Tuesday, December 3, 2019

घुमक्कड़ी दिल से ...कुछ देशी..कुछ विदेशी यात्रा संस्मरण

दीपावली से लेकर अभी तक नागपुर, पेंच और फिर ओड़ीसा के सिमलीपाल राष्ट्रीय उद्यान का सफ़र कम अंतराल पर हुआ। सोचा था इसी बीच रण महोत्सव के बीच कच्छ की यादें ताज़ा करूँगा पर उसके लिए समय ही नहीं निकल पाया। पिछले महीनों को इन यात्राओं में आनंद बहुत आया और इन्हीं यात्राओं के बीच धीरे धीरे यात्रा से जुड़ी एक किताब भी खत्म की जिसका नाम है घुमक्कड़ी दिल से



इसे लिखा है अलका कौशिक ने। अलका जी ने पत्रकारिता और अनुवाद की दुनिया में दो दशक बिताने के बाद यात्रा लेखन का दामन थामा। अपनी देश विदेश की यात्राओं के इन्हीं लमहों को उन्होंने एक पुस्तक का रूप दिया है ।  अलका जी से मेरी मुलाकात सात साल पहले लखनऊ में यात्रा लेखकों व पत्रकारों के सम्मेलन में हुई थी। वे एक सौम्य व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं और उनके व्यक्तित्व का यही गुण उनकी भाषा में भी झलकता है।

करीब एक सौ सत्तर सफ़ों की इस पुस्तक के दो हिस्से हैं। पहले हिस्से में विदेश की धरती से जुड़े उनके  संस्मरण हैं। कुछ बेहद छोटे तो कुछ विस्तार लिए हुए। पुस्तक के इस भाग में सबसे ज्यादा आनंद तब आता है जब अलका बाली, भूटान, बर्मा, ताइवान, सिंगापुर जैसे देशों को छूते हुए कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकलती हैं। चाँदनी रात में घोड़ो पर सफ़र करते हुए  वो लिखती हैं.

अब चट्टानी पत्थरों पर बीच बीच में चाँदनी के गुच्छे बिखरे दिखने लगे हैं। कुछ छोटे छोटे फूल भी खिले हैं, मगर चाँदी की उस घास को देख कर हैरत में हूँ। अगले एकाध किमी तक उनकी चाँद की लकीरों को देख कर अचरज भी खत्म होने लगा है , पोर्टर से पूछती हूँ उनके बारे में। "यह राक्षस घास है" और इतना कहते कहते उसने अपनी पर्स में रखी वैसी ही घास का टुकड़ा मुझे पकड़ा दिया है। "हम पहाड़ के लोग हमेशा इस घास को पास में रखते हैं, जेब में पर्स में, झोले में। ये हमें बुरी आत्माओं से बचाती है। भूत प्रेत नहीं लगते जिनके पास ये होती है..। 
पहाड़ के सीधे सरल भोले भाले विश्वास को इतने करीब से देखना सुखद अहसास से भर देता है।
किताब के दूसरे हिस्से में चंबल, बस्तर, भीमबेटका, हैदराबाद, अमृतसर, कच्छ, जोधपुर, किन्नौर लद्दाख, सियाचीन, प्रयाग आदि स्थानों से जुड़े उनके संस्मरण हैं। भीमबेटका की भित्ति चित्र से सुसज्जित गुफाओं से लेकर हैदराबाद के यमनी मोहल्ले की उनकी सैर दिलचस्प है। लद्दाख, किन्नौर स्पिति और सियाचीन के उनके अनुभव रोमांच जगाते हैं। जोधपुर की उनकी यात्रा संगीत की स्वरलहरियों को बिल्कुल आपके करीब ले आती है तो नंदादेवी की यात्रा उत्तरखंड की संस्कृति का एक आईना बन कर आपके सामने आती है।

अलका जी की लेखनी का सशक्त पहलू उनकी बहती भाषा है जो जगह जगह आपके मन को पुलकित करती रहती है। मादरीद की रातों की बात हो या कैलाश मानसरोवर के दुर्गम मार्ग का रोमांचक विवरण, चंबल नदी की सुंदरता का बखान हो या बर्मी बाजार में लूडो की बिसात पर खिलती मुस्कुराहटों का जिक्र, ये भाषा सौंदर्य मन को मोहता है। एक बानगी देखिए..
पान की दुकान पर खूबसूरत मुस्कुराहटों की ओट में एक बर्मी युवती पान बनाने में मशगूल है। यों तो उसके कत्थई रंग में रंगे दांतो को देखकर लगता नहीं कि वह कुछ बेच पाती होगी! यहां भी बाजार पर औरतों का कब्जा है, ज्यादातर वे ही दुकानदार हैं और खरीदार भी। एक तरफ खिलखिलाहटों की चौसर बिछी दिखी तो मेरे कदम उधर ही उठ गए। यहां लूडो की बिसात सजी है 16 साल की युवती से लेकर 70 बरस की अम्मा तक गोटियां सरकाने में मशगूल हैं। पान की लाली ने हर एक के होंठ सजा रखे हैं। बाजार मंदा है और समय को आगे ठेलने के लिए लूडो से बेहतर क्या हो सकता है! 
दूसरी ओर उनके देश विदेश के कुछ वृत्तांत इतने संक्षिप्त हैं कि उस स्थान से जुड़ाव होने से  पहले ही मामला "The  End " पर आ जाता है। मुझे लगता है कि ऐसे आलेखों को संकलन में शामिल करने से बचा जा सकता था। आशा है पुस्तक के अगले संस्करण इस बात को ध्यान में रखेंगे।

इस पुस्तक को भावना प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। पुस्तक को आप यहाँ से मँगा सकते हैं

Thursday, November 21, 2019

चलिए मेरे साथ पेंच राष्ट्रीय उद्यान में.. A visit to Pench National Park, Sillari Gate

पिछली दीपावली नागपुर में बीती। दीपावली के बाद हाथ में दो दिन थे तो लगा क्यूँ ना आस पास के राष्ट्रीय उद्यानों में से किसी एक की सैर कर ली जाए। ताडोबा और पेंच ऍसे दो राष्ट्रीय उद्यान हैं जो नागपुर से दो से तीन घंटे की दूरी पर हैं। अगर नागपुर से दक्षिण की ओर निकलिए तो चंद्रपुर होते हुए लगभग डेढ़ सौ किमी की दूरी तय कर आप ताडोबा पहुँच जाएँगे। दूसरी ओर नागपुर से पेंच के सबसे नजदीकी गेट सिल्लारी की दूरी मात्र 70 किमी है।

पेंच और तडोबा बाघों के मशहूर आश्रयस्थल हैं पर मेरी दिलचस्पी बाघों से कहीं ज्यादा सुबह सुबह जंगल में विचरण करने की थी। वैसे भी किसी जंगल में मेरे जैसे यात्री के लिए सबसे सुखद पल वो होता है जब आप शांति से एक जगह बैठ कर उस की आवाज़ों को आत्मसात करें। फिर चाहे वो अनजाने पक्षियों की बोली हो, पत्तों की सरसराहट हो, कीट पतंगों का गुंजन या फिर अनायास ही किसी जंगली जानवर के आ जाने की आहट।


ताडोबा में जहाँ मैंने रुकने का सोचा था वहाँ जगह नहीं मिली तो पेंच का रुख किया। महाराष्ट्र में जितने भी राष्ट्रीय उद्यान हैं उनमें अंदर के विश्राम स्थल पर्यटकों के लिए बंद कर दिए गए हैं। यानी रुकने की व्यवस्था जंगल के बाहर ही है। पेंच राष्ट्रीय उद्यान का ज्यादातर हिस्सा मध्यप्रदेश और कुछ महाराष्ट्र में पड़ता है।  इस उद्यान में प्रवेश करने के कई द्वार हैं। नागपुर से सिल्लारी गेट सबसे पास है और अन्य लोकप्रिय द्वारों की तुलना में अपेक्षाकृत अछूता है इसलिए मैंने इसे ही चुना। 

पेंच राष्ट्रीय उद्यान के मुख्य द्वार की ओर जाती सड़क
दीपावली के दो दिन बाद भरी दुपहरी नें अपने दल बल के साथ हमने पेंच की ओर कूच कर दिया। एक घंटे से ऊपर का समय नागपुर के ट्रैफिक को साधने में ही लग गया। नतीजन सिल्लारी तक पहुँचते पहुँचते दिन के दो बज गए। 

अमलतास, जंगल के बाहर बना वन विभाग का रिसार्ट

सिल्लारी गेट के पास महाराष्ट्र पर्यटन और वन विभाग के दो अच्छे ठिकाने हैं। रहने के लिए मैंने वन विभाग के इको रिसार्ट अमलतास को चुना था। नाम के अनुरूप वहाँ अमलतास के पेड़ तो नज़र नहीं आए पर परिसर के पीछे का हिस्सा घने जंगलों से सटा मिला। अब जंगल पास होंगे तो बंदर और लंगूर कहाँ पीछे रहने वाले हैं। वो भी हमारे आशियाने का आस पास अपनी धमाचौकड़ी मचाने में व्यस्त थे। अपने कमरों को खोलकर हमने घर से लाए भोजन को खोलना शुरु किया ही था कि कमरे के दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई। जब तक मैं कुछ समझ पाता कमरे का दरवाजा खुला और एक बंदर ने  झाँकते हुए अंदर आने की इच्छा प्रकट की। समझ आ गया कि इन्होंने भोजन की गंध भाँप ली है। ख़ैर वो तो भगाने से भाग गया पर उसके बाद कमरे में बैठने पर किसी ने भी अपना द्वार खुला रखने की जुर्रत नहीं की।

रिसार्ट वाले कमरे में भी जंगल वाली 'फील' लाना नहीं भूलते।
वन विभाग ने इन कमरों को बड़ी खूबसूरती से सजाया है। हर पलंग के सिराहने यहाँ के मुख्य आकर्षण बाघ की छवि तो बनी ही है, साथ ही हर कमरे की सामने की दीवार पर कोई ना कोई वन्य प्राणी जैसे मोर, सियार, लोमड़ी आदि बड़ी खूबसूरती से चित्रित किए गए थे।  वन विभाग ने ये सुनिश्चित कर रखा है कि अगर जंगल में इन जीवों से मुलाकात ना भी हो तो वापस लौट कर रिसार्ट में तो मुलाकात होगी ही।


अमलतास में तब पर्यटकों की अच्छी खासी हलचल थी। शाम की सफारी के लिए वन विभाग की गाड़ियाँ तैयार खड़ी थीं। नागपुर से पास होने की वजह से कई लोग यहाँ बिना रात बिताए सिर्फ सफारी का आनंद ले कर लौट जाते हैं पर हमें तो अगले दिन तक रुकना था तो सोचा कि क्यूँ ना सिल्लारी गेट तक के इलाके में थोड़ी चहलकदमी की जाए।

स्लेटी रामगंगरा (Cinereous Tit)
रिसार्ट के आगे एक रास्ता वहीं गाँव की ओर मुड़ता था। गाँव में बीस तीस घर और एक छोटा सा मंदिर और एक चबूतरा  था। शाम के वक़्त शायद वो चबूतरा बतकही का अड्डा बनता हो पर उस दुपहरी में वहाँ सन्नाटा पसरा था। खेतों में चारा चरती गायें और उनका अनुसरण करते बगुले, दाने की तलाश में उड़ते कपोतक और गौरैया ही उस निस्तब्धता को तोड़ रहे थे।  राह में टुइयाँ तोते के साथ सलेटी रामगंगरा भी दिखाई पड़ीं। 

सागरगोटी या सागरगोटा
चलते चलते मुझे एक अजीब सा पौधा दिखा जिसकी अंडाकार फलियों पर ढेर सारे काँटे उगे थे। पूछने पर पता चला कि स्थानीय भाषा में इसे सागरगोटी कहते हैं और इसका इस्तेमाल लोग मलेरिया सहित कई रोगों के उपचार के लिए करते हैं।

सुबह सुबह जंगल के अंदर जाने को तैयार
मुझे बताया गया कि अगली सुबह की सफारी के लिए टिकट साढ़े पाँच बजे से ही मिलने लगते हैं। वन विभाग का महकमा भोर होते ही काउंटर पर मुस्तैद दिखा। पूरी गाड़ी, गाइड व कैमरे के साथ करीब साढ़े तीन हजार की रकम चुकता कर हमारा कुनबा सिल्लारी गेट की ओर बढ़ गया। ठंड तो गुनगुनी थी पर हल्के हल्के बादलों ने जंगल के बीच सूर्योदय को देखने के आनंद से हम सबको वंचित रखा। जंगल में घुसते ही जो पहला पक्षी दिखा वो धनेश (Grey Hornbill) था। पेड़ की ऊँचाइयों पर आराम से आसन जमा रखा था उसने। थोड़ा और आगे बढ़े तो कोतवाल के जंगली सहोदर रैकेट टेल ड्रैंगो (Racket Tail Drongo) की लहराती उड़ान दिखी। ये पक्षी जब उड़ान भरता है तो पंखों के दोनों ओर लतरों की तरह हवा में लहराती हुई डंडियाँ देखते ही बनती हैं।

जंगल के अंदर...
इधर मैंने अपनी नज़रें आसमान में पक्षियों की तलाश में टिकाई थीं और उधर हमारा गाइड जंगल में पाए जाने वाले पेड़ों की चर्चा कर रहा था। झारखंड, ओडीसा और छत्तीसगढ़ में जहाँ साल के पेड़ों की प्रधानता वाले जंगल ज्यादा हैं वहीं पेंच का जंगल सागवान (सागौन) यानी टीक के पेड़ों की प्रचुरता है। चौड़े पत्तर और क्रीम रंग के फूलों से लदे इसके पौधे बहुत सुंदर तो नहीं लगते पर अपनी कीमती लकड़ी की वज़ह से गर्व से इतराए खड़े दिखे। सागौन की अधिकता यहाँ भले अधिक हो पर पेंच के जंगल को मिश्रित जंगल कहना ज्यादा उचित होगा क्यूँकि यहाँ इसके आलावा बेर, गूलर, तेंदू पत्ता, बरगद, बाँस और अन्य कई जंगली पेड़ और लताएँ भी दिखाई पड़ीं।

माँ का प्रेम
गाइड बड़े मजे से घोस्ट ट्री के बारे में बता रहा था। ये पेड़ अपनी छाल का रंग बदलता रहता है। घुप्प अँधेरे में अपनी चमकती सफेद छाल की वजह से अंग्रेजों के समय से इसका ये नाम प्रचलित हो गया। ऐसे ही मगरमच्छ के कवच जैसी छाल रखने वाले पेड़ का यहाँ क्रोकोडाइल ट्री नाम सुनने को मिला।

बाँस की झाड़ियाँ
जंगल अब घना होता जा रहा था। हमारा वाहन पक्की से कच्ची सड़क  की राह लेता हुआ अब लगातार हिचकोले ले रहा था। मोर, हिरण और सांभर अपने दर्शन दे चुके थे। एक भूरी फैन टेल  कैमरे का ट्रिगर दबाने से पहले ही फुर्र हो गयी थी। लाल भूरा कठफोड़वा भी अपनी आवाज़ के साथ हल्की झलक दिखाकर जाने कहाँ अदृश्य हो गया था। गाड़ी का इंजन जहाँ शांत होता पक्षियों की आवाज़े गूँजने लगतीं पर उतने घने जंगल में उन्हें ढूँढ पाना दुसाध्य काम था।

दर्शन मोर का

चीतल (Spotted Deer)
आसमान छूते पेड़ों पर अचानक से हरियल का एक झुंड दिखा। गाड़ी रोककर नीचे से किसी तरह उनकी तस्वीर ली। अब महाराष्ट्र के राजकीय पक्षी से अपनी मुलाकात का सबूत तो अपने पास रखना ही था।

हरियल (Green footed Pigeon)


सड़क के किनारे अब पानी की एक धारा का स्वर जंगल के स्वर में एकाकार हो चुका था कि तभी हमें झाड़ियों के बीच एक विशाल गौर दिखाई पड़ा। भूरे घुटने के नीचे इसके सफेद रंग के पैर होने की वजह से गाइड इसे अक्सर सफेद मोजे पहनने वाला बताते हैं। ये गौर खा पीकर इतना मोटा ताजा हो गया था कि इसका अपने झुंड से साथ छूट गया था। पानी की धारा अब हमें पेंच नदी के बिल्कुल करीब ले आई थी जिसके ऊपर इस पार्क का नाम पड़ा है। ये नदी उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हुई इस उद्यान को दो बराबर भागों में बाँटती है। 

भारतीय गौर (Indian Bison)
नदी को छू कर हम लौट ही रहे थे कि पता चला कि हमारे पीछे आने वाली गाड़ी में से एक के सामने से एक बाघ छलाँग लगाता हुआ जंगल में ओझल हो गया। वापस लौटते हुए उस स्थान पर थोड़ी देर रुके भी पर बाघ के पैरों के ताज़ा निशान के आलावा हमारे हाथ कुछ ना लगा।

बाघ के पद चिन्ह

टुइयाँ तोता मादा
जंगलों की भूल भुलैया में करीब तीन चार घंटे बिताने के बाद अब बारी वापस लौटने की थी। 

सफ़र वापसी का

लौटते वक्त मंदिरों के शहर रामटेक का एक छोटा सा चक्कर लगा। जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है रामटेक यानी जहाँ कभी भगवान राम टिके थे। नागपुर से पचास किमी दूरी पर स्थित ये शहर मंदिरों का शहर है। ऐसी किंवदंती है कि वनवास के दौरान भगवान राम का ठिकाना यहाँ भी था। आज भी हजारों लोग प्रतिदिन पहाड़ पर बने राम मंदिर जिसे गड मंदिर भी कहा जाता है में भगवान राम के दर्शन करने आते हैं। राम मंदिर के आलावा यहाँ प्राचीन जैन मंदिर भी हैं।

खिंडसी झील

पेंच नेशनल पार्क से वापस लौटते हुए मैं इस शहर से गुजरा जरूर पर ज्यादा समय ना होने के चलते खिंडसी झील होकर ही वापस नागपुर लौट आया। खिंडसी में  धूप तेज़ होने की वजह से नौकायन का आनंद नहीं उठाया। भूखे पेट में मीठी चाशनी में डूबे सूखे बेरों के साथ चटकीली झालमुड़ी का भोग तो सबको रास आया। साथ ही सफेद गोलाकार चीज भी बिकती दिखी जिसका नाम मैं अब भूल गया। कोई 'मराठी माणूस' मदद करे याददाश्त ताज़ा करने में तो कृपा होगी।

बोलो बोलो बोलो बोलो ना.. क्या है मेरा नाम ? :)
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Thursday, October 10, 2019

राँची की दुर्गा पूजा : आज देखिए बाँधगाड़ी, काँटाटोली हरमू, श्यामली, सेल टाउनशिप के पंडालों की झलकियाँ Ranchi Durga Puja 2019

पंडाल परिक्रमा की अंतिम कड़ी में आपको दिखाते हैं राँची के अन्य उल्लेखनीय पंडालों की झलकियाँ। रेलवे स्टेशन, रातू रोड, ओसीसी व बकरी बाजार के बाद जिन  पंडालों  ने ध्यान खींचे वो थे बाँधगाड़ी, काँटाटोली व हरमू के पंडाल।

बाँधगाड़ी में दुर्गा जी के आसपास कहीं भी महिसासुर की छाया तक नहीं थी। सारे शस्त्र माता के हाथों में ना होकर चरणों में दिखे। माता के मंडप में सर्व धर्म समभाव दिखाने के लिए विभिन्न धर्मों के प्रतीक चिन्हों का प्रयोग किया गया था।

बाँधगाड़ी के पंडाल में शस्त्र विहीन दुर्गा शांति का संदेश देती हुई

कांटाटोली में माँ दुर्गा की प्रतिमा
वहीं काँटाटोली के दुर्गापूजा पंडाल में चित्रकला के माध्यम से रामायण की कथा का निरूपण किया गया था। पंडाल का ये स्वरूप छोटे बड़े बच्चों को काफी आकर्षित कर रहा था।


आज जब एक अभिनेत्री ये नहीं बता पाती हैं कि संजीवनी पर्वत पर हनुमान किसके लिए बूटी लाने गए थे, तो देश में उसे मुद्दा बना लिया जाता है। हमलोग छोटे थे तो ये कहानियाँ कामिक्स और टीवी सीरियल के माध्यम से हमारी स्मृतियों में रोप दी गयी थीं पर आज कल के मोबाइल युग में पढ़ाई के इतर जो कुछ और परोसा जा रहा है उसमें हमारी संस्कृति के कितने अवयव समाहित हैं ये सोचने का विषय है।

यहाँ सजावट थी चित्रकला के माध्यम से...

Tuesday, October 8, 2019

राँची की दुर्गा पूजा : गगनचुंबी इमारतों के बीच बना बकरी बाजार का इंद्रधनुषी पंडाल Bakri Bazar Ranchi Durga Puja 2019

राँची के सबसे नामी पंडालों में बकरी बाजार अग्रणी हैं। सामान्यतः यहाँ के पंडाल अपनी विशालता और वैभव के लिए ज्यादा और महीन कलाकारी के लिए कम जाने जाते हैं। इस बार यहाँ सतरंगा पंडाल सजा जिसकी थीम थी बढ़ती जनसंख्या के बीच आम जनों का संघर्ष !

रंगों से भरे पंडाल में अपनी बात कहने में आयोजक कितने सफल हुए हैं देखिए आज इस झाँकी में..

बकरी बाजार का काल्पनिक इंद्रधनुष

उल्लू तो लक्ष्मी जी का वाहन था पर यहाँ दुर्गा पंडाल का सारथी बन बैठा है


पंडाल में इन्द्रधनुष के नीचे जो सैकड़ों हाथ दिख रहे हैं वो बढ़ती जनसंख्या के प्रति आयोजकों की चिंता को व्यक्त करते हैं। इन सारे लोगों के लिए हर दिन संघर्ष का है जो लोग इस वैतरणी को पार कर जीवन में सफल हुए उनमें सर कुछ के चित्र एक कोलॉज के माध्यम से ऊपर टाँके गए हैं।

ये दिखाने की कोशिश की गयी है कि इतनी भीड़ में कुछ ही सफलता का स्वाद चढ़कर प्रशस्ति की नाव पर सवार हो सकेंगे।

मेकेनिकिल इंजीनियर के यंत्र गियर की सजावट के बीच निखरती चित्रकला

चौंक गए ना? 

राँची की दुर्गा पूजा : बांग्ला स्कूल में सजा राजस्थानी पुतलों का संसार Bangla School Durga Puja 2019

रांची की दुर्गा पूजा की पंडाल परिक्रमा के तीसरे चरण में चलिए बांग्ला स्कूल के इस राजस्थानी पुतलों के संसार में।

बांग्ला स्कूल का पंडाल राँची के अन्य बड़े पंडालों जितना प्रसिद्ध भले ना हो पर यहाँ कलाप्रेमी अक्सर कुछ अलग सा देखने के लिए जाते जरूर हैं। इस बार यहां पंडाल की दीवारें सिंदूरी रंग में सजी थीं। दीवारों के गोल नमूनों को बीचों बीच जलता बल्ब  पंडाल को जगमग कर रहा था। पंडाल की एक दीवार पर शीशा लगा कर लोगों को सेल्फी खींचने की ज़हमत से बचा दिया गया था।

तीस से पैंतीस फीट की कठपुतलियों के बीच माँ दुर्गा से मिलती जुलती छोटी छोटी गुड़िया बनाई गयी हैं। पंडाल के मुख्य मूर्तिकार निर्मल शील के अनुसार इन्हें बनाने के लिए चटाइ, पाट लकड़ी, शीप, शंख, हुगला पत्ता, ताल पत्ता और बाँस का इस्तेमाल किया गया है।

इस पंडाल की सबसे खूबसूरत छटा छलक रही थी माँ के दरबार में। सीपों की लटकती झालर के पीछे माँ दुर्गा राजस्थानी लिबास में लिपटकर सौंदर्य का प्रतिमान लग रही थीं। 

राजस्थानी वेशभूषा में सजी सँवरी माँ दुर्गा

अब और क्या बताना आप खुद ही देख लीजिए मेरे कैमरे की नज़र...

पंडाल का मुख्य द्वार

पुतलों की विशाल प्रतिमाएँ

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