Tuesday, January 1, 2013

क्यूँ निराश किया हमें धनौल्टी ने ?

जैसा कि इस श्रृंखला की पिछली कड़ी में आपको बताया था कानाताल में अपने प्रवास के तीसरे दिन हम लोग  टिहरी बाँध देखने के बाद वापस कानाताल लौट आए। भोजनोपरान्त हमारा काफ़िला धनोल्टी होते हुए मसूरी की ओर चल पड़ा। ये बता दूँ कि कानाताल आने के पहले हमने आसपास की जगहों में सबसे ज्यादा धनोल्टी के बारे में सुन रखा था। अतः हमारे समूह में सबसे ज्यादा उत्साह वहीं जाने के लिए था। 

दरअसल धनौल्टी (Dhanaulti) एक छोटा हिल स्टेशन है जो मसूरी के अंधाधुंध शहरीकरण की वज़ह से पर्यटकों को अब आकर्षित कर रहा है। आजकल यहाँ कई छोटे बड़े होटल खुल गए हैं और जिन लोगों को ज्यादा चलना मुश्किल हो उनके लिए शिमला के कुफरी की तरह घोड़ों की पीठ पर बैठकर जंगल भ्रमण की सुविधा यहाँ उपलब्ध है। धनौल्टी चंबा मसूरी मार्ग पर लगभग चंबा और मसूरी के लगभग मध्य में स्थित है। मसूरी से इसकी दूरी महज 24 किमी है वहीं चंबा से 29 किमी।  कानाताल से निकलते निकलते सवा तीन बज चुके थे। इसलिए हमारे पास इतना समय नहीं था कि धनौल्टी से आठ किमी पहले पड़ने वाले सुरकंडा देवी मंदिर में दर्शन कर पाते। नीचे के चित्र में आप देख सकते हैं कि पहाड़ के ऊपर बने इस मंदिर में जाने के लिए बक़ायदा सीढ़ी और रेलिंग बनी हुई है। चढ़ाई में विश्राम लेने के लिए बीच बीच में शेड भी बनाए गए हैं। 



देवी दर्शन के लिए इस इलाके में जो तीन मंदिर सबसे विख्यात हैं उनमें सुरकंडा देवी मंदिर के साथ साथ चंद्रबदनी और कुंजपुरी मंदिर का भी नाम आता है। वैसे यहाँ के लोग कहते हैं कि गंगा दशहरा के समय यहाँ एक मेला लगता है  जिसमें भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। अगर पहले दिन हम कानायाल सही समय पर पहुँचते तो निर्धारित कार्यक्रम के तहत सबसे पहले देवी माता के ही दर्शन करते पर अब माँ को दूर से ही सलाम कर आगे बढ़ गए।

पर सबसे बड़ी निराशा हुई धनोल्टी पहुँच कर। उत्तराखंड सरकार ने वहाँ दो इको पार्क बनाए हैं। अम्बर और धारा नाम के इन दो इको पार्क में देवदार के जंगलों को संरक्षित कर यहाँ आने वाले लोगों को प्रकृति को पास से महसूस करने का मौका दिया है। पर कानाताल के जंगलों में पिछली तीन सुबहों में विचरण करने के बाद इको पार्क की हरियाली हमें कुछ खास सम्मोहित नहीं कर सकी। पार्क में लकड़ी की बल्लियों के बीच से एक रास्ता ऊपर की ओर जा रहा था।





दिन के खाने के बाद ऊपर की चढ़ाई मेरे सहयात्रियों को नागवार गुजर रही थी तो उन्होंने पहले ही हथियार डाल दिये। मैंने सोचा हो सकता है ऊपर से हिमालय दर्शन का सुनहरा मौका लगे सो मैं अकेला ही ऊपर चल पड़ा। सबसे ऊपर पहुँचने पर योग ध्यान स्थल एवम हर्बल गार्डन का बोर्ड मिला। पर इस बाग में ना तो कोई योगी दिखा ना ही हर्बल गार्डन। बाद में पता चला कि अभी उनका सीजन नहीं है। बात मुझे कुछ पची नहीं क्यूँकि अपने शहर राँची के हर्बल गार्डन नक्षत्र वन में तो सालों भर उद्यान को गुलज़ार देखा था। 

हर्बल गार्डन के अंदर लकड़ी का एक चबूतरा और छतरी बनी थी। उसकी बगल में ही एक व्यू प्वायंट का बोर्ड टँगा था जिसमें वहाँ से देखी जाने वाली तमाम चोटियों की ऊँचाई और नाम लिखे हुए थे। मैंने आँखे फाड़ कर चारों तरफ़ नज़र नज़र घुमाई पर देवदार के पेड़ों और पास की पहाड़ियों के आलावा कुछ नज़र नहीं आया। इको पार्क से पर्वत शिखर तो नहीं  दिखे पर  उनके बारे में बोर्ड पर दी हुई जानकारी उन्हें वापस लौटकर पहचानने में बेहद मददगार साबित हुई। 

व्यू प्वायंट के ठीक सामने ये तीन देवदार के पेड़ यूँ खड़े थे मानो एलेक्सान्ड्रे डूमास (Alexandre Dumas) की किताब Three Musketeers के सिपाही हों और हिमालय की श्वेत धवल चोटियों को हमारी नज़रों से बचा रहे हों।


पक्षियों को खोजने और उन्हें कैमरे में क़ैद करने की रुचि रखने वालों के लिए बता दूँ की इस इलाके में Grey Winged Black Bird, Grey Treepie, Lammergear, Himalayan Black Bulbul, Himalayan Griffon Vulture, Kashmir Nuthatch अक्सर दिखते हैं। पर मेरे ख़्याल से उसके लिए इको पार्क की चौहद्दियों से दूर जंगलों में भटकने ज्यादा बेहतर विकल्प है। इको पार्क से आगे जगह जगह हिमालय पर्वतमाला को देखने के दृश्य स्थल मिलते हैं। पर उसके लिए सुबह का समय सबसे श्रेयस्कर होता है। हम धनौल्टी चार बजे पहुँचे थे इसीलिए हमें हिमालय पर्वतश्रृंखला को वो नज़ारा नहीं मिल सका जिसकी हम उम्मीद लगाए बैठे थे।  


वैसे इको पार्क से थोड़ा आगे हमें चौखम्बा पर्वत चोटी दिखी थी जिसकी छवि आप यहाँ देख सकते हैं। सूर्यास्त करीब आ रहा था और सूर्य किरणें दिन भर का काम पूरा कर पहाड़ की इन बेतरतीब ढलानों पर उतर रहीं थीं। मन में एक अज़ीब सा अहसास तारी था। शायद इस बात का आभास हो चला था कि ये किरणें अब निःस्तेज होती हुई आने वाली कालिमा के आगे घुटने टेक देंगी। और कुछ मिनटों में इन ढलानों पर पसरा होगा घुप्प अँधेरा..


शाम छः बजे तक हम मसूरी पहुँच चुके थे। पर आज की मसूरी वो नहीं जो एक दशक पहले हुआ करती थी। बाजारों के बीच से गुजरते वक़्त ये महसूस ही नहीं होता कि हम किसी पर्वतीय स्थल से गुजर रहे हैं। कभी पहाड़ों की रानी कहीं जाने वाली मसूरी की प्राकृतिक सुंदरता इस शहर के परकोटों तक ही सिमट सी गई है। 




मसूरी के बाजारों में चहलकदमी करते हुए रोशनी में नहाया हुआ ये खूबसूरत चर्च दिखाई पड़ा।


माल रोड पर चलते चलते हम यहाँ के पुराने क्लार्क होटल पहुँच गए। सबको जलपान की जरूरत महसूस हुई और हम अल्पाहार के लिए एक रेस्ट्राँ में घुसे। रेस्ट्राँ की आंतरिक साज सज्जा ने हमें विस्मित कर दिया।



आखिर ऐसा क्या था उस रेस्ट्राँ में ? देखना ना भूलिएगा इस यात्रा की समापन कड़ी में..

मुसाफ़िर हूँ यारों के पाठकों को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएँ ! आशा है हमारा ये सम्मिलित सफ़र नए साल में भी बदस्तूर ज़ारी रहेगा। आप फेसबुक पर भी इस ब्लॉग के यात्रा पृष्ठ (Facebook Travel Page) पर इस मुसाफ़िर के साथ सफ़र का आनंद उठा सकते हैं।

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

20 comments:

  1. भाई साहब सुरकंडा देवी के दर्शन कर ही आते, माँ हर मुरादे पूरी करती हैं..जय माता की, वन्देमातरम..

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    1. सही कह रहे हैं आप पर कुछ परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि चाहते हुए भी हम देवी के दर्शन नहीं कर पाए। शायद अगली बार ये संभव हो...

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  2. मनीष जी....आपको नए साल की शुभकामनाएँ !

    बड़ा दुःख हैं असली मसूरी इस आधुनिकता के चकाचौंध कही खो सा गया हैं...|

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    1. आपको भी नव वर्ष की शुभकामनाएँ रितेश ! मसूरी के बारे में आपकी राय से सहमत हूँ।

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  3. मैंने भी कुछ दिन पहले कानाताल की यात्रा की . मैंने सुरकंडा देवी के दर्शन भी किए . कददुखाल से मंदिर केवल डेढ़ किलो मीटर है और लगता है कि बहुत समीप है पर विस्वास किजीए , ये चढाई बहुत ही steep है सो बहुत कठीण है. हाँ मंदिर पहुचने पर हमें एक सरप्राइज मिला वो था - हिमपात . पूरा मंदिर क्षेत्र बर्फ से ढका पड़ा था . मेरे बेटे ने बर्फ के गोले बनाए और सभी पर मारे .
    धनोल्टी मुझे भी कुछ खास नहीं लगा और मसूरी से तो ज्यादा हरियाली दिल्ली मे है .
    नए साल की शुभकामनाए और संगीतमाला का इन्तेजार

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    1. आपका यात्रा विवरण पढ़ा। मंदिर के ऊपर की बर्फ वाकई लाजवाब थी। आपने वहाँ से गढ़वाल पर्वतमाला के चित्र लिए या नहीं। आपके ब्लॉग पर दिख नहीं रहे थे ।

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  4. Manish ji aap likhte bahut accha hai aise lagta hai ki hum kudh tour par hai

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    1. शुक्रिया सुखदेव जी ! बस यही कोशिश रहती है कि अपने अनुभवों को इस तरह बाँटू कि पाठकों को भी लगे कि वो मेरे साथ सफ़र पर हैं।

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  5. nice post & photos .... aajkal pahado ki rani masoorie nahi ooty hai

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    1. मसूरी तो दूर दूर तक नहीं है। मेरी अपनी पसंद मुन्नार है़।

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  6. My experience is also same. Somebody recommended Dhanaulti and we spared 1 day for it and there was hardly place to finish it in 1 hr. Both parks are nearby and nothing to look for except some pine trees. We went to a temple at some height and came back.It may be very nice place for people who wants to be left lonely.

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    1. अरोड़ा सर धनौल्टी से मौसम साफ रहने से गढ़वाल हिमालय की पूरी पर्वत श्रृंखला दिखाई देती है। इको पार्क तो सच में कुछ खास नहीं है। हाँ श्रृद्धालुओं के लिए सरकुंडा देवी मंदिर की यात्रा जरूर माएने रखती है। इधर आने वाले यात्रियों के लिए मेरा सुझाव ये है कि वो मंदिर में दर्शन कर टिहरी बाँध की ओर जाएँ। रास्ते में अलग अलग जगहों से गढ़वाल हिमालय की पूरी पर्वत श्रृंखला से दर्शन भी हो जाएँगे।

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  7. दिनांक 13/01/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ऎसा क्यूँ हो जाता है......हलचल का रविवारीय विशेषांक.....रचनाकार...समीर लाल 'समीर' जी

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    1. मेरे लेख को लिंक्स में शामिल करने के लिए आभार !

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  8. धनौल्टी के बारे में पहली बार जानकारी मिली ..... सच ही मसूरी अब पर्यटकों को आकर्षित नहीं कर पाती ...

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  9. राज्य सरकारों को चाहिए कि वो पर्वतीय स्थलों के विकास का ऐसा मास्टर प्लान बनाएँ जिनसे उनकी पहचान खत्म ना हो जाए। वित्तीय लाभ से ज्यादा जरूरी इन खूबसूरत शहरों की प्राकृतिक सुंदरता को बनाए रखना है।

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  10. सुन्दर चित्र

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  11. hamne bhi abhasi yatra kar li ....bahut bahut dhanyawad

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    1. लेख आपको पसंद आया जानकर खुशी हुई।

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