Friday, November 20, 2020

कोरोना काल में हवाई / रेल यात्रा के दुख और हरी भरी प्रकृति को देख पाने का सुख

ये यात्रा करने का समय नहीं है पर पारिवारिक कारणों से पिछले हफ्ते पहले राँची से दिल्ली और फिर दिल्ली से पटना होते हुए राँची की यात्रा करनी पड़ी। देश किस क़दर कोरोना से ऊब कर निडर या कहिए ढीठ सा होता जा रहा है इसका प्रत्यक्ष अनुभव मुझे अपनी इस यात्रा में मिला। चूँकि इस साल की शुरुआत के बाद ये मेरी पहली यात्रा थी इसलिए कुछ नए खट्टे मीठे अनुभव भी हुए। इन्हीं अनुभवों को आपके सम्मुख लाने की कोशिश है मेरी ये पोस्ट ताकि आप अपने आप को मानसिक तौर पर तैयार कर सकें जब भी इस दौर में यात्रा पर निकलें।

कोरोना काल में हवाई यात्रा करना अपेक्षाकृत खर्चीला भी है (हालांकि दूसरी ओर इस समय रहने और घूमने के खर्चों में काफी कमी आई है।) और अनिश्चित भी। कब आपकी फ्लाइट कैंसिल हो जाए कुछ कह नहीं सकते और  बिना आपकी गलती के अपनी यात्रा को फिर से पटरी पर लाने का जिम्मा भी आपका ही है। दस पन्द्रह दिन पहले राँची से दिल्ली और दिल्ली से पटना का टिकट बुक करा कर निश्चिंत बैठा था कि अचानक कार्यालय में फोन की घंटी घनघनाने लगी। कॉल रिसीव करते हुए ये सूचना दी गई कि मेरी राँची से दिल्ली की फ्लाइट कैंसिल हो गयी है। एक मेल भी आ गया कि बारह महीने तक आपका रिजर्वेशन सुरक्षित है और आप अपनी यात्रा में बदलाव के लिए हमारे टॉल फ्री नंबर पर संपर्क करें। 

ये विमान कंपनियाँ फोन पर बार बार रिकार्डेड मेसज भेज सकती हैं। SMS और मेल कर सकती हैं पर  रद्द की हुई फ्लाइट से यात्रियों को हुई असुविधा का ख्याल रखते हुए ख़ुद फोन कर यात्री को अपनी यात्रा में बदलाव करने की सहूलियत नहीं दे सकतीं। आप सोचेंगे कि अरे इसमें कौन सी बड़ी बात है कि उन्होंने फोन नहीं किया तो आप कर लीजिए। फोन करने में कौन से पैसे लगते हैं?

पर यहीं तो सारी समस्या शुरु होती है। अव्वल तो फोन लगेगा नहीं और अगर लग भी गया तो कोरोना का हवाला देकर ये संदेश सुनाया जाएगा कि अभी स्टाफ की संख्या कम है अपनी बारी की प्रतीक्षा कीजिए। पाँच मिनट, दस मिनट यहाँ तक कि आधे घंटे वो बारी कभी नहीं आएगी। पूरी यात्रा के गड़बड़ होने का तनाव अपनी जगह और उसके ऊपर ये बिना मतलब के समय की बर्बादी। अब चूँकि पैसे फँसे हुए हैं और आपको जाना अभी है इसलिए आपको निरंतर प्रयास तो करते ही रहना पड़ेगा। शायद इन एयरलाइंस की ऐसी कार्यशैली के लिए वो कहावत रची गयी है

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान 
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान

तो मेरे लगातार दो दिन प्रयास करने के बाद देर रात संपर्क बना और काम पाँच मिनट में हो गया यानी मुझे दूसरी फ्लाइट में जाने की व्यवस्था कर दी गयी पर यही काम अगर गो एयरलाइंस वाले पहले करते तो मुझे ये प्रण ना करना पड़ता कि अगली बार पैसे ज्यादा भी लगें तो दूसरी एयरलाइंस को प्राथमिकता देनी है। हालांकि उनका हाल भी बहुत अच्छा होगा इस मामले में इसकी ज्यादा उम्मीद नहीं है। 

वैसे आजकल यात्रा करने में एक बात और ध्यान देने की है कि सारी एयरलाइंस वेब चेक इन करते समय सीट चुनने के अलग से पैसे लेती हैं। गो एयरलाइंस में तो मैंने ये देखा कि सबसे उपेक्षित बीच वाली सीट के भी पैसे वसूले जा रहे हैं यानी कोई सीट फ्री नहीं है।
 



कोरोना काल में किस तरह से सुरक्षा निर्देशों का पालन हो रहा है कुछ उसकी भी चर्चा कर ली जाए। आप हवाई अड्डे में प्रवेश करते हैं तो थर्मल स्कैनिंग होती हैं। गोल घेरों में खड़े होने का निर्देश है पर आधी जनता को वो दिखाई ही नहीं देता। कुछ दूर आगे बढ़ते हैं तो सामान पर डिसइन्फेक्टेंट स्प्रे इस तरह किया जाता दिखता है मानो गंगाजल का छिड़काव हो रहा हो। कुछ यात्री उससे भी अपने सामान को बचाते नज़र आते हैं मानो इस द्रव के स्पर्श से उनके बैग हमेशा के लिए बेकार हो जाएँगे। टिकट और पहचानपत्र  तो कैमरे से चेक कर लिए जाते हैं। सामान आप खुद से चेक करवाते हैं। किसी हवाई अड्डे पर आपको टिकट के साथ लगेज टैग मिलेगा तो किसी पर ये कहा जाएगा कि टैग बोर्डिंग होने के बाद लिंक के रूप में आपको मोबाइल संदेश के ज़रिए बता दिया जाएगा। 

कोरोना काल में भी हवाई अड्डों पर वैसे ही भीड़ है। एक एक सीट छोड़ कर बैठने का निर्देश है। पर इसका पालन करने के लिए इतनी सीट तो हैं नहीं इसलिए आपको वक़्त खड़े खड़े गुजारना भी पड़ सकता है। विमान के अंदर सीट छोड़ने का कोई प्रावधान नहीं है। हर उड़ान ठसाठस भरी ही मिली। बीच वाली सीट वाले को सारे तामझाम के बाद ऐप्रन पहनना अनिवार्य है। पर आज भी उड़ान की घोषणा होने से सट सट के पंक्ति वैसे ही लगती है और सामान कक्ष से सामान लेने के लिए भगदड़ वैसे ही मचती है जैसे पहले मचती थी। कोरोना जाए भाड़ में। ऐसे में फेस शील्ड और ऐप्रन से क्या होगा?


दिल्ली जाते समय दिखती हिमालय की चोटियाँ

अगर हवाई अड्डों का ये हाल है तो रेलवे स्टेशन की हालत का आप अंदाज़ा लगा ही सकते हैं। इतना जरूर हुआ है कि कुछ स्टेशन अभी भी सिर्फ यात्रियों को अंदर जाने दे रहे हैं और प्लेटफार्म पर सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए दूर दूर बैठने की व्यवस्था दिखती है। पर जब भी कोई ट्रेन आती है फुट ओवर ब्रिज पर ठेलमठेल की स्थिति आ जाती है क्यूँकि वहाँ रेलवे ने दूरी बनाकर चलने की कोई व्यवस्था ही नहीं की है। 

रही बात ट्रेन के अंदर तो वहाँ कई लोगों ने अपने ऊपर मास्क पहनने की बाध्यता भी हटा दी है। कुछ लोग तो मास्क रहते हुए भी उसको हटाकर खाँसते नज़र आए। वैसे भी उड़ान में तो तब भी व्यक्ति एक डेढ़ घंटे उस घुटन भरे वातावरण को झेल पाता है पर ट्रेन की लंबी यात्रा में ऐसी उम्मीद रखना भारत जैसे देश में निरी बेवकूफी होगी। 

पर ये तो थे कोरोनाकाल के दुख पर इस दुख पर मरहम लगाने का काम करती है ये प्रकृति। चाहे हवाई यात्रा में दिखती हिमालय की श्वेत धवल चोटियाँ हों या रेल यात्रा में आँखों को सुकून पहुँचाते खेत खलिहान मन जब उनकी ओर मुड़ता है तो सफ़र की परेशानी एकदम से गायब हो जाती है। इसके अलावा एक फायदे की बात ये है कि चूंकि ट्रेन कम संख्या में चल रही हैं इसलिए हर स्टेशन पर समय से पहले पहुँच रही हैं।

पटना से राँची की ट्रेन यात्रा के दौरान झारखंड में घुसते ही बाहर का दृश्य इतना रमणीक हो गया कि कोरोना का रोना कुछ देर के लिए ही सही, भूल ही गए। इस वक्त जंगल सफ़ेद रंग वाले फूलों से लदे हैं। वो पेड़ कौन सा है ये तो मैं समझ नहीं पाया पर हरे के साथ सफ़ेद फूलों का ये जुड़ाव आंखों को सुकून के कई पल दे गया। पहाड़ खत्म हुए तो उनकी जगह धान के खेतों ने ले ली। धान की बालियां कहीं पूरी तरह पक कर चुकी थीं या कटने को तैयार थीं। पहाड़, खेत खलिहान, नदी व नीले आसमान की संगत इतनी भली लगी कि चलती ट्रेन से भी कुछ दृश्य क़ैद किए बिना रहा नहीं गया। पेश है आज की इस यात्रा की एक झांकी
आंखों को तृप्त करती हरियाली
सफ़ेद फूलों की बहार, कोडरमा के पहले इन्हें संभवतः Bukhara fleece flower या Russian Vine के नाम से जाना जाता है।
धान कटने को तैयार
पके धान के खेत
खेत पे कटाई के बाद काम पर लगे लोग।
सुवर्णरेखा नदी
रेल और हवाई यात्रा कर मुझे तो यही लगा कि सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करना तभी ठीक है जब सारे यात्री अनुशासन के साथ सुरक्षा नियमों का पालन करें। पर हमारे देश में ऐसा हो नहीं पाता इसलिए एक जोखिम तो है ही ऐसी यात्राओं में। मैंने अपना अनुभव आपसे साझा कर दिया ताकि आप ख़ुद ही तय कर सकें कि ऐसे हालात में कहाँ और कैसे यात्रा करनी है?

Sunday, September 27, 2020

विश्व पर्यटन दिवस : कितनी प्रकृतिक सुंदरता समेटे है हमारा देश ? World Tourism Day : Incredible India !

भारत एक बेहद सुंदर देश है। इसकी सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सुंदरता के इतने अलग अलग रूप हैं कि आप चाहें भी तो एक जन्म में उन्हें कभी नहीं देख पाएँगे। फिर भी मैंने कोशिश की है कि आज विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर भारत के उत्तर से लेकर दक्खिन और पूरब से लेकर पश्चिम तक की एक छोटी सी झाँकी आपको उन जगहों की दिखाऊँ जहाँ जाकर मुझे बेहद खुशी मिली।

पर्वत, समुद्र, जंगल, मैदान व नादियों से परिपूर्ण है ये देश। अगर आप यहाँ न भी गए हों तो  स्थितियां सामान्य होने पर  अवश्य जाइए और इस बात को महसूस कीजिए कि ऊपरवाले ने इस धरती को कितनी खूबसूरती नवाज़ी है

विश्व इसे एक युद्ध स्थल के रूप में जानता है। सोच कर बड़ा अजीब लगता है कि जिस जगह आ कर मन खुद ब खुद शांत हो जाता है उसे भी पड़ोसियों ने युद्ध का अखाड़ा बनाने में ज़रा भी परहेज नहीं किया।

द्रास , लद्दाख 

हरी भरी वादियां, नीला आसमान, पहाड़ की ढलान पर दूर दूर तक फैले चाय के बागान। मेरा मन तो यहां बार बार जाने को करता है।


मुन्नार, केरल 

ऐसी जगह तो देश में सिर्फ इकलौती है जहाँ नमक का नमक और पानी का पानी हो जाता है। 

कच्छ का रण , गुजरात 

अब चलिए एक ऐसी जगह जहाँ रेत के ऊंचे नीचे पहाड़ों की निस्तब्धता आपको अपने में मगन कर देगी।


जैसलमेर , राजस्थान 

इस झील का  सबसे बड़ा आकर्षण इसके किनारे लगे वृक्षों की कतारें और उन पर पास की पहाड़ियों से नज़र रखते घने जंगल थे। बादलों ने सूरज की रोशनी पर ऐसा पहरा लगाया था कि गहरे हरे रंग के पत्तों और धानी पत्तों के पेड़ एक दूसरे से बिल्कुल पृथक नज़र आ रहे थे। रंगों का ये विभेद हमारे सामने जो दृश्य उपस्थित कर रहा था वो मेरी स्मृतियों से ना निकला है ना निकल सकेगा। 

नौकुचिया ताल , नैनीताल , उत्तराखंड 

इस झील तक पहुंचने के लिए रास्ते भर कितनी धूल फांकी थी हमने। क्या जानते थे कि उन पहाड़ों के पार प्रकृति गहरी नीली साड़ी में हमारा ऐसा स्वागत करेगी।

चंद्र ताल , हिमाचल प्रदेश 

सत्रह हजार फीट से भी ऊपर हिमालय की गोद में बसी इस झील तक की यात्रा मेरे जीवन की सबसे कठिन और रोमांचक यात्रा रही है।

गुरुदोंगमर झील , सिक्किम 

जंगलों के बेहद अंदर दूर से गरजती इस जलप्रपात की आवाज़ भले ही मन में एक डर पैदा करती हो पर पास जा कर इसकी फुहारों का स्पर्श इतना स्नेहिल होता है कि आप इसके पानी में डुबकी लगाए बिना वापस नहीं आ पाते।

लोध जलप्रपात , झारखण्ड 

जंगल, पहाड़, समुद्र,ज्वालामुखी क्या नहीं है ज़मीन के इस छोटे से टुकड़े में। यहां आकर लगता है कि अगर इसे नहीं देखा तो भारत नहीं देखा।

रॉस द्वीप , अंडमान 

पूर्वी भारत धान की खेती के लिए जाना जाता है। मानसून में जब धान की बुआई चालू होती है तो यहाँ के खेत खलिहानों को देख मन हरा भरा हो जाता है।

अयोध्या पहाड़ , पश्चिम बंगाल 

कितने तूफानों को झेल चुका ये समुद्र तट। पर सूर्योदय की लाली को अपने आलिंगन में बांध कर सुबह की बेला में कितना शांत, कितना मासूम नज़र आ रहा है ...


गोपालपुर समुद्र तट , ओडिशा 

पश्चिमी घाट हों या पूर्वी घाटमानसून में इनकी छटा निराली हो जाती है। कब बादल आ जाएँ और आपके आँखों के सामने का दृश्य ओझल हो जाए इसका पूर्वानुमान लगाना कठिन होता है। ऐसा ही एक लमहा जब पहाड़ के एक ओर निखरी धूप थी तो दूसरी ओर बादल


महाबलेश्वर , महाराष्ट्र 

Saturday, August 15, 2020

केरल जहाँ की सुंदर प्रकृति के साथ लोग भी हैं इंसानियत भरे ...Kerala : Human By Nature

भारत के दक्षिणी पश्चिमी कोने पर बसा एक दुबला पतला सा राज्य है केरल पर ये राज्य अपनी कृशकाया में ना जाने कितनी विविध संस्कृतियों को सैकड़ों सालों से समेटता आया है। इतिहास गवाह है कि इसकी दहलीज़ पर जब जब व्यापारियों और धर्म प्रचारकों ने कदम रखे उन्हें यहाँ के राजाओं ने ना केवल पनाह दी बल्कि उनकी रहन सहन और संस्कृति के भी कई पहलुओं को स्थानीय जीवन शैली में समाहित किया।



क्या अरब, क्या पुर्तगाली, क्या डच, क्या यहूदी, सब इस मिट्टी का हिस्सा बने। वे अपने साथ अपना धर्म तो लाए पर उन्होंने यहाँ रहते रहते स्थानीय परंपराओं को अपने रहन सहन का हिस्सा बना लिया। जब आप केरल जाएँगे तो यहाँ की साझा संस्कृति और मानवीय मूल्यों के कई उदाहरण आपको बस यूँ ही घूमते फिरते दिख जाएँगे।

जब मैं पहली बार कोच्चि गया था तो मात्तनचेरी की गलियों से गुजरते हम एक यहूदी सिनगॉग पहुँचे तो सबसे पहले इसका अज़ीब सा नाम ध्यान आकर्षित कर गया। यहूदियों का ये प्रार्थना स्थल परदेशी सिनगॉग (Pardeshi Synagogue) कहलाता है। इसका कारण ये है कि इसे यहाँ रह रहे स्पेनिश, डच और बाकी यूरोपीय यहूदियों के वंशजों ने मिलकर 1568 में बनाया था। इसलिए परदेशियों का बनाया परदेशी प्रार्थना स्थल हो गया। मज़े की बात ये है कि किसी यहूदी प्रार्थना स्थल में चप्पल उतार कर जाना अनिवार्य नहीं रहता । पर परदेशी सिनागॉग में आप बिना चप्पल उतारे प्रवेश नहीं कर सकते। साफ है कि समय के साथ हिंदू रीति रिवाज का यहाँ रहने बाले यहूदियों पर भी असर पड़ा और उन्होंने उसे अपना लिया।


 

केरल में राह चलते आप किसी भोजनालय में चले जाएँ। आपको कई बार दीवारों पर यहाँ के तीन धार्मिक समुदाय के प्रतीक चिन्ह इकट्ठे दिख जाएँगे। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की अद्भुत मिसाल है ये प्रदेश। यहाँ के लोग भले ही अलग अलग धर्म के अनुयायी हों पर विपत्ति आने पर समाज एक सूत्र में बँधकर एक दूसरे की मदद करता है। अभी हाल ही में कोज़ीकोड में एक विमान दुर्घटना हुई और मिनटों में आसपास के लोग मलबे से लोगों को बाहर निकालने और फिर घायलों को खून देने की ज़द्दोज़हद में जुट गए।

ऍसा ही एक किस्सा याद आता है मुझे जो मेरे एक केरलवासी मित्र ने वहाँ की यात्रा के दौरान सुनाया था। भारतीय मानसून की प्रचंडता को सबसे पहले केरल ही सहन करता है। ऐसे ही एक मानसून के दौरान हुई अत्याधिक वर्षा से मेरे मित्र का गाँव बारिश से पूरी तरह घिर गया था। वे इसी असमंजस में थे कि किस तरह अचानक आई बाढ़ से सुरक्षित निकल पाएँगे कि अगले ही दिन वहाँ से दस बीस किमी दूर मछुआरों की बस्ती से लोग स्वेच्छा से अपनी नाव ले कर उनकी मदद के लिए आ पहुँचे थे। केरल में एक दूसरे को मदद करने की ये परंपरा हर त्रासदी के बीच उभर कर सामने आती है।


लोगों की मदद करने की ये प्रवृति हमें कोच्चि  में भी दिखी थी। एलेप्पी के बैकवाटर्स में नौका यात्रा कर मैं लौटते हुए कोच्चि पहुँचा था। हमें वहाँ रहने के लिए रिहाइशी इलाके में गेस्ट हाउस मिला था। इलाके में ज्यादा दुकानें नहीं थीं। ले दे एक छोटा सा रेस्ट्राँ था। शाम को खाने के लिए जब वहाँ पहुँचे तो लगा कि ये जान लें कि कोच्चि में कहाँ कहाँ जाना श्रेयस्कर रहेगा ? रेस्ट्राँ के मालिक से पूछा तो भाषा की अड़चन सामने आ गयी। हमारी मदद के लिए वो अपने कई ग्राहकों को बारी बारी से बुलाता रहा जो कि अंग्रेजी में बात कर सकें और उसकी ये कोशिश तब तक ज़ारी रही जब तक हमें अपने प्रश्न का यथोचित जवाब मिल नहीं गया।

केरल जैव विविधता लिए एक बड़ा ही खूबसूरत राज्य है जिसके पश्चिमी किनारे के समानांतर बहता अरब सागर कई नयनाभिराम तटों और बैकवाटर्स के अद्भुत जाल को समेटे है तो दूसरी ओर पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ हैं जिनकी ढलानों पर लगाए गए चाय के साथ मसालों और रबर के बागानों की सुंदरता देखते ही बनती है।  इस खूबसूरती में चार चाँद लगाती है यहाँ की मिश्रित संस्कृति और इंसानियत का जज़्बा रखने वाले यहाँ के लोग। इसलिए जब भी केरल जाएँ यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेने के साथ साथ कुछ वक़्त यहाँ की संस्कृति, पर्व त्योहार को समझने और यहाँ के मिलनसार लोगों से मिलने जुलने में भी बिताएँ। यकीनन ऐसा करने से आपके सफ़र का मजा दोगुना हो जाएगा।  

Sponsored by Kerala Tourism

Friday, July 10, 2020

आइए मिलवाएँ आपके घरों के आस पास रहने वाले 36 पक्षियों से Birds in our backyard !

जिस तरह हमारे शहर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होते जा रहे हैं वैसे वैसे हमारा जुड़ाव अपने आस पास की प्रकृति से कम होता जा रहा है। अगर आपका घर किसी बहुमंजिली इमारत का हिस्सा है तो फिर आपके लिए हरियाली घर में लगाए पौधों से ही आ सकती है। महानगरों में ये समस्या काफी बड़ी है पर  छोटे शहर, कस्बे और यहाँ तक की गाँव भी घटती हरियाली से अछूते नहीं रहे हैं। और जब पेड़ ही नहीं रहेंगे तो पक्षी दिखेंगे कैसे? 


यही वज़ह है कि आज की पीढ़ी के ज्यादातर लोग कौए, कबूतर और अपनी पुरानी गौरैया के आलावा शायद ही दस से ज्यादा पक्षियों के नाम गिना सकें। लेकिन जिन लोगों के घरों  के पास थोड़ी बहुत हरियाली है भी वे भी इस बात की शिकायत करते हैं कि हमें तो बिल्कुल पक्षी दिखाई नहीं देते और अगर दिखते हैं तो पहचान ही नहीं पाते। आज का मेरे ये आलेख ऐसे ही लोगों के लिए है जिसमें मैंने तीन दर्जन उन पक्षियों से आपको मिलवाना चाहा है जिसे आप अपनी बॉलकोनी या छत से बैठे बैठे ही देख सकते हैं। मैंने जान बूझ कर पानी के आस पास रहने वाले पक्षियों को इस सूची में शामिल नहीं किया है हालांकि इनमें से कुछ उड़ते हुए घर से भी गाहे बगाहे दिख ही जाते हैं।
नर व मादा कोयल
तो सबसे पहले बात कोयल की जिसके गाने के चर्चे आपने बचपन से सुन रखे हैं। पक्षियों के संसार से भले परिचित हों ना हों पर कोयल का नाम तो सुना ही होगा। हाँ इसकी नर और मादा में क्या अंतर है ये सब लोग तो नहीं ही जानते। ज्यादातर लोग ये जानते हैं कि कोयल काली होती है और बहुत सुरीला गाती है।

कू कू वाला सुरीला गायन करने वाली गायिका नहीं गायक है और इसी तरह अगर आपने मादा कोयल को काला कह दिया तो वो आपको अंधा ही बताएगी  । यानी नर कोयल काला होता है और बेहद सुरीला गाता है जबकि मादा का वक्ष सफेद धारीदार होता है और उसके भूरे पंखों में सफेद बूटे होते हैं। गाती वो भी है पर बस कामचलाऊ। हाँ आँखें जरूर दोनों की लाल होती हैं।



बाकी कौए के घोंसले में अंडे डालने का काम तो नर और मादा मिल कर करते हैं। नर ध्यान हटाता है और तभी मादा चुपके से अपना अंडा डाल कर फुर्र हो जाती है। संदेह ना हो इसलिए कौए का एक अंडा हटाने से भी नहीं चूकती।
महोख / भारद्वाज
कोयल पपीहे की बिरादरी में एक और लंबा चौड़ा सा पक्षी है जिसे हम सब अपने घरों के इर्द गिर्द अक्सर देखते हैं। अगर आपने इसे ना भी देखा हो तो इसकी पुक पुक पुक करती आवाज़ जरूर सुनी होगी। कोयल की तरह ही इसकी आदत पेड़ों के अंदर छुप कर बैठने की है। वैसे अगर इसे अच्छी तरह देखना हो तो सूर्योदय के तुरंत बाद चौकस रहिए ये जनाब धूप सेंकने तभी किसी पेड़ की फुनगी पर अकेले या अपने जोड़ीदार के साथ विराजमान मिलेंगे।

भूरे नारंगी मिश्रित पीठ और काले पंखों वाला ये पक्षी ऊँची उड़ान भरने में कुशल नहीं है। कोयल पपीहे से उलट आप इसे हमेशा ज़मीन पर उतरते देख सकते हैं। कीड़े मकोड़ों के आलावा पक्षियों के अंडों पर भी इसकी नज़र रहती है। अब इसने भारद्वाज ॠषि का नाम पाया है तो कुछ अच्छे लक्षण भी तो होने चाहिए इसमें। मुझे तो एक अच्छी बात ये दिखी कि अपनी प्रजाति के अन्य बदनाम सदस्यों के विपरीत महोख अपने बच्चों का पालन पोषण ख़ुद करते हैं।

कबूतर, कौए या गौरैया के बाद अगर सबसे ज्यादा आपका परिचय किसी से होगा तो वो है तोता या मैना। वैसे एक डाल पर तोता बैठे एक डाल पर मैना वाला गाना जिसने भी सुना है वो इन्हें भूल कैसे सकता है? भारत में तोते की ढेर सारी प्रजातियाँ  मौज़ूद हैंऔर आपको कौन सा तोता ज्यादा दिखता है ये निर्भर करता है कि आप भारत के किस भू भाग में रहते हैं? आम तौर पर जो तोता पूरे भारतवर्ष में दिखता है वो है लाल कंठी तोता जिसे प्यार से हम मिट्ठू के नाम से भी बुलाते हैं। । ऐसा नाम इसके गले के पास की लाल गुलाबी धारी की वजह से है जो काली और नीली धारी से घिरी होती है। मादा में ऐसी धारी नहीं होती। पहाड़ी तोता इससे आकार में बड़ा होता है और उसके उदर के पास एक लाल निशान होता है।

Rose Ringed Parakeet
लाल कंठी तोता

आपके घर के आस पास तोता भले एक या दो किस्म का हो पर मैना की आपको अनेक किस्में दिख जाएँगी। देशी मैना (Common  Myna)  व अबलक मैना (Asian Pied Starling) सबसे ज्यादा दिखती हैं। उसके बाद नंबर आता है भूरे ललाट और काली चोटी वाली ब्राह्मणी (Brahmini Myna) व स्याह रंग की गंगा मैना (Ganga Myna) का। धूसर सिर मैना (Grey Headed Myna) मेरे मोहल्ले में सिर्फ एक बार आई और गुलाबी मैना (Rosy Starling) तो प्रवासी है। दिखेगी तो पूरे दल बल के साथ पर जाड़ों के मौसम में।

अबलक, देशी, गंगा, ब्राह्मणी, धूसर सिर और गुलाबी मैना
बुलबुल की गायिकी से भी तो आप परिचित होंगे ही। मैं तो डैस कोस सिंगल बुलबुल मास्टर वाले खेल से ही बचपन में इनके नाम से परिचित हो गया था पर इन्हें ढंग से पहचानना काफी दिनों बाद ही आया। पूँछ के नीचे लाल और काले सिर वाली वाली गुलदुम बुलबुल (Red Vented Bulbul) और कानों के पास खूबसूरत लाल निशान से सिपाही बुलबुल (Red Whiskered Bulbul)  दूर से ही पहचान ली जाती हैं। पेड़ों की ऊपरी शाखा पर बैठना इन्हें भाता है। पहाड़ों में हिमालयी बुलबुल व काली बुलबुल और उत्तर भारत के मैदानों में सफेद गाल वाली बुलबुल भी आपकों नज़र आएँगी।

सिपाही और गुलदुम बुलबुल

Sunday, May 31, 2020

चांडिल : पहाड़ों और जंगलों से घिरा एक खूबसूरत बाँध Chandil Dam, Jharkhand

राँची से सौ किमी की दूरी पर चांडिल का एक छोटा सा कस्बा है जो सुवर्णरेखा नदी पर बने बाँध के लिए मशहूर है। राँची जमशेदपुर मार्ग पर जमशेदपुर पहुँचने से लगभग तीस किमी पहले ही एक सड़क बाँयी ओर कटती है जो इस बाँध तक आपको ले आएगी। यहाँ एक रेलवे स्टेशन भी है जो कि टाटानगर मुंबई रेल मार्ग पर आता है। पहले मैं सोचता था कि ऐसा नाम चंडी या काली देवी के नाम से निकला होगा क्यूँकि झारखंड में काली की पूजा आम रही है। राँची से सटे रामगढ़ के पास स्थित रजरप्पा के काली मंदिर की प्रसिद्धि का ये आलम है कि वहाँ प्रतिदिन आस पास के राज्यों से भी श्रद्धालु आते रहे हैं। पर चांडिल के नामकरण के बारे में मेरा ये अनुमान गलत निकला।

एक शाम चांडिल बाँध के नाम

कुछ दिनों पहले पढ़ा कि यहाँ के इतिहासकारों का मानना है कि ये नाम चाँदीडीह का अपभ्रंश है। जिस तरह हिंदी भाषी प्रदेशों में किसी नगर के नाम के अंत में 'पुर' लगा रहता है वैसे ही झारखंड से गुजरते वक्त आपको कई ऐसे स्टेशन दिख जाएँगे जिसमें प्रत्यय के तौर पर 'डीह' लगा हुआ है। यानी 'डीह' को आप किसी कस्बे या टोले का समानार्थक शब्द मान सकते हैं। नाम के बारे में इस सोच को इस बात से भी बल मिलता है कि टाटा से राउरकेला के लिए निकलने पर आपको काँटाडीह, नीमडीह और बिरामडीह जैसे स्टेशन मिलते हैं। 

पर्वतों से आज मैं टकरा गया चांडिल ने दी आवाज़ लो मैं आ गया  :)

गर्मियों के मौसम में स्कूल की परीक्षाएँ खत्म होने पर घर में सबकी इच्छा हुई कि कहीं बाहर निकला जाए। सही कहूँ तो ऐसे मौसम में राँची से बेहतर कोई जगह नहीं और जमशेदपुर तो बिल्कुल नहीं है जो गर्मी के मौसम में लगातार तपता रहता है। ऐसे में योजना बनी कि दोपहर बाद चांडिल की ओर निकलते हैं। शाम तक वहाँ पहुँचेगे और रात उधर ही बिताकर अगले दिन वापस आ जाएँगे।  राँची टाटा रोड के जन्म जन्मांतर से बनते रहने के बाद भी ये रास्ता बड़े आराम से दो ढाई घंटे में निकल जाता है। पर उस दिन सड़कें खाली रहने की वज़ह से हम चिलचिलाती धूप में साढ़े तीन बजे तक वहाँ हाजिर थे। हमारे जैसे दर्जन भर घुमक्कड़ वहाँ पहले से मौज़ूद थे। कुछ परिवार के साथ और कुछ अकेले बाँध के आसपास के मनोहारी इलाकों का आनंद उठा रहे थे।

खूबसूरती चांडिल जलाशय की

चांडिल का बाँध ( Chandil Dam) सुवर्णरेखा नदी घाटी परियोजना का एक हिस्सा था। अस्सी के दशक में 56 मीटर ऊँचे इस बाँध का निर्माण हुआ था। बिजली के उत्पादन के साथ साथ आस पास के तीन राज्यों ओड़ीसा, बंगाल और वर्तमान झारखंड में सिंचाई, इस योजना का उद्देश्य था। जैसा कि भारत में अमूमन हर नदी घाटी परियोजना के साथ होता रहा है, ये परियोजना भी प्रभावित गाँवों के लोगों के पुनर्वास, मुआवज़े के आबंटन आदि मुद्दों में फँसती चली गयी और आंशिक रूप से ही पूर्ण हुई।

चांडिल बाँध के बंद दरवाजे, मानसून में इनके खुलने से पानी प्रचंड वेग से निकलता हुआ अपना शक्ति प्रदर्शन करता है।

चांडिल बाँध का इलाका छोटी छोटी पहाड़ियों और साल के जंगलों से अटा पड़ा है। दक्षिण में इसका जुड़ाव डालमा वन्य अभ्यारण्य तक हो जाता है। शाम के वक्त यहाँ के साल के हरे भरे जंगलों का विस्तार, दूर तक फैला अथाह शांत जल और अपनी लालिमा को आस पास की पहाड़ियों पर बिखरते अस्ताचलगामी सूर्य की मिश्रित छटा मन मोह लेती है। 

साल के जंगलों में....

यहाँ पहुँचते ही तीखी धूप से बचने के लिए मैंने साल के जंगलों के बीच शरण ली। ऐसे ये जंगल बाहर से बेहद घने नज़र आते है पर जंगल के अंदर इन सीधे खड़े पेड़ों के बीच आप बड़े आराम से चल फिर सकते हैं। अगर बचने की जरूरत है तो पेड़ों पर निवास करने वाली बड़ी बड़ी लाल चीटियों के अड्डों और विषैली मकड़ियों से क्यूंकि इन जंगली पगडंडियों पर इनका ही सिक्का चलता है। 

जंगलों में घंटे भर का वक़्त बिताने के बाद हम यहाँ चलने वाली मोटरबोट पर थे। वैसे मेरा बस चलता तो चांडिल के जलाशय का भीतरी सफ़र चप्पू वाली नाव पर करता क्यूँकि मोटरबोट का रोमांचक सफ़र दस मिनटों में यूँ खत्म हो जाता है कि लगता है कि अरे काश पानी के बीच इन वादियों में कुछ और वक़्त बिताने का मौका मिलता।

ऐसे शुरु हुई हमारी नौका यात्रा


जलाशय के बीचों बीच

मोटरबोट ने गति पकड़ी और कुछ ही मिनटों में किनारा छोड़ हम जलाशय के बीचों बीच आ गए। खुले आसमान के नीचे हवा निर्बाध गति से बह रही थी। हमारे बाल हवा में उड़े जा रहे थे। सामने तेजी से बदलते उन परिदृश्यों को हम बस आँखों से पी जाना चाहते थे। उन चंद लमहों में प्रकृति की उस सुंदरता को देखकर ही तपती दुपहरी का वो कष्ट काफूर हो गया था और मुझे अपनी यात्रा सार्थक प्रतीत हो रही थी।

कितना हसीं था वो नज़ारा


ढलता सूरज आती शाम

अब वक्त था बाँध के किनारे बैठकर चुपचाप ढलते सूरज की पर्वतों के साथ की जाने वाली अठखेलियों और आसमान के बदलते रंगों को निहारने का ... पर्वतों की हाथ बढ़ाती परछाइयों से मिलने का...। सूर्यास्त के उन खूबसूरत लम्हों में से कुछ को अपने कैमरे में क़ैद कर पाए और कुछ को अपनी स्मृतियों में हमेशा के लिए समा लिया। 

चांडिल बाँध पर सूर्यास्त की बेला

सूर्यास्त और आसमान की रंगीनियाँ

शाम को ये जगह वीरान सी हो जाती है। वैसे तो सिंचाई विभाग का एक विश्रामस्थल यहाँ है और हम वहीं रुकना भी चाहते थे ताकि सुबह जंगलों की खाक छानते हुए सूरज देव से एक बार फिर मिल लें पर स्थानीयों ने सुरक्षा दृष्टि से जमशेदपुर में  रुकने की सलाह दी तो हमें वहाँ से निकलना पड़ा। 

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