Wednesday, December 30, 2015

एक नज़र बीते साल की यात्राओं पर .. Flashback 2015

पिछले साल से विदा लेने का वक़्त लगभग आ पहुँचा है। आपका ये यात्रा ब्लॉग भी अपने आठवें साल में प्रवेश कर जाएगा नई जगहों को आपके सामने प्रस्तुत करने के लिए। तो आगे बढ़ने के पहले एक नज़र गुजरे साल पर।
आपको याद होगा कि साल की शुरुआत मैंने दक्षिणी थाइलैंड के लोकप्रिय समुद्र तटीय शहर फुकेत से की थी। फुकेत शहर के रहन सहन, धर्म, खान पान और नाइट लाइफ के बारे में तो आपको बताया ही था। साथ ही आप मेरे साथ जा पहुँचे थे जेम्स बांड द्वीप पर। पर अपनी फुकेत यात्रा में जिस स्थान ने मेरे दिल में जगह बनाई थी वो थी फी फी द्वीप की यात्रा..

Phi Phi Island, Phuket, Thailand

Monday, December 21, 2015

आइए चलें बीहड़ों के बीच चंबल नदी में नौका विहार पर An evening in River Chambal !

चंबल के इलाके का नाम सुनकर आपमें से ज्यादातर के मन में दस्यु सरदारों और खनन माफ़िया का चेहरा ही उभर कर आता होगा। अब इसमें आपकी गलती भी क्या सालों साल प्रिंट मीडिया में इस इलाके की ख़बरों में मलखान सिंह व फूलन देवी सुर्खियाँ बटोरते रहे और आज भी ये इलाका बालू व पत्थर के अवैध खनन करने वाले व्यापारियों से त्रस्त है।

Nandgaon Ghat, Chambal

इन सब के बीच चुपचाप ही बहती रही है चंबल नदी। ये चंबल की विशेषता ही है कि मानव के इस अनाचार की छाया उसने अपने निर्मल जल पर पड़ने नहीं दी है और इसी वज़ह से इस नदी को प्रदूषण मुक्त नदियों में अग्रणी माना जाता है। पर अचानक ही मुझे इस नदी की याद क्यूँ आई? दरअसल इस नदी से मेरी पहली मुलाकात अक्टूबर के महीने में तब हुई जब मैं यात्रा लेखकों के समूह के साथ आगरा से फतेहाबाद व इटावा के रास्ते में चलते हुए चंबल नदी के नंदगाँव घाट पहुँचा।

Map showing trajectory of River Chambal near UP-MP border

वैसे नौ सौ अस्सी किमी लंबी चंबल नदी खुद भी एक घुमक्कड़ नदी है। इंदौर जिले के दक्षिण पूर्व में स्थित विंध्याचल की पहाड़ियों  से निकल कर पहले तो उत्तर दिशा में मध्यप्रदेश की ओर बहती है और फिर उत्तर पूर्व में घूमकर राजस्थान में प्रवेश कर जाती है। राजस्थान व मध्य प्रदेश की सीमाओं के पास से बहती चंबल का उत्तर पूर्व दिशा में बहना तब तक ज़ारी रहता है जब तक ये उत्तर प्रदेश तक नहीं पहुँचती। यमुना को छूने का उतावलापन इसकी धार को यूपी में उत्तर पूर्व से दक्षिण पूर्व की ओर मोड़ देता है।

Chambal's Ravine

अक्टूबर के पहले हफ्ते में दिन के करीब साढ़े ग्यारह बजे हम आगरा शहर से निकले। एक तो आगरा शहर के अंदर का ट्राफिक जॉम और दूसरे आगरा फतेहाबाद मार्ग की बुरी हालत की वज़ह से सत्तर किमी का सफ़र तय करने में हमे करीब ढाई घंटे लग गए। आगरा से सत्तर किमी दूरी पर चंबल सफॉरी लॉज में हमारी ठहरने की व्यवस्था हुई थी। हरे भरे वातावरण के बीच यहाँ के जमींदारों की प्राचीन मेला कोठी का जीर्णोद्वार कर बनाया गए इस लॉज को सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया गया है। दिन का भोजन कर थोड़ा सुस्ताने के बाद हम चंबल नदी के तट पर नौका विहार का लुत्फ़ उठाने के लिए चल पड़े।

मुख्य सड़क से नंदगाँव घाट जाने वाली सड़क कुछ दूर तो पक्की थी फिर बिल्कुल कच्ची। अब तक चंबल के बीहड़ों को फिल्मों में देखा भर था। पर अब तो सड़क के दोनों ओर मिट्टी के ऊँचे नीचे टीले दिख रहे थे। वनस्पति के नाम पर इन टीलों पर झाड़ियाँ ही उगी हुई थीं। बीहड़ का ये स्वरूप बाढ़ और सालों साल हुए भूमि अपरदन की वज़ह से बना है।

The dusty track to River Chambal

Sunday, December 13, 2015

हरियाली डफरिन द्वीप और उसके आस पास के इलाकों की Dufferin Islands, Niagara Falls

नियाग्रा के जलप्रपत से पहले यानि दक्षिण की ओर बढ़ने से एक बेहद हरा भरा इलाका आ जाता है। इस इलाके के बायीं ओर खूबसूरत उद्यान हैं तो दायीं ओर नियाग्रा नदी की जलधारा से बने छोटे मोटे द्वीप जिन्हें डफरिन द्वीप समूह कहा जाता है। इससे पहले कि मैं आपको यहाँ की मन मोहने वाली हरियाली के दर्शन कराऊँ कुछ बातें इसके इतिहास के बारे में। 

Maple Tree मेपल का वृक्ष जो निशानी है कनाडा की
उन्नीस वीं शताब्दी की शुरुआत तक इस इलाके की तरफ़ नियाग्रा नदी की चट्टानीय ढलान होने के कारण पानी बह कर छोटे छोटे द्वीपों में बँट जाता था। बाद में यहाँ एक बिजली घर बनने के बाद पानी की धारा धीमी और बेतरतीब हो गई। पर यहाँ की मिट्टी ने ऐसी परिस्थितियों में वनस्पतियों का ऐसा जाल अपने चारों ओर बुना कि इसके बीच से होकर गुजरना किसी भी आगुंतक के लिए प्रकृति को अपने में समाहित करने का अहसास दिला जाता है।

Route of Niagara Falls to Dufferin Islands
अगर नियाग्रा जाएँ और जलप्रपात के आस पास की भीड़ से आपका दिल उब जाए तो चुपचाप जलप्रपात को पार कर नियाग्रा नदी के किनारे किनारे करीब डेढ़ किमी आगे बढ़िए। इस सड़क पर आपको दायीं ओर डफरिन द्वीपों की ओर जाने का रास्ता मिलेगा।


एक बार आपने पानी की पतली धारा के ऊपर बना लकड़ी का पुल पार किया कि आप इस हरी भरी शांत दुनिया में प्रवेश कर लेंगे। जैसे ही हम इस इलाके में घुसे देखिए किसने हमारा प्यार भरा स्वागत किया।

Kids enjoying their evening walk बच्चों की शाम की सैर :)

Thursday, December 3, 2015

पोर्ट कोलबर्न : कारों की रंगारंग प्रदर्शनी और वो अनूठा रेस्त्राँ ! Port Colborne,Ontario, Canada

नियाग्रा से 34 किमी की दूरी पर कस्बा है पोर्ट कोलबर्न का। नियाग्रा में रहते हुए हमारे मेजबान हमें लेक एरी पर बसे इस छोटे से कस्बे में ले गए। ये सफ़र मेरे लिए इसलिए भी ख़ास रहा क्यूँकि कनाडा में पहली बार हम ऐसी जगह में थे जहाँ विदेशी पर्यटक कम ही जाते हैं। लिहाज़ा वहाँ के लोगों की ज़िंदगी को पास से देखने का एक छोटा ही सही पर अवसर हमें मिला।

जिस शाम हम वहाँ पहुँचे उस दिन वहाँ पुरानी कारों की प्रदर्शनी लगी थी। सप्ताह में एक दिन लोग बाग पचास व साठ के दशक की अपनी पुरानी कारों को चमका कर वहाँ लाते हैं और फक़्र से उसे सड़क के किनारे खड़ा कर अन्य कार प्रेमियों से गपशप में मशगूल हो जाते हैं। यानि एक जैसे शौक़ रखने वालों के लिए कुछ पल साथ बिताने का ये अच्छा मौका हो जाता है। तो चलिए आज आपको दिखाते हैं कि कनाडा की इन नई  पुरानी कारों को जो उस दिन हमारे सामने नई नवेली दुल्हनों की तरह सज सँवर कर खड़ी थी..

Port Colborne, Niagara, Canada
पोर्ट कोलबर्न नियाग्रा के दक्षिणी तट पर बसा एक छोटा सा कस्बा



यहाँ भारत में हम इतने ही आकार में अंबेसडर बनाकर उसमें दर्जन भर लोगों को घुसा लें। पर यहाँ तो लंबाई व तीखे नैन नक़्श वाली इक कारों में बताइए सिर्फ दो ही लोग बैठ सकते थे।



Saturday, November 28, 2015

बिना गुंबद का मकबरा - सिकंदरा Akbar's Tomb, Sikandara, Agra

इतिहास की किताबों में भारत के दो महान सम्राटों का जिक्र हमेशा से होता रहा है। एक तो मगध के चक्रवर्ती राजा व पाटलिपुत्र नरेश अशोक का तो दूसरे मुगलिया सल्तनत के अज़ीम बादशाह अकबर का। नतीजन इनसे जुड़ी इमारतों को देखने का चाव मुझे शुरु से रहा है । आगरा मैं तीन बार जा चुका हूँ। अपनी दूसरी यात्रा में मुझे अकबर की बनाई खास इमारतों में से एक फतेहपुर सीकरी को देखने का सौभाग्य मिल चुका था पर समय आभाव की वजह से उस वक़्त मैं अकबर के मकबरे को देख नहीं पाया था। इसीलिए पिछले महीने जब उत्तर प्रदेश पर्यटन द्वारा आयोजित यात्रा लेखकों के सम्मेलन के पहले भरी दोपहरी में हमारी बस सिंकदरा के सामने रुकी तो मुझे बेहद खुशी हुई। 

Sikandara..the tomb of Akbar

पेड़ों  की झुरमुट के बीच से दिखता सिंकदरा का दक्षिणी द्वार पहली ही नज़र में हमें मंत्रमुग्ध कर गया। हुमायूँ का मकबरा तो उनकी बेगम ने बनवाया था पर अकबर ने अपने मकबरे की नींव ख़ुद ही रखी थी। मकबरे के इस मुख्य द्वार को देखते ही सबसे पहले नज़र जाती है द्वार के चारों कोनों पर खड़ी संगमरमर की बनी मीनारों पर। इससे पहले मुख्य द्वार के साथ मीनारों के बनने का प्रचलन कम से कम मुगल स्थापत्य में नहीं था। 1605 ई में जब ये इमारत बननी शुरु हुई उसके पहले ही हैदराबाद में कुली कुतुब शाह द्वारा चार मीनार का निर्माण हो चुका था। इतिहासकार ऐसा अनुमान लगाते हैं कि शायद चारमीनार की प्रेरणा पर अकबर ने इस द्वार का ये स्वरूप रखा होगा।

South Gate, Sikandara
संगमरमर की ये मीनारें तिमंजिली है जिन्हें अलग करने का काम हर मंजिल पर स्थित बॉलकोनी करती है। अगर आप इस द्वार की तुलना ताजमहल के बाहरी द्वार से करें तो लाल बलुआ पत्थरों पर रंग बिरंगे पत्थरों से की गई कलमकारी सिकंदरा के प्रमुख द्वार को अपेक्षाकृत ज़्यादा सुंदर बना देती है। 

Beautiful inlay work with coloured stone

Friday, November 20, 2015

चलिए बैंकाक की चाओ फराया नदी में रात के सफ़र पर. Night cruise in Chao Pharaya River, Bangkok

नदियाँ शहर की सुंदरता को तब और बढ़ा देती हैं जब वो शहर के बीचो बीच से गुजरती हों। हाल फिलहाल में लंदन में टेम्स और पेरिस में सीन के अगल बगल बिखरी सुंदरता तो देख चुका हूँ। पर आज ऐसे ही एक नदी के किनारे बसे शहर की बात करूँगा जो भारत से ज्यादा दूर भी नहीं है और जहाँ की एक शाम मैंने उसी नदी के साथ गुजारी थी। वो शहर था बैंकाक और वो नदी थी चाओ फराया

चाओ फराया थाइलैंड की एक प्रमुख नदी है जो इसके केंद्रीय मैदानी भाग से दक्षिण की ओर बहती हुई थाइलैंड की खाड़ी में जा मिलती है। इस नदी के किनारे थाइलैंड के कई नए पुराने शहर बसे हुए हैं जिनकी समृद्धता की वज़ह नदी मार्ग से होने वाले व्यापार की सहूलियत थी। जब थाइलैंड स्याम के नाम से जाना जाता था तब भी यही नदी इसकी प्राचीन राजधानी अयुथ्या से समुद्र तक के व्यापार मार्ग का साधन थी। 

River City Shopping Complex, Bangkok

आज चाओ फराया बैंकाक शहर  को पूर्वी और पश्चिमी हिस्से में बाँटती है। नदी के  पूर्वी हिस्से  की ओर आज का आधुनिक बैंकाक फैला हुआ है। शहर के सभी प्रमुख शॉपिंग मॉल व् मेट्रो सेवा इसी इलाक़े में पड़ते हैं जबकि इसका पश्चिमी पुराना इलाका चाइना टाउन, फूलों के बाजार और वाट अरुण के लिए जाना जाता है।

Monday, November 9, 2015

जब राँची में उतर आया रंग बिरंगा प्यारा सा राजस्थानी गाँव .. Best Puja Pandal of Ranchi

दीपावली पास आ रही है। आप सब घर की सफाई में जुटे होंगे। नाते रिश्तेदारों से मिलने का उत्साह भी होगा। दीपावली में मैं भी बिहार की राजधानी पटना की यात्रा पर रहूँगा पर उससे पहले मैं चाहता हूँ कि अपने इस ब्लॉग पर ही दीपावली मना लूँ। आप पूछेंगे वो कैसे ? तो वो ऐसे जनाब कि मैं ले चलूँगा आपको एक ऐसी जगह जहाँ मैंने दशहरे के वक़्त ही दीपावली के  माहौल की खुशियाँ बटोर ली थीं। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ राँची के इस साल के सबसे खूबसूरत पंडाल की जो दशहरे के वक़्त एक रंग बिरंगे गाँव के रूप में  दीपावली के उल्लास से सराबोर था। 


Tuesday, November 3, 2015

राँची के बारह शानदार पूजा पंडाल ! .. Top 12 Durga Puja pandals of Ranchi 2015 : Part II

दशहरे व दुर्गा पूजा का महोत्सव सारे राँची शहर को रंगीन बना देता है। इस साल सजाए गए राँची के खूबसूरत पूजा पंडालों की इस श्रंखला पिछली कड़ी में आपने बारह से लेकर सातवें क्रम तक के पंडाल देखें। आज आपको दिखाते हैं राँची के शीर्ष पंडालों की कुछ चुनिंदा झलकियाँ। ...

 6. बांग्ला स्कूल यानि OCC Club


राँची झील से सटे बांग्ला स्कूल के अहाते का पंडाल इस बार भिन्न संस्कृतियों की मिश्रित झलक पेश कर रहा था। घुसते ही सामने मिश्र के पिरामिड दिख रहे थे और थी उसके साथ बहती काल्पनिक नदी। पर इस पिरामिड के पीछे  का इलाका एक बौद्ध मंदिर की छाप छोड़ रहा था।



Monday, November 2, 2015

राँची के बारह शानदार पूजा पंडाल ! .. Top 12 Durga Puja pandals of Ranchi 2015 : Part I

इस साल मैं दुर्गा पूजा के समय आपको कोलकाता की गलियों में ही घुमाता रह गया। पर ऐसा नहीं कि दुर्गा की अराधना पश्चिम बंगाल में ही की जाती है। इसके पड़ोसी राज्यों झारखंड, उड़ीसा, असम और बिहार में भी ये बड़े उत्साह से मनाई जाती है। मेरा ख़ुद का शहर राँची जो जो रात दस बजते बजते उँघने लगता है, पूजा के समय  कई रातों तक सोता ही नहीं है। इस दुर्गा पूजा में राँची के सैकड़ों पंडालों में से एक दर्जन को मैंने चुना है पंडाल और उनमें स्थापित मूर्तियों की सुंदरता के हिसाब से...  आज की इस पहली कड़ी में देखिए क्रम संख्या बारह से लेकर सात तक के पूजा पंडाल।

12.   हटिया रेलवे सेटलमेंट कॉलोनी

 गुफा के अंदर एक मंदिर और उसमें बनी सुंदर सी दुर्गा जी ..


11. गाड़ीखाना

हरमू बाइपास पर चलते हुए महेंद्र सिंह धोनी के घर को पार कर आप पहुँचते हैं गाड़ीखाना में जो राँची के सर्वश्रेष्ठ पूजा पंडालों में तो नहीं पर उनके आस पास जरूर होता है। इस बार पंडाल की बाहरी दीवार लकड़ी की चौखटों में बनी मानव आकृतियों और श्रीकृष्ण से सजाई गई थीं।
 

Thursday, October 22, 2015

कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडाल : भाग 4 Durga Puja Pandals of Kolkata, Suruchi Sangha, 66 Palli : Concluding Part

आज नवरात्र का पर्व दशहरे के साथ समाप्त हो रहा है और मैं आपके सम्मुख हूँ कोलकाता के पूजा पंडाल परिक्रमा की इस आख़िरी कड़ी को लेकर। आज आपको ले चलूँगा दक्षिणी कोलकाता के उन दो पूजा पंडालों में जो हर साल अपनी अद्भुत थीम के चुनाव और निरूपण के लिए सुर्खियाँ बटोरते रहते हैं। ये पंडाल हैं न्यू अलीपुर में स्थित सुरुचि संघ और रासबिहारी गुरुद्वारे के करीब का 66 पल्ली। 


सुरुचि संघ इससे पहले 2003, 2009 व 2011 में कोलकाता के सर्वश्रेष्ठ पूजा पंडाल का ख़िताब जीत चुका है। पिछले साल इस पंडाल की थीम का केंद्र था छत्तीसगढ़। वहाँ की नक्सल समस्या को ध्यान में रखते हुए पंडाल के ठीक सामने एक काल्पनिक वृक्ष बनाया गया था । वृक्ष के ऊपरी हिस्से में राज्य में हो रही हिंसा व अशांति का चित्रण था जबकि नीचे शंति का संदेश देते हुए स्थानीय वाद्यों को लेकर नाचते गाते लोग दिखाए गए थे। भीड़ इतनी ज्यादा थी की चित्र लेने के लिए भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी।


पंडाल की शक़्ल एक आक्टोपस सरीखी थी। पर ध्यान से देखने पर लगा कि जिसे हम आक्टोपस की भुजा समझ रहे हैं वो तुरही के समान जनजातीय वाद्य यंत्र है। पंडाल की दीवारों पर वैसे चित्र अंकित किए गए थे जैसे पुरा काल में आदिवासी कला चट्टानों पर अंकित की जाती थी।



Tuesday, October 20, 2015

कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडाल : भाग 3 Durga Puja Pandals of Kolkata, Bose Pukur, Kumartuli, Talbagan, Bagh Bazar: Part III

बांग्ला में पुकुर का मतलब होता है पोखरा और आप तो जानते ही हैं कि बंगाल में आदि काल से हर गाँव और कस्बे में पोखर का होना अनिवार्य सा रहा है। यही वज़ह है कि वहाँ कस्बे और मोहल्लों के नाम तालाबों पर रखे गए हैं। दक्षिणी कोलकाता में गरियाहाट से सटा इलाका है कस्बा का और यहीं से बोस पुकुर सड़क होकर गुजरती है। इस इलाके की दुर्गा पूजा अपनी नई सोच और कलात्मकता के लिए पूरे कोलकाता में प्रसिद्ध है। आज आपको उत्तरी कोलकाता में ले जाने के पहले इसी इलाके के दो खूबसूरत पंडालों से रूबरू करवाना चाहता हूँ। पहले चलते हैं तालबागान जहाँ पिछले साल दुर्गा माँ तक पहुँचने के लिए आपको कमल के फूलों की पंखुडियों के बीच से जाना था. 


 रंग बिरंगी पंखुडियों के बीच आसीन माँ  दुर्गा...



Sunday, October 18, 2015

कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडाल : भाग 2 Durga Puja Pandals of Kolkata, West Bengal : Part II

दक्षिणी कोलकाता के गरियाहाट के आस पास के पंडालों को तो हम कोलकाता में बिताई पहली शाम को ही देख चुके थे। दूसरे दिन की शुरुआत हमने जोधपुर पार्क से की। गरियाहाट और जादवपुर के बीच पड़ने वाला ये इलाका दुर्गा पूजा की दृष्टि से हर साल चर्चा में रहता है। पिछले साल यहाँ पंडाल को तो प्राचीन मंदिर की शक़्ल दी गई थी पर काग़ज़ पर माँ दुर्गा की छवि 3D प्रिंटर से निकाल पंडाल में लगाई गई थी एक अलग से अनुभव को जगाने के लिए। 

Ancient temple depicted at Jodhpur Park
दूर से दिखते खंभो और उनके बीच की कलाकृतियों को देखकर तो यही लगता था कि सचमुच हम किसी पुरातन ऐतिहासिक मंदिर के करीब आ गए हैं। माता का 3D निरूपण तो अपनी जगह था पर पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से जानकर अच्छा लगा  कि ये सारे चित्र काग़ज़ पर उतारे गए हैं।

Goddess Durga in 3D

Friday, October 16, 2015

कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडाल : भाग 1 Durga Puja Pandals of Kolkata, West Bengal : Part I

जिस तरह गणेश चतुर्थी का पर्व बड़े धूमधाम से भारत के पश्चिमी राज्यों में मनाया जाता है उसी तरह दुर्गा पूजा पूर्वी भारत में। पटना, राँची, कटक की पूजा देखने के बाद सिर्फ कोलकाता की पूजा देखने की हसरत रह गई थी मुझे। हर बार लोग वहाँ की भीड़ और उमस की बात कर मेरा उत्साह ठंडा कर दिया करते थे। पर पिछले साल अक्टूबर के महीने में उत्तर पूर्व की ओर निकलने के पहले मैंने कोलकाता में रुकने का कार्यक्रम बनाया। भीड़ से बचने के लिए पंचमी, षष्ठी व सप्तमी के दिन पंडालों के चक्कर लगाए और कुल मिलाकर मेरा अनुभव शानदार रहा। अब जबकि इस साल की दुर्गा पूजा पास आ रही है तो मैंने सोचा कि क्यूँ ना आपको कोलकाता के पूजा पंडालों की सैर करा दूँ ताकि आप ये समझ सकें कि क्यूँ होना चाहिए किसी को कोलकाता में दुर्गा पूजा के वक़्त?
 
मिट्टी के रंग में रँगी माता दुर्गा  Goddess Durga in her gray avtaar

कोलकाता में हर साल हजारों की संख्या में पंडाल बनते हैं। सारे तो आप देख नहीं सकते पर कुछ विशिष्ट पूजा पंडाल आप छोड़ भी नहीं सकते। कोलकाता जैसे महानगर में पूजा पंडालों का चक्कर लगाने का मतलब है कि एक दिन के लिए उसका कोई एक इलाका निर्धारित कर लें। मोटे तौर पर कोलकाता की पूजा के तीन मुख्य इलाके हैं उत्तरी कोलकाता, दक्षिणी कोलकाता और मध्य कोलकाता। अपने कोलकाता प्रवास के समय मैं वहाँ के बिड़ला मंदिर के पास ठहरा था तो मैंने अपनी पंडाल यात्रा दक्षिणी कोलकाता से शुरु की।

Tuesday, October 13, 2015

ताज़ के आगे का आगरा Agra Beyond Taj : Uttar Pradesh Travel Writers Conclave 2015

अक्टूबर के पहले हफ्ते में उत्तर प्रदेश पर्यटन की तरफ़ से एक न्योता आया आगरा, लखनऊ और बनारस के आस पास के इलाकों में उनके साथ घूमने का। सफ़र का समापन यात्रा लेखकों के सम्मेलन से लखनऊ में होना था। सम्मेलन में भारत और विदेशों से करीब चालीस पत्रकार, ब्लॉगर और फोटोग्राफर बुलाए गए थे।

उत्तर प्रदेश मेरे माता पिता का घर रहा है। बनारस, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद व आगरा जैसे शहरों में मैं पहले भी कई बार जा चुका हूँ।  बनारस के घाट की स्मृतियाँ तो एकदम नई थीं क्यूँकि वहाँ पिछले साल ही गया था पर आगरा गए पन्द्रह साल से ऊपर हो चुके थे। सो मैंने आगरा वाले समूह के साथ जाने की हामी भर दी।

उत्तर प्रदेश पर्यटन ने अपने इस कार्यक्रम को दि हेरिटेज आर्क (The Heritage Arc) का नाम दिया था। इस परिधि में आगरा, लखनऊ व बनारस के आस पास के वो सारे इलाके शामिल किए गए थे जहाँ पर्यटन की असीम संभावनाएँ हैं। यानि उद्देश्य ये कि इनमें से पर्यटक किसी भी जगह जाए तो उसके करीब के सारे आकर्षणों को देखते हुए ही लौटे। ज़ाहिर था उत्तर प्रदेश पर्यटन  हमें भी ताज़ के आगे का आगरा (Agra beyond Taj) दिखाने को उत्सुक था। सफ़र के ठीक पहले जब पूरे कार्यक्रम को देखा तो मन आनंदित हुए बिना नहीं रह सका। ऐतिहासिक धरोहरों, वन्य जीवन, प्रकृति, कला, संस्कृति व खान पान का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण बिड़ले ही किसी कार्यक्रम में देखने को मिलता है।

First ray of the Sun falling on the Taj
तीन अक्टूबर को पौ फटते ही हमारे सफ़र की शुरुआत हुई ताज दर्शन से। ताज के दरवाजे सवा छः बजे के लगभग खुलते हैं। पर जब हम वहाँ पहुँचे तो पर्यटकों की भारी संख्या सूर्योदय के समय के ताज़ के दर्शन के लिए आतुर थी। इधर सूरज की किरणों ने संगमरमर की दीवारों का पहला स्पर्श किया और उधर ढेर सारे कैमरे इस दृश्य को अपने दिल में क़ैद करने की जुगत में जुट गए। हमारे गाइड इमरान और आदिल ताज़ महल परिसर की इमारतों के शिल्प की बारीकियों के बारे में बताते रहे और उधर  तब तक   सूर्य देव  ने  सुनहरी रौशनी से पूरे ताज को अपने आगोश में ले लिया ।

The Taj in all its glory !

Tuesday, September 29, 2015

क्या है नियाग्रा शहर में जलप्रपात के आलावा ? Attractions of Niagara apart from fall !

अगर आपको ये लग रहा हो कि नियाग्रा शहर में वहाँ के जलप्रपात और नदी के आलावा कुछ है ही नहीं तो आज मैं आप का भ्रम दूर किए देता हूँ। वास्तविकता ये है कि इस छोटे से शहर  में जलप्रपात को करीब से देखने के आलावा कई अन्य आकर्षण भी हैं जो पूरे परिवार और विशेषकर बच्चों को खासतौर पर रुचिकर लगें। वैसे भी अगर आप यहाँ रुकेंगे तो कुछ तो चाहिए ना अपनी शामों व रातों को  रोमांचक और रंगीन बनाने के लिए! हालांकि नियाग्रा की इस पाँच दिवसीय यात्रा में हमने अपने  खाली समय का ज्यादा हिस्सा  जलप्रपात और नदी के उत्तरी और दक्षिणी किनारों की सैर करने में बिताया पर साथ साथ बचे खुचे समय में यहाँ के बाकी आकर्षणों की टोह भी लेते रहे।

बचपन से हमारे यहाँ हिंदी अख़बार के साथ Times of India भी आया करता था। उन दिनों अखबार पढ़ते वक़्त मैं तो बस पहले पेज के बाद सीधे खेल पृष्ठ पर जाता था जहाँ  कार्टून भी आते थे। पर उन कार्टूनों में फैंटम के आलावा किसी और चरित्र से तारतम्य मिलाना मुश्किल होता था। अख़बार के उन्हीं पन्नों में पहली बार Ripley's Believe It or Not का जिक्र देखा। उसके बाद टीवी पर इससे जुड़ा शो भी दिखा, पर जब मुझे पता चला कि  नियाग्रा के क्लिफ्टन हिल पर इसका अपना संग्रहालय है तो सुबह की सैर में एक दिन हम इसे देखने पहुँच गए ।

Ripley's Believe It or Not  Museum, Niagara Falls
इस संग्रहालय को यहाँ बने पचास साल से अधिक हो चुके हैं । सप्ताहांत को छोड़ ये सुबह दस से रात ग्यारह बजे तक खुला रहता है। मगर इसमें प्रवेश के लिए व्यस्कों को नौ सौ रुपये की मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। वैसे तो समयाभाव की वज़ह से मैं इसमें जा नहीं पाया पर ये विचार जरूर मन में आया कि जब संग्रहालय की इमारत ही इतनी अजूबा है  तो अंदर रखे शिल्प भी  मजेदार ही होंगे।

Clock Tower, Niagara Falls
अमेरिकी परिपेक्ष्य में देखें तो आप पाएँगे कि उनकी संस्कृति में मनोरंजन के कुछ जाने पहचाने आयाम हैं जो धीरे धीरे सारे विश्व में फैल चुके हैं। 4D थियेटर , डरावने चरित्रों से भरे तथाकथित मनोरंजन गृह, बॉलिंग एलेज़, एम्यूजमेंट पार्क, स्काई व्हील, गोल्फ कोर्स समझिए दुनिया का हर बड़ा शहर इस संस्कृति को अपना चुका है या अपनाने की प्रक्रिया में है। रही कनाडा और वो भी नियाग्रा की बात तो वो तो बिल्कुल सटा ही हुआ है अमेरिका से तो उससे अछूता कैसे रह पाएगा? क्लिफ्टन हिल के आस पास के इलाक़े ऐसी ही जगहों से अटे  पड़े हैं। एक नज़र आप भी डालिये। .:)


Sunday, September 20, 2015

नियाग्रा का विशाल भँवरः जो समेटे है अपने अंदर प्रेम और त्याग की उस अमर कहानी को ! A journey from Niagara Whirlpool to Niagara on the Lake!

नियाग्रा  के पहले बहती नदी और फिर बनते जलप्रपात को तो आपने इस श्रंखला की पिछली कड़ी में तो देख लिया। आज चलिए जलप्रपात से आगे नियाग्रा नदी के मुहाने तक जहाँ ये ओंटेरियो झील से मिलती है। जिस छोटे शहर के पास ये मिलन होता है उसका नाम है नियाग्रा-आन-दि-लेक (Niagara-on-the-Lake)। पर इससे पहले कि इस तीस किमी लंबे सफ़र पर आपको ले चलूँ आपके एक सवाल का जवाब बताता चलूँ। पिछले आलेख में आपकी ओर से एक प्रश्न आया था कि आख़िर नियाग्रा नदी में इतना पानी आता कहाँ से हैं और अपनी गंगा ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों की तरह क्या ये भी उतनी ही विशाल है? सच पूछिए तो हमारी इन नदियों से नियाग्रा नदी की तुलना हो ही नहीं सकती।  पूछिए क्यूँ?
A beautiful Cherry Blossom tree on in Niagara on the Lake

नियाग्रा नदी की लंबाई मात्र 56 किमी है और हमारी नदियों की तरह इसका उद्गम स्थल कोई पर्वत श्रंखला नहीं है। जैसा आप नीचे के मानचित्र में देख सकते हैं कि ये नदी एक झील एरी (Lake Erie) से निकलती है और दूसरी झील ओंटोरियो में आकर अपना पानी छोड़ देती है। दोनों झीलों की ऊँचाई में अंतर सौ मीटर का है और इसी ढलान की वज़ह से इस नदी में पानी जाड़ों को छोड़कर साल भर उफनता रहता है। जाड़ों में नियाग्रा के जलप्रपात से गिरता पानी जम जाता है और वो मंज़र भी देखने लायक होता है।

Trajectory of River Niagara

अपने नियाग्रा प्रवास के तीसरे दिन हम शाम को अपने मेज़बान के साथ जलप्रपात से आगे नदी के मुहाने तक के सफ़र पर निकल पड़े। रेनबो ब्रिज से आगे बढ़ने पर नदी एक जगह तेज घुमाव लेती है जिससे एक भयंकर भँवर (Whirlpool) का निर्माण होता है। ये भँवर व्यक्ति को इतनी गहराई तक ले जाता है कि इसमें फँसने के बाद निकल पाना मुश्किल है। इस भँवर के ठीक पहले एक और पुल आता है जिसे व्हर्लपूल रैपिड्स ब्रिज (Whirlpool Rapids Bridge ) का नाम दिया गया है। वहाँ के लोगों ने इन दोनों पुलों के बीच  सौ साल पहले हुई एक ऐसी घटना का जिक्र किया जिसे बताए बिना आप इस भँवर की भयावहता का अंदाजा नहीं लगा सकते। लोगों द्वारा बताई बातों और नियाग्रा के आधिकारिक जालपृष्ठों से जब इस कहानी के सारे सिरों को एक साथ जोड़ने की कोशिश की तो मन बेहद अनमना हो गया। ये कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं है। सच तो ये है कि इसके किरदारों ने जिस प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और त्याग का परिचय दिया वो ना केवल मानव मात्र के प्रति गर्व का अनुभव कराता है पर साथ ही आँखों की कोरों को गीला भी  कर देता है।

ये बात सन 1912 के जाड़ों की है। जाड़ों में  नियाग्रा के आस पास के इलाकों का तापमान  शून्य से नीचे चला जाता है। नतीजन इस नदी पर बर्फ के प्राकृतिक पुल बन जाते हैं जिस पर सैलानी घूमते फिरते और मस्ती करते हैं। उस साल फरवरी के महीने में ऐसा ही एक पुल नियाग्रा नदी पर बन गया था। ये पुल पिछले कुछ दिनों से नियाग्रा नदी द्वारा लाई बर्फ से साठ से अस्सी फीट चौड़ा होकर अपने किनारों से मजबूती से जुड़ चुका था। दो हफ्तों से पर्यटकों की भारी भीड़ इस पुल पर आ जा रही थी। पर चार फरवरी का वो दिन अपने गर्भ में इस अनहोनी को छुपाए बैठा है ये किसे पता था? 

Saturday, September 12, 2015

क्या नियाग्रा जलप्रपात से गिर कर बच सका है कोई ? Can someone survive a fall from Niagara !

नियाग्रा जलप्रपात से जुड़ी पिछली कड़ी में आपसे वादा किया था कि आपको जलप्रपात के उस हिस्से में ले चलूँगा जहाँ बस कुछ हाथों की दूरी से नियाग्रा नदी की प्रचंड धारा भयंकर गर्जन के साथ सत्तर मीटर नीचे गिरती है यानि मौत और आपके बीच का फासला बस कुछ मीटर का होता है। मनुष्य सदा से रोमांच प्रेमी रहा है और उसकी इसी फितरत ने उसे ऐसे हैरतअंगेज करतब करने को प्रेरित किया है जिसकी आप और हम कल्पना भी नहीं कर सकते। 

नियाग्रा फॉल के पास ही एक म्यूजियम भी है जहाँ इस  बात की  जानकारी दी जाती है कि किस तरह जलप्रपात पर विजय पाने की कोशिश में या फिर अप्रत्याशित हादसों में लोगों को यहाँ अपनी जान गवानी पड़ी । नियाग्रा जलप्रपात से जुड़े वाकये मानव की असंभव को संभव करने की प्रवृति पर अचंभित भी करते हैं तो कुछ प्रसंग प्रकृति के रौद्र रूप के आगे लाचार मनुष्य के दुखद अंत से आँखों को नम कर देते हैं। आज इन्हीं अमर कहानियों में से कुछ की दास्तान सुनाते हुए आपको ले चलूँगा जलप्रपात के मुहाने तक के सफ़र में।
Skylon Tower से हार्स शू फॉल और नियाग्रा नदी का नज़ारा

ऊपर के चित्र  में आप देख सकते हैं कि  नियाग्रा नदी किस तरह भँवरों के बीच बहती नीचे जलप्रपात तक आती  है। नदी के उस इलाक़े तक पहुँचने के लिए हमने होटल से दूसरी राह पकड़ी और  नदी के ऊपरी हिस्से की ओर चलकर दो  किमी की दूरी तक जा पहुँचे  । 

उबड़ खाबड़ राह पर चलने की वजह से नदी के प्रवाह में गजब की तेजी आ गयी थी। जहाँ जहाँ पानी पत्थरों से टकराता हुए ढलान की और बहता वहां लहरें  सफ़ेद फेन  का मुखौटा अपने चेहरे पे लगा लेतीं । इसी जगह के आस पास आज से बारह साल पहले यानि वर्ष 2003 में तीस वर्षीय कनाडियन नवयुवक किर्क जोन्स ने नियाग्रा नदी  में छलाँग लगा दी थी। किर्क उस समय अवसादग्रस्त था। वो अपने दोस्तों से नियाग्रा के झरने से कूदने की बातें किया करता था। उसे लगा कि ऐसा करने से वो प्रसिद्धि और धन कमा लेगा और अगर असफल हुआ तो उसे इस बेकार ज़िदगी से छुटकारा मिल जाएगा। जोन्स जब गिरा तो प्रत्यक्षदर्शियों ने देखा कि वो सर पर हाथ रखे हुए पानी की लहरों के साथ उलटता पलटता नीचे गिर रहा है । पानी की विशाल चादर ने जोन्स के  चट्टान से  टकराने के पहले एक मुलायम गद्दे जैसा काम किया और फिर जलधारा के जोर से वो करीब की चट्टान तक पहुँच गया। इस तरह बिना किसी सुरक्षा कवच के  नियाग्रा जलप्रपात से कूदने वाला किर्क जोन्स दुनिया का पहला जिंदा आदमी बन गया। भगवान के दिए हुए मौके ने उसमें ज़िदगी जीने की नई आशा का संचार कर दिया और आज वो सामान्य ज़िन्दगी व्यतीत कर रहा है।

Sunday, September 6, 2015

देखिए सुबह की इस सैर में नियाग्रा जलप्रपात का अद्भुत सौंदर्य Let's go on a morning walk to Niagara Falls !

नियाग्रा के जलप्रपात से जुड़ी इस श्रंखला की पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि हम अपने समूह के साथ कैसे पहुँचे नई दिल्ली से नियाग्रा जलप्रपात तक और रात में नियाग्रा का जलप्रपात और आसमान में हुई आतिशबाजी हमें अपने कितने मनोहारी रूप दिखा गई। पर जैसे ही रात बीती अगली सुबह मैं और मेरे मित्र फिर तैयार थे नियाग्रा जलप्रपात का सुबह का रूप देखने के लिए। उत्साह का आलम ये था कि नई दिल्ली और नियाग्रा के बीच साढ़े नौ घंटे के समय का अंतर jet lag के रूप में हमें छू भी नहीं सका था। 

सुबह छः बजते बजते हम बाहर निकलने के लिए तैयार थे। कमरे के बाहर से दिखते कैसीनो की ऊँची इमारत की बगल से सूर्य देव भी पूरी गोलाई के साथ दर्शन दे चुके थे।
Early morning at Niagara Falls  कैसीनो के ऊपर से अपनी झलक दिखलाते सूर्य देव
सूर्य किरणें नियाग्रा शहर पर धीरे धीरे ही फैल रही थीं।नियाग्रा फॉल्स वैसे ही एक शांत  शहर है। शहर के केंद्र में होने के बावज़ूद सड़क पर चहल पहल ना के बराबर थी। हमारे होटल के आस पास के इलाकों में ज्यादातर होटल व रेस्टॉरेंट  थे। रेस्टॉरेंट के खुलने का तो सवाल ही नहीं था। हाँ इक्का दुक्का गाड़ियाँ जरूर बीच बीच में ये अहसास दिला जाती थीं कि कुछ लोगों के लिए ही सही, भोर हो गई है।

Morning view : City of Niagara Falls

Wednesday, September 2, 2015

टोरंटो से नियाग्रा : कैसा दिखता है रात में नियाग्रा का जलप्रपात ? Toronto to Niagara : Night View of Niagara Falls !

पिछले साल की बात है। मई का महीना था। एक शादी में शिरक़त करने दिल्ली जा रहा था। अभी मुगलसराय स्टेशन पार भी नहीं किया था कि ख़बर आई कि अगले हफ्ते कार्यालय के काम से मुझे कनाडा के नियाग्रा शहर में जाना है। कनाडा की यात्रा की संभावना तो कई महीनों से सर पर थी पर ये पता नहीं चल रहा था की आखिर जाना कब है? सो बड़े बेमन से शादी के कपड़ों के साथ हल्के फुल्के गर्म कपड़े रख लिए थे। मई  में दिल्ली की गर्मी सुनकर स्वेटर पर हाथ धरने का भी मन कैसे करता? बहरहाल शादी के साथ साथ मित्रों की मदद से जल्दी जल्दी में वीसा का आवेदन करवाया। यात्रा के ठीक एक दिन पहले शाम छः बजे वीसा मिला और समझिए हम लोग भागते दौड़ते जेट एयरवेज के जहाज पर मई  के आखिरी हफ्ते में दिल्ली से टोरंटों की ओर रवाना हो गए।

Glimpse of Niagara...पेड़ों के झुरमुट से गरजता नियाग्रा का विशाल जलप्रपात

Sunday, August 23, 2015

चलिए देखते हैं सागर के बीच बने सिधुदुर्ग के इस 'किल्ले' को ! Sindhudurg Fort.. Malvan

कुछ ही दिनों पहले आपको कोंकण के समुद्रतटों की यात्रा पर मालवण ले गया था। मालवण के डांडी समुद्र तट से सिंधुदुर्ग मोटरबोट से दस पन्द्रह मिनट की दूरी पर है। दूर से सिंधुदुर्ग का किला राजस्थान के किसी किले सा दिखाई देता है। चार किमी तक टेढ़ी मेढ़ी फैली इसकी परिधि के साथ नौ मीटर ऊँची और लगभग तीन मीटर चौड़ी दीवारें इसकी अभेद्यता के दावे को मजबूत करती हैं। पर सिंधुदुर्ग  की राजस्थानी किलों से समानता यहीं खत्म भी हो जाती है। जहाँ पहाड़ियों पर स्थित राजस्थानी किले दूर से ही अपनी मजबूत दीवारों के साथ ऊँचाई पर बने भव्य महलों का दर्शन कराते हैं वहीं इस जलदुर्ग की दीवारों के पीछे नारियल वृक्षों की कतारों के आलावा कुछ भी नहीं दिखाई देता।


इतना ही नहीं एक और खास बात है सिंधुदुर्ग में जो इसे अन्य किसी राजस्थानी किले से अलग करती है। वो ये कि एकदम पास जाने पर भी आप इसके मुख्य द्वार की स्थिति का पता नहीं लगा पाते।



Friday, August 14, 2015

लीजिए ओड़ीसा झारखंड की इस बरसाती रुत में मानसूनी यात्रा का आनंद ! Magic of Monsoons in Odisha and Jharkhand

मानसून के समय में भारत के खेत खलिहानों की हरियाली देखते ही बनती है। यही  वो वक़्त होता है जब ग्रामीण अपने पूरे कुनबे के साथ धान की रोपाई में जुटे दिखते हैं। चाहे वो झारखंड हो या बंगाल, उड़ीसा हो या छत्तीसगढ़, भारत के इन पूर्वी राज्य में कहीं भी निकल जाइए बादल, पानी, धान और हरियाली इन का समागम कुछ इस तरह होता है कि तन मन हरिया उठता है। पिछले हफ्ते ट्रेन से राउरकेला से राँची आते हुए ऐसे ही कुछ बेहद मोहक दृश्य आँखों के सामने से गुजरे। इनमें से कुछ को अपने कैमरे में क़ैद कर पाया। तो आइए आज देखते हैं इस मानसूनी यात्रा की हरी भरी काव्यात्मक झांकी..



आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में
और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझ में
अब आप पूछेंगे कि यहाँ आग कहाँ है जनाब..तो मेरा जवाब तो यही होगा कि ऐसे सुहाने मौसम में अकेले सफ़र करते हुए आग तो दिल में जल रही होगी ना बाकी सब तो फोटू में है ही :) :)

Saturday, August 8, 2015

यादें हिरोशिमा की : क्या हुआ था वहाँ सत्तर वर्ष पहले ? Hiroshima Peace Memorial

सत्तर साल पहले विश्व में पहला परमाणु बम जापान में हिरोशिमा की धरती पर गिराया गया था। इस बम ने इस फलते फूलते शहर को अपने एक वार से ही उजाड़ कर रख दिया था। सत्तर हजार लोगों  ने तुरंत और इतनी ही संख्या में घायलों ने भी छः महीनों के भीतर दम तोड़ दिया था। इनमें जापान के सामान्य नागरिकों के आलावा कोरिया और चीन से लाए गए मजदूर भी शामिल थे।

आज भी इतनी भयंकर त्रासदी के बावज़ूद परमाणु युद्ध का ख़तरा संसार से टला नहीं है। किसी का कुछ नहीं जाता ये कह कर कि यहाँ बम गिरा देंगे वहाँ तबाही मचा देंगे। कम से कम मानसिक रूप से विक्षिप्त ऐसे लोगों को हिरोशिमा के उस म्यूजियम की राह जरूर लेनी चाहिए जहाँ सत्तर साल बाद भी विध्वंस के कुछ अवशेष ज्यूँ के त्यूँ बचा के रखे गए हैं। तो चलिए आज मैं आपको ले चलता हूँ उस शहर में जहाँ की निर्दोष जनता को इस परमाणु बम की मार झेलनी पड़ी थी।


आज से तीन साल पूर्व जब मैंने हिरोशिमा की धरती पर कदम रखा था तो वो शहर मुझे किसी दूसरे जापानी शहर से भिन्न नहीं लगा था। बुलेट ट्रेन से उतरकर हम वहाँ की स्थानीय ट्रेन से पहले मियाजीमा स्थित शिंटो धर्मस्थल इत्सुकुशिमा गए थे और वहाँ से लौट कर हिरोशिमा के विख्यात पीस मेमोरियल को देखने का मौका मिला था। हिरोशिमा के मुख्य स्टेशन से पीस मेमोरियल की यात्रा करने का सबसे आसान तरीका ट्राम से सफ़र करने का है। पन्द्रह मिनट के सफ़र के बाद हम Genbaku स्टेशन से चंद कदमों के फ़ासले पर स्थित इन A Bomb dome के भग्नावशेषों के सामने थे।

बीसवी शताब्दी के आरंभ (1915) में एक चेक वास्तुकार द्वारा बनाई गई इस इमारत को  Hiroshima Prefectural Industrial Promotion Hall के नाम से जाना जाता था और अपने हरे गुंबद के लिए शहर में दूर से ही इस  भवन  को पहचाना जाता था । द्वितीय विश्व युद्ध के समय इसे जापानी सरकार के आंतरिक सुरक्षा विभाग ने अपने कार्य हेतु ले लिया था। सन 1945 में यु्द्ध अपने समापन दौर में था। जर्मनी आत्मसमर्पण कर चुका था पर जापानी सम्राट हिरोहितो संधि के मूड में नहीं थे। युद्ध को जल्द खत्म करने के उद्देश्य से अमेरिका ने परमाणु बम का पहला इस्तेमाल 6 अगस्त 1945 को सुबह सवा आठ बजे अपने B 29 लड़ाकू विमानों से किया।

Thursday, July 30, 2015

मालवण तट के दस बेहतरीन नज़ारे.. In pictures : Beaches of Konkan : Dandi , Malvan

कोंकण के समुद्र तटों की इस यात्रा में आप देख चुके हैं कुनकेश्वर, चिवला और तारकर्ली के समुद्र तट। इस श्रंखला की इस कड़ी में आज बारी है मालवण के समुद्र तट की जिसे डांडी का समुद्र तट भी कहा जाता है। मालवण के समुद्र तट पर आए बिना आप यहाँ के प्रसिद्ध समुद्री किले सिंधुदुर्ग तक नहीं पहुँच सकते। मतलब ये कि सिंधुदुर्ग का प्रवेश द्वार मालवण की ही जेटी है।


जैसा आप नीचे के मानचित्र में देख सकते हैं डांडी यानि मालवण का ये समुद्र तट चिवला और तारकर्ली के बीचो बीच में है। इस नक़्शे को देख आप ये समझ सकते हैं कि डांडी के आलावा तारकर्ली से भी सिंधुदुर्ग क्यूँ दिखाई दे रहा था?


अन्य समुद्र तटों की अपेक्षा आप मालवण के तट पर हमेशा चहल पहल पाएँगे। पर ये चहलपहल तट के साथ लगी मछुआरों की बस्ती की वज़ह से ज्यादा हैं। इस तट पर लहरें नहीं उठती सो यहाँ नहाने का आनंद तो आप नहीं उठा सकते मगर प्राकृतिक सुंदरता के मामले में ये तट किसी से पीछे नहीं है।


मालवण की अपनी एक संस्कृति है। इस संस्कृति का अभिन्न अंग है यहाँ की बोली (जो कि कोंकणी और मराठी का मिश्रण है) और भोजन। मालवण की मछली, चावल और नारियल से सजी मालवणी थाली नांसाहारियों को तो खूब पसंद आएगी। डांडी के तट पर नारियल के पेड़ों की सघनता और ढेर सारी मछुआरों की नावों से भोजन के इन अवयवों को स्रोत तो सहज ही मिल जाता है।

Tuesday, July 21, 2015

कोंकण के नयनाभिराम समुद्र तट : चिवला व तारकर्ली Beaches of Konkan : Chivla and Tarkarli !

कोंकण के समुद्र तटों की यात्रा में गणपतिपुले और कुनकेश्वर की यात्रा के बाद आज चलिए इस तट के सबसे खूबसूरत समुद्र तट चिवला व तारकर्ली की चित्रात्मक झाँकी पर। मालवण से दस किमी की दूरी के अंदर ही ये दोनों समुद्र तट स्थित हैं जहाँ चिवला का तट मालवण तट  के उत्तर में हैं वहीं तारकर्ली इसके दक्षिण में है।दोनों ही तट अपनी  नैसर्गिक खूबसूरती से आपका सहज ही ध्यान आकर्षित कर लेते हैं। जब हम चिवला के तट पर पहुँचे तो वहाँ दूर दूर तक सन्नाटा था। तट के किनारे कुछ नावें लगी थीं। उनके पीछे नारियल के पेड़ों का विशाल झुरमुट था।


चिवला की खूबसूरती कई कारणों से है। एक तो यहाँ गहरा नीला समुद्र का जल और दूसरी यहाँ की मुलायम सफेद स्याह रेत ।


 फिर यहाँ का लंबा समुद्र तट और उसके किनारे नारियल  के पंक्तिबद्ध पेड़ भी मन को मोहते हैं। पर इस तट पर जो लहरें आती हैं वो ज्यादा ऊँची नहीं उठती सो यहाँ तैरना तो हो जाता है पर उछलती लहरों द्वारा आपको आगोश में लिये जाने का डर नहीं रहता।

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