Thursday, February 4, 2010

यादें केरल की : भाग 6 - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !

26 दिसंबर को ग्यारह बजे हम चांसलर रिसार्ट से मुन्नार शहर को कूच कर गए। कहते हैं मुन्नार शब्द मुनु (तीन) और आरू (नदी) के मिलने से बना है। ये तीन नदियाँ हैं मुद्रापुज्हा (Mudrapuzha), नल्लाथन्नी (Nallathanni) और कुंडला (Kundala)। इन तीनों नदियों के संगम पर कुंडला बाँध का निर्माण हुआ है जो शहर से करीब १३ किमी दूर है।

बाँध के कुछ किमी पहले मट्टुपेट्टी झील (Mattupetty Lake) है। अगर नीचे का मानचित्र देखें तो मुन्नार शहर पहुँच कर हमें पूर्व की तरफ जाने वाली सड़क पर मुड़ना था।

मुन्नार शहर एक सामान्य कस्बे की तरह दिखता है जिसे हर मोड़ पर बने छोटे बड़े होटल और सैलानियों की भीड़ बड़ा अनाकर्षक रूप दे देती है। पर इस कस्बे से एक किमी दूर आप जिधर भी बढ़ें न भीड़ भाड़ दिखती है और ना तो कंक्रीट के जंगल......।

दिखती है तो बस चारों और पहाड़ियों के बीच चाय बागानों की निर्मल स्वच्छ हरियाली।. केरल सरकार की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उन्होंने मुन्नार की नैसर्गिक सुंदरता को बचाए रखने के लिए इसके व्यापक शहरीकरण पर रोक लगाई हुई है।

(और हाँ ये बताना तो भूल ही गया कि इस ब्लॉग का हेडर में मैंने मुन्नार में खींची गई इस तसवीर का उपयोग किया है।)

रास्ते में जगह-जगह स्थानीय महिलाएँ हरी पत्तियों के साथ ताजे गाजर बेच रही थीं जो खाने के साथ देखने में भी बेहद खूबसूरत लग रहे थे। कुछ ही देर में हमारी गाड़ी मट्टुपेट्टी झील को पार कर रही थी। हमारा इरादा पहले सबसे दूर वाले स्थल इको प्वायंट पर पहुँच कर वापसी में मट्टुपेट्टी झील के किनारे चहलकदमी करने का था। इको प्वायंट पर निराशा हाथ लगी। पर्यटकों की भारी भीड़ वहाँ पर मौजूद थी। सामने नीचे झील का जल मंद-मंद बह रहा था। झील के पार पहाड़ियों थीं। 'शायद' आवाज़ वहीं से लौटकर आती होगी। शायद इसलिए कह रहा हूँ कि हमारे वहाँ घंटे भर बिताने के बावजूद भी किसी भी पर्यटक के चिल्लाने से कोई Echo सुनाई नहीं दी।

मट्टुपेट्टी झील और चेक डैम के आधा किमी आगे झील में स्पीडबोट की व्यवस्था है। पर वहाँ लाइन इतनी लंबी थी कि हमने बाकी लोगों को उसकी सवारी का आनंद उठाते हुए देखकर ही संतोष कर लिया। वैसे आप अगर जाएँ तो इस सफ़र का आनंद अवश्य लें। इको प्वायंट पर पैडल बोट पर बच्चे चले गए और मैं इधर उधर चहलकदमी करने लगा। सामने ही एक छोटी दुकान पर गरम गरम पकौड़ियाँ तली जा रहीं थीं। आलू, प्याज के आलावा मिर्चे की पकौड़ी भी मेनू में थी। पर मिर्चों का आकार देख कर पहले तो खाने की हिम्मत नहीं हुई। पर बाद में खाने पर पता चला की ये मिर्चें, हमारी तरफ की मिर्चों की तरह तीखी नहीं हैं।

इस हल्की पेट पूजा के बाद अपने चालक को मट्टुपेट्टी डैम पर इंतजार करने को कह, हमने तीन किमी का सफर पैदल ही तय करने का निश्चय किया। इको प्वायंट से मट्टुपेट्टी झील का रास्ता बेहद मनमोहक है। एक तरफ हरे भरे विरल जंगल और दूसरी ओर पहाड़ी ढलानों पर फैली हरी धानि घास के खूबसूरत कालीन।
पर सुरक्षा गार्ड इन हरी कालीनों पर आपको घूमने नहीं देते। ये जगह फिल्म की शूटिंग में भी काम में आती है। पर कुछ दूर आगे जाकर एक जगह दिखाई दी जहाँ सुरक्षा गार्ड नहीं थे। बच्चों की मौज हो गई वो घास की ढ़लान पर दौड़ते और फिसलते नीचे पहुँच गए। ऊपर आकाश की गहरी नीलिमा, सामने हरे भरे पेड़ों और चाय बागानों से लदीं पहाड़ियाँ और नीचे झील का बहता जल और बीच की ये हरी दूब..मैं तो ये देखकर बस आनंदविभोर होकर वहीं बैठ गया।


आधे घंटे बिताने के बाद हम वहाँ से आगे बढ़े। कुछ ही दूर पर सड़क की बाँयी तरफ इंडो स्विस डेयरी फार्म दिखा जो आम पर्यटकों के लिए खुला नहीं था। यहाँ पर स्विस प्रजाति की कई किस्मों की गायों का पालन पोषण होता है। रास्ते में बच्चे और बड़े हाथी की सवारी का आनंद ले रहे थे। स्पीड बोट वाली लाइन अब भी वैसी ही थी। झील का मोहक दृश्य पूरे रास्ते भर दिखाई देता रहा जो हमें निरंतर चलने को प्रेरित करता रहा। लौटते वक्त हम मुन्नार के फ्लोरिकल्चर सेन्टर में रुके जिसकी सचित्र रिपोर्ट आपको इस पोस्ट में दी जा चुकी है

शाम को हम मुन्नार के सरवन भवन में खाने पहुँचे। सरवन भवन मुन्नार के शाकाहारी भोजनालयों में सबसे ज्यादा चर्चित है और इसका प्रमाण मुझे खाने के लिए लगी लंबी लाइन को देखकर मिला। यहाँ की एक नवीनता ये भी है कि भोजन, केले के बड़े=बड़े पत्तों पर खिलाते हैं।
शाम होने वाली थी और हम अपने नए ठिकाने पर चल पड़े। अब यहाँ मात्र एक कमरे में दो परिवारों को रात गुजारनी थी। लिहाज़ा हमने जमीन पर ही अपना गद्दा बिछाया। रात को जब-जब हम सोने को उद्यत होते बगल के किसी समारोह से लाउडस्पीकर पर रह रह कर आती मलयालम लोक गीत की बहार हमारी निद्रा में खलल डाल देती और अटपटे से शब्दों को सुनकर सब को हँसी के दौरे पड़ जाते।
ग्यारह के बाद ये शोर तो कम हुआ पर ठंड बढ़ने लगी। आते वक़्त जब ट्रेन में कोई बता रहा था कि मुन्नार का तापमान दिसंबर में शून्य से भी नीचे चला जाता है तो हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मात्र 1500 मीटर ऊँचाई पर स्थित हिल स्टेशन में ऍसा हो सकता है। अब अतिरक्त कंबल के नाम पर होटल वाले ने पतली सी कंबल दी थी जो उस ठंड के लिए अपर्याप्त निकली। नतीजन सारी रात करवट बदलते और ठिठुरते बीती। मन ही मन सोचा, भगवन तूने दो रातों में जीवन के दोनों रंगों से साक्षात्कार करा दिया।..
अगली सुबह हमारा इराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान देख कर थेक्कड़ी निकलने का कार्यक्रम था। कैसी रही ये यात्रा ये जानते हैं इस यात्रा वृत्तांत की अगली किश्त में..

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

  1. यादें केरल की : भाग 1 - कैसा रहा राँची से कोचीन का 2300 किमी लंबा रेल का सफ़र
  2. यादें केरल की : भाग 2 - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...
  3. यादें केरल की : भाग 3 - आइए सैर करें बहुदेशीय ऍतिहासिक विरासतों के शहर कोच्चि यानी कोचीन की...
  4. यादें केरल की : भाग 4 कोच्चि से मुन्नार - टेढ़े मेढ़े रास्ते और मन मोहते चाय बागान
  5. यादें केरल की : भाग 5- मुन्नार में बिताई केरल की सबसे खूबसूरत रात और सुबह
  6. यादें केरल की : भाग 6 - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !
  7. यादें केरल की : भाग 7 - अलविदा मुन्नार ! चलो चलें थेक्कड़ी की ओर..
  8. यादें केरल की भाग 8 : थेक्कड़ी - अफरातरफी, बदइंतजामी से जब हुए हम जैसे आम पर्यटक बेहाल !
  9. यादें केरल की भाग 9 : पेरियार का जंगल भ्रमण, लिपटती जोंकें और सफ़र कोट्टायम तक का..
  10. यादें केरल की भाग 10 -आइए सैर करें बैकवाटर्स की : अनूठा ग्रामीण जीवन, हरे भरे धान के खेत और नारियल वृक्षों की बहार..
  11. यादें केरल की भाग 11 :कोट्टायम से कोवलम सफ़र NH 47 का..
  12. यादें केरल की भाग 12 : कोवलम का समुद्र तट, मछुआरे और अनिवार्यता धोती की
  13. यादें केरल की समापन किश्त : केरल में बीता अंतिम दिन राजा रवि वर्मा की अद्भुत चित्रकला के साथ !

6 comments:

  1. अत्यंत मनोरंजक विवरण और प्रभाव शाली चित्रों से सजी आपकी ये पोस्ट अप्रतिम है...बहुत ही आननद आया पढ़ कर...
    नीरज

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  2. शुक्रिया नीरज जी दरअसल ये जगह और वो दिन इतना खूबसूरत था कि हमने उस दिन जो भी तसवीरें लीं सब की सब हमारी पूरी यात्रा की धरोहर बन गई।

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  3. मनीष जी,
    सुन्दर सुन्दर मनमोहक चित्रों से सजी यह यात्रा वाकई अच्छी लगी.जायेंगे कभी उधर भी.

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  4. Manish that tea garden with tress is really captivating.

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  5. Well on that day we found everything so beautiful around us. Starting from the sunrise that was the most memorable day spent in Kerala.

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  6. definitely more enticing than Kashmir ! may be 'cos i have never been to Kerala , but have seen Kashmir .

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