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| टर्मिनल में घुसते ही आप पहुंच जाते हैं इस हरे भरे गलियारे में |
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| T2 पर बना हरा भरा भोजन कक्ष |
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| छत से लटकते बांस के झाड़फानूस |
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| AC Duct |
हिंदी का एक यात्रा चिट्ठा (An Indian Travel Blog in Hindi)
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| टर्मिनल में घुसते ही आप पहुंच जाते हैं इस हरे भरे गलियारे में |
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| T2 पर बना हरा भरा भोजन कक्ष |
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| छत से लटकते बांस के झाड़फानूस |
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| AC Duct |
कर्नाटक का एक जिला है शिमोगा। कभी जोग जलप्रपात की सैर करनी हो तो बैंगलोर से यहीं आना पड़ता है। पिछले महीने कार्यालय के काम से इस जिले में जाना पड़ा। वैसे तो शिमोगा में हवाई अड्डा है पर बैंगलोर से यहां आने जाने के लिए ट्रेन ज्यादा सुविधाजनक रहती है।
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| सुपाड़ी के पंक्तिबद्ध वृक्ष |
रेल यात्रा में ये दूरी तय करने में पांच साढ़े पांच घंटे लगते हैं और रेलगाड़ी तुमकूर, हासन और चिकमगलूर जिले के कुछ इलाकों को छूती हुई शिमोगा में प्रवेश कर जाती है। चिकमगलूर के बिदूर और कुदूरू इलाकों में नारियल और सुपाड़ी के बागान खेत खलिहानों और चरागाहों के साथ साथ चलते हैं। सुपारी के युवा ठिगने पेड़ों के पीछे नारियल की पंक्तिबद्ध कतार जय वीरू की जोड़ी जैसी लगती है और पूरी यात्रा में साथ न छोड़ती हुई नज़र आ रही थी। नारियल और सुपारी सरीखी व्यावसायिक फसलों की खेती ने इन इलाकों में जो सम्पन्नता लाई है वो यहां के ग्रामीण इलाकों में स्पष्ट झलकती है।
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| हासन जिले का एक सुंदर गांव |
चिकमगलूर तो वैसे भी कर्नाटक में कुर्ग और सकलेशपुर सरीखा एक शानदार हिल स्टेशन है। हासन जिले के अरसीकेरे को पार करने के बाद तुमकूर की बारिश में धुली धुली पहाड़ियां मन को लुभाती हैं पर असली आनंद ट्रेन की खिड़कियों के मध्य में अचानक उभरते मंदारगिरी पर्वत के ऊपर के भव्य मंदिर को देख कर आता है। चोटी पर बने वृक्ष के नीचे जैन तीर्थंकरों की प्रतिमा है। पहाड़ के नीचे एक झील भी है जहां लोग बाग सप्ताहांत में अक्सर बैंगलोर से पहुंचते हैं।
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| मंदारगिरि के ऊपर स्थित भव्य जैन मंदिर |
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| रामदेवरा बेट्टा |
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| तुमकूर की पहाड़ियां |
यूं तो कांस के फूल शरद ऋतु के आगमन का संकेत देते हैं पर इस बार संपूर्ण भारत में इंद्र ने अपनी सेनाएं रावण के जलने तक वापस नहीं बुलाई। नतीजन बेचारा रावण इस साल आधा आग और आधे पानी की बौछार से सिमट सिकुड़ कर गिरने को मजबूर हो गया और उधर मां दुर्गा तक पहुंचने के लिए भक्तों को पानी के साथ गलियों में छपाछप करनी पड़ी।
शायद इंद्र का व्यवहार पहले भी ऐसा ही रहता होगा तभी ऋषि मुनियों के साथ देवताओं से भी उनकी खटपट चलती रहती थी। इसलिए इस साल कांस के फूलों को बारिश की फुहारों के बीच लहराते रहना पड़ा। वो तो अपने समय से फूले पर इस बार बारिश की विदाई के लिए नहीं पर उनके द्वारा लाई हरितिमा के साथ कदम ताल करने के लिए।
बारिश की इस तेजी पर तो कम से कम इस साल महाकवि तुलसीदास को रामचरितमानस की अपनी वो चौपाई वापस लेनी ही पड़ती जिसमें उन्होंने लिखा था
रेल मार्ग से ये रास्ता कई सुरंगों और मनोरम घाटियों के बीच से निकलता है। सुरंगों के अंधकार से निकलते हुए अनायास पहाड़ की ढलानों पर कांस की सैकड़ों मीटर तक फैली सफ़ेद चादर देखने लायक थी।
ट्रेन की खिड़की से एक घंटे मैं यूं ही चिपके बैठे रहा ढलते सूरज के साथ कांस की छटा को देखता हुआ और मन ही मन पंकज उधास की गाई वो मशहूर पंक्तियां होठों पर चली आई कि
एक समय की बात थी जब पटना के छोटे से एयरपोर्ट में भीड़ ऐसी हुआ करती थी जैसे किसी रेलवे स्टेशन पर आ गए हों। एक-एक करके विभिन्न राज्यों की राजधानियों में स्थित हवाई अड्डे बदलते चले गए पर पटना की बारी आते-आते 21वीं शताब्दी का एक चौथाई हिस्सा बीत गया। खैर देर आए दुरुस्त आए। पिछले हफ्ते पटना आना जाना हुआ तो वहां के एयरपोर्ट के इस नए रूप के दर्शन कर सका।
पटना के विमानपत्तन में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है मानो आप गौतम बुद्ध और महावीर की धरती पर अपने कदम रख चुके हैं। परिसर की विभिन्न दीवारों पर चित्रित ध्यान मुद्रा में लीन बुद्ध और महावीर, बोधगया और पावापुरी के प्राचीन मंदिर, बौद्ध विहार में बुद्ध की वाणी को एकाग्रचित्त सुनते बौद्ध भिक्षु, बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त करते बुद्ध, राज्य की ऐतिहासिक विरासत को जीवंत कर देते हैं।
जय प्रकाश नारायण के नाम पर बने इस हवाई अड्डे की दीवारें यहां जन्मे धर्मों के अलावा यहां के सांस्कृतिक और कलात्मक पहलुओं को भी प्रदर्शित करती हैं। ये तो सर्वविदित है कि बिहारी और छठ एक दूसरे के पर्याय हैं इसलिए प्रस्थान क्षेत्र में छठ त्योहार मनाते लोगों का एक विशाल चित्र लगाया गया है।
अगर चित्रकला की बात करूं तो मधुबनी पेंटिंग समूचे भारत में चर्चित हो गई है पर बिहार में चित्रकला की अन्य शैलियां भी पनपी हैं जिनके बारे में बिहार के बाहर बहुत कम ही लोग जानते हैं। हवाई अड्डे पर इन चित्रकलाओं की दो शैलियों मंजूषा और टिकुली को दिखाया गया है।
मंजूषा कला प्राचीन भारत के अंग प्रदेश यानी आज के भागलपुर के आसपास के इलाके में पनपी। बक्से के ऊपर बनाए जाने की वजह से इसे मंजूषा नाम दिया गया। दरअसल इस इलाके में हर साल अगस्त के महीने में बिहुला विषहरी पूजा मनाई जाती है। ऐसी पौराणिक कथा है कि एक साहूकार के परिवार द्वारा सर्प देवी की पूजा न करने से कुपित होकर देवी मनसा ने बहुला के पति लखेंद्र को डस लिया था। बहुला अपने मृत पति के साथ स्वर्ग जाकर अपने पति को जीवित वापस लौटाने में सफल रही थी। इस चित्रकला में इसी पौराणिक गाथा के विभिन्न प्रसंगों को चित्रित किया जाता है। इस कला की खास बात यह है कि इसमें मुख्य तौर पर हरे, गुलाबी और पीले रंग का इस्तेमाल होता है। वैसे वहां प्रदर्शित चित्र में गुलाबी की जगह मुझे लाल रंग प्रयुक्त होता दिखा।
हमारे यहां टिकुली का अर्थ महिलाओं द्वारा लगाई जाने वाली बिंदी से लिया जाता है। टिकुली चित्रकला में छोटी-छोटी बिंदियों को मिलाकर नमूने बनाए जाते हैं और चित्र को आकार दिया जाता है इसलिए इसका ऐसा नामकरण किया गया है। पटना के आसपास और मिथिला के इलाकों में प्रचलित इस चित्र कला के बारे में मुझे भी यहीं आकर पता चला। इन चित्रों में अक्सर रामायण और कृष्ण लीला से जुड़े प्रसंगों को दिखाया जाता है।
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कारो और कोयल ये दो प्यारी नदियां कभी सघन वनों तो कभी कृषि योग्य पठारी इलाकों के बीच से बहती हुई दक्षिणी झारखंड को सींचती हैं। बरसात में उफनती ये नदियां बाकी समय में अपनी दुबली पतली निर्मल धाराओं में अपने पाट में हौली हौली चाल से एक छोर से दूसरे छोर तक डोलती रहती हैं।
कारो और कोयल की भी दो अलग अलग शाखाएं हैं जो उत्तरी और दक्षिणी के नाम से विभक्त की जाती हैं। उत्तरी कारो दक्षिण दक्षिण पूर्व की ओर बहती हुई दक्षिणी कोयल से मिल जाती है। यही कोयल नदी फिर ओडिशा में राउरकेला के पास वेद व्यास में छत्तीसगढ़ से आ रही शंख नदी से मिलकर ब्राह्मणी का रूप धरती है।
किसी ज़माने में इनकी जलराशि को बांध कर कोयल कारो परियोजना के तहत बिजली उत्पादन की एक बड़ी योजना बनाई गई थी। पर नेहरू युग से आज तक स्थानीय ग्रामीणों के सतत विरोध के चलते थोड़ा बहुत काम होने के बाद ये परियोजना पटरी पर नहीं आ सकी और न भविष्य में आयेगी क्योंकि पुनर्वास के सरकारी वादों पर यहां बसने वाले मुंडा जनजाति के लोगों को कभी भरोसा नहीं रहा।
इसी उत्तरी कारो नदी के तट पर पिछले हफ्ते जाने का अवसर मिला। ये नदी रांची के पठारी इलाकों से निकलकर खूंटी जिले से होती हुई दक्षिणी छोटानागपुर के सिंहभूम जिले की ओर बहती है। इससे मुलाकात करने की सबसे अच्छी जगह तोरपा है जो झारखंड की राजधानी रांची से करीब साठ किमी दूरी पर स्थित है। तोरपा पहुंचने के लिए एक रास्ता रांची खूंटी मार्ग से होकर जाता है जबकि दूसरा लोधमा होते हुए कर्रा तोरपा रोड से होकर पहुंचता है। हमने इन दोनों में कम व्यस्तता वाला दूसरा मार्ग अपनाया।
झारखंड में सर्दियां चाहे जितनी पड़े जाड़ों की धूप शानदार होती है। तोरपा के पास उतर पड़े नदी के जल में। ऊपर से आती तीखी धूप नदी के ठंडे जल का स्पर्श पाकर मुलायम हुई जा रही थी। नदी में कहीं कहीं गहराई थी पर अधिकांश हिस्सों में घुटनों से भी नीचे पानी था। थोड़ी दूर नदी के किनारे फैले जंगल और फिर चट्टानों से कूदते फांदते हम आगे बढ़े। हमारा पहला लक्ष्य उत्तरी कारो और छाता नदी के संगम तक पहुंचना था।
नदी में नहाने का मन तो नहीं था पर उसके साथ साथ भ्रमण करने की इच्छा दिल में जोर मार रही थी। सो ऊंचाई से नीचे की ओर जाती पगडंडी का सहारा लेकर चल पड़े नदी के बीचों बीच। नंगे पैर पहाड़ी नदियों में चलना तकलीफ़ को आमंत्रण देना है। ये नदियां अपनी तलहटी में ढेर सारे छोटे छोटे टेढ़े मेढे नुकीले पत्थर समोये रहती हैं। जब तक बालू वाला हिस्सा आपके पैरों के नीचे रहता है तब तक तो आनंद है पर फिर इन कंकड़ पत्थरों की चुभन आपकी यात्रा में साथ बनी रहती है। पर बिना कष्ट सहे आप प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य को कहां महसूस कर पाएंगे? नरेश सक्सेना जी ने यूं ही तो ये कविता नहीं लिख दी
पुल पार करने से, पुल पार होता है
नदी पार नहीं होती
नदी में धँसे बिना
पुल का अर्थ भी समझ में नहीं आता
थोड़ी ही देर में हम छाता और उत्तरी कारो के संगम पर थे। ।
छाता नदी में अपेक्षाकृत कम पानी था इसलिए हम उसे छोड़ कारो नदी वाले रास्ते पर आगे बढ़ गए। बालू दोहन की समस्या इन पहाड़ी नदियों के अस्तित्व के लिए काल बनी हुई हैं।
उत्तरी कारो नदी का पाट कहीं समतल, कही अचानक से ऊंचा नीचा तो कहीं चट्टानी है। यही वज़ह है कि ये नदी अपने पथ में पेरवा घाघ, चंचला घाघ और पांडू पुडिंग जैसे मनोरम स्थलों का निर्माण करती है जहां साल के शुरू में आगंतुकों की भीड़ लगी रहती है।
हल्का बहता पानी सूर्य की रोशनी में बालू के ऊपर खूबसूरत आकृतियां बना रहा था। जल की स्वच्छता देखते ही बन रही थी। चलते चलते मैं कहीं रुक जाता तो ऐसा लगता मानो मैं भी विपरीत दिशा में बहा चला जा रहा हूं। नदी के किनारे किनारे घने वृक्षों की छाया उसकी गहराई के साथ मिलकर पानी को हर रंग दिए दे रही थी। चलते हुए हम इस बात के लिए अतिरिक्त सावधानी बरत रहे थे कि उस हरे रंग की परिधि के बाहर ही रहें। हालांकि दोपहर होने को थी पर पक्षियों का कलरव अभी भी उस स्थान की नीरवता में मिठास घोल रहा था।
नदी के बीच बीच की चट्टानें पन कौवों की आरामगाह होती हैं जहां वो अपने पंख सुखाने के साथ शिकार पर भी नज़र बनाए रखते हैं। हम उनके इलाके में प्रवेश कर गए थे सो वो आकाश में ही चक्कर लगा रहे थे कि कब ये श्रीमान यहां से हटें तो मैं अपना आसान जमाऊं।
कम पानी में इसी तरह चलने का मौका इससे पहले ओडिशा में मुझे चांदीपुर में मिला था। पर वहां बालू का कुशन हमेशा हमारे साथ था। पर ये अनुभव उससे अलग था। उत्तरी कारो की ये स्मृतियां हमेशा दिल में रहेंगी।