Sunday, June 23, 2013

उत्तराखंड की इस त्रासदी से क्या कुछ सीख लेंगे हम? ( The man made tragedy of Uttarakhand !)

पिछली कुछ प्रविष्टियों में उत्तराखंड के कुमाऊँ इलाके के बारे में मैंने लिखना शुरु ही किया था कि उत्तराखंड में ये भीषण त्रासदी घटित हो गई।  रुड़की में अपने छात्र जीवन के दो साल बिताने के बावज़ूद मैं कभी केदारनाथ या बद्रीनाथ नहीं गया। मेरी व्यक्तिगत धारणा है कि ईश्वर अगर हैं तो हर जगह हैं और अगर आप किसी भी कोने में मन में कोई कलुषित भाव लाए बिना उनकी भक्ति करेंगे तो उनका आशीर्वाद हमेशा आपके साथ रहेगा। आज तक सिर्फ वैसे मंदिरों में ही मैंने अपना चित्त स्थिर और भक्तिमय पाया है जहाँ ईश्वर और मेरे बीच किसी तरह का कोलाहल ना हो और शायद इसी वज़ह से उत्तराखंड की पिछली कुछ यात्राओं में सिर्फ घूमने के ख्याल से इन धामों में जाना मुझे कभी उचित नहीं लगा।


कुछ सालों पहले जब उत्तरी सिक्कम में भूकंप आया था तो मन बेहद व्यथित हुआ था क्यूंकि वहाँ जाने के बाद मैं समझ सकता था कि उन निर्जन स्थानों में रहने वाले लोग अगर किसी आपदा में फँस जाएँ तो उन तक समय रहते पहुँचना किसी भी मानवीय शक्ति के लिए कितना दुसाध्य है। आज उत्तराखंड के निवासी और तीर्थयात्री भी अपने आप को उसी स्थिति में फँसा पा रहे हैं। ऐसे हालातों में हमारी सरकारें जैसा काम करने के लिए जानी जाती हैं, उत्तराखंड सरकार ने बस उसी पर फिर से मुहर लगाई है या यूँ कहें कि उससे भी बदतर उदाहरण पेश किया है। आज फँसे हुए लोगों और उनके नाते रिश्तेदारों में जो रोष है वो अकारण नहीं हैं। पिछले कुछ दिनों की घटनाओं को देखते हुए एक यात्री और भारत के आम नागरिक की हैसियत से बहुत सारी बातें मन को कचोट रही हैं जिसे मैंने यहाँ अपने शब्द देने की कोशिश की है।



सरकार के पास साधन सीमित हैं। चलिए मान लिया। अगर ऐसी परिस्थितियों में वो इतनी विशाल संख्या में फँसे तीर्थयात्रियों को बुनियादी सुविधाएँ को मुहैया कराने की व्यवस्था नहीं कर सकती है तो फिर इतने पर्यावरण संवेदनशील इलाके में भारी संख्या में भक्तों को जाने की अनुमति कैसे दे सकती है? बरसात के दिनों में विगत कुछ वर्षों में पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने की घटना हमेशा होती रहीं हैं। सर्वविदित है कि पहाड़ी क्षेत्रों में संपर्क और आवागमन की सुविधाएँ मौसम की ऐसी कठोर मार से कभी भी छिन्न भिन्न हो सकती हैं। ये भी स्पष्ट है कि जब भी ऐसा होगा खराब मौसम की वजह से उन्हें दुरुस्त करने में समय लगेगा। ऐसी हालत में इन यात्राओं के दौरान रास्ते में पड़ने वाले कस्बों गाँवों में पहले से स्थानीय आपदा केंद्रों की स्थापना और उसमें पीने के पानी, बिस्किट या क्षय ना होने वाली भोजन सामग्री रखने की बात क्यूँ नहीं सोची गई ?
सवाल सिर्फ तीर्थयात्रियों का नहीं ऐसी आपदा में फँसे हुए वहाँ के स्थानीय निवासियों का भी है जिनके गाँव कस्बे इस त्रासदी में सारी दुनिया से कट चुके हैं।


ये तो हुई बात उस व्यवस्था की जिसके लिए सरकार ने पहले से कोई तैयारी नहीं की थी। पर केंद्र से जो खराब मौसम की जानकारी राज्य सरकार को भेजी गई उस पर तो अमल किया जा सकता था। एक वक्तव्य ऐसा भी सुनने को मिला कि ऐसी चेतावनी तो हर समय आती ही रहती हैं। तो क्या हुआ बीस बार में अगर एक बार भी ये बात सच साबित होती है तो १९ बार हाई एलर्ट की सूचना से की गई तैयारियों का खर्च एक बार की इस विनाशलीला से कई गुना कम होगा। दरअसल प्रशासनिक स्तर पर ऐसी सोच सिर्फ उत्तराखंड सरकार की है ऐसा नहीं है। ऐसी सोच से भारत की हर राज्य सरकार और यहाँ की जनता जिसमें हम और आप भी शामिल हैं, ग्रसित है। बचपन से शायद हमारे खून में भर दिया गया है जब आफ़त आएगी तब निबटेंगे। अभी से कौन परेशानी मोल ले और  हमारी इस अकर्मण्यता का ख़ामियाजा हमारे ही बंधु बांधवों को उठाना पड़ता है। उत्तराखंड में भी यही हुआ, लिहाजा जो लोग यात्रा के बीच में थे और समय रहते चेतावनी के असर से लौट सकते थे या भविष्य की परिस्थितियों के अनुरूप ज्यादा सजग हो सकते थे, ना हो सके।


उत्तराखंड में इस समय मुसीबत में पड़े यात्रियों का आर्थिक दोहन करने की बात आ रही है। कई लोग स्थानीय निवासियों से जुड़े अपने कड़वे अनुभव की बात कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग ग्रामीण द्वारा की गई सहायता को शिद्दत से याद कर रहे हैं। मैंने सोशल और इलेक्ट्रानिक मीडिया पर छिड़ी बहस में ये देखा कि जहाँ उत्तराखंड से बाहर रहने वाले पहाड़ के लोग इस तरह के आरोप से आहत महसूस कर रहे हैं वहीं दूसरे राज्यों के लोग ये कहते नहीं अघा रहे हैं कि अगर हमारे यहाँ ऐसी घटना घटी होती तो लोग ऐसा नहीं करते । वर्षों से पहाड़ के लोगों को उनकी कर्मठता, कठिन परिस्थितियों को झेलने की सहन शक्ति और सीधे स्वाभाव के लिए जाना जाता है। पर जिस तरह उपभोक्तावाद और शार्टकट से जल्दी ऊपर पहुँचने की संस्कृति पूरे भारत में फैल रही है उससे पहाड़ कैसे अछूता रह सकता है?

दरअसल सच्ची बात ये है कि आज आप भारत के किसी भी कोने में जाइए आपको सब तरह के लोग मिलेंगे।  किसी भी समाज के चंद घृणित तत्वों द्वारा किए गए इन कार्यों के लिए पूरे समाज या राज्य के लोगों को दोषी ठहराना कहाँ तक उचित है? साथ ही ये भी नहीं भूलना चाहिए कि तीर्थयात्रियों के साथ उत्तराखंड के बाशिंदों का भी घर उजड़ा है। वे भी भूख से लड़ रहे हैं और उन्हें भी मदद की उतनी ही जरूरत है जितनी बाहर से गए यात्रियों को। इसके बावज़ूद ऐसी परिस्थितियों में भी उनमें से बहुतों ने मदद का हाथ बढ़ाया ये बात काबिलेतारीफ़ है। आज अगर मानवीय भावनाओं से कटे हुए धन लोलुप इंसानों को कालाबाजारी करने का अवसर मिला है तो इसकी पूरी जवाबदेही प्रशासन की बनती है जिसकों पानी की बोतलों, खाद्य पदार्थों, माचिस, मोमबत्ती जैसे जरूरी सामानों का संग्रहण और वितरण अपने नियंत्रण में करना चाहिए था।


आज हम अचानक आई बाढ़ की इस विभीषिका से थोड़ा बहुत उबर पाए हैं तो वो सेना की वज़ह से। आज अगर प्रशासन की तरह सेना भी अपने कर्त्तव्यों से विमुख हो जाए तो स्थिति कितनी भयावह होगी उसकी कल्पना करते हुए भी डर लगता है। उत्तराखंड की इस त्रासदी के पीछे लोग विकास की वर्तमान अवधारणा पर सवाल उठा रहे हैं। वैसे बादल फटने की घटना के पीछे उत्तराखंड के विकास से जुड़ी वर्तमान नीति का कोई संबंध नहीं है। पर जिस मात्रा में नुकसान हुआ है उसमें जगलों को काटकर किए गए बेतरतीब शहरीकरण का बहुत बड़ा हाथ है।  इस भीषण त्रासदी से  हमारे नीति निर्माताओं को सबक लेने की जरूरत है। विकास ऐसा ना किया जाए जो कुछ दिन फलीभूत होकर विनाश के द्वार खोल दे। क़ुदरत ने हमें एक मौका दिया है अपनी भूल सुधारने का जिसकी शुरुआत  केदारनाथ और उसके आस पास के कस्बों के पुनर्निर्माण के साथ होनी चाहिए...

28 comments:

  1. कैसे कैसे सवाल उठा रहे हो (!) भई सरकार को ये सब पता है ... :(

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    1. क्या करें काजल भाई हमारे जैसे ही तो लोग हैं सरकार में..शायद शुरु से जब आफ़त आएगी तब निबटेंगे वाली सोच हम सब में इस क़दर घुस गई है कि वक़्त रहते हम नहीं जागते।

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  2. सही कहा आपने.. हमारा सरकारी तंत्र तो फेल की ही श्रेणी में आता है...
    शुक्र है कि हमारे पास 'भारतीय सेना' जैसा भी कुछ है....

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    1. सेना की प्रतिबद्धता की वज़ह से नेताओं का सिहांसन डोल नहीं रहा...

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज रविवार (24-06-2013) को अनसुनी गुज़ारिश और तांडव शिव का : चर्चामंच 1286 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आभार इस प्रविष्टि को चर्चा मंच में स्थान देने के लिए !

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  4. जब कुछ अनुमान ही नहीं तो बचाव कार्य कैसे हो पायेंगे? सेना ने सदा ही राष्ट्र को कृतज्ञ किया है।

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    1. सहमत हूँ प्रवीण आपकी बात से।

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  5. गंभीर, सुलझे सवाल.

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    1. आशा ही कर सकते हैं कि अगली बार इन सवालों को दोहराने की जरूरत ना पड़े।

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  6. मनीष भाई...
    कुछ साल पहले मैं भी इस चार धाम यात्रा दो बार गया था. पर वहाँ की व्यवस्था देखा कर मन काफी प्रगुल्लित हो गया था. मेर पहली यात्रा एक धाम की थी जिसमें हमें सिफर बद्रीनाथ तक जाना था. हम जैसे ही ऋषिकेश पार किये एक चेक पोस्ट पर हमें रोक दिया गया. ड्राईवर ने बताया की यहाँ से यात्रा पर्ची कटेगी जिसमें सभी यात्रियों की डिटेल देनी होगी साथ ही गाड़ी कइ सारे पेपर चेक करेंगें. मैंने सवयं इनकी प्रोसेस देखि थी. पूरी इमानदारी से सारे फोर्मलिटी पुरे किये गए यहाँ तक बताया गया की अगर तक्सी की परमिट ५ आदमियों की है तो वे इससे ज्यादा यात्रियों के साथ आगे जाने की परमिट नहीं देते हैं. इसके पहले उएह गाडी चारधाम यात्रा के लिए हरिद्वार से पंजीकृत हो चुकी थी. (वहीँ मुझे पता चला की हर साल यात्रा शुरू होने के १५ दिन पहले यात्रा पर जाने वाले गाड़ियों के फिटनेस चेक होते हैं हरिद्वार और ऋषिकेश में. हरिद्वार में तो मैंने RTO को कूद गाड़ी चेक करते देखा था. साथ ही यह भी की गाडी ४ या ५ साल से ज्यादा पुराणी नहीं होनी चाहिए.) यात्रा डिटेल और पेर्मिस्सिओं लेने के बाद्द ही हम आगे जा सके. और यह परची हर चेक पोस्ट पर आगे चेक होती रही और जानकारी दर्ज होती रही की फलां गाडी कहाँ से गुजर चुकी है. वापसी में भी येही हुआ की जो इस गाडी से गए थे वोह अपनी वापसी दर्ज कराएं.
    दूसरी यात्रा में भी येही प्रक्रिया थी. और तो और जब हम केदारनाथ से चोपता होते हुए बद्रीनाथ गए तो मैं बस जानकारी के लिए बद्रीनाथ पर पता किया पुलिस वालों से( हमारी गाडी के बारे में) की यह गाडी आने वाली थी अब तक नहीं आयी. तो उन्होनें गाडी की पूरी रोड माप ही मुझे बता दी साथ ही यह की यह गाडी बद्रीनाथ पहुँच चुकी हैं चोपता होते हुए.
    हमारे ड्राईवर ने यह भी बताया की पिछले कुछ सालों से शायद जब खंडूरी प्रशाशक हुआ करते थे तब से नियम काफी कठिन हो गए हैं पर अच्छा है यात्रा काफी सुरक्षित रहती है. उसनी यह भी बताया की बहार का ड्राईवर को रिस्क की वजह से अल्लो नहीं करते. और यह भी की अगर आपका सामान गाडी में कहीं छूट गया है तो आप किसी भी यात्रा चेक पोस्ट पर शिकायत दर्ज कर दीजिए ९९ प्रतिशत चांस है की आपका सामान आपको मिल जायेगा.
    पर अब के हालत देख कर लगता है बहुत कुछ बदल गया...



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    1. प्रकाश जी इस जानकारी को यहाँ साझा करने के लिए धन्यवाद। आपने जिस व्यवस्था का जिक्र किया है अगर वो अभी भी पूरी कड़ाई से लागू होती तो हेल्पलाइन नंबरों से नाते रिश्तेदारों को पुख़्ता जानकारी जल्द ही मिल सकती थी। मुमकिन है अभी भी ॠषिकेश के चेक पोस्ट पर गाड़ी और मुसाफ़िरों की जानकारी नोट की जाती हो। पर कितने लोग इस यात्रा के किस पड़ाव में हैं इसके लिए आगे भी ऐसे चेक पोस्ट तब थे या नहीं जब आप वहाँ गए थे?

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    2. जी मनीष जी..
      तब तो ऐसे चेक पोस्ट जगह जगह थे ही तभी तो जब मैंने बद्रीनाथ जाकर अपनी गाडी की enquiry की तब वोह बता दिए की गाडी बद्रीनाथ आ चुकी है. उन्हें पता नहीं था की मैं भी उसका एक सवार हूँ.
      और एक बात. हर चेक पोस्ट पर वोह यात्रा परमिट की एक कॉपी जमा रखवाते थे. हमारे ड्राईवर ने करीब २०-२५ कॉपी इसकी रखी हुई थी... यह बात २०११ और २०१० की है..

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    3. बहुत अच्छी जानकारी दी आपने प्रकाश जी । परन्तु ऐसा होते हुए मैंने कभी नहीं देखा उस रास्ते पर हालाँकि कई बार जाना हुआ है। क्या यह नियम सिर्फ private vehicles के लिए है या फिर बस पर भी लागू होता ?
      हाँ, मेरा सिक्किम route पर यह अनुभव ज़रुर हुआ था |

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  7. सेना हर तरह की आपदा में जिस तरह से मदद करती है वैसा कोई नहीं कर पाता..आम जन के तो हाथ पैर तो वैसे ही देखकर फूल जाते हैं ..इसके लिए हिम्मत जज्बा चाहिए होता है ..बाकी इस दुखद क्षण में बहस करना बेमानी है ..
    .सार्थक सामयिक प्रस्तुति ...

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    1. सही कह रही हैं।

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  8. सब को सब पता है लेकिन कोई क्या करेगा सवाल ये है .........

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    1. शायद अगली बार प्रकृति द्वारा दिए इस सबक से कुछ सीख के सकें।

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  9. Aapki prastuti samyik thi.Sena ka karya kritagyakta ke layak hai Kaash hamare neta kuch sabak lei pate .........

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    1. हम्म सबक लें तब तो नहीं तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृति होती रहेगी।

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  10. vikas aisa ho ki prakriti ko saath lekar chala jaaye na ki usse lada jaaye,prakriti aur manushya ki ladaye mein haar hamesha manushya ki hi hue hai.

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    1. सहमत हूँ आपके कथन से 'सिफ़र' !

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  11. Very true my dear friend. Hum Amarnath yatra ke tarz pe ise bhi limited kar sakte hain.

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    1. हाँ जैसा कि मैंने लिखा भी है ये बहुत जरूरी है.

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  12. Ab bhi bhavisya me sambhal jaye to badi kripa hogi...kyoki fir kuch saal me log aayenge , bheed badhegi.

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  13. सार्थक प्रस्तुति मनीष जी।भगवान् से अब यही प्रार्थना है कि ऐसी भीषण त्रासदी आने पर ळोगों को सम्भलने की शक्ति भी दे साथ–साथ हर व्यक्तिको इस घटना से सबक भी लेना बहुत जरूरी है। हमारी सभी नवजवानों को सलाम एवं हार्दिक नमन॥

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  14. बहुत अच्छा किया जो आपने इस बारे में लिखा । मैं भी ऐसा ही कुछ करने का सोच रही थी । पर्यटकों से अधिक हमें वहाँ रहने वालों के बारे में सोचना चाहिए । उन्हें तो वहीँ रहना है। Tourists ka kya hai, 2 saal nahiN jayenge.

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