Sunday, April 14, 2019

रंग बिरंगी कारों के बीच चलिए आज इटली के इस फेरारी संग्रहालय में Museo Ferrari, Maranello, Italy

कारों का मुझे कभी ऐसा शौक़ नहीं रहा। ये जरूर था कि इंजीनियरिंग में इंजन और आटोमोबाइल से जुड़े तकनीकी विषय बेहद भाते थे। तब ना घर में कार हुआ करती थी और ना ही कभी कॉलेज के दिनों में इच्छा हुई कि किसी दूसरे से कार माँग के थोड़ा गाड़ी चलाने में हाथ साफ कर लिया जाए। लिहाजा गाड़ी चलाने के मामले में तब व्यावहारिक ज्ञान बिल्कुल नहीं था। 

ऐसे में एक बारआटोमोबाइल कंपनी के साक्षात्कर में इसे अपना पसंदीदा विषय बताने की मैं गलती कर बैठा। नब्बे के उस दशक में मारुति देश में छाई हुई थी। साक्षात्कार लेने वाले ने प्रश्न रूपी पहला गोला ये दागा कि मारुति में इस्तेमाल होने वाले ब्रेकिंग सिस्टम को कागज पर बना कर समझाओ। अब मारुति चलाना तो दूर, तब तक उसके अंदर बैठने का भी मौका नहीं मिला था सो इस पहले बाउंसर पर ही हिट विकेट हो गए। वो अलग बात है कि ज़िंदगी की पहली नौकरी बाद में आटोमोबाइल सेक्टर में ही मिली।

फेरारी संग्रहालय के स्वागत कक्ष से आप सबको मेरा प्रणाम
अब अगर आप ये सोच रहे हैं कि आख़िर ये किस्सा आपको मैंने क्यों सुनाया तो वो इसलिए कि जब मैं अपनी यूरोप यात्रा में इटली का कार्यक्रम बना रहा था तो सपने में भी ये नहीं सोचा था कि इस देश की यात्रा की शुरुआत किसी विश्व प्रसिद्ध रेसिंग कार को समर्पित एक संग्रहालय से होगी। दरअसल स्विट्ज़रलैंड के पहाड़ों की खूबसूरती नापने के बाद हमें जाना तो पीसा था पर इस लंबी दूरी को तय करने के लिए भोजन विराम लेना जरूरी था। जब यात्रा संचालक ने फेरारी के इस म्यूजियम की चर्चा की तो लगा कि रास्ते में पड़नेवाले इस संग्रहालय को देखने में भी कोई बुराई नहीं।

बेलिंजोना से मेडोना तक के रास्ते का मानचित्र
अपनी इटली यात्रा शुरु करने से एक रात पहले हम स्विटज़रलैंड के दक्षिणी कस्बे बेलिंजोना में रुके थे। बेलिंजोना कहने को स्विटज़रलैंड में है पर आज भी वहाँ निवास करने वाले अस्सी प्रतिशत से ज्यादा लोगों की भाषा इटालियन है। इतिहास के पन्नों को पलटा तो पाया कि यहाँ रोमन साम्राज्य से लेकर नेपोलियन तक की धमक रह चुकी थी। वहाँ  की सम्मिलित संस्कृति का का एक और नमूना तब दिखा जब मैं एल्पस की तलहटी पर बसे इस कस्बे में  रात को तफरीह पर निकला। सामने की इमारत पर Marche लिखा हुआ था। अंदर गए तो समझ आया कि ये तो छोटा सा बाजार है। बाद में मालूम हुआ कि Marche एक फ्रेंच शब्द है जिसका अर्थ ही बाजार है। 

बहरहाल अगली सुबह सवा आठ बजे हमारा कारवाँ इटली के सफ़र पर था। सीमा से हम साठ किमी की दूरी पर थे। स्विटरज़रलैंड के पहाड़ी हरे भरे रास्ते ने कुछ दूर साथ दिया और फिर सड़क के दोनों ओर समतल मैदान आ गए। पश्चिमी यूरोप में एक देश से दूसरे देश जाने में कोई व्यक्तिगत चेकिंग नहीं होती पर सीमा पर गाड़ी और टूर आपरेटर के कागजात की जरूर  जाँच होती है।

स्विटज़रलैंड और इटली की सीमा पर इटली की पुलिस
हम स्विटज़रलैंड जैसे धनी देश से अपेक्षाकृत गरीब और बदनाम इटली में प्रवेश कर रहे थे। मन में उत्सुकता के साथ एक संशय भी था कि इस देश में अगले दो तीन दिन हमारे कैसे बीतेंगे। उत्तरी इटली के जिस इलाके से हम घुसे वो हमें अपनी ही तरह कृषि प्रधान नज़र आया। ज्यादातर खेतों में फसलें कट चुकी थीं। खेत खलिहानों से निकलते हुए अचानक ही इस खूबसूरत इमारत के दर्शन हुए। तस्वीर तो जल्दी से ले ली पर समझ नहीं आया कि ये संरचना किस उद्देश्य से बनाई गयी है? साथ सफ़र कर रहे यात्रा प्रबंधक ने इसे रेलवे स्टेशन बताया तो एक क्षण विश्वास ही नहीं हुआ। इटली की इंजीनियरिंग क्षमता के इस पहले उदाहरण ने मुझे तो बेहद प्रभावित किया।  

है ना इंजीनियरिंग की खूबसूरत मिसाल
बेलिंजोना से हमने जो राजमार्ग पकड़ा था वो इटली के महानगर मिलान के बगल से होते हुए बोलोनी चला जाता है पर हमें बोलोनी से कुछ पहले ही दाँयी ओर मॉडेना की राह पकड़नी  थी । लगभग तीन सौ किमी की इस यात्रा में तीन साढ़े तीन घंटे का वक़्त लगता है। 

मिलान से होता हुआ ये राजमार्ग बोलोनी तक जाता है
मॉडेना और मारानेल्लो फेरारी कार के जन्म स्थान रहे हैं और इन दोनों जगहों पर कंपनी ने इस ब्रांड से जुड़ी रेसिंग कारों के लिए संग्रहालय बनाए हैं जो ना केवल पिछले सत्तर सालों से कारों के आकार प्रकार और तकनीक में हुए बदलाव की जानकारी देते हैं बल्कि साथ साथ इन कारों को रेसिंग ट्रैक पर विजय देने वाले उन महारथी चालकों के योगदान को भी  उल्लेखित करते हैं। फेरारी की कार देखते देखते किशोर दा का गाया वो गाना याद आ जाता है कि ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा..। यहाँ रखी अधिकांश कारें इस रंग से तो रँगी ही हैं साथ ही इसके परिसर तक पहुँचाने वाली सड़क भी हमें लाल लाल फूलों से सजी मिलीं।



Sunday, April 7, 2019

ऐसे आया मेरे घर-आँगन में वसंत.. Colours of Spring

कई बार आपने महसूस किया होगा कि जब आप छुट्टियों पर घूमने निकलते हैं तो प्रकृति के नए नए रंग आपको आकर्षित करते हैं। ये रंग किसी भी रूप में अचानक सामने आ जाते हैं। कभी सूर्यास्त की लाली, कभी पक्षियों का कलरव, कहीं कोई अजीबोगरीब वृक्ष तो कही चटकीले फूलों की बहार। सवाल है कि क्या आपके अपने शहर में ये दृश्य दिखते नहीं या दिखते भी हैं तो आप उनके आस पास पहुँच नहीं पाते? उन्हें देखने के लिए फुर्सत के पल  नहीं निकाल पाते।

काँटों का ताज Christ Thorn 
पिछले दो महीनों से मैंने अपने घर के आस पास  रंग बदलते वसंत के जिन लम्हों को करीब से महसूस किया उनमें से कुछ को चुन कर आज आप के सामने लाया हूँ। आशा है ये छवियाँ आपकी आँखों को तृप्त करेंगी और साथ ही आप कुछ और सजग हो जाएँगे अपने आसपास की इस खूबसूरती को बटोरने।
नीली गुलमोहर Jacaranda (जैकेरेण्डा)
यही वक़्त है नीली गुलमोहर यानी जेकेरेण्डा को खिलते देखने का। दूर से ही इसकी बैंगनी फूल आपका ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं। गुलमोहर की तरह की पत्तियाँ और पूरे पेड़ को फूलों से भर देने की इसकी विशेषता की वज़ह से ही इसका नाम नीली गुलमोहर पड़ा है। वैसे इस पेड़ को मूल रूप से दक्षिण अमेरिका का माना गया है पर अब इसकी पहुँच विश्व के कोने कोने में है।

काँटों का ताज Crown of Thorns
काँटेदार पौधों के फूल बड़े मनमोहक होते हैं। गुलाब अपनी इसी खासियत के लिए जाना जाता है। यीशू के सर पर काँटों का ताज था तो इस फूल का नाम भी उनकी याद दिलाने के लिए वैसा ही रख दिया गया। ये फूल मुझे बेहद पसंद है खासकर तब जब ये अपनी पंखुड़ियाँ खोल रहा होता है।
 पीला  गुड़हल Yellow Hibiscus
क्या आपको पता है कि पीला गुड़हल हवाई द्वीप के राष्ट्रीय फूल का दर्जा रखता है। वहाँ स्त्रियाँ अगर इसे अपने दाएँ कान के ऊपर लगाएँ तो इसका अर्थ होता है कि वो अकेली हैं और अगर बाएँ कान पर तो मतलब वे शादी शुदा हैं या उनका कोई पुरुष मित्र है।

इसकी सुंदरता में चार चाँद इसके मध्य से निकलने वाली पतली सी डंडी लगाती है जिसके आखिरी सिरे को देखने से लगता है कि किसी रूपवती कन्या के माथे की बिंदिया हो। 
सहजन के फूल Drumstick Tree, Sahjan


Tuesday, April 2, 2019

यादें सुहेलवा की : जब हम जा पहुँचे एक नेपाली गाँव में Birding Trip to Suhelwa, Uttar Pradesh

जंगलों में भटकना किस प्रकृति प्रेमी को अच्छा नहीं लगता? ये प्रसन्नता और भी बढ़ जाती है गर आप वन के बीच बसे हुए किसी गाँव में जा पहुँचते हैं। ऐसा ही एक वाक़या हुआ था जब मैं और मेरे कुछ साथी पिछले साल पक्षियों की खोज में घूमते हुए भारत की सीमा पार कर नेपाल के एक गाँव में जा पहुँचे थे। मौका था अंतरराष्ट्रीय पक्षी महोत्सव का जिसमें पक्षी वैज्ञानिक और चिड़िया प्रेमियों के साथ यात्रा लेखकों को भी आमंत्रण मिला था। 
सुहेलवा वन्य अभ्यारण्य से सटा एक प्यारा सा गाँव

दुधवा के जंगलों की दो दिनों  सुबह से शाम  तक  खाक छानने के बाद हम सुहेलवा की ओर बढ़ रहे थे। दुधवा से सुबह आठ बजे चलकर हम सभी कुछ देर के लिए बहराइच में रुके। 
वन विभाग के अधिकारियों के साथ पक्षीप्रेमियों की जमात


रास्ता बनने की वज़ह से बहराइच के पहले तो धूल फाँकते आए पर उसके बाद हरियाली मिली।  बहराइच से हमारी बस बाँयी ओर जब भिंगा मार्ग पर बढ़ी तो खेत खलिहान कम होते चले गए और उनकी जगह हरे भरे जंगलों ने ले ली। छः घंटों की ये यात्रा आख़िर हमने इन्हीं दरख़्तों के बीच दो दिन घुलने मिलने के लिए तो की थी। चलती बस से हरे भरे खेतों के बीच कहीं सारस जोड़े दिखाई दिए तो कही स्टार्क। जैसे जैसे हम अपने गंतव्य के पास पहुँचने लगे, बादलों के काफिले पूरे आसमान पर काबिज हो गए। कम रोशनी पक्षियों को देखने और तस्वीरें लेने में बाधा उत्पन्न करती है। यही वजह थी कि बाहर की इस फ़िज़ा को देख हम सभी का मन थोड़ा मायूस सा हो गया।

रास्ते में सरसों के हरे भरे खेत

जो लोग सुहेलदेव वन्य अभ्यारण्य से ज्यादा परिचित ना हों उन्हें बता दूँ कि भारत नेपाल सीमा के समानांतर फैले इस हरे भरे जंगलों का कुछ हिस्सा बलरामपुर तो कुछ श्रावस्ती जिले में पड़ता है। वैसे गूगल पर आज भी इस नाम से इसे खोजना आसान नहीं है।  वैसे क्या आप जानना नहीं चाहेंगे कि इस सुहेलदेव या उसका अपभ्रंश सुहेलवा के पीछे आख़िर कौन सी शख़्सियत है?

इस इलाके की प्रचलित दंत कथाओं की मानें तो सुहेलदेव श्रावस्ती पर राज करने वाले एक राजा थे। ऐसा कहा जाता है कि सुहेलदेव ने ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद ग़ज़नवी के सेनापति सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी को बहराइच में हुई लड़ाई में पराजित कर मार डाला था। इससे पहले सिंधु नदी पार कर सैयद सालार मसूद ने कई भारतीय राजाओं को मात दी थी पर सुहेलदेव के सामने उसकी एक ना चली। सुहेलदेव को कुछ लोग यहाँ बसने वाले थारु और पासी समुदायों से जोड़ कर देखते हैं। यही वज़ह है कि इस इलाके की कई सार्वजनिक स्थलों का नामाकरण सुहेलदेव के नाम पर किया गया है।

मेरा खूबसूरत आशियाना

Sunday, March 17, 2019

दहकते पलाश और खिलते सेमल के देश में In the land of Palash & Semal

यूँ तो पलाश का फैलाव भारत के हर कोने में है पर पूर्वी भारत में इनके पेड़ों का घनत्व अपेक्षाकृत ज्यादा है और इसका प्रमाण तब मिलता है जब आप रोड या रेल मार्ग से मार्च और अप्रैल के महीने में इन इलाकों से गुजरते हैं। झारखंड और उत्तरप्रदेश का तो ये राजकीय पुष्प भी है। टैगोर की रचनाओं में भी पलाश का कई बार जिक्र हुआ है। झारखंड तो ख़ैर वन आच्छादित प्रदेश है ही । यहाँ के पर्णपाती वन जब वसंत के आगमन के साथ पत्तियाँ झाड़कर पलाश की सिंदूरी आभा बिखेरते है तो जंगल की लालिमा देखते ही बनती है। 


जंगल की आग पलाश को इस लाली को हर तरफ बिखेरने में साथ मिलता है अपने बड़े भ्राता सेमल का जो कि फरवरी महीने के आख़िर से ही अपने सुर्ख लाल फूलों के साथ खिलना शुरु कर देते हैं। पिछले हफ्ते जब झारखंड और बंगाल के कुछ इलाकों से गुजरने का मौका मिला तो पलाश और सेमल की ये जुगलबंदी किस रूप में नज़र आयी चलिए आपको भी दिखाते हैं। 

गौरंगपुर, बर्धमान में एक झील के किनारे खड़ा मिला मुझे ये पूरी तरह खिला पलाश
तो बात पहले बंगाल की। शांतिनिकेतन जो टैगोर की कर्मभूमि थी  वहाँ पलाश के पेड़ों का अच्छा खासा जमावड़ा है। वसंत के समय ये पलाश के फूल टैगौर की मनोदशा पर क्या असर डालते होंगे ये उनकी लिखी इन पंक्तियों से पता चल जाता है

ओ रे गृहोबाशी, खोल दार, खोल लागलो जे दोल
स्थोले, जोले, बोनो तोले लागलो जे दोल
दार खोल दार खोल
रंग हाशी राशी राशी अशोके पोलाशे
रंग नेशा मेघे मेशा प्रोभातो आकाशे
नोबीन पाते लागे रंग हिलोल, दार खोल दार खोल

अर्थात ओ घर में रहने वालों, अपने घर के द्वारों को खोल दो ! देखो बाहर ज़मीं पर, जल और आकाश में वसंत की कैसी बयार छाई है। प्रकृति के रेशे रेशे में एक हँसी है जो पलाश और अशोक वृक्षों से बिखर रही है। सुबह के आसमान में बादलों की चाल में एक नशा सा है। पेड़ों पर आए नए पत्ते रंगों का नया संसार रच रहे हैं तो तुमने  क्यों अपने द्वार बंद कर रखे हैं ?

शांतिनिकेतन तो नहीं पर उसी के पड़ोसी जिले बर्धमान के जंगलों से गुजरते हुए पिछले हफ्ते पलाश हमें अपने पूर्ण यौवन के साथ दिखाई दिया।

पलाश तो अपना है तुम कहाँ से आए हो?  यही प्रश्न था आँखों में उस बछड़े के :)
पलाश देश के अलग अलग हिस्सों में कई नामों से जाना जाता रहा है। पलाश के आलावा पूर्वी भारत में इसे किंशुक, टेसू व ढाक के नाम से भी पुकारे जाते सुना है। ढाक  से याद आया कि पलाश के पेड़ के पत्तों की खासियत है कि वो साथ में हमेशा तीन के तीन रहते हैं उससे कम ज़्यादा नहीं, इसलिए हिंदी का एक प्रचलित मुहावरा है ढाक के तीन पात यानी स्थिति हमेशा वही की वही रहना।

इसका वैज्ञानिक नाम Butea Monosperma है और अपने औषधीय गुणों और रंग  रँगीले रूप की वज़ह से ये बड़ा उपयोगी पेड़ है । मैंने इन पेड़ों को 5 से 15 मीटर तक लंबा देखा है। झारखंड के जंगलों में इनकी ऊँचाई सेमल के पेड़ों की तुलना में काफी कम होती है। राँची से बोकारो, मूरी, जमशेदपुर जिस दिशा में आप बढ़ेंगे सड़क या रेलवे ट्रैक के दोनों ओर पलाश के पेड़ों को कतारबद्ध पाएँगे।

पलाश के पेड़ों को देखते हुए कई कवियों की रचनाएँ याद आ जाती हैं जिनमें से कुछ का उल्लेख मैंने अपने इस आलेख में कुछ वर्षों पहले किया थानरेंद्र शर्मा ने भी पलाश के खिलने से आए प्रकृति में परिवर्तनों को अपनी एक कविता में बखूबी चित्रित किया है। प्रकृति में पलाश की मची धूम पर उनकी लिखी ये पंक्तियाँ मुझे लाजवाब कर जाती हैं। गौर फरमाइएगा

लग गयी आग; बन में पलाश, नभ में पलाश, भू पर पलाश
लो, चली फाग; हो गयी हवा भी रंगभरी छू कर पलाश

नीचे के चित्रों के साथ नरेंद्र जी की पंक्तियाँ  सटीक बैठ रही हैं या नहीं  इसका निर्णय आप पर छोड़ देता हूँ ।
पतझर की सूखी शाखों में लग गयी आग, शोले लहके
चिनगी सी कलियाँ खिली और हर फुनगी लाल फूल दहके 
मार्च में कभी गोमो या धनबाद से रेल मार्ग से बोकारो आना हो तो बीच रास्ते में दिखता ये दृश्य आपका जरूर मन मोहेगा।
चम्पई चाँदनी भी बीती, अनुराग-भरी ऊषा आई।
जब हरित-पीत पल्लव वन में लौ-सी पलाश-लाली छाई

Thursday, March 7, 2019

एक शाम गेतलसूद के नाम Getalsud Dam, Ormanjhi

राँची यूँ तो झरनों का शहर कहा जाता है पर झरनों के आलावा आप अगर किसी भी दिशा में तीस से चालीस किमी चलेंगें तो आपकी मुलाकात चौड़े पत्तों वाले पर्णपाती वनों से हो जाएगी। अगर मौसम अच्छा हो तो यूँ ही सप्ताहांत में इन हरी भरी वादियों के सानिध्य में बिताने की उत्कंठा बढ़ं जाती है। पिछते हफ्ते मन किया कि क्यूँ ना आज की शाम जंगलों से घिरे किसी जलाशय के आस पास बिताई जाए। धुर्वा और काँके तो शहर के अंदर के ही दो जलाशय हैं तो ऊपर वाले पैमाने को ध्यान में रखते हुए मैंने अपने एक मित्र के साथ घर से करीब चालीस किमी दूर स्वर्णरेखा नदी पर बने गेतलसूद बाँध की ओर निकलने का निश्चय किया ।


मैं इससे पहले गेतलसूद नहीं गया था। हाँ इसके जुड़वा भाई रुक्का से कई बार मुलाकात हुई थी। दरअसल रूक्का और गेतलसूद एक ही जलाशय के दो अलग अलग सिरो पर बनाए गए बाँध है । रुक्का वाला सिरा  राँची से ज्यादा करीब है। राँची के पक्षी प्रेमियों में ये इलाका खासा लोकप्रिय है। पतरातू के आलावा यहाँ भी जलीय व प्रवासी पक्षी दिखाई दे जाते हैं। ये दोनो बाँध ओरमांझी कस्बे से लगभग बराबर की दूरी पर हैं। जिन लोगों को इस कस्बे का नाम पहली बार सुना हो उनके लिए बता दूँ कि ये कस्बा पटना राँची राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। ओेरमांझी की एक खासियत ये भी है कि यहाँ से भी कर्क रेखा गुजरती है।


ओेरमांझी से गुजरती कर्क रेखा
दिन के ढाई बजे निकलने का सोचा जरूर था पर निकलते निकलते तीन बज ही गए। हमने ओरमाझी जाने के लिए टैगोर हिल वाली राह पकड़ी पर गूगल मैप ने कर्क रेखा पार करते हुए  आगे बढ़कर जब बाँए मुड़ने को कहा तो वहाँ कोई मोड़ ही नज़र नहीं आया। लोगों से पूछने पर पता चला कि आप लोग अपना मोड़ पहले छोड़ आए हैं। दरअसल हमें राँची से गोला होते हुए बोकारो की ओर जाने वाली सड़क पकड़नी थी। करीब आठ दस किमी उस सड़क पर चलने के बाद हमें अपनी दायीं ओर गेतलसूद जाने का रास्ता नज़र आया।

गेतलसूद बाँध की ओर जाती सड़क

Sunday, March 3, 2019

लवासा सिटी एक रंग बिरंगा सुंदर पर सुनसान शहर Lavasa, Maharashtra

पुणे महाराष्ट्र का एक ऐसा शहर है जहाँ दो तीन साल में एक बार जाना होता रहा है। दो दशक पहले जब पहली बार यहाँ की हरी भरी ज़मीं पर क़दम रखा था तो यहाँ से लोनावला और खंडाला जाने का अवसर मिला था। वैसे भी खंडाला उन दिनों आमिर खान की फिल्म गुलाम के बहुचर्चित गीत आती क्या खंडाला से.... और मशहूर हो चुका था। पश्चिमी घाटों की वो मेरी पहली यात्रा थी जो आज तक मेरे मन में अंकित है।


डेढ़ साल पहले जब महाबलेश्वर और पंचगनी जाने का कार्यक्रम बना तो कुछ दिन पुणे में एक बार फिर ठहरने का मौका मिला। शहर की कुछ मशहूर इमारतों और मंदिरों को देखने के बाद पश्चिमी घाट के आस पास विचरने की इच्छा ने पर पसारने शुरु कर दिए। मुंबई के मित्रों से झील और हरे भरे पहाड़ों के किनारे बसाए गए इस शहर की खूबसूरती का कई बार जिक्र सुना था।

फिर ये भी सुना कि किस तरह ये शहर पूरी तरह विकसित होने के पहले ही ढेर सारे विवादों में घिरता चला गया पर इस शहर को एक बार देखने की इच्छा हमेशा मन में रही। 

टेमघर बाँध की दीवार से रिसता पानी
अक्टूबर के तीसरे हफ्ते के एक सुनहरे चमकते हुए दिन हमारा काफिला दो कारों में सवार होकर खड़की  से लवासा की ओर चल पड़ा। पुणे में ज्यादा ठंड तो पड़ती नहीं। महीना अक्टूबर का था तो मौसम में हल्की गर्मी थी। वैसे तो पुणे से लवासा की दूरी साठ किमी से थोड़ी कम है पर आधा पौन घंटे तो पुणे महानगर और उसके आसपास के उपनगरीय इलाकों से निकलने में ही लग जाते हैं। फिर तो आप पश्चिमी घाट की छोटी बड़ी पहाड़ियों की गोद में होते हैं। 

मुठा नदी पर बनाया गया टेमघर जलाशय

सफर की तीन चौथाई दूरी तय करने के बाद मुठा नदी पर बना टेमघर बाँध आ जाता है वैसे इस बाँध की खूबसूरती इसके थोड़ा आगे बढ़ने पर तब दिखाई देती है जब इससे लगा जलाशय सड़क के बिल्कुल आपसे हाथ मिलाने चला आता है। लाल मिट्टी के किनारे बहता नीला आसमानी जल अपने पीछे की हरी भरी पहाड़ियों का सानिध्य पाकर और खूबसूरत लगने लगता है। ऍसी जगहों में वक़्त बिताने का आनंद तब और बढ़ जाता है जब वहाँ शांति हो। हमारे आलावा वहाँ बस पाँच छः लोग और थे। 

ढाल से नीचे उतरकर कुछ देर हम सभी टेमघर की सुंदरता में खोए रहे। सड़क के किनारे भुट्टे सिंक रहे थे। फेरीवालों की आवाज़ से मेरा ध्यान टूटा तो लगा कि अब यहाँ रुके हैं तो भुट्टों का स्वाद भी ले ही लेना चाहिए।भुट्टों की बात से याद आया कि पुणे की तरफ उपजने वाले भुट्टे उत्तर भारत के भुट्टों की अपेक्षा बेहद मीठे होते हैं। 

Wednesday, February 13, 2019

सफ़र नुब्रा में सुमूर से पनामिक तक और वो भीषण बर्फबारी Sumur to Panamik in Nubra Valley

दिस्कित के ठंडे रेगिस्तान से वापस लेह तक की अपनी यात्रा मुझे हमेशा याद रहेगी। इस सफ़र के स्मृतियों में समाने की तीन वज़हें थीं। पहली, नुब्रा श्योक घाटी को चीरती उस सड़क से मुलाकात जो मेरे लद्दाख आगमन की प्रेरणा स्रोत रही थी और दूसरी सियाचीन बेस कैंप मार्ग पर कुछ दूर ही सही पर जाने का मौका मिलना और तीसरी खारदोंग ला और लेह के बीच की जबरदस्त बर्फबारी। आज के इस आलेख मैं मैंने अपने इन्हीं संस्मरणों को सँजोया है।


किताबें आपको किसी जगह जाने के लिए प्रेरित करती हैं। सालों पहले अजय जैन की पुस्तक Postcards from Ladakh की अपने ब्लॉग पर समीक्षा की थी। किताब का कथ्य तो कुछ खास नहीं लगा था पर बतौर फोटोग्राफर अजय की तस्वीरें शानदार थीं। उन्हीं में से एक तस्वीर थी नुब्रा घाटी की पतली सी सड़क पर चलते दो लामाओं की। ये तस्वीर मेरे मन में इस क़दर बस गई कि सालों बाद नुब्रा जाते वक़्त मैं उसी सड़क की तलाश करता रहा जो दूर दूर तक फैले सफेद मटमैले पत्थरों को चीरती हुई सी गुजरती है और जब ये सड़क मिली तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

दिस्कित जाते समय जब तक समझ आया कि जिस सड़क की खोज मैं कर रहा था वो यही है तब तक हमारी गाड़ी उस सड़क पर काफी आगे बढ़ चुकी थी। मैंने सोचा कि लौटते हुए जरूर कुछ पल वहाँ बिताऊँगा। दिस्कित से नीचे उतरते ही नुब्रा का एक पठारी मैदान सामने आ जाता है। इस मैदान के दोनों किनारों पर जो पहाड़ हैं वो सड़क के समानांतर चलते हैं। बाँयी तरफ कुछ दूर पर श्योक नदी भी पहाड़ के किनारे किनारे बहती है पर वो सड़क से दिखाई नहीं देती।

इससे सीधी सड़क क्या होगी ?
इस सड़क पर उतर कर लगता है कि दोनों तरफ फैले पहाड़ की गोद में लेटे इस मैदान में बस आप ही आप हैं। मन एक अजीब सी सिहरन और रोमांच से भर उठा। सोचने लगा कि वे लामा यहाँ से मठ तक के दस किमी की राह यूँ ही बारहा पैदल पार करते होंगे। कैसा लगता होगा इस निर्जन राह पर चलना? दरअसल ऐसा माहौल ही उन्हें अध्यात्म से जोड़े रखता होगा।

हरियाली और रास्ता
उन अनूठे पलों को क़ैद कर मैं पनामिक की ओर चल पड़ा। दिस्कित से लेह की ओर जाती सड़क में पन्द्रह किमी बाद बाँयी ओर एक रास्ता जाता है जिस पर मुड़ते ही एक छोटे से पुल को पार कर आप श्योक नदी के दूसरी ओर पहुँचते हैं। श्योक नदी के समानांतर बढ़ते हुए करीब 15 km बाद सुमूर ( Sumur ) गाँव के दर्शन होते हैं जो इस रास्ते की सबसे प्रचलित जगह है।

सुमूर की लोकप्रियता के कारण कई हैं। सुमूर एक प्यारा और छोटा सा हरा भरा गाँव हैं। हुंडर की तरह यहाँ रहने की भी व्यवस्था है। अगर सुमूर से थोड़ी दूर पथरीले मैदानी हिस्से में ट्रेक करें तो नुब्रा नदी से आपकी मुलाकात हो सकती है । सुमूर आने के चंद किमी पहले ही नुब्रा नदी श्योक नदी से मिलती है यानी असली नुब्रा नदी घाटी सुमूर के पास से शुरु होती है।

Tuesday, February 5, 2019

फूलों के रंग "फन कैसल" के संग Fun Castle, Ranchi

राँची को जलप्रपातों का शहर कहा जाता है। शहर से चालीस से अस्सी किमी के दायरे में दशम, जोन्हा, हुंडरू, सीता, हिरणी, पंचघाघ जैसे छोटे बड़े कई झरने हैं। अक्सर साल की शुरुआत में इन झरनों के पास मौज मस्ती करने पूरा शहर उमड़ जाता है पर वास्तविकता ये है कि ये समय इन झरनों की खूबसूरती देखने का सही समय नहीं होता। सबसे अच्छा समय बरसात के तुरंत बाद यानी सितंबर अक्टूबर का है जब इन प्रपातों से आने वाली पानी की गर्जना आप कोसों दूर से सुन सकते हैं।

फूलों की तरह लब खोल कभी, "डेज़ी" की जुबां में बोल कभी 
ये तो हुई शहर के बाहरी इलाके की बातें। शहर के अंदर की मशहूर स्थलों में एक पहाड़ी है जहाँ कभी रवींद्रनाथ टैगोर के अग्रज ज्योतिंद्रनाथ निवास किया करते थे।  तब वो पहाड़ी हरे भरे जंगलों के बीच में हुआ करती थी और आज उसके अगल बगल कंक्रीट के जंगलों का विस्तार है।  ऐसी ही एक दूसरी पहाड़ी पर भगवान जगन्नाथ का  मंदिर है जहाँ हर साल रथ यात्रा बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इसके आलावा जिन लोगों के पास थोड़ा समय हो वो यहाँ के देवड़ी और सूर्य मंदिर में भी जाना पसंद करते हैं।

शहर में दो बड़े जलाशय भी हैं धुर्वा और काँके के पर आज की तारीख़ में जो सबसे लोकप्रिय जगह राँचीवासियों के लिए हो गयी है वो है पतरातू घाटी और उससे सटा बाँध।


राँची में जैव विविधता उद्यान से लेकर नक्षत्र वन जैसे उद्यान तो हैं पर हर बड़े शहर जैसे थीम पार्क या वाटर पार्क जैसा कुछ खास है नहीं। रातू महाराज के इलाके में एक ऐसा एम्यूजमेंट पार्क बना तो था आज से करीब पन्द्रह वर्ष पहले पर वो उस कोटि का नहीं रह गया है जैसा अपने शुरुआती दिनों में था।  पन्द्रह सालों में मैंने सोचा कि क्यूँ ना एक परिवर्तन के लिए ही सही वहाँ का चक्कर मार लें। घूमने का घूमना हो जाएगा और फरवरी के इस महीने में प्रकृति के वासंती रंगों से भी मुलाकात हो जाएगी।

फन कैसल के सबसे ऊँचे बिंदु से पार्क का दृश्य
पार्क में छोटी बड़ी दर्जन भर राइड हैं जिसमें  तीन चार मजेदार हैं। 160 के टिकट में बहुतेरी राइड्स का एक साथ आनंद  लिया जा सकता है। 

सबसे ज्यादा रोमांच तो इसी ट्रेन में आता है।

Friday, January 25, 2019

भारत, नेपाल और बांग्लादेश के नज़ारे चित्रों के सहारे Tarang Painting Exhibition, Ranchi

एक मुसाफ़िर जब नई जगह जाता है तो आख़िर क्या देखता है? उस जगह की इमारतें, लोग, उनका रहन सहन, संस्कृति और आस पास की प्रकृति ! यही ना? यानी वो चीजें जो उस जगह को इतना आकर्षक बनाती हैं कि लोग उसे देखने दूर दूर से आते हैं। पर इंसान की भी एक सीमा है। वो आख़िर कितनी जगहें जा सकता है? इस छोटी सी ज़िंदगी में क्या क्या देख सकता है? 

यही वज़ह है कि इंसान की फितरत है कि वो दूसरों द्वारा कहे और लिखे अनुभवों को भी आत्मसात करता है, दूसरे की आँखों से देखता है और ये आँखें अगर वही दृश्य कूची के रंगों में भरकर दिखाती हैं तो वो अनुभव और सजीव होता है।

पिछले हफ्ते मेरे शहर में भारत , नेपाल और बांग्लादेश के कई चित्रकारों ने अपनी चित्रकला का प्रदर्शन किया। थोड़ा सा समय निकालकर मैं भी वहाँ जा पहुँचा। घंटे भर  अपने और पड़ोसी देशों के उन पहलुओं को रंगों में तब्दील होता देखता रहा जिसकी चर्चा इस आलेख की शुरुआत में की है। आइए इन नज़ारों में कुछ से आपकी भी मुलाकात कराएँ ।
एक वृद्ध पहाड़ी स्त्री 

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