Saturday, December 31, 2016

यादें यूरोप की : कैसी थी वो जलपरी जिसने हमें पहुँचाया नीदरलैंड ? England to Netherlands on Stena Line

लंदन से हमारा काफिला तेजी से इंग्लेंड के हार्विच बंदरगाह की ओर बढ़ रहा था। सरसों के जिन पौधों की खूबसूरत झलक आपने पिछली पोस्ट में देखी थी वो अब कई किलोमीटर तक फैली हुई दिख रही थी। इन हरे भरे नज़ारों के बीच हार्विच से लंदन की 85 मील की दूरी दो घंटों में  कैसे बीत गयी ये पता ही नहीं चला। दरअसल हार्विच से हमें पानी के जहाज से हालैंड का रुख करना था। 

मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये जहाज किस तरह का होगा। बंदरगाह के बाहर हमारी बस एक बहुमंजिली इमारत के पास रुकी। सामने एक बड़ी सी लिफ्ट दिखाई दे रही थी जिससे सामान सहित ऊपर की ओर जाना था। एयरपोर्ट जैसी ट्रालियाँ यहाँ भी थीं पर उनका आकार बड़ा था। लंदन से चली अपनी बस और उसके अक्खड़ ड्राइवर को हमें यहीं अलविदा कह देना था। हमारा सामान दो या तीन तल्ले ऊपर गया। अंदर एयरपोर्ट जैसी चमक दमक तो नहीं थी  पर सारे क़ायदे कानून वैसे ही थे।
हालैंड की हरियाली की बात ही कुछ और है
एक बात और ! अब तक हमारा समूह यूके के वीज़ा पर लंदन घूम रहा था। इंग्लैंड के बाहर यूरोप में शेंगेन वीज़ा लागू हो जाता है। शेंगेन वीज़ा यूरोप के 26 देशों में लागू होता है। यूरोपियन यूनियन के देशों में सिर्फ ब्रिटेन और नार्थन आयरलैंड ही ऐसे हैं जो इसकी परिधि से बाहर हैं। घुमक्कड़ों के लिए ये वीज़ा वरदान की तरह हैं। एक बार ये वीज़ा आपके हाथ आ गया तो इन देशों के अंदर कहीं से कहीं चले जाएँ कोई पूछताछ करने वाला नहीं है। मैं शेंगन वीज़ा के साथ यूरोप के करीब छः सात देशों से गुजरा पर दो हफ्तों में कहीं भी हमारे कागजात जाँचने कोई नहीं आया। पर इतनी आसानी से जब आप एक देश से दूसरे देश में विचर रहे होते हैं तो ये फील ही नहीं आती कि अपन एक देश आज पार कर आए हैं।

स्टेना लाइन विश्व की बड़ी फेरी कंपनियों में से एक
चूंकि हम ब्रिटेन से शेंगेन वीज़ा वाले देश हालैंड में प्रवेश कर रहे थे हमें बंदरगाह पर सबसे पहले अप्रवासन जाँच से गुजरना पड़ा। जहाज का टिकट लेने की प्रक्रिया फिर हू-बहू हवाई अड्डे वाली थी। यानि सुरक्षा जाँच, बैगेज चेक और फिर बोर्डिंग पास के साथ सिर्फ हैंड बेगेज कमरे तक ले जाने का प्रावधान। । 

जब हम बोर्डिंग पास लेकर अंदर अंदर जहाज तक पहुँचे तब समझ आया कि हम जहाज क्या पूरी सुख सुविधाओं से लैस एक बहुमंजिला इमारत में  एक दिन के किरायेदार बनने वाले हैं। हमारे इस विशाल जहाज की कंपनी का नाम स्टेना लाइन था। स्टेना लाइन विश्व की सबसे बड़ी फेरी कंपनियों में एक है। स्कैंडेनेविया से लेकर उत्तर और बाल्टिक सागर तक ये कंपनी अपने चौंतीस जहाजों के साथ बाइस मार्गों पर चलती है। गर पहले से टिकट करा लें आप इसमें सौ पौंड से भी कम कीमत में इंग्लैंड से हालैंड पहुँच सकते हैं।


स्टेना लाइन का डाइनिंग हॉल
जहाज के अंदर कदम रखने के बाद तो ये लगा कि हम पानी के जहाज पर नहीं बल्कि होटल में हैं। कहीं रेस्ट्राँ, कहीं स्वीमिंग पूल, कहीं खेल कूद के कक्ष। पर दिन भर की थकान के बाद हमारे क़दम सिर्फ एक दिशा में बढ़ना चाह रहे थे और वो थे पेट पूजा के। अब अगर हालैंड के रास्ते में चावल और पकौड़े मिलें तो अपना देशी उदर कब पीछे हटने वाला था।

लगती है ना होटल की लॉबी !
जहाज़ पर रहने के लिए कई तलों में कमरे बने हुए थे। गलियारा तो इतना लंबा कि उसका दूसरा छोर दिखाई ना दे। कमरा ट्रेन के एसी वन के कोच की तरह जिसमें एक व्यक्ति को सीढ़ी से चढ़ कर ऊपरी बर्थ पर पहुँचना पड़े। ख़ैर अब शरीर में जहाज़की और ज्यादा खोज बीन की ताकत नहीं बची थी सो सीधे चादर तान ली़ ।

मुझे तो ये जहाज़ की ये सीढियाँ इतनी पसंद आयीं कि यहीं आसन जमा लिया

Monday, December 19, 2016

क्या दिखता है लंदन आई से ? What you can see from London Eye ?

पिछली पोस्ट में आपने मेरे साथ लंदन शहर की परिक्रमा की और मिले मैडम तुसाद के पुतलों से । चलिए आज आपको दिखाते हैं लंदन की एक और पहचान से और ले चलते हैं आपको लंदन की आँख यानि London Eye पर।
लंदन आई के प्रतीक के सामने बैठे स्कूली बच्चे
लंदन के शहर की पहचान के तौर पर अब तक मैंने आपसे यहाँ के लाल रंग के टेलीफोन बूथ और डबल डेकर बसों का जिक्र किया। अब इनका ये लाल रंग दशकों तक रहे ना रहे पर लंदन की एक और पहचान है जो शायद सबसे दीर्घकालिक रहे और जिसे आप लंदन की सड़कों से गुजरते हुए हर समय देखेंगे़। ये पहचान हैं यहाँ की लंदन प्लेन ट्री। आपको बता दूँ कि शहरी लंदन के आधे से ज्यादा पेड़ लंदन प्लेन के ही हैं। 


वैसे लंदन प्लेन के इतिहास को देखें तो पाएँगे कि ये पेड़ लंदन के लिए बहुत पुराना भी नहीं सत्रहवीं शताब्दी में ये पेड़ पहली बार इस शहर में देखा गया। विशेषज्ञ इस पेड़ को अमेरिकी सिकामोर और यूरोप के ओरियंटल प्लेन का संकर मानते हैं। पर इतनी बड़ी तादाद में लंदन में ये पेड़ आए कैसे? औद्योगिक क्रांति से  लंदन में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए बड़ी संख्या में इन पेड़ों को लगाया गया। इन पेड़ों की खासियत है कि ये वातावरण की गंदगी को अपने में समा लेते है और फिर अपनी गिरती छाल से वो गंदगी पेड़ के बाहर भी चली जाती है।

लंदन प्लेन London Plane tree

इस पेड़ की पत्तियों को देखकर आप सहज ही मेपल की पत्तियों से धोखा खा जाएँ। पर दोनों में क्या अंतर है ये नियाग्रा आन दि लेक के सफ़र में मैंने आपको बताया था। लंदन प्लेन की पत्तियाँ मेपल की तरह पतझड़ में लाल ना होकर पीली भूरी ही रहती हैं। तीस मीटर तक की लंबाई हासिल करने वाला ये पेड़ हर तरह की मिट्टी में उग आता है और इसकी जड़ें ज्यादा फैलती भी नहीं।

लंदन प्लेन ट्री आज के लंदन की एक और पहचान Leaves of London Plane
तकरीबन आधे घंटे के सफ़र के बाद हम लंदन आई के सामने थे। अब आपको दूर से ते ये अपने मेलों में लगने वाला एक साधारण सा झूला नज़र आएगा। दरअसल ये है भी वही 😄। पश्चिमी जगत में ये फेरीज़ व्हील के नाम से मशहूर है। जापान और कनाडा में इसके नमूने मैं पहले भी देख  चुका था। हमारे झूलों और विदेशों की इन फेरीज़ में दो मुख्य अंतर हैं। हमारे यहाँ इस तरह के झूले रोमांच पैदा करने के लिए गति से घुमाए जाए जाते हैं जबकि विदेशों में इनका मूल उद्देश्य ऊँचाई से शहर के दृश्यों का अवलोकन करना होता है। इसलिए इन्हें बिल्कुल मंथर गति से घुमाया जाता है।

लंदन आई फेरीज़ व्हील
अगर लंदन आई की बात करूँ तो ये एक सेकेंड में मात्र 26 सेमी का सफ़र तय करती है। 120 मीटर व्यास वाला इसका चक्र बनने के समय विश्व में  सबसे ऊँचा था । अब भी इसे यूरोप की सबसे ऊँची व्हील का सम्मान प्राप्त है। वैसे अंग्रेजों को लंदन आई बनाने का ख्याल कहाँ से आया? अब करते भी क्या ? चिरकालिक प्रतिद्वन्दी फ्रांस मे उन्नीसवी शताब्दी के अंत में एफिल टॉवर बनाकर मैदान पहले ही मार लिया था । लंदन ने जवाब में एक फेरीज़ व्हील बनाई जिसे Giant Wheel का नाम दिया गया था। 94 मीटर ऊँचे इस घूमते पहिये की उम्र जब बीस साल की थी तो इसे हटा लिया गया। पर लंदनवासियों को कोई तो बिंदु चाहिए था जिसकी ऊँचाइयों से वो शहर के केंद्र को देख सकें। लिहाज़ा एक नई फेरीज़ व्हील बनाई गई सत्रह साल पहले जो आजकल कोका कोला लंदन आई के नाम से जानी जाती है।

लंदन आई के बैठने का कक्ष London Eye's Capsule

हमारे झूलों की तरह इन फेरीज़ में बैठने का हिस्सा खुला नहीं रहता। आप शीशे के खाँचे में बंद रहते हैं। लंदन आई में ये खाँचा वातानुकूलित है। इसमें एक साथ दो दर्जन लोग बैठ और घूम भी सकते हैं।

हंगरफोर्ड ब्रिज Hungerford Bridge
लंदन आई थेम्स के दक्षिणी किनारे पर बनी  है। ऊपर उठते हुए इसके दक्षिण पूर्व  में सबसे पहले हमें हंगरफोर्ड ब्रिज नज़र आया जो कि एक रेलवे ब्रिज है। स्टील ट्रस संरचना पर आधारित ये पुल दूर से दिखने में बेहतरीन लगता है। इसके और आगे वाटरलू सड़क ब्रिज है। थेम्स नदी यहाँ से टॉवर ब्रिज की तरफ़ घुमाव लेती है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस पुल की नींव वाटरलू के युद्ध की जीत की खुशी में पड़ी थी।

वाटरलू पुल के पास घुमाव लेती थेम्स Waterloo Bridge

लंदन आई से सबसे खूबसूरत नज़ारा जुबली गार्डन का मिलता है। रानी एलिजाबेथ द्वितीय के शासन की सिलवर जुबली के उपलक्ष्य में इस पार्क को बनाया गया था। दो हजार बारह में लंदन ओलंपिक के ठीक पहले इस पार्क को इसकी गोल्डन जुबली के अवसर पर और खूबसूरत बनाने की क़वायद शुरु हुई और नतीजा आपके सामने है।

जुबली पार्क Jubilee Gardens

Sunday, December 11, 2016

मोम के जीवंत पुतलों की दुनिया : मैडम तुसाद, लंदन Madame Tussauds, London

लंदन शहर का एक छोटा सा चक्कर तो आपको पिछले हफ्ते ही लगवा दिया था पर साथ में ये वादा भी था कि अगली सैर लंदन के विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय मैडम तुसाद की होगी। यूँ तो मैडम तुसाद के संग्रहालय अब विश्व के कोने कोने में खुल रहे हैं और अगले साल तो अपनी दिल्ली भी इस सूची में शामिल हो रही है पर लंदन का संग्रहालय इनका जनक रहा है इसलिए इसे देखने के लिए हमारे समूह के सहयात्रियों में खासा उत्साह था। बस में सवार बच्चे व युवा  तो अपने चहेते कलाकार व खिलाड़ी के साथ तस्वीर खिंचाने की जैसे बाट ही जोह रहे थे।
क्रिकेट के शहंशाह सचिन तेंदुलकर

इतनी मशहूर जगह हो और वहाँ पहुँचने के लिए लंबी कतार ना हो ऐसा कैसे हो सकता है? वैसे भी मैडम तुसाद का गुंबदनुमा संग्रहालय रिहाइशी इलाके के बीचो बीच स्थित है। लंदन के अन्य दर्शनीय स्थानों के मुकाबले इसके आस पास कोई खाली जगह नहीं हैं। लिहाज़ा कांउटर पर लगने वाली पंक्ति सड़कों तक बिखर जाती है। टिकट पहले से लेने पर भी कतार में इसलिए खड़ा होना पड़ रहा था क्यूँकि अंदर पहले से ही काफी लोग थे। अपनी बारी की प्रतीक्षा करता हुआ मैं सोच रहा था आख़िर ये कौन सी मैडम होंगी जिनके नाम से मोम के ये पुतले अपनी ये पहचान बना पाए हैं? तो इससे पहले की संग्रहालय के अंदर कदम रखा जाए कुछ बातें इसके रचयिता के बारे में भी जान लीजिए।

मैडम तुसाद, लंदन  Madame Tussauds, London

ये  संग्रहालय मेरी ग्रोज़ होल्ट की देन है। मेरी ब्रिटेन में नहीं बल्कि फ्रांस में पैदा हुई थीं। उनकी माँ स्विटज़रलैंड के  एक डा. फिलिप के यहाँ काम करती थीं। डा. फिलिप को मोम के प्रारूप बनाने में महारत हासिल थी। उन्होंने ही मेरी को मोम के इन पुतलों पर काम करना सिखाया। जानते हैं मेरी ने अपने हाथों से पहला पुतला आज से करीब तीन सौ चालीस साल पहले बनाया था। पर लोगों तक अपने और डा. फिलिप के संग्रह को पहुँचाने का काम उन्होंने अठारहवीं शताब्दी की आख़िर से शुरु किया। 

 

तुसाद का उपनाम उन्हें शादी के बाद मिला। मेरी  ने उस दौरान पूरे यूरोप में घूम घूम कर अपने शो किए और तबसे इस प्रदर्शनी का नाम मैडम तुसाद पड़ गया। मेरी जब अपने शो के सिलसिले में 1830 में लंदन आयी तो फिर वापस युद्ध की वज़ह से फ्रांस नहीं लौट पायीं। लंदन में पहले उन्होंने बेकर स्ट्रीट पर  ये संग्रहालय बनाया और बाद में  वहाँ जगह की कमी की वज़ह से उनके पोते द्वारा इसे मालबो स्ट्रीट में ले आया गया जहाँ ये आज भी स्थित है।

 मैडम तुसाद में भारतीय फिल्मी सितारे

भारत से आनेवालों के मैडम तुसाद से प्रेम का ही ये नतीज़ा है कि संग्रहालय में घुसते ही आप अपने को बॉलीवुड के फिल्मी सितारों से भरी दीर्घा में पाते हैं।  जितने वास्तविक यूरोपीय शख़्सियत के पुतले लगते है् वो बात भारतीय अदाकारों के इन पुतलों में नज़र नहीं आती।  अमिताभ, शाहरुख, सलमान, माधुरी, ऐश्वर्या , कैटरीना...लंबी फेरहिस्त है यहाँ भारतीय फिल्मी हस्तियों की पर सब के सब चेहरे की भाव भंगिमाओं के निरूपण में बाकी विदेशी जनों से उन्नीस ही नज़र आए। हमारे राजनेताओं में महात्मा गाँधी और इंदिरा गाँधी के पुतले भी हैं यहाँ पर और अब तो हमारे प्रधानमंत्री मोदी का पुतला भी यहाँ की शोभा बढ़ रहा है ।

इसे कहते हैं पोज़ देना 😀
मुझे इन आभासी पुतलों में अल्बर्ट आइंस्टीन और राजकुमारी डॉयना का पुतला सबसे बेहतरीन लगा। अल्बर्ट आइंस्टीन के उड़ते सफेद बालों के साथ चेहरे की झुर्रियों को इतनी स्पष्टता से उतारा है शिल्पियों ने कि लगता है कि वो सामने खड़े होकर पढ़ा रहे हों। सबसे बड़ी बात है कि जो लोग यहाँ आते हैं वो इस अदा के साथ इन पुतलों के साथ फोटो खिंचाते हैं कि पुतले सजीव हो उठते हैं। अब इन बाला को देखिए आइंस्टीन के गले में यूँ हाथ डाले हैं मानो वो बचपन के लंगोटिया यार रहे हों।

Monday, December 5, 2016

यादें यूरोप की: इ है लंदन नगरिया तू देख बबुआ ! City of London

लंदन की अगली सुबह का दृश्य थोड़ा मायूस करने वाला था। पिछले दिन के खुले आकाश के उलट आज बाहर सूरज का नामोनिशान तक नहीं था। बादलों के झुंड के साथ चलती हवा सिरहन अलग उत्पन्न कर दे रही थी । बारिश का भी खतरा था। पर हमारा समूह इंतज़ार कर रहा था अपनी यात्री बस का, जिस पर सवार होकर हमें लंदन के गली कूचों का चक्कर लगाना था।
लंदन  की पहचान यहाँ का टॉवर ब्रिज Tower Bridge
निकलना सुबह साढ़े सात तक था पर जब तक हमारी मर्सीडीज़ बेंज़ की बस आती, साढ़े आठ बज चुके थे। हीथ्रो से निकलते ही बस एक लंबे से ट्राफिक जाम में फँस गई।

ट्राफिक जॉम लंदन में  भी Traffic Jam in London
समय से नहीं आने पर टूर मैनेजर और ड्राइवर में नोकझोंक शुरु हो गयी थी। मैनेजर ने जहाँ punctuality का मसला उठाया ड्राइवर का अंग्रेज अहम जाग उठा और वो भड़क कर बस लौटाने की बात करने लगा। मैं आगे की सीट पर बैठा था। चालक की बातों से समझ गया कि आज हमलोगों का पाला एक अक्खड़ और अशिष्ट इंसान से पड़ा है। सुबह की देरी व  जॉम की वज़ह से समय वैसे ही निकला जा रहा था। रही सही कसर बारिश ने पूरी कर दी। लंदन की बारिश के चर्चे पहले भी सुन रखे थे और इसी वज़ह से ये उम्मीद भी थी कि बदलते मौसम वाले इस शहर में कब बारिश और कब रोशनी के साथ मुलाकात हो जाए कोई कह नहीं सकता।

बारिश में भीगा  लंदन
रॉयल एल्बर्ट हॉल के सामने जब हमारी बस रुकी तो बारिश बंद हो चुकी थी पर बाहर निकलते ही ऐसा महसूस हुआ कि तापमान एकदम से पाँच सात डिग्री नीचे चला आया हो। ठिठुरते हुए हम इस इमारत का बाहर से मुआयना करने लगे। हॉल को देखते हुए  बचपन के वो दिन याद आने लगे जब पहली बार इस जगह का नाम सुना था। 

बाजार में तब पैनासोनिक का आयताकार टेपरिकार्डर पहली बार आया था। घर में संगीत सुनने का माहौल था तो वैसा ही टेपरिकार्डर हमारे यहाँ भी खरीदा गया था। टेप तो आ गया पर खरीदने के लिए कैसेट्स ही नहीं थे। तब बाजार में कैसेट्स का चलन शुरु ही हुआ था। बाद में नेपाल के एक परिचित से कैसट्स मँगाए गए़। उनमें से जो कैसेट सबसे ज्यादा हम भाई बहनों ने सुना था वो था लता मंगेशकर का रॉयल अल्बर्ट हॉल में किया गया कन्सर्ट। तब भारत का हर नामी कलाकार यहाँ आया करता था।

रॉयल अल्बर्ट हॉल का एक हिस्सा Royal Albert Hall
रायल अल्बर्ट हॉल से बस में हमारी गाइड एलेक्सेन्ड्रिया भी शामिल हो गयी थीं। कॉलेज में पढाई कर रही एलेक्सेन्ड्रिया के लिए गाइड का काम पार्ट टाइम नौकरी वाला था। उसके माता पिता रूस से आकर यहीं बस गए थे और उसकी परवरिश ब्रिटेन में हुई। स्वभाव से विनम्र, हमारे सवालों का धैर्य से जवाब देने वाली एलेक्सेन्ड्रिया एक ही दिन हमारे साथ रही पर इतने कम समय में उसने हम सभी के हृदय में जगह बना ली।


रायल एल्बर्ट हॉल के ठीक सामने केनसिंग्टन पार्क में राजकुमार एल्बर्ट का मेमोरियल बना हुआ है। रॉयल एल्बर्ट हॉल के बनने के एक साल बाद रानी विक्टोरिया ने 1872 में ये  मेमोरियल बनवाया था। एल्बर्ट 42 वर्ष की आयु में ही टॉयफाएड का शिकार बन गए थे।

अल्बर्ट मेमोरियल Albert Memorial
गोथिक स्थापत्य शैली में बना हुए इस मेमोरियल को देखते हुए मौसम ने करवट ले ली थी और हमारी उम्मीदों के मुताबिक आसमान अपनी नीलिमा यूँ बिखेरने लगा था मानो सुबह से वो ऐसा ही हो।

बकिंघम  पैलेस Buckingham Palace

रॉयल एल्बर्ट हॉल से हम बकिंघम  पैलेस पहुँचे। यहाँ तो दुनिया के कोने कोने से आए लोगों का ताँता लगा हुआ था। बकिंघम पैलेस के अंदर रानी हैं या नहीं इसका पता आप इसके ऊपर लगे झंडे से कर सकते हें। सन 1997 तक परंपरा थी कि जब रानी महल में हों तब झंडा फहराया जाएगा। जब राजकुमारी डायना की मौत हुई तो रानी महल के बाहर थीं तो झंडा नहीं फहराया गया। डायना के प्रति लोगों के प्रेम ने इसे उसका अपमान माना। उनका कहना था कि उनके सम्मान में झंडा आधी ऊँचाई से फहरना चाहिए। तबसे महल की परंपरा बदली गयी। अब रानी जब महल में नहीं रहती तो झंडा फहराया जाता है और राजपरिवार के सदस्य के निधन पर झंडा आधी ऊँचाई से फहराया जाता है। हम जब महल के पास पहुँचे तो झंडा खंभे से बँधा हुआ था यानि रानी महल में थीं।

विक्टोरिया मेमोरियल Victoria Memorial
बकिंघम पैलेस के सामने ही क्वीन विक्टोरिया मेमोरियल है।  इसे बनाने के लिए उस वक़्त पैसा ब्रिटिश उपनिवेशों और आम जनता से दान के रूप में लिया गया था। इस तरह करीब डेढ़ लाख पौंड की राशि इकठ्ठा की गयी थी। 1924 में आर्किटेक्ट थॉमस ब्रोक के सोचे प्रारूप पर ये बनकर तैयार हुआ था। मेमोरियल के ऊपर पर लगी कांसे की प्रतिमा विजय की देवी का प्रतीक है। मेमोरियल के नीचे रानी को दो रूपों में दिखाया गया है। महल की ओर बनी प्रतिमा में रानी  माँ के स्वरूप में हैं जो बच्चे को दूध पिला रही हैंं। यहाँ देश की जनता को बच्चे का प्रतीतात्मक रूप दिया गया है जो माँ की छत्र छाया में पल रहा है, वहीं दूसरी ओर (जो हिस्सा चित्र में नहीं दिख रहा) रानी अपने सिंहासन पर बैठी दिखती हैं। बाकी दो दिशाओं में मूर्तियों को सत्य और न्याय का प्रतीक बनाया गया है। मेमोरियल की बगल वाली सड़क पर सैनिक परेड करते दिखे। कुल मिलाकर वहाँ की चहल पहल देख कर लगा कि ये इलाका पर्यटकों से हमेशा आबाद रहता है।

संत पॉल कैथेड्रल

Sunday, November 20, 2016

यादें यूरोप की : कैसा दिखता है आकाश से लंदन? Aerial View , London

जब यूरोप का मैं कार्यक्रम बना रहा था तो लंदन मेरी सूची में ऊपर नहीं था। ऐसा नहीं कि हमारे अतीत से इतनी नज़दीकी से जुड़े इस शहर से मेरा कोई बैर था पर मन में ये बात अवश्य थी कि लंदन तो बाद में भी कभी जाया जा सकता है। क्यूँ  ना इसकी जगह कहीं और अपने रहने का ठिकाना बढ़ा दें? पर अंततः ये शहर हमारे कार्यक्रम में  शामिल हो गया और यहाँ बिताये दो दिनों में  इतना तो जरूर समझ आया कि बतौर एक देश ब्रिटेन काफी अलग है अन्य यूरोपीय देशों से।

इतिहास के पन्नों को कुछ देर के लिए भूल जाएँ तो इंग्लैंड से मेरा पहला लगाव क्रिकेट व रेडियो की वज़ह से हुआ था। बचपन में जब घर में टीवी नहीं हुआ करता था तो सारा परिवार रेडियो के सामने बीबीसी  की सांयकालीन हिंदी सेवा के कार्यक्रम जरूर सुना करता था। रेडियो कमेन्ट्री के उस दौर में क्रिकेट से भी खासी रुचि हो गयी थी। 
और कर लिया हमारे विमान ने इंग्लैंड में प्रवेश !
टाइम्स आफ इंडिया के खेल पृष्ठ को पढ़ पढ़ कर सारी इंग्लिश काउंटी के नाम मुजबानी याद हो गए थे। मसलन हैम्पशायर, डर्बीशायर, लंकाशायर, वारविकशायर, एसेक्स, केन्ट, सरी, समरसेट, मिडिलसेक्स और ना जाने क्या क्या! अस्सी के दशक में विजय अमृतराज और रमेश कृष्णन जैसे खिलाड़ियों के विंबलडन में   अच्छे प्रदर्शन वजह से ये प्रतियोगिता देखना एक सालाना शगल बन गया। विबंलडन के माध्यम से लंदन की छवियाँ देखते रहे। फिर नब्बे के आसपास बूला चौधरी ने इंग्लिश चैनल को तैर के पार कर सनसनी फैला दी थी। फ्रांस से समुद्र में कुलांचे भरते इंग्लैंड पहुँच जाना तब एक भारतीय के लिए बड़ी उपलब्धि थी।

अपनी पुरानी यादों को सँजोते हुए मैं टकटकी लगाए विमान की खिड़की से नीचे के खेत खलिहानों को देख रहा था। हमारा विमान अस्ट्रिया के बाद जर्मनी और फ्रांस के ऊपर से उड़ते हुए लंदन की ओर जा रहा था। मैं तो तैयार था कि जहाँ समुद्र की अथाह जलराशि दिखनी शुरु हुई समझो कि इंग्लैंड की सीमा करीब ही है। जैसे ही इंग्लैंड के तटीय इलाके  में हमारे विमान ने प्रवेश किया हरे भरे खेतों के बीच सर्पीली चाल से चलती हुई कई नदियाँ पतली पतली धाराओं में विभक्त हो सागर में मिलती दिखाई देने लगीं ।

बलखाती थेम्स नदी
पर लंदन का शहर तो थेम्स नदी के तट पर बसा है। आकाश से ये नदी कैसी  दिखती हैं ये जानने की उत्सुकता थी और ये मुलाकात कुछ मिनटों में दक्षिण पूर्वी लंदन के ग्रीनविच इलाके में ही हो गई। थेम्स इंग्लैंड में बहने वाली सबसे लंबी नदी है। लंदन के बीचो बीच से गुजरती ये नदी उत्तरी सागर में मिलती है। लंदन में बहती ये दुबली पतली नदी अपने सफ़र के दौरान कई घुमाव लेती है। ऊपर  चित्र के बाँयें कोने में गुम्बदनुमा संरचना दिख रही है वो दरअसल यहाँ की एक मशहूर इमारत है जिसका नाम है ओ टू एरीना (O2 Arena)। इसका इस्तेमाल खेलों के आलावा संगीत से जुड़े बड़े आयोजनों के लिए होता रहा है।

विंबलडन, लंदन
थेम्स नदी तो कुछ ही क्षणों में आँखों से ओझल हो गयी। लंदन का एक इलाका और था जिसे देखने की तमन्ना मैंने मन में बना रखी थी। वहाँ मैं जा तो नहीं सका पर आकाश से उसे निहारने का अवसर भगवन ने अनायास ही दे दिया। ये इलाका था विंबलडन पार्क का। विंबलडन के सेंटर कोर्ट में  हो रहे मुकाबलों के दौरान कई बार आपने देखा होगा कि विमान की आवाज़ की वजह से खिलाड़ी  अपनी सर्विस रोक दिया करते थे। पर मुझे ये बात दिमाग में पहले नहीं आई थी कि हीथ्रू हवाई अड्डे जाते हुए हमारा विमान भी विंबलडन के इलाके से गुज़रेगा। विंबलडन का इलाका पार्क के एथलेटिक्स ट्रेक से दिखना शुरु हुआ, फिर आई झील और गोल्फ कोर्स। गोल्फ कोर्स से सटा हुआ यहाँ का सेंटर कोर्ट है और जो गोलाकार स्टेडियम आप देख रहे हैं वो कोर्ट नंबर एक है। बाकी के कोर्ट सेंटर कोर्ट से आगे की तरफ़ हैं।
रिचमंड पार्क गोल्फ कोर्स
विबलडन से हीथ्रो के बीच रिचमंड का शाही पार्क दिखाई पड़ा। शाही इसलिए कि सत्रहवीं शताब्दी में यहाँ के राजा चार्ल्स प्रथम ने इसके बगल में अपना डेरा जमाया था । वो इस हरे भरे इलाके का प्रयोग हिरणों के शिकार के लिए किया करते थे। तब आम जनता को इसमें घूमने की आजादी नहीं थी।  बाद में जब ये सरकार के नियंत्रण में आया तो ये बंदिश खत्म हुई। अब गाड़ी वालों को दिन में और पैदल चलने वालों व साइकिल सवारों के लिए ये हमेशा खुला रहता है।

इस पार्क को लंदन के सबसे बड़े पार्क होने का गौरव प्राप्त है और ये लगभग हजार हेक्टेयर से थोड़े कम क्षेत्र में फैला हुआ है। पार्क में ही एक खूबसूरत गोल्फ कोर्स भी है।


दक्षिण पूर्व लंदन से पश्चिमी लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे तक बहुमंजिली इमारते कम दिखीं। जितने भी रिहाइशी इलाके दिखे उनमें ज्यादातर मकान दुमंजिले तिकोनी छतों के साथ थे। इटली या डेनमार्क के कुछ शहरों की तरह रंगों की तड़क भड़क लंदन के इन इलाकों में दिखाई नहीं दी। सफ़ेद व  हल्के  भूरे रंग में रेंज इन मकानों का स्वरूप ब्रिटिश संस्कृति में सौम्यता के महत्त्व को दर्शाता है।


भरी दुपहरी में हम लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पे दाखिल हो चुके थे।  बाहर मौसम खुशगवार था। ना ज्यादा ठंड ना गर्मी। सामान के साथ बाहर निकल कर सबसे पहले हीथ्रो के अहाते में फोटो की औपचारिकताएँ पूरी की गयीं।

हीथ्रो का हवाई अड्डा

हीथ्रो हवाई अड्डे का मुख्य द्वार
पहली समस्या अपने होटल तक पहुँचने की थीं। बुकिंग की उलटपुलट की वज़ह से थॉमस कुक ने हमें अपने समूह से अलग कर दिया था। एयरपोर्ट से अपने होटल तक पहुँचने का इंतज़ाम हमें ख़ुद करना था। भाषा की समस्या थी नहीं तो पूछने  पर पता चला कि बस या टैक्सी के दो विकल्प हमारे पास हैं। बस के हिसाब से हमारा  सामान ज्यादा था सो दस पाउंड में एक एक टैक्सी की गई। दिखने में  हट्टे कट्टे अंग्रेज ड्राइवर बातों में बड़े व्यवहार कुशल निकले। कुछ ही क्षणों में  तीन परिवारों के सामानों को उन्होंने दो टैक्सियों में बाँटा और हमारा काफिला अपने होटल की ओर चल पड़ा।

हमारा होटल प्रीमियर इन हीथ्रो हवाई अड्डे से ज्यादा दूर नहीं था। प्रीमियर इन ब्रिटेन के बजट होटल की सबसे बड़ी श्रंखला है। ब्रिटेन में इस समूह के सात सौ होटल हैं। होटल के कमरे ज्यादे बड़े तो नहीं पर साफ़ सुथरे एवं आरामदेह थे। इतनी लंबी यात्रा के बाद कमरे में पड़े लिहाफ को देखते ही सफ़र की थकान फिर उभर आई। पर यूरोप की धरती पर उतरने का उत्साह इतना था कि नींद नहीं आई और मैं चल पड़ा अगल बगल के इलाकों में चहलकदमी करने।

लंदन का हमारा ठिकाना
थोड़ी देर बाद हमारे एक परिचित वहाँ आए और उन्होंने लंदन के बाहरी इलाकों की सैर करने का प्रस्ताव रखा। घंटे भर उनकी गाड़ी लंदन के शांत इलाकों से गुजरती रही। पर बाहर के दृश्यों से ज्यादा उनकी बातें दिलचस्प लगने लगीं। उन्होंने बताया कि आजादी के बाद यहाँ भारत से आने वाले लोगों  संख्या बढ़ी। उस वक़्त यहाँ आने वाले लोगों में  पंजाबियों की संख्या अच्छी खासी थी। इन लोगों ने हीथ्रो के आसपास अपना अड्डा जमाया। हीथ्रो में आज भी काफी संख्या में भारतीय काम करते हैं। अपने उद्यम और मेहनत से आज इस इलाके की बहुतेरी संपत्तियों के वे मालिक बन बैठे हैं।

हीथ्रो के पास का रिहाइशी इलाका जहाँ भारतीय आज काफी संख्या में है
शाम की इस सैर के बाद पेट में चूहे दौड़ रहे थे। रात में जब हम इस भारतीय रेस्ट्राँ में पहुँचे तो जान में जान आई।


होटल में सुबह का नाश्ता शानदार था। तरह तरह के ब्रेड, दूध,फल, जूस, अंडा,चाय कॉफी, केक पेस्ट्री से टेबुल भरी पड़ी थी। यूरोप यात्रा में लंदन जैसा स्वादिष्ट और विविधता से भरपूर ब्रेकफॉस्ट हमें नहीं मिला।



सुबह तक इस यात्रा में भारत के अन्य हिस्सों से आए लोग भी मिले। अगले दो हफ़्तों के लिए ये सभी लोग हमारी टूर बस के हमसफ़र होने वाले थे। कैसा रहा हमारा लंदन में पहले दिन का अनुभव? वो कौन सी मुसीबत थी जिससे हमारा समूह पहले ही दिन से दो चार होने वाला था? जानिएगा इस श्रंखला की अगली किश्त में ।

पूरे समूह के साथ बस पर मैं
 यूरोप यात्रा में अब तक


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Saturday, November 12, 2016

यादें यूरोप कीः वो पहला अनुभव वियना का ! Senses of Austria

वियना में विमान से सुबह उतरते वक़्त बाहर का तापमान पन्द्रह के करीब बताया गया। हमारा समूह सशंकित था कि राँची और फिर दिल्ली में मई की गर्मी झेलने के बाद अचानक कितनी ठंड का सामना करना पड़ेगा। जो ठंड लगनी थी वो एरोब्रिज के आखिरी छोर पर पहुँचते पहुँचते खत्म हो गयी। वियना का ये एयरपोर्ट बहुत नया तो नहीं पर बेहद हरे भरे इलाके के बीच बना है। आज से करीब अस्सी साल पहले इसका निर्माण दूसरे विश्व युद्ध की तैयारियों के लिए जर्मनी द्वारा 1938 में किया गया था। समय के साथ इसमें कई बदलाव हुए और आज ये आस्ट्रिया का सबसे बड़ा हवाई अड्डा है। 

देश में घुसते या निकलते समय ऐसी दुकानें से की गई खरीद वर्षों आपकी यादों को ताज़ा रख सकती हैं। 
हमारी अगली फ्लाइट छः घंटे बाद थी। भारत की अपेक्षा जहाँ इतनी सुबह एयरपोर्ट की हालत मछली बाजार की हो जाती है, यहाँ मामला खाली खाली सा था। अगली फ्लाइट जिस  द्वार के पास  आने वाली थी,  उसी इलाके में हमने अपना कब्जा जमाया। बेल्जियम के एयरपोर्ट की तरह यहाँ भी लोग बड़े डील डौल वाले दिखे। ज्यादातर कर्मचारी काले कोट या ब्लेजर में, अपने अपने काम में मुस्तैद। हमारे साथ जो विदेशी उतरे थे वे अख़बार पढ़ने या लैपटाप में काम करने में जुट गए और हम छत्तीस घंटे के लगातार ट्रेन और विमान की यात्रा करने के बाद फ्रेश होने के जुगाड़ में। अब पहली समस्या पीने के पानी की थी। एयरपोर्ट सुरक्षा ने पानी की किसी भी बोतल को पहले ही रखवा लिया था। अपने मोबाइल पास के चार्जिंग प्वाइंट पर लगा के मैं अपने सहयात्रियों के साथ पानी की खोज़ में निकला।


पूरे अहाते का चक्कर लगाने पर दो तीन जगह ही पानी की बोतल नज़र आई। ये तो जानते थे कि यहाँ पानी मँहगा होगा पर पानी पीने के लिए बीस रुपये की जगह दो सौ रुपये देकर हमें अपनी यात्रा की शुरुआत करना गले नहीं उतर रहा था। अभी इसी उधेड़बुन में थे कि एक और भारतीय जोड़े ने बताया ये पानी नहीं सोडा वाटर है। ऐसी ठंडी जगह में लोग पानी की बजाए बीयर या अन्य कोटि की शराब से गला तर करते हैं तो ख़ालिस पानी को कौन पूछे?  

वियना और पूरा आस्ट्रिया बीयर के शौकीनों के लिए जाना जाता है। आपको जान कर ताज्जुब होगा कि आस्ट्रिया का एक बाशिंदा साल में औसतन सौ से ऊपर लीटर बीयर को हलक के अंदर कर लेता है। इस मामले में आस्ट्रिया सिर्फ चेक रिपब्लिक और जर्मनी से पीछे है। एयरपोर्ट पर अगर  तीन चार यूरो में आधा लीटर बीयर या एक लीटर पानी मिले तो फिर आख़िर आप क्या पीजिएगा :p ? बाद में जब लौटते समय वियना शहर में चहलकदमी की तो पाया कि सुपरमार्केट में आधी लीटर बीयर की बोतल एक यूरो से भी कम में आती है।

वियना में पानी से ज्यादा सुलभ बीयर है :)

वैसे विदेश आने के पहले दो बातों के लिए अपने आपको मानसिक रूप से तैयार कर लेना चाहिए। पहला तो टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल और दूसरे पीने के पानी के लिए अलग से नल लगे होने की अपेक्षा का त्याग। पानी के बारे में ये फंडा तो मुझे अपनी जापान यात्रा में मिल गया था यानि बाथरूम में आने वाले पानी को आप बड़े विश्वास से पीने के तौर पर प्रयोग कर सकते हैं। यही जवाब विदेशों में हर जगह मिलेगा जहाँ आप ऐसा प्रश्न करेंगे। 

एयरपोर्ट पर नान वेज पिज़्जा, बर्गर तो मिल ही रहे थे। शाकाहारियों के लिए तरह तरह के बन, मफिन (मीठे केक) और चीज़ टमाटर सैंडविच जैसे व्यंजन (जिसे Tomato Foccacia नाम दिया गया था) भी उपलब्ध थे। पर दिल्ली से हम खाने पीने का पूरा स्टॉक ले कर चले थे। वियना एयरपोर्ट पर पूड़ी सब्जी का मस्त भोग लगा कर हमने एयरपोर्ट पर बाकी का वक़्त विंडो शापिंग में गुजारने का निश्चय किया।

Sunday, November 6, 2016

छठ के रंग मेरे संग : क्या अनूठा है इस पर्व में? Chhath Puja 2016

भारत के आंचलिक पर्व त्योहारों में देश के पूर्वी राज्यों बिहार, झारखंड ओर  पूर्वी उत्तरप्रदेश में मनाया जाने वाले त्योहार छठ का विशिष्ट स्थान है। भारत के आलावा नेपाल के तराई इलाकों में भी  ये पर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। जिस तरह लोग पुष्कर मेले में शिरकत करने के लिए पुष्कर जाते हैं वहाँ की पवित्र झील में स्नान करते हैं, देव दीपावली में बनारस की जगमगाहट की ओर रुख करते हैं, बिहू के लिए गुवहाटी और ओनम के लिए एलेप्पी की राह पकड़ते हैं वैसे ही बिहारी संस्कृति के एक अद्भुत रूप को देखने के लिए छठ के समय पटना जरूर जाना चाहिए। 

छठ महापर्व पर आज ढलते सूर्य को पहला अर्घ्य देते भक्तगण

छठ एक सांस्कृतिक पर्व है जिसमें  घर परिवार की सुख समृद्धि के लिए व्रती सूर्य की उपासना करते हैं। एक सर्वव्यापी प्राकृतिक शक्ति होने के कारण सूर्य को आदि काल से पूजा जाता रहा है।   ॠगवेद में सूर्य की स्तुति में कई मंत्र हैं। दानवीर कर्ण सूर्य का कितना बड़ा उपासक था ये तो आप जानते ही हैं। किवंदतियाँ तो ये भी कहती हैं कि अज्ञातवास में द्रौपदी ने पांडवों की कुल परिवार की कुशलता के लिए वैसी ही पूजा अर्चना की थी जैसी अभी छठ में की जाती है।

छठ पर आम जन हर नदी पोखर पर उमड़ पड़ते हैं उल्लास के साथ

पर छठ में ऐसी निराली बात क्या है? पहली तो ये कि चार दिन के इस महापर्व में पंडित की कोई आवश्यकता नहीं। पूजा आपको ख़ुद करनी है और इस कठिन पूजा में सहायता के लिए नाते रिश्तेदारों से लेकर  पास पडोसी तक  शामिल हो जाते हैं।  यानि जो छठ नहीं करते वो भी व्रती की गतिविधियों में सहभागी बन कर उसका हिस्सा बन जाते हैं। छठ व्रत कोई भी कर सकता है। यही वज़ह है कि इस पर्व में महिलाओं के साथ पुरुष भी व्रती बने आपको नज़र आएँगे। भक्ति का आलम ये रहता है कि बिहार जैसे राज्य में इस पर्व के दौरान अपराध का स्तर सबसे कम हो जाता है। जिस रास्ते से व्रती घाट पर सूर्य को अर्घ्य देने जाते हैं वो रास्ता लोग मिल जुल कर साफ कर देते हैं और इस साफ सफाई में हर धर्म के लोग बराबर से हिस्सा लेते हैं।

महिलाओं के साथ कई पुरुष भी छठ का व्रत रखते हैं।
सूर्य की अराधना में चार दिन चलने वाले इस पर्व की शुरुआत दीपावली के ठीक चार दिन बाद से होती है। पर्व का पहला दिन नहाए खाए कहलाता है यानि इस दिन व्रती नहा धो और पूजा कर शुद्ध शाकाहारी भोजन करता है। पर्व के दौरान शुद्धता का विशेष ख्याल रखा जाता है। लहसुन प्याज का प्रयोग वर्जित है। चावल और लौकी मिश्रित चना दाल के इस भोजन में सेंधा नमक का प्रयोग होता है।  व्रती बाकी लोगों से अलग सोता है। अगली शाम तक उपवास फिर रोटी व गुड़ की खीर के भोजन से टूटता है और इसे खरना कहा जाता है। छठ की परंपराओं के अनुसार इस प्रसाद को लोगों को घर बुलाकर वितरित किया जाता है। इसे मिट्टी की चूल्हे और आम की लकड़ी में पकाया जाता है।

इसके बाद का निर्जला व्रत 36 घंटे का होता है। दीपावली के छठे दिन यानि इस त्योहार के तीसरे दिन डूबते हुए सूरज को अर्घ्य दिया जाता है और फिर अगली सुबह उगते हुए सूर्य को। अर्घ्य देने के पहले स्त्रियाँ और पुरुष पानी में सूर्य की आराधना करते हैं।  इस अर्घ्य के बाद ही व्रती अपना व्रत तोड़ पाता है और एक बार फिर प्रसाद वितरण से पर्व संपन्न हो जाता है । पर्व की प्रकृति ऐसी है कि घर के सारे सदस्य पर्व मनाने घर पर एक साथ इकठ्ठे हो जाते हैं।

Tuesday, November 1, 2016

यादें यूरोप कीः दिल्ली से वियना! Why travelling with Thomas Cook was not so smooth ?

परिवार और पिताजी के साथ यूरोप जाने का सपना मेरे मन में बहुत सालों से पल रहा था। कभी छुट्टियाँ तो कभी साथ चलने वालों की गैर मौज़ूदगी अड़चन डाल दे रही थी। अक्टूबर 2014 में मेरे एक मित्र ने भी वहाँ साथ चलने की इच्छा जताई। फिर क्या था लग गए इंटरनेट पर सारे विकल्प तलाशने। सारे मुख्य टूर आपरेटर से बात करने के बाद सत्रह दिनों के थॉमस कुक (Thomas Cook) के एक पैकेज पर दिल आया जिसमें पश्चिमी यूरोप के साथ पूर्वी यूरोप के देशों का सफ़र भी शामिल था। जाना तो मई 2015 में था पर बुकिंग दिसंबर में ही कर दी।

यूरोप की पहली झलक पाई हमने आस्ट्रिया की राजधानी वियना में..
मार्च में ब्रिटेन के वीज़ा की सारी औपचारिकताएँ भी पूरी हो गयीं। पर यहीं से हमारी मुश्किलों का दौर शुरु हो गया। मुझे बताया गया था कि यूके वीज़ा मिलने के बाद स्वतः शेंगेन वीज़ा ज़ारी करने की प्रक्रिया शुरु हो जाएगी। पर जब अप्रैल का महीना आ गया और थॉमस कुक से कोई जानकारी नहीं मिली तो हमने कोलकाता और राँची के उनके कार्यालयों से पूछताछ शुरु की। पता चला कि हमारा टूर "होल्ड" पर है। कारण ये कि हमारे समूह ने जिस टूर का विकल्प चुना था उसमें यथेष्ट संख्या में यात्री नहीं मिल रहे़ थे। बिना हमारी किसी गलती के इस पूरे प्रकरण का ख़ामियाजा  हमें ही भुगतना पड़ा। हमें कहा गया कि आप पाँच दिन आगे जाएँ तो आपको उस जैसे दूसरे पैकेज में फिट किया जा सकता है।

छः महीने पहले की बुकिंग का ये हश्र देख कर मन बहुत दुखी हुआ। छुट्टियाँ हम बदल नहीं सकते थे और बदलते भी तो हालैंड के ट्यूलिप गार्डन देखने का हमारा सपना अधूरा रह जाता। Travel Smooth की टैग लाइन रखने वाली थॉमस कुक का रवैया नितांत अव्यवसायिक रहा। नौ लोगों के तीन परिवार का आरंभिक आरक्षण करने में उन्होंने जो तत्परता दिखाई थी वो हमारे कार्यक्रम को यथावत बनाए रखने में या उसमें हमारी आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तन करने में बिल्कुल नहीं दिखी। बुकिंग करते समय उन्होंने ये नहीं बताया कि हमारा चुना हुआ पैकेज वो यात्री ना मिलने की स्थिति में बदल सकते हैं। अगर हमने ख़ुद से पूछताछ ना की होती तो शायद यात्रा के शायद शीघ्र पहले ही ये बम गिराते। एक एक मेल का जवाब पाने में हमें जाने कितने फोन कॉल्स करने पड़े। ख़ैर हम मन बना चुके थे कि जाना तो है ही तो हमारी यात्रा की तिथि से मिलता हुआ जो भी पैकेज मिला उसी में शामिल हो गए। ये पैकेज बारह दिनों का था। पैकेज़ म्यूनिख़ में ख़त्म होना था पर हमने अपनी वापसी तीन दिन बढ़ा कर बाकी के दिन आस्ट्रिया में बिताने का निश्चय किया।

राँची से लंदन तक का हमारा साथी रहा आस्ट्रियन !
ये सब अंतिम रूप में लाते लाते मई का पहला हफ्ता आ गया। अंत समय में दूसरे समूह के साथ जुड़ने की वज़ह से हमारी उड़ान के टिकट अलग हो गए। एयरपोर्ट पर पहुँच कर अपने समूह वाले होटल तक पहुँचना भी अब हमारे जिम्मे हो गया। हालत ये थी कि दिल्ली से अपनी उड़ान के एक दिन पहले तक हमें अपने टिकट, वाउचर आदि मिल रहे थे। मतलब थॉमस कुक ने इस यात्रा की शुरुआत से पहले हमारे समूह का तनाव बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

पर इतने ही से बात बन जाती तो क्या बात थी। मेरे संयम की कुछ परीक्षा ‌ऊपरवाले ने भी ले रखने की सोची थी। ग्यारह मई को रात हमें आस्ट्रियन एयरवेज़ की उड़ान से वियना होते हुए लंदन तक पहुँचना था। दस मई को मैंने राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली जाने का आरक्षण कराया था। शाम पाँच बजे राँची से चलकर ये ट्रेन सुबह दस बजे दिल्ली पहुँचती है। यानि हमारे पास बारह घंटे दिल्ली में आराम करने का समय था। पर जब राँची स्टेशन पहुँचे तो पता चला कि पाँच बजे चलने वाली ट्रेन छः घंटे विलंब से रात ग्यारह बजे चलेगी। ग्यारह बजे ट्रेन चल तो दी पर सुबह सात बजे तक मुगलसराय के दर्शन भी नहीं हुए थे। कानपुर पहुँचते पहुँचते ट्रेन ग्यारह घंटे लेट हो चुकी थी। यानि हमने जो भी मार्जिन सोचा था वो सब हवा हो गया था। 

राँची राजधानी से दिल्ली और फिर वियना हवाई अड्डे तक पहुँचने के बाद

अब हालत ये थी कि नई दिल्ली स्टेशन से उतरते ही टी 3 की और दौड़ लगानी थी। वो भी तब जब ट्रेन और विलंबित ना हो। हमारे साथ जाने वाले परिवार पहले ही दिल्ली पहुँच चुके थे पर कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार करने वाला ही साथनहीं चल सकेगा इस आशंका से वो भी तनावग्रस्त हो रहे थे। हर एक घंटे में गुजरने वाले स्टेशन की फोन पर जानकारी ली जा रही थी। दस बजे तक एयरपोर्ट तक पहुँचने की योजना थी और यहाँ हमारी ट्रेन ही साढ़े नौ के करीब दिल्ली पहुँची। सामान ले कर हम सीधे एयरपोर्ट भागे और सवा दस में टी 3 में दाखिल हुए। सुरक्षा और आप्रवासन जाँच समय के पहले पूरी होने पर जान में जान आई।

आस्ट्रिया के समय के अनुसार सुबह साढ़े छः के करीब हमें वियना में उतरना था। आस्ट्रियन एयरवेज की आठ घंटे की ये उड़ान बिना किसी और परेशानी के अच्छी मेहमानवाज़ी के साथ बीती। पाँच बजे ही परिचारिका ने एप्पल जूस पिला कर मेरी तंद्रा भंग कर दी थी। यूरोप की पहली झलक मेरे लिए अविस्मरणीय थी। उठती गिरती ढलानों के बीच करीने से जुते खेत खलिहान अगर आकाश की ऊँचाइयों से देखे जाएँ तो वे कितना खूबसूरत अहसास जगाते हैं मन में.. और इन लहराते खेतों के बीच पीले पीले फूल से लदे पेड़ों का एक घना जंगल आ जाए तो लगता है मानो धरा से एक कविता सी फूट रही हो। 

वियना के बाहर के अविस्मरणीय खेत खलिहान
आस्ट्रिया के इन प्रातःकालीन खूबसूरत दृश्यों को कभी यहाँ एक पूरी पोस्ट की शक़्ल दी थी। बहरहाल वियना के एयरपोर्ट पर कुछ घंटे गुजारने के बाद हमें लंदन के लिए दूसरा विमान पकड़ना था। यूरोप में गुजरे पहले दिन की दास्तान ले के आऊँगा इस श्रंखला की अगली कड़ी में.. 

 यूरोप यात्रा में अब तक
अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

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