Wednesday, September 27, 2017

फ्रांस से अब चलते हैं स्विट्जरलैंड की ओर.. Road trip from Paris to Zurich

पिछले महीने आपको अपने ब्लॉग पर मैंने पेरिस की यात्रा करवाई और वहाँ से निकलते वक़्त मैंने लिखा था कि अब आपकी मुलाकात कराऊँगा यूरोप के एक ऐसे देश से जो निहायत ही खूबसूरत है। ये देश है स्विट्ज़रलैंड का। 40000 वर्ग किमी से कुछ ही ज्यादा ही इस देश का क्षेत्रफल, पर इसके ज़र्रे ज़र्रे में खूबसूरती बिखरी पड़ी है। कहने का मतलब ये कि ये एक ऐसा देश है जहाँ आँखों को तृप्त करने के लिए बिना किसी मंजिल के निकल पड़ना ही काफ़ी है । 

पेरिस से स्विट्ज़रलैंड की सीमा करीब 600 किमी की दूरी पर है। पेरिस के खेत खलिहानों और मैदानों से उलट स्विट्ज़रलैंड में घुसते ही पहाड़ियों, झीलों, चारागाहों और उनमें बसे छोटे छोटे गाँव का जो सिलसिला शुरु होता है वो थमने का नाम नहीं लेता। आठ घंटों की इस सड़क यात्रा में चलते चलते जो नज़ारे बस की खिड़की से दिखे उनमें से कुछ को क़ैद कर आपके सामने लाने की कोशिश है मेरी ये पोस्ट..
फ्रांस स्विट्ज़रलैंड की सीमा पर एक प्राचीन महल

गोरी तेरा गाँव प्यारा मैं तो गया मारा आ के यहाँ रे..

जुते और बोए हुए खेतों के बीच से निकलती सड़क मन को हर गयी


Saturday, September 9, 2017

झारखंड का सबसे ऊँचा और दुर्गम जलप्रपात लोध ! Highest waterfall of Jharkhand : Lodh Waterfalls

बरसों पहले किसी स्थानीय मित्र ने एक ऐसे जलप्रपात के बारे में बताया था जिसकी आवाज़ घने जंगलों के बीच से कई किमी पहले से सुनी जा सकती है। पलामू जिला तब नक्सलियों का गढ़ माना जाता था। सड़कों का जाल भी झारखंड में तब इतना विस्तृत नहीं हुआ था। इसलिए वहाँ जाने का विचार मन में तब बैठ नहीं पाया था। बात आई गयी हो गयी और उस अनजान इलाके का रहस्य मेरे लिए रहस्य ही बना रहा।

बहुत दिनों बाद मैं उस झरने का नाम जान सका। साथ ये भी कि जंगलों के भीतर स्थित लोध जलप्रपात झारखंड का सबसे ऊँचा जलप्रपात है। झारखंड में यूँ तो कई जलप्रपात हैं पर इनमें से ज्यादातर राँची के आस पास ही हैं। हुँडरु, दशम, जोन्हा, सीता और हिरणी राँची से साठ किमी की त्रिज्या के अंदर ही आते हैं। पर उस वक़्त क्या आज भी राँची से दौ सौ किमी दूर स्थित ये निर्झर झारखंड और खासकर राँची के लोगों के लिए इक अबूझ पहेली ही है क्यूँकि उस इलाके के साथ नक्सली गतिविधियों का जो पुराना इतिहास रहा है वो अभी मिट नहीं सका है। हालत ये है कि आज भी नेतरहाट और उसके आस पास के इलाकों में जितने लोग पहुँचते हैं उनमें अधिकांश बंगाल से होते हैं।  

मस्ती का है ये समा : लोध जलप्रपात
साल दर साल टलते टलते आख़िरकार नेतरहाट का कार्यक्रम बना तो मैंने  निश्चय कर लिया कि चाहे मौसम जैसा रहे नेतरहाट के साथ साथ इस झरने के अट्टाहस को इस बार सुन कर आना है। राँची से नेतरहाट की अपनी यात्रा और वहाँ के प्रवास के बारे में तों मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ। सुबह की बारिश का आनंद लेने  के बाद करीब दस बजे जब हम नेतरहाट से निकले तो पहला झटका हमारे होटल  प्रबंधक ने दिया। उसने कहा कि बारिश के मौसम में आपकी गाड़ी महुआडांड़ तक ही जा पाएगी। वहाँ से लोध तक का रास्ता सही नहीं है क्यूँकि अभी तक सड़क ठीक से बनी नहीं है। इसलिए आप वहाँ से सूमो या महिंद्रा जैसी गाड़ी ले लीजिएगा।  इस सूचना के लिए हम मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। फिर भी निर्णय लिया गया कि पहले महुआडांड़ तो पहुँचा जाए फिर वहाँ लोगों से पूछ कर आगे का सफ़र तय किया जाएगा।


पर मन में जो चिंताएँ तैर रही थीं वो बाहर निखर आई धूप और खूबसूरत रास्ते की वज़ह से जाती रहीं। नेतरहाट से महुआडांड़ की दूरी चालीस किमी से थोड़ी ज्यादा होगी। सफ़र का पहला हिस्सा नेतरहाट के जंगलों के बीच से गुजरता है और फिर अचानक से घने जंगल साथ छोड़ देते हैं और दिखती हैं मानसूनी हरी भरी वादियाँ। कहीं चारागाह तो कहीं धान और मक्के के खेत, रास्ते में छोटे छोटे गाँव और उनसे निकलती सड़कों पर साइकिल या फिर पैदल चलते लोग।

समा..समा है सुहाना अकेले तुम हो अकेले हम हैं
ऐसी ही इक प्यारी सी जगह पर सड़क के किनारे हमने अपनी गाड़ी खड़ी की और प्रकृति के इस अद्भुत मंज़र को कुछ देर तक अपलक निहारते रहे । दूर दूर तक ना कोई गाड़ी आ जा रही थी और ना ही लोग। ऐसे लग रहा था मानो धरा के इस सुंदर से टुकड़े की मिल्कियत अपनी हो। ये एक  विरोधाभास ही है कि इतने खूबसूरत अंचल को झारखंड के सबसे गरीब इलाकों में गिना जाता है।

सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं, हमें डर है हम खो ना जाए कहीं
अगर इस इलाके का इतिहास को  खँगालें तो पाएँगे कि पलामू जिले पर खारवार जनजाति और गुमला जिले पर मुंडा राजा का वर्चस्व था। इसके आलावा उराँव, बिरहोर और असुर जनजाति के लोग भी यहाँ निवास करते थे। मुगल से ले के अंग्रेजों के ज़माने तक आम किसान यहाँ के जमींदारों और महाजनों की वसूली से त्रस्त रहे। 

वैसे तो इस इलाके से शंख और उत्तरी कोयल नदी बहती हैं पर गर्मी के दिनों में ये लगभग सूख जाती हैं। आज भी यहाँ की मिट्टी बहुत उपजाऊ ना होने और सिंचाई  के लिए मानसून पर निर्भर रहने की वज़ह से यहाँ के बाशिंदों का खेती से गुजारा चला पाना मुश्किल है। इसलिए यहाँ के लोग जंगल के उत्पादों और मुर्गी, बकरी और सूअर पालन कर अपनी ज़िंदगी बसर करते हैं।
महुआडांड़ लोध मार्ग
महुआडांड़ के कस्बे के आस पास पहली बार आबादी दिखनी शुरु हुई। हम चौराहे के किनारे रुके और लोगों से लोध के रास्ते का हाल पूछना शुरु किया। लोगों ने कहा कि वहाँ तक कच्ची पक्की सी सड़क तो है पर इस गाड़ी में वहाँ जाने में थोड़ा ख़तरा तो है। मन में शंका का बीज पड़ चुका था तो फिर आगे का सफ़र वहाँ खड़ी महिंद्रा से पूरा किया गया। अंतिम बीस किमी की इस यात्रा में आने जाने का खर्चा रास्ते के हिसाब से सात आठ सौ से ज्यादा नहीं होने चाहिए था पर हमारी बात हजार रुपये में बन पाई। लोध से लौटने पर लगा कि हमारा गाड़ी करने का निर्णय सही ही था।

महुआडांड़ लोध मार्ग
हमारी गाड़ी में मुस्लिम चालक ने हमसे पूछ कर अपने एक रिश्तेदार को भी बैठा लिया। उनसे रास्ते भर बात होती रही। पता चला कि वो आलू के व्यापारी हैं और महुआडांड़ से खरीद कर आलू  वो पलामू जिले के मुख्यालय डाल्टेनगंज में बेचते हैं। जब मैंने मकई के खेतों के बारे में उनसे सवाल किया तो उन्होंने बताया कि पहले मकई की रोटी यहाँ के आहार का हिस्सा होती थी पर अब उसका इस्तेमाल मवेशियों के चारे में ज्यादा होता है।
महुआडांड़ लोध मार्ग
बहरहाल अब आगे का रास्ता ऐसा था कि मेरी उन सज्जन से बातचीत एकदम से बंद हो गई। कहीं तो अचानक  से ढलान आ जाती थी तो कहीं कीचड़ से सनी सड़क को काटते हुए गुजरना पड़ता था । अब मानसून का मौसम था तो छोटी मोटी नदी ने भी अपने जौहर दिखाने शुरु कर दिए थे।

जब नदी सड़क ही लील जाए
नदी के ऊपर बनी पुलिया पानी के थपेड़ों से लहुलुहान पड़ी थी। लिहाजा गाड़ी पानी में भी उतारनी पड़ी। नदी पार करते हम गहरे जंगल में घुसने लगे और वहीं से गिरते पानी की झंकार सुनाई देने लगी। अब सड़क के नाम पर छोटे बड़े पत्थर ही बचे थे। कुछ ही पलों में हम उस जगह पर थे जहाँ से अगले सौ मीटर की दूरी पैदल तय करनी थी। 


लो अब तो झरने की आवाज़ भी आने लगी

इससे पहले हम अपनी  चढ़ाई शुरु करते पहाड़ के ऊपर से गिरते  झरने का पहला दृश्य हमें रोमांचित कर गया। लोध जलप्रपात छत्तीसगढ़ और झारखंड की सीमा पर स्थित है।  छत्तीसगढ़ की ओर से घने जंगलों के बीच से आने वाली  बूढ़ा नदी के नीचे गिरने से इस प्रपात का निर्माण होता है। पहाड़ के ऊपर से पानी नीचे आते वक्त तीन मुख्य धाराओं में विभक्त हो जाता है। दो धाराएँ तो बाद में मिल भी जाती हैं जबकी तीसरी कुछ दूर जाकर गिरती है।

झारखंड का सबसे ऊँचा जलप्रपात लोध
143 मीटर ऊँचा ये झरना कई चरणों में नीचे गिरता है। बूढ़ा नदी से उत्पन्न होने के कारण इसे बूढ़ा घाघ जलप्रपात के नाम से भी जाना जाता है।

तीन मुख्य धाराओं में बँटकर गिरता है ये जलप्रपात


दोपहर की धूप तीखी थी पर झरने के ठीक सामने बैठने से जो फुहारें चेहरे पर पड़ रही थीं वो तन मन शीतल कर दे रही थीं। कुछ देर हम यूं ही आनंदित होते रहे।  


एक बार आप झरने के सामने आ गए तो ऊपर जाने का कोई अलग से रास्ता नहीं है। मतलब ये कि अगर लोध के मुख की ओर जाना चाहें तो आपको चट्टानों पर चढ़ने लाएक मजबूत घुटने और जूतों में  अच्छी पकड़ होनी जरूरी है।
लोध की एक धारा
पहली बाधा पार करने में तो मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई पर  झरने की दूसरी मंजिल से तीसरी मंजिल चढ़ने में पसीने छूट गए। बरसात की फिसलन का ध्यान रखते हुए मैंने और ऊपर जाने का जोख़िम नहीं लिया। मेरे मित्र थोड़ा और ऊपर जा सके पर आगे का मार्ग और दुर्गम निकला सो वो भी कुछ देर में नीचे लौट आए। 

ऍसी वादियों में बिछने का मन क्यूँ ना करे?
पानी की धारा को पकड़ने की हमारी कोशिश में हम पसीने से तरबतर हो चुके थे और मुँह अलग से लाल हो चुका  था। अब इस अवस्था से निज़ात पाने का आसान सा तरीका था पानी में डुबकी लगाना। फिर क्या थासही जगह देख के झरने के निर्मल शीतल जल में हम बारी बारी से कूद पड़े।
लोध में छप छपा छईं..
पानी के स्पर्श से पूरे शरीर को जो ठंडक और सुकून मिला उसे हमारे चेहरे की खुशी ही बयाँ कर सकती है। दो घंटे की मस्ती के बाद हम वापस महुआडांड़ पहुँचे। शाम के समय हम वापसी की राह नेतरहाट की घुमावदार घाटी से तय नहीं करना चाहते थे। वहाँ लोगों ने हमें डुमरी के रास्ते  से लौटने को कहा। ये रास्ता और भी सुनसान पर बेहद खूबसूरत था और डुमरी, चैनपुर होते हुए मुख्य राजमार्ग से जा मिलता था।

राँची - घाघरा -नेतरहाट - लोध - डुमरी - गुमला - राँची : ये था हमारा रास्ता !

डुमरी के पास ही इस इलाके की शंख नदी प्रवाहित होती है और राउरकेला के वेद व्यास में जाकर ब्राह्मणी और दक्षिणी कोयल के साथ संगम बनाती है। 

बारिश में उफनती शंख नदी
पन्द्रह अगस्त की उस शाम को इलाके के हर छोटे बड़े गाँव में जश्न का माहौल था। हर जगह इस दिन फुटबाल की प्रतिस्पर्धा का आयोजन था। लड़के और लड़कियाँ बढ़ चढ़ कर इस आयोजन में हिस्सा ले रहे थे । मैदान के चारों ओर आम जनता मेले की भांति भीड़ में खड़ी दिखी। हँसी तो तब आई जब मैंने प्रतियोगिता के दौरान होती उद्घोषणा में इनाम की बात सुनी। तो बताइए क्या इनाम रखा था सरकार ने..  बोले तो  आयोजकों ने  😄? जीतने वालों को दो खसी और हारने वाले को एक। हाँ जो इस इलाके की भाषा से परिचित ना हों उन्हें बता दूँ कि खसी का अर्थ बकरा होता है।

आजादी का जश्न
हमें बाद में पता चला कि ये इलाका भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शुमार होता है और इधर से शहरी आदिवासी तक गुजरने से कतराते हैं। मुझे ये जानने के बाद अग्रेजी की वो कहावत याद आ गयी कि Ignorance is a bliss. अगर हमे ये पता होता कि ये रास्ता इतना ख़तरनाक है तो हम इसकी ओर रुख ही नहीं करते और झारखंड की ग्रामीण संस्कृति को पास से देखने का सुनहरा मौका खो देते। बहरहाल जहाँ रास्तों  में इक्का दुक्का बस और आटो के आलावा निजी वाहन ना चलते हों वहाँ हमारी नेक्सा थोड़े कौतूहल का विषय तो थी। लिहाजा तीन बार हमारी गाड़ी को रोका गया। पहली बार इन बच्चों के द्वारा जो ना जाने कहाँ से सामने आ गए और हमारी गाड़ी को घेर पूरी लय में गाजे बाजे के साथ गाने लगे। ना उन्होंने रास्ता दिया ना कुछ माँगा। ख़ैर दस रुपये का नोट उन्हें हटाने में सफल रहा। इस घटना की एक बार पुनरावृति और हुई पर पीछे का अनुभव काम आया।

ये डगर स्मृतियों में हमेशा रहेगी
रात साढ़े आठ बजे तक वापस राँची पहुंच चुके थे।कुल मिलाकर झारखंड के अंदरुनी इलाकों की हमारी ये यात्रा बेहद आनंददायक और रोमांचकारी साबित हुई।  तो चलते चलते आपको लोध का उस जगह से लिया अपना वीडियो दिखा दूँ जहाँ से मुझे इसकी पहली झलक मिली थी।

 

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