Monday, August 29, 2011

चित्र पहेली 19 : ये किस जीव के अंडे हैं ?

चित्र पहेलियों की कड़ियों में बहुत पहले समुद्र तट के किनारे रात के समय होती कछुओं की दौड़ दिखाई थी और पूछा था आप सब से कि ये दौड़ आखिर किस खुशी में है? बाद में आपको बताया था कि भारत के पूर्वी तटों पर ये दौड़ कछुओं के प्रजनन काल में अक्सर देखने को मिलती है। पर आज की पहेली के चित्र में माज़रा कुछ उल्टा है। चित्र में एक समुद्र तट दिख रहा है और उसके साथ दिख रही हैं कुछ अंडाकार आकृतियाँ!



ये आकृतियाँ आगर वास्तव में किसी बड़े जीव के अंडे हैं तो फिर ये समझ नहीं आता कि इस निर्जन से दिखते तट पर उन्हें बिना छुपाए यूँ तट पर क्यूँ छोड़ दिया गया है? आखिर कौन सा जीव ऐसा कर सकता है ? कम से कम कछुए तो ऐसा नहीं करते। हो सकता है कि आप इन्हें अंडे मानने से इनकार दें। फिर भी सवाल तो वही रह जाता है ना कि आखिर ये हैं क्या ? तो दिमागी घोड़े दौड़ाइए या फिर अगर फिर भी जवाब ना समझ आए तो कीजिए अगली पोस्ट का इंतज़ार। तब तक आपके जवाब हमेशा की तरह माडरेशन में रखे जाएँगे।

Monday, August 22, 2011

चाँदीपुर समुद्र तट भाग 3 : दिन की मौज मस्ती और अलविदा.

दिन के बारह बजे मौसम बिल्कुल साफ हो गया था। इस बार चूँकि हमे पानी मरं छपाके लगाने थे इसलिए सूर्य की रोशनी में चमकते अपने अतिथि गृह सागर दर्शन को छोड़कर हम समुद्र के अंदर एक दूसरे से रेस लगाते हुए भागे।




करीब ढाई किमी चलने के बाद करीब घुटनों भर पानी मिला । वैसे आगर आप एक दो किमी और भी चल लें रो पानी कमर से ऊपर नहीं जाएगा। इसलिए यहाँ के लोग कहते हैं कि इस तट पर चाहे आप कितनी भी कोशिश कर लें आप समुद्र में डूबकर आत्म हत्या नहीं कर सकते।

अगर आपकों इन तटों पर नहानों हों तो पूरे पैर फैलाकर पानी में बैठ जाइए । लहरें फिर आकर आपको तर कर जाएँगी। एक बार पानी में गीले होने के बाद हमारी मौज मस्तियाँ शुरु हो गयीं। इस बार मैं धूप की वजह से काले चश्मे को पहन कर आया था। पानी में दो तीन डुबकियों के बाद ज्यूँ ही सिर बाहर निकाला बेटे ने कहा पापा आपका चश्मा कहाँ गया?  लगा कि हजार दो हजार का चूना तो लग ही गया पर गनीमत थी कि तेज धार ना होने के कारण अगली डुनबकी में चश्मा वहीं सुरक्षित मिल गया।

 समुद्र में दौड़ते भागते यूँ वक़्त गुजर गया कि पता ही नहीं चला...


चाँदीपुर के समुद्र तट का असली आनंद दूसरे समुद्र तटों से हटकर है। आप यकीन मानिए समुद्र के अंदर दो तीन किमी जब आप चल कर चारों ओर देखते हैं तो आपको दूर दूर तक पानी के सिवा और कुछ नज़र नहीं आता। बस वहाँ आप होते हैं और समुद्र होता है। एक ऐसा समुद्र जो आप को डराता नहीं भगाता नहीं। मन होता है कि समुद्र के पानी में शरीर को सहलाती हवाओं के बीच वहीं धूनी रमाकर बैठ जाएँ। इसलिए समुद्र में धमाचौकड़ी मचाते अपने समूह को छोड़कर आधे घंटे के लिए मैं बिल्कुल दूसरी तरफ़ निकल गया। चाँदीपुर  में समुद्र के साथ बिताए हुए वो पल आज भीयात्रा के सबसे यादगार लमहे हैं।




चाँदीपुर में रहने के लिए निजी होटल भी हैं। पर सरकारी पंत निवास में आरक्षण मिल जाए तो सागर दर्शन गेस्ट हाउस की तरह ही आपको तट पर जाने के लिए होटल से बाहर निकलना नहीं पड़ता। इसलिए अगर आप पुरी की यात्रा कर चुके हैं तो अगली बार उड़ीसा जाने पर एक दिन चाँदीपुर का भी चक्कर जरूर लगाएँ।
इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

Tuesday, August 16, 2011

चाँदीपुर समुद्र तट भाग 2 : क्या आप समुद्र में मेरे साथ मार्निंग वॉक पर चलेंगे?

चाँदीपुर के समुद्र तट पर शाम बिताने के बाद कुछ देर विश्राम कर हम फिर पेट पूजा के लिए नीचे आए। शाम को समुद्र की तरफ बने लॉन में ही गोल टेबुल व कुर्सियाँ लगा दी जाती हैं। बादल भरी रात होने की वज़ह से समुद्र एक बारगी फिर दूर चला गया था। दूर अँधेरे में कुछ दिख भी नहीं रहा था। फिर भी समुद्र के हर रूप में देखने की इच्छा हमें भोजन के पश्चात एक बार फिर हम समुद्र की ओर बने वॉच टावर की ओर ले गई। 
शांत समुद्र को हम यूँ ही बहुत देर निहारते रहे कि अचानक हमें समुद्र के स्याह जल के बीच थोरी थोड़ी दूर पर सफेद आकृतियाँ दिखाई पड़ीं। आकृति दूर से इतनी छोटी दिखाई दे रही थी कि वो क्या है ये किसी की समझ में नहीं आ रहा था। सफेद रंग की वो आकृति पल भर में अपनी जगहें यूँ बदल रही थी मानों उसकी सतह पर बड़ी तेजी से तैर रही हो। इतने कम पानी में इतनी तेजी से तैरती मछली का अनुमान हमारे गले नहीं उतर रहा था। इसलिए रात के अँधेरे में समूह के सबसे युवा सदस्य को तहकीकात करने के लिए नीचे भेजा गया। थोड़ी देर बाद उसने ऊपर आकर कर उसने रहस्य खोला कि वो सफेद आकृति कोई मछली नहीं पर पानी की सतह के समानांतर उड़ती छोटी सफेद चिड़िया है जो कीड़े मकोड़ों और नन्ही मछलियों को अपना शिकार बना रही है।
थोड़ी दूर और समय बिताने के बाद हम वापस चले गए इस कार्यक्रम के साथ की भोर होते ही फिर समुद्र में वॉक पर निकल पड़ना है। सुबग पाँच बजे जब नींद खुली तो तेज हवा चलने की आवाज़ आई। बालकोनी का दरवाजा खोला तो पाया कि तेज हवा के साथ मूसलाधार बारिश भी हो रही है। घंटे भर की बरिश के बाद  बादल  तितर बितर हो गए।
सात बजते बजते हल्की सी धूप भी निकल आई।  बारिश से धुली ये वाटिका कुछ और हरी भरी महसूस हो रही थी।

पाँच दस मिनट के भीतर ही हम सुबह की सैर पर निकल आए। सबुह हमने समुद्र में पिछली शाम की तरह अंदर ना जा कर उसके समानांतर टहलने का निश्चय किया। अगर गूगल मैप से देखें तो हमारी सुबह की सैर का इलाका कुछ यूँ दिखाई पड़ेगा।

पहले हम अपने अतिथि गृह सागर दर्शन के दाँयी ओर मुड़े। इस इलाके में DRDO के ही कुछ और पुराने बने गेस्ट हाउस हैं। समुद्र के कटाव को रोकने के लिए पूरे तट पर पत्थरों से बाँध बनाया गया है जिसके पीछे नारियल के वृक्षों की कतार दूर तक दिखाई देती है। 

करीब तीन चार सौ मीटर बढ़ने के बाद एक बार फिर से बादल घिर आए तो हमने दूसरी दिशा में चलना शुरु किया। दरअसल चाँदीपुर का मुख्य समुद्र तट इसी दिशा में है। बादलों के आ जाने से समुद्र में टहलना और अच्छा लग रहा था। तट के किनारे पानी लगभग स्थिर था इसलिए हम हल्की लहरों वाले हिस्से में बहते जल में चलने लगे। देखिए दोनों जल राशियाँ कितनी पृथक लग रही हैं...



सागर दर्शन गेस्ट हाउस से चलते चलते हम अब PWD के गेस्ट हाउस तक आ चुके थे। चाँदीपुर तट का बालू वाला किनारा भी पार्श्व में नज़र आने लगा था। इसी तट के आस पास ही यहाँ के होटल अवस्थित हैं। ऊपर चित्र में मेरे पीछे जो बिन्दुनुमा काली आकृतियाँ दिख रही हैं वो मुख्य तट पर आए सैलानियों की हैं।

हल्के नीले सफेद बादलों ने अपना रंग बदलना शुरु कर दिया था। दूर से आते बादलों की कालिमा बारिश के आने का संकेत दे रही थी। हाथों में कैमरे होने की वजह से हम बारिश में भींफने का खतरा नहीं उठा सकते थे सो हम वापस लौटने लगे।

आधे रास्ते पहुँचते पहुँचते बारिश की रिमझिम शुरु हो गई थी। कारे कारे बदरा किस तरह बारिश की फुहारों को छोड़ रहे थे वो नज़ारा भी देखने लायक था।

तट के बिल्कुल किनारे जहाँ से समुद्र गायब हो चुका था वहाँ ठोस रेत में पानी के कटाव से बड़ी मोहक आकृतियों का निर्माण हो गया था

सुबह की इस सैर तो हो गई पर अब तक हम समुद्र में छपाका नहीं लगा पाए थे। अब समुद्र में आएँ और उसके पानी से अठखेलियाँ ना की जाएँ तो फिर बात अधूरी रह जाएगी। बारह बजे तेज धूप में अंतिम बार हम फिर तट की ओर निकले। क्या किया इस बार हमने ये देखिए इस श्रृंखला की आखिरी कड़ी में..

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

Monday, August 8, 2011

चाँदीपुर समुद्र तट भाग 1 : डूबता सूरज..समुद्र में बदते कदम और वो यादगार शाम...

चाँदीपुर ओडीसा का एक बेहद खूबसूरत समुद्र तट है। दशकों पहले एक बार यहाँ जाना हुआ था और उस यात्रा में समुद्र के रातों रात गायब होने और फिर सुबह में वापस अवतरित होने की कहानी भी आप सब से साझा की थी। पर उस बार चाँदीपुर से समुद्रतट से हुई मुलाकात सुबह के उन चंद घंटों की ही थी और साथ में कैमरा भी नहीं था कि आपको समुद्र के बदलते रूप को प्रत्यक्ष दिखा पाता। पिछले साल जब उड़ीसा गया तो पारादीप के बंदरगाह से लौटते वक़्त बालासोर भी जाना हुआ। 

ओडीसा के उत्तर पूर्वी हिस्से में स्थित इस जिले से चाँदीपुर मात्र पन्द्रह किमी दूर है। इसके तटीय जिले के पूर्व में बंगाल की खाड़ी और पश्चिम में मयूरभंज का इलाका आता है जबकि इसे उत्तरी सिरे पर बंगाल का मेदनीपुर जिला आ जाता है। बंगाल के सबसे लोकप्रिय समुद्र तट दीघा से बालासोर की दूरी लगभग सौ किमी की है। दीघा से बालासोर का समुद्रतट बेहद छिछला है। यानि आप समुद्र के अंदर मीलों चलते रहें पानी घुटनों से ऊपर नहीं जाएगा। चाँदीपुर के समुद्रतट की यही विशिष्टता इसे बाकी सभी समुद्र तटों से अलग कर देती है। वैसे चाँदीपुर मिसाइल प्रक्षेपण केंद्र के लिए भी मशहूर है। यह केंद्र यहाँ १९८९ में स्थापित किया गया था। भारत में बनी अधिकतर मिसाइल जैसे त्रिशूल, आकाश, नाग व हाल फिलहाल में जमीन से जमीन तक मार करने वाली मिसाइल पृथ्वी और अग्नि का प्रक्षेपण भी यहीं से किया गया था।



बालेश्वर से चाँदीपुर पहुँचते पहुँचते पौने पाँच बज चुके थे। इस बार चाँदीपुर में किसी होटल में ना ठहरकर हम डीआरडीओ के विश्रामगृह में ठहरे। ये गेस्ट हाउस समुद्र के ठीक किनारे बसा हुआ था। उद्यान को पार करिए और सामने समुद्र हाज़िर। वैसे प्रथम तल्ले की बालकोनी से भी समुद्र की गतिविधियाँ साफ दिखाई देती थीं। रूम में सामान रखकर हम लगभग पाँच बजे समुद्र की ओर चल पड़े। सूर्यास्त अभी नहीं हुआ था। पर सूरज बादलों की ओट में छुपा हुआ था। हमारे आने के पहले ही वहाँ बारिश भी हुई थी। चाँदीपूर में सूर्यास्त के पहले का समुद्र बेहद शांत होता है। जब तक सागर को चाँद ना दिखे उसका दिल हिलोरें लेने को मानता ही नहीं है। गेस्ट हाउस के वाच टॉवर से नीचे उतरकर हम नंगे पाँव समुद्र में चहलकदमी करने चल पड़े। पीछे दिख रहा है डी आर डी ओ का गेस्ट हाउस।



समुद्र के अंदर मैंने करीब दो सौ मीटर का फासला तय कर लिया था पर पानी का स्तर मेरे तलवों से भी ऊपर नहीं आया था।



सूर्यास्त के पहले एक हल्की सी रोशनी बादलों के बीच से आई तो मैंने कैमरे का रुख ऊपर की ओर मोड़ा।



अब तक समुद्र में चलते चलते हमें बीस मिनट हो चले थे। इस इलाके के समुद्र तट कि एक खास बात ये भी है कि यहाँ की सतह ठोस होती है और बालू बेहद  महीन जिससे आपको समुद्र में चलने में जरा भी तकलीफ़ नहीं होती। गेस्ट हाउस से तकरीबन हम लोग एक डेढ़ किमी दूर थे पर हमने चलना जारी रखा।



डूबता सूरज आकाश को लाल नारंगी आभा से दीप्त किए दे रहा था। हमें समुद्र में चलते चलते पैंतीस मिनट हो चुके थे। दाएँ, बाएँ और सामने जहाँ तक नज़र जाती थी दूर दूर तक समुद्र का मटमैला पानी दिख रहा था। पीछे देखने पर गेस्ट हाउस पहले से और बौना प्रतीत हो रहा था। पानी का स्तर तलवों से बढ़ गया था पर दो किमी चलने के बाद भी घुटनों से नीचे था।



पर कुछ ही मिनटों में एकदम से अँधेरा हो गया। जो लहरें शांत दिख रही थीं उनमें एक हलचल सी दिखाई देने लगी। शायद उन्हें चाँद की झलक मिल चुकी थी। हम सब भी वापस गेस्ट हाउस की ओर लौटने लगे। इस इच्छा को मन में दबाए हुए कि अगली सुबह फिर तेरा रूप देखने लौंटेंगे।


कैसा था चाँदीपुर समुद्र तट में शाम का नज़ारा। अगले भाग में आपके साथ की जाएगी समुद्र में मार्निंग वॉक। तैयार रहिएगा !

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