Saturday, August 15, 2020

केरल जहाँ की सुंदर प्रकृति के साथ लोग भी हैं इंसानियत भरे ...Kerala : Human By Nature

भारत के दक्षिणी पश्चिमी कोने पर बसा एक दुबला पतला सा राज्य है केरल पर ये राज्य अपनी कृशकाया में ना जाने कितनी विविध संस्कृतियों को सैकड़ों सालों से समेटता आया है। इतिहास गवाह है कि इसकी दहलीज़ पर जब जब व्यापारियों और धर्म प्रचारकों ने कदम रखे उन्हें यहाँ के राजाओं ने ना केवल पनाह दी बल्कि उनकी रहन सहन और संस्कृति के भी कई पहलुओं को स्थानीय जीवन शैली में समाहित किया।



क्या अरब, क्या पुर्तगाली, क्या डच, क्या यहूदी, सब इस मिट्टी का हिस्सा बने। वे अपने साथ अपना धर्म तो लाए पर उन्होंने यहाँ रहते रहते स्थानीय परंपराओं को अपने रहन सहन का हिस्सा बना लिया। जब आप केरल जाएँगे तो यहाँ की साझा संस्कृति और मानवीय मूल्यों के कई उदाहरण आपको बस यूँ ही घूमते फिरते दिख जाएँगे।

जब मैं पहली बार कोच्चि गया था तो मात्तनचेरी की गलियों से गुजरते हम एक यहूदी सिनगॉग पहुँचे तो सबसे पहले इसका अज़ीब सा नाम ध्यान आकर्षित कर गया। यहूदियों का ये प्रार्थना स्थल परदेशी सिनगॉग (Pardeshi Synagogue) कहलाता है। इसका कारण ये है कि इसे यहाँ रह रहे स्पेनिश, डच और बाकी यूरोपीय यहूदियों के वंशजों ने मिलकर 1568 में बनाया था। इसलिए परदेशियों का बनाया परदेशी प्रार्थना स्थल हो गया। मज़े की बात ये है कि किसी यहूदी प्रार्थना स्थल में चप्पल उतार कर जाना अनिवार्य नहीं रहता । पर परदेशी सिनागॉग में आप बिना चप्पल उतारे प्रवेश नहीं कर सकते। साफ है कि समय के साथ हिंदू रीति रिवाज का यहाँ रहने बाले यहूदियों पर भी असर पड़ा और उन्होंने उसे अपना लिया।


 

केरल में राह चलते आप किसी भोजनालय में चले जाएँ। आपको कई बार दीवारों पर यहाँ के तीन धार्मिक समुदाय के प्रतीक चिन्ह इकट्ठे दिख जाएँगे। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की अद्भुत मिसाल है ये प्रदेश। यहाँ के लोग भले ही अलग अलग धर्म के अनुयायी हों पर विपत्ति आने पर समाज एक सूत्र में बँधकर एक दूसरे की मदद करता है। अभी हाल ही में कोज़ीकोड में एक विमान दुर्घटना हुई और मिनटों में आसपास के लोग मलबे से लोगों को बाहर निकालने और फिर घायलों को खून देने की ज़द्दोज़हद में जुट गए।

ऍसा ही एक किस्सा याद आता है मुझे जो मेरे एक केरलवासी मित्र ने वहाँ की यात्रा के दौरान सुनाया था। भारतीय मानसून की प्रचंडता को सबसे पहले केरल ही सहन करता है। ऐसे ही एक मानसून के दौरान हुई अत्याधिक वर्षा से मेरे मित्र का गाँव बारिश से पूरी तरह घिर गया था। वे इसी असमंजस में थे कि किस तरह अचानक आई बाढ़ से सुरक्षित निकल पाएँगे कि अगले ही दिन वहाँ से दस बीस किमी दूर मछुआरों की बस्ती से लोग स्वेच्छा से अपनी नाव ले कर उनकी मदद के लिए आ पहुँचे थे। केरल में एक दूसरे को मदद करने की ये परंपरा हर त्रासदी के बीच उभर कर सामने आती है।


लोगों की मदद करने की ये प्रवृति हमें कोच्चि  में भी दिखी थी। एलेप्पी के बैकवाटर्स में नौका यात्रा कर मैं लौटते हुए कोच्चि पहुँचा था। हमें वहाँ रहने के लिए रिहाइशी इलाके में गेस्ट हाउस मिला था। इलाके में ज्यादा दुकानें नहीं थीं। ले दे एक छोटा सा रेस्ट्राँ था। शाम को खाने के लिए जब वहाँ पहुँचे तो लगा कि ये जान लें कि कोच्चि में कहाँ कहाँ जाना श्रेयस्कर रहेगा ? रेस्ट्राँ के मालिक से पूछा तो भाषा की अड़चन सामने आ गयी। हमारी मदद के लिए वो अपने कई ग्राहकों को बारी बारी से बुलाता रहा जो कि अंग्रेजी में बात कर सकें और उसकी ये कोशिश तब तक ज़ारी रही जब तक हमें अपने प्रश्न का यथोचित जवाब मिल नहीं गया।

केरल जैव विविधता लिए एक बड़ा ही खूबसूरत राज्य है जिसके पश्चिमी किनारे के समानांतर बहता अरब सागर कई नयनाभिराम तटों और बैकवाटर्स के अद्भुत जाल को समेटे है तो दूसरी ओर पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ हैं जिनकी ढलानों पर लगाए गए चाय के साथ मसालों और रबर के बागानों की सुंदरता देखते ही बनती है।  इस खूबसूरती में चार चाँद लगाती है यहाँ की मिश्रित संस्कृति और इंसानियत का जज़्बा रखने वाले यहाँ के लोग। इसलिए जब भी केरल जाएँ यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेने के साथ साथ कुछ वक़्त यहाँ की संस्कृति, पर्व त्योहार को समझने और यहाँ के मिलनसार लोगों से मिलने जुलने में भी बिताएँ। यकीनन ऐसा करने से आपके सफ़र का मजा दोगुना हो जाएगा।  

Sponsored by Kerala Tourism

Friday, July 10, 2020

आइए मिलवाएँ आपके घरों के आस पास रहने वाले 36 पक्षियों से Birds in our backyard !

जिस तरह हमारे शहर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होते जा रहे हैं वैसे वैसे हमारा जुड़ाव अपने आस पास की प्रकृति से कम होता जा रहा है। अगर आपका घर किसी बहुमंजिली इमारत का हिस्सा है तो फिर आपके लिए हरियाली घर में लगाए पौधों से ही आ सकती है। महानगरों में ये समस्या काफी बड़ी है पर  छोटे शहर, कस्बे और यहाँ तक की गाँव भी घटती हरियाली से अछूते नहीं रहे हैं। और जब पेड़ ही नहीं रहेंगे तो पक्षी दिखेंगे कैसे? 


यही वज़ह है कि आज की पीढ़ी के ज्यादातर लोग कौए, कबूतर और अपनी पुरानी गौरैया के आलावा शायद ही दस से ज्यादा पक्षियों के नाम गिना सकें। लेकिन जिन लोगों के घरों  के पास थोड़ी बहुत हरियाली है भी वे भी इस बात की शिकायत करते हैं कि हमें तो बिल्कुल पक्षी दिखाई नहीं देते और अगर दिखते हैं तो पहचान ही नहीं पाते। आज का मेरे ये आलेख ऐसे ही लोगों के लिए है जिसमें मैंने तीन दर्जन उन पक्षियों से आपको मिलवाना चाहा है जिसे आप अपनी बॉलकोनी या छत से बैठे बैठे ही देख सकते हैं। मैंने जान बूझ कर पानी के आस पास रहने वाले पक्षियों को इस सूची में शामिल नहीं किया है हालांकि इनमें से कुछ उड़ते हुए घर से भी गाहे बगाहे दिख ही जाते हैं।
नर व मादा कोयल
तो सबसे पहले बात कोयल की जिसके गाने के चर्चे आपने बचपन से सुन रखे हैं। पक्षियों के संसार से भले परिचित हों ना हों पर कोयल का नाम तो सुना ही होगा। हाँ इसकी नर और मादा में क्या अंतर है ये सब लोग तो नहीं ही जानते। ज्यादातर लोग ये जानते हैं कि कोयल काली होती है और बहुत सुरीला गाती है।

कू कू वाला सुरीला गायन करने वाली गायिका नहीं गायक है और इसी तरह अगर आपने मादा कोयल को काला कह दिया तो वो आपको अंधा ही बताएगी  । यानी नर कोयल काला होता है और बेहद सुरीला गाता है जबकि मादा का वक्ष सफेद धारीदार होता है और उसके भूरे पंखों में सफेद बूटे होते हैं। गाती वो भी है पर बस कामचलाऊ। हाँ आँखें जरूर दोनों की लाल होती हैं।



बाकी कौए के घोंसले में अंडे डालने का काम तो नर और मादा मिल कर करते हैं। नर ध्यान हटाता है और तभी मादा चुपके से अपना अंडा डाल कर फुर्र हो जाती है। संदेह ना हो इसलिए कौए का एक अंडा हटाने से भी नहीं चूकती।
महोख / भारद्वाज
कोयल पपीहे की बिरादरी में एक और लंबा चौड़ा सा पक्षी है जिसे हम सब अपने घरों के इर्द गिर्द अक्सर देखते हैं। अगर आपने इसे ना भी देखा हो तो इसकी पुक पुक पुक करती आवाज़ जरूर सुनी होगी। कोयल की तरह ही इसकी आदत पेड़ों के अंदर छुप कर बैठने की है। वैसे अगर इसे अच्छी तरह देखना हो तो सूर्योदय के तुरंत बाद चौकस रहिए ये जनाब धूप सेंकने तभी किसी पेड़ की फुनगी पर अकेले या अपने जोड़ीदार के साथ विराजमान मिलेंगे।

भूरे नारंगी मिश्रित पीठ और काले पंखों वाला ये पक्षी ऊँची उड़ान भरने में कुशल नहीं है। कोयल पपीहे से उलट आप इसे हमेशा ज़मीन पर उतरते देख सकते हैं। कीड़े मकोड़ों के आलावा पक्षियों के अंडों पर भी इसकी नज़र रहती है। अब इसने भारद्वाज ॠषि का नाम पाया है तो कुछ अच्छे लक्षण भी तो होने चाहिए इसमें। मुझे तो एक अच्छी बात ये दिखी कि अपनी प्रजाति के अन्य बदनाम सदस्यों के विपरीत महोख अपने बच्चों का पालन पोषण ख़ुद करते हैं।

कबूतर, कौए या गौरैया के बाद अगर सबसे ज्यादा आपका परिचय किसी से होगा तो वो है तोता या मैना। वैसे एक डाल पर तोता बैठे एक डाल पर मैना वाला गाना जिसने भी सुना है वो इन्हें भूल कैसे सकता है? भारत में तोते की ढेर सारी प्रजातियाँ  मौज़ूद हैंऔर आपको कौन सा तोता ज्यादा दिखता है ये निर्भर करता है कि आप भारत के किस भू भाग में रहते हैं? आम तौर पर जो तोता पूरे भारतवर्ष में दिखता है वो है लाल कंठी तोता जिसे प्यार से हम मिट्ठू के नाम से भी बुलाते हैं। । ऐसा नाम इसके गले के पास की लाल गुलाबी धारी की वजह से है जो काली और नीली धारी से घिरी होती है। मादा में ऐसी धारी नहीं होती। पहाड़ी तोता इससे आकार में बड़ा होता है और उसके उदर के पास एक लाल निशान होता है।

Rose Ringed Parakeet
लाल कंठी तोता

आपके घर के आस पास तोता भले एक या दो किस्म का हो पर मैना की आपको अनेक किस्में दिख जाएँगी। देशी मैना (Common  Myna)  व अबलक मैना (Asian Pied Starling) सबसे ज्यादा दिखती हैं। उसके बाद नंबर आता है भूरे ललाट और काली चोटी वाली ब्राह्मणी (Brahmini Myna) व स्याह रंग की गंगा मैना (Ganga Myna) का। धूसर सिर मैना (Grey Headed Myna) मेरे मोहल्ले में सिर्फ एक बार आई और गुलाबी मैना (Rosy Starling) तो प्रवासी है। दिखेगी तो पूरे दल बल के साथ पर जाड़ों के मौसम में।

अबलक, देशी, गंगा, ब्राह्मणी, धूसर सिर और गुलाबी मैना
बुलबुल की गायिकी से भी तो आप परिचित होंगे ही। मैं तो डैस कोस सिंगल बुलबुल मास्टर वाले खेल से ही बचपन में इनके नाम से परिचित हो गया था पर इन्हें ढंग से पहचानना काफी दिनों बाद ही आया। पूँछ के नीचे लाल और काले सिर वाली वाली गुलदुम बुलबुल (Red Vented Bulbul) और कानों के पास खूबसूरत लाल निशान से सिपाही बुलबुल (Red Whiskered Bulbul)  दूर से ही पहचान ली जाती हैं। पेड़ों की ऊपरी शाखा पर बैठना इन्हें भाता है। पहाड़ों में हिमालयी बुलबुल व काली बुलबुल और उत्तर भारत के मैदानों में सफेद गाल वाली बुलबुल भी आपकों नज़र आएँगी।

सिपाही और गुलदुम बुलबुल

Sunday, May 31, 2020

चांडिल : पहाड़ों और जंगलों से घिरा एक खूबसूरत बाँध Chandil Dam, Jharkhand

राँची से सौ किमी की दूरी पर चांडिल का एक छोटा सा कस्बा है जो सुवर्णरेखा नदी पर बने बाँध के लिए मशहूर है। राँची जमशेदपुर मार्ग पर जमशेदपुर पहुँचने से लगभग तीस किमी पहले ही एक सड़क बाँयी ओर कटती है जो इस बाँध तक आपको ले आएगी। यहाँ एक रेलवे स्टेशन भी है जो कि टाटानगर मुंबई रेल मार्ग पर आता है। पहले मैं सोचता था कि ऐसा नाम चंडी या काली देवी के नाम से निकला होगा क्यूँकि झारखंड में काली की पूजा आम रही है। राँची से सटे रामगढ़ के पास स्थित रजरप्पा के काली मंदिर की प्रसिद्धि का ये आलम है कि वहाँ प्रतिदिन आस पास के राज्यों से भी श्रद्धालु आते रहे हैं। पर चांडिल के नामकरण के बारे में मेरा ये अनुमान गलत निकला।

एक शाम चांडिल बाँध के नाम

कुछ दिनों पहले पढ़ा कि यहाँ के इतिहासकारों का मानना है कि ये नाम चाँदीडीह का अपभ्रंश है। जिस तरह हिंदी भाषी प्रदेशों में किसी नगर के नाम के अंत में 'पुर' लगा रहता है वैसे ही झारखंड से गुजरते वक्त आपको कई ऐसे स्टेशन दिख जाएँगे जिसमें प्रत्यय के तौर पर 'डीह' लगा हुआ है। यानी 'डीह' को आप किसी कस्बे या टोले का समानार्थक शब्द मान सकते हैं। नाम के बारे में इस सोच को इस बात से भी बल मिलता है कि टाटा से राउरकेला के लिए निकलने पर आपको काँटाडीह, नीमडीह और बिरामडीह जैसे स्टेशन मिलते हैं। 

पर्वतों से आज मैं टकरा गया चांडिल ने दी आवाज़ लो मैं आ गया  :)

गर्मियों के मौसम में स्कूल की परीक्षाएँ खत्म होने पर घर में सबकी इच्छा हुई कि कहीं बाहर निकला जाए। सही कहूँ तो ऐसे मौसम में राँची से बेहतर कोई जगह नहीं और जमशेदपुर तो बिल्कुल नहीं है जो गर्मी के मौसम में लगातार तपता रहता है। ऐसे में योजना बनी कि दोपहर बाद चांडिल की ओर निकलते हैं। शाम तक वहाँ पहुँचेगे और रात उधर ही बिताकर अगले दिन वापस आ जाएँगे।  राँची टाटा रोड के जन्म जन्मांतर से बनते रहने के बाद भी ये रास्ता बड़े आराम से दो ढाई घंटे में निकल जाता है। पर उस दिन सड़कें खाली रहने की वज़ह से हम चिलचिलाती धूप में साढ़े तीन बजे तक वहाँ हाजिर थे। हमारे जैसे दर्जन भर घुमक्कड़ वहाँ पहले से मौज़ूद थे। कुछ परिवार के साथ और कुछ अकेले बाँध के आसपास के मनोहारी इलाकों का आनंद उठा रहे थे।

खूबसूरती चांडिल जलाशय की

चांडिल का बाँध ( Chandil Dam) सुवर्णरेखा नदी घाटी परियोजना का एक हिस्सा था। अस्सी के दशक में 56 मीटर ऊँचे इस बाँध का निर्माण हुआ था। बिजली के उत्पादन के साथ साथ आस पास के तीन राज्यों ओड़ीसा, बंगाल और वर्तमान झारखंड में सिंचाई, इस योजना का उद्देश्य था। जैसा कि भारत में अमूमन हर नदी घाटी परियोजना के साथ होता रहा है, ये परियोजना भी प्रभावित गाँवों के लोगों के पुनर्वास, मुआवज़े के आबंटन आदि मुद्दों में फँसती चली गयी और आंशिक रूप से ही पूर्ण हुई।

चांडिल बाँध के बंद दरवाजे, मानसून में इनके खुलने से पानी प्रचंड वेग से निकलता हुआ अपना शक्ति प्रदर्शन करता है।

चांडिल बाँध का इलाका छोटी छोटी पहाड़ियों और साल के जंगलों से अटा पड़ा है। दक्षिण में इसका जुड़ाव डालमा वन्य अभ्यारण्य तक हो जाता है। शाम के वक्त यहाँ के साल के हरे भरे जंगलों का विस्तार, दूर तक फैला अथाह शांत जल और अपनी लालिमा को आस पास की पहाड़ियों पर बिखरते अस्ताचलगामी सूर्य की मिश्रित छटा मन मोह लेती है। 

साल के जंगलों में....

यहाँ पहुँचते ही तीखी धूप से बचने के लिए मैंने साल के जंगलों के बीच शरण ली। ऐसे ये जंगल बाहर से बेहद घने नज़र आते है पर जंगल के अंदर इन सीधे खड़े पेड़ों के बीच आप बड़े आराम से चल फिर सकते हैं। अगर बचने की जरूरत है तो पेड़ों पर निवास करने वाली बड़ी बड़ी लाल चीटियों के अड्डों और विषैली मकड़ियों से क्यूंकि इन जंगली पगडंडियों पर इनका ही सिक्का चलता है। 

जंगलों में घंटे भर का वक़्त बिताने के बाद हम यहाँ चलने वाली मोटरबोट पर थे। वैसे मेरा बस चलता तो चांडिल के जलाशय का भीतरी सफ़र चप्पू वाली नाव पर करता क्यूँकि मोटरबोट का रोमांचक सफ़र दस मिनटों में यूँ खत्म हो जाता है कि लगता है कि अरे काश पानी के बीच इन वादियों में कुछ और वक़्त बिताने का मौका मिलता।

ऐसे शुरु हुई हमारी नौका यात्रा


जलाशय के बीचों बीच

मोटरबोट ने गति पकड़ी और कुछ ही मिनटों में किनारा छोड़ हम जलाशय के बीचों बीच आ गए। खुले आसमान के नीचे हवा निर्बाध गति से बह रही थी। हमारे बाल हवा में उड़े जा रहे थे। सामने तेजी से बदलते उन परिदृश्यों को हम बस आँखों से पी जाना चाहते थे। उन चंद लमहों में प्रकृति की उस सुंदरता को देखकर ही तपती दुपहरी का वो कष्ट काफूर हो गया था और मुझे अपनी यात्रा सार्थक प्रतीत हो रही थी।

कितना हसीं था वो नज़ारा


ढलता सूरज आती शाम

अब वक्त था बाँध के किनारे बैठकर चुपचाप ढलते सूरज की पर्वतों के साथ की जाने वाली अठखेलियों और आसमान के बदलते रंगों को निहारने का ... पर्वतों की हाथ बढ़ाती परछाइयों से मिलने का...। सूर्यास्त के उन खूबसूरत लम्हों में से कुछ को अपने कैमरे में क़ैद कर पाए और कुछ को अपनी स्मृतियों में हमेशा के लिए समा लिया। 

चांडिल बाँध पर सूर्यास्त की बेला

सूर्यास्त और आसमान की रंगीनियाँ

शाम को ये जगह वीरान सी हो जाती है। वैसे तो सिंचाई विभाग का एक विश्रामस्थल यहाँ है और हम वहीं रुकना भी चाहते थे ताकि सुबह जंगलों की खाक छानते हुए सूरज देव से एक बार फिर मिल लें पर स्थानीयों ने सुरक्षा दृष्टि से जमशेदपुर में  रुकने की सलाह दी तो हमें वहाँ से निकलना पड़ा। 

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Sunday, April 12, 2020

इस Lockdown में कैसे बीता मेरा वसंत ? Nature's Photography

पिछला एक महीना पूरे विश्व के लिए एक जबरस्त चुनौती के रूप में सामने आया। एक महामारी ने पूरे विश्व को हिला कर रख दिया। स्थिति ये हो गयी है कि आज  हममें से अधिकांश अपने अपने घरों में  नज़रबंद हैं। घर से काम कर रहे हैं। कुछ लोगों का दायित्व ही ऐसा ही है कि संकट की घड़ी में भी बाहर निकल कर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। जब सुबह शाम टीवी, अखबार व सोशल मीडिया पर सिर्फ महामारी की चर्चा हो तो अच्छे भले व्यक्ति का मन अवसाद या मायूसी से भर उठेगा। सामाजिक दूरी अगर बनाए रखनी है तो इसका मतलब ये नहीं कि आप इस समय अकेले बैठे बैठे यूँ ही चिंतित और अनमने होकर घर का पूरा माहौल ही बोझिल हो उठे।

इस मूड से बाहर आने का सीधा सा उपाय ये है कि क्रियाशील रहें, पढ़े लिखें अपने शौक़ पूरे करें और अगर फिर भी समय बचे तो वो वक्त अपने आसपास की प्रकृति के साथ बिताएँ।

फूल सहजन के

वैसे तो मैं अपने नित्य के जीवन में हमेशा कुछ समय अपनी आस पास की प्रकृति को देता आया हूँ क्यूँकि उसका साथ मुझे आंतरिक रूप से उर्जावान बनाता है। घर में रहने से आजकल ये मौका कुछ ज्यादा मिल रहा है। जब यात्राएँ संभव ना हो तो ये उर्जा और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। आजकल मेरी हर सुबह प्रकृति के इन्हीं रूपों को अपने कैमरे में क़ैद करते हुए बीतती है तो मैंने सोचा कि क्यूँ ना आपको भी पिछले कुछ हफ्तों की इस प्रकृति यात्रा में शामिल करूँ पहले पेड़ पौधों के साथ और अगले हिस्से में पक्षियों के साथ। तो तैयार हैं ना इस यात्रा में मेरे साथ चलने के लिए।

पुटुस या रायमुनिया 

पुटुस या रायमुनिया (Lantana Indica)

पुटुस या रायमुनिया तो जब जब खिलते खिलते हैं मन खुश कर देते हैं। लैंटना भी वरबेना परिवार के ही सदस्य हैं। पूर्वी भारत में ये पुटुस के नाम से मशहूर हैं। शायद ही भारत में कोई जंगल बचा हो जहाँ इनकी झाड़ियों ने अपना साम्राज्य ना फैलाया हो पर बगीचे में अगर इनको ढंग से नियमित रूप से काँटा छाँटा जाता रहे तो इनकी खूबसूरती देखते ही बनती है।

सेमल

सेमल जैसे बहुत कम ऐसे वृक्ष होंगे जिनके तने की रंगत फूलों के रंग से इतनी पृथक हो। सांझ की बेला में तनों का स्याह होता शरीर चटकीले लाल फूलों के सानिध्य में एक ऐसे आकर्षण में आपको बाँध लेता है कि आप इस दृश्य को अपनी आँखों में सँजोए रखना चाहते हैं। इस बार मेरे मोहल्ले में सेमल के फूल थोड़ी देर से आए और अब तो उनके झड़ने की प्रक्रिया आरंभ भी हो गयी है। पिछले हफ्ते ऐसी ही एक ढलती शाम का ये रंगीन लम्हा आपके लिए

सेमल के फूल

नीम 

पिछले महीने नीम के पेड़ में अब पत्तियाँ ना के बराबर बची थीं  फिर नए पत्ते आने लगे। इन नन्ही कोपलों को फूटते देखने का सुख कम नहीं।
नीम की नव कोपलें
नव पल्लवों के आने के हफ्ते भर में इन छोटी छोटी कलियों से से पूरा नीम का पेड़ आच्छादित हो गया।
नव कोपलों से हफ्ते भर में निकले ये नीम की कलियाँ


अब देखिए कैसे कलियों से इसके खूबसूरत फूल निकल आए हैं। :)

सहजन या मुनगा 

जामुनी शकरखोरे का एक नाम फुलसुँघनी भी है। क्यूँ है वो सहजन के फूलों पर इनकी साष्टांग दंडवत वाली इस मुद्रा से सहज अंदाज़ा लगा लेंगे आप
सहजन के फूलों पर साष्टांग दंडवत करता जामुनी शकरखोरा

शिरीष 


हमारे मोहल्ले में एक पेड़ ऐसा है जो गर्मियों की शुरुआत से से खिलने लगता है। एक बार इसके नीचे से गुजर जाएँ तो बस इसकी भीनी भीनी खुशबू से आमोदित हो जाएँगे। इस वृक्ष का नाम है शिरीष। हिंदी में ये सिरस या सिरीस के नाम से भी जाना जाता है।

इसके पतले पतले रेशों से बने फूल रुई के फाहे जैसे होते हैं। फूल झड़ने पर जो फलियाँ बनती हैं वो लंबी चपटी और सख्त बीज के साथ होती हैं। जाड़े के मौसम में जब हवा चलती है तो इनकी खड़खड़ाहट ध्यान खींचती है। शायद इसीलिए अंग्रेजों ने इसे "सिजलिंग ट्री का नाम दे रखा है। जहाँ तक इसके वैज्ञानिक नाम का सवाल है तो वो इटली के वनस्पति विज्ञानी अल्बीज़ी के नाम पर अल्बीज़िया लेबेक रखा गया है।


शिरीष की फलियाँ

शिरीष की फलियों के झरने के बाद निकले नव पल्लव व कलियाँ
एक हफ्ते बाद ही शिरीष यूँ भर गया फूलों से

कनेर


कनेर के फूल से भी ज्यादा मुझे इसकी पतली हरी पत्तियाँ अच्छी लगती हैं। वैसे भी ये औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं।
पीला कनेर

स्नैपड्रैगन या डॉग फ्लावर


स्नैपड्रैगन या डॉग फ्लावर एक अजब सा नाम नहीं लगता आपको। हिंदी में इन फूलों का कोई देशी नाम नहीं। ये भी उत्तरी अफ्रिकी और भूमध्यसागरीय देशों से घूमते घामते भारत में पहुँचे हैं। मैंने कहीं पढ़ा था कि नीला रंग छोड़ के फूलों की ये प्रजाति हर रंग में पाई जाती है।
सोचिए तो इनका ऐसा विचित्र नाम क्यूँ पड़ा? ज्यादा मुश्किल नहीं है ये प्रश्न। बस इनका कोई भी गिरा हुआ एक फूल उठाइए और उसे आधार से दबाइए। दबाते ही इसकी दोनों पंखुड़ियाँ अपना मुँह खोल लेंगी और छोड़ते ही बंद कर लेंगी। पश्चिमी सभ्यताओं को इस फूल का चेहरा ड्रैगन समक्ष लगा तो इसके मुँह खोलने बंद करने के गुण की वजह से वहां इसका नाम स्नैपड्रैगन के रूप में प्रचलित हुआ।
चेहरा तो देखने वालों पर है किसी को 🐉 ड्रैगन लग सकता है किसी को 🐕 जैसा।
स्नैपड्रैगन या डॉग फ्लावर

लिली 

क़ैद में है "लिली"
कोरोना मुस्कुराए
कुछ कहा भी ना जाए
खिले रहा भी ना जाए
क़ैद में है लिली
वैसे ये लिली सचमुच क़ैद में है। इसके मालिक इसे पिछले साल लगा कर चले गए और पिछले हफ्ते ये अपने आप फिर खिल गई।

पिटूनिया

गुलाबी पिटूनिया

वर्बेना 


फूल का अब कोई देश नहीं रह गया। घूमते फिरते मानव ने उन्हें हर मिट्टी की पहचान करा दी है। वर्बेना (Verbena) या बरबेना को ही लीजिए। मूलतः उत्तर और दक्षिणी अमरीकी महादेशों का पौधा है जो अब भारत के बगीचों की शान बढ़ा रहा है।

वर्बेना (Verbena) या बरबेना

बोगनवेलिया

बोगनवेलिया के कागजी फूल देखिए सूर्य की पहली किरण पाकर कैसे प्रकाशित हो उठे हैं 

क्राउन डेज़ी

एक खिले दूजा इठलाए
मेरे तो दोनों मन भाए 
क्राउन डेज़ी (Crown Daisy, Chrysanthemum Coronarium) को हिंदी में ज्यादातर गुलचीनी के नाम से जाना जाता है। ये पीला सफेद फूल देखने में तो खूबसूरत है ही पर इस पौधे की पत्तियों का अपने पौष्टिक गुणों के कारण दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों के विभिन्न व्यंजनों में इस्तेमाल होता है।

क्राउन डेज़ी 

सबबूल

सबबूल के फूलों के बीच छोटा बसंता :)

इस बार वसंत थोड़ी देर से आया और थोड़ी देर ज्यादा ठहर पाया है इसीलिए बहुत सारे फूल जो अप्रैल की गर्म होती फ़िज़ाओं में सिकुड़ने लगते थे अब भी हँस मुस्कुरा रहे हैं। अब जब फूल यूँ खिल कर अपनी खूबसूरती बिखेरेंगे तो तितलियाँ भी कहाँ पीछे रहने वाली हैं।
कल तितलियों का एक नया मेहमान दिखाई पड़ा तो उत्सुकता हुई कि जरा जाने तो कि ये कौन सी तितली आई है? सौभाग्य से मोहल्ले में यूँ ही बिखरे पुटुस यानी रायमुनिया के फूलों ने हमारी इस नई मेहमान का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया और वो जा बैठी इस पुष्प पर। वैसे भी ये फूल आतुर रहते हैं कि तितलियाँ आएँ, उनकी सहायता से परागण हो और वो अपने रंग बदल सकें।
तस्वीर तो ले ली गयी। दूर से सफेद पंखों पर काले काले गोल चौकोर नमूने दिखे और मुँह के पास लाली भी नज़र आई। धूप अगर कम होती तो इसके सफेद काले परों के बीच एक हल्के नीले शेड का भी आभास होता जिसकी वज़ह से इनका नाम Blue Mormon पड़ा है।

ब्लू मॉरमॉन 
झारखंड में अमूमन ये तितली अपेक्षाकृत कम देखी जाती है। इसे सदाबहार जंगल ज्यादा रास आते हैं इसलिए श्रीलंका में बहुतायत पाई जाती है। भारत के दक्षिणी राज्यों में भी ये आम है और महाराष्ट्र ने तो इसे अपनी राजकीय तितली का ही दर्जा दे रखा है। गुजरात, मध्य प्रदेश और झारखंड के उत्तर इसे कम ही देखा गया है।

सूरज की झीनी झीनी रोशनी को अपने में समेटता शीशम का पेड़
आजकल रात का आसमान देखने लायक है। चाँद और शुक्र तो छुआ छुई खेल ही रहे हैं पर उनके पीछे दर्शक दीर्घा में सैकड़ों चमकते तारों की बारात भी है। ऐसे नज़ारों के लिए पहले पहाड़ों तक भटकना पड़ता था।
तो इस एकांतवास में एक बार छत की भी सैर कर आइए। मायूस मन भी तारों सा जगमगा उठेगा।


कितना हसीं है ये चाँद :)
आशा है इस यात्रा ने आपके मन में भी एक धनात्मक उर्जा का संचार किया होगा। अगली बार आपकी पहचान कराएँगे उन पक्षियों से जो आपके बाग बगीचों में अक्सर आते हैं पर आप उन्हें पहचान नहीं पाते।

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Sunday, March 8, 2020

उत्तरी कारो नदी पर स्थित रमणीक पर्यटन स्थल पेरवाघाघ Perwaghagh Falls, Khunti

राँची से सटा झारखंड का एक जिला है खूँटी। लोकसभा में उप सभापति रह चुके कड़िया मुंडा इस लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे। कड़िया मुंडा की विरासत तो आज केंद्र में आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा सँभाल रहे हैं पर इन बड़े कद के नेताओं से ज्यादा खूँटी का जिक्र नक्सलवाद, अफीम की खेती और पत्थलगड़ी जैसे मसलों की वज़ह होता रहा है। ऐसी परिस्थितियों में पर्यटन के लिहाज से शायद ही राँची आने वाला कोई शख्स अब तक इस ओर रुख करता था।

पेरवाघाघ से सटी पहाड़ी के शीर्ष पर पहुँचने के बाद
फिर भी इस इलाके में सड़कों का जाल बिछने से कई जगहें जो पहुँच से दूर थीं वो अब आम जनता के दायरे में आ गयी हैं। खूँटी जिले की ऐसी ही एक खूबसूरत जगह है पेरवाघाघ।  राँची से करीब 75 किमी दूर इस रमणीक स्थल तक पहुँचने के लिए पहले राँची से खूँटी और फिर आगे तोरपा का रास्ता पकड़ना पड़ता है। तोरपा थाना के ठीक पहले एक सड़क बाँयी ओर मुड़ती है जो गाँव देहात के कई मोड़ों को पार करते हुए पेरवाघाघ पहुँचती है।

खूँटी से तोरपा के रास्ते एक बेहद लोकप्रिय शिव धाम है। पेरवाघाघ जाते समय कुछ देर वहाँ रुकना हुआ। कहते हैं कि यहाँ आम के वृक्ष के नीचे से शिवलिंग के निकलने के कारण इसका नाम आम्रेश्वर धाम पड़ा। शिव के आलावा यहाँ दुर्गा, पार्वती, सीता, भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमान गणेश और राधा कृष्ण को समर्पित मंदिर भी हैं पर लोग मुख्यतः यहाँ भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं। आम्रेश्वर धाम की पहचान दूर से दिखने वाले लगभग दो सौ फीट ऊँचे बने मीनार से होती है जिसके नीचे माँ दुर्गा का मंदिर है। इसी  वज़ह से ये धाम अंगराबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है।

आम्रेश्वर धाम परिसर में स्थित विभिन्न मंदिर
झारखंड का वास्तविक ग्रामीण जीवन देखना हो तो किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग से निकलती दुबली पतली सड़कों पर उतर लीजिए। हालांकि झारखंड की ज्यादा भूमि पठारी है फिर भी गाँव के लोगों की जीविका का ज़रिया खेती और पशुपालन ही है। पहाड़ियों और जंगलों के बीच बसे इन गाँवों को जंगल से लकड़ी और मवेशी चराने के लिए जगह भी मिल जाती है। ऐसे ही तीन चार गाँव पार कर जब हम पेरवाघाघ पहुँचे तो वहाँ सैलानियों की भीड़ पहले से ही मौज़ूद थी। वैसे भी जनवरी के महीने में ऐसी जगहों में लोग भारी तादाद में दिन भर पहुँचते  रहते हैं। 


अगर आपको पेरवाघाघ नाम कुछ अजीब लग रहा हो तो बता दूँ कि स्थानीय भाषा में पेरवा कबूतर को कहते हैं। रही बात घाघ की तो हिंदी में ये शब्द एक धूर्त या कुटिल व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होता है पर झारखंड में घाघ से मतलब ऊँचाई से गिरते पानी यानी झरने के लिए प्रयुक्त होता है। पहली बार मेरा इस शब्द से परिचय झारखंड के सबसे ऊँचे जलप्रपात लोध के झरने में जाते वक़्त हुआ था। वहाँ लोग उसे बूढ़ा  घाघ के नाम से पुकारते हैं।

 बेहद साफ सुथरी है यहाँ कारो नदी
किसी ज़माने में यहाँ की पहाड़ी गुफाओं में कबूतरों का वास था। मैंने भी कोशिश की ये देखने कि क्या आज भी उनका वहाँ बसेरा है पर मुझे निराशा ही हाथ लगी। आजकल पिकनिक मनाने में सामिष भोजन और तेज संगीत बजाने की अनिवार्यता हो गई है। स्थानीय झारखंडी संस्कृति तो इसमें और भी रमी हुई है इसलिए परिंदे भी वैसी जगहों से दूर होते जा रहे हैं जहाँ मनुष्य अपने स्वछंद आचरण से उनके लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है। 

पेरवाघाघ की झलक पाने के लिए पहाड़ों के बीच बहती उत्तरी कारो नदी के तट पर नीचे तक उतर कर नदी पार करनी पड़ती है। उत्तरी कारो नदी का उद्गम राँची के पश्चिमी छोर पर खूँटी के पठारी इलाके से होता है। वहाँ से बहते हुए  ये सारंडा सिंहभूमि के जंगलों में प्रवेश करती है और कई सारे घुमाव लेते हुए दक्षिणी कोयल नदी में मिल जाती है। मैंने आपको एक बार राउरकेला के वेद व्यास की सैर कराई थी। वहाँ इसी दक्षिणी कोयल और शंख नदी के संगम से ब्राह्मणी नदी की शुरुआत होती है।

उत्तरी कारो नदी इस दिशा में बढ़ती हुई प्रवेश करती है सारंडा सिंहभूमि के वन्य क्षेत्र में
आंगुतकों की सुविधा के लिए यहाँ के स्थानीय लोगों ने लकड़ी का एक पुल बनाया है जिसे पार करने के लिए आपको पाँच रुपये का एक छोटा सा शुल्क देना होता है। यहाँ से होने वाली आय से स्थानीय, पूरे परिसर की साफ सफाई करते हैं और लोगों पर नज़र भी बनाए रखते हैं। 

पेरवाघाघ पर पहुँचते के साथ ही बिना वक़्त गँवाए पुल पार कर पास की मैंने पास की पहाड़ी पर चढ़ाई शुरु की। कारो नदी घाटी का घुमाव कुछ ऐसा है कि बिना पहाड़ी पर चढ़े आप झरने को नहीं देख सकते। 

पेरवाघाघ का सुंदर जलप्रपात
पेरवाघाघ का झरना भले ही छोटा सा हो पर पचास फीट की ऊँचाई से गिरते पानी के बाद बनने वाला गहरे हरे रंग का जलाशय और उसके बाद की संकरी घाटी इसकी खूबसूरती को बढ़ा देते हैं। झरने तक पहुँचने के लिए एक जुगाड़ वाली नाव भी है जो दोनों छोर में बँधी रस्सी की मदद से आपको झरने के बेहद करीब ले आती है।वहां पहुंचने पर आप  पानी के गिरने से हवा में उठती फुहारों को  शरीर पर महसूस कर सकते हैं।  वैसे भी अब अगर झरने के नीचे नहाना संभव नहीं हो तो फुहारों से ही संतोष करना पड़ेगा ना।

लकड़ी की नैया.. चलाए खिवैया
मैंने सोचा कि क्यूँ ना पहले ऊपर ऊपर चलते हुए झरने के शीर्ष पर पहुँचा जाए पर थोड़ा आगे बढ़ने पर एक खाई सामने आ गयी। मन मसोस कर मुझे वहाँ से वापस लौटना पड़ा। नौका पर आते जाते लोगों के उत्साह को देख कर झरने को छू कर आने की इच्छा जागी और मैं भी पंक्ति में लग गया। ये निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ। सच मजा आ गया रस्सी के सहारे खिंचती इस नौका विहार का।

पास आता झरना :)

झरने के पास गिरती फुहारों का आनंद !

पहाड़ की चढ़ाई भी हो गयी और झरने तक की नौका यात्रा भी। समय अभी भी काफी था तो सोचा चलो आगे बहती नदी के साथ भी कुछ दूर चल लिया जाए। पत्थर यूँ तो सूखे थे पर उनके बीच से कूदते फाँदते चलना इतना आसान भी नहीं था। कई लोगों को उन पत्थरों पर फिसलते देखा और देखते देखते कुछ देर बाद मेरे भी कदम डगमगा गए और मैं गिरते गिरते बचा। धूप भी बढ़ती जा रही थी और लोगों की भीड़ भी। अगर माहौल शांत रहता तो नदी के तट पर इन चट्टानों के साथ साथ चलते चलते बड़े आराम से कुछ समय बिताया जा सकता था।

कारो इन्हीं विशाल शिलाओं के बीच से आपना आगे का रास्ता बनाती है।

 उत्तरी कारो का चट्टानी पाट  



धूप से बचने के लिए अब जंगल ही एक सहारा थे। पक्षी तो दिखे नहीं पर कुछ शानदार पेड़ जरूर दिखे। अब इस लाल पीले फूलों से लदे इस वृक्ष को देखिए। दरअसल ये एक परजीवी झाड़ी है जो अपने भोजन के लिए किसी पेड़ से एक विशेष संरचना से जुड़ जाती है और उसी के इर्द गिर्द फलती फूलती है। अंग्रेजी में इस तरह के वृक्ष Mistletoe के अंदर  वर्गीकृत किए जाते हैं। जंगल में कुछ वक़्त ऐसे ही कुछ और आकर्षक पेड़ों की छवियाँ खींचते हुए बीता और फिर मैंने वापसी की राह पकड़ी।

लाल पीले फूलों से सजा एक परजीवी पेड़

सूखी पत्तियँ के बावज़ूद इस पेड़ पर नज़र ठहर ठहर जाती थी

 पत्तियाँ तो मनोहारी हैं पर उन तक पहुँचने का रास्ता काँटो भरा है।

पेरवाघाघ में क्या करें और क्या ना करें

  • वैसे तो पेरवाघाघ सालों भर जाया जा सकता है पर अप्रैल से जून के बीच नदी के खुले पाट में चलना गर्मी की वजह से आनंद के बजाए पसीने ही छुड़वाएगा। वहीं दिसंबर और जनवरी के महीनों में यहाँ भीड़ काफी होती है इसलिए उसके पहले या बाद में यहाँ जाने की योजना बनाएँ। 
  • तोरपा तक तो बसें चलती हैं पर आखिर के सोलह किमी की दूरी किसी निजी वाहन से ही पूरी की जा सकती हैं। 
  • नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने की वजह से चार बजे के बाद यहाँ ठहरना श्रेयस्कर नहीं है। 
  • झरने के पास पानी गहरा है। वहाँ नहाना जोखिम को आमंत्रण देना है। 
  • मुझे संगीत खुद बेहद प्रिय है पर ऐसी जगहों में म्यूजिक सिस्टम और उसे चलाने के लिए डी जी सेट ले जाना कहाँ की समझदारी है? यहाँ आएँ तो प्रकृति का संगीत सुने जो झूमते पेड़ों, नदी व झरने की बहती धारा व पक्षियों के कलरव से निकलता है।
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