Sunday, March 29, 2009

यादें अंडमान की : बारिश में भीगी-भीगी सी वो हैवलॉक की समुद्री यात्रा

इस श्रृंखला की पिछली प्रविष्टियों में आपने पढ़ा कि किस तरह इठलाती बालाओं और विमान के टूटते डैने के संकट से उबर कर अंडमान पहुँचा और सेल्युलर जेल में ध्वनि और प्रकाश का सम्मिलित कार्यक्रम वहाँ के गौरवमयी इतिहास से मुझे रूबरू करा गया। अगले दिन रॉस द्वीप की सुंदरता देख और फिर नार्थ बे के पारदर्शक जल में गोते लगाकर मन प्रसन्न हो गया अब आगे पढ़ें....


तीन दिनों से अच्छी खासी धूप खिलाने के बाद सूरज देवता को विराम लेने की सूझी । और रात से ही मूसलाधार वर्षा शुरु हो गई । सुबह फोनिक्स जेटी (Phoenix Jetty) के आस-पास का समुद्र शांत लग रहा था। बारिश भी थम गई सी लगती थी । सुबह ९ बजे जैसे ही गेस्ट हाउस के बाहर निकले बारिश फिर प्रारंभ हो गई । खैर, जाना तो था ही क्योंकि पहले तीन दिनों में हमने इतनी कम जगहें निबटाईं थीं कि चौथे दिन के लिए हमारे पास अपने कार्यक्रम को आगे-पीछे करने की गुंजाइश ही नहीं बची थी।

सो तेज बारिश के बीच भागते दौड़ते हम अपने पहले गन्तव्य चाथम (Chatham) के लकड़ी के कारखाने तक पहुँचे । चाथम, पोर्ट ब्लेयर के उत्तरी सिरे में अवस्थित एक छोटा सा द्वीप है । पोर्ट ब्लेयर से चाथम तक पहुँचने ले लिए समुद्र के ऊपर एक सेतु से होकर पहुँचते हैं। ये सेतु अंग्रेजों ने यहाँ की सॉ मिल के निर्माण के समय बनवाया था । ये सॉ मिल दक्षिण पूर्व एशिया की सबसे बड़ी मिल मानी जाती है। अब मिल की ऐतिहासिक प्रसिद्धि जो भी रही हो, बारिश में भींगते हुए उसे देखना हमें नागवार गुजरा। मिल में जहाँ -तहाँ लकड़ी के ढ़ेर दिखे । यहाँ तक कि इतनी बड़ी मिल में चलती हुई मशीनें इनी-गिनी ही दिखाई पड़ीं। सो वहाँ से जल्दी हम सब जल्दी कट लिए और Mini Zoo होते हुए नृविज्ञानी (एन्थ्रापोलोजिकल ) संग्रहालय पहुंचे।

संग्रहालय दर्शनीय लगा । अंडमान की सारी आदिम जन जातियों की वेश भूषा और उनके रहन सहन के बारे में अच्छी जानकारी मिली । जारवा (Jarva), सेंटीनल (Sentinal) और ओंगी (Ongy) तो काफी हद तक एक जैसे दिखे। जान कर आश्चर्य हुआ कि इन सबकी आबादी कुल मिलाकर 1000 से भी कम है । निकोबारी (Nicobari) ही एकमात्र ऐसी जनजाति है जो आम लोगों से बिल कुल घुल -मिल गये हैं और उनकी संख्या भी सबसे ज्यादा है। उनके नाक- नक्श बहुत कुछ मंगोलाएड (Mangoloid) रेस से मिलते-जुलते हैं । अपनी यात्रा के आखिरी चरण में इन आदिम जन जातियों में से एक से रूबरू होने का सौभाग्य मिला। पर उस प्रकरण के लिए आपको थोड़ा इंतजार करना होगा। वैसे अगर आपकी नृविज्ञान में रुचि नहीं तो 'समुद्रिका' चले चलें । समुद्र में रहने वाले जीवों और दुर्लभ कोरलों का अभूतपूर्व संग्रह है वहाँ पर !
भोजन का वक्त आ चुका था और इंद्र देव भी कुछ देर के लिए शांत हो गए थे । हमें भोजन उपरांत अंडमान के सबसे खूबसूरत द्वीप हैवलॉक की ओर कूच करना था । तड़तड़ाती बारिश के बीच 12.30 पर हम अपने जहाज के करीब पहुंचे । MVS Jollybuoy हमारी प्रतीक्षा में तैयार खड़ा था। एसी केबिन में जहाँ हमारी सीटें थी, वहाँ पहुँचने के लिए पहले जहाज के डेक पर जाना पड़ता था और फिर नीचे । अंदर जाते वक्त ख्याल यही था कि खिड़की के नजदीक से बाहर का नजारा देखने को मिलेगा या नहीं । पर अंदर जाने पर पता चला कि वो खिड़की एक छोटी तश्तरी से ज्यादा बड़ी नहीं है और उसका तल समुद्री जल के स्तर से थोड़ा सा ही ऊपर है । यानि उसमें ज्यादा ताक-झांक करने का स्कोप नहीं। सो धीमी बारिश में ही हम केबिन छोड़ ऊपर जहाज की डेक पर जा पहुँचे ।

जीवन में कुछ क्षण ऍसे आते हैं जिन्हें अपने स्मृति पटल से कभी मिटाया नहीं जा सकता । जहाज के ऊपर के डेक पर कदम रखते ही जो मंजर आँखों के सामने दिखा उसका शुमार मैं ऐसे ही कुछ पलों में करता हूँ।

चारों ओर पानी की विशाल नीली चादर....
दूर दूर तक ना कोई पेड़ पौधे ना किसी पंक्षी की झलक...
बारिश और हवा के साथ उठती गिरती लहरें, मानों अट्टाहस कर रही हों, चुनौती दे रही हों कि क्या मुझको भेद पाओगे ?
पर हमारा MVS Jollybuoy कब पीछे हटने वाला था...
वो तो उन लहरों को चीरता हुआ समुद्र के बीचों-
बीच एक सफेद लकीर खींचता चला जा रहा था।
एक अजीब सी निस्तब्धता थी उस माहौल में...
एक पल को दिल सहम सा गया था पर कुछ ही पलों में प्रकृति का ये अनजाना रूप मन में समा गया था।
ऊपर के इस दृश्य को देखने के बाद नीचे जाने का सवाल ही नहीं था क्यूँकि हम सब ये जानते थे कि ऐसी सुखद अनुभूति कि पुनरावृति शायद फिर ना हो । आकाश में अभी भी बादलों का डेरा था जिसकी हलकी फुहारें रुक-रुक कर हमें भिंगोने पर तुली हुईं थीं। पर हवा का वेग जैसे जैसे बढ़ता गया, बादलों की सेना पीछे की ओर हटने लगी और यात्रा शुरु होने के डेढ़ घंटे बाद बारिश थम ही गई । हमें अपनी बायीं तरफ हरे भरे जंगलों से भरा हैवलॉक द्वीप दिखाई दे रहाथा । कुछ ही देर में दाहिनी ओर भी जमीन पर नारियल के झुंड दिखने लगे। लोगों से पता चला कि ये नील द्वीप (Neel Island) है और हमारा जहाज यहाँ होते हुए हैवलॉक की ओर मुड़ेगा ।

सारे समूह की मायूसी बढ़ती जा रही थी । सबने सोचा था कि अगर साढ़े चार तक भी हैवलॉक पहुँचेगे तो कुछ देर तट पर समुद्र से अठखेलियाँ करने का अवसर मिलेगा। पर जहाज नील से होकर जाएगा ये जानने पर सबके समक्ष ये साफ हो गया कि शाम के पहले हम हैवलॉक नहीं पहुँच पाएँगे । नील आते ही शिप के डेक पर भीड़ बढ़ गई। चढ़ने -उतरने वाले ज्यादातर स्थानीय थे तो जो शायद पोर्ट ब्लेयर से रोज आते -जाते थे। नील द्वीप पर हमारे जहाज को मुड़ते हुए वापस हैवलॉक की ओर जाना था।

हैवलॉक (Havelock), अंडमान के बड़े द्वीपों में एक है। हमारा जहाज मुड़ने के बाद अब इस द्वीप के दूसरे सिरे पर आ गया था। हैवलॉक पहुँचते- पहुँचते शाम के सवा पाँच बज चुके थे।नवंबर मैं वैसे भी दिन छोटा होता है सो अँधेरा लगभग हो चला था। हैवलॉक हमारी इस यात्रा का मुख्य आकर्षण था। इसकी सुंदरता के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। लिहाजा सबके मन में यही उधेड़बुन थी कि वो हमारी आशाओं के अनुरूप निकलेगा या नहीं । क्या हैवलॉक वैसा ही था जिसकी कल्पना हमने की थी ?

4 comments:

  1. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा..यादें फिर लौट आयीं..२ सप्ताह पहले ही पोर्ट ब्लेयर से लौटा हूँ...जानकार गर्व होता है की हमारा भारत कितना विशाल, सुंदर और विविधताओं से भरा देश है.

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  2. लिखते चलें ... बढिया चल रहा है मनीष जी ।

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  3. Waah wah... maza aa gaya...padh ke bhi aur tasveer dekhe ke bhi...

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  4. चाथम की मिल और हैवलॉक तक की यात्रा तो बढ़िया रही लेकिन वहाँ तक पहुँच के काहे रूक गए, हैवलॉक का हाल भी बाँच देते! :)

    अगली कड़ी की प्रतीक्षा है अब!

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