Monday, July 8, 2019

आइए चलें दुनिया के सबसे छोटे देश वैटिकन सिटी में Smallest country of the World : Vatican City

वैटिकन सिटी का शुमार विश्व के सबसे छोटे देश में होता है। अगर आप पूछें कि इस छोटे का मतलब कितना छोटा तो समझ लीजिए कि उतना ही जितना की छः सौ मीटर लम्बा और सात सौ मीटर चौड़ा कोई इलाका हो। मतलब ये कि आप मजे से तफरीह करते हुए घंटे भर में इस देश की चोहद्दी नाप लेंगे। इस देश की जनसंख्या भी कितनी?  सिर्फ एक हजार ! इतने को तो हमारी एक गली की आबादी सँभाल ले।

संत पीटर बाज़िलिका
मजे की बात है कि इतने छोटे से इलाके में एक रेलवे स्टेशन भी है जिसके स्वामित्व में सिर्फ तीन सौ मीटर की रेलवे है। कभी वैटिकन जाइए तो यहाँ के बैंक वाले ATM से पैसे निकालने की जुर्रत ना कीजिएगा। इस बैंक का ATM दुनिया का एकमात्र ऐसा ATM है जहाँ पैसे निकालने के लिए निर्देश लैटिन भाषा में दिए गए हैं। इसी छोटे से देश को देखने के लिए हर दिन संसार के कोने कोने से हजारों लोग आते हैं। आए भी क्यूँ ना आखिर यही तो रोमन कैथलिक चर्च का मुख्य केंद्र है।

रोम की संगिनी टाइबर नदी

रोम के संग संग बहने वाली टाइबर नदी को पार करके जब मैं वैटिकन सिटी जाने वाली सड़क पर पहुँचा तो सबसे पहले इस झंडे ने मेरा स्वागत किया। बड़ा कमाल का झंडा है वैटिकन का। शक्ल से वर्गाकार आधा पीला और आधा सफेद। पीला वाला हिस्सा तो बिल्कुल सादा पर सफेद हिस्से में दो चाभियाँ दिखती हैं। एक सुनहरी और दूसरी चाँदी के रंग की एक दूसरे के ऊपर क्रास का आकार बनाती हुईं। इन दोनों चाभियों को जोड़ती है इक लाल डोरी। 

चाभियों को देखकर मन ही मन सोचा जरूर ये स्वर्ग तक पहुँचाने वाली चाभियाँ होंगी और बाद में पता चला कि मेरा तुक्का बिल्कुल सही निकला। ऐसी मान्यता है कि  ये स्वर्गारोहणी चाभियाँ ईसा मसीह ने खुद संत पीटर को दी थीं। सुनहरी चाभी आध्यात्मिक शक्ति जबकि चाँदी के रंग की चाभी संसारिक शक्ति का प्रतीक है।

विश्व के सबसे छोटे देश का ध्वज
बहरहाल अब हमें पत्थरों से बनी एक पतली सी सड़क संत पीटर बाज़िलिका ( बाज़िलिका दरअसल किसी बड़े महत्त्वपूर्ण गिरिजाघर को कहते हैं । ) की ओर ले जा रही थी। यूरोप की प्राचीन जगहों की पहली पहचान वहाँ की कॉबलस्टोन सड़कें है जिनका इस्तेमाल मध्यकालीन यूरोप में होना शुरु हुआ था।

संत पीटर स्कवायर की ओर जाती सड़क
बाज़िलिका तक पहुँचने के ठीक पहले एक विशाल सी खुली जगह मिलती है जिसे रोमन स्थापत्य की पहचान माने जाने वाले गोलाकार स्तंभों के गलियारे से दोनों ओर से घेरा गया है। इस के ठीक मध्य में रोमन सम्राट कालिगुला द्वारा मिश्र से लाया गया पिरामिडनुमा स्तंभ है जिसे अंग्रेजी में ओबेलिस्क के नाम से जाना जाता है। रोमन सम्राट कालिगुला से मेरा परिचय तो सुरेंद्र वर्मा के प्रसिद्ध उपन्यास "मुझे चाँद चाहिए" की प्रस्तावना में हुआ था पर जूलियस सीज़र के इस परपोते को रोमन इतिहास एक क्रूर आतातायी की तरह जानता है। अब सोचता हूँ कि असंभव की आशा जगाने के लिए वर्मा जी को यही सनकी प्रतीक मिले।

 याद कीजिए ऐसे ही एक स्तम्भ के बारे में विस्तार से पहली बार मैंने आपको अपनी पेरिस यात्रा में बताया था


संत पीटर बाज़िलिका के सामने खड़ा मिश्र से लाया गया स्तंभ

संत पीटर स्कवायर
ओबेलिस्क के दोनों ओर छोटे छोटे फव्वारे हैं। पोप जब बाज़िलिका की खिड़की से अपने दर्शन देते हैं तो ये पूरा स्कवायर लोगों से खचाखच भर जाता है। धार्मिक उत्सवों में लोग के इकठ्ठा होने के लिए ये जगह इतनी खुली बनाई गयी।

गोलंबर के चारों ओर फैला गोलाकार गलियारा
संत पीटर स्कवायर में आ तो गए पर आधा किमी लंबी पंक्ति देख लगा कि अब तो हो गए  पीटर साहब के दर्शन। पूरा वृताकार गलियारा कैथलिक चर्च के इस पवित्र स्थान को देखने के लिए पंक्तिबद्ध खड़ा था। थोड़ी ही देर में पंक्ति का अनुशासन देख के समझ आ गया कि यहाँ देर है पर अँधेर नहीं। पंक्ति लगातार आगे चल रही थी और दस पन्द्रह मिनट में तेज़ी से खिसकते हम इमारत की दाँयी ओर से चर्च में दाखिल हो गए। मुख्य परिसर में प्रविष्टि के ठीक पहले दाहिनी ओर संत पाल की सफेद मूर्ति लगी है जबकि चर्च की बाँयी ओर संत पीटर विराजमान हैं।  
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संत पीटर का ये विशाल गिरिजाघर अंदर घुसते ही अपनी प्रसिद्धि का कारण बता देता है। गिरिजे की आंतरिक दीवारों और छत को इतनी खूबसूरती से सजाया गया है कि आँखें फटी की फटी रह जाती है। मुख्य गुंबद की छत तीन हिस्सों में बँटी है। एल्टर की ओर जाने से ठीक पहले दोनों ओर दो खूबसूरत गलियारे कटते हैं जिनकी छतों के अलग अलग रूप मन को मोहित करते हैं। दीवारों के किनारे किनारे भिन्न भंगिमाओं में कई संतों की प्रतिमाएं लगी हैं। माइकल एंजेलो के कुछ खूबसूरत शिल्प भी हैं और तमाम पेटिंग्स भी। 

गिरिजाघर का शानदार गुम्बद


ऐसा नहीं कि वैटिकन ईसाई धर्म आने के पहले नहीं था। टाइबर नदी के पश्चिमी किनारे का ये इलाका पहले दलदली हुआ करता था। आम लोगों को यहाँ बसने की मनाही थी क्यूँकि इस हिस्से को पवित्र समझा जाता था। कालिगुला ने दलदली ज़मीन से पानी निकालकर इस क्षेत्र में उद्यान बना दिया। बाहरी सेनाओं ने यदा कदा वैटिकन के इलाके में अपनी अस्थायी छावनी बनाई पर  खराब पानी ने उनका यहाँ के जीना दूभर कर दिया।

इटली की प्राचीन सभ्यता में उपवन को वैटिकम कहा जाता था जो कि कालांतर में वैटिकन हो गया। कितनी अचरज की बात है कि संस्कृत में भी बाग बगीचे के लिए इससे मिलते जुलते शब्द वाटिका का इस्तेमाल होता रहा है। 

यूरोपीय चित्रकला का एक नमूना

छत पर की गई बेहतरीन नक्काशी 
इस शृंखला की पिछली कड़ी में मैंने आपको बताया था कि रोम की भीषण आग के लगने के बाद किस तरह नीरो ने शक की सुई अपनी ओर से हटाने के लिए ये अपराध ईसाई अनुयायिओं पर मढ़ दिया था। इस घटना के फलस्वरूप ईसाई मत मानने वाले तमाम लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया । ईसा मसीह के बारह प्रमुख अनुयायिओं में सर्वोच्च स्थान रखने वाले संत पीटर उस समय रोम के पहले बिशप थे। ऐसा माना जाता है कि उन्हें उलटा लटकाकर यहाँ सूली पर चढ़ा दिया गया था।

जब रोम के सम्राट कांस्टेन्टाइन में ईसाई धर्म स्वीकारा तो उन्होंने संत पीटर के सम्मान में उसी जगह गिरिजाघर की नींव रखी जहाँ उनकी हत्या कर उन्हें दफनाया गया था।

मुख्य पूजा स्थल

देखिए कैसे गुंबद से सूरज की रोशनी अंदर छन कर आने की व्यवस्था की गयी है
संत पीटर के उत्तराधिकारियों को ही बाद में पोप का दर्जा मिला। इटली के शासकों से संधि के फलस्वरूप एक देश के रूप में वैटिकन आज से नब्बे साल पहले अस्तित्व में आया। आज वैटिकन की अपनी एक सेना है। भले ही उसमें दो सौ से कम जवान हों।

पोप के निवास की सुरक्षा में मुस्तैद जवान
जिस तरह फ्रांस के सम्राट की सुरक्षा का जिम्मा एक स्विस बटालियन पर था उसी तरह पोप की सुरक्षा का दारोमदार स्विट्ज़रलैंड के सैनिक सँभालते हैं। इनकी रंगीन वेशभूषा पर मत जाइए। इन्हें रणक्षेत्र के सारे कौशल आते हैं।

संत पीटर
वैटिकन के बाद इटली प्रवास का आख़िरी पड़ाव था वेनिस। इस शृंखला के अगले कदम में आपको ले चलेंगे फ्लोरेंस होते हुए वेनिस की ओर..

इटली यात्रा में अब तक
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Monday, June 24, 2019

कैसा था प्राचीन रोम ? Glimpses of Ancient Rome !

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इटली से जुड़े इस यात्रा वृतांत में आपने मेरे साथ सबसे पहले देखा फेरारी कारों का संग्रहालय और फिर पीसा की मीनार। पिछली कड़ी में आपको रोम के अनजाने स्वरूपों की कुछ झलकियाँ दिखाई थीं पर आज बारी है रोम शहर के गौरवशाली अतीत की कुछ खिड़कियों को खोलने की। तो तैयार हैं ना आप मेरे साथ इस सफ़र पर चलने के लिए...
पीसा से रोम की दूरी करीब साढ़े तीन सौ किमी है। पहले पहाड़ियों और फिर मैदानों से गुजरता ये रास्ता काफी हरा भरा है। खेती बाड़ी में इटली पीछे नहीं है। जहाँ इसके उत्तरी इलाके मुख्यतः खाद्यान्न और डेयरी से जुड़ी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं वहीं जैसे जैसे आप मध्य से संकरे होते दक्षिणी इटली की ओर बढ़ते हैं, अंगूर के फार्म से लेकर भांति भांति के फल, सब्जियों और जैतून के खेत दिखने लगते हैं। मैं रास्ते भर इन वादियों का आनंद लेता रहा और चलती बस से इनमें से कुछ खूबसूरत  दृश्यों को कैमरे में क़ैद भी किया।
इटली के खेत खलिहान 

खेत खलिहानों को पार करते हुए अब हम रोम शहर के अंदर दाखिल हो चुके थे। बचपन में पढ़ा था कि रोम सात पहाड़ियों से मिल कर बना शहर है पर शहर में अब पहाड़ियों के ऊपर इस तरह निर्माण हो चुका है कि समझ ही नहीं आता कि कब एक पहाड़ी शुरु हुई और कब खत्म? जैसे ही रोम शहर में दाखिल हुए प्राचीन इमारतें और खंडहरों की झलकें मिलनी शुरू हो गयीं


रोम जैसे ऐतिहासिक शहर की विरासत को समझने और उसे आज के इटली से जोड़ने में तो महीनों का वक़्त भी कम ही जान पड़ेगा। इससे पहले मैं आपको रोम की ये छोटी सी झाँकी दिखाऊँ ये  बताना जरूरी है कि रोम भले  ही आज कैथलिक चर्च के अनुयायिओं का केंद्र माना जाता है पर  इस शहर ने 380 ई के बाद ही ईसाई धर्म को अंगीकार किया।

ईसाई धर्म के पहले, रोम गणतंत्र की धार्मिक परंपरा बहुत कुछ हिंदू धर्म जैसी थी। भगवान कई थे़। प्रत्येक शहर का अपना एक अलग इष्ट देवता था। अपने इष्ट देवों के आलावा रोम वासियों ने कई ग्रीक भगवानों को भी अपना लिया था। पूज्य  देवी देवताओं में सूर्यमंडल के  ग्रहों का विशेष स्थान था। इन ग्रहों में वृहस्पति यानि जुपिटर सबसे शक्तिशाली माना जाता था। यहाँ तक कि उसकी पत्नी जूनो और पुत्री मिनर्वा की भी पूजा होती थी। ग्रीस की सभ्यता से प्रभावित होने के चलते इन सब देवों की मूर्तियाँ मनुष्यों जैसी ही थीं।

हरक्यूलस विक्टर का मंदिर
रोमन मंदिरों के भीतरी कक्ष में इष्ट देवों को स्थापित किया जाता था। धार्मिक गतिविधियाँ जिनमें अनुष्ठान के साथ बलि की भी मान्यता थी वो कक्ष के बाहर संपादित की जाती थीं। हर मंदिर के बाहर का आँगन या बरामदा गोलाकार स्तंभों से सजा होता था जो ग्रीस की वास्तुकला से प्रभावित था।

कॉलोसियम की ओर जाते वक्त सबसे पहले मेरी नज़र हरक्यूलस विक्टर के मंदिर पर पड़ी। ये मंदिर ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी का बना मंदिर है जिसकी पहचान इसके चारों ओर बने वृताकार स्तंभ है। इसके समीप एक और मंदिर है जिसे Temple of Portunas भी कहा जाता है। पोरच्यूनस दरवाजे, तालों, मवेशियों और खलिहानों के देवता थे। ये सारी चीज़े उस वक़्त जनता के लिए कितनी कीमती रही होंगी आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं।

Thursday, June 6, 2019

डॉग पार्किंग से रहस्यमयी टॉयलेट तक : क्या है रोम का अनैतिहासिक चेहरा? The other side of Rome, Italy

पीसा के बाद मेरा अगला पड़ाव था रोम का ऍतिहासिक शहर पर आज मैं रोम के इतिहास की बात नहीं करने वाला बल्कि आज पहले वहाँ से जुड़ी दस मजेदार बातें बताना चाहता हूँ जो मैंने अपने अल्प प्रवास में  गौर कीं। भले ही ये सब मैंने रोम में देखा पर मेरे ख्याल से इनमें से ज्यादातर वाकये पूरी इटली पर लागू होते हैं। तो चलिए आपको दिखाएँ रोम की कुछ रोचक झलकियाँ..

इटली की भाषा con eni gas e luce hai tutto sotto controllo :) 

तो शुरुआत इटली की भाषा से। फ्रेंच के ठीक उलट इटालवी भाषा मुँह पर सहज ही चढ़ जाती है। यहाँ के लोग जिस तरह शब्दों को खींच के बोलते हैं, ट को त बना देते हैं और बोलते वक्त आँखों के साथ पूरे चेहरे की भाव भंगिमाएँ ही बदल डालते हैं उसने मुझे इस भाषा की ओर शीघ्र ही आकर्षित कर लिया। अगर आप अंग्रेजी समझते हों तो मान लीजिए कि सिर्फ 'O' प्रत्यय लगाकार आपने इटालवी भाषा के भी कई शब्द सीख लिए। चलिए अब ऊपर की तस्वीर को ध्यान से देखिए। 

बिलबोर्ड से झाँकती कन्या कह रही है con eni gas e luce hai tutto sotto controllo। अब  Eni अगर ब्रांड  का नाम है तो इतना तो आप तुक्का लगा ही सकते हैं कि वाक्य में gas और control का जिक्र है। वैसे मोहतरमा कहना चाहती हैं कि  With Eni gas and light you have everything under control  :)

रोम नगरी का बहुतेरा हिस्सा इन हल्की भूरी और क्रीम रंग की इमारतों से भरा है।

पूरा शहर बादामी और हल्के भूरे रंग से रँगा नज़र आता है जो मुझे बाहर से तो नीरस रंग लगा। 

नाज़ियों के खिलाफ दीवार पर ग्रैफिटी
वैसे तो इटली ने दूसरा विश्व युद्ध मुसोलनी के नेतृत्व में जर्मनी और जापान के साथ लड़ा था पर इस युद्ध में इस तिकड़ी की सबसे कमजोर कड़ी यही था और इसीलिए घुटने टेकने में पहला भी। आज वैसे तो इटली के सम्बन्ध  बाकी यूरोपीय देशों से अच्छे हैं पर प्रचार के बीच नाजियों को गाली देती ये ग्राफिटी जर्मन समुदाय के प्रति लोगों  के अंदर के रोष को ही प्रकट करती हुई दिखती है।

पेड़ कैसे कैसे..कहीं शंकुनुमा
रोम के चारों ओर और शहर के अंदर कुछ पेड़ बड़े अलग सा रूप लेकर सामने आए। शंकुधारी और लॉलीपॉप   सरीखे इन पेड़ों के नाम तो मुझे नहीं मालूम पर ये पूरे शहर को एक अलग सी सुंदरता जरूर प्रदान करते हैं।

....तो कहीं लॉलीपॉप से
अस्सी का दशक याद है आपको जब देश के विभिन्न प्रदेशों में दूरदर्शन के ट्रांसमीटर लगने शुरु हुए थे और उसी के साथ धीरे धीरे बढ़ा था बहुमंजिली इमारतों पर आड़े तिरछे लंबे लंबे एंटेना का मकड़जाल। इन्ही एंटेना को घुमा घुमा कर प्रसारण गुणवत्ता सुधारने में बहुतों ने तब महारत हासिल की थी। 

एंटेना का मकड़जाल

रोम में घुसते ही जब ऐसा ही बेतरतीब जाल दिखा तो लगा चलो किसी मामले में तो इस यूरोपीय देश से आगे निकले। इटली में आज भी प्राइवेट डिश आपरेटरों की तुलना में फ्री टू एयर चैनल का प्रसारण करने वाले टेरेरेस्टियल चैनलों का बोलबाला है।  सरकारी नीतियाँ ही कुछ ऐसी हैं कि इटली के हर इलाके के लिए अलग अलग डिश टीवी आपरेटर हैं। नतीजा ये कि एक ओर तो ये मँहगे हैं तो दूसरी ओर एक साथ उनका कांटेंट पूरे देश में उपलब्ध भी नहीं।

हमने तो कब का बंबई को मुंबई बन दिया पर इटली बांबे को नहीं भूला है।
भारतीयों की आवाजाही जिस तरह विश्व में बढ़ रही है वैसे ही भारतीय व्यंजन परोसने वाले रेस्त्राँ की भी।  विश्व का शायद ही कोई कोना हो जहाँ भारतीय भोजन की धमक ना पहुँची हो। बहरहाल अगर कोई इटली में है तो भारतीय स्वाद से हटकर अठारहवीं शताब्दी में यहाँ के शहर नेपल्स से प्रचलित हुआ पिज्जा उसकी पहली पसंद क्यूँ ना हो? वैसे भी ये जानने का मन तो भारतीय पिज्जा प्रेमियों का करता ही है कि आखिर डोमिनो और पिज्जा हट की दुनिया से परे इटली के वास्तविक पिज्जा का स्वाद कैसा है?

पिज्जा जो इटली का सर्वाधिक लोकप्रिय व्यंजन है विश्व में।
भारत में रहने वाले लोगों के लिए वेस्पा एक जाना पहचाना नाम है। यहाँ  बजाज को अगर किसी स्कूटर ब्रांड ने चुनौती दी तो वो एल एम एल वेस्पा ही थी। वैसे वेस्पा ब्रांड की शुरुआत इटली में  पिआजियो ने तब की थी जब भारत आजाद हुआ था। आजकल भारयीय सड़कों पर वेस्पा के नए मॉडल फिर से दिखाई दे रहे हैं। यही वजह थी कि रोम की सड़कों पर इस स्कूटर को देखना मन को एक ख़ुशी दे गया ।

ये लीजिए आपका जाना पहचाना ब्रांड वेस्पा रोम की सड़कों पर
कॉफी या कोल्ड ड्रिंक वेंडिंग मशीन तो आपने हर जगह देखी होंगी पर कंडोम वेडिंग मशीन, वो भी रोमन कैथलिक चर्च के मुख्यालय रोम में आप जगह जगह देख पाएँगे। आश्चर्य की बात ये है कि इस बात को लेकर अमेरिकी भी उतने ही आश्चर्यचकित हो रहे थे जितना कि संकोची एशियाई समाज से आने वाले हमारे जैसे लोग। उनके चकित होने की वजह ये है कि कैथलिक चर्च अमेरिका में लोगों को बर्थ कंट्रोल से विमुख करता है और यहाँ उसके मुख्य केंद्र में ऐसी मशीनें रखी जा रही हैं । बाद मैं मैंने एक जगह इस विषय पर एक अमेरिकी टिप्पणी पढ़ी

In the land of the catholic church, they supply condoms for those "in need." In the U.S., they want to do away with birth control. Kind of makes your head spin, doesn't it?

कंडोम वेंडिंग मशीन और साथ में डॉग पार्किंग !
इटली के मदिरालय में कॉफी भी मिलती है और वहाँ की सर्विस, वेडिंग मशीन जैसी ही त्वरित है। इसलिए मशीनों की ये परंपरा वहाँ नयी है। कंडोम के आलावा सिगरेट भी इन मशीनों से खरीदी जा सकती हैं।

पता नहीं आपने गौर किया या नहीं कि इस मशीन के साथ नीचे ही एक हुक बना है। हुक के ठीक नीचे लिखा है डॉग पार्किंग यानि कुत्तों की पार्किंग। चौंक गए ना आप? यहाँ तो आप ढंग की कार पार्किंग के लिए परेशान हो जाते हैं और वहाँ इटली में किसी स्टोर में घुसने से पहले अपने कुत्तों को आप इन हुक में बाँध कर यानी  park  कर  खरीदारी कर सकते हैं। कुत्तों को अपने साथ सफर करने के लिए जर्मनी की तरह इटली भी अपने नियमों में काफी लचीला है। मतलब  Dog loving nation के तौर पर इटली का भी नाम लिया जा सकता है।

पेंट छिड़ककर दीवारों पर उल्टी सीधी ग्राफिटी करने का रोग रोम में तो मुझे गंभीर नज़र आया।
अगर आप इटली में है और आपको शौचालय के लिए टॉयलेट लिखा नहीं दिख रहा तो फिर बॉन्यो (Bagno) शब्द ढूँढिए। याद रखिए इसमें g साइलेंट और बोलते वक़्त अंत में 'o ' के पहले खामखा एक अदृश्य 'y' आ जाता है। अगर वो भी ना दिखे तो किसी से पूछ लीजिए डोवेल बॉन्यो यानी  शौचालय कहाँ है ?

पेंट से लिखी जाने वाली ग्राफिटी की समस्या तो आजकल भारत में भी देखी जा रही है पर ये कहाँ से आई है ये आप इस शौचालय की बाहरी दीवार को देख कर समझ सकते हैं।

बाहरी महादेशों से यूरोप में विचरण करने वालों के लिए सबसे रहस्यपूर्ण है इटालियन टॉयलेट। आप कहेंगे अब शौचालय में ऐसा क्या चौंकाने वाला हो सकता है जिसकी अलग से चर्चा करनी पड़े? दरअसल इटली के बाथरूम में घुसते ही आपको एक की बजाए दो टॉयलट सीट दिखेंगी। एक तो वैसी ही जो अपने यहाँ पश्चिमी रंग में रँगे शौच में दिखती है और दूसरे उसके समानांतर, जो दिखती तो वाशबेसिन जैसी है पर जिसकी ऊँचाई सिर्फ टॉयलेट सीट जितनी ही होती है। खा गए ना चक्कर?

मैं जब इटली गया था यो इसके बारे में थोड़ा बहुत पढ़कर अंदाजा हो गया था पर मैंने इसका प्रयोग किया ही नहीं यानी भारतीय अंदाज में ही अपना काम निबटा दिया। दरअसल दूसरी सीट बिडेट के नाम से जानी जाती है। पहली में आपको शौच करना है और दूसरी में बिना अपने हाथ का इस्तेमाल किए, बैठते हुए करनी है अपनी सफाई। सीट पर बैठकर जिस ओर की सफाई करनी है ऊधर मुँह घुमाकर बैठ जाइए और नल को खोल दीजिए। बिडेट में गीले होने के बाद शरीर को सुखाने के लिए बाथरूम में छोटे पर बेहद पतले तौलिए होते हैं जो की सामान्य तौलिये के साथ ही आपको लटके मिलेंगे ।

क्या आपको पता है इटालियन शौचालय का रहस्य ?
दरअसल इटली में ये परंपरा फ्रांस के धनाढय वर्ग से होती हुई पहुँची जिन्हें साफ सफाई के लिए थोड़ा नफासत वाला अंदाज पसंद था। इटली वालों को ये तरीका इतना जँच गया कि ज्यादा जगह घेरने के बाद भी वो अधिकांश जगह इसका इस्तेमाल करते हैं वहीं जापान ने बिडेट की प्रक्रिया एक ही टॉयलेट सीट में एकीकृत कर दी है।

रोम शहर की इन झलकियों के बाद ले चलूँगा मैं आपको इसकी विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक इमारतों की तरफ इस कड़ी के अगले भाग में..। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें।


Sunday, May 19, 2019

क्यों झुकी पीसा की मीनार Leaning Tower of Pisa, Italy

पिछले महीने आपको अपनी इटली यात्रा की पहली कड़ी में फेरारी के संग्रहालय  की सैर कराई थी। उस सुबह संग्रहालय देखने से ज्यादा रोमांच दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक पीसा की मीनार देखने का था। मारानेल्लो जहाँ फेरारी का संग्रहालय है से पीसा की दूरी करीब दो सौ किमी की है।


यूँ समझ लीजिए कि हमें इटली के उत्तर मध्य इलाके से उसके पश्चिमी तटीय इलाके की ओर रुख करना था। इटली का उत्तरी चौरस भाग जहाँ फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी और आस्ट्रिया जैसे देशों से घिरा हुआ है वहीं दक्षिणी भाग के लंबे पतले सिरे के दोनों ओर समुद्र हैं। दक्षिण पूर्वी इटली की सीमाएँ एड्रियाटिक सागर तय करता है जबकि दक्षिण पश्चिम में टीरेनियन। नेपल्स की तरह पीसा और रोम टीरेनियन से बिल्कुल सटे ना होकर थोड़े ही दूर हैं जबकि वेनिस  इसके पूर्वी तट की शान हैं।

हरी भरी पहाड़ी के बीच छिपा इटली का एक गाँव

मारानेल्लो के इलाके से निकलते ही हमारी बस हमें हरे भरे पहाड़ों के बीच ले आई। ये मंज़र ज्यादा देर हमारे साथ नहीं रहा और आधे घंटे के अंदर हम इटली के मध्यवर्ती मैदानी इलाके में थे। कुछ देर सड़क के दोनों ओर छोटे छोटे घरों के चारों ओर एक ही फसल की बुआई किए गए बड़े बड़े फार्म दिखाई देने लगे। भारत की तरह यूरोप में छोटे खेत आप शायद ही देखेंगे। अगर इटली की बात करूँ  तो यहाँ हर किसान के पास औसतन आठ हेक्टेयर की ज़मीन है। 

ग्रामीण क्षेत्रों के खेत खलिहान
इटली में घूमते हुए मुझे एक बात खास लगी वो ये कि यहाँ के ग्रामीण इलाकों के अधिकांश घरों का रंग रोगन क्रीम या पीले से मिलते जुलते रंगों से ही किया जाता है। छतें अवश्य खपरैल के गेरुए भूरे रंग की दिखाई दीं।
साँप की तरह लहराते पौधे और गमलों में पॉम की एक नस्ल
गाड़ी चलाने वाला भटक ना जाए इसके लिए सामान्य साइनबोर्ड के आलावा पूरी सड़क पर ही बड़े बड़े अक्षरों में मुख्य शहरों की ओर जाती सड़कों को प्रदर्शित करने का यहाँ चलन हैं यानी दूसरे शब्दों में कहें तो यहाँ की सड़कें अपने आप में ही पथप्रदर्शक का काम करती हैं।
सीधी सड़क रोम को और दाँयी ओर रास्ता जा रहा है पीसा को
करीब ढाई घंटे के सफ़र के बाद हमारा समूह पीसा के छोटे से शहर में दाखिल हो चुका था। पीसा में जहाँ झुकी मीनार है वो यहाँ के कैथेड्रल यानी बड़े गिरिजाघर परिसर का हिस्सा है। इस परिसर मैं फैली इमारतों को यहाँ का चमत्कारिक मैदान यानी Field of Miracles भी कहा जाता है। मुख्य सड़क से एक पतली सी राह परिसर के मुख्य दरवाजे तक लाती है। इस सड़क के दोनों ओर यहाँ सोविनियर  बेचती छोटी छोटी दुकाने हैं। परिसर में घुसते ही आपको दाँयी ओर कुछ संग्रहालय और पर्यटक सूचना केंद्र मिलेगा जबकि बाँयी ओर एक हरे भरे मैदान के बीच यहाँ की बैपटिस्ट्री दिखाई देगी।

संग्रहालय और पर्यटक सूचना केंद्र

घास की मखमली चादर के बीच बैपटिस्ट्री के शानदार गुंबद को देख कर आगुंतक अभिभूत हो जाता है। ये इटली की सबसे विशाल बैपटिस्ट्री के रूप में जानी जाती है।  ये इमारत रोमन और गोथिक शैली के मिश्रण का अनुपम उदाहरण है। रोमन शैली में बनी इमारतों में अर्ध चंद्राकार मेहराबों का प्रचुरता से इस्तेमाल होता है जैसा आप इस बैपटिस्ट्री के निचले भाग में देख सकते हैं जबकि ऊपरी भागों में तिकोनी मेहराब दिखाई देती हैं जो कि गोथिक स्थापत्य कला की पहचान है। 
पीसा बैपटिस्ट्री Pisa Baptistery
अगर आप ईसाई धर्म के रीति रिवाज़ों से परिचित हैं तो ये जानते ही होंगे कि दूसरे धर्मों के लोगों और बच्चों को ईसाई धर्म अंगीकार करने की शुरुआत बैपटिज्म नामक प्रथा से की जाती है। ये आयोजन जिस भवन में होता है उसे ही बैपटिस्ट्री कहते हैं। अगर आप इस आलेख के पहले चित्र को देखेंगे तो इस बैपटिस्ट्री को भी दाँयी ओर ज़रा सा झुका पाएँगे। बैपटिस्ट्री में अंदर जाने का अलग से टिकट लगता है जो मैंने नहीं लिया और यहाँ के मुख्य गिरिजाघर की ओर चल पड़ा।
Pisa Cathedral
इस परिसर की सबसे पुरानी इमारत यहाँ का गिरिजाघर है। गिरिजे का ऊपरी भाग चारा समानांतर खंभों की कतारों पर टिका है। अंदर की दो कतारों के बीच बैठने के लिए लकड़ी के बेंच लगे हैं जिसके बीचो बीच चलकर आप जीसस की छवि के पास पहुँच सकते हैं। छत पर लकड़ी के फ्रेम पर नक्काशी कर सोने के पानी चढ़ा दिया गया है।

जीसस की छवि के ठीक ऊपर छत पर वर्जिन मेरी को अन्य संतों के साथ दिखाया गया है। किनारे की दीवारें चित्रित हैं पर ऊँचे ऊँचे खंभों की दीवारें बिना किसी नक्काशी के हैं। रोशनदानों की काँच पर रंग बिरंगी आकृतियाँ जरूर उकेरी गयी हैं जो आकर्षक लगती हैं। मुझे याद आया कि काँच पर ऐसी चित्रकला मैंने पहले राजस्थान के महलों में भी देखी थी। हमारे धनी रजवाड़े बड़े शौक़ से अपने महलों में काँच का काम यूरोप से कराते रहे हैं।

गिरिजे का प्रार्थना कक्ष

पीसा का बडा गिरिजा Pisa Cathedral
चूँकि ये भवन ग्यारहवीं शताब्दी में बनना शुरु हुआ इसकी संरचना रोमन स्थापत्य कला पर आधारित रही। परिसर के अंदर दो खंभों के बीच अर्ध चंद्राकार मेहराबें तो हैं ही, इसके प्रवेश द्वार पर भी इस शैली की अमिट छाप है।

गुंबद पर बना जीसस का चित्र, किनारे की दो कतारों के खंभों के बीच से दिखता दृश्य
गिरिजाघर के ठीक पीछे यहाँ का घंटा घर है जिसे हम पीसा की झुकी मीनार के नाम से जानते हैं। कौन जानता था कि इंजीनियरिंग की एक भूल इस मीनार का शुमार दूनिया के सात अजूबों में करने में सफल हो जाएगी। इस घंटाघर का निर्माण गिरिजाघर और बैपटिस्ट्री के बनने के बाद बारहवीं शताब्दी में हुआ। इंजीनियरिंग में भवन बनाने के पहले उस स्थान की Soil Bearing Capacity मापी जाती है जो ये बताती है कि इमारत की नींव प्रति वर्ग मीटर कितना वजन सह पाएगी। कई बार बिना परीक्षण किए भी आस पास की भूमि के पहले से उपलब्ध आँकड़ों पर ये काम होता है। 

बारहवीं शताब्दी में किस प्रक्रिया का अनुसरण किया गया ये तो पता नहीं पर हुआ ये कि मीनार के एक तरफ की भूमि अपेक्षाकृत मुलायम निकली जिससे  मीनार उस ओर झुकने लगी। दूसरे तल्ले के बनने के बाद निर्माण का दोष सबकी नज़र में आया और काम वहीं रोक देना पड़ा। फिर लगभग एक शताब्दी तक पीसा के युद्ध में फँसे रहने की वजह से काम आगे नहीं बढ़ पाया। आपको जान कर ताज्जुब होगा कि निर्माण शुरु होने के लगभग दो सौ साल के बाद इस मीनार में वो घंटियाँ लगाई गयीं जिसके लिए ये घंटाघर बना था।

इंजीनियर क्या नींव  ठीक करेंगे? कैमरे का कमाल इसे पल भर में सीधा कर सकता है। 😀
एक ओर से निरंतर धँसते रहने की वज़ह से एक समय इस पूरी इमारत के गिरने का खतरा उत्पन्न हो गया। नब्बे के दशक में इस इमारत को पर्यटकों के लिए बंद कर इसके पुनरुद्धार का काम शुरु हुआ। नींव की मजबूती के बाद अब अभियंताओं का दावा है कि ये मीनार दो सौ साल तक आसानी से इस अवस्था में संतुलित रह सकती है।

पीसा और ताजमहल की एक मीनार
56 मीटर ऊँची पीसा की ये सात मंजिला मीनार सादगी और शालीनता की प्रतिमूर्ति लगती है। मेहराबों की एकरूपता और इसका सफेद रंग मन में निर्मलता जगाता है। । इन इमारतों के पीछे की कहानियाँ तो हम बाद में जानते हैं पर इन्हें नज़दीक से आँखों में भर कर जब भी देखते हैं तो एक अलग ही अहसास तारी होता है... शांति का सुकून का। कुछ पल के ही लिए ही सही अपने आप को भूल जाने का..। मन करता है बैठे रहें इस अहसास को पकड़ कर.. निहारते रहें कुशल कारीगरों के बनाए इन अद्भुत प्रतिमानों को ...पर इस मशीनी युग में इतनी फुर्सत कहाँ दी है हमने अपने आप को

प्रथम तल पर की गयी नक्काशी
कुतुब मीनार से उलट पीसा की मीनार में अतिरिक्त टिकट लेकर आप अंदर जा सकते हैं पर एक समय मीनार के अंदर एक निश्चित संख्या में ही लोग प्रवेश कर सकते हैं। यही वज़ह है कि अगर टिकट लें तो ये देख लें कि आपके पास कुछ अतिरिक्त समय है या नहीं? मीनार के बगल से एक रास्ता इस परिसर के बाहर बनी रंगीन इमारत को जाता है। इन इमारतों में एक ज़माने में यहाँ काम करने वाले कारीगर और कर्मचारी रहा करते थे। आज इसका इस्तेमाल आपेरा हाउस की तरह होता है। इन इमारतों से लगा यहाँ एक प्राचीन समाधि स्थल भी है।

नृत्यशाला की छाँव में आराम करते पर्यटक (Opera House)
पीसा की मीनार से बाहर निकलते ही भगवा कपड़ों में लिपटे इन तथाकथित योगियों को हवा में लटके देख के आपको भारत की याद आ जाएगी। विश्व में भारतीय संतों के पानी पर चलने, हवा में तैरने की कहानियाँ इतनी प्रचलित हैं कि यहाँ कुछ भारतीय हवा में लटकने का करतब दिखा कर पैसे इकठ्ठा करते हैं। पीसा के चमात्कारिक मैदान के बाहर इन्हें देख कर मैं भी सकते में आ गया। बाद में पता चला कि ये सारा कारनामा इनके कपड़ों में छिपी छड़ों और प्लेटों की संरचना से संभव होता है यानी ऊपर हवा में लटकता व्यक्ति एक प्लेट पर बैठा होता है और उसका संतुलन एक दूसरी प्लेट  से होता है जिसके ऊपर नीचे वाला व्यक्ति बैठा है।

योग का छलावा है ना मजेदार

तो कैसी लगी आपको पीसा की ये यात्रा? इटली यात्रा की अगली कड़ी में ले चलेंगे आपको इटली की ऐतिहासिक राजधानी रोम में। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें।


इटली यात्रा में अब तक

Sunday, May 5, 2019

कैसी थी अंतिम मुगल शासकों की जीवन शैली ? Book Review : City of my Heart !

अगर आप एक अच्छे यात्री या यात्रा लेखक बनना चाहते हैं तो आपको अपने इतिहास से भी लगाव होना चाहिए क्यूँकि तभी आप ऐतिहासिक इमारतों, संग्रहालयों और अपनी संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के उद्गम से जुड़ी बहुत सी बातों को एक अलग नज़रिए से देख सकेंगे। यूँ तो किसी भी ऐतिहासिक इमारत में जाते वक़्त हमारा पुरातत्व विभाग उनके बारे में जरूरी जानकारी मुहैया कराता है पर जब वही बात  किसी किताब में आप एक प्रसंग या किस्से के तहत पढ़ते हैं तो वो हमेशा के लिए याद रह जाती है।

पुस्तक आवरण 

इसलिए मुझे जब कुछ महीने पहले राणा सफ़वी द्वारा आख़िरी मुगलों की जीवन शैली, किले के अंदर लोगों के रहन सहन और गदर के बाद शाही खानदान पर आई मुसीबतों पर लिखी किताबों के अंग्रेजी अनुवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देने का अवसर मिला तो मैंने झट से अपनी हामी भर दी। 247 पन्नों की इस किताब को पढ़ने में मुझे करीब दो महीने का वक़्त लग गया। उसकी एक वज़ह ये भी रही किताब का अधिकांश हिस्सा किसी सफ़र के दौरान पढ़ा गया। 

City of my Heart चार पुस्तकों बज़्म ए आखिर, दिल्ली का आखिरी दीदार, किला ए मुआल्ला की झलकियाँ और बेगमात के आँसू का एक संग्रह है। इसमें पहली दो किताबें मुख्यतः उस दौरान किले में मनाए जाने वाले उत्सवों, रीति रिवाज़ और खान पान की बातें करती हैं जबकि तीसरी किताब में किले के अंदर की झलकियों के साथ सत्ता के लिए चलते संघर्ष का भी विवरण मिलता है। बेगमात के आँसू में शाही खानदान के उन चिरागों का जिक्र है जो अंग्रेजी हुकूमत के कत्ले आम से बच तो गए पर जिनके लिए शाही जीवन से आम व्यक्ति सा जीवन जीना बड़ा तकलीफ़देह रहा।

इन किताबों के कुछ लेखक इन घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी रहे तो कुछ ने उस समय के किस्से कहानियाँ अपनी पिछली पीढ़ियों के हवाले से सुनी। अब किताब चूँकि दिल्ली के बारे में है इसलिए प्रस्तावना में राणा सफवी ने बड़े रोचक तरीके से दिल्ली के नामकरण और सम्राट अशोक के ज़माने सो होते हुए तोमर, खिलजी, तुगलक और मुगलों के समय में अलग अलग हिस्सों में बढ़ती और निखरती दिल्ली का खाका खींचा है। लाल किले के विभिन्न हिस्सों का उपयोग किन उद्देश्यों के लिए होता रहा इसका उल्लेख भी किताब में है।

राणा सफ़वी 
इस पुस्तक में जिस दौर की बात की गयी है तब मुगल साम्राज्य का अस्ताचल काल था। बादशाह अंग्रेजों की बँधी बँधाई पेंशन का मोहताज था और उसका राज काज में दखल, किले के बाशिंदों से जुड़े मामलों व सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सवों के आयोजन तक ही सीमित था। इन हालातों के बावज़ूद जिस शान शौकत का वर्णन बज़्म ए आखिर और दिल्ली का आखिरी दीदार में मिलता है उससे सिर्फ अंदाज़ ही लगाया जा सकता है कि अकबर से औरंगजेब के शासन काल तक किले के अंदर क्या रईसी रही होगी। 

किले में मनाये जाने वाले हर त्योहार से जुड़ी कुछ रवायतें रहीं जो आज तक हमारी मान्यताओं में शामिल हैं। मसलन दशहरे के समय नीलकंठ का दिखना आज भी इतना ही शुभ माना जाता है। पुस्तक में इस बात का जिक्र है कि हर दशहरे में नीलकंठ को लाकर उड़ाने का दस्तूर था। ईद, बकरीद, फूलवालों की सैर व उर्स के मेलों के साथ तब होली दीवाली भी धूमधाम से मनती थी जो कि किले के अंदर के सामाजिक सौहार्द का परिचायक था।  ईद में खेले जाने वाले खेल का एक दिलचस्प विवरण किला ए मुआल्ला की झलकियाँ में कुछ यूँ बयान होता है....
"ईद ए नवरोज़ के दिन राजकुमारों व कुलीन जनों के बीच अंडों से लड़ाई होती थी। इसले लिए एक विशेष तरह की मुर्गियों का इस्तेमाल होता था जिन्हें सब्जवार कहते थे।  इसके छोटे नुकीले अंडों की ऊपरी परत कठोर हुआ करती थी। त्योहार के कुछ महीने पहले तीन सौ रुपए जोड़े में ये मुर्गियाँ खरीदी जाती थीं और इनसे पाँच से छः अंडे तैयार हो जाया करते थे। प्रतियोगिता के दिन लोग नुकीले सिरे को सामने रखते हुए एक दूसरे के अंडों पर निशाना लगाते थे। जिसका अंडा पहले टूटता था उसकी हार होती थी. हजारों रुपयों की बाजियाँ लगती थीं। आम जनता सामान्य अंडों से बाद में यही खेल खेला करती थी।"

मुगलयी खान पान में जिसकी रुचि है और जो उस वक़्त के पकवानों के बारे में शोध करने में दिलचस्पी रखते हैं उनके लिए शाही मेनू से गुजरना बेहद उपयोगी रहेगा। बज़्म ए आखिर में खानपान के पहले की गतिविधियों का जिक्र कुछ यूँ होता है

"परिचारिकाएँ अपने सर पर टोकरियों में भोजन बैठक में लाती हैं।  पंक्ति में खड़े होकर खाना एक दूसरे से होते हुए शाही मेज तक पहुँचता है। सात गज लंबे और तीन गज चौड़े दस्तरखान के ऊपर सफेद रंग का कपड़ा बिछता है। इसके बीच में दो गज लंबी और डेढ़ गज चौड़ी और छः उँगली ऊँची एक मेज लगायी जाती है जिस पर तरह सील किए हुए पकवान रखे जाते हैं। रसोई प्रबंधक बादशाह के सामने बैठता है और खाना परोसता है।"

अब खाने में रोज़ क्या क्या परोसा जाता था उसकी फेरहिस्त देखेंगे तो लगेगा कि बादशाह और शाही परिवार ऐसा भोजन रोज़ रोज़ खा कर अपना हाजमा कैसे दुरुस्त रखते होंगे? स्टार्टर से लेकर मीठे तक विविध पकवानों का मास्टर मेनू देख के आप सभी चकित रह जाएँगे। सिर्फ पुलाव की बात करूँ तो मोती पुलाव, नूर महली पुलाव. नुक्ती पुलाव, नरगिसी पुलाव, किशमिशी पुलाव, लाल पुलाव , मुजफ्फरी पुलाव, आबी पुलाव, सुनहरी पुलाव, रुपहली पुलाव, अनानास पुलाव, कोफ्ता पुलाव... अंतहीन सूची है कितनी लिखी जाए। मेनू के कुछ हिस्से की बानगी चित्र में आप ख़ुद ही देख लीजिए।

शाही व्यंजनों की फेरहिस्त का कुछ हिस्सा

खान पान के बाद बात कुछ मौसम की। किताब में अलग अलग मौसम में शाही परिवार के क्रियाकलापों का विस्तार से वर्णन किया गया है।  दिल्ली में रहने वाले तो आजकल थोड़ी देर की बारिश और उमस से परेशान रहा करते हैं। उस ज़माने में दिल्ली के मानसून का मिज़ाज देखिए
"जब बारिश आठ से दस दिनों तक होती थी और मानसूनी बादल टस से मस होने का नाम नहीं लेते। कभी पानी की फुहारें आतीं तो कभी  मूसलाधार बारिश होती। लोग खुले आसमान और सूखे दिन के लिए तरसते। कभी कभी सूरज अपनी झलक दिखला जाता। रात में बादलों के झुरमुट से तारे नीचे ताकते तो ऐसा लगता कि जुगनू चमक रहे हों।"

किले के अंदर सत्ता के संघर्ष की छोटी छोटी घटनाओं का ऊपरी जिक्र यदा कदा किताब में मिलता है पर ऐसे विवरणों में वो गहराई नहीं है जिससे इतिहास के छात्र लाभान्वित हो सकें। इतना तो साफ है कि मुगल साम्राज्य का नैतिक पतन औरंगजेब के बाद ही होना शुरु हो गया था। मुगल साम्राज्य के अंतिम पचास सालों में ज्यादातर बादशाह और शहजादे अय्याश और अकर्मण्य थे और मंत्रियों और सरदारों के इशारों पर खून के रिश्ते को दागदार बनाने का मौका नहीं चूकते थे। भाई भाई को, रानियाँ अपने सौतेले पुत्रों को और पुत्र पिता को अपने रास्ते से हटाने के लिए किसी भी हद जाने को तैयार हो जाते थे। बहादुर शाह जफर से जुड़ी ऐसी ही एक घटना का उल्लेख पुस्तक में कुछ इस तरह से आता है
"एक बार बहादुर शाह जफर के स्वागत के लिए जश्न के साथ किले में एक दावत का आयोजन था। दावत के बाद संगीत की महफिल जमी तो बहादुर शाह उसमें तल्लीन हो गए। उनको मारने के लिए उनके एक पुत्र की ओर से पान का बीड़ा भिजवाया गया जिसमें बाघ की मूँछों के बाल भी डाल दिए गए थे। पान खाने के तुरंत बाद ही बादशाह की तबियत खराब हो गयी। पान  में कुछ मिलावट की आशंका से हकीमों ने उनको उल्टियाँ कराने की दवा दी जिसमें खून के साथ वो बाल भी बाहर निकल आया। 
तफ्तीश के दौरान शहज़ादे की इस साजिश का पता लग गया। तबियत ठीक होने की खुशी में एक उत्सव का आयोजन हुआ जिसमें उस शहज़ादे को भी बुलाया गया। बादशाह ने उसके लिए जहर भरा शर्बत भी तैयार कर रखा था। शहज़ादे को पता था कि अब उसके साथ क्या होने वाला है, फिर भी वो वहाँ सर झुकाए हाथ जोड़ते हुए पहुँच गया। बादशाह ने शर्बत का गिलास हाथ में लेकर कहा, बेटा तुमने जो मुझे बाघ के मूँछ का बाल दिया था उसके बदले में मैंने तुम्हारे लिए जहर भरा शर्बत बनवाया है। 
शहज़ादे ने कुछ कहना चाहा पर बादशाह उससे पहले ही बोल उठे मेरा बुरा चाहने वाले मनहूस तुम अब मेरे हुक्म ना मानने की भी गलती करना चाहते हो? 
शहज़ादे ने जहर मिला शर्बत पिया और वहीं तड़पते हुए जान दे दी।"

किताब को पढ़ने के बाद दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं कि किले के बाहर और नजदीकी क्षेत्रों में रह रही रियाया की हालत से शाही खानदान को शायद ही कोई लेना देना था। किले के अंदर रहने वाले उनके टुकड़ों पर पलते थे इसलिए उनके वफादार रहे। शाही खानदान को जिन नाज़ नखरों से पाला जाता रहा यही उनकी दुर्दशा का कारण बना। जब वे अंग्रेजों से डरकर भागे तो शहर से बाहर गाँवों में रहने वालों ने भी उन पर तरस नहीं खाया। आपको पढ़कर ताज्जुब होगा कि शाही युवा अपनी ज़िन्दगी में दौड़ना तो दूर कुछ दूर पैदल भी नहीं चले थे। उन्होंने जीवन भर हुक्म चलाना सीखा था, कुछ काम करना नहीं। इसलिए शाही खानदान से जुड़े कई लोगों को बाद में भीख माँगकर गुजर बसर करनी पड़ी। उनमें से जो थोड़े बहुत खुद्दार थे उन्होंने जरूर मेहनत मजदूरी कर अपना स्वाभिमान बचाए रखा।

शुरुआत की दो किताबों का मूल विषय एक ही है। हर रस्म की अदाएगी में होने वाले ताम झाम का विवरण पढ़कर पाठकों की किताब में रुचि बनाए रखना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही इस पुस्तक का सबसे कमजोर पक्ष है। हालांकि किले से जुड़ी झलकियाँ और गदर के बाद शाही खानदान से जुड़ी कहानियाँ पहले भाग से अपेक्षाकृत अधिक रोचक हैं। 

ये पुस्तक उन लोगों को जरूर पढ़नी चाहिए जो मुगलकालीन धार्मिक और सांस्कृतिक रीति रिवाज़ों, उस समय के पहनावे व खान पान में विशेष रुचि रखते हों या उन पर शोध करने के अभिलाषी हों । किताब में जिन व्यंजनों और पहनावों का जिक्र हुआ है उस पर जहाँ तक संभव हो सका है अनुवादिका ने पुस्तक के परिशिष्ट में उनके बारे में अतिरिक्त जानकारी देने की कोशिश की है जो कि काबिलेतारीफ़ है।

आमेजन पर ये किताब यहाँ उपलब्ध है

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