Thursday, October 10, 2019

राँची की दुर्गा पूजा : आज देखिए बाँधगाड़ी, काँटाटोली हरमू, श्यामली, सेल टाउनशिप के पंडालों की झलकियाँ Ranchi Durga Puja 2019

पंडाल परिक्रमा की अंतिम कड़ी में आपको दिखाते हैं राँची के अन्य उल्लेखनीय पंडालों की झलकियाँ। रेलवे स्टेशन, रातू रोड, ओसीसी व बकरी बाजार के बाद जिन  पंडालों  ने ध्यान खींचे वो थे बाँधगाड़ी, काँटाटोली व हरमू के पंडाल।

बाँधगाड़ी में दुर्गा जी के आसपास कहीं भी महिसासुर की छाया तक नहीं थी। सारे शस्त्र माता के हाथों में ना होकर चरणों में दिखे। माता के मंडप में सर्व धर्म समभाव दिखाने के लिए विभिन्न धर्मों के प्रतीक चिन्हों का प्रयोग किया गया था।

बाँधगाड़ी के पंडाल में शस्त्र विहीन दुर्गा शांति का संदेश देती हुई

कांटाटोली में माँ दुर्गा की प्रतिमा
वहीं काँटाटोली के दुर्गापूजा पंडाल में चित्रकला के माध्यम से रामायण की कथा का निरूपण किया गया था। पंडाल का ये स्वरूप छोटे बड़े बच्चों को काफी आकर्षित कर रहा था।


आज जब एक अभिनेत्री ये नहीं बता पाती हैं कि संजीवनी पर्वत पर हनुमान किसके लिए बूटी लाने गए थे, तो देश में उसे मुद्दा बना लिया जाता है। हमलोग छोटे थे तो ये कहानियाँ कामिक्स और टीवी सीरियल के माध्यम से हमारी स्मृतियों में रोप दी गयी थीं पर आज कल के मोबाइल युग में पढ़ाई के इतर जो कुछ और परोसा जा रहा है उसमें हमारी संस्कृति के कितने अवयव समाहित हैं ये सोचने का विषय है।

यहाँ सजावट थी चित्रकला के माध्यम से...

Tuesday, October 8, 2019

राँची की दुर्गा पूजा : गगनचुंबी इमारतों के बीच बना बकरी बाजार का इंद्रधनुषी पंडाल Bakri Bazar Ranchi Durga Puja 2019

राँची के सबसे नामी पंडालों में बकरी बाजार अग्रणी हैं। सामान्यतः यहाँ के पंडाल अपनी विशालता और वैभव के लिए ज्यादा और महीन कलाकारी के लिए कम जाने जाते हैं। इस बार यहाँ सतरंगा पंडाल सजा जिसकी थीम थी बढ़ती जनसंख्या के बीच आम जनों का संघर्ष !

रंगों से भरे पंडाल में अपनी बात कहने में आयोजक कितने सफल हुए हैं देखिए आज इस झाँकी में..

बकरी बाजार का काल्पनिक इंद्रधनुष

उल्लू तो लक्ष्मी जी का वाहन था पर यहाँ दुर्गा पंडाल का सारथी बन बैठा है


पंडाल में इन्द्रधनुष के नीचे जो सैकड़ों हाथ दिख रहे हैं वो बढ़ती जनसंख्या के प्रति आयोजकों की चिंता को व्यक्त करते हैं। इन सारे लोगों के लिए हर दिन संघर्ष का है जो लोग इस वैतरणी को पार कर जीवन में सफल हुए उनमें सर कुछ के चित्र एक कोलॉज के माध्यम से ऊपर टाँके गए हैं।

ये दिखाने की कोशिश की गयी है कि इतनी भीड़ में कुछ ही सफलता का स्वाद चढ़कर प्रशस्ति की नाव पर सवार हो सकेंगे।

मेकेनिकिल इंजीनियर के यंत्र गियर की सजावट के बीच निखरती चित्रकला

चौंक गए ना? 

राँची की दुर्गा पूजा : बांग्ला स्कूल में सजा राजस्थानी पुतलों का संसार Bangla School Durga Puja 2019

रांची की दुर्गा पूजा की पंडाल परिक्रमा के तीसरे चरण में चलिए बांग्ला स्कूल के इस राजस्थानी पुतलों के संसार में।

बांग्ला स्कूल का पंडाल राँची के अन्य बड़े पंडालों जितना प्रसिद्ध भले ना हो पर यहाँ कलाप्रेमी अक्सर कुछ अलग सा देखने के लिए जाते जरूर हैं। इस बार यहां पंडाल की दीवारें सिंदूरी रंग में सजी थीं। दीवारों के गोल नमूनों को बीचों बीच जलता बल्ब  पंडाल को जगमग कर रहा था। पंडाल की एक दीवार पर शीशा लगा कर लोगों को सेल्फी खींचने की ज़हमत से बचा दिया गया था।

तीस से पैंतीस फीट की कठपुतलियों के बीच माँ दुर्गा से मिलती जुलती छोटी छोटी गुड़िया बनाई गयी हैं। पंडाल के मुख्य मूर्तिकार निर्मल शील के अनुसार इन्हें बनाने के लिए चटाइ, पाट लकड़ी, शीप, शंख, हुगला पत्ता, ताल पत्ता और बाँस का इस्तेमाल किया गया है।

इस पंडाल की सबसे खूबसूरत छटा छलक रही थी माँ के दरबार में। सीपों की लटकती झालर के पीछे माँ दुर्गा राजस्थानी लिबास में लिपटकर सौंदर्य का प्रतिमान लग रही थीं। 

राजस्थानी वेशभूषा में सजी सँवरी माँ दुर्गा

अब और क्या बताना आप खुद ही देख लीजिए मेरे कैमरे की नज़र...

पंडाल का मुख्य द्वार

पुतलों की विशाल प्रतिमाएँ

Monday, October 7, 2019

राँची की दुर्गा पूजा : आज बारी रातू रोड की Ratu Road Durga Puja 2019

दुर्गा पूजा पंडाल परिक्रमा में आज बारी है रातू रोड के पंडाल की जहाँ सड़क के किनारे एक विशाल रथ के अंदर माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गयी है।  रातू रोड का पंडाल राँची के सबसे पुराने पंडालों में से एक है। ये वही इलाका है जहाँ यहाँ के प्राचीन नागवंशी राजवंश के अंतिम महाराज रहा करते थे। इसी वंश की एक रानी लक्ष्मी कुँवर ने जो बंगाल से थीं यहाँ 1870 ई से दुर्गा पूजा की परंपरा शुरु कराई।

रातू रोड पूजा पंडाल
इस साल इस पंडाल में भ्रूण हत्या और स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों को पंडाल की थीम बनाया गया है। बाहर से इस सजीले रथ को तो बाजे गाजे के साथ हाँका जा रहा है पर अंदर सर्प सरीखी कुप्रथाओं को स्त्री का अस्तित्व मिटाते दिखाया गया है। स्त्रियों पर होते जुल्म को देखकर माँ ने अपनी आँखे अधमुँदी कर रखी हैं।

पंडाल के बाहरी भाग को पीले और लाल रंग के समायोजन से सजाया गया है। अगर ध्यान से देखेंगे तो सारी आकृतियाँ पीले रंग के रेशे से बनी दिखेंगी। तो आइए चलें इस पंडाल की परिक्रमा पर

ऊपर बजती शहनाई, शादी की वेला आई

Sunday, October 6, 2019

राँची की दुर्गा पूजा : आज देखिए राँची रेलवे स्टेशन पर केरल की सांस्कृतिक झाँकी Durga Puja 2019 Ranchi Railway Station Pandal

राँची में दुर्गा पूजा की धूमधाम शुरु हो गयी है। षष्ठी और सप्तमी को राँची के पंडालों को देखने के बाद मैं आपके सामने ला रहा हूँ इस साल के चार शानदार पंडालों की झलकियाँ। शुरुआत राँची रेलवे स्टेशन के पंडाल से जो विगत कुछ वर्षों से अपनी कलात्मकता के लिए जाना जाता रहा है।

इस बार लगातार बारिश होने की वज़ह से राँची के ज्यादातर पंडाल षष्ठी को खुले। राँची रेलवे स्टेशन के पंडाल में सप्तमी के बाद इतनी भीड़ हो जाती है कि ढंग से यहाँ की कलाकृतियों को निहारना भी मुश्किल होता है। यही सोचकर मंडप के पट खुलने के कुछ घंटे बाद ही मैं वहाँ जा पहुँचा। भीड़ तो थी पर इतनी नहीं कि धक्का मुक्की हो।

इस साल पंडाल में दक्षिण भारतीय राज्य केरल की संस्कृति को वहाँ के नृत्यों के माध्यम से उकेरा गया है। चार महीने और 36 लाख रुपये में बने इस पंडाल में माता के दरबार को कैसे सजाया गया है चलिए देखते हैं चित्रों की इस झाँकी में।



मुख्य द्वार के सामने स्वागत करता कथकली नर्तक

मंडप का मुख्य द्वार

Sunday, September 29, 2019

अयोध्या पहाड़ से चांडिल बाँध : याद रहेगी वो भूलभुलैया Ayodhya Hills to Chandil Dam

राँची से अयोध्या पहाड़ तक की यात्रा तो आपने की थी मेरे साथ पिछले हफ्ते और ये भी जाना था कि किस तरह हम ऐसे ठिकाने में फँस गए थे जहाँ आती जाती बिजली के बीच जेनेरेटर की व्यवस्था भी नहीं थी। समझ में मुझे ये नहीं आ रहा था कि जहाँ दो दो बाँध का निर्माण बिजली उत्पादन के लिए हुआ है वहीं बिजली क्यूँ आ जा रही है। रात भर की कच्ची नींद तड़के ही टूट गयी। बाहर अभी भी अँधेरा था। बारिश की टीप टाप ही उस शांत वातावरण को चीरती हुई कानों तक आ रही थी।


आधे घंटे बाद कमरे से निकल कर छत पर पहुँचे तो सूरज को बादलों के लिहाफ में अँगड़ाई लेता पाया। बारिश रुक तो गयी थी पर फिज़ा से नमी अब भी बरक़रार थी।
पास बसा एक गाँव
हमारी लॉज के ठीक पीछे घरों को देख कर लगता था कि हम गाँव के बीचों बीच हैं। सच पूछिए तो अयोध्या पहाड़ का इलाका ग्रामीण आदिवासी इलाका ही है।  जंगलों से सटे गाँवों में ज्यादातर संथाल, मुंडा और बिरहोर जनजाति के लोग निवास करते हैं। अंग्रेजों ने अठारहवीं शताब्दी में जब बिहार, बंगाल और उड़ीसा की दीवानी ली तब जंगल महल नाम से एक जिला बनाया गया जिसमें पुरुलिया भी शामिल था। 1833 में अंग्रेजों ने फिर इस जिले को तोड़ कर मनभूम नाम का जिला बनाया जिसका मुख्यालय पहले मानबाजार और फिर पुरुलिया बना। इस जिले में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के इलाके मिले हुए थे। 

आजादी के बाद भाषायी आधार पर जिले के हिस्से बिहार, बंगाल और ओड़ीसा में बाँट दिए गए। इन्हीं आदिवासी जिलों को मिलाकर वृहद झारखंड बनाने के लिए आंदोलन चला पर अंत में झारखंड के हिस्से में वही भूभाग आया जो पहले से बिहार के पास था। पुरुलिया बंगाल को चला तो गया पर यही वज़ह है कि इसके पहाड़ी इलाकों पर जाते ही झारखंडी संस्कृति की खुशबू आने लगती है।

पुरुलिया की ओर जाती सड़क
छत पर खड़ा मैं बादल और सूरज की आँखमिचौनी देख रहा था कि एक बंगाली सज्जन भी वहाँ आ गए। गपशप शुरु हुई तो बताने लगे कि करीब दस बारह साल पहले जब वो यहाँ आए थे तो ये पूरा इलाका घने जंगलों से भरा था। होटल के नाम पर सिर्फ पश्चिम बंगाल पर्यटन का निहारिका गेस्ट हाउस यहाँ हुआ करता था। तब इस जंगल में हाथियों की काफी आवाजाही थी। उन्होंने खुद हाथियों की लंबी कतार को उस वक्त देर तक रास्ता पार करते हुए देखा था। आज अयोध्या पहाड़ का मुख्य आकर्षण यहाँ बिजली उत्पादन के लिए बनाए गये दो बाँध हैं। लगभग दस वर्ग किमी में फैले इन दोनों बाँधों को बनाने में जंगलों का एक हिस्सा नष्ट हो गया और उसकी वज़ह से अब हाथियों ने भी अपना रास्ता बदल लिया है। अन्य जंगली जानवरों की संख्या में भी कमी आई है।

हल्की बारिश में हरियाते खेत खलिहान
बहरहाल आसपास के जंगलों में कदम नापने का हो रहा था तो सुबह की सैर के लिए चल पड़े। आज भी अयोध्या पहाड़ मैं छोटे बड़े सिर्फ दर्जन भर होटल और लॉज हैं। इन होटलों और कुछ सरकारी इमारतों का ये सिलसिला एक से दो किमी में ही निपट जाता है और जिन्हें पार कर आप साल के जंगलों के बिल्कुल करीब आ जाते हैं। जंगल की शुरुआत में ही सुनहरे पीलक (Golden Oriole) का एक जोड़ा अपनी मीठी बोली में चहकता दिखाई पड़ा। मुख्य सड़क को छोड़ हमने एक पगडंडी की राह पकड़ी और थोड़ी ही देर में धान के खेतों के बीच चले आए। अचानक गाय की घंटियों की आवाज़ कानों में गूँजी तो देखा कि एक किसान पहाड़ी ढलान पर हल बैलों से अपने खेत जोत रहा है। एक ज़माना था जब यहाँ के आदिवासी मूल रूप से जानवर व पक्षियों का शिकार कर ही अपना जीवन यापन करते थे। थोड़ी बहुत धान की खेती और पशुपालन इनके लिए आज भी जीविका का आधार है। 


पहाड़ी ढलानों पर भी हल बैलौं से खेती
वापस लौटते हुए यहाँ के प्रसिद्ध और सबसे मँहगे आश्रय स्थल कुशल पल्ली को देखने की इच्छा हुई। इसके बगल में यहाँ का यूथ हॉस्टल भी है। खेत खलिहानों के बीच से निकलते हुए रास्ते के आस पास तेलिया मुनिया और कोतवाल के आलावा कई और पक्षी दिखाई दिए जिनकी पहचान करने से पहले ही वे फुर्र हो गए। रिसार्ट तो वाकई बड़ा खूबसूरत था पर अक्सर मैंने महसूस किया है कि यहाँ आने वाले लोग इसी के अंदर इतना रम जाते हैं कि अगल बगल के जंगलों और ग्रामीण संस्कृति को समझने के लिए शायद ही कोई वक़्त देते हैं । 


कुशल पल्ली का आकर्षक परिसर

Friday, September 13, 2019

चलिए आज मेरे साथ पुरुलिया के अयोध्या पहाड़ पर Monsoon Trip to Ayodhya (Ajodhya) Hills, West Bengal

अयोध्या नाम लेने से हम सबके मन में सीधे सीधे राम जन्म भूमि का ख्याल आता है। सच ये है कि राम तो पूरे भारतीय जनमानस के हृदय में बसे हैं। उनकी भक्ति का प्रभाव भारत ही नहीं आस पास के पड़ोसी देशों तक जा पहुँचा। यही वज़ह है कि थाइलैंड में राम की याद में राजधानी बैंकाक से अस्सी किमी दूर एक भरा पूरा शहर अयुत्थया ही बन गया जिसकी ऐतिहासिक इमारतों को देख आज भी लोग दाँतों तले ऊँगलियाँ  दबा लेते हैं। अब विदेशों की छोड़िए। क्या आपको पता है कि भारत में एक पहाड़ का नाम भी अयोध्या पहाड़  है। जी हाँ ये पहाड़ है पश्चिम बंगाल के झारखंड से सटे पुरुलिया जिले में। जिन लोगों के लिए पुरुलिया नया नाम है उन्हें याद दिलाना चाहूँगा कि ये वही जिला है जहाँ नब्बे के दशक में एक विदेशी विमान से तथाकथित रूप से आनंद मार्गियों के लिए भारी मात्रा में हथियार गिराए गए थे। 

दरअसल छोटानागपुर के पठार का पूर्वी सिरा इसी जिले में जाकर खत्म होता है। यानी अपने भौगोलिक स्वरूप और संस्कृति के लिहाज से इस इलाके की झारखंड से काफी समानता है।  यही वज़ह है कि वृहद झारखंड के शुरुआती आंदोलन में बंगाल के इस हिस्से को भी नए राज्य में शामिल करने की बात थी।


हर साल मानसून में मेरी कोशिश रहती है कि किसी ऐसे इलाके से गुजरा जाए जो अपेक्षाकृत अछूता हो और प्रकृति की गोद में बसा हो। नेतरहाट, लोध, पारसनाथ पिछली मानसूनी यात्राओं के साथी रह चुके थे तो इस बार मन हुआ कि अयोध्या पहाड़ का रुख किया जाए जिसे स्थानीय अजोध्या पहाड़ (Ajodhya Hills) के नाम से भी बुलाते हैं।

राम के वनवास के मार्ग को लेकर ना जाने देश में कितनी किंवदंतियाँ हैं। यहाँ के ग्रामीणों का मानना है कि श्री राम बनवास के समय सीता माता के साथ इधर से गुजरे थे। यहाँ से गुजरते वक़्त सीता जी को प्यास लगी तो राम जी ने चट्टानों पर तीर चला कर ज़मीन से एक जल स्रोत निकाल दिया जिसे आज सीता कुंड के नाम से जाना जाता है। राम के वनवास की इसी कथा की वज़ह से इस पहाड़ का नाम अयोध्या पहाड़ पड़ गया।

किता से झालदा के बीच
अगस्त के दूसरे हफ्ते में राँची से मूरी और झालदा होते हुए हमें अयोध्या पहाड़ की राह पकड़नी थी। एक वक़्त था जब इस पूरे रास्ते में मूरी तक नाममात्र की आबादी मिलती थी। आज के दिन में सड़कों के बेहतर होने से जहाँ आवाजाही बढ़ी है वहीं सड़कों के दोनों ओर नए निर्माण अपने पाँव पसारने लगे हैं।

सड़क यात्रा में आनंद की पहली घड़ी तब आई जब हम झारखंड के किता से पश्चिम बंगाल के झालदा की ओर अग्रसर हुए। सड़क के दाँयी ओर रह रह कर रेल की पटरियाँ आँखमिचौनी का खेल खेल रही थीं तो दूसरी ओर नीले गगन में हरी भरी पहाड़ियों का समानांतर जाल मन को लुभा रहा था।

मुरगुमा जलाशय, अयोध्या पहाड़
तुलिन से झालदा में घुसते सड़क अचानक से संकरी हो जाती है। कस्बाई भीड़ और भाषा के बदलते स्वरूप को देख आप समझ जाते हैं कि आप पश्चिम बंगाल की सरज़मीं पर कदम रख चुके हैं। सहयात्रियों को चाय की तलब परेशान कर रही थी पर इतनी भीड़ भाड़ में गाड़ी खड़ा करना ट्राफिक जाम को आमंत्रण देना था। लिहाजा हम बढ़ते गए और कस्बे के बाहर ही निकल आए।  अयोध्या पहाड़ के लिए एक सड़क कस्बे के चौराहे से भी मुड़ती है पर मैंने वो रास्ता चुना था जो मुरुगमा जलाशय होते हुए जंगलों के बीच से निकलता है।

झालदा से निकलते हुए जैसे ही ग्रामीण अंचल मिला वहाँ गाड़ी रोकी गयी। छोटी सी गुमटी पर चाय के पतीले को देख लोगों की जान में जान आई। पाँच रुपये में गिलास भरी चाय का जो लुत्फ़ था वो सौ दो सौ की कैपेचीनो में भी नहीं मिलता। चाय की दुकान से पीछे ही एक मंदिर था जिसके सामने वृक्ष के नीचे चबूतरे पर लोग बोल बतिया रहे थे। धूप कड़क थी और झालदा की चिल पों के बाद तरुवर की छाँव में सुस्ती भरा माहौल भी मन को रुच रहा था।

जलाशय के ऊपर बादलों का खेल
थोड़े विश्राम के बाद हम मुरगुमा की राह पर थे। जलाशय में बारिश के इस मौसम में जितने पानी की अपेक्षा थी उतना पानी नहीं था। दरअसल इस साल झारखंड और बंगाल में उतनी बारिश नहीं हुई जितनी हर साल होती थी। उस  प्रचंड धूप में भी पानी को छू कर आने के लिए मेरे मित्र नीचे उतर गए। 

पंख  सुखाता छोटा पनकौआ (Little Cormorant)

मैं सड़क के दूसरी ओर बाँध के किनारे किनारे चल पड़ा। जलाशय से एक नहर सिंचाई के लिए निकाली गयी है। उसी ओर से कुछ पक्षियों का कलरव सुनाई पड़ा। थोड़ी दूर आगे बढ़ा ही था कि सड़क के पीछे के जंगलों से एक लहटोरे (Shrike ) ने उड़ान भरी और नीचे की झाड़ियों में लुप्त हो गया। तभी मेरी नज़र पानी के बीचो बीच बैठे पनकौवे पर पड़ी।  पनकौवा पत्थर पर चारों ओर घूमता हुआबड़ी अदा के साथ अपने पंख सुखा रहा था। पनकौवे को वो धूप भले ही भा रही हो पर बीस पच्चीस मिनट के बाद वहाँ उस गर्मी में और रुकना सबके लिए मुश्किल था। नतीजन मुरगुमा से हम सबने विदा ली।

मुरगुमा से आगे बढ़ते ही चढ़ाई शुरु हो जाती है। जंगलों के बीच से एक कोना ऐसा मिला जहाँ से पूरा जलाशय दिखाई देता है। रास्ता मनोहारी हो चला था। सड़क के दोनों ओर झाड़ियों और लतरों का साम्राज्य छाया था। उनके कंधे पकड़े कोई कोई पेड़ कभी उचक उचक कर देख लेता था। आसमान दोरंगा था... एक ओर धूप से कुम्हलाया फीका सा तो दूर पहाड़ियों के ऊपर मटमैले रंग में अपने तेवर बदलता हुआ। 

ऐसी हरी भरी राह पर कदमताल करने का मन किसे ना करे?
इतनी खूबसूरत डगर का मजा पैदल चलकर ही लिया जा सकता था। कभी धूप कभी छाँव में पड़ती इन पहाड़ी ढलानों पर चलना दिन के सबसे खूबसूरत लमहों में से था। पुटुस ने सड़क के दोनों ओर मजबूती से अपना खूँटा गाड़ रखा था। बस हम सब यही सोच रहे थे कि इस सड़क पर चलते हुए बारिश की फुहार साथ मिल जाती तो आनंद आ जाता। शाम को पता चला कि भगवन उस वक़्त बारिश करा तो रहे थे पर पहाड़ियों के उस पार।

अयोध्या पहाड़ से बीस किमी पहले
जंगलों  के बीच छोटे छोटे गाँवों का आना ज़ारी रहा। ज्यादातर घर खपड़ैल के दिखे जबकि कुछ की छत पुआल की थी। दो अलग अलग रंगों से लीपी गयी मिट्टी की दीवारों को उनके बीच एक रंग बिरंगी पट्टी और आकर्षक बना रही थी। घर के बरामदे की छाँव में कूद फाँद करते बच्चों के बीच आराम करती बकरियाँ, मुर्गी और बत्तख के चूजों की घर घर भटकती कतारों को देख कर लग रहा था कि कहीं हम वापस झारखंड में तो नहीं आ गए। दो दिन के प्रवास में मुझे ऐसा लगा धान की थोड़ी बहुत खेती के आलावा पशु और मुर्गी पालन ही यहाँ के गाँवों की जीविका का आधार है।

पुटुस  (Lantana Camara) की लताओं के बीच 
अयोध्या पहाड़ का कस्बाई इलाका बड़ा छोटा सा है। पश्चिम बंगाल पर्यटन के अतिथि गृह निहारिका के आलावा दस बारह छोटे बड़े लॉज, होटल व गेस्ट हाउस हैं। आरक्षण कर के तो हम गए नहीं थे। सोचा था कि ठिकाना नही मिला तो दूसरे रास्ते से जमशेदपुर की ओर बढ़ जाएँगे।

ख़ैर सप्ताहांत की छुट्टी में पश्चिम बंगाल में कहीं भी जगह मिल पाना टेढ़ी खीर है। भटकते भटकते एक लॉज मिली जहाँ सुविधा के नाम पर एक कमरा भर था। भोजन के लिए सड़क के किनारे ले देकर एक ढाबा था। वहीं अपनी क्षुधा पूरी की। शाम ढलने में अभी दो घंटे का वक़्त था। अपने रहने के ठिकाने के सबसे पास मयूर पहाड़ दिखा।  निर्णय लिया गया कि सबसे पहले पास के मयूर पहाड़ की चढ़ाई की जाए।

मयूर पहाड़ से दिखते आस पास के घने जंगल
पहाड़ ज्यादा ऊँचा नहीं था। पहाड़ी की चोटी पर एक छोटा सा हनुमान मंदिर है जहाँ से आप दूर दूर तक फैले जंगलों और घाटी में बसे खेत खलिहानों का विस्तार देख सकते हैं।

बारिश में नहाए खेत खलिहान

सूरज की रोशनी में निखरे धान के खेत
मयूर पहाड़ के बाद हमारा अगला मुकाम था मार्बल लेक। झील की ओर जाने वाला रास्ता गढ्ढों से भरा हुआ था। जिस बारिश की फरियाद हमने दिन में की थी वो शायद यहाँ बरस गयी थी। धान के खेत पानी से लबालब थे।बरसाती नालों का उफान मारता पानी सड़कों को भी जगह जगह से लील गया था। एक दो गढ्ढों को लाँघते हुए गाड़ी में सबने राम नाम जपना शुरु ही किया था कि उल्टी दिशा से आती एक गाड़ी को देख संबल मिला। बताया गया कि मार्बल लेक तक तो चले जाएँगे पर बामनी जलप्रपात तक जाना मुश्किल है।

बारिश में उफनते नाले
मार्बल लेक का ऐसा नाम क्यूँ पड़ा वो उसे देखकर समझ आया। संभवतः ये झील यहाँ बनाए गए बाँधों के निर्माण के लिए निकाले पत्थर की वजह से इस रूप में आयी है। शाम के पाँच बजे के आस पास जब हम वहाँ पहुंचे तो झील में ग्रामीण बच्चों और युवाओं का दल पानी में पहले से ही डुबकी लगाए बैठा था। झील की एक ओर कटे फटे पहाड़ अब भी अपनी बची खुची ताकत के साथ खड़े थे तो दूसरी ओर के पहाड़ों पर झूमती हरियाली झील की सुंदरता को नया रूप दे रही थी।
मार्बल लेक
पत्थरों के सानिध्य में अपने नाम को सार्थक करती भूरे रंग की पत्थरचिड़ी भी बैठी थी। नीचे झील की ओर उतरती पगडंडी जा रही थी पर सूर्यास्त का समय पास होने की वज़ह से ऊपर की चट्टानों पर ही अपनी धूनी रमा ली। 

पत्थरचिड़ी (Brown Rock Chat)
मार्बल लेक की संरचना ऐसी है कि यहाँ ईको बड़ा जबरदस्त होता है। ज़ोर से किसी का नाम लीजिए और फिर उसी आवाज़ को गूँजता सुनिए। अपना नाम आकाशवाणी की तरह गुंजायमान होते देख मैं और मेरे मित्र फूले ना समाए। सबका बाल हृदय जाग उठा और सबने बारी बारी से अपने गले की जोर आजमाइश की।


सूर्य देवता से विदा लेते हुए हम वापस उसी रास्ते से लौटे। लौटते हुए अपर डैम की एक झलक देखी और शाम की चाय का स्वाद लेते हुए विश्राम के लिए अपने लॉज पहुँचे।

अपर डैम, अयोध्या पहाड़
बाँध पर उतरती नीली शाम
थोड़ी ही देर में बिजली गुल हुई और कमरे में घना अंधकार छा गया। तभी पता चला कि हमारा  ये ठिकाना जेनेरेटर की सुविधा से महरूम है। संचालक ने किसी भी ठहरने वाले यात्री को लॉज की ये खूबी नहीं बताई थी। ख़ैर बिजली आती जाती रही और हमने जैसे तैसे रात बिताई। अगले दिन हम किन नज़ारों से रूबरू हुए और कैसे भटकी हमारी राह ये जानिएगा इस आलेख की अगली कड़ी में..

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Thursday, August 29, 2019

वेनिस : कुछ लफ़्ज़ों की है, इस शहर की कहानी ...निखरते मकां और वो बहता सा पानी Venice Boat Ride

वेनिस की यात्रा एक ख़्वाब सरीखी थी। कब ये सपना आँखों के आगे तैरा, स्मृतियों में शामिल हुआ और फिर निकल गया ये उस थोड़े से समय में पता ही नहीं चला। 

कभी कभी तो ये लगता है कि वेनिस के चारों ओर जो लैगून है वो एड्रियाटिक सागर की फैली हुई बाहें हों। वही बाहें जो नहरों का आकार लेकर वेनिस की ओर मानो खिंची चली आई हों। अपने बाहुपाश में समोने को आतुर। पर मेरी सोच उस सागर जैसी नहीं। 



आज भी मैं जब वेनिस को याद करता हूँ तो वो शहर एक तिलिस्म सा लगता है जिसके जादू को मैं तोड़ना नहीं चाहता। बस दूर से टकटकी लगाए देखते रहना चाहता हूँ।

लगता है पास से इस शहर को छूने से ये मैला हो जाएगा। आज भी वेनिस में आने वाले लाखों आंगुतक दिन भर रह कर उड़न छू हो जाते हैं। अब वो करें भी क्या ? सुंदरता के अपने नुकसान जो ठहरे। ढेर सारे यात्री मतलब ढेर सारा प्रदूषण और आसमान छूती कीमतें। इस शहर से कुछ लमहे जो मैंने भी अपनी यादों में इन तस्वीरों के माध्यम से सहेज रखे हैं वो आज आपकी नज़र..



वेनिस पोर्ट (Port of Venice)
समुद्र से वेनिस एक लैगून के ज़रिये जुड़ा हुआ है। इस लैगून के तीन मुहाने हैं जिससे वेनिस में प्रवेश किया जा सकता है।  चिंता की बात ये है कि पर्यटन को बढ़ावा देने के चक्कर में यहाँ क्रूज पर आने वाले बड़े जहाजों की संख्या बढ़ गयी है। इनकी आवाजाही से लैगून में प्रदूषण बढ़ता है और कई बार ज्वार के समय लहरें असमान्य रूप से ऊँची होकर शहर को बेवजह भिंगो देती हैं। क्रूज से एक साथ इतने पर्यटक शहर में दाखिल हो जाते हैं कि यहाँ रहने वालों को उनका शहर पराया लगने लगता है। इन्हीं कारणों से इन जहाजों को शहर के नज़दीक न आने देने के लिए समय समय पर विरोध होता रहा है।

बारिश में भींगा वेनिस
दो साल पहले इस समस्या का निदान करने के लिए वेनिस के मेयर ने घोषणा की कि बगल के शहर Marghera में क्रूज के रुकने की व्यवस्था की जाएगी और वेनिस के बंदरगाह का इस्तेमाल सिर्फ सिर्फ छोटे जहाजों कर पाएँगे। 



यानी वेनिस के मेयर क्रूज तो यहाँ बंद नहीं करेंगे क्यूँकि उससे इटली के इस शहर को रोज़गार के कई अवसर मिलते हैं पर पर्यावरणविदों की संतुष्टि के लिए ये उसे शहर से दूर अवश्य ले जाएँगे। 




संता मारिया डेल रोज़ारियो चर्च (Church of Santa Maria del Rosario)

अठारहवीं शताब्दी में बनाया गया चर्च जो कि आजकल डोमेनिकन संप्रदाय द्वारा संचालित होता है। वेनिस में इस चर्च को जेसुआती के नाम से भी जाना जाता है


संत मार्क गिरिजे का बेल टॉवर

वेनिस पहुँचते ही सबसे पहले जिस इमारत पर नज़र पड़ती है वो है संत मार्क गिरिजे का बेल टॉवर। नवीं शताब्दी में शुरुआती निर्माण के बाद इसे लाइटहाउस की तरह इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि अगले तीन सौ सालों में ये सौ मीटर ऊँचे घंटा घर में तब्दील हो गया। इसके बाद कभी बिजली गिरने और कभी आग लगने से इसे कई बार नुकसान पहुँचा और इसका पुनर्निर्माण किया जाता रहा।



डोज़ का महल (Doge's Palace)


अब अगर डोज़ शब्द आपको परेशान कर रहा हो तो ये समझ लीजिए कि इसका खुराक से कोई लेना देना नहीं बल्कि ये तो अंग्रेजी के ड्यूक शब्द का पर्याय है। मध्यकालीन यूरोप में वेनिस का मुख्य प्रशासक डोज़ ही कहलाता था। वेनिस की ये इमारत जो अपने हल्के नारंगी  रंग से दूर से ही पहचानी जाती है चौदहवीं शताब्दी में बनाई गयी थी।



पुंटा डेला डोगाना (Punta Della Dogana)


वेनिस की सबसे लोकप्रिय नहर है यहाँ की ग्रैंड कैनाल। शहर के बीचो बीच निकलती इस सर्पीलाकार नहर के दोनों ओर पुनर्जागरण काल की कई मशहूर इमारतें और खूबसूरत पुल हैं। ये नहर जहाँ जूदेक्का कैनाल से मिलती है उसी कोने पर पुंटा डेला डोगाना का ये संग्रहालय स्थित है। सत्रहवीं शताब्दी में यहाँ कस्टम का दफ्तर हुआ करता था। आज इसका इस्तेमालय संग्रहालय की तरह होता है। इसकी छत पर दो व्यक्ति सुनहरे गोले को उठाए हैं जिसके ऊपर भाग्य की देवी विराजमान है।  ये इस बात को दर्शाता है कि वेनिस के लोगों की ये आम मान्यता थी कि अगर भाग्य की देवी की कृपा रही तो व्यापार में लाभ ही लाभ होगा।



होटल हिल्टन मोलीनो स्टकी, जूदेक्का (Hilton Molino Stucky Hotel, Giudecca, Venice)


जूदेक्का कैनाल में जो इमारत अपने अलग रंग रूप की वज़ह से ध्यान खींचती है वो है होटल हिल्टन मोलीनो स्टकी। इस भवन का भी अपना एक इतिहास है। इसे बनाने वाला जोवानी स्टकी मूलतः स्विटज़रलैंड का रहने वाला था। जोवानी ने यहाँ पहले एक आटा चक्की लगाई और बाद में पास्ता बनाने का कारखाना भी। समय के साथ ये उद्योग बंद हो गए और करीब पच्चीस साल पहले इमारत को होटल में तब्दील कर दिया गया। यहाँ रहने के लिए आज की तारीख में कम से कम आपको बाईस हजार रुपये चुकाने होंगे।


रेसीडेंजा ग्रान्दी वेदुते (Residenza Grandi Vedute)


ये इमारत भी कभी कृषि आधारित उत्पाद के लिए कारखाने का काम करती थी। यहाँ हर कमरे में किचन भी है यानी अपना खाना खुद बनाओ पर एक दिन में रहने का किराया इतना जितना की आप भारत के किसी आम शहर में महीने में देते हैं।


इटली की इस यात्रा का ये आख़िरी भाग था। आशा है इसकी कड़ियाँ आपको पसंद आई होंगी। शीघ्र हाज़िर होता हूँ किसी और सफ़र की दास्तान लेकर..

इटली यात्रा 
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