Tuesday, February 26, 2013

रंगीलो राजस्थान : मेहरानगढ़ - सफ़र श्रृंगार चौक से दौलतखाना का..

पिछली प्रविष्टि में मेहरानगढ़ का किला तो बाहर से आपने देख लिया। आइए आज आपको ले चलते हैं इसके दौलतखाने में। वैसे इस नाम से 'कन्फ्यूजिया' मत जाइएगा। हुजूर अब स्वर्ण मुद्राओं वाली दौलत कहाँ इन पुराने किलों को नसीब होनी है वो तो आज किसी बैंक की शोभा बढ़ा रही होगी। एक ज़माना था जब यहाँ खजाना रखा जाता था और उसके बाद इसका उपयोग शाही आभूषणों को रखने में किया जाने लगा। आज की तारीख में मेहरानगढ़ का दौलतखाना राठौड़ शासकों के शौर्य, रहन सहन,राजपूत संस्कृति से जुड़ी श्रेष्ठ कलात्मक वस्तुओं का एक संग्रहालय है। 

पर इससे पहले कि मैं आपको दौलतखाने की ओर ले चलूँ , एक नज़र मेहरानगढ़ के श्रृंगार चौक के संगमरमर के बने इस राजसिंहासन की ओर। श्रृंगार चौक तीन तरफ़ से लाल पत्थरों से नक़्काशीयुक्त झरोखों वाले महल से घिरा हुआ है। इसीलिए इसे झाँकी महल भी कहा जाता था। यहीं से राजमहल की स्त्रियाँ श्रृंगार चौक पर हो रहे राठौड़ राजकुमारों का राज्याभिषेक को देख पाती थीं।



Tuesday, February 19, 2013

रंगीलो राजस्थान : नीले शहर जोधपुर की पहचान मेहरानगढ़ (Mehrangarh)


अगली सुबह सवा नौ बजे तक हमारा समूह जोधपुर के मेहरानगढ़ किले पर धावा बोलने के लिए तैयार था। बाहर नवंबर के तीसरे हफ्ते की चमकती धूप और नीला आसमान हमारा इंतज़ार कर रहा था। पौने दस बजे तक मैं मेहरानगढ़ के विशाल अभेद्य किले के सामने खड़ा था। राठौड़ राजाओं की शान कहा जाने वाला 122 मीटर ऊँचा ये किला राजस्थान के विशाल किलों में से एक है। राठौर नरेश राव जोधा (Rao Jodha) ने 1459 ई में जब इसे बनाया था तब ये इतना बड़ा नहीं था, पर जैसे जैसे राठौड़ शासकों की ताकत बढ़ती गई ये किला फैलता चला गया। शुरुआती दो द्वारों से बढ़कर आठ द्वार हो गए। आज का मेहरानगढ़ उन सारे बदलावों को अपने हृदय में समेटे हुए है जो पाँच सौ सालों के राठौड़ शासन के दौरान आए।

मेहरानगढ़ के पहले राठौड़ शासकों की राजधानी मण्डोर (Mandore) हुआ करता था जो इस किले से करीब 9 किमी की दूरी पर है। सुरक्षा की दृष्टि से भोर चिड़िया की पथरीली पहाड़ी के ऊपर एक किला बनाना राव जोधा को श्रेयस्कर लगा। पर एक प्रश्न सहज ही मन में आता है? वो ये कि चित्तौड़ के नाम से चित्तौड़गढ़, वही राणा कुंभ के नाम से कुंभलगढ़ तो फिर राव जोधा को इस किले का नाम मेहरानगढ़ (Mehrangarh) रखने की क्या सूझी? कहानियाँ कई हैं पर इतिहासकारों की मानें तो 'मिहिर' का मतलब सूर्य से है जो राजस्थानी में 'मेहर' भी कहा जाता है। राठौड़ शासक अपने को सूर्यवंशी मानते थे और संभवतः इसी वजह से इस किले का नाम मेहरानगढ़ पड़ा।

Wednesday, February 13, 2013

रंगीलो राजस्थान : सफ़र माउंट आबू से जोधपुर का..

राजस्थान के अपने यात्रा वृत्तांत में आपको मैं उदयपुर, चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, राणकपुर और माउंट आबू की सैर करा चुका हूँ। पर माउंट आबू के बारे में लिखने के बाद अपनी जापान यात्रा की वज़ह से मैंने अपनी इस श्रृंखला को विराम दे दिया था। आइए इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए चलते हैं आज माउंट आबू से जोधपुर के सफ़र पर। माउंट आबू से जोधपुर की दूरी लगभग 270 किमी की है जिसे पूरा करने में करीब पाँच घंटे लग ही जाते हैं।

माउंट आबू से जोधपुर जाने के लिए अगली सुबह जब हम उठे तो बाहर कोहरे की घनी चादर देख वापस अपने कमरे में दुबक लिए। हमारी योजना तो ये थी कि नौ बजे तक आबू की पहाड़ियों से कूच कर देंगे ताकि बीच में  विश्राम लेते हुए भी दो बजते बजते जोधपुर पहुँच जाएँ। पर कोहरे के बीच माउंट आबू के घुमावदार रास्तों में जाने का खतरा कौन मोल लेता ? लिहाजा सामान गाड़ी में चढ़ा कर हम मौसम के साफ होने का इंतज़ार करने लगे। कुछ ही देर में हवा के साथ हल्की बूँदा बाँदी शुरु हो गई और बादल भी छँटने लगे। आखिरकार दस बजे हमने माउंट आबू छोड़ दिया।




आबू घाटी के घुमावदार रास्तों पर एक ओर तो  पहाड़ियाँ नज़र आ रही थीं तो दूसरी ओर मारवाड़ के दूर दूर तक फैले इन मैदानी इलाकों की झलकें मिल रही थीं। थोड़ी ही देर में आबू पर्वत हमसे दूर जा चुका था। बादलों के घने झुंड अभी भी उसके उच्च शिखरों के आस पास मँडरा रहे थे।



Friday, February 8, 2013

यादें अंडमान की (Andaman Memoirs) : वो मेरी पहली विमान यात्रा.. इठलाती परिचारिकाएँ और टूटता डैना.

मुसाफ़िर हूँ यारों पर अब तक आप सिक्किम, पचमढ़ी और केरल की यात्राओं के बारे में पढ़ चुके हैं। अब आपके सामने ला रहा हूँ अपनी अंडमान यात्रा के संकलित संपादित अंश जिसे करीब दो वर्ष पूर्व एक शाम मेरे नाम पर प्रकाशित किया था। अंडमान की ये यात्रा मैंने २००४ नवंबर में की थी यानि सुनामी आने के ठीक एक महिने पहले। अपनी अब तक की यात्राओं में अंडमान जैसा विविधतापूर्ण सौंदर्य मैंने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। अंडमान की वो यात्रा मेरी पहली हवाई यात्रा थी इसलिए इस कड़ी की शुरुआत उस पहली हवाई यात्रा के संस्मरण से....


कोलकाता से अंडमान जाने की वो फ्लाइट 11 बजे की थी । 9-9.30 बजे तक हम टैक्सी में सवार होकर एयरपोर्ट के रास्ते में थे । मेरे लिए या यूँ कहें कि मेरे परिवार के लिए हवाई यात्रा का वो पहला अनुभव था । हवाई अड्डे पर चेक इन की औपचारिकता से लेकर पोर्ट ब्लेयर तक पहुँचने में जो कुछ भी हुआ वो हम सब के लिए अनूठा अनजाना अनुभव था । बच्चों को एस्कलेटर पसंद आया तो मुझे समान ढ़ोने वाली ट्राली । ट्रेन के सफर में भारी भरकम बोझ को ढ़ो कर चलने के बाद इस तरह की व्यवस्था देख के मन को सुकून मिला कि चलो कुलीगिरी के काम से तो मुक्ति मिली :)।


हवाई अड्डे की लांज में सामूहिक चित्र लेने के बाद बस पर चढ़ कर विमान की ओर चल पड़े। विमान में सीट लेने के पहले एक मसला और भी था । किसी ने हमारे टीम लीडर को बताया था कि विमान उतरते वक्त अंडमान द्वीप का सुंदर दृश्य सिर्फ दायीं ओर की खिड़की से दिखाई देता है । जाहिर है ये सूचना हमें अपने कार्यालय के पूर्ववर्ती यात्रियों से प्राप्त हुई थी । पर इस जानकारी के बावजूद हमें दाहिनी ओर की सिर्फ एक ही सीट मिली । सो हम मन मसोस कर बाँयी ओर की खिड़की के पास बैठ गए । पर सूचना देने वाले ने ये निष्कर्ष सुबह की फ्लाइट में अपने अनुभव पर बताया था । विमान के समय में परिवर्तन की वजह से धूप ने अपना रुख बदला और अंडमान हमें बांयीं ओर से भी दिखा और अच्छी तरह दिखा ।

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