Tuesday, April 17, 2012

दास्तां नक्की झील की : आख़िर क्यूँ याद आए मुझे 'बलम रसिया' ?

पिछली पोस्ट में उदयपुर से चलते हुए हम जा पहुँचे थे माउंट आबू में। शाम का वक़्त था । नक्की झील हमारे सामने थी। एक रास्ता गाँधी घाट को जा रहा था जहाँ बोटिंग करने के लिए भारी भीड़ जुटी थी। नक्की झील कोई बहुत बड़ी झील नहीं है। हमें लगा कि जितना समय कतार में लगकर नौका की प्रतीक्षा में लगेगा उससे अच्छा वक़्त झील के किनारे किसी शांत सी जगह पर काटा जा सकता है। घाट से थोड़ी दूर छोटे छोटे दुकानदार लोक लुभावन  वस्तुओं के साथ पर्यटकों को आकर्षित कर रहे थे। हमने भी थोड़ी मोड़ी खरीददारी की और पास ही पानी में बने जहाजनुमा रेस्टोरेन्ट में चल पड़े। ये भोजनालय झील के दक्षिण पूर्वी किनारे पर स्थित है।


दरअसल रेस्टोरेंट उस वक़्त बिल्कुल खाली था। सारी भीड़ नौका विहार का आनंद लेने में मशगूल थी। चूंकि भीड़ के आने का समय नहीं हुआ था इसलिए बैरे भी इधर उधर थे। पानी के समीप शांति से बैठने का ये अनुकूल अवसर था।

सरोवर रेस्टोरेन्ट के डेक से झील का रमणीक दृश्य दिख रहा था। झील की दूसरी ओर की पहाड़ियों के नीचे उठते श्वेत फ्व्वारे और उन फव्वारों के बीच  चलती भांति भांति आकारों से सुसज्जित छोटी बड़ी नावें। कुछ दिखने में शाही तो कुछ बेहद आम। नावों से थोड़ी दूर  झील का गश्त लगाती प्यारी प्यारी बत्तखों के ढेर सारे परिवार। वैसे देश की कई अन्य झीलों की तरह यहाँ की पहाड़ियों पर के जंगल घने नहीं हैं।


नक्की झील की एक खास बात ये है कि झील के अंदर और इससे सटी पहाड़ियों में चट्टानें हवा और पानी की मार से काफी अपरदित हो गई हैं। इस अपरदन से चट्टानों ने जो आकार लिया है वो आकृतियाँ बड़ी मजेदार हैं। इन सारी चट्टानों में सबसे मशहूर टोड रॉक (Toad Rock) है।  इस चट्टान को देखने से ऐसा लगता है मानों पहाड़ की चोटी पर एक टोड  बैठा है जो किसी भी क्षण वहीं से झील में छलाँग लगा सकता है। सरोवर कैफे के जिस छोर पर हम बैठे थे वहाँ से टोड रॉक ठीक सामने दिखाई दे रही थी। वहाँ भी लोगों को मज़मा जमा था। कुछ लोग रस्सी की सहायता से चट्टान पर चढ़ने में मशगूल थे वहीं ज्यादातर इस तमाशे को देखने में।

झील के अंदर भी बीच बीच में अचानक उभरती चट्टानें तरह तरह की आकृतियों को रूप देती मालूम पड़ती हैं। झील और आसपास के इलाकों में फैली इन चट्टानों को कैमल रॉक (Camel Rock) , नन रॉक (Nun Rock) , नंदी रॉक (Nandi Rock) जैसे तरह तरह के नाम दिए गए हैं।
 

अभी हम झील के इन दृश्यों को आत्मसात कर ही रहे थे कि झील के दक्षिण पश्चिमी सिरे से बादलों की पतली चादर उड़ती सी दिखाई दी। बादलों के फैलाव को देखते ही मैं समझ गया कि ये वर्षा के बादल हैं।


झील में बढ़ते बादलों को बारिश की आती हल्की फुहारों के बीच कैमरे में क़ैद करना यात्रा के यादगार अनुभवों में रहा।


मजे की बात ये थी कि जो लोग खुली नौका में सवार थे उनमें से कुछ ही बारिश में लौटने को तैयार दिखे। और क्यूँ लौटे भला घर से इतनी दूर मौज मस्ती के माहौल में अपने को सराबोर करने ही तो आए हैं।

जैसे जैसे अँधेरा बढ़ा बारिश और तेज होती गई। अँधेरा और बारिश बढ़ने की वज़ह से भोजनालय में भीड़ बढ़ने लगी थी। सो कैमरे को अंदर रखकर तुरत फुरत नाश्ते का आर्डर दे कर हम भीतर जाकर बैठ गए। नक्की झील से वापस निकलते समय झील के मुख्य द्वार के पास राजस्थान पर्यटन की तख्ती दिखाई पड़ी जिसमें लिखा था कि ऐसी मान्यता है कि इस झील को देवताओं ने अपने नख से खोदा है और इसी कारण इसका नाम नक्की झील पड़ा। हिमालय पर स्थित झीलों को अगर छोड़ दें तो समुद्रतल से बारह सौ मीटर (1200 m) की ऊँचाई पर स्थित ये झील देश की एक मात्र प्राकृतिक झील है। प्रत्येक वैशाख पूर्णिमा पर यहाँ के स्थानीय आदिवासी जिन्हें गरासिये कहा जाता है, यहाँ अपने पूर्वजों की अस्थियाँ प्रवाहित करने पुण्य स्नान के लिए आते हैं। पर नक्की झील के नामाकरण की इससे ज्यादा दिलचस्प कथा यहाँ की गाइड पुस्तिका में मिलती है।



उस कथा को पढ़कर मुझे तो सबसे पहले वो गाना याद आ गया जो लड़कपन में हमने सुना था। किससे सुना था ये तो याद नहीं। आपने भी शायद सुना हो 'डोन्ट टच माई चुनरिया मोहन रसिया' पर हम लोग इसे गाते थे डोन्ट टच माई चुनरिया बलम रसिया। आप भी सोच रहे होंगे भला इस ऊटपटाँग से गीत का नक्की झील के नामाकरण से क्या संबंध है?

दरअसल माउंट आबू आकर ही पता चला कि किसी ज़माने में यहाँ एक ॠषि रहा करते थे जिनका नाम भी वही था यानि बलम रसिया। हुआ यूँ कि वो राजकुमारी को अपना हृदय दे बैठे। राजा चिंता में पड़ गए। वो योगी को अपनी लड़की का हाथ भी नहीं देना चाहते थे और ना ही उन्हें नाराज करना चाहते थे। अब करें तो करें क्या?  उन्हें एक जुगत सूझी। उन्होंने योगी के सामने शर्त रखी कि  वो अगली सुबह मुर्गे के बाँग देने के पूर्व अगर  पहाड़ की चोटी से लेकर तलहटी तक अपनी कानि ऊँगली से खुदाई कर एक रास्ता और झील  बना देंगे तो वे इस विवाह के लिए राजी हो जाएँगे। अब ॠषि बलम रसिया भी पहुँचे हुए योगी थे। वे अपनी दिव्य शक्तियों से इस काम को पूर्ण करने ही वाले थे कि रानी ने छल से मुर्गे की आवाज़ निकालकर उन्हें भ्रमित कर दिया। हताश ॠषि अपनी कुटिया में वापस लौट आए। वापस लौटकर उन्हें जब वस्तुस्थिति का भान हुआ तो उन्होंने शाप देकर रानी और राजकुमारी को पत्थर की मूरत बना दिया और बाद में खुद को भी एक शिला में ढाल लिया। प्रेम कथा के इस दुखद अंत को आज भी श्रद्धालु माउंट आबू के कुँवारी कन्या मंदिर में याद करते हैं। यहीं कुँवारी कन्या यानि राजकुमारी और योगी बलम रसिया की पत्थर की मूर्ति बनी हुई है।

माउंट आबू में अपने प्रवास की दूसरी शाम हम एक बार फिर नक्की झील पहुँचे।  पर इस बार हमने झील के उत्तर पश्चिमी किनारे का रुख किया। जैसा कि आप नीचे चित्र में देख सकते हैं कि पिछली शाम, हमने झील के दूसरी छोर पर बने सरोवर रेस्ट्राँ में बिताई थी। गाँधी घाट से नौकाएँ झील के बीचो बीच बने इस चबूतरे का चक्कर लगाती हुई वापस लौटती हैं।


धूप और बादलों की लुकाछिपी आज भी जारी थी। नीचे चित्र में आप सरोवर भोजनालय के ऊपर बने घंटा घर और यहाँ के हेरिटेज होटल जयपुर हाउस की छवि देख सकते हैं।  एक समय में इस जयपुर हाउस का इस्तेमाल वहाँ के नरेश ग्रीष्मकालीन आवास के लिए करते थे। आज इसे हेरिटेज होटल में तब्दील किया गया है पर यहाँ रहने वाले पर्यटक इस होटल की एकमात्र खूबी यहाँ से दिखने वाले झील के खूबसूरत दृश्य ही बताते हैं। यानि रहने और खाने की सुविधाएँ यहाँ उतनी अच्छी नहीं हैं।


झील के चारों ओर कई मंदिर हैं जिसमें गाँधी घाट के समीप का रघुनाथ मंदिर और भारत माता मंदिर प्रमुख हैं। भारत माता मंदिर झील के इस सिरे के करीब था सो हमने कुछ वक़्त वहाँ और पास बने मछलीघर में बिताया।


भारत माता मंदिर परिसर के अंदर स्थित खूबसूरत उद्यान


नक्की झील में गुजारी इन दो शामों की कहानी तो आपने पढ़ ली। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में आपको ले चलेंगे माउंट आबू की सबसे ऊँची चोटी गुरु शिखर की यात्रा पर ...  मुसाफिर हूँ यारों  : हिंदी का एक यात्रा ब्लॉग

 माउंट आबू से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

18 comments:

  1. Replies
    1. सराहने का शुक्रिया गाफ़िल साहब !

      Delete
  2. Replies
    1. It may not be the best hill station of India but considering the hot surrounding climate in which it is situated its thronged by the people from Rajasthan & Gujarat.

      Delete
  3. मनीष जी बहुत अच्छा वर्णन हैं, फोटो बहुत अच्छे हैं, अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा

    ReplyDelete
  4. बहुत दिना हो गए हैं माउण्‍ट आबू गए हुए, आपने कई नयी बाते बतायी, बड़ा अच्‍छा लगा। अगल कड़ी का इन्‍तजार रहेगा।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हाँ पर अगली कड़ी के पहले यहाँ की मूली का स्वाद चखते जाइएगा।

      Delete
  5. बढ़िया विवरण .

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया मृत्युंजय !

      Delete
  6. Aanand aa gaya. Been to Mount Abu. Wish to visit yet again after having read your article.

    ReplyDelete
  7. एक बार हम भी गए थे इस झील पर लेकि‍न देर शाम ढले पहुंचे और सुबह मुँह अँधेरे ही नि‍कल जाना था सो बस यूं की कुछ ढँकी छुपी सी याद बची इस झील की

    ReplyDelete
    Replies
    1. अँधेरा होने पर तो इसकी मोहकता कम हो गई होगी। वैसे सच कहूँ तो माउंट आबू में नक्की झील से कहीं ज्यादा गुरुशिखर तक का सफ़र और दिलवाड़ा मंदिर की अंदरुनी खूबसूरती रोमांचित करती है।

      Delete
  8. वाकई बहुत सुंदर विवरण किया है नक्की झील का....

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया पंकज !

      Delete
  9. काफी साल पहले १९९८ में गई थी मैं आबू ...काफी हिल स्टेशन देखे पर आबू का जवाब नहीं ..वहा की निक्की झील का जवाब नहीं ..अब काफी कुछ बदल गया हैं ....राजस्थान की जूतियों की दुकाने भी देखने लायक होती हैं...?वहाँ की दाल -बाटी चूरमा का स्वाद आज भी मुंह में घुला हुआ हैं ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया दर्शन जी अपनी यादें ताज़ा करने के लिए !

      Delete

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails