Wednesday, August 19, 2009

दीघा और शंकरपुर का समुद्र तट जहाँ दौड़ती हैं जीपें, दिखते हैं फुटबॉल खेलते लोग और लाल लाल प्रहरी !

पिछली प्रविष्टि में मैंने आपको बताया था कि किस तरह हम राँची से खड़गपुर होते हुए दीघा (Digha) पहुँचे। होटल से पाँच मिनट पैदल चलकर हम पुराने दीघा (Old Digha) के समुद्र तट पर थे। दरअसल दीघा को पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने का श्रेय इतिहासकार अंग्रेज पर्यटक जॉन फ्रैंक स्मिथ (John Frank Smith) को देते हैं जो 1923 में दीघा आए और यहाँ की सुंदरता देख यहीं बस गए। दीघा के बारे में उनके लेखों ने इस जगह के बारे में लोगों की जानकारी को बढ़ाया। आजादी के उपरांत स्मिथ ने तत्कालीन मुख्यमंत्री विपिन चंद्र रे को दीघा को एक पर्यटन स्थल बनाने के लिए राजी किया। वैसे इस जगह का उल्लेख अंग्रेज गवर्नर जेनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के १७८० में अपनी पत्नी को लिखे ख़त में भी मिलता है. हेस्टिंग्स ने बीरकुल के नाम से जाने वाली इस जगह को अपने पत्र में ब्राइटन आफ दि ईस्ट (Brighton of the East) की संज्ञा दी थी।

उस दिन पूरे तट पर जबरदस्त भीड़ थी। सबने सफ़र की थकान मिटाने के लिए जम कर स्नान किया। जिन्हें पानी से डर लग रहा था उनके लिए बड़ी बड़ी रबर ट्यूब्स का सहारा था। एक दो घंटे में जब धूप ज्यादा चढ़ आई तो हम वापस लौट चले।

(चित्र छायाकार सुमित)
समुद्री अपरदन ने दीघा के पुराने तट की चौड़ाई कम कर दी है। पर बाकी तटों से मिलती जुलती बातें यहाँ भी नज़र आती हैं। यानि कि समुद्र तट के सामानांतर चलती रोड और उसके ठीक अगल पर छोटी-छोटी खाने पीने की दुकानें। शाम को जब हम तट की गहमागहमी देखने वापस आए तो हमारे साथियों ने यहाँ की सी पाम्फ्रेड मछली (Sea Pamfred) का जम कर लुत्फ़ उठाया। मित्र गणों को पेट पूजा में तल्लीन छोड़ कर मैं सूर्यास्त का नज़ारा लेने के लिए तट के भीड़ भाड़ वाले इलाके से दूर निकल पड़ा। रास्ते के एक तरफ अपरदन रोकने के लिए चट्टानों की बनाई दीवार थी तो दूसरी ओर हरे भरे कैसुराइना प्लानटेशन। ये प्लानटेशन ही इस तट को एक विशिष्टता प्रदान करती हैं।

(चित्र छायाकार अनुनय)
दीघा का सूर्यास्त पुरी और चाँदीपुर जैसा मंज़र पेश करता है। पुराने दीघा की भीड़ भाड़ को देखते हुए अब दीघा से २ किमी दूर नई दीघा बीच (New Digha) का विकास किया गया है जो अपेक्षाकृत शांत और साफ सु्थरी है। अगले दिन हम नए दीघा के तट पर भी गए पर पैदल नहीं बल्कि एक जीप में। आपको विश्वास हो ना हो पर दीघा और उसके आस पास के समुद्री तट इतने सख्त हैं कि ज्वार के समय वहाँ आसानी से चौपहिया वाहन चलाए जा सकते हैं।

वैसे नए दीघा में जीप से जब आप समुद्र तट पर जाएँगे तो सैकड़ों की संख्या में एक जाति विशेष के आंगुतक अपने घरों के दरवाजे से बाहर निकलकर आपका इंतज़ार करते हुए मिलेंगे। जीप उनके घरों को रौंदती हुई निकल जाएगी पर मज़ाल है कि उनमें से किसी का भी बाल बाँका हो जाए। जीप से कुछ फीट दूर रहते ही ये इस तेजी से अपने घरों के अंदरुनी तहखानों में घुसते हैं कि आपको उनकी फुर्ती देखकर दाँतो तले उँगलियाँ दबानी पड़ती हैं।

जी हाँ ये हैं इस इलाके में पाए जाने वाले रेड क्रैब (Red Crab).. दीघा के लाल प्रहरी जो रेत में बनाए गए छोटे छोटे छिद्रों से आपको तब तक घूरते रहेंगे जब तक आप इनके बिल्कुल करीब ना आ जाएँ और फिर पास आते ही अपने घरों में यूँ छिप जाएँगे जैसे वहाँ कोई रहता ही ना हो।


(चित्र छायाकार मानिक मंडल)

अगली सुबह हम दीघा से 14 किमी दूर शंकरपुर के समुद्री तट पर गए। दीघा के समुद्र तट की तुलना में शंकरपुर कहीं ज्यादा सुंदर है। दूर दूर तक फैला छिछला समुद्र ज्वार के समय किसी फुटबॉल के मैदान की शक़्ल इख़्तियार कर लेता है । पार्श्व की हरियाली आँखों को सुकून देती है सो अलग। ऊपर से भीड़भाड़ का नामोनिशान नहीं। बगल में ही मछुआरों की बस्तियाँ हैं जहाँ बड़ी संख्या में मछली पकड़ने वाली नौकाएँ लगी रहती हैं। ज्वार की वज़ह से लहरें ज्यादा नहीं उठ रहीं थीं इसलिए नहाना यहाँ नहीं हो पाया। पर दीघा की भीड़ भाड़ के बाद यहाँ आने पर इतनी खुशी मिली कि हम सब ने तट रूपी मैदान पर जम कर दौड़ भाग की और तसवीरें खिंचाई गई़। उस समय को याद दिलाती कुछ स्कैन्ड तसवीरें ये रहीं। देखिए तट के ठीक पीछे की हरियाली


देख रहे हैं ना पीछे की हरियाली और फुटबॉल मैदान से भी बड़ा ठोस समतल समुद्र तट। इसीलिए यहाँ लोग सचमुच ही फुटबॉल खेलते नज़र आ जाएँ तो कोई अचरज की बात नहीं...

(चित्र छायाकार राजीव लोधा)

तो ये था चाँदीपुर, शंकरपुर और दीघा का मेरा सफ़रनामा। शायद इन जगहों पर बाद में फिर जाने को मिले तब अपने कैमरे से यहाँ के कुछ और दृश्य दिखला सकूँगा। बताइए कैसी लगी आपको ये श्रृंखला ?

8 comments:

  1. नयनाभिराम चित्र और दिलकश वर्णन....
    नीरज

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  2. अब वे केकड़े वहां नही रहे ...चारो ओर गन्दगी और पोलीथिन की थैलियाँ बिखरी रहती है ..अफ़सोस होता है.

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  3. Aapne to Ekdam Sajeev chitran kar diya...picture aur shabdon ka aisa kramanusar varnan lagata hai..aap ke sath ham sabhi ghum rahe hai..

    behad umda prstuti kiya aapne..
    aage ke yatra vivran ka intzaar rahega...Thank You..

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  4. waah bahot hi dilkash nazara .... main puri ke beach pe to gayaa hun magar bahot jaldi me tha to kuchh khas majaa nahi le paya... bahot bahot aabhaar...


    arsh

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  5. The sunset picture is smashing and I am scared of the crabs!

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  6. nice description ,but i would like to revisit Puri ten times !

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  7. ek ye hi malaal hai ki maine aaj tak samudra or tat nahin dekha hai.
    good chitr

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