Thursday, February 18, 2010

यादें केरल की भाग 9 : पेरियार का जंगल भ्रमण, लिपटती जोंकें और सफ़र कोट्टायम तक का..

केरल के इस यात्रा विवरण में पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि किस तरह मोटरबोट यात्रा का विचार त्याग कर हमने जंगल में दो-ढाई घंटों की ट्रेकिंग का निश्चय किया। पेरियार वाले, वन के अंदर इस भ्रमण को नेचर वॉक (Nature Walk) की संज्ञा देते हैं।


इसके लिए आपको पाँच सौ का पत्ता खर्च करना पड़ता है। एक समूह में पाँच सदस्य हो सकते हैं। जंगल में साथ चलने के लिए एक गाइड रहता है जो आपका जंगल में मार्गदर्शन करता है। आप उसे किसी भी प्रकार से नाराज़ नहीं कर सकते क्योंकि एक बार वन में घुस जाने के बाद, यात्रा शुरुआत करने वाली जगह पर सिर्फ वही आपको पहुँचा सकता है।

आप सोच रहे होंगे के पेरियार के इन घने जंगलों में हम लोगों ने रात भर डेरा डालने या फिर जीप सफॉरी का मन क्यूँ नहीं बनाया? तो हुजूर जवाब सीधा है मन तो तब बने जब जेब साथ दे। अब Thekkady Tourism Devlopment Council (TTDC) की इन दरों पर ज़रा गौर कीजिए

  • जंगल जीप सफॉरी (Forest Jeep Safari) : 2000 रुपये मात्र प्रति व्यक्ति
  • पेरियार टॉइगर ट्रेल (Periyar Tiger Trail) : एक रात दो दिन 3000 रुपये मात्र प्रति व्यक्ति
  • बैम्बू रैफ्टिंग (Bamboo Rafting) :2000 रुपये मात्र प्रति व्यक्ति

अब अगर आप पाँच छः लोग हों तो सारा बजट तो एक दिन ही में बिगड़ जाएगा :) !

ठीक सवा ग्यारह बजे हमारा मलयाली गाइड हमारे सामने था। जंगल में घुसने की पहली हिदायत ये थी कि मोजे के ऊपर से जोंक प्रतिरोधक वस्त्र पहन लें। इस कपड़े को मोजे के ऊपर पहन कर घुटनों तक बाँध लेते हैं (ऊपर पहले चित्र में देखें)। इस तैयारी के साथ हमारा काफ़िला बढ़ चला।


पेरियार के जंगलों में प्रवेश करने के लिए आपको पेरियार झील (Periyar Lake) को पार करना होता है। और झील पार की जाती है बाँस की नौका से। इस नौका को देख कर बच्चों के चेहर खिल उठे। इसे चलाने के लिए चप्पू की नहीं बल्कि रस्से की जरूरत होती है। रस्से के दोनों सिरे अलग अलग दिशाओं में मजबूत पेड़ों से बाँध दिये जाते हैं। बस हाथ से रस्से पर जोर लगाया नहीं कि चल पड़ी हमारी नौका...

कुछ ही मिनटों में हम झील की दूसरी तरफ थे। जंगल के अंदर हमने क्या क्या देखा उसकी झांकी तो आप इस पोस्ट में देख सकते हैं।

जंगल सघन था। थोड़ी दूर चलने के बाद झील दिखनी बंद हो गई। पेड़ अपनी लताओं के साथ हमारे चलने में रुकावट पैदा कर रहे थे।

कुछ पेड़ तो इतने ऊँचे थे कि उनका ऊपरी सिरा दिखता ही नहीं था। कुछ पर परजीवी लताएँ भी अपना आसन जमाए बैठीं थीं। हम चुपचाप बिना आवाज़ किए चलते रहे क्योंकि ऍसा गाइड महोदय का आदेश था।

पेरियार के जंगलों में ३५ प्रजातियों के जानवर और २६५ प्रजातियों के पक्षी मौजूद हैं। पर जानवरों को देखने के लिए जंगल के बहुत अंदर तक घुसना होता है।

एक घंटे चलते-चलते हमें पेड़ों की झुरमुट के नीचे छायादार जगह दिखाई दी। जमीन पर गीली और सूखी पत्तियों का जमाव था। वहाँ दो तीन दिन पहले अच्छी बारिश हुई थी। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद सब चित्र खींचने लगे।

तभी मुझे लगा कि हम इतनी देर एक जगह खड़े रहे तो अपने जूते जाँच लेने चाहिए। मेरा इतना कहना था कि हमारी एक सहयात्री को अपने जूते पर दो जोंकें चलती नज़र आईं। बस फिर क्या था आनन फानन में सब लोग अपने जूते झटकने लगे। उन दो जोकों को तो ठिकाने लगा दिया गया। पूरी यात्रा के बाद जब उन्होंने अपने जूते निकाले तो दो और जोकें जूत के अंदर प्रतिरोधक वस्त्र पर घूमती टहलती नजर आईं।



दो घंटे चलने के बाद हम थकने लगे थे। थकान के पीछे दिन की चढ़ती गर्मी का भी हाथ था। करीब दो बजे हम उन जंगलों से निकल आए थे। दिन का भोजन कुमली में करने के बाद हमें अपने अगले पड़ाव कोट्टायम की ओर कूच करना था जो वहाँ से करीब ११० किमी था। कुमली (Kumli) के बाहर सड़क के दोनों ओर मसालों के बागान हैं। अगर कोई पर्यटक चाहे तो टूरिस्ट गॉइड के साथ इन बागानो की सैर कर सकता है। चाय के बागान अब भी दिख रहे थे पर फर्क ये था कि इन बागानों में सिल्वर ओक (Silver Oak) के पेड़ के साथ काली मिर्च के पौधे भी लगे थे जिन्होंने सिल्वर ओक को अपने बाहुपाश में जकड़ा हुआ था।

रास्ते के चाय बागानों में पहली बार मजदूरों को पत्तियाँ चुनते भी देखने का अवसर मिला। अब हम पूर्व से पश्चिमी दिशा की ओर जा रहे थे, और पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ धीरे धीरे एक एक कर हमारा साथ छोड़ती जा रहीं थीं। कोट्टायम जिले में प्रवेश करते ही रबर के बागानों ने हमें घेर लिया था। कोट्टायम भारत में प्राकृतिक रबर के उत्पादन में प्रमुख स्थान रखता है। भारतीय रबर बोर्ड का मुख्य कार्यालय भी यहीं है। कोट्टायम केरल में शिक्षा और मलयालम साहित्य के विकास का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ सीरियन क्रिश्चन (Syrian Christan) की अच्छी खासी आबादी निवास करती है। शाम सात बजे के लगभग हम कोट्टायम शहर की चमक दमक के बीच थे।

पैकेज टूर वाले अक्सर थेक्कड़ी से पर्यटकों को कुमारकोम (Kymarakom) ले जाते हैं जो कोट्टायम से मात्र १८ किमी दूर है और पर दिसंबर में वहाँ के बैकवॉटर रिसार्टों (Backwater Resorts) की कीमत आसमान छूती हैं। २८ दिसंबर का दिन हमने केरल के बैकवॉटर को देखने के लिए मुकर्रर किया था। केरल का अगले दिन का रूप बिल्कुल भिन्न प्रकृति का था। पहाड़ों , जंगलों की सैर करने के बाद क्या पृथक था इस रूप में ये जानते हैं इस यात्रा की अगली कड़ी में...


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

  1. यादें केरल की : भाग 1 - कैसा रहा राँची से कोचीन का 2300 किमी लंबा रेल का सफ़र
  2. यादें केरल की : भाग 2 - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...
  3. यादें केरल की : भाग 3 - आइए सैर करें बहुदेशीय ऍतिहासिक विरासतों के शहर कोच्चि यानी कोचीन की...
  4. यादें केरल की : भाग 4 कोच्चि से मुन्नार - टेढ़े मेढ़े रास्ते और मन मोहते चाय बागान
  5. यादें केरल की : भाग 5- मुन्नार में बिताई केरल की सबसे खूबसूरत रात और सुबह
  6. यादें केरल की : भाग 6 - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !
  7. यादें केरल की : भाग 7 - अलविदा मुन्नार ! चलो चलें थेक्कड़ी की ओर..
  8. यादें केरल की भाग 8 : थेक्कड़ी - अफरातरफी, बदइंतजामी से जब हुए हम जैसे आम पर्यटक बेहाल !
  9. यादें केरल की भाग 9 : पेरियार का जंगल भ्रमण, लिपटती जोंकें और सफ़र कोट्टायम तक का..
  10. यादें केरल की भाग 10 -आइए सैर करें बैकवाटर्स की : अनूठा ग्रामीण जीवन, हरे भरे धान के खेत और नारियल वृक्षों की बहार..
  11. यादें केरल की भाग 11 :कोट्टायम से कोवलम सफ़र NH 47 का..
  12. यादें केरल की भाग 12 : कोवलम का समुद्र तट, मछुआरे और अनिवार्यता धोती की
  13. यादें केरल की समापन किश्त : केरल में बीता अंतिम दिन राजा रवि वर्मा की अद्भुत चित्रकला के साथ !

Monday, February 15, 2010

यादें केरल की भाग 8 : थेक्कड़ी - अफरातफरी, बदइंतजामी से जब हुए हम जैसे आम पर्यटक बेहाल !

26 दिसंबर की शाम कुमली के बाजारों में बीती। कुमली में मसालों के ढ़ेर सारे बगीचे (Spice Garden) हैं जहाँ इलायची, काली मिर्च, लौंग, दालचीनी, जायफल की खेती की जाती है। इसलिए हमारी खरीदारी का मुख्य सामान मसाले ही थे। अब भला ७० रुपये में सौ ग्राम इलायची मिले तो कौन नहीं लेना चाहेगा। इसके आलावा तरह-तरह के आयुर्वेदिक तेल और हाथों से बनाए चॉकलेट भी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र थे। यहाँ केरल के प्रसिद्ध आयुर्वेदिक तेल मसॉज (Herbal Oil Massage) का आनंद भी आप ले सकते हैं पर हममें से कोई उसके लिए विशेष उत्साहित नहीं था।

होटल के बगल में रात को केरल के शास्त्रीय नृत्य कत्थकली (Kathakali) का आयोजन था। पर एक एक टिकट का मूल्य दो सौ रुपये था और उसे देखने के लिए पर्याप्त संख्या में विदेशी पर्यटक मौजूद थे। दरअसल केरल में जाने पर एक बात स्पष्ट लगती है कि सरकार मुख्य रूप से विदेशी सैलानियों और अमीर भारतीयों को अपनी ओर आकर्षित करना चाहती है और ये बात थेक्कड़ी में सबसे ज्यादा खटकती है। कोचीन में जब हम सरकारी पर्यटन कार्यालय में विभाग द्वारा चलाए गए होटलों के बारे में पूछने गए थे तो वहाँ के कर्मचारी ने हँसते हुए जवाब दिया था कि वो आप लोग नहीं कर पाएँगे क्योंकि वे सारे सितारा होटल हैं। बाद में इस बात की सत्यता जानने के लिए जब इंटरनेट पर के.टी.डी.सी. (KTDC) का जाल पृष्ठ खोला तो पाया कि एक दो को छोड़ दें तो अधिकांश के किराये ही तीन हजार प्रतिदिन से ऊपर हैं।

जिस होटल में ठहरे थे वहाँ हमसे ये कहा गया था कि सुबह झील यात्रा के टिकट की चिंता ना करें वो बड़ी आसानी से मिल जाएगा। पर रात होते होते भारी भीड़ की वजह से हर टिकट पर प्रीमियम की बात होने लगी। सुबह सात बजे निकते तो थे कि आठ बजे फॉरेस्ट गेट पार कर साढ़े आठ बजे वाली नौका को पकड़ लेंगे पर गेट के बाहर ही जंगल में अंदर घुसने के लिए एक डेढ़ किमी लंबी गाड़ियों की पंक्ति लगी थी। गाड़ी को वहीं छोड़ हम गेट पर टिकट लेने पहुँचे। वहाँ भी वही हालत थी। देने वाला एक था और पंक्तियाँ दो थीं। एक विदेशियों के लिए और दूसरी देशियों के लिए। लाइन इतनी मंथर गति से बढ़ी कि हमें गेट पार करने में ही डेढ़ घंटे लग गए। लिहाजा साढ़े आठ की मोटरबोट छूट गई।

पूरी पेरियार झील उस समय सफेद घनी धु्ध में डूबी हुई थी। धु्ध इतनी गहरी थी कि ना तो जंगल दिख रहे थे ना झील। मन ही मन सोचा कि ऐसे में हमें मोटरबोट से शायद ही कुछ दिखाई देता। पेरियार जंगल के अंदर से ही वन विभाग और पर्यटन विभाग की नौकाएँ छूटती हैं। पर बदइंतजामी का आलम ये था कि घंटों पंक्ति में खड़े होकर भी टिकट नहीं मिल रहे थे। टिकट के दलाल पहले ही टिकट खरीद कर 'बोट फुल' की घोषणा कर देते। इस अफरातफरी की वजह से तनाव इस हद तक बढ़ गया कि बात मारा मारी तक पहुँच गई।
(काउंटर पर हंगामे का दृश्य बगल के चित्र में देखें)


घंटों लाइन में खड़े रह कर नौका यात्रा करने का विचार हमने त्याग दिया। हमें लगा कि चार घंटे पंक्ति में खड़े रहने के बजाए अगर हम वो समय जंगल में विचरण करने में लगाएँ तो वो ज्यादा बेहतर रहेगा। बाद में हमारे सहकर्मी (जो वहाँ दो दिन पहले पहुँचे थे) से पता चला कि मोटरबोट से उन्हें एक हिरण के आलावा कोई वन्य प्राणी नहीं दिखा। वास्तव में पेरियार की झील के भ्रमण का पूरा आनंद लेना हो तो कभी सप्ताहांत और पीक सीजन में ना जाएँ। वन्य जीव सामान्यतः सुबह या शाम के वक़्त ही पानी पीने के लिए झील की तरफ आते हैं इसलिए कोशिश करें कि इसी समय की बोट मिले।

पेरियार झील एक मानव निर्मित झील है जो पेरियार नदी पर मुल्लापेरियार बाँध (Mullaperiyar Dam) की वजह से बनी है। पेरियार एक टाइगर रिजर्व है और इसका विस्तार करीब ७७७ वर्ग किमी तक फैला हुआ है। बाघों के आलावा हाथी, हिरण और कई तरह के पशु पक्षी भी इस जंगल के भीतरी भागों में निवास करते हैं। जो भाग डैम के बनने से डूब गया था उसके मृत पेड़ों के सूखे तनों को आप अब भी झील के बीचों बीच निकला देख सकते हैं। बगल के चित्र में देखें..

झील के चारों ओर जिधर भी चहलकदमी करें पेड़ों का जाल दिखाई देता रहता है। साढ़े दस बज रहे थे और हमने एक बजे के नेचर वॉक (Nature Walk) के टिकट ले लिए थे। थोड़ा जलपान कर हम चहलकदमी करते हुए आस पास की हरियाली का आनंद लेते रहे। पास ही कछुआनुमा आकार की एक दुकान दिखी जिसमें पेरियार के अभ्यारण्य और वन्य जीवन से जुड़ी कुछ पुस्तकें मिल रही थीं।

ठीक एक बजे हम अपने जंगल अभियान यानि नेचर वॉक (Nature Walk) के लिए तैयार हो गए। जंगल के अंदर का तीन चार किमी का ये सफ़र करीब तीन घंटों का रहा। कैसा रहा हमारा ये संक्षिप्त जंगल प्रवास ये जानते हैं यात्रा की अगली किश्त में....

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

  1. यादें केरल की : भाग 1 - कैसा रहा राँची से कोचीन का 2300 किमी लंबा रेल का सफ़र
  2. यादें केरल की : भाग 2 - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...
  3. यादें केरल की : भाग 3 - आइए सैर करें बहुदेशीय ऍतिहासिक विरासतों के शहर कोच्चि यानी कोचीन की...
  4. यादें केरल की : भाग 4 कोच्चि से मुन्नार - टेढ़े मेढ़े रास्ते और मन मोहते चाय बागान
  5. यादें केरल की : भाग 5- मुन्नार में बिताई केरल की सबसे खूबसूरत रात और सुबह
  6. यादें केरल की : भाग 6 - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !
  7. यादें केरल की : भाग 7 - अलविदा मुन्नार ! चलो चलें थेक्कड़ी की ओर..
  8. यादें केरल की भाग 8 : थेक्कड़ी - अफरातरफी, बदइंतजामी से जब हुए हम जैसे आम पर्यटक बेहाल !
  9. यादें केरल की भाग 9 : पेरियार का जंगल भ्रमण, लिपटती जोंकें और सफ़र कोट्टायम तक का..
  10. यादें केरल की भाग 10 -आइए सैर करें बैकवाटर्स की : अनूठा ग्रामीण जीवन, हरे भरे धान के खेत और नारियल वृक्षों की बहार..
  11. यादें केरल की भाग 11 :कोट्टायम से कोवलम सफ़र NH 47 का..
  12. यादें केरल की भाग 12 : कोवलम का समुद्र तट, मछुआरे और अनिवार्यता धोती की
  13. यादें केरल की समापन किश्त : केरल में बीता अंतिम दिन राजा रवि वर्मा की अद्भुत चित्रकला के साथ !

Monday, February 8, 2010

यादें केरल की : भाग 7 - अलविदा मुन्नार ! चलो चलें थेक्कड़ी की ओर..

२६ दिसंबर की सुबह अपने एक रात के ठिकाने कानन देवन हिल्स क्लब से निकल हम इरवीकुलम राष्ट्रीय उद्यान (Ervikulam National Park) की ओर चल पड़े।


करीब दस बजे मुन्नार शहर से तीस चालिस मिनट की यात्रा कर जब हम वहाँ के फॉरेस्ट चेक प्वाइंट पर पहुँचे तो वहाँ पर्यटकों की २०० मीटर लंबी पंक्ति हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। चेक प्वाइंट से तीन चार बसें यात्रियों को अंदर पहुँचाती और दो घंटे बाद वापस ले आती हैं। करीब सवा घंटे प्रतीक्षा करने के बाद हमारा क्रम आया। जंगल के अंदर लेडीज पर्स के आलावा वन कर्मी कुछ भी ले जाने नहीं देते जो पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से उचित कदम है।

मिनी बस में खिड़की से हम इस राष्ट्रीय उद्यान की सैर पर निकले। एक ओर पहाड़ियाँ तो दूसरी ओर चाय बागानों से पटी हरी भरी राजमलई (Rajamalai Hills) की पहाड़ियाँ। ये राष्ट्रीय उद्यान करीब ९७ वर्ग किमी में फैला है और इस उद्यान से आप दक्षिण भारत की सबसे ऊँची पहाड़ी अनामुदी (Anamudi) ऊँचाई २६९५ मीटर को देख सकते हैं। बस की यात्रा २० मिनट में खत्म हो जाती है और फिर आगे का सफ़र पैदल तय करना पड़ता है। पर इस सफ़र की खास बात है सड़क के नीचे की और दिखते घाटी के दृश्य। चाय बागानों को एक ऊँचाई से देखना एक अद्भुत मंजर पेश करता है। ऐसा लगता है मानो भगवन ने विशाल हरे कैनवस पर पगडंडियों की आड़ी तिरछें लकीरें खींच दी हों। कहते हैं कि हर बारह सालों पर यहाँ नीलाकुरिंजी (Neelakurinji) के फूल खिल कर पूरी पहाड़ी को नीला कर देते हैं। अगली बार ये फूल २०१८ में खिलेंगे तब के लिए तैयार हैं ना आप ?

अब अगर आप राष्ट्रीय उद्यान में बहुतेरे पशु पक्षियों को देखने की तमन्ना लगाए बैठे हों तो आपको निराशा हाथ लगेगी क्योंकि पूरे रास्ते में सुंदर दृश्यों के साथ-साथ बस एक जानवर आपको दिखाई देगा और वो है यहाँ का मशहूर नीलगिरि त्हार (Neelgiri Tahr)। नीलगिरि त्हार पहाड़ी बकरियों की एक लुप्तप्राय प्रजाति है जिसे इस उद्यान में आप बहुतायत पाएँगे। इनके खतरनाक सींगों की तरफ न जाइएगा, ये स्वभाव से आक्रामक नहीं हैं। पहाड़ी के शिखर के पास पहुँचने के बाद आगे का रास्ता पर्यटकों के लिए बंद है इसलिए ट्रेकिंग का शौक रखने वालों को अपना मन मार कर लौटना पड़ता है।


दिन का भोजन करते समय मुन्नार शहर में रुके तो एक धार्मिक जुलूस दिखाई दिया। ढोल नगाड़ों के बीच स्थानीय निवासी तरह तरह के करतब दिखा रहे थे। लोहे की छड़ों को गाल के पास दोनों ओर छेद कर श्रृद्धालु चल रहे थे जिसे देख कर मन हैरत में पड़ गया। भगवान को प्रसन्न करने के लिए भक्त कितनी कठिन चुनौतियों को स्वीकार कर लेते हैं ये भी उसका ही एक नमूना लगा। वैसे सवाल ये भी उठता है कि ऍसा करने से क्या ऊपरवाला वाकई गदगद हो पाता है ?



करीब दो बजे हम मुन्नार से थेक्कड़ी(Thekkady) की ओर चल पड़े। कुछ देर तो पहले ही की तरह सड़क के दोनों ओर चाय बागानों वाला अति मनोरम दृश्य दिखता रहा। इसके बाद शुरु हुआ घुमावदार रास्तों का जाल। चाय बागानों की जगह अब हमें इलायची के जंगल नज़र आने लगे। मन हुआ कि अब केरल आए हैं तो इनके पौधों को जरा करीब से देखा जाए और लगे हाथ इलायची के हरे दानों पर भी हाथ साफ किया जाए। बगल के चित्र में आप हरी इलायची को जड़ के पास फला देख सकते हैं।

जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गए जंगलों की सघनता बढ़ती गई। यहाँ तक की साफ आकाश में धूप भी पेड़ों के बीच से छनकर थोड़ी बहुत आ पा रही थी। एक नई बात और हुई। जैसे ही हम मदुरई राष्ट्रीय मार्ग छोड़ दक्षिण की ओर थेक्कड़ी जाने वाले रास्ते में मुड़े, पहली बार गढ्ढेदार रास्तों से पाला पड़ा। रास्तों के झटकों से ध्यान तब हटा जब हमने पहली बार कॉफी के पौधों को देखा। इन पौधों को छाया की ज्यादा आवश्यकता होती है, इसलिए ये बड़े बड़े पेड़ो के बीच में अपनी जगह बना लेते हैं।

शाम पाँच बजे तक हम 'मसालों के शहर' कुमली पहुँच गए थे। कुमली तमिलनाडु और केरल की सीमा पर स्थित एक कस्बा है जहाँ से थेक्कड़ी का पेरियार राष्ट्रीय उद्यान पाँच किमी की दूरी पर है।

होटल खोजने में तो दिक्कत नहीं हुई पर असली समस्या थी अगली सुबह पेरियार झील में सैर करने के लिए टिकटों का जुगाड़ करने की। क्या हम अपनी इस मुहिम में सफल हो पाए ये ब्योरा इस वृत्तांत की अगली किश्त में।


अरे ये देखकर आपका मन ये नहीं कहने को हुआ कि सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं...
देखो देखो ये है मेरा जलवा...:)

पौधा इलायची का जिसके नीचे डंठल से निकलती है इलायची..


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

  1. यादें केरल की : भाग 1 - कैसा रहा राँची से कोचीन का 2300 किमी लंबा रेल का सफ़र
  2. यादें केरल की : भाग 2 - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...
  3. यादें केरल की : भाग 3 - आइए सैर करें बहुदेशीय ऍतिहासिक विरासतों के शहर कोच्चि यानी कोचीन की...
  4. यादें केरल की : भाग 4 कोच्चि से मुन्नार - टेढ़े मेढ़े रास्ते और मन मोहते चाय बागान
  5. यादें केरल की : भाग 5- मुन्नार में बिताई केरल की सबसे खूबसूरत रात और सुबह
  6. यादें केरल की : भाग 6 - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !
  7. यादें केरल की : भाग 7 - अलविदा मुन्नार ! चलो चलें थेक्कड़ी की ओर..
  8. यादें केरल की भाग 8 : थेक्कड़ी - अफरातरफी, बदइंतजामी से जब हुए हम जैसे आम पर्यटक बेहाल !
  9. यादें केरल की भाग 9 : पेरियार का जंगल भ्रमण, लिपटती जोंकें और सफ़र कोट्टायम तक का..
  10. यादें केरल की भाग 10 -आइए सैर करें बैकवाटर्स की : अनूठा ग्रामीण जीवन, हरे भरे धान के खेत और नारियल वृक्षों की बहार..
  11. यादें केरल की भाग 11 :कोट्टायम से कोवलम सफ़र NH 47 का..
  12. यादें केरल की भाग 12 : कोवलम का समुद्र तट, मछुआरे और अनिवार्यता धोती की
  13. यादें केरल की समापन किश्त : केरल में बीता अंतिम दिन राजा रवि वर्मा की अद्भुत चित्रकला के साथ !

Thursday, February 4, 2010

यादें केरल की : भाग 6 - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !

26 दिसंबर को ग्यारह बजे हम चांसलर रिसार्ट से मुन्नार शहर को कूच कर गए। कहते हैं मुन्नार शब्द मुनु (तीन) और आरू (नदी) के मिलने से बना है। ये तीन नदियाँ हैं मुद्रापुज्हा (Mudrapuzha), नल्लाथन्नी (Nallathanni) और कुंडला (Kundala)। इन तीनों नदियों के संगम पर कुंडला बाँध का निर्माण हुआ है जो शहर से करीब १३ किमी दूर है।

बाँध के कुछ किमी पहले मट्टुपेट्टी झील (Mattupetty Lake) है। अगर नीचे का मानचित्र देखें तो मुन्नार शहर पहुँच कर हमें पूर्व की तरफ जाने वाली सड़क पर मुड़ना था।

मुन्नार शहर एक सामान्य कस्बे की तरह दिखता है जिसे हर मोड़ पर बने छोटे बड़े होटल और सैलानियों की भीड़ बड़ा अनाकर्षक रूप दे देती है। पर इस कस्बे से एक किमी दूर आप जिधर भी बढ़ें न भीड़ भाड़ दिखती है और ना तो कंक्रीट के जंगल......।

दिखती है तो बस चारों और पहाड़ियों के बीच चाय बागानों की निर्मल स्वच्छ हरियाली।. केरल सरकार की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उन्होंने मुन्नार की नैसर्गिक सुंदरता को बचाए रखने के लिए इसके व्यापक शहरीकरण पर रोक लगाई हुई है।

(और हाँ ये बताना तो भूल ही गया कि इस ब्लॉग का हेडर में मैंने मुन्नार में खींची गई इस तसवीर का उपयोग किया है।)

रास्ते में जगह-जगह स्थानीय महिलाएँ हरी पत्तियों के साथ ताजे गाजर बेच रही थीं जो खाने के साथ देखने में भी बेहद खूबसूरत लग रहे थे। कुछ ही देर में हमारी गाड़ी मट्टुपेट्टी झील को पार कर रही थी। हमारा इरादा पहले सबसे दूर वाले स्थल इको प्वायंट पर पहुँच कर वापसी में मट्टुपेट्टी झील के किनारे चहलकदमी करने का था। इको प्वायंट पर निराशा हाथ लगी। पर्यटकों की भारी भीड़ वहाँ पर मौजूद थी। सामने नीचे झील का जल मंद-मंद बह रहा था। झील के पार पहाड़ियों थीं। 'शायद' आवाज़ वहीं से लौटकर आती होगी। शायद इसलिए कह रहा हूँ कि हमारे वहाँ घंटे भर बिताने के बावजूद भी किसी भी पर्यटक के चिल्लाने से कोई Echo सुनाई नहीं दी।

मट्टुपेट्टी झील और चेक डैम के आधा किमी आगे झील में स्पीडबोट की व्यवस्था है। पर वहाँ लाइन इतनी लंबी थी कि हमने बाकी लोगों को उसकी सवारी का आनंद उठाते हुए देखकर ही संतोष कर लिया। वैसे आप अगर जाएँ तो इस सफ़र का आनंद अवश्य लें। इको प्वायंट पर पैडल बोट पर बच्चे चले गए और मैं इधर उधर चहलकदमी करने लगा। सामने ही एक छोटी दुकान पर गरम गरम पकौड़ियाँ तली जा रहीं थीं। आलू, प्याज के आलावा मिर्चे की पकौड़ी भी मेनू में थी। पर मिर्चों का आकार देख कर पहले तो खाने की हिम्मत नहीं हुई। पर बाद में खाने पर पता चला की ये मिर्चें, हमारी तरफ की मिर्चों की तरह तीखी नहीं हैं।

इस हल्की पेट पूजा के बाद अपने चालक को मट्टुपेट्टी डैम पर इंतजार करने को कह, हमने तीन किमी का सफर पैदल ही तय करने का निश्चय किया। इको प्वायंट से मट्टुपेट्टी झील का रास्ता बेहद मनमोहक है। एक तरफ हरे भरे विरल जंगल और दूसरी ओर पहाड़ी ढलानों पर फैली हरी धानि घास के खूबसूरत कालीन।
पर सुरक्षा गार्ड इन हरी कालीनों पर आपको घूमने नहीं देते। ये जगह फिल्म की शूटिंग में भी काम में आती है। पर कुछ दूर आगे जाकर एक जगह दिखाई दी जहाँ सुरक्षा गार्ड नहीं थे। बच्चों की मौज हो गई वो घास की ढ़लान पर दौड़ते और फिसलते नीचे पहुँच गए। ऊपर आकाश की गहरी नीलिमा, सामने हरे भरे पेड़ों और चाय बागानों से लदीं पहाड़ियाँ और नीचे झील का बहता जल और बीच की ये हरी दूब..मैं तो ये देखकर बस आनंदविभोर होकर वहीं बैठ गया।


आधे घंटे बिताने के बाद हम वहाँ से आगे बढ़े। कुछ ही दूर पर सड़क की बाँयी तरफ इंडो स्विस डेयरी फार्म दिखा जो आम पर्यटकों के लिए खुला नहीं था। यहाँ पर स्विस प्रजाति की कई किस्मों की गायों का पालन पोषण होता है। रास्ते में बच्चे और बड़े हाथी की सवारी का आनंद ले रहे थे। स्पीड बोट वाली लाइन अब भी वैसी ही थी। झील का मोहक दृश्य पूरे रास्ते भर दिखाई देता रहा जो हमें निरंतर चलने को प्रेरित करता रहा। लौटते वक्त हम मुन्नार के फ्लोरिकल्चर सेन्टर में रुके जिसकी सचित्र रिपोर्ट आपको इस पोस्ट में दी जा चुकी है

शाम को हम मुन्नार के सरवन भवन में खाने पहुँचे। सरवन भवन मुन्नार के शाकाहारी भोजनालयों में सबसे ज्यादा चर्चित है और इसका प्रमाण मुझे खाने के लिए लगी लंबी लाइन को देखकर मिला। यहाँ की एक नवीनता ये भी है कि भोजन, केले के बड़े=बड़े पत्तों पर खिलाते हैं।
शाम होने वाली थी और हम अपने नए ठिकाने पर चल पड़े। अब यहाँ मात्र एक कमरे में दो परिवारों को रात गुजारनी थी। लिहाज़ा हमने जमीन पर ही अपना गद्दा बिछाया। रात को जब-जब हम सोने को उद्यत होते बगल के किसी समारोह से लाउडस्पीकर पर रह रह कर आती मलयालम लोक गीत की बहार हमारी निद्रा में खलल डाल देती और अटपटे से शब्दों को सुनकर सब को हँसी के दौरे पड़ जाते।
ग्यारह के बाद ये शोर तो कम हुआ पर ठंड बढ़ने लगी। आते वक़्त जब ट्रेन में कोई बता रहा था कि मुन्नार का तापमान दिसंबर में शून्य से भी नीचे चला जाता है तो हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मात्र 1500 मीटर ऊँचाई पर स्थित हिल स्टेशन में ऍसा हो सकता है। अब अतिरक्त कंबल के नाम पर होटल वाले ने पतली सी कंबल दी थी जो उस ठंड के लिए अपर्याप्त निकली। नतीजन सारी रात करवट बदलते और ठिठुरते बीती। मन ही मन सोचा, भगवन तूने दो रातों में जीवन के दोनों रंगों से साक्षात्कार करा दिया।..
अगली सुबह हमारा इराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान देख कर थेक्कड़ी निकलने का कार्यक्रम था। कैसी रही ये यात्रा ये जानते हैं इस यात्रा वृत्तांत की अगली किश्त में..

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

  1. यादें केरल की : भाग 1 - कैसा रहा राँची से कोचीन का 2300 किमी लंबा रेल का सफ़र
  2. यादें केरल की : भाग 2 - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...
  3. यादें केरल की : भाग 3 - आइए सैर करें बहुदेशीय ऍतिहासिक विरासतों के शहर कोच्चि यानी कोचीन की...
  4. यादें केरल की : भाग 4 कोच्चि से मुन्नार - टेढ़े मेढ़े रास्ते और मन मोहते चाय बागान
  5. यादें केरल की : भाग 5- मुन्नार में बिताई केरल की सबसे खूबसूरत रात और सुबह
  6. यादें केरल की : भाग 6 - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !
  7. यादें केरल की : भाग 7 - अलविदा मुन्नार ! चलो चलें थेक्कड़ी की ओर..
  8. यादें केरल की भाग 8 : थेक्कड़ी - अफरातरफी, बदइंतजामी से जब हुए हम जैसे आम पर्यटक बेहाल !
  9. यादें केरल की भाग 9 : पेरियार का जंगल भ्रमण, लिपटती जोंकें और सफ़र कोट्टायम तक का..
  10. यादें केरल की भाग 10 -आइए सैर करें बैकवाटर्स की : अनूठा ग्रामीण जीवन, हरे भरे धान के खेत और नारियल वृक्षों की बहार..
  11. यादें केरल की भाग 11 :कोट्टायम से कोवलम सफ़र NH 47 का..
  12. यादें केरल की भाग 12 : कोवलम का समुद्र तट, मछुआरे और अनिवार्यता धोती की
  13. यादें केरल की समापन किश्त : केरल में बीता अंतिम दिन राजा रवि वर्मा की अद्भुत चित्रकला के साथ !

Monday, February 1, 2010

आइए दिखाएँ आपको मुन्नार की ये खूबसूरत नर्सरी !

मुन्नार की खूबसूरत सुबह का जिक्र तो आपने पिछली पोस्ट में पढ़ा आइए आज देखते हैं केरल सरकार के वन विकास विभाग की ये खूबसूरत नर्सरी । फूलों के इन रंगों में हम सब तो रंग गए, देखें ये पुष्प और पादप आपका मन कितना रंग पाते हैं?




ये है 'टी रोज' (Tea Rose)अब चाय बागानों के बीच कोई गुलाब खिल जाए तो उसे क्या कहेंगे ? पर हुजूर ध्यान से इसकी पत्तियों और तने को देखिए। इसमें काँटे नहीं होते। है ना कमाल की बात!





है ना रंगों का ये अद्भुत मिश्रण बेजोड़ ?

अब शादी के बाद हनीमून पर जाना तो आजकल आम बात है। पर आप सोच रहे होंगे इस बात का इस पौधे से क्या संबंध ? इस पौधे की खासियत ये है कि शुरुआत में इसके चौड़े पत्ते हरे रंग के होते हैं जो बाद में सुर्ख लाल रंग ले लेते हैं। और ये लाली शायद हनीमून मना रहे जोड़ों की चेहरों की लाली से मिलती हो इसीलिए तो इनका नाम दिया गया हनीमून रेड (HoneyMoon Red) !

क्या आपको नहीं लगता कि यहाँ पत्तियाँ ही फूल बन गईं !



और ये अलग सा पौधा है पेपेरोमिया (Peperomia) का। पत्तों से निकलती लतरें इसे अद्भुत बनाती हैं।
और इन पंखुड़ियों का जादू तो दिल को ऍसा लुभा गया कि मन कह उठा

फूलों की तरह लब खोल कभी
खुशबू की जुबाँ में बोल कभी...

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

  1. यादें केरल की : भाग 1 - कैसा रहा राँची से कोचीन का 2300 किमी लंबा रेल का सफ़र
  2. यादें केरल की : भाग 2 - कोचीन का अप्पम, मेरीन ड्राइव और भाषायी उलटफेर...
  3. यादें केरल की : भाग 3 - आइए सैर करें बहुदेशीय ऍतिहासिक विरासतों के शहर कोच्चि यानी कोचीन की...
  4. यादें केरल की : भाग 4 कोच्चि से मुन्नार - टेढ़े मेढ़े रास्ते और मन मोहते चाय बागान
  5. यादें केरल की : भाग 5- मुन्नार में बिताई केरल की सबसे खूबसूरत रात और सुबह
  6. यादें केरल की : भाग 6 - मुन्नार की मट्टुपेट्टी झील, मखमली हरी दूब के कालीन और किस्सा ठिठुराती रात का !
  7. यादें केरल की : भाग 7 - अलविदा मुन्नार ! चलो चलें थेक्कड़ी की ओर..
  8. यादें केरल की भाग 8 : थेक्कड़ी - अफरातरफी, बदइंतजामी से जब हुए हम जैसे आम पर्यटक बेहाल !
  9. यादें केरल की भाग 9 : पेरियार का जंगल भ्रमण, लिपटती जोंकें और सफ़र कोट्टायम तक का..
  10. यादें केरल की भाग 10 -आइए सैर करें बैकवाटर्स की : अनूठा ग्रामीण जीवन, हरे भरे धान के खेत और नारियल वृक्षों की बहार..
  11. यादें केरल की भाग 11 :कोट्टायम से कोवलम सफ़र NH 47 का..
  12. यादें केरल की भाग 12 : कोवलम का समुद्र तट, मछुआरे और अनिवार्यता धोती की
  13. यादें केरल की समापन किश्त : केरल में बीता अंतिम दिन राजा रवि वर्मा की अद्भुत चित्रकला के साथ !

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