Thursday, December 21, 2017

लूसर्न : जहाँ एक मरणासन्न शेर करता है आपका इंतज़ार ! Lucerne, Switzerland

इंटरलाकन से मध्य स्विट्ज़रलैंड के शहर लूसर्न की दूरी महज 70 किमी है। जिस तरह युंगफ्राओ तक कूच करने के लिए लोग इंटरलाकन आते हैं उसी तरह माउंट टिटलिस की चोटी तक पहुँचने के लिए उसके पास बसे शहर लूसर्न को आधार बनाया जा सकता है। इंटरलाकन की तरह लूसर्न कोई छोटा सा शहर नहीं है। आबादी के लिहाज से ये स्विटज़रलैंड के सातवें सबसे बड़े शहर में शुमार होता है।

स्विट्ज़रलैंड के प्रतीक चिन्ह के साथ लूसर्न के बाजार में लगी गाय की एक प्रतिमा जो कि वहाँ के हर शहर का एक चिरपरिचित मंज़र है।

लूसर्न शहर का नाम यहाँ स्थित इसी नाम की झील की वज़ह से पड़ा है। इसी झील से ही रोस नदी निकलती है जो कि शहर के बड़े इलाके से होकर गुजरती है। झील के ही पास हमारे समूह को बस उतार कर चली गयी. सुबह के दस बजने वाले थे पर मुख्य चौराहों को छोड़ दें तो सड़कों पर भीड़ ज्यादा नहीं थी । पाँच दस मिनट की पैदल यात्रा में हम यहाँ के सुप्रसिद्ध लॉयन मानूमेंट के पास पहुँच गए।

लूसर्न झील

शेर को मूर्तियों में आपने गरजते हुए ही देखा होगा। पर पर यहाँ तो शेर के शरीर में शमशीर बिंधी है। लूसर्न का ये शेर निढाल होकर अपनी मृत्यु शैया पर पड़ा है।  आख़िर डेनमार्क के शिल्पकार  Bertel Thorvaldsen ने शेर का ऐसा निरूपण क्यूँ किया? ये जानने के लिए आपको इतिहास के पन्ने उलटने पड़ेंगे। पेरिस की यात्रा के दौरान मैंने आपको 1789 में हुई फ्रांस की क्रांति के बारे में बताया था। उस ज़माने में फ्रांस की गद्दी पर लुइस XVI का शासन था। 

सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ से ही फ्रांस के सम्राट की सुरक्षा का दायित्व एक स्विस रेजिमेंट सँभालती थी। क्रांतिकारियों ने जब राजा के महल पर हमला किया तो उनका सामना इसी स्विस रेजीमेंट से हुआ। रेजीमेंट के पास तब पर्याप्त गोला बारूद नहीं था और क्रांतिकारियों की तादाद भी ज्यादा थी सो वो ज्यादा देर मुकाबला नहीं कर सके। आधे घंटे की लड़ाई के बाद राजा का उन्हें अपने बैरक में लौट जाने का संकेत मिला पर तब तक वो शत्रुओं से घिर गए थे। युद्ध में तो स्विस जवान हताहत हुए ही, कई आत्मसमर्पण करने वाले बंदियों की भी हत्या कर दी गयी। करीब 600 स्विस गार्ड्स को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।


इसी रेजीमेंट के एक साहब ने जो उस दौरान छुट्टी पर था, एक यादगार बनाने के लिए धन इकठ्ठा करना शुरु किया। और उसका सपना 1821 में जाकर साकार हुआ। स्पष्ट है कि शिल्पकार ने स्विस रेजिमेंट के जवानों के लिए घायल शेर के प्रतीक का चुनाव किया। अगर आप शिल्प को पास से देखेंगे तो पाएँगे कि शेर की बगल में एक ढाल है जिसमें स्विट्ज़रलैंड का प्रतीक चिन्ह है और उसके पंजे के नीचे एक और ढाल है जिस पर फ्रांस की राजशाही का प्रतीक चिन्ह मौजूद है। प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने अपनी किताब A tramp abroad  में इस शिल्प का जिक्र करते हुए लिखा है

"इसके चारों ओर हरे भरे पेड़ और घास है। ये जगह शहर के भीड़ भड़क्के से दूर बनी एक आश्रयस्थली सी नज़र आती है और ये सही भी है। शेर वास्तव में ऐसी ही जगहों में प्राण त्यागते हैं ना कि किसी चौराहे पर बने ग्रेनाइट चबूतरे और उसको घेरती सुंदर रेलिंग के बीच। ये शेर कही भी शानदार लगेगा पर उससे ज्यादा शानदार नहीं जिस जगह पर आज वो लगता है।"
लॉयन मानूमेंट

लॉयन मानूमेंट के साथ लूसर्न शहर को सबसे अधिक जाना जाता है यहाँ के चैपल ब्रिज के लिए। चौदहवीं शताब्दी में बनाया लकड़ी का ये पुल दौ सौ से ज्यादा मीटर लंबा है। उस समय इसे रोस नदी के ऊपर शहर के पुराने हिस्से को नए हिस्से से मिलाने के लिए बनाया गया था।

चैपल ब्रिज और वाटर टावर
पैदल पार होने वाले इस पुल की दो खासियत हैं. पहली तो ये कि ऊपर एसे ढका हुआ सेतु है और दूसरी ये कि इसके ढलावदार छत और खंभों के तिकोन के बीच सत्रहवी शताब्दी में बनी चित्रकला सजी है। दुर्भाग्यवश 1993 में लगी आग की वज़ह से इनमें से अधिकांश चित्र नष्ट हो गए पर उनमें से कुछ का पुनर्उद्धार किया जा सका है। इन चित्रों में लूसर्न के इतिहास से जुड़ी घटनाओं का रूपांकन है। 

चैपल ब्रिज पर बनी सत्रहवीं शताब्दी की चित्रकला

इस पुल के ठीक सटे लगभग तीस मीटर ऊँचा एक स्तंभ है जिसे पानी पर बना होने की वजह से वाटर टॉवर नाम दिया गया है। ये टॉवर पुल से भी तीस वर्ष पुराना है। फिलहाल तो इस टॉवर में प्रवेश निषेध है पर एक ज़माने में इसका प्रयोग बतौर जेल और प्रताड़ना केंद्र भी किया जाता था। आज ये लूसर्न ही नहीं वरन पूरे स्विटज़रलैंड के प्रतीक के रूप में विख्यात है। स्विट्ज़रलैंड में बने चाकलेट्स के कवर पर आप इस टॉवर को देख सकते हैं।


इस पुल पर चहलकदमी करते हुए हम रोस नदी की दूसरी तरफ आ गए। पुल के दोनों ओर थोड़े थोड़े अंतराल पर बड़े बड़े आयताकार गमले लगे हैं जिनमें खिले रंग बिरंगे फूल पुल की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं।

चैपल ब्रिज


लूसर्न की आबादी में बहुसंख्यक कैथलिक समुदाय है और उनका  मुख्य चर्च है Saint Leodegar का।  आठवीं शताब्दी में बने इस चर्च को सोलहवीं शताब्दी में लगी आग की वजह से काफी क्षति उठानी पड़ी। आप झील के किसी ओर भी चहलकदमी करें, आसमान में दूर से दिखती इसकी नुकीली छतों को नज़रअंदाज नहीं कर पाएँगे।

Saint Leodegar church

यूरोप के अन्य शहरों की तरह यहाँ भी ट्राम का बोलबाला है। वैसे चैपल ब्रिज से कुछ ही दूर पर यहाँ का रेलवे स्टेशन भी है जहाँ से आपको स्विट्ज़रलैंड के अन्य शहरों के लिए आसानी से ट्रेन मिल जाएँगी। 

लूसर्न  रेलवे स्टेशन

स्टेशन के बगल से जाती सड़क पर चहलकदमी करते हुए हम झील के दूसरे सिरे पर पहुँचे। झील के पार्श्व में लूसर्न शहर  पर दूर से नज़र रखती हुई एल्प्स की Pilatus चोटी बादलों की ओट से झाँक रही थी । आपको आश्चर्य होगा कि दो हजार से ज्यादा ऊँची इस चोटी पर पर्यटक रेल से चढ़कर जा सकते हैं। चोटी से ना केवल लूसर्न शहर बल्कि पूरी झील का नज़ारा मिलता है।



झील का चक्कर लगाने के बाद पास के बाजारों में हम थोड़ी बहुत खरीदारी को निकले। बेल्जियम के चॉकलेट्स की तरह ही स्विस चॉकलेट्स अपने बेहतरीन स्वाद के लिए बेहद मशहूर हैं इसलिए यहाँ आने वाले कुछ ना कुछ चॉकलेट्स जरूर खरीद कर जाते हैं। इनके आलावा इस देश से बतौर सोगात लोग गाय के गले में बाँधी जाने वाली घंटी, रंगीन गायों की मूर्तियाँ और दीवार और कलाई घड़ियाँ ले जाना पसंद करते हैं। वैसे ये बताना जरूरी होगा कि अन्य यूरोपीय देशों की तुलना में स्विटज़रलैंड एक मँहगा देश है।  यहाँ से वही खरीदें जिसकी आपको वास्तव में  जरूरत हो ।

 गर गायें सचमुच इतनी रंग बिरंगी होतीं !
गाय के गले में घंटी कौन बाँधे ? :)

घड़ी की टिक टिक आपको स्विट्ज़रलैंड के हर बाजार से सुनाई देगी।

स्विट्ज़रलैंड के इस सफ़र के अगले पड़ाव में आपको ले चलेंगे माउंट टिटलिस की  चोटी पर। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

Saturday, December 2, 2017

कैसे एक ट्रेन करती है युंगफ्राओ की चढ़ाई? A journey to the peak of Jungfrau, Switzerland

स्विट्ज़रलैंड के इंटरलाकन से हम युंगफ्राओ के लिए बढ़ चले। वैसे क्या आपको पता है कि युंगफ्राओ का शाब्दिक अर्थ क्या है? चलिए में ही बता दूँ आपको। युंगफ्राओ का मतलब है "कुमारी" यानि वर्जिन। बर्नीज ओवरलैंड में स्थित युंगफ्राओ स्विस ऐल्प्स  की तीन मुख्य चोटियों में से ये एक है। हालांकि तकनीकी रूप से ये स्विट्ज़रलैंड की सबसे ऊँची चोटी नहीं है फिर भी यहाँ इसे Top of Europe कह कर प्रचारित किया जाता है। निजी संचालकों द्वारा स्विट्ज़रलैंड का कोई भी कार्यक्रम Top of Europe की इस रेल यात्रा के बिना पूरा नहीं होता। क्या वाकई इस चोटी तक की यात्रा पर संचालकों द्वारा मचाया गया हो हल्ला वाज़िब है? आप ख़ुद ही मेरे साथ चलकर महसूस कर लीजिए। 


इंटरलाकेन से युंगफ्राओ तक जाने के लिए ट्रेन या सड़क मार्ग से आपको घंटे भर का ही समय लगेगा। इंटरलाकन से एक रास्ता ग्रिंडलवाल्ड होते हुए जाता है जबकि दूसरा लाउठाबोरेन होकर। इन दोनों रास्तों से अंततः आप क्वाइन्स स्काइक Kleine Scheidegg स्टेशन पहुँचते हैं। अब ये मत पूछिएगा कि जर्मन Kleine Scheidegg को क्वाइन्स स्काइक कैसे पढ़ लेते हैं? मैं तो सड़क मार्ग से क्वाइन्स स्काइक पहुँचा था पर रेल मार्ग ऐल्प्स पर्वतमाला को ज्यादा करीब से देखने का मौका देती है इसलिए इंटरलाकन में रहते हुए अगर आप युंगफ्राओ तक जाने की सोचें तो जाते समय ग्रिंडलवाल्ड और लौटते वक़्त लाउठाबोरेन होते हुए वापस आ जाएँ।

युंगफ्राओ जाने के लिए यहाँ से पकड़ी जाती है ट्रेन
इंटरलाकन से क्वाइन्स स्काइक तक जाना एक सपने जैसा था। पहाड़, बादल, दूर दूर तक फैले चारागाह और उसमें बसे छोटे छोटे गाँव। दूर से गाँव कितने भी आधुनिक लगें जब आप करीब से इनकी दिनचर्या देखेंगे तो इनकी खूबसूरती के पीछे आपको यहाँ के लोगों का कठोर जीवन दिखाई पड़ेगा। इन पहाड़ों में पर्यटन के आलावा जीविकोपार्जन का ज़रिया पशुपालन है। स्विट्ज़रलैंड की चीज़ Cheese का विश्व भर में बड़ा नाम है। गर्मी के मौसम में ये हरे भरे चारागाह गायों के आहार का प्रमुख हिस्सा बनते हैं। हर गाँव अपनी  बनाई हुई चीज़ पर फक्र महसूस करता है। इसे बनाने के तरीकों का यहाँ अभी भी मशीनीकरण नहीं हुआ है और गाँव के लोग विरासत में मिले परंपरागत विधियों को अपनाए हुए हैं।

बर्नीज़ ओवरलैंड की खूबसूरत घाटियाँ
गर्मी का मौसम खत्म होते ही ये चारागाह बर्फ से ढक जाते हैं। चारे के लिए गड़ेरिए को और नीचे उतरना  पड़ता है। बर्फीले तूफान लकड़ी के घरों में रहने वाले नागरिकों के लिए आफत का बुलावा ले के आते हैं। फिर भी यहाँ के लोग घाटी में बसे शहरों का रुख नहीं करते। पर ये गौर करने की बात है कि चीज़ और चॉकलेट जैसे दुग्ध उत्पादों में अग्रणी होने के बावज़ूद ये देश अपनी बैकिंग सेवाओं, घड़ी और भारी उद्योगों के ज़रिए कमाता है। खेती किसानी महज यहाँ की दो प्रतिशत आबादी को रोज़गार देती है और काफी सब्सिडी भी पाती है।

क्वाइन्स स्काइक रेलवे स्टेशन

क्वाइन्स स्काइक के समीप हम अपनी बस से नीचे उतरे और चारों ओर फैली अलौकिक सुंदरता में खो से गए। बर्नीज ओवरलैंड की हरी भरी पहाड़ियों के साथ आइगर, मांक और युंगफ्राओ के विशालकाय पर्वत हमें घेरे खड़े थे। पर्वतों की बर्फ रेखा जहाँ खत्म हो रही थी वही देवदार सदृश गहरे हरे पेड़ों के जंगल शुरु हो जाते थे। गाहे बगाहे जब धूप मंद पड़ती तो  बर्फ की विशाल सफेद चादर के बीच वे काले बौनों से नज़र आते। इन पेड़ों के नीचे जहाँ तक नज़र जाती वहाँ तक घास के मखमली चारागाहों का विस्तार नज़र आता। सड़क की दूसरी तरफ खिलखिलाती नदी का गुंजन आँखों  के साथ कानों को तृप्त किए दे रहा था।

माउंट आइगर
स्टेशन के ठीक पीछे अपनी खड़ी ढाल  के साथ आइगर का पहाड़ हमें टकटकी लगाए देख रहा था। अगर यहाँ की लोक कथाओं को मानें तो आइगर की इन्हीं निगाहों से बचाने के लिए मान्क यानि संत को भगवान ने कुमारी जुंगफ्राओ के सामने खड़ा किया था।

देखिए कितने ऊपर आ गए हम !
हमें  हरे पीले वाले डिब्बों वाली ट्रेन मिली। मेरे और सहयात्रियों के बैठते ही ट्रेन चल दी। अगले नौ किमी का सफ़र धरती के इस स्वर्ग की प्रवेश यात्रा सरीखा था। धीरे धीरे रैक और पिनियन पर विद्युत इंजन से खिसकती रेल पहले आइगर पर्वत की ओर चलती है। हरी हरी दूब कुछ ही दिर में बर्फ से धीरे धीरे ढकने लगती है और फिर ट्रेन की खिड़की के दोनों ओर बर्फ की चादर के आलावा कुछ और नजर नहीं आता।
पहाड़ के अंदर से जाती सुरंग
लोग बता रहे हैं कि कुछ ही देर में हम पहाड़ के अंदर बनी सात किमी लंबी सुरंग में घुसेंगे।  खिड़की के बाहर देखते हुए मैं सोचता हूँ कि इतने दुर्गम रास्ते में सुरंग बनाने का ख्याल किसे आया होगा। बाद में युंगफ्राओ में पता चला कि ये विचार 1894 में  Adolf Guyer-Zeller को आया जो कि इस इलाके के उद्योगपति थे।  दो साल बाद इस परियोजना पर कार्य आरंभ हो गया।  इसे पूरा होने में करीब पच्चीस साल लग गए। ये दुर्भाग्य ही रहा कि इस योजना को अमली जामा पहनाने वाले Zeller इसे जीते जी इसे पूरा होते नहीं देख पाए।

रेल की पटरियों के बीच कुछ अलग सा दिखा आपको?

लगभग सौ साल पहले बनी ये रेलवे इंजीनियरिंग की मिसाल है। इसे शुरुआत से मीटर गेज़ और बिजली के इंजन से चलाया गया। इतनी खड़ी ढाल पर चलने के लिए दो रेलों के बीच एक रैक का निर्माण किया गया। गाड़ी के चक्कों के बीच में एक पिनियन गियर बनाया गया जो इस रैक के दातों से अपने आपको जोड़ता घूमता है। सेफ्टी गियर का प्रयोग करते ही पिनियन रैक के साथ जुड़कर गाड़ी ढलान पर पीछे जाने से रोकने में सहायक होता है। इतना ही नहीं यहाँ इंजन में रिजेनेरेटिव मोटर लगी हैं जो चढ़ाई में तो विद्युत उर्जा की खपत करती हैं पर ढलान आने से उर्जा उत्पन्न करती हैं जो फिर ऊपर लगी ग्रिड में चली जाती है। सुरंग के अंदर दो और खुले में एक स्टेशन हैं जहाँ से एक दूसरी ट्रेन हमें आगे ले चलती है।

पहाड़ को करीब से देखने के लिए बना स्टेशन
छोटे स्टेशन पर घुसते ही ट्रेन रुक जाती है और घोषणा होती है कि यात्री स्टेशन पर लगे झरोखों से बर्फीले पर्वतों को बेहद करीब से देखने जा सकते हैं। यात्री झरोखों की ओर दौड़ते हैं। सुरंग के अंदर की ठंडक ठिठुराने वाली है पर खिड़की से आँख गड़ा कर जब तक आइगर और उसे सटी पर्वतमाला को निहार ना लें  तो आगे बढ़ें कैसे?


ट्रेन की खिड़की निरंतर बदलते दृश्य पेश कर रही है। बादलों का झुंड इस चोटी को पूरी तरह घेर चला है। ऐसा लग रहा है मानो चोटी गर्दन उचका कर कह रही हो अब तो रास्ता छोड़ों तुम सब नहीं तो क्या पता आज सूरज बिना मिले ही वापस चला जाए।

बादलों के बाहुपाश में जकड़ा एक पर्वत
हम अपने गन्तव्य पर एक घंटे से कम समय में पहुँच गए हैं। यकीन नहीं हो रहा है कि इंजीनियरिंग की इस मिसाल की बदौलत हम युंगफ्राओ की चोटी पर विचरण कर पा रहे हैं। युंगफ्राओ पर मौसम बड़ी तेजी से बदलता है। गनीमत है कि धूप बड़ी तेज है और एक जैकेट में ठंड का ज़रा भी आभास नहीं हो रहा है।


स्टेशन पर ही कैफेटेरिया है। पर अभी खाने पीने की किसको पड़ी है। हम सभी इस दृश्य को आँखों में हमेशा हमेशा के लिए क़ैद कर लेना चाहते हैं। युंगफ्राओ की चोटी से हटकर मेरी नज़र अब Aletsch Glacier पर पड़ती है। इसकी न्यूनतम और अधिकतम चौड़ाई एक से दो किमी तक है। ग्लेशियर के ठीक ऊपर एक वेधशाला है। वेधशाला के नीचे की बॉलकोनी पर विश्व के कोने कोने से आए लोग इस यादगार मौके को कैमरे में बंद कर लेना चाह रहे हैं। एक जापानी टूरिस्ट तो अपनी शर्ट खोल कर सेल्फी ले रहा है। मैं उसके इस दुस्साहस को देख मुस्कुराए बिना नहीं रह पाता।


इटली की ओर जाता करीब बीस किमी लंबा Aletsch Glacier ग्लेशियर


युंगफ्राओ की चोटी
एक ओर जुंगफ्राओ तो दूसरी तरफ मांक की चोटियाँ नज़र आ रही हैं। गहरे नीले आकाश के नीचे ढलान पर जमी बर्फ के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं है। बर्फ का ये समतल सपाट रूप उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहा है।
Add caption
हिमखंडो को देखते हुए हम बर्फ के संग्रहालय में जा पहुँचते हैं। संग्रहालय के अंदर पहुँचते ही ठिठुरा देने वाली ठंड का सामना होता है। चूँकि रास्ता बर्फीला है इसलिए हर क़दम बड़ी सतर्कता से लेना पड़ रहा है। जरा सी चूक हुई और आप बर्फ में औ्धे मुँह पड़े होंगे। बर्फ की कलाकृतियाँ मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार देख रहा हूँ। मुझे पेंग्विन और ध्रुवीय भालू की ये मूर्तियाँ सबसे ज्यादा आकर्षित करती हैं।  संग्रहालय के आस पास चॉकलेट की दुकानें और एल्पाइन पेनोरामा के दो सेक्शन हैं। पर उसे छोड़कर हम आइसपार्क की ओर बढ़ चलते हैं क्यूँकि अंदर ठंड काफी है।
बर्फ से बनी कलाकृतियों का संग्रहालय
आइस पार्क बर्फ के विशाल मैदान सा नज़र आ रहा है। ऐसे मैदानों पर स्कीइंग करने का आनंद ही कुछ और है। पर हमारे समूह में स्कीइंग किसी को आती नहीं सो आपस में बर्फ से खेलने का क्रम शुरु हो जाता है। दिन की पेट पूजा करने हम वापस कैफेटेरिया पहुँचते हैं जहाँ पहले से ही भारतीय और चीनी मूल के लोगों की भारी भीड़ है। वापसी की यात्रा में टिकट संग्राहक टिकट की जाँच करते हुए एक स्विस चाकलेट भी हाथ में पकड़ा देती है और मैं इसी मिठास को लिए युंगफ्राओ से विदा लेता हूँ।
आइस पार्क
स्विटरज़रलैंड के इस सफ़र के अगले पड़ाव में आपको ले चलेंगे मध्य स्विटरज़रलैंड के शहर Lucerne में। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails