Tuesday, September 22, 2009

आइए देखें भितरकनिका की चित्रात्मक झाँकी : हरियाली और वो रास्ता ...

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान से डाँगमाल पहुँचने का अपना यात्रा वृत्तांत इस श्रृंखला की पिछली दो प्रविष्टियों में समेट चुका हूँ पर इससे पहले डाँगमाल द्वीप (Dangmal Island) और फिर इकाकुला के समुद्री तट की ओर आपको ले चलूँ मैनग्रोव के जंगलों के बीच से की गई नौका यात्रा की चित्रात्मक झाँकी..

नीला आकाश, हरे भरे मैनग्रोव और डेल्टाई इलाके का मटमैला जल तीनों समानांतर पट्टियों में चलते हैं इस राष्ट्रीय उद्यान में।


नदी की बहती धारा पर वृक्ष की ये झुकती शाखाएँ उसके सौंदर्य से इस कदर मंत्रमुग्ध हैं मानो कह रही हों..छू लेने दे नाज़ुक होठों को कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये...


क्या इस चित्र को देख कर भारत का आर्थिक सामाजिक परिदृश्य नहीं कौंध जाता यानि ऊपर ऊपर हरियाली और पर पेड़ के इस ऊपरी हिस्से को अपने हृदय से सींचती उसके नीचे की शाखाएँ सूखी।



और जब ये शाखाएँ ही दम तोड़ दें तब....


तब तो पंक्षियों को यही संदेश देना होगा 'चल उड़ जा पंक्षी कि अब तो देश हुआ बेगाना...'

फिर वही शाम, वही ग़म वही तन्हाई है...

इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम राहें, कुछ तेज कदम रस्ते


जंगल की शून्यता को तोड़ता बगुलों का समेवत कलरव कुछ ऍसा ही कहता प्रतीत हो रहा था..
तनहा ना अपने आप को अब पाइए जनाब
मेरे इस घर की यादें लिये जाइए जनाब :)



इस श्रृंखला में अब तक

  1. भुवनेश्वर से भितरकनिका की सड़क यात्रा
  2. मैनग्रोव के जंगल, पक्षियों की बस्ती और वो अद्भुत दृश्य

Thursday, September 17, 2009

नज़ारे भितरकनिका के : मैनग्रोव के जंगल, नौका विहार और पक्षियों की दुनिया !

पिछली पोस्ट में आपको मैं ले गया था भुवनेश्वर से भितरकनिका के मैनग्रोव जंगलों के प्रवेश द्वार यानि गुप्ती चेक पोस्ट तक। करीब ६५० वर्ग किमी में फैले इन मैनग्रोव वनों का निर्माण ब्राहाम्णी, वैतरणी और धर्मा नदियों की लाई और जमा की गई जलोढ़ मिट्टी के बनने से हुआ है। ये पूरा इलाका समुद को जल्दी से छू लेने की कोशिश में बँटी नदियों की पतली पतली धाराओं और उनके बीच बने छोटे द्वीपों से अटा पड़ा है।

मैनग्रोव जंगलों के बीच से इस डेल्टाई क्षेत्र से गुजरना मेरे लिए कोई पहला अनुभव नहीं था। इससे पहले मैं अंडमान के बाराटाँग की यात्रा में इन जंगलों को करीब से देख चुका था। पर भितरकनिका के इन जंगलों में मैनग्रोवों के सिवा किस किस की झलक और देखने को मिलेगी इसका अंदाजा यात्रा शुरु करने के वक़्त तो नहीं था।

करीब सवा चार बजे हमारी लकड़ी की मोटरबोट अपने गन्तव्य डाँगमाल (Dangmal) की ओर चल पड़ी थी। सूरज अभी भी मद्धम नहीं पड़ा था पर अक्टूबर के महिने में उसकी तपिश इतनी भी नहीं थी कि हमें उस नौका की छत पर जाने से रोक सके। कुछ ही दूर बढ़ने के बाद हमें तट के किनारे छोटे छोटे गाँव दिखने शुरु हुए। अगल बगल दिखते छोटे मोटे गाँवों में असीम शांति छाई थी। पानी में हिलोले लेती नौका के आलावा जलराशि में भी कोई हलचल नहीं थी।


पर धीरे धीरे गाँवों की झलक मिलनी बंद हो गई और रह गए सिर्फ जंगल..

अंडमान में जब हैवलॉक के डॉल्फिन रिसार्ट में रहने का अवसर मिला था तो वहीं पहली बार पेड़ों को उर्ध्वाकार यानि सीधी ऊँचाई में बढ़ते ना देखकर समानांतर बढ़ते देखा था। कुछ ही देर में वही नज़ारा भितरकनिका में भी देखने को मिल गया। अंतर बस इतना था कि ये पेड़ अंडमान की अपेक्षा अधिक घने थे। पेड़ की हर ऊँची शाख पर पक्षी यूँ बैठे थे मानों बाहरी आंगुतकों से जंगलवासियों को सचेत कर रहे हों।

पाँच बजने को थे पर हमें भितरकनिका के नमकीन पानी में रहने वाले मगरमच्छों (Salt Water Crocodiles) के दर्शन नहीं हुए थे। यहाँ के वन विभाग के अनुमान के हिसाब से भितरकनिका में करीब १५०० मगरमच्छ निवास करते हैं और उनमें से कुछ की लंबाई २० फुट तक होती है यानि विश्व के सबसे लंबे मगरमच्छों का दर्शन करना हो तो आप भितरकनिका के चक्कर लगा सकते हैं। हमारी आँखे पानी में इधर उधर भटक ही रही थीं कि दूर पानी की ऊपरी सतह आँखे बाहर निकाले एक छोटा सा घड़ियाल दिखाई पड़ा। उसके कुछ देर बाद तो दूर से ही ये मगरमच्छ महाशय क्रीक की दलदली भूमि पर आराम करते दिखे। फिर दिखी भागते कूदते हिरणों की टोली। खैर हिरणों से तो अगले दिन भी सामना होता रहा।

डाँगमाल पहुँचने के पहले ही हमें देखनी थी भितरकनिका के बीच बसी पक्षियों की दुनिया। क़ायदे से हमें यहाँ चार बजे तक पहुँच जाना था। पर केन्द्रापाड़ा से देर से सफ़र शुरु करने की वज़ह से हम यहाँ पहुँचे सवा पाँच पर। भितरकनिका की पक्षियों की इस दुनिया को यहाँ बागा गाहन (Baga Gahan) या हेरनरी (Heronry) कहा जाता है। यहाँ पाए जाने वाले पक्षी मूलतः बगुला प्रजाति के हैं। जून से नवंबर के बीच विश्व की ग्यारह बगुला प्रजातियों के पक्षी ३०००० तक की तादाद में यहाँ आकर घोसला बनाते हैं और नवंबर दिसंबर तक अपने छोटे छोटे बच्चों जिनकी तादाद भी लगभग ३५००० होती है लेकर उड़ चलते हैं। हमारी नौका जब सवा पाँच बजे पक्षियों के इस मोहल्ले पर रुकी तो पक्षियों का कर्णभेदी कलरव दूर से ही सुनाई दे रहा था।


अँधेरा तेजी से फैल रहा था इसलिए नौका से उतरकर जंगल की पगडंडियों पर हम तेज़ कदमों से लगभग भागते हुए वाच टॉवर की ओर बढ़ गए। जंगल के बीचो बीच बने इस वॉच टॉवर की ऊँचाई २० से ३० मीटर तक की जरूर रही होगी क्यूँकि ऊपर पहुँचते पहुँचते हम सब का दम निकल चुका था। पर वॉच टावर के ऊपर चढ़कर जैसे ही मैंने चारों ओर नज़रें घुमाई मैं एकदम से अचंभित रह गया।

दूर दूर तक उँचे पेड़ों का घना जाल सा था। और उन पेड़ों के ऊपर थे हजारों हजार की संख्या में बगुले सरीखे काले सफेद रंग के पक्षी। जिंदगी में पक्षियों के इतने बड़े कुनबे को एक साथ देखना मेरे लिए अविस्मरणीय अनुभव था। ढलती रौशनी में इस दृश्य को सही तरीके से क़ैद करने के लिए बढ़िया जूम वाले क़ैमरे की जरूरत थी जो हमारे पास नहीं था। फिर भी कई तसवीरें ली गई और उनमें से एक ये रही....(चित्र को बड़ा करने के लिए उस पर क्लिक करें)


साँझ ढल रही थी सो हमें ना चाहते हुए भी बाघा गाहन से विदा लेनी पड़ी। आधे घंटे बाद शाम छः बजे हम डाँगमाल के वन विभाग के गेस्ट हाउस में पहुँचे। आगे क्या हुआ ये जानने के लिए इंतज़ार कीजिए इस श्रृंखला की अगली पोस्ट का ।

Monday, September 7, 2009

आइए चलें भुवनेश्वर से भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के सफ़र पर...

मुसाफ़िर हूँ यारों पर आपने पिछले महिने मेरे साथ चाँदीपुर और दीघा के समुद्र तटों की सैर की । इस महिने आपको ले चलते हैं एक ऍसी जगह जो उड़ीसा के पर्यटन मानचित्र में तो नज़र आती है पर देश के अन्य भाग के लोग शायद ही इसके बारे में जानते हों। ये जगह है उड़ीसा के उत्तर पूर्वी तटीय इलाके के करीब स्थित भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान (Bhiterkanika National Park)



भितरकनिका उड़िया के दो शब्दों से मिलकर बना है। भितर यानि अंदरुनी और कनिका यानि बेहद रमणीक। केन्द्रपाड़ा (Kendrapada) जिले में अवस्थित ये राष्ट्रीय उद्यान अपनी दो विशेषताओं के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। एक तो सुंदरवन के बाद ये देश के सबसे बड़े मैनग्रोव के जंगलों को समेटे हुए है और दूसरी ये कि भारत में नमकीन पानी में रहने वाले मगरमच्छों की सबसे बड़ी आबादी यहीं निवास करती है।

मेरी ये यात्रा पिछली दुर्गा पूजा और दशहरा की छुट्टियों की है। मैं तब उस वक्त भुवनेश्वर गया था। वहीं से भितरकनिका जाने का कार्यक्रम बना। हमारा कुनबा करीब सवा दस बजे भुवनेश्वर से निकला। हमें भुवनेश्वर से कटक होते हुए केन्द्रपाड़ा की ओर निकलना था। भुवनेश्वर और फिर कटक की सड़्कों पर दुर्गापूजा की गहमागहमी थी पर कंधमाल की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं और हाल ही में आई बाढ़ ने माहौल अपेक्षाकृत फीका अवश्य कर दिया था।


भुवनेश्वर से केन्द्रपाड़ा करीब ७५ किमी दूरी पर है अगर आप कटक से जगतपुर वाले राज्य राजमार्ग से जाएँ। पर हमने केन्द्रपाड़ा जाने का थोड़ा लंबा रास्ता लिया।
कटक से चंडीखोल होते हुए हमने पारादीप (Paradip) की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग ५ (NH- 5) की राह पकड़ ली। चार लेनों की चौड़ाई वाले इस राजमार्ग पर आप अपनी गाड़ी बिना किसी तनाव के सरपट भगा सकते हैं।


राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों ओर के दृश्य बिल्कुल विपरीत प्रकृति के थे। एक ओर तो धान की लहलहाती फसल दिखाई दे रही थी...


तो दूसरी ओर दो महिने पहले आई बाढ़ की वज़ह से उजड़ी फसलों का मंज़र दिख रहा था।


हम लोग तो बारह बजे के करीब केन्द्रपाड़ा पहुँच गए पर हमारे समूह के ही एक और सदस्य जो दूसरे रास्ते से हमें केन्द्रपाड़ा में मिलने वाले थे, सिंगल लेन रोड और भीड़ भाड़ की वज़ह से जल्दी पहुँचने की बजाए देर से पहुँचे। लिहाज़ा दिन का भोजन और थोड़ा विश्राम करने के बाद हमें केन्द्रपाड़ा से निकलते निकलते सवा दो बज गए।

हमारा अगला पड़ाव राजनगर (Rajnagar) था जो कि भितरकनिका जाने का प्रवेशद्वार है। केन्द्रपाड़ा और राजनगर के बीच की दूरी करीब ७० किमी है। इन दोनों के बीच
पतामुन्दई (Patamundai)
का छोटा सा कस्बा आता है। ये पूरी सड़क एक लेन वाली है और फिर त्योहार की गहमागहमी अलग से थी इसलिए चाहकर भी अपने गंतव्य तक जल्दी नहीं पहुँचा जा सकता था। हर पाँच छः गाँवों को पार करते ही एक मेला नज़र आ जाता था। गाँव के मेलों की रौनक कुछ और ही होती है... थोड़ी सी जगह में तरह तरह की वस्तुएँ बेचते फुटकर विक्रेता और रंग बिरंगी पोशाकों में उमड़ा जन समुदाय जो शायद एक साल से इन मेलों की प्रतीक्षा में हो।

राँची और कटक की दुर्गापूजा से अलग जगह जगह दुर्गा के आलावा शिव पार्वती, लक्ष्मी और हनुमान जी की भी मूर्तियाँ मंडप में सजी दिखाई पड़ीं। बाद में पता चला कि इस इलाके का ये सबसे बड़ा त्योहार है और इसे यहाँ गजलक्ष्मी पूजा (Gajlakshmi Puja) कहा जाता है।

राजनगर से आगे हमें गुप्ती तक जाना था जहाँ से रोड का रास्ता खत्म होता है और पानी का सफ़र शुरु होता है। हरे भरे धान के खेत अब भी दिखाई दे रहे थे। गुप्ती के ठीक पहले कुछ किमी मछुआरों के गाँव के बीच से गुजरना पड़ा। वहीं एक झोपड़ी में सौर उर्जा का प्रयोग करती ये झोपड़ी भी दिखाई दी तो देख कर सुखद संतोष हुआ कि इन भीतरी इलाकों पर भी सरकार की नज़र है।




ठीक वार बजे हम गुप्ती के चेक पोस्ट पर थे। और ये साइनबोर्ड हमारा चेक पोस्ट पर स्वागत कर रहा था


अगले दो घंटे का सफ़र डेल्टाई क्षेत्र की कभी संकरी तो कभी चौड़ी जलधाराओं के बीच बीता। अगली पोस्ट पर आपको मिलवाएँगे पानी और जंगल में रहने वाले कुछ बाशिंदों से और साथ ही देखना ना भूलिएगा एक दृश्य जो हमारे इस सफ़र का सबसे बेहतरीन स्मृतिचिन्ह रहा।

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