Thursday, January 7, 2010

यादें केरल की : भाग 2 - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...

वैसे तो कोच्चि (पुराना नाम कोचीन) दस छोटे बड़े द्वीपों से मिलके बना है,पर मुख्यतः इसे आप तीन भागों मे बाँट सकते हैं।


एक हिस्सा मानव निर्मित विलिंगडन द्वीप (Willingdon Island) है जिसे अंग्रेजों ने समुद् से निकाली गई मिट्टी से 1920 में बनाया था। कोच्चि के इस हिस्से में कोंकण रेलवे का कोचीन रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा और भारतीय नौ सेना के कार्यालय आते हैं। विलिंगडन द्वीप के एक ओर फोर्ट कोच्चि मात्तनचेरी (Mattancherry) के इलाके आते हैं जिसमें कोच्चि की ज्यादातर ऍतिहासिक विरासतें स्थित हैं तो दूसरी ओर मुख्य भूभाग से जुड़ा एरनाकुलम (Ernakulam) का व्यवसायिक नगर आता है।

अक्सर लोग केरल पैकेज टूर के तहत जाते हैं। विमान से उतरने के बाद वाहन और होटल की सुविधा के बारे में पर्यटक को सोचना नहीं पड़ता पर ये जरूर है कि जेब अच्छी तरह से हल्की हो जाती है। हमलोग जब एरनाकुलम पहुँचे तो हमारे पास जाने वाली सारी मुख्य जगहों का एक-एक दिन का आरक्षण था। ये सोचकर आ गए थे कि पहले दिन तो कोई चिंता नहीं रहेगी और दूसरे दिन घूम फिरकर कोई ठौर ठिकाना ढूँढ ही लेंगे ।

एरनाकुलम स्टेशन पर उतरे ही थे कि काली काली पोशाकों में झुंड के झुंड लोग भगवान अयप्पा ( Ayappa) की जयजयकार करते हुए रेलवे ओवरब्रिज पर जाते दिखाई पड़े। ट्रेन में हमें सहयात्रियों से पता चल चुका था कि जिस तरह उत्तर भारत में जगह जगह काँवरिया काँवर उठाकर धार्मिक स्थलों की तरफ जाते हैं (राँची के समीप देवघर में भी सावन के समय ऍसी यात्राएँ होती हैं) वैसे ही ये दल कोट्टायम के समीप पहाड़ी पर स्थित सबरीमाला के मंदिर जा रहा है।

जिधर प्री पेड आटो का बूथ था हम उधर ही चल पड़े। वहाँ अंदर लाइट जल रही थी पर रसीद काटने वाले का दूर-दूर तक पता ना था। ये अनुपस्थिति सुनियोजित ही थी क्योंकि साढ़े छः सात का वक्त ट्रेनों की आवाजाही के हिसाब से व्यस्त ही कहा जाएगा। पुरानी दिल्ली स्टेशन की यादें ताज़ा हो गईं। इस बात को फिर बल मिला कि अनेकता में एकता वाकई है हमारे देश में। खैर दस पन्द्रह मिनट प्रतीक्षा के बाद भी जब वहाँ कोई नही् आया तब हमने टैक्सी और आटो वालों से पूछना शुरु किया। तीस की जगह हमसे सौ रुपये माँगे जा रहे थे। कोई और उपाय ना देख हमने डेढ़ सौ रुपये में एक टेक्सी कर ली जो दस मिनट से कम समय में ही हमें अपने गन्तव्य तक पहुँचा गई।

हमारा गेस्ट हाउस रिहाईशी इलाके में था सो नहा धो कर हम खाने का जुगाड़ ढूँढने लगे। थोड़ी देर चलने के बाद हमें एक छोटा सा होटल दिखाई पड़ा। केरल में आम तौर पर भोजनालयों में रोटी नहीं मिलती। इसकी जगह मिलता हैं पराठा जो तिकोना ना होकर गोल होता है और प्रायः मैदे का बनाया जाता है। मेनू कार्ड में जो एक नयी चीज दिखाई दी वो थी अप्पम (Appam)। चावल से बनाए जाने वाले इस व्यंजन को हमारे सुपुत्र ने शीघ्र ही अपना प्रिय आहार बना लिया। सामान्यतः तमिलनाडु और केरल में लोग इसे नाश्ते के तौर पर चटनी के साथ (ये अपने आप में फीका होता है) खाते हैं। खाने के बाद हमने टूरिस्ट बस के बारे में पूछताछ शुरु की। अब वहाँ आंग्ल भाषा के जानकार गिने चुने थे। होटल के मालिक ने कुछ लोगों को हमारी बात समझने के लिए आगे किया पर वो भी हमारे प्रश्न को समझने में असफल रहे।


अगली सुबह दस बजे जब टूरिस्ट आफिस में फोन लगाया तो पता चला कि कोच्चि के प्रमुख स्थानों के लिए उनके यहाँ से मोटरबोट सेवा उपलब्ध है। टूरिस्ट आफिस से दिन का टिकट ले कर हम बगल के एनर्जी यानि उर्जा पार्क चल पड़े। बच्चों को वहाँ कॉर चलाने, और तरह तरह के झूलों में आनंद आ गया। शाम को जब जेटी से लौट कर वापस आए तो पार्क में तिल भर पैर रखने की जगह नहीं थी। पूरा उत्सव सा माहौल था।

पार्क के पिछवाड़े में वेम्बनाड झील (Vembanad Lake) है जो भारत की सबसे लंबी झील है। इस झील का विस्तार एरनाकुलम, कोट्टायम और एलेप्पी जिलों तक है। कोच्चि में आकर ये अरब सागर में मिलती है। इस झील के किनारे-किनारे चहलकदमी के लिए खूबसूरत सा मार्ग बना है जो कोच्चि का मेरीन ड्राइव कहलाता है। मार्ग में बीच बीच में अर्धवृत्ताकार पुल भी हैं। मार्ग के दूसरी ओर बड़े-बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों और शॉपिंग मॉल्स की लंबी कतारे हैं। पर मेरीन ड्राइव के रास्ते में शहर के गंदे नाले आकर मिलते हैं जिनसे निरंतर आती बदबू रास्ते की शोभा को धूमिल कर देती है। इसी वज़ह से हमसे पल भर भी मेरीन ड्राइव पर बैठने की इच्छा नहीं हुई।

दिन में जेट्टी लेने के पहले हम आगे के सफ़र के लिए गाड़ी बुक करना चाहते थे। हमने सोचा कि ये काम स्टेशन के आस पास बढ़िया तरीके से हो पाएगा। इसलिए एक आटो को रोका और स्टेशन कहते हुए बैठ गए। अब वो मलयालम में हमसे कुछ पूछने लगा। हमारे अँग्रेजी में समझाने पर उसने सर पर हाथ रख लिया और कहा NO ENGLISH। फिर कुछ देर सोचने के बाद उसने कहा नार्था..साउथाहमने सोचा कि लगता है हम कहाँ से आए हैं ये पूछ रहा है तो दाँते निपोरते हुए हमने कहा नार्था.. उसने अज़ीब सा मुँह बनाया और फिर कुछ कहा। हमने बिना समझे फिर एक मुस्कुराहट से प्रत्युत्तर दिया। थोड़ी देर में मुझे लगा कि ये वो रास्ता नहीं है जिस तरफ से हम रात में आए थे, पर उसे ये समझाएँ कैसे ये सोचकर चुप रह गए। थोड़ी देर में सड़कों पर घूमते घुमाते वो हमें एरनाकुलम टाउन स्टेशन ले आया और तब हमें अहसास हुआ कि वो शायद शहर के उत्तर या दक्षिण दिशा वाले स्टेशन के बारे में पूछ रहा था। खैर तीस चालीस रुपये का चूना लगवाकर हम मुख्य स्टेशन पहुँचे।

चूंकि कोच्चि रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा वेलिंगडन में है, ज्यादातर ट्रैवेल एजेन्ट शहर के उस हिस्से में हैं। दिसंबर की भीड़ और क्रिसमस की वजह से तमाम गाड़ियाँ पहले से बुक थीं। हम लोगों की योजना थी की Non AC Qualis ले लेंगे पर वो मिली ही नहीं और हमें AC वाहन लेना पड़ा। इस भागदौड़ में दिन का एक बज गया। दिन में हमने कोच्चि की शानदार बिरयानी खाई और चल पड़े जेट्टी के सफ़र पर।
जेट्टी से हमने क्या देखा और क्या नहीं देखा इसका खुलासा अगली किश्त में।

कोचीन का मानचित्र यहाँ से लिया गया है


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

  1. यादें केरल की : भाग 1 - कैसा रहा राँची से कोचीन का 2300 किमी लंबा रेल का सफ़र
  2. यादें केरल की : भाग 2 - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...
  3. यादें केरल की : भाग 3 - आइए सैर करें बहुदेशीय ऍतिहासिक विरासतों के शहर कोच्चि यानी कोचीन की...
  4. यादें केरल की : भाग 4 कोच्चि से मुन्नार - टेढ़े मेढ़े रास्ते और मन मोहते चाय बागान
  5. यादें केरल की : भाग 5- मुन्नार में बिताई केरल की सबसे खूबसूरत रात और सुबह
  6. यादें केरल की : भाग 6 - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !
  7. यादें केरल की : भाग 7 - अलविदा मुन्नार ! चलो चलें थेक्कड़ी की ओर..
  8. यादें केरल की भाग 8 : थेक्कड़ी - अफरातरफी, बदइंतजामी से जब हुए हम जैसे आम पर्यटक बेहाल !
  9. यादें केरल की भाग 9 : पेरियार का जंगल भ्रमण, लिपटती जोंकें और सफ़र कोट्टायम तक का..
  10. यादें केरल की भाग 10 -आइए सैर करें बैकवाटर्स की : अनूठा ग्रामीण जीवन, हरे भरे धान के खेत और नारियल वृक्षों की बहार..
  11. यादें केरल की भाग 11 :कोट्टायम से कोवलम सफ़र NH 47 का..
  12. यादें केरल की भाग 12 : कोवलम का समुद्र तट, मछुआरे और अनिवार्यता धोती की
  13. यादें केरल की समापन किश्त : केरल में बीता अंतिम दिन राजा रवि वर्मा की अद्भुत चित्रकला के साथ !

9 comments:

  1. मनीष भाई,आप तो वैसे ही यात्रा करते रहते हैं,और अभी तक मैं साउथ गया नहीं हूँ,पर जिस तरह की समस्या से आप जूझ रहें है दिलचस्प लग रहा है ......आगे भी पढ़ने की इच्छा जाग रही है.....नया साल मुबारक़!!!!!!

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  2. सुरम्य प्रकृति-चित्रण ! मनोरम यात्रा-वृत्तांत !!!

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  3. south ki yatrao mai Bhasha sabse bara sir dard banti hai...ye mai apni madras yatra mai anubhv kar chuki hu...

    baharhaal apka yatra vritand bahut rochak lag raha hai...

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  4. I am yet to visit kerala. Lekin aapki description se to lagta hai jaldi jana padega.

    Bahut detailed description hai.

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  5. एक अच्छी यात्रा का रोचक बातों के रोचक विवरण। साथ में सुन्दर फोटो। और हाँ बच्चों को हमारी तरफ से प्यार का हाथ फेर देना जी।

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  6. The kids seem to be enjoying food!

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  7. AnonymousJuly 28, 2010

    I have never been to KErela and you have wonderfully encapsulated the experiences from the state. Another nice article that i came across http://www.jagranyatra.com/2010/04/kerala-mansoon-rain-season-beac/

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  8. manish ji apka blog kafi dino se padh rahi hoon . bahut achha lagta hai jab aap jaise log itne sunder tarike se traveling ko discribe karte ho . main bhi apki tarh hi thodi bahut ghumakkadi kar leta hoon aur apki tarah se un photos ko jo last 5 years main traveling main liye unko leke hindi main ek blog banana chahta tha par blog name register karne ke baad bhi usme hindi main nahi likh paya so is bare main aapki help chahta hoon . agar aap mujhe apne kimti samay main se kuch samay de sake to .

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  9. Manu Prakash Is link par jayein aapko aapki samasya ka samadhan mil jayega.

    http://raviratlami.blogspot.com/2007/02/how-to-write-in-hindi.html

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