Saturday, May 21, 2016

लैटलम कैनयन : जहाँ अचानक से खत्म हो जाती हैं खासी पहाड़ियाँ ! Laitlum Canyon, Shillong

मावलीनांग से शिलांग लौटने के बाद हमारे पास एक दिन और बचा था। मैंने शिलांग आने के पहले  इंटरनेट पर लैटलम कैनयन के बारे में पढ़ा था। वहाँ की खूबसूरत वादियों का जिक्र तो था ही, साथ ही ये हिदायत भी थी कि भीड़ भाड़ से दूर इस सुनसान इलाके में पहुँचना टेढ़ी खीर है इसलिए रास्ते के बारे में जानकर ही वहाँ जाएँ। प्राकृतिक सुंदरता मुझे हमेशा लुभाती रही है और लैटलम के एकांत में कुछ पल अपने को डुबाने की कल्पना मुझे उसकी तरफ़ खींच रही थी ।

पर सबसे बड़ी दिक्कत थी कि इस अनजाने से स्थान पर जाया कैसे जाए? जो जानकारी मुझे उपलब्ध थी उसके हिसाब से हमारा पहला लक्ष्य स्मित नाम का गाँव था। हमारी गाड़ी गुवहाटी की थी और हमें पक्का यकीन था कि हमारे चालक को लैटलम क्या स्मित के बारे में भी कोई जानकारी नहीं होगी। मैंने उसे खड़ी ढाल वाली संकरी घाटी के बारे में जब बताया तो उसने बड़े आत्मविश्वास से बताया कि उसे रास्ता पता है।

लैटलम दर्रा, नदी व छोटा सा गाँव !
ख़ैर हम लोग तब भी सशंकित थे पर शिलांग शहर के बाहर निकलने के बाद भी वो जब बेफ़िक्री  से गाड़ी चलाता रहा तो हमें लगा बंदे को पता ही होगा। पर मुझे चिंता तब होने लगी जब चलते चलते एक घंटे बीत गए और लैटलम का पता ठिकाना ही नहीं मिला। दस बजे के वक़्त भी रास्ता सुनसान ही था। इक्का दुक्का व्यक्ति जो दिखते भी वो हिंदी या अंग्रेजी समझ पाने में अपनी असमर्थता दिखाते  हमारे तनाव को बढ़ता देख ड्राइवर ने अचानक बगल की घाटी को दिखाते हुए कहा कि यही लैटलम है। मैंने कहा कि स्मित गाँव आया नहीं और रोड के किनारे से ही तुम्हें लैटलम दिख रहा है। हमारी खरी खोटी सुनने के बाद उसने माना कि रास्ते के बारे में उसे पता नहीं था। डार्इवर के हाथ खड़े करने के बाद हमने जी पी एस की मदद ली। पता चला हम लैटलम नहीं बल्कि सिलचर के मार्ग पर जा रहे हैं । स्मित गाँव का रास्ता तो काफी पहले ही छूट चुका है।

स्मित गाँव की ओर जाती सड़क Road to Smit Village
गाड़ी वापस घुमाई गई। जीपीएस के सहारे हम रुकते रुकते उस मोड़ तक पहुँचे जहाँ स्मित गाँव का रास्ता कटता था। गनीमत थी कि वहाँ उस गाँव के नाम का बोर्ड भी लगा था। स्मित गाँव का रास्ता बेहद मनोरम था। दूर दूर तक हरे भरे पठारी मैदान और उनके बीच उगे इक्का दुक्का पेड़। हल्की पठारी ढलानों पर बिछी दूब की इस चादर को देख थोड़ी देर पहले मन में व्याप्त कड़वाहट जाती रही। 

पर हमारी लैटलम की खोज अभी भी ख़त्म नहीं हुई थी। स्मित गाँव किसी भी हिसाब से हमें गाँव जैसा नहीं लगा। लगे भी तो कैसे सारे पक्के मकान और गाँव के केंद्र में इतनी बड़ी गोलाई में फैला विशाल चौराहा जो कि हमारी तरफ़ के छोटे  बड़े शहरों को भी मात दे दे। चौराहे पर मुंबई  की तरह ही काली पीली फिएट वाली टैक्सियाँ खड़ी थीं। हमें यहीं उतरकर  लैटलम का रास्ता पूछना था जो यहाँ से आठ दस किमी की दूरी पर था। हमारे सवाल पूछने पर एक टैक्सी ड्राइवर ने पाँच दस मिनट का सीधा रास्ता बताया और कहा कि दाँयी ओर देखते जाना। उधर ही से लैटलम के लिए एक  पतली सड़क मिलेगी

सब्जियों के लिए मशहूर मेघालय में गोभी के खेत Vegetable fields near Smit, Meghalaya

गाड़ी में बैठे हमारे समूह के प्रत्येक सदस्य को खिड़की से बाहर देखने का आदेश दे दिया गया कि जहाँ लैटलम का "L''  भी दिखे गाड़ी रुकवा दी जाए। हौले हौले हम उस डगर पर आगे बढ़े पर लैटलम ना मिलना था ना मिला। जब दस मिनट बीत गए तो अचानक मेरी  भांजी ने साइनबोर्ड Lait...पढ़ते हुए जोर से चीख मारी कि मिल गया.. मिल गया । आनन फानन में गाड़ी रुकवाई गई पर जब सबने साइनबोर्ड पूरा पढ़ा तो सबका हँसते हँसते बुरा हाल गया । साइनबोर्ड पर वास्तव में लिखा था Laitrine जाने का रास्ता। 

ख़ैर तब तक एक टैक्सी हमारे पीछे से आगे निकली। उसे हाथ देकर हमने अपनी व्यथा सुनाई। ड्राइवर ने हमारी परेशानी समझते हुए कहा कि आप हमारी गाड़ी के पीछे पीछे चलिए। एक मोड़ पर आकर हमें दाहिने मुड़ने का इशारा कर वो  सीधे चला गया। दाहिने वाले रास्ता तो और भी सुनसान था। लोगों का संयम भी अब खत्म हो रहा था।  सवाल उठने लगे कि वास्तव में लैटलम कोई जगह भी है या मनीष हमें यूँ ही कुछ उल्टा सीधा पढ़कर बेवज़ह  घुमा रहा है ।

पहाड़ के सिरे पर हम सब At the edge of the plateau

Wednesday, May 11, 2016

मावलीनांग : एशिया के सबसे साफ सुथरे गाँव का तमगा पाकर क्या खोया है इस गाँव ने? Mawlynnong, Meghalaya

जब पहले पहल मैंने मेघालय जाने का कार्यक्रम बनाया था तो मावलीनांग के बारे में मैं जानता भी नहीं था। कोलकाता में अपने एक रिश्तेदार के यहाँ जब मेघालय जाने की चर्चा चली तो वहाँ इस गाँव और इसकी विशेषता के बारे में पता चला। जिस देश में स्वच्छता अभियान चलाने के लिए सरकार रोज़ अपने नागरिकों से अनुनय विनय करती दिखती है वहीं के एक गाँव को एक दशक से ज्यादा पहले एशिया के सबसे साफ सुथरे गाँव के खिताब से नवाज़ा गया हो ये निश्चय ही मेरे लिए कौतूहल का विषय था।

On Way to Mawlynnong... मावलीनांग के रास्ते में..
शिलांग यात्रा को अंतिम रूप देने के पहले मैंने मावलीनांग के लिए भी एक दिन मुकर्रर कर दिया। बड़ी उत्सुकता थी ये जानने की कि उत्तर पूर्व के ग्रामीण इलाके का जीवन  कैसा होगा ? वैसे भी अब तो अपने गाँव जाना कहाँ हो पाता है और ये तो एक पुरस्कृत गाँव था। 

सुबह नाश्ते के बाद हमारा काफ़िला मावलीनांग की राह पर था। अक्टूबर महीने का पहला हफ्ता था और धूप भी खिली हुई थी। शिलांग से चेरापूंजी मार्ग की तरह ये सड़क भी हरी भरी पहाड़ियों से हो कर गुजर रही थी। पहाड़ियों के सघन जंगल के बीच बीच से झरनों की सफेद लकीरें यदा कदा उभर ही आती थीं।

घाटी, झरने, हरियाली.. मेघालय की रुत मतवाली
रास्ते में सोहरा घाटी के ऊपर बना एक व्यू प्वाइंट मिला। क्या नज़ारा था! दूर दूर तक हरीतिमा की चादर बिछी दिखाई देती थी। इन चादरों को बेधने का काम भूरी लाल  मिट्टी की ठसक के साथ सर्पीली पगडंडियाँ कर रही थीं। दूर दराज़ में छोटे मोटे गाँव भी दिख रहे  थे। खपरैल की जगह तिकोनी आकार वाली टीन की छतें यहाँ के घरों की पहचान थीं । पर व्यू प्वाइंट से जितना सुंदर दृश्य दिख रहा था उतने ही सुंदर और विशालकाय मच्छर हमारे ताजे ख़ून के प्यासे हो रहे थे। जो भी कोई वहाँ खड़ा होता, दो तीन तसवीरें खींचने के बाद ताली मारता दिखाई पड़ता था। मच्छरों को हाँकते हुए कुछ देर हमने अपने पास के अलौकिक दृश्यों का आनंद उठाया और फिर अपने गन्तव्य की ओर बढ़ चले।

Sohra Valley सोहरा घाटी : गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा, आ के यहाँ रे

Tuesday, May 3, 2016

मुसाफ़िर हूँ यारों की आठवीं सालगिरह एक नए पते पर.. 8th Blog Anniversary !

मुसाफ़िर हूँ यारों का आठवीं सालगिरह पिछले हफ्ते पूरी हुई। नवें साल की शुरुआत में नया बस ये कि अब ये ब्लॉग अपने ख़ुद के डोमेन यानि www.travelwithmanish.blogspot.com से हटकर www.travelwithmanish.com पर चला आया है। हालांकि अभी आप इसके पुराने पते को क्लिक करेंगे तो भी आपको वो नए पते पर ख़ुद ही ले आएगा।


यात्रा जगत में ये बात धड़ल्ले से कही जाती है कि अगर आपके पास खुद का डोमेन हो तो लोग मानते हैं कि आप ब्लॉगिंग को गंभीरता से लेते हैं। ये बात कुछ लोगों के लिए सही हो सकती है पर कितने ही हिंदी या अंग्रेजी में लिखने वाले ब्लॉगर जो वर्डप्रेस या ब्लॉगस्पाट पर हैं, डोमेन वालों से भी बेहतर लिखते हैं।फिर भी अपेक्षाकृत छोटा पता दिखने में एक लंबे पते से बेहतर तो लगता है।

ख़ैर मैंने तो शुरु से इस विधा को गंभीरता से लिया है और तभी तो आठ सालों से यहाँ से हिलने का नाम नहीं लिया। हिंदी में जब मैंने यात्रा आधारित ब्लॉगिंग शुरु की थी तब इस विषय को केंद्र में रखकर ब्लॉग बनाना हिंदी में एक नयी नवेली अवधारणा थी।  मुसाफ़िर हूँ यारों की लोकप्रियता बढ़ी तो इसी नाम से या फिर इससे मिलते जुलते कई कुछ और ब्लॉग रचे गए और उनमें से कुछ ने अपना अलग मुकाम हासिल किया है। विगत तीन चार साल में हिंदी ट्रैवेल ब्लॉगिंग में महिलाओं की सहभागिता बढ़ी है और उन्होंने पूरे मन और मेहनत से इस विधा को अपनाया  है। नए ब्लॉगरों को तो मैं यही सलाह देना चाहूँगा कि यहाँ आप तभी सफल होंगे जब आप लेखन की अपनी विशिष्ट शैली विकसित करें जो आपकी पहचान बन जाए।

हिंदी में यात्रा ब्लागिंग में चुनौतियाँ वही हैं जो चार साल पहले ऐसी ही एक पोस्ट में मैंने कहने की कोशिश की थी। आज फिर वहीं दोहरा रहा हूँ क्यूँकि आज भी वो उतनी ही  सामयिक हैं..

"..सवाल है कि यात्रा लेखन हिंदी में क्यूँ किया जाए? सीधे सीधे आकलन किया जाए तो एक ब्लॉगर के लिए अंग्रेजी में यात्रा लेखन करना ज्यादा फ़ायदेमंद है। अगर आप अंग्रेजी में स्तरीय यात्रा लेखन करते हैं तो ना केवल देश बल्कि विदेशों के पाठक भी आप के ब्लॉग तक पहुँचते हैं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात ये है कि अंग्रेजी आभिजात्य वर्ग की भाषा है। इस भाषा को जानने वाले पाठकों की क्रय शक्ति हिंदी के आम पाठकों की तुलना में ज्यादा है। लाज़िमी है कि यात्रा से जुड़ी सेवाएँ प्रदान करने वाली कंपनियाँ ऐसे ब्लॉगों के साथ व्यावसायिक रूप से जुड़ने में ज्यादा रुचि दिखाएँगी।

हिंदी ब्लागों में एडसेंस का समावेश पिछले साल से ही हुआ है। पर उससे होने वाली आमदनी आपके नेट पर किए गए खर्चे को पूरा कर दे तो गनीमत है। इसीलिए अगर आपका यात्रा ब्लॉग लिखने का उद्देश्य विशुद्ध रूप से व्यावसायिक है तो हिंदी लेखन से वो उद्देश्य निकट भविष्य में पूरा होने से रहा। पर क्या हम सब यहाँ पैसों ले लिए अपना समय ख़पा रहे हैं? नहीं, कम से कम मेरा तो ये प्राथमिक उद्देश्य कभी नहीं रहा। आज भी इस देश में हिंदी पढ़ने और बोलने वालों की तादाद अंग्रेजी की तुलना में कहीं अधिक है। जैसे जैसे समाज के आम वर्ग तक इंटरनेट की पहुँच बढ़ रही है हिंदी में सामग्री ढूँढने वालों की संख्या भी बढ़ेगी। क्या हमारा दायित्व ये नहीं कि ऐसे लोगों को हिंदी में स्तरीय जानकारी उपलब्ध कराएँ जैसी कि अंग्रेजी में आसानी से सुलभ है।.."

फिलहाल तो मैं आपको मेघालय की यात्रा करा ही रहा हूँ। अपनी यूरोप यात्रा के सिलसिले को शुरु करना तो अभी बाकी है और जब तक उस सफ़र के बारे में लिख पाऊँगा कुछ और राहें तय हो चुकी होंगी। 


जिन लोगों को तसवीरों से मोहब्बत लिखे शब्दों से ज्यादा रही है उनको ये बता दूँ कि आप मेरी पसंदीदा चित्रों से इंस्टाग्राम (जो कि मोबाइल से तुरत फुरत फोटो साझा करने का माध्यम है) से यहाँ मिल सकते हैं



वक़्त के साथ स्मार्ट फोन्स ना केवल हमारी जरूरत बन गए हैं बल्कि नेट देखने के लिए भी खासे इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। हिंदी में आजकल ऐसे एप आ रहे हैं जो ख़बरों के साथ सिनेमा, यात्रा, खान पान के बारे में लिखे जा रहे अच्छे लेखों को इकठ्ठा कर आप तक पहुँचाते हैं। मुसाफ़िर हूँ यारों न्यूज हंट से जुड़ने वाला पहला हिंदी यात्रा ब्लॉग था। नवें साल में आप मुसाफ़िर हूँ यारों को ऐसी कई और एप्लिकेशन से जुड़ता देख सकते हैं।

चलते चलते इस ब्लॉग का वर्षों साथ निभाने वाले पाठकों का हार्दिक आभार ! जो लोग इसे ई मेल, नेटवर्क ब्लॉग, फेसबुक पेज व ट्विटर के ज़रिये पढ़ते रहे हैं उनसे मेरा यही अनुरोध है कि अपने विचारों को यहाँ, जवाबी ई मेल या फेसबुक पेज पर रखें ताकि आप की भावनाओं से मैं अवगत हो सकूँ। ये आपकी मोहब्बत का नतीजा है कि मैं उसी उत्साह से आपके सामने अपनी यात्राओं के अनुभवों को आपसे बाँटता रहा हूँ। आशा है ये प्रेम आप यूँ ही बनाए रखेंगे।

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