Friday, August 22, 2008

यात्रा चर्चा : बस्तर जहाँ दी हुई कंघी को रख लेना ही आपके प्रेम प्रस्ताव की स्वीकारोक्ति है

मैं बस्तर कभी नहीं गया। हाँ ये जरूर है कि आज से सात आठ साल पहले एक परियोजना के तहत हमें दांतेवाड़ा भेजने की योजना थी। परियोजना के लिए पानी इंद्रावती नदी (River Indravati) से लेना था। उस वक़्त इस यात्रा के प्रति रोमांच से ज्यादा भय का अनुभव हुआ था क्योंकि इस बात के चर्चे थे कि वहाँ परियोजना को स्थानीयों के विरोध का सामना भी करना पड़ सकता है और विरोध का तरीका वहाँ जाने वाले अभियंताओं की पिटाई का भी हो सकता है।

खैर, वो परियोजना तकनीकी कारणों से फलीभूत नहीं हो पाई और मैं दांतेवाड़ा (Dantewada) को लगभग भूल ही गया। पर इस महिने बस्तर ब्लॉग पर पत्रकार अंबरीश कुमार ने बरसात में बस्तर की अद्भुत प्राकृतिक छटा और वहाँ के निवासियों के अनूठे रहन सहन और खान पान का जिक्र किया तो लगा कि अगर वो परियोजना आ जाती तो मैं भी उस मोहक छटा का आनंद ले सकता था जिसका अनुभव अंबरीश ने किया।

अपने बेहतरीन आलेख में अंबरीश लिखते हैं.....

".....बरसात में बस्तर कई द्वीपों मे बंट जता है पर जोड़े रहता है अपनी संस्कृति को, सभ्यता को और जीवनशैली को। बस्तर में अफ्रीका जैसे घने जंगल हैं, दुलर्भ पहाड़ी मैना है तो मशहूर जंगली भैसा भी हैं। बरसात में जब इंद्रावती नदी पूरे वेग में अर्ध चंद्राकार पहाड़ी से सैकड़ों फुट नीचे गिरती है तो उसका बिहंगम दृश्य देखते ही बनता है। जब तेज बारिश हो तो चित्रकोट जलप्रपात का दृश्य कोई भूल नहीं सकता। बरसात में इंद्रावती नदी का पानी पूरे शबाब पर होता है झरने की फुहार पास बने डाक बंगले के परिसर को भिगो देती है। ....."

और मन तब अचंभित हो जाता है जब ये पता चलता है कि वहाँ के युवा और युवती स्वयंवर की माला की जगह अब कंघे का इस्तेमाल करते हैं

".......विवाह संबंध बनाने के रीति-रिवाज भी अजीबो गरीब हैं। आदिवासी यु्वक को यदि युवती से प्यार हो जए तो वह उसे कंघा भेंट करता है और यदि युवती उसे बालों में लगा ले तो फिर यह माना जता है कि युवती को युवक का प्रस्ताव मंजूर है।......"






पूरे आलेख में कमी दिखती है तो सिर्फ चित्रों की, जिसे बस्तर के हमारे साथी राजीव रंजन प्रसाद बाल उद्यान पर कुहू के साथ बस्तर की सैर करा कर पूरी करा देते हैं।

किसी जगह के बारे में लिखने में एक आम पर्यटक का नज़रिया वहाँ रहने वाले से भिन्न हो जाता है। हमारी साथी चिट्ठाकार मीनाक्षी धनवंतरी ने सउदी अरब में बिताये अपने दिनों के बारे में जून की अपनी एक पोस्ट में कुछ बेहद रोचक जानकारियाँ सब के साथ बाँटी थीं जिसमें सउदी अरब के उन पहलुओं की झलक मिलती है जिससे आम पर्यटक अछूता ही रह जाता। "प्रेम ही सत्य है": जैसा देश वैसा भेष पर वो लिखती हैं


".....कभी कभी टैक्सी से भी जाना पड़े तो कोई डर नही है, हाँ अकेले होने पर हिन्दी-उर्दू बोलने वाले की ही टैक्सी रोकी जाती है.... सभी लोग अपनी जुबान जानने वाले की टैक्सी में सफर करने में आसानी महसूस करते हैं... एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है बाहर निकलते वक्त अपना परिचय पत्र साथ लेना...परिचय पत्र मतलब इकामा . हम विजय के इकामा की फोटोकापी रखते थे.... जब बच्चे बड़े हुए..उनकी जेब में भी एक एक फोटोकापी रखनी शुरू कर दी


एक बार पतिदेव विजय को मना लिया गया कि मेरी सहेली को उसके घर से लेकर आना है... पहले तो ना नुकर की फ़िर मान गये.. जो डरते हैं शायद वही मुसीबत में जल्दी फंसते हैं, हुआ भी वही.... रास्ते में चैकिंग हुई... महाशय रोक लिए गये... अच्छा था कि मेरी सहेली पीछे बैठी थी.... आगे बैठी होती तो और मुसीबत खड़ी हो जाती.... दोनों की हालत ख़राब....लेकिन खुदा मेहरबान तो बाल भी बांका नही हो सकता..पूछताछ करने पर अपने को कंपनी ड्राईवर कह कर जान बचा कर भागे तो कसम खा ली कि अकेले न किसी महिला को लाना है न छोड़ना है.........."

बस्तर और सउदी अरब के बाद अब चलिए दीपांशु गोयल के साथ कश्मीर की यात्रा पर। विगत दो महिनों से वो सिलसिलेवार ढंग से श्रीनगर से लेकर अमरनाथ तक की अपनी यात्रा का जिक्र कर रहे हैं। अब तक आपने उनके साथ डल झील के तैरते खेतों, हजरत बल की खूबसूरत दरगाह, मुगल बागों और पहलगाम के नयनाभिराम दृश्यों का आनंद लिया।


पर ये जगहें तो वैसी हैं जिन्हें वहाँ जाने वाले हर पर्यटक ने देखा होगा या फिर सुना होगा। आइए आज बात करें अवन्तिपुर के मंदिर की जो कि श्रीनगर से करीब तीस किलोमीटर दूर है। मंदिर में इस्तेमाल पत्थरों की संरचना के बारे में दीपांशु लिखते हैं




"....वहां के गाईड ने तो एक बडी ही आश्चर्य जनक बात बताई की इन पत्थरो को जोडने के लिए किसी भी तरह के बाईन्डिग मैटेरियल का इस्तेमाल नहीं किया है। पत्थरो को आपस में जोडने के लिए अनोखी विधि का प्रयोग किया गया जैसा कि आप फोटो में देख रहे हैं एक पत्थर में छेद बनाया जाता था दूसरे में नुकीला हिस्सा जिन्हे आपस में एक दूसरे पर बिठा दिया जाता था।...."



वहीं डल झील के तैरतों खेतों के बारे में भी उनका अनुभव बेहद रोचक है ..

"...डल की एक खासियत है इसमें तैरते खेत। ये खेत जमीन पर मिलने वाले खेतों के जैसे ही होते हैं। जरुरत की सभी सब्जियां इसमें उगाई जाती है। देख कर आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं कि ये खेत वास्तव नें स्थिर ना होकर झील की सतह पर तैर सकते हैं। इन्हे देख कर तो मैं हैरत में पड गया था। ये तैरते खेत इस बात की मिसाल है कि आदमी अपने आस पास के वातावरण को किस हद तक अपने अनुरुप ढाल सकता है। ..."


तो भई यात्रा चर्चा के इस अंक में आज बस इतना ही। अगली बार फिर मिलेंगे ऍसे ही कुछ और रोचक यात्रा संस्मरणों के साथ..

12 comments:

  1. भाई वाह आपने ढेरो संस्मरणों को एक सूत्र में पिरो दिया ....

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  2. अनुराग जी से पूर्णतया सहमत.. इतने संस्मरणों को एक साथ पिरोना वाकई लाजवाब है.. आप बहुत मेहनत करते है मनीष भाई..

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  3. sach me bastar bahut khoobsurat hai.sirf bastar nahi chhatisgarh ka dusra kona sarguja bhi aadiwasi bahul hai aur wo bhi bastar jaisa hi khoobsurat.ambrish jee mere sampadak rahe hain aur sirf bastar nahi sare desh ko dekhne samajhane ki jabardast ichha hai unme.bastar se vishakhapattanam jane wale rail ka safar to hare-bhare swarg ki sair se kam nahi.khair kabhi bataunga vistaar se.aapne accha likha aur bastar ke bare me sabko bataya aabhar aapka

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  4. बस्तर जाना नहीं हुआ मेरा लेकिन पढ़कर लगा कि क्यों नहीं गया और जाना चाहिए।

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  5. मनीष जी,
    बहुत अच्छा लगा यह आलेख पढ कर। पर्यटन की दृष्टि से अभी इस स्थल में बहुत कुछ किया जाना शेष है, किंतु एस तरह के आलेख इस नैसर्गिक स्वर्ग की ओर लिगों की रुचि अवश्य पैदा करेंगे।

    बहुत कम्पोज्ड आलेख है आपका, बधाई स्वीकारें...

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  6. बहुत सुंदर है आपकी यात्रा चर्चा। कमाल का काम किया है आपने। धन्‍यवाद।

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  7. ये यात्रा पैकेज अच्छा था, एक साथ भिन्न-भिन्न और रोचक जगहों की अच्छी सैर हुई.

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  8. सब यात्रा वृतांत एक जगह एकत्रित करने का यह प्रयास सराहनीय है, साधुवाद. अति आनन्ददायी.

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  9. बहुत सही।

    शुक्रिया आपका उल्लेख करने के लिए।
    अब से चित्रों की कमी न खले इस दिशा में आज के ताज़ा लेख से ही प्रयास शुरु कर दिया गया है।

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  10. आप सब का धन्यवाद इस चर्चा को पसंद करने के लिए!

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