Saturday, August 8, 2015

यादें हिरोशिमा की : क्या हुआ था वहाँ सत्तर वर्ष पहले ? Hiroshima Peace Memorial

सत्तर साल पहले विश्व में पहला परमाणु बम जापान में हिरोशिमा की धरती पर गिराया गया था। इस बम ने इस फलते फूलते शहर को अपने एक वार से ही उजाड़ कर रख दिया था। सत्तर हजार लोगों  ने तुरंत और इतनी ही संख्या में घायलों ने भी छः महीनों के भीतर दम तोड़ दिया था। इनमें जापान के सामान्य नागरिकों के आलावा कोरिया और चीन से लाए गए मजदूर भी शामिल थे।

आज भी इतनी भयंकर त्रासदी के बावज़ूद परमाणु युद्ध का ख़तरा संसार से टला नहीं है। किसी का कुछ नहीं जाता ये कह कर कि यहाँ बम गिरा देंगे वहाँ तबाही मचा देंगे। कम से कम मानसिक रूप से विक्षिप्त ऐसे लोगों को हिरोशिमा के उस म्यूजियम की राह जरूर लेनी चाहिए जहाँ सत्तर साल बाद भी विध्वंस के कुछ अवशेष ज्यूँ के त्यूँ बचा के रखे गए हैं। तो चलिए आज मैं आपको ले चलता हूँ उस शहर में जहाँ की निर्दोष जनता को इस परमाणु बम की मार झेलनी पड़ी थी।


आज से तीन साल पूर्व जब मैंने हिरोशिमा की धरती पर कदम रखा था तो वो शहर मुझे किसी दूसरे जापानी शहर से भिन्न नहीं लगा था। बुलेट ट्रेन से उतरकर हम वहाँ की स्थानीय ट्रेन से पहले मियाजीमा स्थित शिंटो धर्मस्थल इत्सुकुशिमा गए थे और वहाँ से लौट कर हिरोशिमा के विख्यात पीस मेमोरियल को देखने का मौका मिला था। हिरोशिमा के मुख्य स्टेशन से पीस मेमोरियल की यात्रा करने का सबसे आसान तरीका ट्राम से सफ़र करने का है। पन्द्रह मिनट के सफ़र के बाद हम Genbaku स्टेशन से चंद कदमों के फ़ासले पर स्थित इन A Bomb dome के भग्नावशेषों के सामने थे।

बीसवी शताब्दी के आरंभ (1915) में एक चेक वास्तुकार द्वारा बनाई गई इस इमारत को  Hiroshima Prefectural Industrial Promotion Hall के नाम से जाना जाता था और अपने हरे गुंबद के लिए शहर में दूर से ही इस  भवन  को पहचाना जाता था । द्वितीय विश्व युद्ध के समय इसे जापानी सरकार के आंतरिक सुरक्षा विभाग ने अपने कार्य हेतु ले लिया था। सन 1945 में यु्द्ध अपने समापन दौर में था। जर्मनी आत्मसमर्पण कर चुका था पर जापानी सम्राट हिरोहितो संधि के मूड में नहीं थे। युद्ध को जल्द खत्म करने के उद्देश्य से अमेरिका ने परमाणु बम का पहला इस्तेमाल 6 अगस्त 1945 को सुबह सवा आठ बजे अपने B 29 लड़ाकू विमानों से किया।



Hiroshima Prefectural Industrial Promotion Hall के बगल से Motyasu  नदी बहती है जिसके ऊपर बना पुल अमेरिकी निशाने पर था। बम पुल पर ना गिरकर इस भवन से 600 मीटर ऊपर और 160 मीटर की दूरी पर फटा।  चूंकि बम की शक्ति ऊपर से नीचे की ओर तेज़ी से आई, इस भवन के लम्बवत खंभे और दीवारें उसे बर्दाश्त कर गए और इतनी क्षति होने के बाद भी ये अपने वास्तविक रूप की स्मृति दिलाता रहा। नब्बे के दशक में इस इमारत को विश्व की धरोहर सूची में शामिल कर लिया गया।


दो नदियों के बीच फैला हिरोशमा शहर तब कुछ ऐसा दिखता था..

 
बम के धमाके के बाद आग का गोला धुएँ के बादलों के बीच बड़ी तेजी से फैला..

 
धमाके के बाद जो गर्म किरणें फैलीं उससे आस पास के भवनों में रहने वाले सारे लोगों को जला दिया। पल भर में एक दो इमारतों को छोड़ शहर का साठ प्रतिशत हिस्सा उनमें रहने वाले बाशिंदों के साथ गायब हो गया।


जापान ने उस समय अपने सारे नागरिकों को युद्ध में झोंक दिया था। युद्ध विमानों द्वारा सामान्य बमबारी से बचने के लिए ज्वलनशील मकानों को तोड़ने और अग्नि सुरक्षा कवच तैयार करने का काम चल रहा था। इस काम के लिए हजारों की संख्या दस से बारह साल के बच्चों का हुजूम शहर के अलग अलग हिस्सों में बाहर निकल कर सहायता कर रहा था। ऐसे में हुए धमाके ने बच्चों को सँभलने का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया।



घटना के कुछ दिनों बाद जब माता पिता अपने बच्चों को ढूँढने निकले तो ऐसे ऐसे हृदय विदारक दृश्य सामने आए जिन्हें देख कर किसी के आँसू ही ना थम पाएँ। किसी बच्चे का चेहरा नहीं था पर उसके  हाथों की हड्डियां माँ के दिये लंच बॉक्स को दबाए थीं। कोई बच्ची समूह में काम करती ही जल गई तो उसके पैरों के निशान लकड़ी की चप्पल पर उभर आए । बैंक के सामने बैठ कर प्रतीक्षा करते व्यक्ति की छाया पत्थरों में उभर आई। घर की घडी ठीक सवा आठ पर रुकी तो रुकी ही रह गयी। सैनिक की ऊँगलियों के बीच की पिघली हड्डियों में दूरबीन फँसी रह गई। घटनास्थल पर बचे रहे तो खून में डूबे जले हुए कपड़े और हड्डियों के ढाँचे जिन्हें वो प्रचंड आग जला नहीं पाई।

जो लोग तुरंत नहीं मरे वो दवा और डाक्टर के आभाव में निकलती त्वचा और अपने जले अंगों  की पीड़ा सहते सहते भगवान को प्यारे हो गए। रही सही कसर रेडियोधर्मिता ने पूरी कर दी। बच्चों और बड़ों में बमबारी के महीनों बाद रक्त कैंसर के लक्षण उभर आए।


अमेरिका ने ये हमला इतने चुपके से किया था कि जापान के सम्राट को सही स्थिति समझने में एक दिन लग गया। जापानी शासकों को पूरा अनुमान था कि ऐसे हमले अमेरिका पुनः कर सकता है फिेर भी युद्ध ज़ारी रखने का आदेश दिया गया। मृत्यु का इतना नृशंस तांडव मचाने वाले अमेरिका को भी आम जनता पर दया माया नहीं आई और तीन दिन के अंतराल में एक और बम नागासाकी पर गिरा दिया गया। अगर जापान तुरंत आत्मसमर्पण नहीं करता तो अमेरिका की तरफ़ से और बम गिराने की पूरी तैयारी थी। हिरोशिमा एक जीता जागता प्रमाण है कि इंसानियत का दम भरने वाली शक्तियाँ अपने त्वरित फायदे के लिए किस हद तक नीचे गिर सकती हैं। किस तरह हमारे आका जिन्हें देश को चलाने की जिम्मेवारी हम सौंपते हैं सिर्फ अपनी कुर्सी पर बने रहने के लिए आम जनता को बलि का बकरा बनाते हैं।


आज शहीदों की स्मृति में जो स्मारक वहाँ बनाया गया है और उस पर लिखा है कि भगवान आप सबकी आत्मा को शांति दे। हम ऐसी गलती दोबारा नहीं करेंगे।


जब आप विश्व शांति  और सहअस्तित्व के लिए बनी इस इमारत में प्रवेश कर रहे होते हैं तो बच्चों के समूह द्वारा एक याचिका पर दस्तखत लिए जाते हैं कि आप किसी भी तरह के परमाणु बम के इस्तेमाल का विरोध करते हैं। मैं तो ये प्रतिज्ञा तीन साल पहले ही ले ली थी..आशा है आप भी लेंगे.विश्व के किसी भी कोने को ऐसी किसी विभीषिका से बचाने के लिए..

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8 comments:

  1. हृदय विदारक घटना,जानकारी के लिए धन्यवाद

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    1. बेहद तकलीफ़देह होता है यहाँ के संग्रहालय से होकर गुजरना !

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  2. Very nice post Manish ji...thanks

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    1. जानकर खुशी हुई कि आपको ये लेख पसंद आया।

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  3. बहुत हृदय विदारक रहा आपका आज के लेख का वर्णन | नफरत और शासन करने की चाह ही दुनिया में विनाश ला रही है | बहुत अच्छी लगी आपकी पोस्ट ...हिरोशिमा शहर के बारे जानने को मिला....

    www.safarhainsuhana.blogspot.in

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    1. वहाँ से निकलते वक़्त दिल बेहद बोझल हो उठा था इसलिए लेख में वैसी भावनाएँ स्वतः आ गयीं।

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