Sunday, March 8, 2020

उत्तरी कारो नदी पर स्थित रमणीक पर्यटन स्थल पेरवाघाघ Perwaghagh Falls, Khunti

राँची से सटा झारखंड का एक जिला है खूँटी। लोकसभा में उप सभापति रह चुके कड़िया मुंडा इस लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे। कड़िया मुंडा की विरासत तो आज केंद्र में आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा सँभाल रहे हैं पर इन बड़े कद के नेताओं से ज्यादा खूँटी का जिक्र नक्सलवाद, अफीम की खेती और पत्थलगड़ी जैसे मसलों की वज़ह होता रहा है। ऐसी परिस्थितियों में पर्यटन के लिहाज से शायद ही राँची आने वाला कोई शख्स अब तक इस ओर रुख करता था।

पेरवाघाघ से सटी पहाड़ी के शीर्ष पर पहुँचने के बाद
फिर भी इस इलाके में सड़कों का जाल बिछने से कई जगहें जो पहुँच से दूर थीं वो अब आम जनता के दायरे में आ गयी हैं। खूँटी जिले की ऐसी ही एक खूबसूरत जगह है पेरवाघाघ।  राँची से करीब 75 किमी दूर इस रमणीक स्थल तक पहुँचने के लिए पहले राँची से खूँटी और फिर आगे तोरपा का रास्ता पकड़ना पड़ता है। तोरपा थाना के ठीक पहले एक सड़क बाँयी ओर मुड़ती है जो गाँव देहात के कई मोड़ों को पार करते हुए पेरवाघाघ पहुँचती है।

खूँटी से तोरपा के रास्ते एक बेहद लोकप्रिय शिव धाम है। पेरवाघाघ जाते समय कुछ देर वहाँ रुकना हुआ। कहते हैं कि यहाँ आम के वृक्ष के नीचे से शिवलिंग के निकलने के कारण इसका नाम आम्रेश्वर धाम पड़ा। शिव के आलावा यहाँ दुर्गा, पार्वती, सीता, भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमान गणेश और राधा कृष्ण को समर्पित मंदिर भी हैं पर लोग मुख्यतः यहाँ भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं। आम्रेश्वर धाम की पहचान दूर से दिखने वाले लगभग दो सौ फीट ऊँचे बने मीनार से होती है जिसके नीचे माँ दुर्गा का मंदिर है। इसी  वज़ह से ये धाम अंगराबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है।

आम्रेश्वर धाम परिसर में स्थित विभिन्न मंदिर
झारखंड का वास्तविक ग्रामीण जीवन देखना हो तो किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग से निकलती दुबली पतली सड़कों पर उतर लीजिए। हालांकि झारखंड की ज्यादा भूमि पठारी है फिर भी गाँव के लोगों की जीविका का ज़रिया खेती और पशुपालन ही है। पहाड़ियों और जंगलों के बीच बसे इन गाँवों को जंगल से लकड़ी और मवेशी चराने के लिए जगह भी मिल जाती है। ऐसे ही तीन चार गाँव पार कर जब हम पेरवाघाघ पहुँचे तो वहाँ सैलानियों की भीड़ पहले से ही मौज़ूद थी। वैसे भी जनवरी के महीने में ऐसी जगहों में लोग भारी तादाद में दिन भर पहुँचते  रहते हैं। 


अगर आपको पेरवाघाघ नाम कुछ अजीब लग रहा हो तो बता दूँ कि स्थानीय भाषा में पेरवा कबूतर को कहते हैं। रही बात घाघ की तो हिंदी में ये शब्द एक धूर्त या कुटिल व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होता है पर झारखंड में घाघ से मतलब ऊँचाई से गिरते पानी यानी झरने के लिए प्रयुक्त होता है। पहली बार मेरा इस शब्द से परिचय झारखंड के सबसे ऊँचे जलप्रपात लोध के झरने में जाते वक़्त हुआ था। वहाँ लोग उसे बूढ़ा  घाघ के नाम से पुकारते हैं।

 बेहद साफ सुथरी है यहाँ कारो नदी
किसी ज़माने में यहाँ की पहाड़ी गुफाओं में कबूतरों का वास था। मैंने भी कोशिश की ये देखने कि क्या आज भी उनका वहाँ बसेरा है पर मुझे निराशा ही हाथ लगी। आजकल पिकनिक मनाने में सामिष भोजन और तेज संगीत बजाने की अनिवार्यता हो गई है। स्थानीय झारखंडी संस्कृति तो इसमें और भी रमी हुई है इसलिए परिंदे भी वैसी जगहों से दूर होते जा रहे हैं जहाँ मनुष्य अपने स्वछंद आचरण से उनके लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है। 

पेरवाघाघ की झलक पाने के लिए पहाड़ों के बीच बहती उत्तरी कारो नदी के तट पर नीचे तक उतर कर नदी पार करनी पड़ती है। उत्तरी कारो नदी का उद्गम राँची के पश्चिमी छोर पर खूँटी के पठारी इलाके से होता है। वहाँ से बहते हुए  ये सारंडा सिंहभूमि के जंगलों में प्रवेश करती है और कई सारे घुमाव लेते हुए दक्षिणी कोयल नदी में मिल जाती है। मैंने आपको एक बार राउरकेला के वेद व्यास की सैर कराई थी। वहाँ इसी दक्षिणी कोयल और शंख नदी के संगम से ब्राह्मणी नदी की शुरुआत होती है।

उत्तरी कारो नदी इस दिशा में बढ़ती हुई प्रवेश करती है सारंडा सिंहभूमि के वन्य क्षेत्र में
आंगुतकों की सुविधा के लिए यहाँ के स्थानीय लोगों ने लकड़ी का एक पुल बनाया है जिसे पार करने के लिए आपको पाँच रुपये का एक छोटा सा शुल्क देना होता है। यहाँ से होने वाली आय से स्थानीय, पूरे परिसर की साफ सफाई करते हैं और लोगों पर नज़र भी बनाए रखते हैं। 

पेरवाघाघ पर पहुँचते के साथ ही बिना वक़्त गँवाए पुल पार कर पास की मैंने पास की पहाड़ी पर चढ़ाई शुरु की। कारो नदी घाटी का घुमाव कुछ ऐसा है कि बिना पहाड़ी पर चढ़े आप झरने को नहीं देख सकते। 

पेरवाघाघ का सुंदर जलप्रपात
पेरवाघाघ का झरना भले ही छोटा सा हो पर पचास फीट की ऊँचाई से गिरते पानी के बाद बनने वाला गहरे हरे रंग का जलाशय और उसके बाद की संकरी घाटी इसकी खूबसूरती को बढ़ा देते हैं। झरने तक पहुँचने के लिए एक जुगाड़ वाली नाव भी है जो दोनों छोर में बँधी रस्सी की मदद से आपको झरने के बेहद करीब ले आती है।वहां पहुंचने पर आप  पानी के गिरने से हवा में उठती फुहारों को  शरीर पर महसूस कर सकते हैं।  वैसे भी अब अगर झरने के नीचे नहाना संभव नहीं हो तो फुहारों से ही संतोष करना पड़ेगा ना।

लकड़ी की नैया.. चलाए खिवैया
मैंने सोचा कि क्यूँ ना पहले ऊपर ऊपर चलते हुए झरने के शीर्ष पर पहुँचा जाए पर थोड़ा आगे बढ़ने पर एक खाई सामने आ गयी। मन मसोस कर मुझे वहाँ से वापस लौटना पड़ा। नौका पर आते जाते लोगों के उत्साह को देख कर झरने को छू कर आने की इच्छा जागी और मैं भी पंक्ति में लग गया। ये निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ। सच मजा आ गया रस्सी के सहारे खिंचती इस नौका विहार का।

पास आता झरना :)

झरने के पास गिरती फुहारों का आनंद !

पहाड़ की चढ़ाई भी हो गयी और झरने तक की नौका यात्रा भी। समय अभी भी काफी था तो सोचा चलो आगे बहती नदी के साथ भी कुछ दूर चल लिया जाए। पत्थर यूँ तो सूखे थे पर उनके बीच से कूदते फाँदते चलना इतना आसान भी नहीं था। कई लोगों को उन पत्थरों पर फिसलते देखा और देखते देखते कुछ देर बाद मेरे भी कदम डगमगा गए और मैं गिरते गिरते बचा। धूप भी बढ़ती जा रही थी और लोगों की भीड़ भी। अगर माहौल शांत रहता तो नदी के तट पर इन चट्टानों के साथ साथ चलते चलते बड़े आराम से कुछ समय बिताया जा सकता था।

कारो इन्हीं विशाल शिलाओं के बीच से आपना आगे का रास्ता बनाती है।

 उत्तरी कारो का चट्टानी पाट  



धूप से बचने के लिए अब जंगल ही एक सहारा थे। पक्षी तो दिखे नहीं पर कुछ शानदार पेड़ जरूर दिखे। अब इस लाल पीले फूलों से लदे इस वृक्ष को देखिए। दरअसल ये एक परजीवी झाड़ी है जो अपने भोजन के लिए किसी पेड़ से एक विशेष संरचना से जुड़ जाती है और उसी के इर्द गिर्द फलती फूलती है। अंग्रेजी में इस तरह के वृक्ष Mistletoe के अंदर  वर्गीकृत किए जाते हैं। जंगल में कुछ वक़्त ऐसे ही कुछ और आकर्षक पेड़ों की छवियाँ खींचते हुए बीता और फिर मैंने वापसी की राह पकड़ी।

लाल पीले फूलों से सजा एक परजीवी पेड़

सूखी पत्तियँ के बावज़ूद इस पेड़ पर नज़र ठहर ठहर जाती थी

 पत्तियाँ तो मनोहारी हैं पर उन तक पहुँचने का रास्ता काँटो भरा है।

पेरवाघाघ में क्या करें और क्या ना करें

  • वैसे तो पेरवाघाघ सालों भर जाया जा सकता है पर अप्रैल से जून के बीच नदी के खुले पाट में चलना गर्मी की वजह से आनंद के बजाए पसीने ही छुड़वाएगा। वहीं दिसंबर और जनवरी के महीनों में यहाँ भीड़ काफी होती है इसलिए उसके पहले या बाद में यहाँ जाने की योजना बनाएँ। 
  • तोरपा तक तो बसें चलती हैं पर आखिर के सोलह किमी की दूरी किसी निजी वाहन से ही पूरी की जा सकती हैं। 
  • नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने की वजह से चार बजे के बाद यहाँ ठहरना श्रेयस्कर नहीं है। 
  • झरने के पास पानी गहरा है। वहाँ नहाना जोखिम को आमंत्रण देना है। 
  • मुझे संगीत खुद बेहद प्रिय है पर ऐसी जगहों में म्यूजिक सिस्टम और उसे चलाने के लिए डी जी सेट ले जाना कहाँ की समझदारी है? यहाँ आएँ तो प्रकृति का संगीत सुने जो झूमते पेड़ों, नदी व झरने की बहती धारा व पक्षियों के कलरव से निकलता है।
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Sunday, February 23, 2020

आइए चलें पक्षियों की दुनिया में अंबाझरी जैवविविधता उद्यान, नागपुर Ambazari Biodiversity Park, Nagpur

नागपुर यूँ तो अपने चारों ओर तरह तरह के अभ्यारण्यों को समेटे है बस शहर के बीचो बीच भी एक इलाका है जो जानवरों के लिए तो नहीं पर प्रकृति प्रेमियों और स्वास्थ के प्रति सजग रहने वालों में खासा लोकप्रिय है। इस इलाके का नाम है अंबाझरी जैवविविधता उद्यान जो करीब साढ़े सात सौ एकड़ में फैला हुआ है और अपने अंदर दो सौ से भी अधिक प्रजातियों के पक्षियों को समेटे है।  


पिछले नवंबर में जब मैं पेंच राष्ट्रीय उद्यान में गया था तो उससे पहले अपनी दो सुबहें मैंने यहीं व्यतीत की थीं और सच पूछिए बड़ा आनंद आया था मुझे अंबाझरी झील के किनारे बसे इस इलाके में अकेले विचरण करते हुए। ये पूरा क्षेत्र घास के मैदानों और झाड़ियों से भरा है। यही वज़ह है कि यहाँ आपको वो पक्षी दिखते हैं जिन्हें पानी के पास या झाड़ियों में रहना पसंद है। 


घास के मैदान जो आश्रयस्थल है ढेर सारे पक्षियों के
 घर से चलने के पहले ही अंबाझरी में काले और नारंगी रंग के थिरथिरे से मेरी मुलाकात हो गयी। बताइए क्या रंगों का मिश्रण दिया इन्हें भगवान ने! शरीर का ऊपरी हिस्सा काला रखा तो निचले सिरे को खूबसूरत नारंगी बना दिया। अब इन दोनों रंगों का मेल ऐसा कि एक बार देखते ही नज़रें ठिठक जाएँ। इन जनाब से मेरी पहली मुलाकात दो साल पहले सितंबर के महीने में तब हुई थी जब में स्पीति के गांव लंग्ज़ा की ओर बढ़ रहा था और ये उस पथरीले रेगिस्तान में ज़मीन पर अपने भोजन को ढूँढ रहे थे। जाड़ों में ये हिमालय की ऊँचाई त्याग कर मैदानी इलाकों की राह तय करते हैं।
अंबाझरी जैवविविधता उद्यान, नागपुर

साढ़े सात बजे तक मैं पार्क में दाखिल हो चुका था। यूँ तो वहाँ साइकिल की व्यवस्था है पर पक्षियों को ढूँढने और साथ ही साथ कैमरा सँभालने के लिए पैदल चलने से बेहतर कुछ भी नहीं। शुरुआत में तो मुझे पक्षियों की आवाज़ों के आलावा वहाँ कोई शख़्स नज़र नहीं आया। पर इतने एकांत में प्रकृति को यूँ निहारना अपने आप में एक अलग तरह का अनुभव था। जानते हैं सबसे पहले मुझे वहाँ कौन सा पक्षी दिखाई दिया? एक ऐसा पक्षी जिसकी साहित्य में तो महिमा अपरमपार है पर जिसके दर्शन मुझे इससे पहले कभी सुलभ नहीं हो पाए थे।

वो पक्षी था चातक ! वही चातक जिसके बारे में कहा जाता है कि चाहे वो कितना भी प्यासा हो मगर नदी या झील के पानी के बजाय वर्षा की गिरती बूँदों से ही अपना गला तर करता है। कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य में भी इसका जिक्र है। बहरहाल ये तो बस कहानियों की बाते हैं जो बेचारे चातक पर यूँ ही लाद दी गयी हैं। काले और सफेद रंग के पंखों वाले इस पक्षी का सबसे आकर्षित करने वाला हिस्सा इसकी बड़ी बड़ी आँखें और कलगी है। बहरहाल मैं इसे देख ही रहा था कि एक विचित्र गूँज से मेरा ध्यान दूसरी ओर पलटा।

चातक (Pied Cuckoo, Jacobin Cuckoo)
रौशनी अभी धीरे धीरे अपने पैर पसार रही थी। इसलिए एक सूखे पेड़ के ऊपर उस आवाज़ करती काली सी आकृति को पहचानना मुश्किल था। कैमरे से ज़ूम कर इतना समझ जरूर आया कि हो न हो ये तीतर के दो आगे तीतर , तीतर के दो पीछे तीतर ,बोलो कितने तीतर वाले प्रश्न का ही तीतर है। जनाब की हुंकार मीठी तो कहीं से नहीं थी पर ये जरूर था कि उनकी हर हूक का जवाब करीब आधे किमी दूर बैठे पक्षी से लगातार मिल रहा था। नतीजा ये था कि उनकी वाणी पूरे उत्साह से वातावरण को गुंजायमान किए थी। बाद में मुझे पता चला कि प्रजनन काल में सुबह सुबह ही अपनी प्रेयसी की तलाश में ही भोर होते ही ये अपने रियाज़ पर लग जाते हैं और उसके लिए कोई ऊँचा स्थान ढूँढ लेते हैं।  कम रौशनी और दूरी की वज़ह से उनकी तस्वीर बहुत साफ नहीं आई। इसकी आवाज़ का वीडियो बनाना उस वक़्त सूझा नहीं पर आप सुनना चाहें तो यहाँ सुन सकते हैं

तीतरों की कई प्रजातियाँ होती है और इस तीतर को चित्रित तीतर के नाम से जाना जाता है। चित्रित तीतर पश्चिमी और मध्य भारत के इलाकों में ज्यादा देखा जाता है।

चित्रित तीतर (Painted Francolin)
उजाला हो रहा था और अब कई युवा भाड़े की साइकिलों के साथ नज़र आने लगते थे। कहीं रास्ते में मैं किसी पक्षी की तस्वीर खींच रहा होता तो सब बिना आवाज़ किए पहले ही रुक जाते और मेरे से इशारा पाकर ही आगे बढ़ते। बच्चों को ऐसा करते देख अच्छा लगा। कई माता पिता अपने बच्चों को पक्षियों के बारे में बताने भी लाए थे पर बिना किसी दूरबीन के। इसीलिए उनहें वहाँ लगे पक्षियों के साइनबोर्ड पर दी गयी जानकारी से ही संतोष करना पड़ रहा था।

राबिन, महोख, फुटकी, अबाबील की झलक पाते हुए नज़रें इस लंबी पूँछ वाले लहटोरे पर जा अटकीं। इससे तो कई बार पहले भी मुलाकात हुई थी। आँखों के आगे काली पट्टी बाँधे ये पक्षी दिखने में भले छोटा सा दिखे पर इसकी गिनती बेरहम शिकारियों में होती है।

लंबी दुम वाला लहटोरा या लटोरा, Long Tailed Shrike
फाख़्ता तो आपने कई देखे होंगे पर चितरोखा और छोटे फाख्ता की तुलना में गेरुई फाख्ता अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। अपने गले के पास के घेरे और नर के स्याह रंग के सिर की वजह से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। 

फाख्ता के बाद जो पक्षी मुझे दिखाई पड़ा वो थी लाल मुनिया। कहना ना होगा कि इसकी खूबसूरती के चर्चे और झाड़ियों वाले इलाकों में इसके नज़र आने की अधिक प्रायिकता ते मेरे मन में विश्वास जगा दिया था कि सुबह की मेरी इस सैर में इसके दर्शन जरूर होंगे।

गेरुई फाख्ता  (Red Collared Dove)
लाल रंग तो कुदरत ने कई पक्षियों पर उड़ेला है पर लाल शरीर और भूरे काले पंखों के साथ इन छोटे छोटे से सफेद बूटों को देख कर इस रूप पर कौन ना वारी जाए? सच पूछिए इसकी लाल सफेद काया का दर्शन ऐसा है मानों पक्षियों के सांता क्लाज के दर्शन हो गए :)।

अंग्रेज बड़े अच्छे इतिहासकार थे। किसी भी चीज़ को देखना और उसके बारे में लिखकर दस्तावेज़ की शक़्ल देना उन्हें बखूबी आता था। सालिम अली का युग तो बाद में आया पर उसके पहले बहुतेरे भारतीय पक्षियों का नामकरण अंग्रेजों द्वारा कर दिया गया। इस क्रम में कुछ नाम उन्होंने ऐसे बिगाड़े कि आप समझ ही नहीं पाएँगे कि इस पक्षी का नाम ऐसा क्यूँ दिया गया? अब लाल मुनिया को ही लीजिए। ये पक्षी अंग्रेजी में रेड अवदावत (Red Avadavat ) के नाम से मशहूर है। अब अवदावत तो अंग्रेजी मूल का शब्द है ही नहीं तो क्या आपने कभी सोचा कि आख़िर बेचारी इस छोटी और प्यारी सी मुनिया का इतना क्लिष्ट नाम क्यूँ रख दिया गया?



इतिहास के पन्नों को टटोलें तो पाएँगे कि ये नाम दरअसल भारत के गुजरात राज्य के शहर अहमदाबाद का अपभ्रंश है। सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेजों ने अपने दस्तावेज़ों में अहमदाबाद में पिंजरों में बंद इन सुंदर पक्षियों का जिक्र किया है। वहीं से इन्हें यूरोप भी ले जाया गया। कहीं अमिदावाद, कहीं अमदावत होते होते इस पक्षी का नाम अंग्रेजों ने रेड अवदावत कर दिया।
खैर छोड़िए अवदावत को हमारे लिए तो ये लाल मुनिया ही रहेगी। जब मेरी इससे मुलाकात हुई तो ये झाड़ी के एक नुकीले सिरे पर झूला झूल रहा था। हमारी नज़रे मिलीं और अपनी आजादी में खलल देख कर कुछ देर तो इसने नाक भौं सिकोड़ी पर फिर मुझ पर ध्यान ना देते हुए ये अपने गायन में तल्लीन हो गया। तस्वीर का ये लम्हा तभी का है।
लाल मुनिया नर  (Red Munia)

Sunday, December 15, 2019

साल्ज़बर्ग : मोत्ज़ार्ट की भूमि पर जब गूँजी बारिश की सरगम Scenic Lake District of Salzburg

जाड़ों की भली धूप का आनंद पिछले दो हफ्तों से उठा रहे थे कि अचानक उत्तर भारत की बर्फबारी के बाद खिसकते खिसकते बादलों का झुंड यहाँ आ ही गया। धूप तो गई ही, ठंड के साथ ही बारिश की झड़ी भी ले आई। मुझे याद आया कि ऐसे ही मौसम में मैंने कभी जर्मनी के म्यूनिख से आस्ट्रिया के शहर साल्ज़बर्ग की यात्रा की थी। साल्जबर्ग आस्ट्रिया का एक खूबसूरत शहर है। ये वही शहर है जिसमें कभी विश्व प्रसिद्ध संगीतज्ञ मोत्ज़ार्ट ने अपनी ज़िंदगी गुजारी थी और जिनकी धुनों से सलिल चौधरी से लेकर अजय अतुल जैसे संगीतकार बेहद प्रभावित रहे हैं।

ऐसे प्यारे शानदार घरों से सजा है साल्ज़बर्ग से सटा लेक डिस्ट्रिक्ट
जर्मनी की वो ट्रेन जापान की बुलेट ट्रेन सरीखी तो नहीं थी पर उसने बीच बीच में रुकते हुए भी डेढ़ सौ किमी की दूरी डेढ़ पौने दो घंटे में पूरी कर ली थी।

म्यूनिख से साल्ज़बर्ग ले जाने वाली रेल जेट :)
जर्मनी हो या आस्ट्रिया दोनों देशों में जर्मन भाषा का ही बोलबाला है। जर्मन शब्दों का उच्चारण तो फ्रेंच से भी दुष्कर लगता है पर चाहे म्यूनिख हो या साल्ज़बर्ग, दोनों ही रेलवे स्टेशनों  पर यात्री संकेत इतने स्पष्ट थे कि भाषा ना जानते हुए भी उनकी मदद से बहुत कुछ समझ आ जाता था। गाड़ी ढूँढने से लेकर अपने ठिकाने तक पहुँचना बेहद आसानी से हो गया। शायद इसमें मददगार ये बात भी थी कि मेरा होटल स्टेशन से पाँच मिनटों की दूरी पर था।

साल्ज़बर्ग में मेरा रहने का  ठिकाना Wyndham Grand
अब रहने का ठिकाना व सवारी तो मैंने चुनी थी पर मौसम पर कहाँ मेरी मर्जी चलती? शहर घूमना शुरु ही किया था कि सर्द हवाओं के बीच बारिश की लड़ियाँ यूँ बरसने लगीं कि जैसे पूरे शहर को डुबो कर ही छोड़ेंगी। साल्ज़बर्ग स्टेशन पर बड़ी बड़ी छतरियों को बिकते देखा था। उनके बड़े आकार का मर्म अब समझ आया। एक के दाम में तो हमारे यहाँ की दर्जन छतरियाँ आ जातीं। वैसे भी इतनी मँहगी छतरी को तो भारतीय माणुस इस्तेमाल करने से भी डरे। 

ये थी हमारी शहर की सवारी
घनघोर बारिश का नतीजा ये था हमारी मेटाडोर के शीशे से दिखता साल्ज़बर्ग शहर भी धुँधला सा गया था। वहाँ के चर्च, पुरानी ऐतिहासिक इमारतों और मोत्जार्ट के घर को देखने के बाद हमारे गाइड ने गाड़ी शहर को दो हिस्सों में काटती नदी सालज़च के सामने खड़ी कर दी । 

भारी बारिश के बीच दिखी वो इमारत जहाँ कभी मोत्जार्ट रहा करते थे
नदी के दूसरी यानी किले की तरफ़ शहर का सबसे पुराना इलाका है। पूरे  इलाके में दो दर्जन से अधिक चर्च हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस इलाके को क्षति नहीं उठानी पड़ी थी इसलिए ये जैसा का तैसा रह गया। आज यूरोपीय इतिहास की इस बची धरोहर को यूनेस्को की हेरिटेज साइट्स में शामिल कर लिया गया है। 

सामने पहाड़ी पर खड़ा होहेनसाल्ज़बर्ग का किला अपनी ओर आमंत्रित कर रहा था पर भारी बारिश में बिना छतरी के ना कैमरा सँभल रहा था ना ही चलने का मन हो रहा था। उधार की छतरी से अपना सिर बचाए हुए गाइड की बातें सुनने के आलावा कोई विकल्प भी नहीं था।

बारिश में भीगा किले और शहर का पुराना इलाका
गाइड बता रहा था कि साल़्जबर्ग का शाब्दिक अर्थ है नमक का किला। मध्यकालीन युग में यहाँ नमक की खदानें हुआ करती थीं। यही व्यापार इस शहर की सम्पन्नता का आधार था। यूनेस्को ने भले शहर के इस पुराने इलाके  को विश्व धरोहर बनाकर सबके मानस पटल पर ला दिया हो पर यहाँ के बाशिंदे तो उससे भी ज्यादा अपनी संगीतिक विरासत पर गर्व महसूस करते हैं। ये  शहर अपने नायक मोत्ज़ार्ट को बेहद प्यार करता है। उनके घर को तो संग्रहालय बना ही दिया गया है। साथ ही गाइड उनके परिवार के सदस्यों से जुड़ी  हर एक बार बड़े फक्र से बताते हैं। 

बाजार ने भी शहर की इस भावना को हाथो हाथ लिया है। नतीजा ये कि मोत्ज़ार्ट चॉकलेट से लेकर उनके नाम के खिलौने और आइसक्रीम भी आपको इस शहर में बिकते मिल जाएँगे। यूरोपीय शास्त्रीय संगीत के चाहने वालों के लिए बकायदा एक अलग यात्रा कार्यक्रम होता है जिसे यहाँ साउंड आफ म्यूजिक (Sound Of Music) टूर का नाम दिया जाता है। इस कार्यक्रम में मोत्ज़ार्ट से संबंधित जगहों की सैर के साथ साथ आपको उनके संगीत का रसास्वादन करने के लिए कन्सर्ट में भी ले लाया जाता है।

मुझे संगीत में दिलचस्पी तो थी पर उपलब्ध समय में मैंने साल्ज़बर्ग के बाहरी इलाकों की सैर को प्राथमिकता दी और मेरा ये निर्णय साल्ज़बर्ग की यादों को मेरे हमेशा हमेशा के लिए मन में नक़्श करने में सफल रहा।

फुशोज़ी झील (Lake Fuschlsee)
शहर से तीस चालीस किमी दूर  ही आल्प्स की तलहटी में बसे गाँव दिखने लगते हैं। झील से सटे इन इलाकों को यहाँ लेक डिस्ट्रिक्ट के नाम से जाना जाता है ।

साल्ज़बर्ग से संत गिलगन के रास्ते में से पहले जो झील पड़ती है उसका नाम है फुशोज़ी (Fuschlsee)। जर्मन से सिर्फ अक्षरों के माध्यम से इस उच्चारण को पकड़ पाना कितना कठिन है ये समझ सकते हैं। आम दिनों में  शहर से पास होने की वज़ह से यहाँ अच्छी खासी भीड़ भाड़ होती है पर फिर भी यहाँ के लोग इस झील के पानी को सबसे साफ बताते हैं। चार घंटे में इस झील का चक्कर लगाना आँखों को वाकई तृप्त कर देता होगा। यहाँ की अधिकांश झीलों में तैरना लोगों का प्रिय शगल है।

मैं यहाँ रुका नहीं क्यूँकि मुझे फुशोज़ी से आगे साल्ज़कैमरगुट (Salzkammergut) का रुख करना था।

चांसलर हेलमट कोल का छुट्टियों का आशियाना 
रास्ते में मुझे जर्मनी के पुराने चांसलर हेलमट कोल का वो विला दिखाया गया जहाँ चांसलर जर्मनी से छुट्टियाँ मनाने आया करते थे। उनके शासन काल में एक बार बढ़ती बेरोजगारी को मुद्दा बना के विपक्ष के नेताओं ने युवकों को यहाँ पिकनिक मना कर भोजन के लिए इसी विला का घेराव करने की बात कही थी।

कितना प्यारा  घर है तुम्हारा 
साठ के दशक में Sound of Music  की फिल्म की शूटिंग इस इलाके में हुई थी। इससे जुड़े स्थानों को देखने की ललक यहाँ आने वाले लोगों को वैसी ही है जैसे भारतीयों को स्विटज़रलैंड जाने पर DDLJ से जुड़ी जगहों को देखने की होती है।

संत गिलगन से शुरु हुई हमारी यात्रा
पहाड़ से सटे मैदानों में छोटी बड़ी इतनी झीलों का होना आश्चर्य पैदा करता है। भूगोलविदों का मानना है कि आइस एज़ के बाद जब यहाँ के ग्लेशियर पिघले तो उन्होंने झील की शक़्लें इख्तियार कर लीं। 


एल्प्स पर्वत से जुड़ी पहाड़ियों का एक सिरा आस्ट्रिया में आकर खत्म होता है
संत गिलगन से शुरु हुई हमारी यात्रा को संत वोल्फगैंग में जाकर खत्म होना था। पूरे रास्ते में झील के किनारे किनारे छोटे बड़े गाँव बसे हुए हैं।


अब इन तथाकथित गाँवों को हमारे ज़मीर ने गाँव मानने से इनकार कर दिया। झील के किनारे पहाड़ी ढलानों पर बने इन मकानों में से ज्यादातर किसी रईस की कोठी की तरह नज़र आते हैं। शायद यहाँ रहने वाले इनमें से कुछ का इस्तेमाल देश विदेश से आने वाले सैलानियों को ठहराने के लिए करते होंगे। 

इक बँगला बने न्यारा

आ जाइए कुर्सियाँ आपका इंतज़ार कर रही हैं।

झील के किनारे बसे इन गाँवों की खूबसूरती  देखते ही बनती है। बारिश जहाँ पेड़ पौधों को हरा करती जा रही थी वहीं बादल उनमें सफेदी का रंग भर रहे थे। हरी भरी छटा के बीच ये मकान दूर से छोटे छोटे खिलौने की तरह बिछे दिखाई दे रहे थे।

हरियाली के बीच रहना इसी को कहेंगे ना?



साल्ज़बर्ग को बसाने में संत वोल्फगैंग का महती योगदान है। दसवीं शताब्दी में उन्होंने ही यहाँ पहले चर्च की स्थापना की। उनके नाम में ये वोल्फ यानी सियार का शब्द आया कैसे इसके लिए भी एक रोचक कथा यहाँ प्रचलित है। चर्च के किए जगह खोजने के लिए उन्होंने पहाड़ी से एक कुल्हाड़ी नीचे फेंकी। जिस जगह जाकर ये कुल्हाड़ी अटकी वहीं चर्च का बनना तय हुआ। इस कार्य के लिए उन्होंने बुरी शक्तियों (जिसे ईसाई धर्म में Devil के नाम से जाना जाता है) की भी मदद माँगी। बदले में ये तय हुआ कि जो पहली जीवित आत्मा चर्च में प्रवेश करेगी वो डेविल के हवाले कर दी जाएगी। हुआ यूँ कि बनने के बाद इस चर्च में सबसे पहले एक सियार ने दाखिला ले लिया और इसी वजह से वो यहाँ के संत से लेकर झील के नाम का हिस्सा बन गया। आज इस कस्बे से सटी झील लेक वोल्फगैंगसी के नाम से जानी जाती है।

संत वोल्फगैंग चर्च

संत वोल्फगैंग एक छोटा सा कस्बा है जिसका चर्च उस की पहचान है। चर्च में कुछ समय बिताने के बाद जब बाहर निकले तो बारिश थोड़ी कम हो गयी थी। शहर की गलियों में थोड़ी देर चहलकदमी करने करने के बाद आस्ट्रिया के इस खूबसूरत इलाके के दृश्यों को सँजोए हम वापस साल्ज़बर्ग लौट गए।



आगर आप आसमान से इस इलाके को देखें तो ये रमणीक जगह  कुछ ऐसी दिखेगी । :)


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Tuesday, December 3, 2019

घुमक्कड़ी दिल से ...कुछ देशी..कुछ विदेशी यात्रा संस्मरण

दीपावली से लेकर अभी तक नागपुर, पेंच और फिर ओड़ीसा के सिमलीपाल राष्ट्रीय उद्यान का सफ़र कम अंतराल पर हुआ। सोचा था इसी बीच रण महोत्सव के बीच कच्छ की यादें ताज़ा करूँगा पर उसके लिए समय ही नहीं निकल पाया। पिछले महीनों को इन यात्राओं में आनंद बहुत आया और इन्हीं यात्राओं के बीच धीरे धीरे यात्रा से जुड़ी एक किताब भी खत्म की जिसका नाम है घुमक्कड़ी दिल से



इसे लिखा है अलका कौशिक ने। अलका जी ने पत्रकारिता और अनुवाद की दुनिया में दो दशक बिताने के बाद यात्रा लेखन का दामन थामा। अपनी देश विदेश की यात्राओं के इन्हीं लमहों को उन्होंने एक पुस्तक का रूप दिया है ।  अलका जी से मेरी मुलाकात सात साल पहले लखनऊ में यात्रा लेखकों व पत्रकारों के सम्मेलन में हुई थी। वे एक सौम्य व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं और उनके व्यक्तित्व का यही गुण उनकी भाषा में भी झलकता है।

करीब एक सौ सत्तर सफ़ों की इस पुस्तक के दो हिस्से हैं। पहले हिस्से में विदेश की धरती से जुड़े उनके  संस्मरण हैं। कुछ बेहद छोटे तो कुछ विस्तार लिए हुए। पुस्तक के इस भाग में सबसे ज्यादा आनंद तब आता है जब अलका बाली, भूटान, बर्मा, ताइवान, सिंगापुर जैसे देशों को छूते हुए कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकलती हैं। चाँदनी रात में घोड़ो पर सफ़र करते हुए  वो लिखती हैं.

अब चट्टानी पत्थरों पर बीच बीच में चाँदनी के गुच्छे बिखरे दिखने लगे हैं। कुछ छोटे छोटे फूल भी खिले हैं, मगर चाँदी की उस घास को देख कर हैरत में हूँ। अगले एकाध किमी तक उनकी चाँद की लकीरों को देख कर अचरज भी खत्म होने लगा है , पोर्टर से पूछती हूँ उनके बारे में। "यह राक्षस घास है" और इतना कहते कहते उसने अपनी पर्स में रखी वैसी ही घास का टुकड़ा मुझे पकड़ा दिया है। "हम पहाड़ के लोग हमेशा इस घास को पास में रखते हैं, जेब में पर्स में, झोले में। ये हमें बुरी आत्माओं से बचाती है। भूत प्रेत नहीं लगते जिनके पास ये होती है..। 
पहाड़ के सीधे सरल भोले भाले विश्वास को इतने करीब से देखना सुखद अहसास से भर देता है।
किताब के दूसरे हिस्से में चंबल, बस्तर, भीमबेटका, हैदराबाद, अमृतसर, कच्छ, जोधपुर, किन्नौर लद्दाख, सियाचीन, प्रयाग आदि स्थानों से जुड़े उनके संस्मरण हैं। भीमबेटका की भित्ति चित्र से सुसज्जित गुफाओं से लेकर हैदराबाद के यमनी मोहल्ले की उनकी सैर दिलचस्प है। लद्दाख, किन्नौर स्पिति और सियाचीन के उनके अनुभव रोमांच जगाते हैं। जोधपुर की उनकी यात्रा संगीत की स्वरलहरियों को बिल्कुल आपके करीब ले आती है तो नंदादेवी की यात्रा उत्तरखंड की संस्कृति का एक आईना बन कर आपके सामने आती है।

अलका जी की लेखनी का सशक्त पहलू उनकी बहती भाषा है जो जगह जगह आपके मन को पुलकित करती रहती है। मादरीद की रातों की बात हो या कैलाश मानसरोवर के दुर्गम मार्ग का रोमांचक विवरण, चंबल नदी की सुंदरता का बखान हो या बर्मी बाजार में लूडो की बिसात पर खिलती मुस्कुराहटों का जिक्र, ये भाषा सौंदर्य मन को मोहता है। एक बानगी देखिए..
पान की दुकान पर खूबसूरत मुस्कुराहटों की ओट में एक बर्मी युवती पान बनाने में मशगूल है। यों तो उसके कत्थई रंग में रंगे दांतो को देखकर लगता नहीं कि वह कुछ बेच पाती होगी! यहां भी बाजार पर औरतों का कब्जा है, ज्यादातर वे ही दुकानदार हैं और खरीदार भी। एक तरफ खिलखिलाहटों की चौसर बिछी दिखी तो मेरे कदम उधर ही उठ गए। यहां लूडो की बिसात सजी है 16 साल की युवती से लेकर 70 बरस की अम्मा तक गोटियां सरकाने में मशगूल हैं। पान की लाली ने हर एक के होंठ सजा रखे हैं। बाजार मंदा है और समय को आगे ठेलने के लिए लूडो से बेहतर क्या हो सकता है! 
दूसरी ओर उनके देश विदेश के कुछ वृत्तांत इतने संक्षिप्त हैं कि उस स्थान से जुड़ाव होने से  पहले ही मामला "The  End " पर आ जाता है। मुझे लगता है कि ऐसे आलेखों को संकलन में शामिल करने से बचा जा सकता था। आशा है पुस्तक के अगले संस्करण इस बात को ध्यान में रखेंगे।

इस पुस्तक को भावना प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। पुस्तक को आप यहाँ से मँगा सकते हैं

Thursday, November 21, 2019

चलिए मेरे साथ पेंच राष्ट्रीय उद्यान में.. A visit to Pench National Park, Sillari Gate

पिछली दीपावली नागपुर में बीती। दीपावली के बाद हाथ में दो दिन थे तो लगा क्यूँ ना आस पास के राष्ट्रीय उद्यानों में से किसी एक की सैर कर ली जाए। ताडोबा और पेंच ऍसे दो राष्ट्रीय उद्यान हैं जो नागपुर से दो से तीन घंटे की दूरी पर हैं। अगर नागपुर से दक्षिण की ओर निकलिए तो चंद्रपुर होते हुए लगभग डेढ़ सौ किमी की दूरी तय कर आप ताडोबा पहुँच जाएँगे। दूसरी ओर नागपुर से पेंच के सबसे नजदीकी गेट सिल्लारी की दूरी मात्र 70 किमी है।

पेंच और तडोबा बाघों के मशहूर आश्रयस्थल हैं पर मेरी दिलचस्पी बाघों से कहीं ज्यादा सुबह सुबह जंगल में विचरण करने की थी। वैसे भी किसी जंगल में मेरे जैसे यात्री के लिए सबसे सुखद पल वो होता है जब आप शांति से एक जगह बैठ कर उस की आवाज़ों को आत्मसात करें। फिर चाहे वो अनजाने पक्षियों की बोली हो, पत्तों की सरसराहट हो, कीट पतंगों का गुंजन या फिर अनायास ही किसी जंगली जानवर के आ जाने की आहट।


ताडोबा में जहाँ मैंने रुकने का सोचा था वहाँ जगह नहीं मिली तो पेंच का रुख किया। महाराष्ट्र में जितने भी राष्ट्रीय उद्यान हैं उनमें अंदर के विश्राम स्थल पर्यटकों के लिए बंद कर दिए गए हैं। यानी रुकने की व्यवस्था जंगल के बाहर ही है। पेंच राष्ट्रीय उद्यान का ज्यादातर हिस्सा मध्यप्रदेश और कुछ महाराष्ट्र में पड़ता है।  इस उद्यान में प्रवेश करने के कई द्वार हैं। नागपुर से सिल्लारी गेट सबसे पास है और अन्य लोकप्रिय द्वारों की तुलना में अपेक्षाकृत अछूता है इसलिए मैंने इसे ही चुना। 

पेंच राष्ट्रीय उद्यान के मुख्य द्वार की ओर जाती सड़क
दीपावली के दो दिन बाद भरी दुपहरी नें अपने दल बल के साथ हमने पेंच की ओर कूच कर दिया। एक घंटे से ऊपर का समय नागपुर के ट्रैफिक को साधने में ही लग गया। नतीजन सिल्लारी तक पहुँचते पहुँचते दिन के दो बज गए। 

अमलतास, जंगल के बाहर बना वन विभाग का रिसार्ट

सिल्लारी गेट के पास महाराष्ट्र पर्यटन और वन विभाग के दो अच्छे ठिकाने हैं। रहने के लिए मैंने वन विभाग के इको रिसार्ट अमलतास को चुना था। नाम के अनुरूप वहाँ अमलतास के पेड़ तो नज़र नहीं आए पर परिसर के पीछे का हिस्सा घने जंगलों से सटा मिला। अब जंगल पास होंगे तो बंदर और लंगूर कहाँ पीछे रहने वाले हैं। वो भी हमारे आशियाने का आस पास अपनी धमाचौकड़ी मचाने में व्यस्त थे। अपने कमरों को खोलकर हमने घर से लाए भोजन को खोलना शुरु किया ही था कि कमरे के दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई। जब तक मैं कुछ समझ पाता कमरे का दरवाजा खुला और एक बंदर ने  झाँकते हुए अंदर आने की इच्छा प्रकट की। समझ आ गया कि इन्होंने भोजन की गंध भाँप ली है। ख़ैर वो तो भगाने से भाग गया पर उसके बाद कमरे में बैठने पर किसी ने भी अपना द्वार खुला रखने की जुर्रत नहीं की।

रिसार्ट वाले कमरे में भी जंगल वाली 'फील' लाना नहीं भूलते।
वन विभाग ने इन कमरों को बड़ी खूबसूरती से सजाया है। हर पलंग के सिराहने यहाँ के मुख्य आकर्षण बाघ की छवि तो बनी ही है, साथ ही हर कमरे की सामने की दीवार पर कोई ना कोई वन्य प्राणी जैसे मोर, सियार, लोमड़ी आदि बड़ी खूबसूरती से चित्रित किए गए थे।  वन विभाग ने ये सुनिश्चित कर रखा है कि अगर जंगल में इन जीवों से मुलाकात ना भी हो तो वापस लौट कर रिसार्ट में तो मुलाकात होगी ही।


अमलतास में तब पर्यटकों की अच्छी खासी हलचल थी। शाम की सफारी के लिए वन विभाग की गाड़ियाँ तैयार खड़ी थीं। नागपुर से पास होने की वजह से कई लोग यहाँ बिना रात बिताए सिर्फ सफारी का आनंद ले कर लौट जाते हैं पर हमें तो अगले दिन तक रुकना था तो सोचा कि क्यूँ ना सिल्लारी गेट तक के इलाके में थोड़ी चहलकदमी की जाए।

स्लेटी रामगंगरा (Cinereous Tit)
रिसार्ट के आगे एक रास्ता वहीं गाँव की ओर मुड़ता था। गाँव में बीस तीस घर और एक छोटा सा मंदिर और एक चबूतरा  था। शाम के वक़्त शायद वो चबूतरा बतकही का अड्डा बनता हो पर उस दुपहरी में वहाँ सन्नाटा पसरा था। खेतों में चारा चरती गायें और उनका अनुसरण करते बगुले, दाने की तलाश में उड़ते कपोतक और गौरैया ही उस निस्तब्धता को तोड़ रहे थे।  राह में टुइयाँ तोते के साथ सलेटी रामगंगरा भी दिखाई पड़ीं। 

सागरगोटी या सागरगोटा
चलते चलते मुझे एक अजीब सा पौधा दिखा जिसकी अंडाकार फलियों पर ढेर सारे काँटे उगे थे। पूछने पर पता चला कि स्थानीय भाषा में इसे सागरगोटी कहते हैं और इसका इस्तेमाल लोग मलेरिया सहित कई रोगों के उपचार के लिए करते हैं।

सुबह सुबह जंगल के अंदर जाने को तैयार
मुझे बताया गया कि अगली सुबह की सफारी के लिए टिकट साढ़े पाँच बजे से ही मिलने लगते हैं। वन विभाग का महकमा भोर होते ही काउंटर पर मुस्तैद दिखा। पूरी गाड़ी, गाइड व कैमरे के साथ करीब साढ़े तीन हजार की रकम चुकता कर हमारा कुनबा सिल्लारी गेट की ओर बढ़ गया। ठंड तो गुनगुनी थी पर हल्के हल्के बादलों ने जंगल के बीच सूर्योदय को देखने के आनंद से हम सबको वंचित रखा। जंगल में घुसते ही जो पहला पक्षी दिखा वो धनेश (Grey Hornbill) था। पेड़ की ऊँचाइयों पर आराम से आसन जमा रखा था उसने। थोड़ा और आगे बढ़े तो कोतवाल के जंगली सहोदर रैकेट टेल ड्रैंगो (Racket Tail Drongo) की लहराती उड़ान दिखी। ये पक्षी जब उड़ान भरता है तो पंखों के दोनों ओर लतरों की तरह हवा में लहराती हुई डंडियाँ देखते ही बनती हैं।

जंगल के अंदर...
इधर मैंने अपनी नज़रें आसमान में पक्षियों की तलाश में टिकाई थीं और उधर हमारा गाइड जंगल में पाए जाने वाले पेड़ों की चर्चा कर रहा था। झारखंड, ओडीसा और छत्तीसगढ़ में जहाँ साल के पेड़ों की प्रधानता वाले जंगल ज्यादा हैं वहीं पेंच का जंगल सागवान (सागौन) यानी टीक के पेड़ों की प्रचुरता है। चौड़े पत्तर और क्रीम रंग के फूलों से लदे इसके पौधे बहुत सुंदर तो नहीं लगते पर अपनी कीमती लकड़ी की वज़ह से गर्व से इतराए खड़े दिखे। सागौन की अधिकता यहाँ भले अधिक हो पर पेंच के जंगल को मिश्रित जंगल कहना ज्यादा उचित होगा क्यूँकि यहाँ इसके आलावा बेर, गूलर, तेंदू पत्ता, बरगद, बाँस और अन्य कई जंगली पेड़ और लताएँ भी दिखाई पड़ीं।

माँ का प्रेम
गाइड बड़े मजे से घोस्ट ट्री के बारे में बता रहा था। ये पेड़ अपनी छाल का रंग बदलता रहता है। घुप्प अँधेरे में अपनी चमकती सफेद छाल की वजह से अंग्रेजों के समय से इसका ये नाम प्रचलित हो गया। ऐसे ही मगरमच्छ के कवच जैसी छाल रखने वाले पेड़ का यहाँ क्रोकोडाइल ट्री नाम सुनने को मिला।

बाँस की झाड़ियाँ
जंगल अब घना होता जा रहा था। हमारा वाहन पक्की से कच्ची सड़क  की राह लेता हुआ अब लगातार हिचकोले ले रहा था। मोर, हिरण और सांभर अपने दर्शन दे चुके थे। एक भूरी फैन टेल  कैमरे का ट्रिगर दबाने से पहले ही फुर्र हो गयी थी। लाल भूरा कठफोड़वा भी अपनी आवाज़ के साथ हल्की झलक दिखाकर जाने कहाँ अदृश्य हो गया था। गाड़ी का इंजन जहाँ शांत होता पक्षियों की आवाज़े गूँजने लगतीं पर उतने घने जंगल में उन्हें ढूँढ पाना दुसाध्य काम था।

दर्शन मोर का

चीतल (Spotted Deer)
आसमान छूते पेड़ों पर अचानक से हरियल का एक झुंड दिखा। गाड़ी रोककर नीचे से किसी तरह उनकी तस्वीर ली। अब महाराष्ट्र के राजकीय पक्षी से अपनी मुलाकात का सबूत तो अपने पास रखना ही था।

हरियल (Green footed Pigeon)


सड़क के किनारे अब पानी की एक धारा का स्वर जंगल के स्वर में एकाकार हो चुका था कि तभी हमें झाड़ियों के बीच एक विशाल गौर दिखाई पड़ा। भूरे घुटने के नीचे इसके सफेद रंग के पैर होने की वजह से गाइड इसे अक्सर सफेद मोजे पहनने वाला बताते हैं। ये गौर खा पीकर इतना मोटा ताजा हो गया था कि इसका अपने झुंड से साथ छूट गया था। पानी की धारा अब हमें पेंच नदी के बिल्कुल करीब ले आई थी जिसके ऊपर इस पार्क का नाम पड़ा है। ये नदी उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हुई इस उद्यान को दो बराबर भागों में बाँटती है। 

भारतीय गौर (Indian Bison)
नदी को छू कर हम लौट ही रहे थे कि पता चला कि हमारे पीछे आने वाली गाड़ी में से एक के सामने से एक बाघ छलाँग लगाता हुआ जंगल में ओझल हो गया। वापस लौटते हुए उस स्थान पर थोड़ी देर रुके भी पर बाघ के पैरों के ताज़ा निशान के आलावा हमारे हाथ कुछ ना लगा।

बाघ के पद चिन्ह

टुइयाँ तोता मादा
जंगलों की भूल भुलैया में करीब तीन चार घंटे बिताने के बाद अब बारी वापस लौटने की थी। 

सफ़र वापसी का

लौटते वक्त मंदिरों के शहर रामटेक का एक छोटा सा चक्कर लगा। जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है रामटेक यानी जहाँ कभी भगवान राम टिके थे। नागपुर से पचास किमी दूरी पर स्थित ये शहर मंदिरों का शहर है। ऐसी किंवदंती है कि वनवास के दौरान भगवान राम का ठिकाना यहाँ भी था। आज भी हजारों लोग प्रतिदिन पहाड़ पर बने राम मंदिर जिसे गड मंदिर भी कहा जाता है में भगवान राम के दर्शन करने आते हैं। राम मंदिर के आलावा यहाँ प्राचीन जैन मंदिर भी हैं।

खिंडसी झील

पेंच नेशनल पार्क से वापस लौटते हुए मैं इस शहर से गुजरा जरूर पर ज्यादा समय ना होने के चलते खिंडसी झील होकर ही वापस नागपुर लौट आया। खिंडसी में  धूप तेज़ होने की वजह से नौकायन का आनंद नहीं उठाया। भूखे पेट में मीठी चाशनी में डूबे सूखे बेरों के साथ चटकीली झालमुड़ी का भोग तो सबको रास आया। साथ ही सफेद गोलाकार चीज भी बिकती दिखी जिसका नाम मैं अब भूल गया। कोई 'मराठी माणूस' मदद करे याददाश्त ताज़ा करने में तो कृपा होगी।

बोलो बोलो बोलो बोलो ना.. क्या है मेरा नाम ? :)
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