Thursday, April 16, 2009

यादें अंडमान की : अंडमान ट्रंक रोड सफारी और जारवा से रूबरू होने का खौफ़

इस श्रृंखला की पिछली प्रविष्टियों में आपने पढ़ा कि किस तरह इठलाती बालाओं और विमान के टूटते डैने के संकट से उबर कर अंडमान पहुँचा और सेल्युलर जेल में ध्वनि और प्रकाश का सम्मिलित कार्यक्रम वहाँ के गौरवमयी इतिहास से मुझे रूबरू करा गया। अगले दिन रॉस द्वीप की सुंदरता देख और फिर नार्थ बे के पारदर्शक जल में गोते लगाकर मन प्रसन्न हो गया। हैवलॉक तक की गई यात्रा मेरी अब तक की सबसे अविस्मरणीय समुद्री यात्रा रही।
हैवलॉक पहुँच कर हमने अलौकिक दृश्यों का रसास्वादन तो किया ही साथ ही साथ समुद्र में भी जम कर गोते लगाए। हैवलॉक से तो ना चाहते हुए भी निकलना पड़ा पर अब हम चल पड़े उत्तरी अंडमान की रोड सफॉरी पर। आज इस श्रृंखला में पढ़िए इस सफॉरी के दौरान मेरे अनुभवों का लेखा जोखा.....


वैसे तो घर पर शायद ही कभी सात बजे से पहले उठते हों पर अगली सुबह साढ़े पाँच तक सूर्योदय देखने समुद्र तट की ओर चल पड़े। बाहर मौसम सुहावना था। आकाश में हल्के-फुल्के बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। बादलों की इस चहलकदमी ने सूरज को अपना चेहरा दिखा पाने का मौका नहीं दिया था। समुद्र तट शांत था। लहरें भी सूर्य किरणों के लिए प्रतीक्षारत थीं कि कब उनकी झलक मिले और वो उछल-उछल कर अपनी खुशी का इजहार कर सकें। पर सूरज की इस वादाखिलाफी पर एक ठंडी साँस छोड़ते हुए यही तो कह सकते थे

हमसे वादा था एक सवेरे का
हाए कैसे मुकर गया सूरज !

मछुआरे अपनी नाव को समुद्र में ले जाने की तैयारी में व्यस्त दिखे। हम तट के किनारे-किनारे इन दृश्यों को देखते और शांत स्वच्छ वातावरण का आनंद लेते हुए घंटे भर चलते रहे।

हैवलॉक से वापस लौटने का मन जरा सा भी नहीं हो रहा था। पर साढ़े आठ की फेरी से वापस पोर्ट ब्लेयर की राह पकड़नी थी। वैसे तो हैवलॉक से मध्य अंडमान जाने के लिए लोग यहीं से जहाज में रंगत तक चले जाते हैं और फिर वहाँ से सड़क मार्ग से मायाबन्दर (Mayabundar) और दिगलीपुर (Diglipur) का रुख करते हैं। हम सब जब अंडमान के लिए चले थे तो रंगत (Rangat) का कार्यक्रम निश्चित नहीं था । इसी वजह से हमें वापस पोर्ट ब्लेयर लौटना पड़ रहा था। इस बार भी हमारा जहाज नील द्वीप से होते हुए ही जा रहा था।

वापस आते समय वातानुकूलित कक्ष में ही बैठे रहे क्यूंकि डेक पर तीखी धूप थी। बाहर समुद्र अशांत था और लहरें काफी ऊँची उठ रही थीं। नील तक जहाज को लहरों की दिशा के लम्बवत बढ़ना था। लहरों की तीव्र मार से जहाज कभी बायीं तो कभी दाहिनी ओर झुक रहा था। थोड़ी ही देर में मेरा सिर चकराने लगा। मैं भागते हुए जहाज की एक छोर की रेलिंग के पास जा पहुँचा । ऊँची उठती लहरों का पानी जहाज के अंदर तक आ रहा था। मेरी जैसी स्थिति कई और सहयात्रियों की भी थी। एक घंटे के भीतर मैं उदर के अंदर के सारे पदार्थ समुद्र में विलीन कर चुका था। नील के आगे जब जहाज ने अपनी दिशा बदल ली और लहरों के साथ हो लिया तब मैंने राहत की साँस ली।
दिन का दूसरा भाग हमने सेलुलर जेल में बिताया । उसकी चर्चा मैं पहले ही कर चुका हूँ।


समुद्र तो अब तक काफी देख चुके थे इसलिए अगले दिन हमने मध्य अंडमान के जंगलों की ओर रुख करने का निश्चय किया। हमें अंडमान ट्रंक रोड से मध्य अंडमान में रंगत तक जाना था। भौगोलिक रूप से अंडमान द्वीप तीन भागों में बँटा है...उत्तरी अंडमान, मध्य अंडमान और दक्षिणी अंडमान। पोर्ट ब्लेयर, दक्षिणी अंडमान का मुख्य केंद्र है। इसके दक्षिण में लिटिल अंडमान और निकोबार द्वीप समूह हैं जिन्होंने सुनामी में भारी तबाही सही थी।


तो इससे पहले कि इस रोड सफारी पर आप को ले चलूँ एक नजर इस सड़क के इतिहास की ओर। जैसा कि आप बगल के नक्शे में देख सकते हैं कि ३४० किमी लंबी अंडमान ट्रंक रोड, पोर्ट ब्लेयर को अंडमान के उत्तरी सिरे से जोड़ती है । अंडमान ट्रंक रोड का निर्माण और अब इस पर आवागमन शुरु से ही विवादों के घेरे में रहा है। विवाद का केंद्र रहा है इसका 129 किमी लंबा वो हिस्सा जो जारवा जनजाति के लिए सुरक्षित जंगलों से होकर गुजरता है। सत्तर के दशक में तमाम विरोधों के बाद इस पर काम शुरु हुआ और अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में इस पर यातायात संभव हो सका। जारवा समुदाय के लोगों ने ने शुरुआत में इस सड़क से अपने आप को दूर रखा पर 1998 में वे पहली बार इस सड़क पर बाहरी दुनिया के अनजान लोगों से मिलने के लिए बाहर निकले। अन्यथा उसके पहले तक बाहरी दुनिया के लोगों के मिलने पर ये सीधे अपने तीर कमान से हमला बोल देते थे। आजकल तो ये सरकार के स्वास्थ केंद्रों पर खुद पहुँच जाते हैं और सैलानियों से भी बिस्कुट, केले आदि सहर्ष ले लेते हैं। पर ये दोस्ताना रवैया उनके भोजन,रहन सहन को गलत ढ़ंग से प्रभावित कर रहा है, ऍसा NGO और नृविज्ञानी मानते हैं। इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने २००२ में अंडमान ट्रंक रोड के इस हिस्से को बंद करने का आदेश दिया था। पर इस फैसले को अभी तक कार्यान्वित नहीं किया जा सका है ।


हमारी रोड सफारी करीब आठ बजे शुरु हुई। जारवा इलाकों में घुसने के पहले ट्रैवल एजेन्ट को परमिट लेनी पड़ती है। छोटे-छोटे गांवों को पार करते हम जिरकाटांग के पहले चेकपोस्ट के पास पहुंचे। चेकपोस्ट से जारवा क्षेत्र में गाड़ियाँ पुलिस बंदोबस्त के साथ काफिले में चलती हैं। चेकपोस्ट कुछ कुछ समय के बाद खुलता है। रास्ते में जारवा अगर दिख भी जाएँ तो गाड़ी रोकना मना है। पर कभी-कभी कारवां लंबा हो जाता है तो जारवा हाथ देकर गाड़ियों को रुकवा लेते हैं और खाद्य पदार्थ और प्लॉस्टिक की बोतलों की मांग करते हैं। जिरकाटांग से आगे हमारी नजरें और चौकस हो गईं । जंगल से हो रही कोई भी सरसराहट हमें उधर आँखें फाड़ने को विवश कर देती थी । पर मुझे जारवा नहीं दिखे, अलबत्ता हमारे दो साथियों को वन विभाग की खड़ी गाड़ी में एक जारवा महिला और
बच्चे के क्षणिक दर्शन जरूर किये।


जिरकाटांग से बाराटांग (Baratang) के बीच का रास्ता शीतोष्ण वनों से आच्छादित मिला। दोनों ओर घने जंगल और बीचों बीच पतली सर्पीलाकार सड़क एक ऐसा मंजर प्रस्तुत करते हैं जो किसी भी समुद्री तटीय पर्यटन स्थल में दुर्लभ है। रोड के किनारे किनारे जारवा के अस्थायी निवास दिखाई पड़े।


तीर-धनुष के साथ जारवा जब भोजन की तालाश में घूमते हैं तो छोटी-छोटी झोपड़ियाँ बनाते चलते हैं। पर जंगलों के बहुत अंदर जहाँ बहुत सारे जारवा परिवार एक साथ रहते हैं वहाँ इनके घर बड़े आकार के होते हैं। इस जाति के लोग मछली ,जंगली सुअर का शिकार करना जानते हैं।इसके आलावा भोजन के लिए जंगल में ये कन्द मूल और शहद बटोरते हैं।

अंडमान ट्रंक रोड की एक और विशेषता है कि ये लगातार नहीं है । यानि अगर समुद्र का पार्श्वजल आपके रास्ते में आ जाए तो कोई सेतु नहीं मिलेगा आपको जिस पर आप अपनी गाड़ी सरपट दौड़ा सकें। आपको इंतजार करना पड़ेगा एक बड़ी सी फेरी का जो बस,कॉर, जीप सब को अपने पर लादकर दूसरी तरफ पहुँचाती है और उसके बाद सड़क यात्रा फिर से शुरु हो जाती है। पोर्ट ब्लेयर से रंगत के 170 किमी के फासले में ऐसी फेरी क्रासिंग दो बार मिलती है। बाराटांग के बाद हम जारवा सुरक्षित क्षेत्र से बाहर निकल गए । पर पुनः कदमतला के बाद एक दूसरे सुरक्षित क्षेत्र में प्रवेश कर गए। मानचित्र में अगर देखें तो पाएँगे कि इस इलाके में सड़क सुरक्षित क्षेत्र को बाहर-बाहर ही छूती है इसलिए यहाँ जारवा के दिखने की प्रायिकता बेहद कम होती है।

रंगत में सरकारी गेस्ट हाउस रंगत बाजार से 25 किमी आगे है। शाम तक हम सब रंगत के सरकारी गेस्ट हाउस, हॉकबिल नेस्ट (Hawkbill Nest) में थे। गेस्ट हाउस की हालत को देख कर ऐसा लगा कि वहाँ ठहरने के लिए ज्यादा लोग आते नहीं। एक बेड शीट से लेकर खाने के इंतजाम में हर जगह बदहाली नजर आई। गेस्ट हाउस के सामने ही कटबर्ट बे (Cutburt Bay) समुद्री तट है पर वहाँ पहुँचने के लिए मछुआरों की बस्ती के ठीक मध्य से जाना होता है। कहा जाता है कि रंगत के कटबर्ट बे समुद्री तट पर कछुए दिसंबर से फरवरी के बीच अंडे देने आते हैं। हम चूंकि नवंबर में आए थे ये दृश्य भी देखने को नहीं मिल सका। हैवलॉक के समुद्र तट के विपरीत यहाँ का तट काफी गंदा था। इसलिए सब लोग तुरंत गेस्ट हाउस में पहुँच गए।

अगले दिन हमें पुनः उसी रास्ते से वापस बाराटांग जाना था। क्या रंगत में बिताए हुई वो रात कुछ अप्रत्याशित लेकर नहीं आई थी ? वापस लौटते समय क्या जारवा जाति के लोगों से आमना सामना हो सका ? इन सवालों का जवाब लेकर उपस्थित हूँगा इस विवरण की अगली किश्त में।

(जारवा चित्र सौजन्य : Society for Andaman and Nicobar Ecology, Port Blair)

11 comments:

  1. एक ओर दुनिया से रूबरू हुए फिर आपके कैमरे की बदोलत....दिलचस्प ....जावेद अख्तर का शेर भी....

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  2. रोचक... आगे क्या हुआ इसकी उत्सुकता जगा दी है आपने.

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  3. sunder chitra aur khubsat yatra vritant...

    aage ki yatra zara jaldi bataiyega...

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  4. बेहद खूबसूरत. हमने भी Onges को देखा है. एकदम नंगे.

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  5. भाई,आपके पैर में चक्र है जो आप इतने घुमक्कड़ी निकले, भाई थोड़ा हम लोगों के लिये कुछ ऐसा यात्रा विवरण लिखिये कि हम भी कम से कम कुछ जगहों पर टहल कर आते,पर आपका अंदाज़ सब जगह जाने की उत्सुकता पैदा करता है,आप ऐसे ही बने रहें यही मेरी कामना है।

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  6. जितनी मेहनत से आपने जारवाओं के इतिहास से परिचय कराया उसके लिए बहुत धन्यवाद. चित्र और विवरण दोनों सुन्दर है....अगली कड़ी का इन्तिज़ार है.

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  7. i would like to see more pics & lesser commentary here. Itz a TIP from one musafir to another. Going great guns manish bhai!

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  8. यह तो बहुत ही प्रमाणित और रोचक यात्रा वृत्तांत रहा -जारवा के अतिरिक्त दूसरे आदिवासियों - Great Andamanese of Strait Island, Onges of Little Andaman, Sentinelese of Sentinel Islands, and Shompens of Great Nicobar.की वर्तमान दशा के बारे में भी बताएं !

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  9. मुनीश भाई आपके सुझाव का धन्यवाद। पर अंडमान पर लेखों की ये श्रृंखला मूलतः एक यात्रा वृत्तांत है जिसमें चित्र सिर्फ यात्रा के विवरण की झांकी दिखलाने के लिए प्रयुक्त हुए हैं। और वो भी मेरे एनालॉग कैमरे और इंतरनेट से जुटाए हुए हैं।
    अगर मेरे पास उस वक्त डिजिटल कैमरा रहा होता तो आप केरल यात्रा की भांति इस श्रृंखला में यात्रा वृतांत के आलावा अलग से फोटो फीचर वाले लेख जरूर पाते।

    अरविंद मिश्रा जी तारीफ के लिए धन्यवाद। आपने जिन अन्य जनजातियों का जिक्र किया है वे जिस जगह रहती हैं हम उन इलाकों में नहीं जा पाए, इसलिए मुझे उनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं हो पाई। हाँ पोर्ट ब्लेयर के म्यूजियम में उनके द्वारा बनाए गए घर के माडल जरूर देखने को मिले।

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  10. Ok manish bhai , im trying to inspire bloggers for a trip to Sat-Taal so that Hindi bloggers come together and meet often at exotic locales . Itz just a start and it would be nice to have ur comments on this endeavour. thanx.

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