दशकों पहले जब कृष्णचंदर का यात्रा संस्मरण मेरी यादों के चिनार पढ़ा था तो पहली बार कश्मीर की वादियों की रूपरेखा मन में गढ़ी थी। पर साल बीतते गये कश्मीर के हालात कभी अच्छे कभी खराब तो कभी एकदम बदतर होते रहे और मेरा वहाँ जाना टलता रहा। मेरे माता पिता अक्सर वहाँ के किस्से सुनाते और मैं उसी से संतोष कर लेता था।
हालांकि वहाँ लोगों का आना जाना कभी रुका नहीं था पर जिस सुकून के लिए कश्मीर का अद्भुत सौंदर्य जाना जाता है वो छवि वक़्त के साथ मन में धूमिल होती चली गयी थी। वर्षो बाद जब कश्मीर जाने की योजना बनाई तो वो भी इस लिए कि मैं लेह तक धीरे धीरे बढ़ना चाहता था ताकि जब हम वहाँ पहुँचे तो वातावरण के परिवर्तन को झेलने में ज्यादा सक्षम रहें। श्रीनगर के आस पास के इलाकों में गुज़रे वो दो दिन उसकी उस पुरानी छवि को काफी हद तक वापस लाने में सफल रहे।
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| चिनार जो एक प्रतीक है कश्मीर का.. |
जून के उस पहले हफ्ते में हमारे सफ़र की शुरुआत राँची से दिल्ली तक तो ठीक रही थी पर सुबह सुबह दिल्ली से श्रीनगर पहुँचने का ख़्वाब स्पाइसजेट की लचर सेवा ने तोड़ के रख दिया था। ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ था कि एयरपोर्ट बस से सभी यात्री विमान के सामने खड़े कर दिए गए हों और फिर करीब पौन घंटे बस के अंदर खड़े रखवा कर उन्हें वापस भेज दिया गया हो। विमान में चढ़ने के ठीक पहले नज़र आयी ये तकनीकी खराबी ने हमारे सुबह के तीन घंटे बर्बाद कर दिए।
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| धानी हरे खेतों का आकाशीय नज़ारा |
हवाई जहाज से दिल्ली से श्रीनगर का सफ़र डेढ़ घंटे का है। आधे घंटे बाद से ही खिड़की के बाहर का नज़ारा लुभावने वाला हो जाता है। ऊँचाई पर रहते हुए जहाँ बर्फ से ढकी चोटियाँ बादलों से घुलती मिलती दिखाई देती हैं वहीं श्रीनगर के पास आते ही पीर पंजाल की पर्वतमालाओं के बीच की हरी भरी मोहक घाटियाँ आँखों को तृप्त कर देती हैं। श्रीनगर के आस पास के इलाकों में देवदार व पोपलर के वृक्ष बहुतायत में दिखते हैं। इसके आलावा सेव, अखरोट के बागान भी आम हैं।
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| ये है हरा भरा श्रीनगर |
भोजन उपरांत यहाँ सफ़र की शुरुआत शंकराचार्य मंदिर से शुरु हुई। भगवान शिव को समर्पित ये मंदिर शहर के एक कोने पर तीन सौ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। ये एक बेहद प्राचीन मंदिर है जिसका निर्माण 400 ईसा पूर्व से भी पहले का बताया जाता है। कश्मीर के इतिहासकार कल्हण ने भी अपने आलेख में इसका जिक्र किया है। समय समय पर हिंदू और मुस्लिम राजाओं ने इस मंदिर की मरम्मत की। कहते हैं कि हिंदू मंदिर के रूप में स्थापित होने के पहले ये बौद्धों का भी पूजा स्थल हुआ करता था। मुगलों के शासनकाल में इस जगह को तख्त ए सुलेमान के नाम से भी जाना जाता रहा। दसवीं शताब्दी में जब आदि शंकराचार्य के कदम यहाँ पड़े तब से शिव मंदिर के रूप में यहाँ पूजा अर्चना होने लगी।
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| शंकराचार्य मंदिर से दिखता डल झील का विहंगम दृश्य |