Tuesday, February 5, 2019

फूलों के रंग "फन कैसल" के संग Fun Castle, Ranchi

राँची को जलप्रपातों का शहर कहा जाता है। शहर से चालीस से अस्सी किमी के दायरे में दशम, जोन्हा, हुंडरू, सीता, हिरणी, पंचघाघ जैसे छोटे बड़े कई झरने हैं। अक्सर साल की शुरुआत में इन झरनों के पास मौज मस्ती करने पूरा शहर उमड़ जाता है पर वास्तविकता ये है कि ये समय इन झरनों की खूबसूरती देखने का सही समय नहीं होता। सबसे अच्छा समय बरसात के तुरंत बाद यानी सितंबर अक्टूबर का है जब इन प्रपातों से आने वाली पानी की गर्जना आप कोसों दूर से सुन सकते हैं।

फूलों की तरह लब खोल कभी, "डेज़ी" की जुबां में बोल कभी 
ये तो हुई शहर के बाहरी इलाके की बातें। शहर के अंदर की मशहूर स्थलों में एक पहाड़ी है जहाँ कभी रवींद्रनाथ टैगोर के अग्रज ज्योतिंद्रनाथ निवास किया करते थे।  तब वो पहाड़ी हरे भरे जंगलों के बीच में हुआ करती थी और आज उसके अगल बगल कंक्रीट के जंगलों का विस्तार है।  ऐसी ही एक दूसरी पहाड़ी पर भगवान जगन्नाथ का  मंदिर है जहाँ हर साल रथ यात्रा बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इसके आलावा जिन लोगों के पास थोड़ा समय हो वो यहाँ के देवड़ी और सूर्य मंदिर में भी जाना पसंद करते हैं।

शहर में दो बड़े जलाशय भी हैं धुर्वा और काँके के पर आज की तारीख़ में जो सबसे लोकप्रिय जगह राँचीवासियों के लिए हो गयी है वो है पतरातू घाटी और उससे सटा बाँध।


राँची में जैव विविधता उद्यान से लेकर नक्षत्र वन जैसे उद्यान तो हैं पर हर बड़े शहर जैसे थीम पार्क या वाटर पार्क जैसा कुछ खास है नहीं। रातू महाराज के इलाके में एक ऐसा एम्यूजमेंट पार्क बना तो था आज से करीब पन्द्रह वर्ष पहले पर वो उस कोटि का नहीं रह गया है जैसा अपने शुरुआती दिनों में था।  पन्द्रह सालों में मैंने सोचा कि क्यूँ ना एक परिवर्तन के लिए ही सही वहाँ का चक्कर मार लें। घूमने का घूमना हो जाएगा और फरवरी के इस महीने में प्रकृति के वासंती रंगों से भी मुलाकात हो जाएगी।

फन कैसल के सबसे ऊँचे बिंदु से पार्क का दृश्य
पार्क में छोटी बड़ी दर्जन भर राइड हैं जिसमें  तीन चार मजेदार हैं। 160 के टिकट में बहुतेरी राइड्स का एक साथ आनंद  लिया जा सकता है। 

सबसे ज्यादा रोमांच तो इसी ट्रेन में आता है।



ये राइड तो कहीं भी की जाए मजेदार होती है।

स्काई ट्रेन जो बारिश के दिनों में एक सरोवर के ऊपर से चलती है जो फिलहाल सूखा हुआ है।

तीन चार राइड्स का लुत्फ उठाने के बाद कुछ वक्त वहाँ की बगिया में खिले फूलों के साथ बिताना लाज़िमी था।
फूलों के इंद्रधनुषी रंग
वैसे आपको पता है इस पुष्प का नाम डेज़ी कैसे पड़ा? ऍसा कहा जाता है कि प्राचीन काल में इसे अंग्रेजी में Day's eye  सूरज की आँख के नाम से जाना जाता रहा जो बाद में डेज़ी हो गया।

डेज़ी रानी..बड़ी सयानी
सुंदर ऐसी ना कोई सानी 

पेच्यूनिया (Petunia)





पार्क के पिछले हिस्से में एक छोटी सी झील भी है। अब झील हैं तो वहाँ पक्षी भी होंगे यही सोचकर मैं उस पर निकल पड़ा। थोड़ी दूर बढ़ते ही कोतवाल यानी भुजंग के दर्शन हुए। घर के आस पास तो ये दिखता ही है पर पानी के आस पास झुंड में मँडराते मैंने इसे पहली बार देखा। झील का पानी जिधर छिछला था उधर कमल के फूलों का अंबार लगा था। मेरे कैमरे की पहुँच से कुछ दूर पर ही  बगुलों के साथ पनकौवों का झुंड बैठा था।

कमल की फैली गुलाबी आभा 
दूरबीन और ज़ूम कैमरा ले कर गया नहीं था इसलिए पास से उनकी तस्वीरें नहीं ले पाया पर  शोर शराबे से दूर उनके क्रियाकलापों पर नज़र रखना सुकूनदेह था। झील में पैडल और मोटर बोट भी चल रही थीं पर धूप की तेज़ी के चलते उसमें जाने के बजाए शंति से किनारे बैठ कर वक़्त  गुजारना ज्यादा बेहतर लगा।
कमल की खुलती पंखुड़ियाँ जितनी खूबसूरत लगती हैं उतने ही प्यारे लगते हैं पानी में पालथी मारे इसके पत्ते।
कुल मिलाकर ये जगह छुट्टी में कुछ घंटे गुजारने के लिए बुरी नहीं है बशर्ते आप अपने साथ ज्यादा अपेक्षाओं का बोझ ना लाएँ। झील के किनारों की तरफ थोड़ी साफ सफाई बेहतर हो और उसके किनारे पेड़ लगा दिये जाएँ तो इस जगह की सुंदरता भी बढ़ जाएगी और कड़ी धूप के बीच छाँव का भी एक कोना आनेवाले को नसीब होगा। अगर इसकी रेटिंग करनी हो तो इसे मैं पाँच में से तीन अंक दूँगा।

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