Monday, September 1, 2008

कोलकाता : तोमार कौतो रुप ?

पिछले साल अप्रैल में कोलकाता जाना हुआ था, एक परियोजना के सिलसिले में और तभी मैंने ये प्रविष्टि लिखी थी। अपने बाकी के यात्रा विवरणों से ये सफ़र अलग सा था क्योंकि यहाँ हम घूमने नहीं बल्कि काम के सिलसिले में गए थे। ये पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि किसी भी शहर का सही आकलन वहाँ रहने वाला बाशिंदा ही कर सकता है। बाहर से जो लोग आते हैं वे सिर्फ सतही तौर पर वो बातें कह पाते हैं जो उनके अल्प प्रवास के दौरान उन्हें नज़र आती हैं। आप इस आलेख को इसी दृष्टि से लें....
चलते-चलते ये बताना मुनासिब होगा कि जिस परियोजना की बात इस प्रविष्टि में की गई थी वो अभी भी अपनी जगह अटकी हुई है।
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छोटे शहरों के प्राणी अगर अकस्मात ही अपने आप को एक महानगरीय वातावरण में डाल दें तो वो कैसा महसूस करेंगे !




भागती दौड़ती जिंदगियों के प्रति कौतूहल भरी निगाह...
अपार जनसमूह के बीच अपने खो जाने का भय...
गाड़ियों की चिल्ल पों के बीच ट्राफिक में फँसे होने की खीज...


ऐसी ही कुछ भावनायें मेरे मन में भी उभरीं जब राँची की शांति का त्याग कर मैं कार्यालय के काम के सिलसिले में कोलकाता पहुँचा। कोलकाता मेरे लिए कोई नया शहर नहीं । साल में एक या दो बार इस नगरी के चक्कर लग ही जाते हैं। हावड़ा स्टेशन से निकलते ही हावड़ा ब्रिज की विशाल संरचना आपको मोहित कर देती है । पर ये सम्मोहन ज्यादा देर बना नहीं रहता । टैक्सी, बस और आमजनमानस की भारी भीड़ के बीच अपने को पाकर आप जल्द ही अपने गंतव्य स्थल तक पहुँच जाना चाहते हैं ।
अपने तीन दिनों के कोलकाता प्रवास के दौरान अलग - अलग अनुभवों से गुजरा । इन अनुभवों में एकरूपता नहीं है । कह सकते हैं कि हर्ष और विषाद का मिश्रण हैं ये । इन्हें जोड़कर इस शहर के बारे में कोई बड़ी तसवीर ना बना लीजिएगा क्योंकि इस उद्देश्य से मैंने ये प्रविष्टि नहीं लिखी । 

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हमारी टैक्सी कलकत्ता से हावड़ा के सफर पर जा रही है । ड्राइवर के बातचीत के लहजे से हम सब जान चुके हैं कि ये बंदा अपने मुलुक का है । पूछा भाई किधर के हो ? छूटते ही जवाब मिला देवघर से । जैसे ही उसे पता चला कि हम सब राँची से आए हैं, झारखंड के बारे में अपना सारा ज्ञान वो धाराप्रवाह बोलता गया । थोड़ी देर बाद एक उदासी उसकी आवाज में तैर गई । पहले गाए भैंस हांकते थे साहब, अब कलकत्ता जैसे शहर में इस टैक्सी को हाँक रहे हैं। शहर से कभी-कभार बाहर जाना होता है तो खेत खलिहान देख के बड़ा संतोष मिलता है । अपनी जड़ से उखड़ने का मलाल हर वर्ग को सताता है, पर रोजी रोटी की जुगत उससे कहीं बड़ी समस्या है जो उस गाँव, उन खेतों की छवि को धूमिल किए रहती है ।
खैर, कुछ देर शांति बनी रही ।

फिर बात राजनीति पर छिड़ गई कि मधु कोड़ा झारखंड के लिए क्या कर रहे हैं । मैंने कहा करेंगे क्या वैसे भी कोलिजन की सरकार में तलवार की म्यान पर बैठे हैं । पर मेरी इस बात पर उसने कहा कि जिस तरह अमरीका में दो दलों से लोकतंत्र चलता है वैसा ही कुछ झारखंड में होना चाहिए तभी विकास को कुछ दिशा मिल सकेगी । उसकी राजनीतिक समझ पर मैं चकित रह गया । जिसने हाईस्कूल से ऊपर की पढ़ाई नहीं की वो अमेरिका के राजनीतिक परिवेश की खबर रखता है ...ये शायद अपने देश में ही संभव है ।

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हमारी टीम हावड़ा में एक बंद पड़ी सरकारी मिल का निरीक्षण करने गई थी । वहाँ एक नई मिल लगाने की योजना है । देखना ये था कि ये निवेश हमारी कंपनी के लिए कितना लाभकारी है । लगभग दो साल से बंद पड़ी मिल में अब मुशकिल से १५० कर्मचारी रह गए हैं । बाकी सब ने वी. आर. एस ले रखा है । पर बाकी के मजदूर अभी भी आस लगाए बैठे हैं कि उनकी मिल एक ना एक दिन चलेगी । ऊपर से कहीं भी यूनियन के हल्ले हंगामे की बात नहीं, बस एक उम्मीद उन हाथों को फिर मशीनों पर चलते देखने की । क्या ये वही बंगाल है मैं समझ नहीं पा रहा था ? हमारे आने से उनके चेहरे की चमक देखती ही बनती थी । पुरानी पड़ी जंग खाती मशीनों के बारे में इतने फक्र से बताते कि साहब ये जापान से आई थी अभी भी तेल डालने से जम कर चलेगी । पर हम सब कहाँ जुड़े थे उनकी भावनाओं से । हमारे लिए तो बस वो सिर्फ लोहे का टुकड़ा थीं जिनका वजन ही उनकी एक खासियत थी । अपना काम निपटा कर वहाँ से तो चले आए पर उन आशाओं का बोझ भी शायद अदृश्य सा साथ चला आया।
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सुबह का अखबार पं बंगाल को लड़कियों के शारीरिक शोषण में पहला स्थान दे रहा था। रेडियो मिर्ची की उदघोषिका गीतों के बीच इस संबंध में अपने प्रश्न रख रही है और शर्मिन्दगी का अहसास श्रोताओं के मन से उभर रहा है पर क्या ये काफी है ? कम से कम मेरे लिए ये बात विस्मित करने वाली थी क्योंकि बंगाल में नारी जागरुकता , शिक्षा और समाज में उनकी भागीदारी अन्य राज्यों से बेहतर है।

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शाम के सात बज रहे हैं। मैं कोलकाता के मुख्य केंद्र स्पलेनैड में हूँ । कोलकाता में स्पलेनैड इलाके का वही महत्त्व है जो दिल्ली में कनाट प्लेस का चौरंगी की सड़कें खरीददारों और विक्रेताओं से अटी पड़ी हैं । माहौल एक छोटे शहर के हिसाब से एक उत्सव का है। युवक युवतियाँ चुस्त चमकदार पोशाकों में हर जगह हँसते खिलखिलाते नजर आ रहे हैं। हमेशा वाली नमी की अधिकता , आज चल रही तेज हवाओं से महसूस नहीं हो रही है । न्यू मार्केट में हमेशा की तरह अंतिम बारगेन प्राइस बोल कर खरीददार भाग रहे हैं और विक्रेता तेज कदमों से उनका पीछा कर अंतिम मूल्य पर उनकी रजामंदी की कोशिश कर रहे हैं । पर उधर उस छोटी सी दुकान में भीड़ कैसी ? अरे ये तो संगीत से जुड़ी लगती है...उससे क्या जनाब ये कोलकाता है ..यहाँ संगीतप्रेमियों की कमी नहीं ।

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रात्रि के ९.३० बज चुके हैं । मेरे एक सहयोगी पान खाने के लिए चार सितारा होटल से बाहर निकले हैं । पान का रस लेते हुए वापस लौट ही रहे हैं कि बगल में हाथों से चलाता एक रिक्शावाला दौड़ता हुआ आता है और कहता है ..
जाबे...?मित्र जवाब देते हैं नहीं यार यहीं होटल में जा रहा हूँ, तुरंत प्रत्युत्तर मिलता है

चाहिए ? स्कूल, कालेज सब मिलेगा
अब वस्तुस्थिति भांपते हुए तेज कदमों से घबराए हुए होटल की चौहद्दी में प्रवेश करते हुए राहत की सांस लेते हैं

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अगले दिन वापसी की शाम हम सब बेलूर मठ में है । मठ परिसर के अंदर घुसते ही मन प्रसन्न हो जाता है । नदी की ओर से आती शीतल हवा ,सर्वत्र हरियाली और बीच बीच में बने भव्य मंदिर । पर परिसर के अंदर का ये खूबसूरत नागफनी अपनी ओर अनायास ही ध्यान खींच लेता है । मन सोच में पड़ जाता है । कैसा रूप है इसका ऊपर से कितना भव्य कितना सुरचित पर नजदीक से देखो तो कांटे भी नजर आते हैं । बहुत कुछ अपने शहर की तरह जिसकी मिट्टी में ये उगा है !

9 comments:

  1. .

    भालो बर्नन छिलो, मनीश बाबू,
    ए ई रकमे भालो जीबंतो बर्नन दिते पारबेन, आपनी !

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  2. झकास .......बोले तो .अपुन तो पहले से ही फ़िदा है आपकी यात्रा व्रतांत पर.......ओर जो पहली लाइना लिखी है आपने एकदम कोर्रेक्ट बोले तो....

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  3. आपने पूरे कोलकाता का चित्र खींच दिया।

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  4. कोलकाता तब गया था जब कलकत्ता हुआ करता था. अब कितना याद होगा ये आप अनुमान लगा सकते हैं, पर आपका वृतांत है तो फिर कहे की टेंसन !

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  5. pehli baar jaaney per to yahi upajta hai---IS SHAHAR ME HAR SHAKS PARESHAAN SA KYU HAIN? ..beluur jaa kar vapas aaney ka mun nahi karta kabhi bhii...

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  6. safar mein sath ghoumne ka ahsaas hua. nice

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  7. जवाब नही आपके लिखने के अंदाज का ..हम भी साथ साथ ही घूम लिए ..पर लगता है की भारत में बहुत कुछ अनदेखा है अभी भी ..

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  8. बेहद रोचक वर्णन रहा मनीष भाई
    सिर्फ एक और अनुरोध है ...
    आप जैसे सँगीत के जानकार से,
    यात्रा हो या अन्य लेख,
    उसीके अनुरुप
    एक गीत भी अवश्य लगाया करेँ !
    ..आपसे यही उम्मीद है .
    आशा है,
    सुनवायेँगेँ :) ..
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  9. अमर भाई आपकी टिप्पणी का बंगाली अंदाज पसंद आया। :)

    ये पोस्ट मेरे दिल के बेहद करीब है इसलिए आप सबका इसे सराहना एक संतोष दे गया।

    लावण्या जी कम से कम इस पोस्ट के साथ रवीन्द्र संगीत से जुड़ी कोई ढ़ुन मुझे बजानी चाहिए थी पर मेरे संग्रह में ऍसा कुछ था नहीं। पर आपका सुझाव पसंद आया। अगर कभी कुछ माकूल हुआ तो उसे यहाँ पोस्ट के साथ दालने की कोशिश करूंगा।

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