Monday, November 1, 2021

पहाड़ के कोने पर टिका धनकर का बौद्ध मठ और रोमांच धनकर झील ट्रेक का ! Dhankar Gompa and Dhankar Lake Trek

स्पीति की यात्रा करने के बहुत पहले से वहाँ की दो तस्वीरें मेरे मन में घर कर चुकी थीं। एक तो हरे भरे खेतों के बीचों उठती लांग्ज़ा में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा तो दूसरी पहाड़ की संकरी चोटी पर लटकता हुआ सा प्रतीत होता धनकर का बौद्ध मठ जिसे यहाँ धनखर के नाम से भी जाना जाता है। बाद में स्पीति की यात्रा की योजना बनाते समय ये भी पता चला कि मठ से थोड़ी चढ़ाई पर एक छोटा सा ताल भी है जिस तक पहुँचने के लिए करीब एक घंटे लगते हैं। फिर धनकर के इस ऐतिहासिक मठ के साथ साथ वो अनजानी सी झील भी मेरे सफ़र का हिस्सा बन गयी।

धनकर का बौद्ध मठ व किला जिसके अवशेष मात्र ही रह गए हैं

काज़ा की वो सुबह मन में स्फूर्ति भर कर लाई थी। स्पीति के सबसे पुराने मठ को देखने की ललक तो थी ही साथ ही इतनी ऊँचाई पर एक छोटा सा ही सही ट्रेक कर धनखर की पवित्र झील तक जाने का रोमांच भी था। हालांकि मेरे साथी थोड़ा सशंकित जरूर थे क्यूँकि इस तरह की यात्रा का उनका ये पहला अनुभव था पर उत्साह की कमी उनमें भी नहीं थी। 

स्थानीय विद्यालय की शिक्षिका के साथ हम सब

काज़ा से धनकर की दूरी मात्र 33 किमी की है। सीधा सा रास्ता है जो स्पीति नदी के किनारे किनारे होता हुआ करीब एक घंटे में धनकर पहुँचा देता है। काज़ा से पाँच छः किमी आगे बढ़े थे कि रास्ते में हमारी गाड़ी को रोकने का इशारा करती एक युवती मिल गयी। उसे भी धनकर जाना था। हमने उसे बिठा लिया। पता चला कि वहीं के स्कूल की शिक्षिका है। वो रोज़ काज़ा के आगे के एक गाँव से धनकर में बच्चों को पढ़ाने जाती थी। अपने गाँव कस्बों के विद्यालयों से तुलना करूँ तो उसके स्कूल की इमारत शानदार थी पर जिस गाँव की आबादी ही कुल जमा तीन सौ हो वहाँ बच्चे कितने होने थे? 

धनकर का साफ सुथरा प्यारा सा  गाँव 

शिक्षिका ने बताया कि एक क्लास में ज्यादा से ज्यादा पाँच से दस बच्चे होते हैं। उसमें भी कम छात्र होने से दो अलग अलग कक्षाओं के बच्चों को एक साथ पढ़ाना पड़ता है। मैंने मन ही मन सोचा कम से कम यहाँ हर बच्चे को शिक्षक अलग से ध्यान दे पाता होगा वर्ना शहरों में तो आजकल एक सेक्शन में पचास से ज्यादा बच्चे भी विद्यालय ठूँस लेते हैं।

धनकर गाँव में स्कूल की शानदार इमारत

युवती से विदा लेने के बाद हम धनखर मठ की ओर बढ़े। धनकर मठ स्पीति का सबसे पुराना मठ माना जाता है। बारहवीं शताब्दी में ये हिस्सा तिब्बत के राजाओं के नुमाइन्दों के नियंत्रण में था और पूरे स्पीति की राजधानी था। राजा के ये प्रतिनिधि नोनो के नाम से जाने जाते थे। स्पीति और पिन नदियों के बीच घाटी से लगभग हजार फीट की ऊँचाई पर धनकर का लकड़ी और मिट्टी से बना हुआ किला होता था। खेती बाड़ी और गर्मियों में पश्चिमी तिब्बत से होने वाले व्यापार में साहूकारों से सुरक्षा के नाम पर वसूले गए कर से यहाँ का राज काज चलता था। 

वैसे व्यापार के लिए यहाँ के लोगों के पास था भी क्या? सिर्फ याक का ऊन या उसका सुखाया हुआ दूध जिसके बदले यहाँ के लोग नमक और माणिक लिया करते थे। आज भी मठ के ऊपर जाने वाले रास्ते में मिट्टी की दीवारें और उनके बीच कलात्मक लकड़ी के पैनल दिख जाते हैं। आज किले के नाम पर उसके अवशेष ही बचे हैं जो कब काल के गाल में विलीन हो जाएँ कह नहीं सकते।

धनकर गोम्पा का स्वागत द्वार

जैसा कि ज्यादातर मठों में होता है, इस मठ के अंदर भी फोटोग्राफी की मनाही है। मठ के अंदर जाने में ऐसा लगता है मानो किसी गुफा में जा रहे हों। मठ की दीवारों पर बनी पेंटिंग सबसे पहले ध्यान खींचती हैं जो इसके अतीत की झलक दिखला जाती है। यहाँ का मुख्य ध्यान कक्ष एक बड़ी गुफा जैसा ही है जो संभवतः पहाड़ को काट कर बनाया गया हो। ये छोटी बड़ी गुफाएँ एकांत तो देती ही थीं साथ ही कड़ाके की ठंड में अपेक्षाकृत गर्म भी रहती थीं। 

धनकर गोम्पा कब तक खड़ा रह पायेगा इन निरंतर अपरदित होती संरचना पर

पुराने मठ की जीर्ण शीर्ण हालत को देखते हुए नीचे एक नया बौद्ध मठ भी बना दिया गया है जिसमें बाहर से आने वालों के लिए ठहरने की भी व्यवस्था है। मठ के बाहर से आपको धनकर गाँव के साथ साथ दूर तक फैला हुआ स्पीति नदी का पाट और उसके किनारे के रूखे सूखे खेत खलिहान भी दिखते हैं।

धनकर का नया  मठ और उसके ऊपर  धनकर झील की ओर जाती पगडंडी

धनकर के इलाके में तेज हवाओं की वज़ह से मिट्टी की शिलाओं में निरंतर होते अपरदन से कई तीखी शंकुधारी संरचनाएँ बन गयी हैं। वैसे तो नश्तर की तरह निकले ऐसे नुकीले स्वरूपों से स्पीति भरा पड़ा है पर घाटी से तीन सौ मीटर ऊँची चोटी पर स्थित मठ के नीचे और अगल बगल इस अपरदन का जबरदस्त प्रभाव दिखता है। ऐसा लगता है कि ये पहाड़ कभी भी टूट कर बिखर जाएगा। जलवायु परिवर्तन की वज़ह से अब तो स्पीति में यदा कदा बारिश भी होने लगी है जो कमजोर होते इस पहाड़ के लिए और भी नुकसानदायक है। यही वज़ह है कि धनकर को विश्व की सौ वैसी धरोहरों में रखा गया है जो प्रकृति की चोटों को शायद ज्यादा दिनों तक बर्दाश्त ना कर पाएँ। 

मिटटी के अपरदन से बनी नुकीली संरचना 



मठ का दर्शन करने के बाद हम सब धनकर झील तक चढ़ाई के लिए तैयार हो गए। धनकर का मठ समुद्र तल से लगभग 12774 लगभग फीट की ऊँचाई पर है। हमें अभी 250  मीटर यानी साढ़े सात सौ फीट और ऊपर जाना था। ये दूरी तय करने में अमूमन पौन से एक घंटे लगते हैं। जिन लोगों को इतनी ऊँचाई पर चलने का अभ्यास नहीं है उनके लिए ये यात्रा फिटनेस की परीक्षा ले सकती है। सच बताऊँ तो इतनी ऊँचाई पर ट्रेक करने का ये हमारे समूह का पहला अनुभव था। लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में अपनी यात्राओं से मिली सीख से मैं मन ही मन आश्वस्त था कि ये मैं आसानी से कर पाऊँगा पर बाकी लोगों के लिए ये कठिन चुनौती के समान था।

दुबले पतले पेड़ जो स्पीति के बियावान में हरियाली की मुस्कान ले के आते हैं 

मठ के नीचे के खेत खलिहान 

धनकर झील ट्रेक की असली परीक्षा शुरुआती आधे घंटे की है जब आपको तीखी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। सितंबर के महीने में वहाँ ठीक ठाक ठंड होती है पर दिन में धूप भी तेज़ होती है इसलिए चलने में थकान का होना स्वाभाविक है। नए मठ के विपरीत दिशा में जाती पगडंडी से ट्रेक शुरु होता है। शुरुआत में थोड़े बहुत पेड़ और झाड़ियाँ मिलती हैं पर कुछ मिनटों में नंगे पहाड़ आपका दामन थाम लेते हैं और दूर दूर तक उनके सिवा कुछ नहीं दिखता ।

शुरुआत की तीखी चढ़ाई 

अगर आपकी फोटोग्राफी में दिलचस्पी है तो धनकर झील के इस ट्रेक का आनंद आपके लिए तब और बढ़ जाएगा जब पिन और स्पीति नदियों के संगम का विहंगम दृश्य आपके सामने होगा। स्पीति में ये नदियाँ पतली पतली धाराओं में बहती है ठीक वैसे ही जैसे डेल्टाई क्षेत्र में मैदान में बहने वाली नदियाँ टूट कर सागर में मिल जाती हैं। इस पर्वतीय रेगिस्तान में बारिश तो होती नहीं। नदियों में जो पानी होता है वो जाड़ों में जमी बर्फ के पिघलने से आता है। हमारा ट्रेक अब तक नदी के समानांतर चल रहा था पर आगे एक घुमाव था जो हमें नदी से दूर झील की ओर ले जाता। मेरे एक वरीय सहकर्मी अच्छा तो महसूस नहीं कर रहे थे पर रुकते रुकते आगे बढ़ रहे थे। समूह का सबसे छोटा सदस्य निरंतर उनका उत्साहवर्धन कर रहा था़। उनके आने की प्रतीक्षा में मैंने अपनी नज़रें नदियों के मिलन बिन्दु पर गड़ा दीं।


पिन और स्पीति नदी का संगम 

जिस तस्वीर को अंतरजाल पर अक्सर देखा करता था वो साक्षात मेरे सामने थी। मैं चुपचाप एक शिला पर जा बैठा उन लम्हों को अन्तरमन में क़ैद करने के लिए जो कुछ घंटों के बाद मात्र स्मृतियों का हिस्सा भर रह जाने वाले थे। मैं सोचने लगा कि अगर ये कलकल करती नदी वहाँ ना बहे और हवा अपनी सरसराहट ना सुनाए तो इन पहाड़ों में गहन निस्तब्धता के सिवाए और रह क्या जाएगा? ऐसे वातावरण में बौद्ध अनुयाईयों ने भगवान बुद्ध की अराधना का केंद्र बनाया ये क्या कम विस्मय की बात नहीं है? शायद ये निर्जनता ही उनकी साधना को और गहरा करने में सहायक होती हो।

चढ़ाई और संकरे रास्ते से पार पाने के बाद मुख पर छायी प्रसन्नता 😊

घुमाव के साथ पगडंडी बेहद संकीर्ण हो चली थी। एक साथ दो लोगों के चलने की गुंजाइश खत्म हो गयी थी। हम पहाड़ के बिल्कुल किनारे किनारे चल रहे थे। ये स्थिति पाँच दस मिनट बनी रही। हम करीबन हजार फीट ऊपर चढ़ चुके थे। अक्सर झील की ओर लोग दोपहर के बाद ही जाते हैं पर हम थोड़ा पहले ही निकल लिए थे। इसलिए रास्ते में ये बताने के लिए कोई नहीं था कि आगे और कितना चलना है? पर वापसी में ढेर सारे लोगों मुझसे यही सवाल करते रहे। वैसे भी ऊपर चढ़ने वाला हाँफते हुए प्रश्न पूछता है कि और कितना तो जवाब में वो बस पास ही है सुनना चाहता है। एक युवा मोहतरमा ने तो उसका मौका भी नहीं दिया। दूरी पूछने के बाद छूटते ही बोल उठीं प्लीज़ पाँच मिनट से ज्यादा मत बोलिएगा और माहौल में हँसी की एक तरंग तैर गयी।

जिस दिशा में हम पुराने मठ से नए मठ की तरफ आए थे, चढ़ाई चढ़ने के बाद घुमावदार रास्ते से ठीक विपरीत दिशा में जा रहे थे। अगर पुराने किले से कोई पैराग्लाइडिंग करते हुए उड़ान भरता तो ये झील बस पीछे के दो पहाड़ों को पार करते ही सामने दिख जाती। आगे का रास्ता हल्की ढलान लिए था पर पहले से काफी चौड़ा हो चुका था। कठिन हिस्से को पार कर चुकने की खुशी हम सब के चेहरों पर थी। 


चारों ओर मटमैले पहाड़ों का जाल सा था। इन पहाड़ों ने हर दिशा से धनकर झील को घेर रखा है। अगर पास के किसी पर्वत की चोटी से  देखें तो ये छोटी सी झील एक बेहद गहरे मिट्टी के  कटोरे सी नज़र आती है। 

जैसे जैसे हम झील के पास आ रहे थे जंगली घास गोल चौकौर बूटों की शक़्ल में हमें रास्ते की दोनों तरफ दिखाई दे रही थी। कुछ ही देर में हम इस झील के सामने थे। अपने गंतव्य तक पहुँच कर सबसे पहले हमने प्रार्थना स्थल पर जाकर प्रभु को धन्यवाद दिया कि हम इस जगह तक सकुशल पहुँच सके। हमारे समूह के कुछ लोग झील की छोटी सी परिक्रमा पर निकले तो कुछ आकाश की खुली चादर के नीचे लेट कर अपनी थकान मिटाने लगे। मैं भी झील और आस पास का पूरा दृश्य देखने पास की पहाड़ी की ओर बढ़ गया।

धनकर झील, झील  की बाँयी तरफ छोटा सा पुराना स्तूप है 


धनकर झील की बगल में बना नया स्तूप 

रास्ते और झील के पास  बिताये कुछ खुशनुमा पलों की झलकियां 

झील के पास के इलाके में घास के बूटों का अनोखा नमूना, पीछे दिख रहा मणिरंग पर्वत 

झील का एक हिस्सा सितंबर तक सूख चुका था। पानी से भरे झील के दूसरे किनारे पर एक छोटा सा स्तूप है। झील तक पहुँचने के ठीक पहले किन्नौर स्पीति की सीमा पर स्थित मणिरंग की चोटी दिखाई देती है। मणिरंग का शुमार हिमाचल प्रदेश की ऊँची चोटियों में होता है। लगभग 6600 मीटर ऊँचे इसके शिखर पर हाल ही में एयरफोर्स की महिला पर्वतारोहियों की टीम ने अपने झंडे गाड़े थे। एक ज़माने में मणिरंग के पास का दर्रा किन्नौर को स्पीति से जोड़ने का एकमात्र माध्यम हुआ करता था। अब तो अच्छी खासी रोड बन गयी है।

मणिरंग का चमकता शिखर 

पहाड़ों पर कब मौसम बदल जाए पता ही नहीं चलता। झील के आस पास बोलते बतियाते घंटा भर बीता ही था कि बादलों की फौज झील की ओर आती दिखाई दी। मौसम और ना बिगड़ जाए ये सोचकर हमने जल्दी जल्दी वापस कदम बढ़ाए।


वापसी का रास्ता बिना किसी ज्यादा दिक्कत पूरा किया गया। कहीं कहीं ढीली मिट्टी में उतरते समय पैर फिसलने की नौबत आई पर किसी तरह लड़खड़ाते हुए मैं सँभल गया। ट्रेक पूरा होने का उत्साह में सफ़र की थकान उड़ चुकी थी।

ट्रेक सफलतापूर्वक समाप्त करने का उत्साह 


धनकर के नए मठ का प्रांगण 

मठ के पास चाय पी गयी और हम सभी वापस काज़ा के लिए चल पड़े। धनकर में बिताया वो यादगार दिन हमेशा हमेशा के लिए स्मृतियों का अटूट हिस्सा बन गया।

कोरोना की वज़ह से मैंने आपने यात्रा लेखों पर विराम दे दिया था। बदले हुए माहौल और मूड में ये आलेख आप सबको कैसा लगा जरूर बताइएगा।

Monday, April 5, 2021

सखुआ और पलाश के देश में : रेल यात्रा झारखंड की A train journey through Jharkhand

कोरोना की मार ऐसी है कि चाह के भी लंबी यात्राओं पर निकलना नहीं हो पा रहा है। फिर भी अपने शहर और उसके आस पास के इलाकों को पिछले कई महीनों से खँगाल रहा हूँ। बीते दिनों  में अपने दूसरे ब्लॉग एक शाम मेरे नाम पर व्यस्तता ऐसी रही कि यहाँ लिखने का समय नहीं मिल पाया। अब उधर से फुर्सत मिली है तो पिछले कुछ महीनों की हल्की फुल्की घुमक्कड़ी में जो बटोरा है उसे आपसे साझा करने की कोशिश करूँगा।

सखुआ के घने जंगल 

शुरुआत पिछले हफ्ते की गयी एक रेल यात्रा से। बचपन से ही मुझे ट्रेन में सफ़र करना बेहद पसंद रहा है। जब भी नानी के घर गर्मी छुट्टियों में जाना होता मैं खिड़की वाली सीट सबसे पहले हथिया लेता। घर में भले ही सबसे छोटा था पर किसी की मजाल थी जो मुझे खिड़की से उठा पाता। दिन हो या रात खिड़की के बाहर बदलते दृश्य मेरे मन में विस्मय और आनंद दोनों का ही भाव भर देते थे। खेत-खलिहान, नदी-नाले, पहाड़, जंगल, गांव, पुल सभी की खूबसूरती आंखों में बटोरता मैं यात्रा के दौरान अपने आप में मशगूल रहता था।

आज भी जब मुझे कोई खिड़की की सीट छोड़ने को कहता है तो मैं उस आग्रह को कई बार ठुकरा देता हूँ। इस बार होली में घर आने जाने में दो बार रेल से सफ़र करने का मौका मिला।

जाने की बात तो बाद में पर मेरी वापसी सुबह की थी। आसमान साफ था और धूप साल के हरे भरे पत्तों पर पड़कर उनका सौंदर्य दोगुना कर दे रही थी। साल (सखुआ) के पेड़ जहां अपने हरे भरे परिवार और क्रीम फूलों के साथ मुस्कुरा रहे थे तो वहीं कुछ पेड़ों में पतझड़ का आलम था। इन सब के बीच पलाश भी बीच बीच में अपनी नारंगी चुनर फैला रहा था।
कुल मिलाकर दृश्य ऐसा कि आंखें तृप्त हुई जा रही थीं। इसी यात्रा के कुछ नज़ारे आप भी देखिए।

नीली नदी जो इस वसंत में हरी हो गयी 😍

हरी भरी वसुन्धरा पर नारंगी चुनर पलाश की




पर्ण विहीन पेड़ मन में एकाकीपन और गहरी शांति का सा आभास जगाते हैं। वैसे दिखते ये भी उतने ही खूबसूरत हैं।


जाना भरी दुपहरी में था। खेत खलिहान तो दूर से रूखे सूखे दिख रहे थे पर जंगलों की छटा ही निराली थी।झारखंड के खेतों में इन दिनों गेहूँ की फसल पक चुकी है। गेहूँ की झूमती बालियों और उनके पीछे पहाड़ जो साल के पेड़ों से निकले पत्तों का परिधान पहनकर अपनी जीवंतता का सबूत दे रहे थे।



इस साल वसंत वसंत की तरह नहीं आया बल्कि आपने साथ हल्की गर्मी ले कर आया। पलाश जो अमूमन मार्च के आखिर से अप्रैल तक झारखंड में फूलता है, इस बार फरवरी के अंत से ही फूलों से लद गया और मार्च के अंत तक अधिकांश पेड़ों के फूल झड़ भी गए। 

यूँ तो इस रेल यात्रा में राँची से गया के बीच की हरियाली देखते ही बनती है पर गया से कोडरमा और राँची से मूरी के बीच के दृश्य मन को लगातार मुग्ध करते रहते हैं। अगर आप कभी इस रेलमार्ग से यात्रा करें तो इन स्टेशनों के बीच खिड़की से दिखते दृश्यों को देखना ना भूलें।

Friday, November 20, 2020

कोरोना काल में हवाई / रेल यात्रा के दुख और हरी भरी प्रकृति को देख पाने का सुख

ये यात्रा करने का समय नहीं है पर पारिवारिक कारणों से पिछले हफ्ते पहले राँची से दिल्ली और फिर दिल्ली से पटना होते हुए राँची की यात्रा करनी पड़ी। देश किस क़दर कोरोना से ऊब कर निडर या कहिए ढीठ सा होता जा रहा है इसका प्रत्यक्ष अनुभव मुझे अपनी इस यात्रा में मिला। चूँकि इस साल की शुरुआत के बाद ये मेरी पहली यात्रा थी इसलिए कुछ नए खट्टे मीठे अनुभव भी हुए। इन्हीं अनुभवों को आपके सम्मुख लाने की कोशिश है मेरी ये पोस्ट ताकि आप अपने आप को मानसिक तौर पर तैयार कर सकें जब भी इस दौर में यात्रा पर निकलें।

कोरोना काल में हवाई यात्रा करना अपेक्षाकृत खर्चीला भी है (हालांकि दूसरी ओर इस समय रहने और घूमने के खर्चों में काफी कमी आई है।) और अनिश्चित भी। कब आपकी फ्लाइट कैंसिल हो जाए कुछ कह नहीं सकते और  बिना आपकी गलती के अपनी यात्रा को फिर से पटरी पर लाने का जिम्मा भी आपका ही है। दस पन्द्रह दिन पहले राँची से दिल्ली और दिल्ली से पटना का टिकट बुक करा कर निश्चिंत बैठा था कि अचानक कार्यालय में फोन की घंटी घनघनाने लगी। कॉल रिसीव करते हुए ये सूचना दी गई कि मेरी राँची से दिल्ली की फ्लाइट कैंसिल हो गयी है। एक मेल भी आ गया कि बारह महीने तक आपका रिजर्वेशन सुरक्षित है और आप अपनी यात्रा में बदलाव के लिए हमारे टॉल फ्री नंबर पर संपर्क करें। 

ये विमान कंपनियाँ फोन पर बार बार रिकार्डेड मेसज भेज सकती हैं। SMS और मेल कर सकती हैं पर  रद्द की हुई फ्लाइट से यात्रियों को हुई असुविधा का ख्याल रखते हुए ख़ुद फोन कर यात्री को अपनी यात्रा में बदलाव करने की सहूलियत नहीं दे सकतीं। आप सोचेंगे कि अरे इसमें कौन सी बड़ी बात है कि उन्होंने फोन नहीं किया तो आप कर लीजिए। फोन करने में कौन से पैसे लगते हैं?

पर यहीं तो सारी समस्या शुरु होती है। अव्वल तो फोन लगेगा नहीं और अगर लग भी गया तो कोरोना का हवाला देकर ये संदेश सुनाया जाएगा कि अभी स्टाफ की संख्या कम है अपनी बारी की प्रतीक्षा कीजिए। पाँच मिनट, दस मिनट यहाँ तक कि आधे घंटे वो बारी कभी नहीं आएगी। पूरी यात्रा के गड़बड़ होने का तनाव अपनी जगह और उसके ऊपर ये बिना मतलब के समय की बर्बादी। अब चूँकि पैसे फँसे हुए हैं और आपको जाना अभी है इसलिए आपको निरंतर प्रयास तो करते ही रहना पड़ेगा। शायद इन एयरलाइंस की ऐसी कार्यशैली के लिए वो कहावत रची गयी है

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान 
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान

तो मेरे लगातार दो दिन प्रयास करने के बाद देर रात संपर्क बना और काम पाँच मिनट में हो गया यानी मुझे दूसरी फ्लाइट में जाने की व्यवस्था कर दी गयी पर यही काम अगर गो एयरलाइंस वाले पहले करते तो मुझे ये प्रण ना करना पड़ता कि अगली बार पैसे ज्यादा भी लगें तो दूसरी एयरलाइंस को प्राथमिकता देनी है। हालांकि उनका हाल भी बहुत अच्छा होगा इस मामले में इसकी ज्यादा उम्मीद नहीं है। 

वैसे आजकल यात्रा करने में एक बात और ध्यान देने की है कि सारी एयरलाइंस वेब चेक इन करते समय सीट चुनने के अलग से पैसे लेती हैं। गो एयरलाइंस में तो मैंने ये देखा कि सबसे उपेक्षित बीच वाली सीट के भी पैसे वसूले जा रहे हैं यानी कोई सीट फ्री नहीं है।
 



कोरोना काल में किस तरह से सुरक्षा निर्देशों का पालन हो रहा है कुछ उसकी भी चर्चा कर ली जाए। आप हवाई अड्डे में प्रवेश करते हैं तो थर्मल स्कैनिंग होती हैं। गोल घेरों में खड़े होने का निर्देश है पर आधी जनता को वो दिखाई ही नहीं देता। कुछ दूर आगे बढ़ते हैं तो सामान पर डिसइन्फेक्टेंट स्प्रे इस तरह किया जाता दिखता है मानो गंगाजल का छिड़काव हो रहा हो। कुछ यात्री उससे भी अपने सामान को बचाते नज़र आते हैं मानो इस द्रव के स्पर्श से उनके बैग हमेशा के लिए बेकार हो जाएँगे। टिकट और पहचानपत्र  तो कैमरे से चेक कर लिए जाते हैं। सामान आप खुद से चेक करवाते हैं। किसी हवाई अड्डे पर आपको टिकट के साथ लगेज टैग मिलेगा तो किसी पर ये कहा जाएगा कि टैग बोर्डिंग होने के बाद लिंक के रूप में आपको मोबाइल संदेश के ज़रिए बता दिया जाएगा। 

कोरोना काल में भी हवाई अड्डों पर वैसे ही भीड़ है। एक एक सीट छोड़ कर बैठने का निर्देश है। पर इसका पालन करने के लिए इतनी सीट तो हैं नहीं इसलिए आपको वक़्त खड़े खड़े गुजारना भी पड़ सकता है। विमान के अंदर सीट छोड़ने का कोई प्रावधान नहीं है। हर उड़ान ठसाठस भरी ही मिली। बीच वाली सीट वाले को सारे तामझाम के बाद ऐप्रन पहनना अनिवार्य है। पर आज भी उड़ान की घोषणा होने से सट सट के पंक्ति वैसे ही लगती है और सामान कक्ष से सामान लेने के लिए भगदड़ वैसे ही मचती है जैसे पहले मचती थी। कोरोना जाए भाड़ में। ऐसे में फेस शील्ड और ऐप्रन से क्या होगा?


दिल्ली जाते समय दिखती हिमालय की चोटियाँ

अगर हवाई अड्डों का ये हाल है तो रेलवे स्टेशन की हालत का आप अंदाज़ा लगा ही सकते हैं। इतना जरूर हुआ है कि कुछ स्टेशन अभी भी सिर्फ यात्रियों को अंदर जाने दे रहे हैं और प्लेटफार्म पर सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए दूर दूर बैठने की व्यवस्था दिखती है। पर जब भी कोई ट्रेन आती है फुट ओवर ब्रिज पर ठेलमठेल की स्थिति आ जाती है क्यूँकि वहाँ रेलवे ने दूरी बनाकर चलने की कोई व्यवस्था ही नहीं की है। 

रही बात ट्रेन के अंदर तो वहाँ कई लोगों ने अपने ऊपर मास्क पहनने की बाध्यता भी हटा दी है। कुछ लोग तो मास्क रहते हुए भी उसको हटाकर खाँसते नज़र आए। वैसे भी उड़ान में तो तब भी व्यक्ति एक डेढ़ घंटे उस घुटन भरे वातावरण को झेल पाता है पर ट्रेन की लंबी यात्रा में ऐसी उम्मीद रखना भारत जैसे देश में निरी बेवकूफी होगी। 

पर ये तो थे कोरोनाकाल के दुख पर इस दुख पर मरहम लगाने का काम करती है ये प्रकृति। चाहे हवाई यात्रा में दिखती हिमालय की श्वेत धवल चोटियाँ हों या रेल यात्रा में आँखों को सुकून पहुँचाते खेत खलिहान मन जब उनकी ओर मुड़ता है तो सफ़र की परेशानी एकदम से गायब हो जाती है। इसके अलावा एक फायदे की बात ये है कि चूंकि ट्रेन कम संख्या में चल रही हैं इसलिए हर स्टेशन पर समय से पहले पहुँच रही हैं।

पटना से राँची की ट्रेन यात्रा के दौरान झारखंड में घुसते ही बाहर का दृश्य इतना रमणीक हो गया कि कोरोना का रोना कुछ देर के लिए ही सही, भूल ही गए। इस वक्त जंगल सफ़ेद रंग वाले फूलों से लदे हैं। वो पेड़ कौन सा है ये तो मैं समझ नहीं पाया पर हरे के साथ सफ़ेद फूलों का ये जुड़ाव आंखों को सुकून के कई पल दे गया। पहाड़ खत्म हुए तो उनकी जगह धान के खेतों ने ले ली। धान की बालियां कहीं पूरी तरह पक कर चुकी थीं या कटने को तैयार थीं। पहाड़, खेत खलिहान, नदी व नीले आसमान की संगत इतनी भली लगी कि चलती ट्रेन से भी कुछ दृश्य क़ैद किए बिना रहा नहीं गया। पेश है आज की इस यात्रा की एक झांकी
आंखों को तृप्त करती हरियाली
सफ़ेद फूलों की बहार, कोडरमा के पहले इन्हें संभवतः Bukhara fleece flower या Russian Vine के नाम से जाना जाता है।
धान कटने को तैयार
पके धान के खेत
खेत पे कटाई के बाद काम पर लगे लोग।
सुवर्णरेखा नदी
रेल और हवाई यात्रा कर मुझे तो यही लगा कि सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करना तभी ठीक है जब सारे यात्री अनुशासन के साथ सुरक्षा नियमों का पालन करें। पर हमारे देश में ऐसा हो नहीं पाता इसलिए एक जोखिम तो है ही ऐसी यात्राओं में। मैंने अपना अनुभव आपसे साझा कर दिया ताकि आप ख़ुद ही तय कर सकें कि ऐसे हालात में कहाँ और कैसे यात्रा करनी है?

Sunday, September 27, 2020

विश्व पर्यटन दिवस : कितनी प्रकृतिक सुंदरता समेटे है हमारा देश ? World Tourism Day : Incredible India !

भारत एक बेहद सुंदर देश है। इसकी सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सुंदरता के इतने अलग अलग रूप हैं कि आप चाहें भी तो एक जन्म में उन्हें कभी नहीं देख पाएँगे। फिर भी मैंने कोशिश की है कि आज विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर भारत के उत्तर से लेकर दक्खिन और पूरब से लेकर पश्चिम तक की एक छोटी सी झाँकी आपको उन जगहों की दिखाऊँ जहाँ जाकर मुझे बेहद खुशी मिली।

पर्वत, समुद्र, जंगल, मैदान व नादियों से परिपूर्ण है ये देश। अगर आप यहाँ न भी गए हों तो  स्थितियां सामान्य होने पर  अवश्य जाइए और इस बात को महसूस कीजिए कि ऊपरवाले ने इस धरती को कितनी खूबसूरती नवाज़ी है

विश्व इसे एक युद्ध स्थल के रूप में जानता है। सोच कर बड़ा अजीब लगता है कि जिस जगह आ कर मन खुद ब खुद शांत हो जाता है उसे भी पड़ोसियों ने युद्ध का अखाड़ा बनाने में ज़रा भी परहेज नहीं किया।

द्रास , लद्दाख 

हरी भरी वादियां, नीला आसमान, पहाड़ की ढलान पर दूर दूर तक फैले चाय के बागान। मेरा मन तो यहां बार बार जाने को करता है।


मुन्नार, केरल 

ऐसी जगह तो देश में सिर्फ इकलौती है जहाँ नमक का नमक और पानी का पानी हो जाता है। 

कच्छ का रण , गुजरात 

अब चलिए एक ऐसी जगह जहाँ रेत के ऊंचे नीचे पहाड़ों की निस्तब्धता आपको अपने में मगन कर देगी।


जैसलमेर , राजस्थान 

इस झील का  सबसे बड़ा आकर्षण इसके किनारे लगे वृक्षों की कतारें और उन पर पास की पहाड़ियों से नज़र रखते घने जंगल थे। बादलों ने सूरज की रोशनी पर ऐसा पहरा लगाया था कि गहरे हरे रंग के पत्तों और धानी पत्तों के पेड़ एक दूसरे से बिल्कुल पृथक नज़र आ रहे थे। रंगों का ये विभेद हमारे सामने जो दृश्य उपस्थित कर रहा था वो मेरी स्मृतियों से ना निकला है ना निकल सकेगा। 

नौकुचिया ताल , नैनीताल , उत्तराखंड 

इस झील तक पहुंचने के लिए रास्ते भर कितनी धूल फांकी थी हमने। क्या जानते थे कि उन पहाड़ों के पार प्रकृति गहरी नीली साड़ी में हमारा ऐसा स्वागत करेगी।

चंद्र ताल , हिमाचल प्रदेश 

सत्रह हजार फीट से भी ऊपर हिमालय की गोद में बसी इस झील तक की यात्रा मेरे जीवन की सबसे कठिन और रोमांचक यात्रा रही है।

गुरुदोंगमर झील , सिक्किम 

जंगलों के बेहद अंदर दूर से गरजती इस जलप्रपात की आवाज़ भले ही मन में एक डर पैदा करती हो पर पास जा कर इसकी फुहारों का स्पर्श इतना स्नेहिल होता है कि आप इसके पानी में डुबकी लगाए बिना वापस नहीं आ पाते।

लोध जलप्रपात , झारखण्ड 

जंगल, पहाड़, समुद्र,ज्वालामुखी क्या नहीं है ज़मीन के इस छोटे से टुकड़े में। यहां आकर लगता है कि अगर इसे नहीं देखा तो भारत नहीं देखा।

रॉस द्वीप , अंडमान 

पूर्वी भारत धान की खेती के लिए जाना जाता है। मानसून में जब धान की बुआई चालू होती है तो यहाँ के खेत खलिहानों को देख मन हरा भरा हो जाता है।

अयोध्या पहाड़ , पश्चिम बंगाल 

कितने तूफानों को झेल चुका ये समुद्र तट। पर सूर्योदय की लाली को अपने आलिंगन में बांध कर सुबह की बेला में कितना शांत, कितना मासूम नज़र आ रहा है ...


गोपालपुर समुद्र तट , ओडिशा 

पश्चिमी घाट हों या पूर्वी घाटमानसून में इनकी छटा निराली हो जाती है। कब बादल आ जाएँ और आपके आँखों के सामने का दृश्य ओझल हो जाए इसका पूर्वानुमान लगाना कठिन होता है। ऐसा ही एक लमहा जब पहाड़ के एक ओर निखरी धूप थी तो दूसरी ओर बादल


महाबलेश्वर , महाराष्ट्र 

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails