पार्श्व में पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ और उनके आगे फैला हुआ शहर अभी तक हरियाली को यहाँ वहाँ अपने में समेटे हुए है। बाहर मानसूनी बादल ठंडी हवाओं की सेना ले कर पूरे शहर का मुस्तैदी से मुआयना कर रहे थे।विमान से दिल्ली लौटते वक्त भारत के इस आठवें सबसे बड़े शहर पर उन्हीं मानसूनी बादलों का साया था और खिड़की के बाहर का दृश्य बड़ा ही मनमोहक लग रहा था। सोचा आपके भी क्यूँ ना इस छटा के दर्शन करवाता चलूँ..
डर यही है कि बड़ी बड़ी इमारतों के बीच इन खूबसूरत हरे भरे हिस्सों का आकार छोटा होते होते खत्म ना हो जाए जैसा कि दिल्ली में हुआ है। नई दिल्ली और दिल्ली रिज का इलाका छोड़ दें तो ऊपर से दिल्ली कंक्रीट के जंगलों से भरी बेदिल दिल्ली की तरह ही लगती है। खैर दिल्ली के बारे में बाद में बात करते हैं।
समुद्र तल से 560 मीटर ऊंचाई पर बसे इस शहर के बीचों बीच मुला व मुठा नदियाँ का प्रवाह होता है। (नीचे चित्र में देखें।) पर वहाँ के समाचार पत्रों में पढ़ा कि वहाँ के उद्योग प्रदूषित सीवेज का एक बड़ा हिस्सा इन नदियों में छोड़ रहे हैं। अगर पुणेवासियों ने मिलकर इसके खिलाफ़ प्रयास नहीं किए तो वो अपनी इन प्राकृतिक धरोहरों का वही हाल होता देखेंगे जो दिल्ली में यमुना का हुआ है।

पुणे की इस हरियाली का रसास्वादन कर ही रहे थे कि बादलों के काफ़िले ने हमारे विमान को घेर लिया।
एक घंटे बाद जब विमान से फिर नीचे के दृश्य दिखने लगे तो परिदृश्य एकदम भिन्न था। दिल्ली के पास जो पहुँच गए थे। कैसी दिखी ऊपर से आपकी दिल्ली ये जानने के लिए इंतज़ार कीजिए अगली पोस्ट का !