Sunday, October 17, 2010

राँची के दुर्गा पूजा के पंडालों की सैर भाग 2 आज देखिए नज़ारे बकरी बाजार, काँटाटोली, कोकर और रातू रोड के...

पिछली पोस्ट में आपने मेरे साथ राँची के हरमू, राँची झील और अपर बाजार के पंडालों को देखा था। आज आपसे वादा था राँची के सबसे बड़े पंडाल और बारिश में भीगी राँची की रात की गहमागहमी को दिखाने का। पिछली पोस्ट में अभिषेक ओझा पूछ रहे थे इस साल बकरी बाजार में क्या हुआ? राँची वासियों के लिए हर साल दुर्गा पूजा में ये सवाल सबसे अहम होता है और इसी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हम आज के सफ़र की शुरुआत करते हैं अपर बाजार स्थित 'बकरी बाजार' के पंडाल से।

बकरी बाजार के पंडाल की खासियत हमेशा से ये रही है कि इसके पास अपनी चुनी हुई थीम को प्रदर्शित करने के लिए काफी जगह है। इस बार यहाँ पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के तामलुक में स्थित किले और उसके प्रागण के एक पुराने मंदिर को प्रदर्शित किया गया है। किले की दीवारों में दिखती सीलन, लतर वाले पादपों की लटकती बेलें एक पुराने किले में घुसने के अहसास को पुरज़ोर करती हैं। जब हम वहाँ पहुँचे तो बारिश की एक लहर आ कर जा चुकी थी और उससे मंदिर और किले की लाल इँटों की दीवारें और स्याह हो कर अपने पुरातन होने की गवाही दे रही थीं।


करारी धूप ने पल भर में दीवारों के रंग पर क्या प्रभाव डाला वो आप ऊपर और नीचे के चित्रों में साफ देख सकते हैं।



अंदर मंदिर के प्रागण का हरा भरा खुला वातावरण मन मोह रहा था..


माता दुर्गा के इस रूप में देखकर भला किसकामन श्रृद्धामय ना हो जाए...



बकरी बाजार से वापस लौट कर शाम हमने घर में बिताई। शाम से बारिश के तीन चार झमाझम दौर हो चुके थे। रात दस बजे लगा कि बारिश रुक गई है। सो हम रात ग्यारह बजे राँची की रंगत देखने के लिए निकल पड़े कोकर की ओर जो अपनी जगमगाती विद्युत सज्जा के लिए खास तौर पर जाना जाता है। कोकर जाने के पहले हम रुके काँटाटोली के 'नेताजीनगर पूजा समिति' के द्वार पर। इस बार यहाँ पंडाल में तीन ऐसी वस्तुओं का प्रयोग किया गया था जिनका हम रोजमर्रा की ज़िंदगी में अक्सर प्रयोग करते हैं। एक नज़र नीचे के चित्र को देख कर क्या आप पहचान सकते हैं कि क्या हैं ये तीन वस्तुएँ?


ठहरिए पहले क्लोज अप ले लिया जाए! तो देख लिया आपने सूप, टोकरी और आइसक्रीम खाने वाले चम्मच का किस तरह उपयोग किया पंडाल बनाने वाले कारीगरों ने ?



मुख्य मंडप तक पहुँचने के पहले गलियारे में भी शानदार सजावट थी...


लकड़ी के इस काम को भला कौन नहीं सराहेगा ?



जितनी मेहनत इस बाहरी साज सज्जा में की गई, उतनी ही माता को सजाने सँवारने में....


काँटाटोली से हम बढ़े कोकर की ओर। बच्चों के लिए कोकर जाना हमेशा खुशी का विशेष सबब रहा है। इस बार भी विद्युत सज्जा में दिखती झांकियाँ, शेर और मगरमच्छ के चलते फिरते पुतले और फिर पूजा मंडप के निकट लगने वाला मेला उनको आकर्षित कर रहा था। अब जब विद्युत सज्जा अगर फुटबॉल प्रेमी बंगाली कारीगर करेंगे तो फिर हमारे आक्टोपसी पॉल बाबा को स्पेन वाले बक्से पर बैठने का नज़ारा क्यूँ कर दिखाना भूल जाएँगे?



पर इस बार कोकर के पूजा पंडाल की साज सज्जा पिछले साल से फीकी रही।


कोकर से हम बढ़े कचहरी चौक की तरफ जहाँ इस साल वैष्णव देवी के मंदिर का मॉडल तैयार किया गया था। रात के साढ़े बारह बज रहे थे और बारिश पुनः प्रारंभ हो गई थी पर संग्राम पूजा समिति के पंडाल के बाहर जबरदस्त भीड जमा थी। अंदर बिजली से चलने वाले प्रारूपों की मदद से अघोरी साधु भैरवनाथ और दुर्गा माता द्वारा उनके संहार की कथा चल रही थी। भीड़ ने झटके से हमें अंदर ठेला। कथा चलती रही भक्त देवी के हर वार पर खुशी से जय माता दी का हर्षोन्नाद करते दिखे। क्या बच्चे क्या बड़े सभी भक्ति के रंग में रँगे थे।

हल्की बारिश अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। रात्रि का एक बज चुका था। अब हमें अपने अंतिम पड़ाव रातू रोड की ओर बढ़ना था। बारिश में भींगते हमारे जैसे कई लोग थे। कुछ ही जन ऐसे थे जो छतरी के साथ चल रहे थे। रातू रोड भी हर साल की तरह सुंदर विद्युत सज्जा से चकाचौंध था।


पंद्रह मिनट तक बारिश की फुहारों के बीच चलते हम रातू रोड के 75 फीट ऊँचे पूजा पंडाल के पास पहुँचे। नारियल के बाहरी कवच और उसके रेशे से पूरे पंडाल की साज सज्जा की गई थी।


पंडाल के अंदर भगवान राम की ये छवि मुझे विशेष रूप से पसंद आई।


रातू रोड से हम वापस रात दो बजे तक घर आ गए। और देखिए मौसम का मिजाज़, आज विजयदशमी के दिन बादल एक बार फिर सही समय पर छँट गए जिससे रावण दहन भली भांति सम्पन्न हो गया।

Saturday, October 16, 2010

आइए चलें राँची के दुर्गा पूजा पंडालों की सैर पर.. भाग 1

राँची में इस वक़्त दुर्गा पूजा का जश्न जोरों पर है। वैसे पूजा की इस बेला में मौसम ने भी क्या खूब करवट ली है। अष्टमी के साथ ही बादलों की फौज राँची के आसमाँ में पूरी तरह काबिज़ हो गई है। बारिश भी ऐसी की अभी है और अभी नहीं है। पर ऊपर से गिरती इन ठंडी फुहारों का पूजा का आनंद उठाने वालों पर जरा सा भी असर नहीं पड़ा है। बारिश और धूप से आँखमिचौली के बीच मैंने भी दुर्गा पूजा पंडालों के बीच एक दिन और एक रात बिताई। दुर्गा पूजा के पंडालों (Puja Pandals of Ranchi ) में आपको पहले भी घुमाता रहा हूँ तो चलिए निकलते हैं आपको लेकर माता के दर्शन पर..

सुबह के साढ़े नौ बजे हैं। घर से साढ़े दस बजे निकलने का वक़्त तय है। पर दस बजे से ग्यारह बजे की बारिश हमारे कार्यक्रम को पैंतालिस मिनट आगे खिसका देती है। अपनी कॉलोनी से डिबडी चौक के फ्लाईओवर को क्रास करते ही अरगोड़ा और फिर हरमू का इलाका आ जाता है। अरगोड़ा दुर्गा पुजा पंडाल से ज्यादा रावण दहन के लिए जाना जाता है। इसलिए सबसे पहले हम जा पहुँचते हैं हरमू की पंचमंदिर पूजा समिति के पंडाल पर। वैसे जो राँची के नहीं हैं उन्हे बता दूँ कि इस इलाके का नाम हरमू नदी के नाम पर है जो अब अवैध निर्माणों की वज़ह से लगभग विलुप्तप्राय ही हो गई है। हमारे क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धौनी हमारी कॉलोनी छोड़ अब इसी इलाके में बने अपने नए घर में रहते हैं।

पंडाल के करीब पहुँचे तो चटक रंगों से सुसज्जित पंडाल को देख कर मन रंगीन हो उठा। बोध गया के बौद्ध मंदिर से प्रेरित ये पंडाल सिर्फ बाहर से ही बौद्ध मठ की याद नहीं दिलाता।

अंदर माँ दुर्गा की प्रतिमा भी बौद्ध मूर्ति कला की झलक दिखलाती है।

हरमू रोड से रातू रोड के बीच के इलाके में राँची शहर के खासमखास पंडाल रहते हैं। पर इन सबमें मुझे हर साल सत्य अमर लोक पूजा समिति द्वारा रचित पंडाल सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। कम जगह और कम बजट में ये लोग हर साल कलाकारी के कुछ ऐसे नायाब नमूने लाते हैं कि दाँतों तले उंगलियाँ दबाने को जी चाहता है। चार लाख की लागत पर बनाया गया इस साल का पंडाल फिरोज़ाबाद से लाई हुई चूड़ियों से बनाया गया है। पंडाल में दुर्गा माता को एक विजय रथ पर सवार हैं।


और रथ के वाहक हैं ये सफेद घोड़े...





रथ के पहिए बहुत कुछ कोणार्क के सूर्य मंदिर के चक्रों की याद दिलाते हैं।


पंडाल के अंदर और बाहर हर हिस्से में चूड़ियों को तोड़ तोड़ कर भांति भांति की मनोरम आकृतियाँ बनाई गई हैं। आयोजकों का कहना है कि करीब तीन लाख चूड़ियों से बनाए गए इस पंडाल की चूड़ियों का काली पूजा में फिर प्रयोग करेंगे।


बगल में ही गाड़ीखाना का पंडाल है जहाँ इस बार थर्मोकोल पर इस तरह डिजायन बनाए गए हैं मानो संगमरमर पत्थर के हों।

गाड़ीखाना से हमारी गाड़ी बढ़ती है राजस्थान चित्र मंडल के पंडाल की ओर। ये पंडाल राँची झील के किनारे काफी व्यस्त इलाके में बनाया जाता है। कम जगह होने की वज़ह से सत्य अमर लोक की तरह इस पंडाल के आयोजक कारीगरी के नए प्रयोगों को हमेशा से प्रोत्साहित करते रहे हैं। राजस्थान चित्र मंडल का इस साल का पंडाल नेट के कपड़े से और मूर्तियाँ जूट से बनाई गई हैं.

तो देखिए जूट से बनी दुर्गा जी का ये रूप...


राँची झील के दूसरी तरफ ओसीसी पूजा समिति का पहाड़नुमा ये पंडाल बच्चों को खूब भा रहा है।



दुर्गा माँ की प्रतिमा भी यहाँ निराली है।

आज के लिए तो बस इतना ही। कल आपको दर्शन कराएँगे राँची के सबसे बड़े पंडाल का और साथ में होगी बारिश से भीगी राँची की मध्यरात्रि में चमक दमक।

Friday, October 8, 2010

चित्र पहेली 16 परिणाम : आइए देखें यूरोपीय शैली में बनाए गए अमर महल को...

पिछली पोस्ट में आपसे सवाल पूछा था एक महल के बारे में जो दिखता तो यूरोपीय शैली का था पर जिसे बनाया था एक भारतीय राजा ने। तो आइए जानते हैं इस महल का रहस्य। इस महल का नाम है अमर महलइसकी परिकल्पना कश्मीर के डोगरा राजा अमर सिंह ने एक फ्रांसिसी वास्तुविद् की सहायता से सन 1862 में की थी। पर ये महल बन पाया 1890 में जाकर।

चित्र छायाकार : अजित कार्तिक

महल को यूरोपीय हवेली की शक्ल देने के लिए जम्मू का एक पहाड़ी इलाका चुना गया। लाल बलुआपत्थर और लाल ईटों से बने इस महल के सामने तावी नदी घाटी का मनोरम दृश्य दिखता है। अपने समय में ये जम्मू की सबसे ऊँची इमारत मानी जाती थी।


चित्र सौजन्य

भले ही आपने अमर सिंह का नाम नहीं सुना हो पर उनके आज की कश्मीर समस्या की जड़ में उनके पुत्र राजा हरि सिंह थे। वही हरि सिंह जिन्होंने आज़ादी मिलने के बाद भी भारत या पाकिस्तान में अपनी रियासत का विलय ना कर स्वाधीन रहने की कोशिश की थी। हरि सिंह की पत्नी महारानी तारा देवी ने अपनी जिंदगी के अंतिम वर्ष इसी महल में बिताए। आज भी महारानी तारा देवी का कक्ष उसी हालत में रहने दिया गया है जिसमें वो रहती थीं। महाराज अमर सिंह के पोते कर्ण सिंह जी ने इस महल को 1975 में एक संग्रहालय में तब्दील कर दिया।
डोगरा राजाओं का स्वर्ण सिंहासन भी आज इस संग्रहालय के दरबार कक्ष की शोभा बढ़ा रहा है।


पर आज सिर्फ इसकी इस प्राचीन विरासत को देखने के लिए ही पर्यटक यहाँ नहीं आते हैं। इस संग्रहालय में डोगरा राजाओं के समय की काँगड़ा और पहाड़ी चित्रकला का अद्भुत संग्रह है। संग्रहालय में भारत के मशहूर चित्रकारों की चित्रकला प्रदर्शित करती कई कला दीर्घाएँ भी हैं। यही नहीं यहाँ महाराज कर्ण सिंह द्वारा पिछले पचास साल में संग्रहित भारतीय और विश्व के जाने माने लेखकों द्वारा लिखी गई बीस हजार से ज्यादा पुस्तकों का संकलन है।

पहेली का सही जवाब देने में सबसे पहले सफल हुए अन्तर सोहिल। वैस उनके बाद प्रकाश गोविंद भी सही उत्तर देने में सफल रहे। आप दोनों को हार्दिक बधाई और बाकी लोगों को अनुमान लगाने के लिए शुक्रिया। आशा है जम्मू के आस पास रहने वाले लोग जम्मू जाने पर इस महल का भी चक्कर लगा कर जरूर आएँगे।

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