स्पीति घाटी में प्रवेश करने के लिए आपको शिमला के रास्ते नारकंडा, सहारन, कल्पा, बसपा घाटी और फिर नाको का रुख करना पड़ता है। कायदे से ये सारी जगहें शिमला किन्नौर मार्ग से थोड़ा थोड़ा हट करके हैं पर इतने लंबा सफ़र करते हुए लोग बाग रुकते हुए ही चल पाते हैं। वैसे भी स्पीति भाग भाग कर देखने वाली जगह है भी नहीं।
नाको मठ परिसर में बनी नई इमारतें
नंगे पहाड़ों के बीच से गुजरती टेढ़ी-मेढ़ी राहें
नाको किन्नौर का आखिरी सिरा है। इसे पार करने के बाद ही आप स्पीति घाटी के अंदर कदम रखते हैं। कल्पा और नाको के बीच एक ऐसी जगह आती है जहां से आप हिमाचल प्रदेश के सबसे ऊंचे पर्वत रियो पुर्ग्यिल के दर्शन कर सकते हैं। यही नहीं इस बिंदु पर दो प्रमुख नदियों सतलुज और स्पीति का संगम भी है और ये संगम पास के गांव के नाम पर खाब संगम पड़ा है।
खाब संगम के पास स्पीति नदी
संगम के पास चट्टानों के नीचे से निकलता रास्ता
कल्पा से खाब संगम का रास्ता सुंदरता के बजाए मन में भय और कौतूहल पैदा करता है। इतनी ऊबड़ खाबड़ और अपरदित चट्टानें मैंने लद्दाख और उत्तरी सिक्किम जैसे इलाकों में भी कम ही देखी हैं। यही इस इलाके की विशेषता है और भय का कारण भी।
मिट्टी के विशालकाय अपरदित पहाड़
दरअसल ऊँचाई पर स्थित ठंडे रेगिस्तान होने के कारण, इस क्षेत्र में तापमान में काफी उतार-चढ़ाव होता है। पानी चट्टानों की दरारों में रिसता है, रात में जम जाता है, फैलता है और चट्टान को तोड़ देता है। वहीं दूसरी ओर अस्थिर टेक्टोनिक प्लेट्स की वजह से भी लगातार हलचल की गुंजाइश बनी रहती है और फलस्वरूप बैरन चट्टानें गिरती रहती हैं। रही सही कसर सतलुज की तीखी धारा पूरी कर देती है। नदी के किनारे पत्थरों के छोटे छोटे टुकड़ों के विशाल ढेर इनकी फूटी किस्मत की गवाही देते हैं।
धूल धूसरित खतरनाक रास्ते
दशकों पहले इस इलाके की सड़कें इतनी संकरी होती थीं कि जरा सी असावधानी से वाहनों का सतलुज की गहरी घाटी में गिरने का खतरा बना रहता था। अब सड़कें पहले से बेहतर हैं पर निरंतर गिरती चट्टानों की मार झेलते हुए वो सालों भर टूटने और फिर बनने की प्रक्रिया से गुजरती रहती हैं।
सतलुज नदी के पथरीले पाट पर बड़ी दी के साथ
अस्सी किमी के इस रास्ते में बीच बीच में अचानक से हरे भरे टुकड़े भी दिखाई देते हैं। इन टुकड़ों के आस पास या तो गांव दिखते हैं या सेना का कोई परिसर। इन इलाकों में थोड़ी बहुत खेती के बाद कोई काम बचता है तो वो सड़क निर्माण का।
खाब संगम पर पुल पार कर यदि आप सतलुज नदी के किनारे चलेंगे तो ठीक सामने आपको रियो पुर्ग्यिल की 6148 मीटर ऊंची चोटी दिखाई देगी। स्पीति नदी कुंजम दर्रे से निकल कर यहां सतलुज नदी से मिल जाती है। स्पीति जाने वाले तिब्बत के हिमखंडों से निकल कर आने वाली सतलुज से यहीं विदा ले लेते हैं।
रियो पुर्ग्यिल की छोटी ठीक मेरे पीछे
खाब संगम समुद्र तल से लगभग 8000 फीट की ऊंचाई पर है, वहीं नाको का बौद्ध मठ 12000 फीट पर स्थित है। जाहिर सी बात है कि संगम से आगे का रास्ता जबरदस्त चढ़ाई वाला है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों में कभी अर्श तो कभी फर्श पर वाला खेल चलता ही रहता है। संगम से जो पतली सड़क जलेबी की शक्ल में ऊपर की ओर उठती है वो खाब लूप्स के नाम से जानी जाती है। 26 किमी की इस दूरी में 1200 मीटर की चढ़ाई चढ़ने में मात्र पौन घंटे लगते हैं क्योंकि रास्ता भले घुमावदार हो पर सड़कें उतनी धूल धूसरित नहीं रहतीं जितना खाब संगम तक पहुंचने के पहले मिलती हैं।
लियो गांव की ओर से आती स्पीति नदी
खाब लूप्स
ऊंचाई से स्पीति नदी एक पतली लकीर की तरह दुर्गम हंगरंग घाटी में अपना रास्ता बनाती हुई चलती है। मिट्टी की इन सुनसान सूखी पहाड़ियों में अगर कोई रंग भरता है तो वो ऊपर का गहरा नीला आसमान और दूर ऊंचाई पर दिखती बर्फ से लदी चोटियां। नीचे पर्वतों की इन सूखी बदरंग ढलानों में रौनक तब लौटती है जब इनकी दरारों से पानी का कोई सोता फूट पड़ता है या फिर ग्लेशियर या चोटियों की बर्फ पिघल पिघल कर बहते जल की एक अनवरत धारा में बदल जाती है। पानी का स्पर्श पाकर मिट्टी के ये पहाड़ हरे भरे खेत खलिहानों में बदल जाते हैं और उनके बीच में उग आते हैं पत्थर के बने छोटे छोटे घर।
नाको मठ की ओर आती सड़क
इस घाटी में बसे गांव प्राचीन बौद्ध संस्कृति के रंग में रंगे है। इन गांवों में एक ग्राम दूर से अपनी अलग पहचान बनाता हुआ दिखाई देता है। खाब संगम और नाको के बीच आने वाला ये गांव है लियो। इस गांव के लिए मुख्य मार्ग से ही बायीं ओर एक रास्ता कटता है। पर्वतीय ढलान और स्पीति नदी के बीच बसे इस गांव को दूर से ही दिखते दो हरे भरे टुकड़ों से आप आसानी से पहचान सकते हैं। नदी के आस पास की बसाहट पुरानी है। यहां के लोग गांव के मठ को नाको का समकालीन मानते हैं। कुछ साल पहले अचानक आई बाढ़ से उजड़े घरों को सरकार ने ऊपर की तरफ बसाने का काम किया है।
लियो गांव, ऊपरी किन्नौर
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि किन्नौर और स्पीति के इन गांवों में गेहूं और बाजरे जैसी फसलें बड़े आराम से उग जाती हैं। पर अब इन्हें गांव की जरूरत भर ही उगाया जाता है। सेव और मटर जैसी शीघ्र नकद देने वाली फसलों की अब ज्यादा खेती होने लगी है।
हाड़ कंपाने वाली ठंड के बीच छोटे अंधकार भरे बेतरतीब कमरों में रहने वाले इन लोगों का जीवन बेहद कठिन है पर जब भी मिलेंगे तो एक मुस्कुराहट के साथ। जहां भी जाएं आपको चाय पीने का आमंत्रण जरूर मिलेगा। प्रसन्न रहने के लिए जीवन में भौतिक वस्तुएं कितनी गैरजरूरी हैं वो यहीं आकर पता चलता है।
लियो परगिल
हरियाली के इस टुकड़े के पार्श्व से झांकती है हिमाचल की दूसरी सबसे ऊंची चोटी जिसे लियो परगिल के नाम से जाना जाता है। लियो गांव का जल स्रोत इसी शिखर पर जमी बर्फ के पिघलने से आता है। लियो से नाको मठ तक पहुंचने में ज्यादा देर नहीं लगती। एक विशाल परिधि में फैला हुआ मठ दो भागों में बंटा हुआ है।
नाको का प्राचीन मठ
एक ओर 11वीं शताब्दी में स्थापित नाको का प्राचीन मठ है तो दूसरी ओर दलाई लामा के स्वागत में बनाई गई नई इमारतें हैं जिनका इस्तेमाल पर्व त्योहारों में किया जाता है। परिसर के चारों ओर हंगरंग घाटी में फैले पर्वत शिखरों का जाल है और उन्हीं के पर्दों में मुंह उठाए रियो पुर्गयाल चोटी की भी हल्की सी झलक मिलती है।
नाको मठ में रंगे हुए लाल पत्थरों के बीच
पुराने मठ में भगवान बुद्ध और तारा की रंग बिरंगी मूर्तियां हैं। इस मठ का निर्माण रिनचेन जांगपो ने करवाया था। रिनचेन जांगपो का जिक्र मुझे लद्दाख के मठों में भी मिला था। कहते हैं कि संस्कृत से तिब्बती भाषा में बौद्ध अभिलेखों के अनुवाद के साथ साथ उन्होंने लद्दाख से लेकर स्पीति तक करीब सौ से ज्यादा छोटे बड़े मठों की स्थापना की।
क्या आपको दिखा दक्षिण भारत का नक्शा?
नाको मठ में हमारा ज्यादा वक़्त नहीं गुजरा क्योंकि सबकी उत्कंठा पहले नाको झील तक पहुंचने की थी। फिर ताबो की ओर भी निकलना था। नाको की बेहद खूबसूरत झील तक ले चलूंगा अगली पोस्ट में।
पहाड़ी नदियों की भी अपनी एक विशिष्टता है। बरसात के दिनों में दो तीन दिन की तेज़ बारिश में उफन पड़ेंगी वहीं जाड़ों में दुबली पतली होकर हौले हौले इठलाती हुई बहती चलेंगी। गर्मी आते ही अपने बलुई छाती इस तरह खोल देंगी मानो उसके बीच पानी का कोई कतरा कभी रहा भी न हो।
ज़ाहिर सी बात है इन नदियों के आस पास रहने वाले लोग नवंबर से मार्च तक इन नदियों की इठलाती चाल के साथ कदम मिलाते हुए इनके पाटों के बीच सुकून तलाशते हैं। वैसे भी कहीं समतल तो कहीं चट्टानी इलाकों के बीच से उछलती कूदती या फिर थोड़ी थोड़ी ऊंचाई से गिरती इन नदियों को करीब से निहारना या फिर इनके उथले जल में लोट पोट होना भला किसे न भाएगा? तो चलिए आज लिए चलते हैं आपको झारखंड की दो प्रमुख नदियों के तटों पर जहां पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत में जाना हुआ था।
यही वज़ह थी कि साल की शुरुआत में भीड़ भाड़ से दूर किसी सुरम्य स्थान की खोज करते हुए हम झारखंड की एक ऐसी नदी के आस पास चले गए जिसकी खूबसूरती रांची और उसके आस पास के जिले के लोगों को खूब लुभाती है। ये नदी थी उत्तरी कारो जो रांची जिले के पठारी इलाकों से निकल कर खूंटी और गुमला जिलों को छूती हुई पश्चिमी सिंहभूम में जाकर दक्षिणी कोयल नदी से जाकर मिल जाती है। इस नदी में नंगे पैर पदयात्रा करने का पहला अनुभव मुझे तोरपा जाते वक़्त मिला था। इस बार इस नदी से मिलने के लिए हमारे समूह ने कौवा खाप को चुना। गोविंदपुर के निकट के इस स्थान का नाम ऐसा क्यों पड़ा ये तो मुझे नहीं मालूम पर इस रमणीक स्थल पर दूर दूर तक कौओं का नामो निशान न था।
कभी कभी संसार मोनोक्रोम (श्वेत श्याम) के चश्मे से देखकर कुछ ज्यादा शांत, ठहरा हुआ और थोड़ा रहस्यमय लगने लगता है।
कौवा खाप में उत्तरी कारो नदी घने जंगलों के किनारे किनारे बहती हुई 180 डिग्री का घुमाव लेती है।
Clockwise from left: घने जंगलों के अंदर,सूखे पत्तों की सुंदरता, जंगल के साथ घुमाव लेती नदी, जंगलों की ढलान ले जाती है यहां आपको नदी तक, नीले आसमान और हरियाली के बीच बहती कारो
यहां तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नदी के लगभग आधा एक किमी पहले ही खत्म हो जाती है। हालांकि कच्ची सड़क से नदी के बेहद करीब तक पहुंचा जा सकता है। जब मैं यहां मित्रों के साथ पहुंचा तो नदी के आस पास दो चार परिवार ही मौजूद थे। जंगल से लौट रही ग्रामीण स्त्रियों के लिए हमारा वहां आना कौतूहल का विषय था। मुस्कुराते हुए एक ने पूछ ही लिया कि यहां तो कोई आता नहीं आप कहां से आए हैं? दरअसल आम जनों में ये जगह उतनी मशहूर नहीं हुई इसीलिए इसकी स्वच्छता अभी भी बची हुई है। पर्यटक भले कम हों पर बालू का खनन करने वाले यहां खूब आते हैं।
Clockwise from left: नदी का पथरीला पाट, कच्ची सड़क से नदी की ओर जाता रास्ता, नदी पार कर दिखता जंगल
जंगल तक पहुंचने के लिए नदी को पार करना पड़ता है। यहां के जंगल काफी घने हैं और ज्यादा अंदर जाने पर गजराज से कभी भी सामना हो सकता है। सुबह आठ नौ बजे तक यहां पहुंच कर सीधे नदी के छिछले जल में चलने का आनंद लेकर थोड़ा दिन चढ़ते ही इन जंगलों के बीच आप धूनी रमा सकते हैं। नदी की कलकल बहती धारा, जंगल में पत्तों की सरसराहट के अलावा यहां कोई और शोर नहीं है।
अगर प्रकृति के बीच परम शांति के बीच आप अपना समय बिताना चाहें तो ये जगह आपको निश्चय ही पसंद आएगी।
मुझे नहीं लगता कि भारत के किसी भी प्रदेश में किसी भी नदी का नाम किसी पक्षी के नाम पर हो पर झारखंड में एक ऐसी ही नदी है जिसका नाम है कोयल। मजे की बात है कि कोयल झारखंड का राजकीय पक्षी भी है। हालांकि निश्चित तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि इस नदी का नाम कोयल क्यों पड़ा? क्या इसके बहते जल की कलकल बोली इसे राज्य में यत्र तत्र सर्वत्र पाई जाने वाली कोयल की कूक से जोड़ गई या फिर इसके तटों के आस पास आदिम काल से रहने वाले कोल आदिवासियों के नाम पर इसका नाम कोल से कोयल हो गया। कारो नदी की तरह ही झारखंड में इस नाम की दो नदियां हैं उत्तरी कोयल और दक्षिणी कोयल।
तो उत्तरी कारो के तट से आपको लिए चलते हैं उत्तरी कोयल की ओर। ये नदी रांची से सटे गुमला जिले के पठारी इलाकों से निकल कर लातेहार, पलामू और गढ़वा जिले को छूती हुई झारखंड बिहार और छत्तीसगढ़ की सीमा के पास सोन नदी में मिल जाती है। जहां इसी के पचास सौ किमी के आस पास के इलाकों से निकलने वाली दक्षिणी कोयल, उत्तरी कारो और शंख नदियां दक्षिण की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी की ओर निकल जाती हैं वहीं उत्तरी कोयल लातेहार के पठारी इलाकों के पत्थर से भरे पाटों और दुर्गम जंगलों को चीरती हुई पलामू और गढ़वा जिलों से होकर निकलती है। इन जिलों का शुमार झारखंड के सबसे शुष्क प्रदेशों में होता है और ये इलाके अक्सर पानी के लिए तरसते हैं। ऐसे में यहां के निवासियों के लिए उत्तरी कोयल और उसकी सहायक नदियां औरंगा और अमानत का महत्त्व कितना बढ़ जाता है आप समझ सकते हैं।
Clockwise from left: गारू के पास बहती उत्तरी कोयल नदी, गुलदार तितली (Common Leopard), नदी का हरा भरा तट, गारू पुल
झारखंड पर्यटन के दो प्रमुख आकर्षण नेतरहाट और बेतला राष्ट्रीय अभयारण्य जाते समय इस नदी से आपकी बार बार मुलाकात होती है। झारखंड का डाल्टनगंज तो खैर इस नदी के किनारे ही बसा हुआ है। कभी पलामू के किले पर चढ़ाई करेंगे तो उसके शीर्ष से आपको इसकी सहायक नदी औरंगा बहती दिखाई देगी। ये नदी बेतला नेशनल पार्क की उत्तरी सीमा निर्धारित करती है। बेतला के आगे जहां ये नदी कोयल से मिलती है उसे केचकी संगम के नाम से जाना जाता है।
इसके तो शर्बत का मौसम आने ही वाला है😋
बेतला से लौटते हुए मुझे भरी दुपहरी में और फिर सूर्यास्त की वेला में इस नदी के दो रूपों में दर्शन हुए। एक तो बेहद समतल तो दूसरा इसका पथरीला रूप। लातेहार के जंगलों से निकल कई जलराशियां इस नदी में गिरती हैं पर जाड़ों में इसके चौड़े पाट को अगर आप चाहें तो पैदल पार कर सकते हैं। मुलायम बालू के बीच से बहती इसकी धाराएं छन कर बिल्कुल स्वच्छ हो जाती हैं और ऐसे में इसमें छप छपा छईं करना बेहद आनंददायक होता है।🙂
बेतला के जंगलों से गारू की ओर लौटते हुए इस नदी के तट पर कुछ समय बिताने का मौका मिला। नदी के निर्जन तट पर एक दो मछुआरे, कुछ फलदार वृक्ष और झाड़ियों के साथ ढेर सारी तितलियां हमारी संगी बनीं।
Clockwise from left: घाघरा के पास उत्तरी कोयल का बेहद पथरीला पाट, मेरे सहयात्री, नारंगी से गुलाबी होती सूर्यास्त की आभा
घाघरा के पास जब दूसरी बार इस नदी से मुलाकात हुई तो शाम ढल चुकी थी। सूर्य किरणें दिन का अंतिम टाटा बाय बाय कहने के पहले नदी के जल पर बड़े प्रेम से नारंगी आभा बिखेर रही थीं। जैसे जैसे अंधेरा पसर रहा था नदी सकुचाती से इस स्पर्श से गुलाबी हुई जा रही थी।
कारो और कोयल से विदा लेते हुए कवि अखिलेश सिंह की ये पंक्तियाँ मुझे सहसा याद आ गयीं।
गढ़ पंचकोट, ये नाम शायद ही आपने कभी सुना हो। सुनने से तो ऐसा लगता है कि यहां कोई विशाल सा किला रहा होगा। पर किले के नाम पर यहां सिर्फ 16 वीं शताब्दी में सिंहदेव वंश के शासनकाल में बनाए पक्की मिट्टी के कुछ मंदिर ही बचे हैं।
वैसे अगर आपने बंगाल के प्रसिद्ध विष्णुपुर के मंदिरों को देखा हो तो वहां की स्थापत्य शैली बिल्कुल यहां के मंदिरों सरीखी दिखेगी। हालांकि ऐसा माना जाता है कि मल्ल शासकों द्वारा बनाए वो मंदिर 17 वीं शताब्दी में बने। इस हिसाब से गढ़ पंचकोट के मंदिर संभवतः उससे पचास सौ वर्ष पुराने रहे होंगे।
पंचेत बांध से निकलता पानी
गढ़ पंचकोट का इलाका यहां स्थित पंचेत पहाड़ियों के उत्तर पूर्वी किनारे की तलहटी पर है। पास ही दामोदर नदी के पानी को रोककर बनाया गया पंचेत बांध है जो झारखंड और बंगाल की सीमा का काम करता है। यही वज़ह है कि पुरुलिया जिले में स्थित ये कस्बा यूं तो बंगाल में है पर इसका निकटवर्ती रेलवे स्टेशन कुमारधुबी झारखंड में है।
पंचेत की हरी भरी पहाड़ियां
गढ़ पंचकोट की खूबसूरती का मुख्य आकर्षण पंचेत की लगभग 450 मीटर ऊंची हरी भरी पहाड़ी और उससे सटे घने जंगल हैं। इन जंगलों के बीच से एक दुबला पतला रास्ता जाता है जिस पर सुबह सुबह चहलकदमी करना मन को बेहद सुकून देता है। इस रास्ते पर बेहद सुंदर रिसॉर्ट भी हैं। दुर्गापुर और धनबाद जैसे बड़े शहरों के पास होने के कारण मानसून और जाड़ों में यहां काफी लोग आते हैं।
रिजॉर्ट का मुख्य द्वार
बारिश में यहां के सुंदर तरणताल का आनंद नहीं ले पाए
गढ़ पंचकोट इको टूरिज्म का अहाता
रिजॉर्ट के अंदर एक छोटा मगर प्यारा सा मंदिर
पिछले साल अगस्त के महीने में मैं दुर्गापुर में था। सप्ताहांत की छुट्टियां थीं तो अचानक यहां जाने का कार्यक्रम बन गया। भरी दोपहरी में मैं जब यहां पहुंचा तो गाड़ी से उतरते ही ऐसी झमाझम बरसात शुरू हुई कि कमरे से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया। खुशकिस्मती बस इतनी थी कि बालकनी से ही पंचेत की पहाड़ियां अपना दिल खोलकर हमें दर्शन दे रही थीं। गर्मागर्म चाय और पकौड़ों के बीच तड़तड़ाती बारिश का आनंद लिया गया।
बारिश में बाल्कनी से दिखता दृश्य
बारिश के बंद होने के इंतज़ार में थोड़ी पेट पूजा ही कर ली जाए
बादल छंटे तो पूर्णिमा का चांद अपनी झलक कुछ यूं दिखा गया
रात तक इंद्र देव ने अपनी सेना वापस बुला ली पर अंधेरे में जंगलों की ओर कौन निकलता? सुबह सुबह जब हम सब निकले तो मौसम साफ था। पक्षियों का कलरव शुरू हो चुका था।
Clockwise from left लाजवंती, पीहू, कुमुदनी, स्याह वक्ष वाली फुदकी
कहीं पीहू तो कहीं काले सिर वाले पीलक की उपस्थिति नज़र आ रही थी। सतभाई स्याह पिद्दी के साथ सुर में सुर मिला रहे थे। कहीं तो जंगल एकदम से घना हो उठता तो कभी अचानक सड़क के दोनों ओर समतल भूमि आ जाती। एक ओर धान के खेतों का विस्तार था तो दूसरी और छोटे बड़े सरोवर ,कमल और कुमुदिनी की उपस्थिति से फूले नहीं समा रहे थे ।
जंगल का रास्ता और खेत खलिहान
तीन चार किमी चलने के बाद ये ख्याल आया कि अभी वापस भी लौटना है। धूप अब चढ़ चुकी थी और बारिश के बाद की उमस ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। पसीने पसीने होकर किसी तरह रुकते चलते हुए होटल पहुंचे और फिर दिन में पंचेत बांध से गुजरते हुए वापसी की राह ली।
दीवारों पर महाराष्ट्र की वरली चित्रकला, सड़क पर बिखरे quarzite पत्थर
पंचेत बांध और पीछे दिखती पहाड़ियां
अगर आपके पास एक दिन और समय हो तो जाड़ों के दिनों में आप पंचेत की पहाड़ियों के ऊपर तक की ट्रैकिंग भी कर सकते हैं।
पहली हवाई यात्रा का उत्साह अपने आप में अनूठा होता है। दो दशक पहले जब कोलकाता से अंडमान जाना हुआ था तबका रोमांच अब तक मन को पुलकित करता रहता है।
पर जैसे जैसे घर और कार्यालय की जरूरतों की वज़ह से हवाई सफ़र निरंतर होने लगे उनका नयापन जाता रहा। हवाई अड्डों पर जाने का उत्साह रहता भी तो कैसे? वक़्त के साथ साथ Peak Hour में यात्रियों की भारी भीड़ ने कई अच्छे खासे एयरपोर्ट में अनुभव रेलवे स्टेशन से भी बदतर बना दिया।
टर्मिनल में घुसते ही आप पहुंच जाते हैं इस हरे भरे गलियारे में
दूसरी तरफ पिछले कुछ सालों में नए और विशाल एयरपोर्ट तो बने पर सारे के सारे लगभग एक ही तर्ज पर। एक सी छत की संरचना, एक से गलियारे , एक सी बैठने की जगह और रंगों का वही उदासीन करता संयोजन।
ऐसे में जब पिछले साल मैं बैंगलोर के नए T2 टर्मिनल पहुंचा तो उसका रूप रंग देख के मन जुड़ गया।
चार साल की मेहनत के बाद ये टर्मिनल 2022 के अंत में अपने इस रूप में आया। यहां प्रवेश करते हुए ही आपको लगेगा मानो एयरपोर्ट नहीं बल्कि आप एक उद्यान में प्रवेश कर गए हों। बैंगलोर वाटिकाओं की नगरी के रूप में जाना जाता है और इसीलिए इस टर्मिनल का स्वरूप ऐसा रखा गया।
प्रकृति को इस इमारत में करीब रखने के लिए जो लैंडस्केप यहां बनाया गया उसमें मुख्य भूमिका थी छत, खंभों और दीवारों में प्रयोग किए गए बांस की। यहां तक की छत से लटकते झाड़फानूस (जिसमें रोशनी के साथ पौधों को डाला गया है) और ACVS duct को भी यहां बांस से बनाया गया।
T2 पर बना हरा भरा भोजन कक्ष
छत से लटकते बांस के झाड़फानूस
AC Duct
करीब दस हजार वर्ग मीटर में हरियाली को फैलाने के लिए दीवारों की बाहरी सतह पर फैले पौधों का इस्तेमाल किया गया। बैठने की जगहों के बीचों बीच पेड़ लगाए गए। इन पेड़ों की हरीतिमा बनी रहे उसके लिए बांस से बनी छत के बीच से पर्याप्त मात्रा में प्रकाश आने की व्यवस्था की गई।
एयरपोर्ट में प्रवेश करते ही एक लंबा सा गलियारा आता है जिसके दोनों ओर हरी भरी लताएं आपकी गलबहियां करने के लिए आतुर दिखती हैं। अचानक छत की ओर आपकी नज़र जाती है तो शंकु की शक्ल में बांस को लपेटी हुई लताओं में खिलते फूल आपको देख कर मुस्कुराते हैं। ये समझ लीजिए कि एक प्रकृति प्रेमी को आनंदित करने के लिए यहां बहुत कुछ है।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यहां तीन हजार से अधिक प्रजातियों के पौधों में दो सौ के करीब संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं। ताड़ के भी सौ से ज्यादा रूप आप यहां देख सकते हैं। और तो और यहां एक छोटा सा झरना भी है जो सुरक्षा जांच के बाद आपके सामने आ जाता है।
प्रकृति तो इस एयरपोर्ट की मुख्य थीम है ही पर इसका एक हिस्सा कर्नाटक के इतिहास , सांस्कृतिक कलाओं और स्थापत्य से भी परिचय कराता है
कठपुतली के नाम से सबसे पहला ध्यान राजस्थान पर जाता है पर कर्नाटक में भी कठपुतलियों का प्रयोग लोगों के मनोरंजन के लिए किया जाता रहा है। यही वज़ह है कि टर्मिनल पर जगह जगह पारम्परिक वेशभूषा में कठपुतलियां प्रदर्शित की गयी हैं। इन्हें बनाया है अनुपमा होस्केरे ने इन कठपुतलियों में महिलाओं की भाव भंगिमाओं द्वारा भारतीय नाट्यशास्त्रों के नवरसों को दिखने की कोशिश की गयी है।
कर्नाटक के उत्तरी सिरे पर एक ऐतिहासिक शहर है बीदर जो कभी बहमनी सल्तनत का मुख्य केंद्र हुआ करता था इसी जगह बिदरी कला विकसित हुई इसमें मिश्र धातु की प्लेट को मिट्टी के साथ पका कर काले रंग में लाया जाता हैं। फिर उस पर आकृतियों को उकेरा जाता है। इस कला की मुख्य विशेषता ये है कि इन आकृतियों को चांदी के धागों से बनाया जाता है। नीचे बिदरी कला से बने इस एक सर्किट बोर्ड सरीखे इस शिल्प में बंगलौर के नक़्शे को दिखाया गया है जो शहर की हरीतिमा के साथ साथ उसके तकनीकी केंद्र होने का भी आभास देता है।
हवाई अड्डे पर रखी गयी कलाकृतियाँ भी आगुन्तक का ध्यान अपनी और खींचती हैं। सरवनन परसुरमन का ये गोलाकार शिल्प वास्तव में एक बीज की परिकल्पना बनाया गया है। बीज जब प्रस्फुटित होता है तो ये संरचना नीचे के चित्र की शक़्ल में आ जाती है। शिल्पकार प्रकृति के विभिन्न घटकों के आपसी संबंधों को तंतुओं के अंतरजाल के रूप में प्रदर्शित करते हैं।
कर्नाटक का प्राचीन इतिहास हम्पी के विशाल शहर विजयनगर से जुड़ा है। इस शहर की सम्पन्नता और कला कौशल को आप आज भी हम्पी के खंडहरों में महसूस कर सकते हैं। ओडिशा के कलाकार मयाधर साहू ने अपने इस काष्ठ शिल्प के माध्यम से विजयनगर की सांस्कृतिक समृद्धि को उकेरने का प्रयास किया है।
तो आप जब कभी इस टर्मिनल पर पधारें तो कुछ समय इसकी प्राकृतिक खूबसूरती और इन सराहनीय शिल्पों को निहारने के लिए जरूर रखें।