Friday, February 8, 2013

यादें अंडमान की (Andaman Memoirs) : वो मेरी पहली विमान यात्रा.. इठलाती परिचारिकाएँ और टूटता डैना.

मुसाफ़िर हूँ यारों पर अब तक आप सिक्किम, पचमढ़ी और केरल की यात्राओं के बारे में पढ़ चुके हैं। अब आपके सामने ला रहा हूँ अपनी अंडमान यात्रा के संकलित संपादित अंश जिसे करीब दो वर्ष पूर्व एक शाम मेरे नाम पर प्रकाशित किया था। अंडमान की ये यात्रा मैंने २००४ नवंबर में की थी यानि सुनामी आने के ठीक एक महिने पहले। अपनी अब तक की यात्राओं में अंडमान जैसा विविधतापूर्ण सौंदर्य मैंने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। अंडमान की वो यात्रा मेरी पहली हवाई यात्रा थी इसलिए इस कड़ी की शुरुआत उस पहली हवाई यात्रा के संस्मरण से....


कोलकाता से अंडमान जाने की वो फ्लाइट 11 बजे की थी । 9-9.30 बजे तक हम टैक्सी में सवार होकर एयरपोर्ट के रास्ते में थे । मेरे लिए या यूँ कहें कि मेरे परिवार के लिए हवाई यात्रा का वो पहला अनुभव था । हवाई अड्डे पर चेक इन की औपचारिकता से लेकर पोर्ट ब्लेयर तक पहुँचने में जो कुछ भी हुआ वो हम सब के लिए अनूठा अनजाना अनुभव था । बच्चों को एस्कलेटर पसंद आया तो मुझे समान ढ़ोने वाली ट्राली । ट्रेन के सफर में भारी भरकम बोझ को ढ़ो कर चलने के बाद इस तरह की व्यवस्था देख के मन को सुकून मिला कि चलो कुलीगिरी के काम से तो मुक्ति मिली :)।


हवाई अड्डे की लांज में सामूहिक चित्र लेने के बाद बस पर चढ़ कर विमान की ओर चल पड़े। विमान में सीट लेने के पहले एक मसला और भी था । किसी ने हमारे टीम लीडर को बताया था कि विमान उतरते वक्त अंडमान द्वीप का सुंदर दृश्य सिर्फ दायीं ओर की खिड़की से दिखाई देता है । जाहिर है ये सूचना हमें अपने कार्यालय के पूर्ववर्ती यात्रियों से प्राप्त हुई थी । पर इस जानकारी के बावजूद हमें दाहिनी ओर की सिर्फ एक ही सीट मिली । सो हम मन मसोस कर बाँयी ओर की खिड़की के पास बैठ गए । पर सूचना देने वाले ने ये निष्कर्ष सुबह की फ्लाइट में अपने अनुभव पर बताया था । विमान के समय में परिवर्तन की वजह से धूप ने अपना रुख बदला और अंडमान हमें बांयीं ओर से भी दिखा और अच्छी तरह दिखा ।



एलायन्स एयरवेज की इस उड़ान में मुझे सीट पीछे वाली मिली थी । पर खिड़की से बाहर का नजारा बिना किसी अवरोध के नजर आ रहा था । मेरे बगल वाली सीट खाली थी । यात्रा की शुरुआत में ही एक विमान परिचारिका आई और उसने अपना बैग वहाँ रख दिया। मैंने मन ही मन प्रभु को धन्यवाद दिया कि वाह शुरुआत इतने शुभ तरीके से हो रही है तो आगे बात ही क्या ! पर मेरी ख्वाबों की ये उड़ान क्षणिक साबित हुई क्यूँकि बैग रखने की प्रक्रिया उसकी सहयोगियों द्वारा दोहराई जाती रही । देखते ही देखते हमारी बगल की सीट बैग स्टोरेज यार्ड में तब्दील हो गई। मन ही मन प्रभु को कोसा कि हे प्रभु ! तुम्हारी कैसी ये माया है ? पहले तो ख्वाबों के सब्जबाग दिखाते हो और फिर बड़ी बेरहमी से उनकी बाट लगाते हो

विमान उड़ान भर चुका था और नेताजी सुभाष चंद्र बोस हवाई अड्डे का रनवे पीछे छूट चुका था । विमान के अंदर बदले हालातों को देखकर दुखी मन से मैंने बाहर खिड़की की ओर नजर घुमाई । सामने का दृश्य भयावह था..डैने का एक हिस्सा रह-रह कर खुल जा रहा था । टेक आफ के समय विमान दुर्घटना के किस्से तो पहले ही सुन रखे थे । ऊपर से एलायन्स के खस्ता हाल विमानों पर पढ़ा हुआ लेख भी स्मृतियों की चारदीवारी लांघता हुआ एकदम से कौंध गया । प्रभु को दीन-हीन मुद्रा में मन ही मन फिर याद किया....क्यूँ अंडमान घूमें बगैर ही अपने पास बुला लेना चाहते हो ! खैर, जी को कड़ा किया और यही सोचा कि समय रहते देख लिया है । अगर डैने का कुछ हिस्सा टूट कर गिरे तो सबसे पहले मैं जरूर चालक दल को ये बता पाऊंगा कि भैया यहीं कुछ गड़बड़ लग रियो है । पर ८-१० मिनट के सूक्ष्म अध्ययन के बाद दिमाग की घंटी बजी की ये जो कुछ हो रहा है वो विमान के एयरोडॉयनमिक प्रतिरोध को कम करने के लिये हो रहा है ।
अपनी जान को सुरक्षित जान अब खिड़की से बाकी सब जो दिख रहा था उस पर ध्यान देना शुरु किया । नीचे था आयताकार खेतों का जाल और उसको लकीर की तरह चीरती सड़कें और बीच-बीच में छोटे बड़े जल मग्न क्षेत्र । फिर दिखा गंगा का डेल्टा...ऐसा लगता था कि जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के बीच नदी की अगिनत
धाराओं ने एक जटिल जाल सा बुन रखा है।

सब कुछ अद्भुत सा लग रहा था । शायद इसलिए भी की पहली बार इतनी ऊँचाई से इस दृश्य को देखने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था । डेल्टा क्षेत्र के समाप्त होते ही बाहर के दृश्य धुंधले पड़ गए । सिर्फ दिख रही थी एक नीली चादर जो दूर क्षितिज के पास जाकर एक उजली लकीर में तब्दील हो जाती थी। ये चादर ऊपर फैले आकाश की है या नीचे बहते समुद्र की ये निर्णय ले पाना काफी कठिन था ।

अब ध्यान अंदर की और लौटा । दुबली पतली परिचारिकाएँ इठलाती हुई अपनी मशीनी मुस्कुराहट के साथ लोगों को जलपान करा रहीं थीं। उन्होंने अब बगल में बनाए बैग स्टोरेज यार्ड को खाली कर लिया था । मैंने उड़ती निगाह अपने सहयात्रियों पर डाली । निगाह जाकर उसी आकर्षक बाला पर टिकी जिसे पहले बस पर भी देखा था । आगे की सीट पर बैठे खेतवाल जी (मेरे वरीय सहकार्मिक) भी उसी को ताड़ते दिखे। सूचना भाभी जी तक पहुँची तो खेतवाल जी ने सारा इलजाम मेरे सिर मढ़ा कि मनीष ने ही बस पर चढ़ते समय उधर ध्यान दिलाया था। बतायें इस कलयुगी जमाने में है ना...नेकी कर दरिया में डालने वाली बात ।
भोजन करने के बाद परिचारिका को ट्रे वापस करने लगे तो दो एक रैपर नीचे जा गिरे। तेजी से उन्हें उठाने के लिए ज्यों ही हाथ बढ़ाया कि परिचारिका का हँसता खनखनाता सा स्वर सुनाई दिया

PLEASE RELAX !
मन ही मन गुस्सा आया कि यहाँ मैं इसकी सहायता के लिए तेजी दिखा रहा हूँ और ये समझ रही है कि इसे देख कर घबराहट में रैपर गिरा रहा हूँ । सोचा कह दूँ - इतना इतराने की जरुरत नहीं, आपसे कहीं ज्यादा सुंदर सहयात्री मौजूद हैं इस विमान में, पर कह ना सका । चुपचाप बिना उसे देखे ट्रे वापस की और ध्यान वापस मोड़ा ।

सफर करते हुए एक घंटे से ज्यादा हो चुके थे और 20-25 मिनट में अंडमान आने ही वाला था । खिड़की से बादलों का घना झुंड बड़ा प्यारा लग रहा था । हमारा विमान अब नीचे की ओर जा रहा था । कुछ ही देर बाद पहला द्वीप दिखा । बीच में गहरा हरा रंग और किनारे किनारे धानि और पीले से द्वीप के चारों ओर फैली एक लकीर । पहले तो गहरे हरे और धानि के अंतर को कि इसमें जंगल का रूप कौन सा है समझ ना सका। फिर पता चला कि द्वीप के किनारे की धानि लकीर छिछले समुद्र की है और पीली लकीर बालू का किनारा है, जिसने द्वीप को चारों ओर से घेर रखा है । पाँच-दस मिनटों के बाद हम पोर्ट ब्लेयर के ऊपर मंडरा रहे थे । चारों ओर हरे भरे पेड़ और जंगल दिख रहे थे। विमान के उतरने पर थोड़ा अजीब सा अहसास होता है और सर भी घूमने सा लगता है ।

तो क्या था पोर्ट ब्लेयर की जमीं पर हमारा पहला अहसास ?
नवंबर के महिने में ३२ डिग्री की उमस और गर्मी कितनी भिन्न थी राँची की इतने ही तापमान पर रहती खुशनुमा ठंडक से । होठों पर अनायास ही ये गीत तैर गया
ये कहाँ आ गए हम, यूँ ही साथ-साथ चलके....अगले हिस्से में आपको सुनाएँगे अंडमान में बिताये पहले दो दिनों का हाल . ..

आप फेसबुक पर भी इस ब्लॉग के यात्रा पृष्ठ (Facebook Travel Page) पर इस मुसाफ़िर के साथ सफ़र का आनंद उठा सकते हैं।

16 comments:

  1. बहुत रोचक लगी यह यात्रा ..अगली कड़ी का इन्तजार करते हैं ..अंडमान वाकई सुन्दर जगह है

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  2. रोचक यात्रा विवरण.आभार.

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  3. Rochak yatra rahi apki...

    aage ka intzaar rahega...

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  4. वाह, मजा आ गया आपकी विमान यात्रा के बारे में पढ़ के, खूब रोचक रहा था आपके लिए वह हवाई सफ़र ही ही ही!! :D

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  5. दिलचस्प है भाई...... वैसे आजकल ताड़ना मना है ....

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  6. बहुत सुंदर, ओर मजेदार, एक सलाह दे रहा हुं बिन मांगे अगली बार जब भी बेठॊ घर से छतरी साथ ले जाना भाई कुच हो वो गया तो ? तो भईया छतरी खोल कर झट से कूद जाना....:)
    धन्यवाद

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  7. वाह! मजा आया फ़िर से पढकर! पहले तो पढ ही चुकी हूं .:)

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  8. Humari bhi paheli viman yatra andman ki hi thi .
    Aapne purani yadein taza kar di.
    Yatra vritant sajiv aur rochak tha.
    Us sundar ladki ka kya hua? Janene ki pratiksha rahegi

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  9. पालीवल भाई होना क्या था वहाँ से निकल कर वो गुम हुई पर फिर दिखी तीन दिन बाद हैवलॉक में..पर जहाँ सुंदर लड़की होगी वहां ब्वॉयफ्रेंड भी होगा ना :)

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  10. Kulwant SharmaMarch 11, 2009

    बहुत जोरदार है.

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  11. one of a kind description! lovely. ur blog has a pure positive feel bhai . keep it up!

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  12. Manish, I have to bookmark your blog. Really enjoyed your post. I linked to one of your posts here-

    http://www.blogbharti.com/mridula/travel/a-trip-to-rangat-andman/

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  13. I m going keral for 5 night give me some tip for kerala

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    1. Spend 1 night at Kochi, 1 at Thekkadi, 1 at Allepy 2 nights at Munnar. If there is a time shortage you can omit Kochi. For more details you can refer following link

      http://travelwithmanish.blogspot.in/search/label/Kerala

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  14. मनीष जी..... हमने अभी तक हवाई जहाज यात्रा नहीं की...अब सोचता हूँ कि एक बार तो यात्रा कर हूँ ली...| वैसे अंडमान जाने और घूमने का खर्चा करीब कितना हो सकता हैं....कृपया बताये....

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  15. एक आदमी के लिए 40 हजार मानकर चलें

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