Sunday, May 30, 2010

चित्र पहेली 14 : क्या आपने देखी है हरे - हरे गोलाकार घेरों से भरी ऐसी झील ?

जब मैंने आपके सामने केरल यात्रा का विवरण पेश किया था तो थेक्कड़ी के बारे में लिखते हुए पेरियार झील का भी उल्लेख किया था। पेरियार झील में नौका विहार करते हुए सबसे अचंभित करते हैं, झील के बीचों बीच निकले पेड़ों के निर्जीव तने जो पेरियार को उसकी पहचान देते हैं। ऐसा ही कुछ दृश्य अरुणाचल की माधुरी झील में भी दिखता है। पर जहाँ पेरियार में बाँध बनने से हुए जलमग्न जंगलों की वजह से ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ वहीं माधुरी झील में यह स्थिति कालांतर में हुए भूकंप व भू स्खलन की वज़ह से हुई। पर आज की चित्र पहेली जिस झील के बारे में है उसका स्वरूप इन दोनों झीलों से सर्वथा भिन्न है।

अब आप इस चित्र को गौर से देखिए। पार्श्व की पहाड़ी के चारों ओर फैली झील में हरे रंग के इन गोलाकार घेरों को देख कर आप जरूर विस्मित हुए होंगे। मैं भी हुआ था और इसी वजह से इस झील को मैंने आज की चित्र पहेली के लिए चुना।


आपको बताना है कि इस झील का नाम क्या है और इन गोल घेरों का रहस्य क्या है?

अगली पोस्ट में आपके जवाबों के साथ आपको बताऊँगा इस झील के बारे में। तब तक हमेशा की तरह आपके जवाब माडरेशन में रखे जाएँगे...

Thursday, May 20, 2010

सारनाथ यात्राः क्या कहता है इतिहास यहाँ के धमेख व धर्मराजिका स्तूपों के बारे में ?

अब तक की वाराणसी यात्रा में जिक्र हो चुका है बनारस के कुछ मंदिरों कासारनाथ के नए मूलगंध कुटि विहार और उससे सटे बोधिवृक्ष का। जैसा कि मैंने बताया था कि ये जगहें बहुत बाद में अस्तित्व में आयीं। फिर सारनाथ की ऐतिहासिक धरोहरें कौन सी है? आज की तारीख में सारनाथ पहुँचते ही जो सबसे बड़ी ऐतिहासिक इमारत दिखाई देती है वो है धमेख स्तूप (Dhamek Stupa)। यूँ तो मूलगंध कुटि विहार की बगल में उत्तर दिशा की ओर ये स्तूप अवस्थित है पर दोनों परिसरों की अलग अलग घेराबंदी की वज़ह से आपको स्तूप तक पहुँचने के लिए मूलगंध कुटि विहार से बाहर निकलना पड़ता है।

कुटिविहार के आगे बढ़ते ही सड़क पर स्तूप की दिशा में उठती सीढ़ियां दिखाई देती हैं। हम गलती से उस ओर चल पड़े। ऊपर चढ़ने पर पता चला कि स्तूप के ठीक बगल में बना ये परिसर एक जैन मंदिर है जो ग्याहरवें जैन तीर्थंकर श्रेयसनाथ को समर्पित हैं। इस परिसर के ठीक आगे से धमेख स्तूप का रास्ता है। उस रास्ते पर थोड़ा आगे बढ़ने पर इसी मंदिर का पिछला हिस्सा दिखता है। दो विशाल हरे पेड़ों के बीच पीले रंग से रँगा मंदिर अनूठा दृश्य उपस्थित करता है।



रास्ते की बाँयी तरफ एक विशाल क्षेत्र में ऐतिहासिक बौद्ध इमारतों के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं। नीचे चित्र को अगर ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे कि इस पूरे इलाके में धमेख स्तूप के आलावा अशोक स्तंभ, धर्मराजिका स्तूप के अवशेष, बौद्ध विहार और भिक्षुओं के ध्यान करने की जगहें बनी हैं। मेंने उड़ीसा में हाल में कई बौद्ध धार्मिक स्थलों को देखा है। ध्यान करने के लिए बनाए गए जमीन से थोड़े उठे ईंट के इन गोलाकार या आयताकार चबूतरों की रूप रेखा करीब एक सी है। जिने बौद्ध इतिहास में रुचि हो उन्हें इस क्षेत्र का भ्रमण करते वक़्त एक गाइड अवश्य रखना चाहिए।



सारनाथ में फिलहाल धर्मराजिका स्तूप (Dharmarajika Stupa) की अब सिर्फ नींव ही दिखती है। इस स्तूप के इन हालातों की भी एक दुखद कथा है। कहते हैं सम्राट अशोक ने अपने ज़माने से पहले बने बौद्ध स्तूपों को खुलवाकर बौद्ध धर्मग्रंथों को एकत्रित किया था और फिर अपने द्वारा विश्व के कई भागों में बनाए हजारों स्तूपों में बाँट दिया था। धर्मराजिका स्तूप भी उनमें से एक था। शुरुआत में इस स्तूप का व्यास 13.49 मीटर था । कालांतर में छः बार इसके स्वरूप में परिवर्तन किए गए जिसमें इसके चारों ओर का परिक्रमा पथ और चारों दिशाओं से इसकी छत पर ले जाने वाली सीढ़ियाँ प्रमुख थीं। पर 1794 में जब बनारस पर राजा चेत सिंह का शासन चल रहा था, उनके एक दीवान जगतसिंह ने इस इमारत में लगी ईंटों के निर्माण सामाग्री के रूप में इस्तेमाल करने के लिए, इस स्तूप को तुड़वा दिया। टूटे स्तूप के अंदर से पत्थर के बक्से में हरे रंग के संगमरमर पर खुदे बौद्ध अभिलेख मिले। दुर्भाग्यवश संगमरमर के उस टुकड़े को गंगा में प्रवाहित कर दिया गया। आज भी पत्थर का वो बक्सा कलकत्ता के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है।



धर्मराजिका स्तूप के भग्नावशेषों से जैसे ही हम धमेख स्तूप की ओर बढ़े, पूरा वातावरण शांत और भक्तिमय हो गया। देश विदेश से आए श्रद्धालु अलग अलग तरीकों से भगवान बुद्ध के ध्यान में जुटे थे।

कुछ तो एकांत में शांति से भगवान को याद कर रहे थे तो कुछ हाथों में फूल लिए बौद्ध भिक्षुओं के धर्मपाठ की पुनरावृति कर रहे थे।


ये सब देखते देखते हम धमेख स्तूप के बिल्कुल करीब पहुँच गए। धमेख इसका आधुनिक नाम है। प्राचीन काल में इसी स्थान विशेष पर गौतम बुद्ध द्वारा उपदेश दिए जाने की वज़ह से इस स्तूप का नाम धर्म चक्र स्तूप पड़ गया। ये स्तूप देखने में काफी विशाल है। इसका व्यास 28.5 मीटर और ऊँचाई 33.35 मीटर है और अगर इसमें जमीन के नीचे तक गए इसके आधार का हिस्सा जोड़ दें तो इसकी ऊँचाई 42.6 मीटर हो जाती है। लगभग ग्यारह मीटर ऊँचाई तक तो इसकी बाहरी दीवार पत्थर की बनी प्रतीत होती है पर उसके ऊपर का हिस्सा ईंटों की बेलनाकार संरचना के रूप में ऊपर उठता दिखाई देता है। नीचे थोड़ी थोड़ी दूर पर जो चौखटनुमा खाने दिख रहे हैं, वहाँ कभी बुद्ध की प्रतिमाएँ रही होंगी ऐसा इतिहासकारों का अनुमान है। वैसे भी ये पूरा इलाका तुर्की मुस्लिम शासकों के आक्रमण का दंश झेल चुका है। अशोक स्तंभ भी ऐसे ही एक आक्रमण में तोड़ डाला गया और अब उसका शीर्ष पास में ही बने संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहा है।


इतना तो तय है कि हमारे शासक अपने इतिहास को संरक्षित रखने में जितने उदासीन रहे, उससे ठीक उलट हम पर शासन करने वाले अँग्रेजों ने हमारा इतिहास जानने में खासी दिलचस्पी ली। सारनाथ का धमेख स्तूप इसका जीता जागता उदहारण है। अंग्रेज इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस स्तूप के अंदर रखे गए अभिलेखों के बारे में जानने के लिए शिखर के मध्य से लम्बवत खुदाई करवाई। मात्र 91.4 सेमी नीचे ही उन्हें ब्राह्मी लिपि में लिखा सातवीं सदी का अभिलेख मिला जिस पर लिखा था 'ये धम्मा हेतु प्रभावा हेतु'। इसके भी काफी नीचे मौर्य कालीन अभिलेख मिले। अभी ये स्तूप जिस स्वरूप में है उसके शिल्प से लगता है कि इसे गुप्तकाल में बनाया गया होगा।

स्तूप का गोलाकार चक्कर लेते समय कुछ लोगों को मैंने जलती मोमबत्तियों को कपड़े में बाँध कर स्तूप के ग्यारह मीटर से ऊपर के ईंट से बने हिस्से में फेंकता पाया। शायद बौद्ध या स्थानीय मान्यताओं में ऍसा करना शुभ माना जाता हो।

धमेख स्तूप का दर्शन करने के बाद हम यहाँ के संग्रहालय की ओर बढ़े। अब सारनाथ आकर अपने राष्ट्रीय चिन्ह अशोक स्तंभ के शीर्ष को कौन पास से देखना नहीं चाहेगा? बलुआ पत्थर से बना ये शीर्षक संग्रहालय में प्रवेश करते ही दिख जाता है। पूरा संग्रहालय कई दीर्घाओं में बँटा है। हर दीर्घा में क्या है, इसकी जानकारी आप टचस्क्रीन कंप्यूटर से जान सकते हैं। बुद्ध की एक सुंदर मूर्ति के समक्ष जब पीछे से बुद्धम् शरणम गच्छामि का आडिओ सुनाई देता है तो मन अपने आप एक अज़ीब सी शांति से भर उठता है।

इसी शांति को बटोरे हुए हम वापस शाम को बनारस की ओर चल पड़े। अगर ऍतिहासिक स्थलों में आप रुचि रखते हों और शांत भक्तिमय वातावरण आपको आनंदित करता हो, तो बनारस आते वक़्त सारनाथ अवश्य जाएँ। आशा है बनारस और सारनाथ का ये यात्रा वृतांत आपको पसंद आया होगा। अपनी राय से जरूर अवगत कराएँ।

Monday, May 10, 2010

चलिए चलें सारनाथ जहाँ पड़ी बौद्ध धर्म की नींव !

यूँ तो इस साल जनवरी के अंतिम हफ्ते में समूचा उत्तर भारत कोहरे की चपेट में था पर 26 जनवरी के दिन बनारस में धूप अच्छी तरह खिल गई थी। सुबह साढ़े दस के लगभग हम बनारस से सारनाथ की ओर रवाना हो गए। शहर के उत्तर पूर्वी दिशा में स्थित सारनाथ, बनारस से तकरीबन 13 किमी की दूरी पर है। पर बनारस की भीड़ भीड़ वाली सड़कों से निकल कर सारनाथ पहुँचने में पौन घंटे लग ही जाते हैं।

सारनाथ के इलाके के पास पहुँचते ही इस बौद्ध धार्मिक स्थल की अहमियत का अंदाजा लग जाता है। विश्व के विभिन्न कोनों से आए विदेशी पर्यटकों की तादाद, हमारे जैसे देशी पर्यटकों से थोड़ी ही कम दिखती है। सारनाथ में देखने के लिए विभिन्न देशों के बौद्ध अनुयायिओं की मदद से बनाए गए कई छोटे बड़े मंदिरों के आलावा, जैन मंदिर, हिरण उद्यान, बौद्ध विहार के अवशेष व एक बेहद प्रसिद्ध राजकीय संग्रहालय भी है।

हमारे समूह ने सबसे पहले यहाँ के नए बौद्ध मंदिर मूलगंध कुटि विहार (Mulagandh Kuti Vihar) की ओर रुख किया। दरअसल मंदिर से थोड़ी दूर पर इसी नाम के पुराने मंदिर के भग्नावशेष मिले हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग की माने तो यहाँ अवस्थित उस प्राचीन मंदिर की ऊँचाई लगभग 61 मीटर थी। 18 मीटर से कुछ अधिक वर्गाकार भुजा वाले इस मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर था जिसके सामने एक आयताकार मंडप एवम् विशाल प्रांगण था। इतिहासकारों का मानना है कि स्थापत्य और ईंटों की सज्जा शैली के हिसाब से ये मंदिर गुप्त काल में बनाया गया होगा।

इसी स्थल पर नए मंदिर को बनाने का श्रेय श्रीलंका के बौद्ध प्रचारक अंगारिका धर्मपाल को जाता है जिन्होंने भारत में महाबोधि समाज की नींव रखी। धर्मपाल के आह्वाहन पर विश्व भर के बौद्ध धर्मावलंबियों के दान से 1931 में इस मंदिर का निर्माण हुआ। भारत के नार्गाजुन कोंडा और तक्षशिला में उत्खनन से मिले कई पवित्र बौद्ध ग्रंथों को अंग्रेजों ने महाबोधि समाज को भेंटस्वरूप दिया और ये आज इस मंदिर की शोभा बढ़ा रहे हैं। हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन इन धर्मग्रंथों के साथ यहाँ एक शोभायात्रा निकाली जाती है।



मंदिर में घुसते ही स्वर्णिम आभा से चमकती बुद्ध की प्रतिमा नज़र आती है। प्रतिमा के बगल में जापान से लाई गई एक विशाल घंटी भी दृष्टिगोचर होती है। एक अलग बात ये दिखी कि कैमरे के लिए कोई टिकट अलग से नहीं दिया जा रहा था । सिर्फ एक अनुरोध इतना कि टिकट की जगह वो राशि आप दानपात्र में डाल दें।



भगवान बुद्ध को प्रणाम करने के बाद सहसा नज़र मंदिर की दीवारों पर चली गई। प्रख्यात जापानी चित्रकार कोसेत्सू नोसू (Kosetsu Nosu) के बनाए इन चित्रों को 1936 में आम जन के सामने प्रस्तुत किया गया। इन चित्रों में बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं का निरूपण किया गया है।





मंदिर परिसर से निकल कर हम उस स्थान की ओर बढ़ गए जिसके लिए सारनाथ विख्यात है। आपको तो पता ही होगा कि क्यूँ सारनाथ भगवान बुद्ध के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है? अगर आप भूल गए हों तो चलिए आपकी याददाश्त एक बार फिर ताज़ा किए देते हैं। दरअसल बोधगया, बिहार में ज्ञान प्राप्ति के बाद अपने प्रथम पाँच शिष्यों को इसी जगह स्थित हिरण उद्यान में बुद्ध ने पहला धर्मोपदेश दिया जिसका उल्लेख 'धर्म चक्र प्रवर्तन' के नाम से बौद्ध साहित्य में मिलता है। यानि बौद्ध धर्म की नींव सारनाथ में ही पड़ी।

बौद्ध धर्म ग्रंथों में सारनाथ का उल्लेख ॠषिपत्तन, धर्मपत्तन, मृगदाय व मृगदाव के रूप में होता रहा है पर ताज़्जुब की बात ये है कि सारनाथ का ये आधुनिक नाम पास में स्थित महादेव के मंदिर सारंगनाथ से निकल कर आया है।


मूलगंध कुटि विहार से निकलकर हम उस बोधिवृक्ष के पास आ गए जिसके नीचे अपने पाँच शिष्यों को उपदेश देते गौतम बुद्ध की मूर्ति दिखाई दे रही थी। कहते हैं कि सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा ने बोधगया स्थित पवित्र बोधि वृक्ष की एक शाखा श्रीलंका के अनुराधापुरा में लगाई थी। उसी पेड़ की एक शाखा से सारनाथ का बोधिवृक्ष फला फूला है। यह शाखा यहाँ मुलगंध कुटि विहार के उद्घाटन के समय लगाई गई थी। 1989 में यहाँ गौतम बुद्ध व उनके शिष्यों की प्रतिमा म्यानमार के बौद्ध श्रृद्धालुओं की मदद से बनी। 1999 में इस परिसर में बुद्ध के 28 रूपों की प्रतिमा और लगाई गई जिनमें से एक का चित्र आप नीचे देख सकते हैं।


इसी परिसर में ही एक विशाल घंटी भी लगी हुई है जिसे बौद्ध धर्म घंटे का नाम देते हैं। कहते हैं इसे बजाते वक़्त इसकी आवाज़, सात किमी दूर तक सुनाई देती है। इस परिसर से निकल कर हम सारनाथ के प्राचीन स्तूपों की ओर बढ़े। सारनाथ की यात्रा के इस चरण के बारे में जानिएगा विस्तार से इस कड़ी के अगले भाग में..


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