Wednesday, February 13, 2019

सफ़र नुब्रा में सुमूर से पनामिक तक और वो भीषण बर्फबारी Sumur to Panamik in Nubra Valley

दिस्कित के ठंडे रेगिस्तान से वापस लेह तक की अपनी यात्रा मुझे हमेशा याद रहेगी। इस सफ़र के स्मृतियों में समाने की तीन वज़हें थीं। पहली, नुब्रा श्योक घाटी को चीरती उस सड़क से मुलाकात जो मेरे लद्दाख आगमन की प्रेरणा स्रोत रही थी और दूसरी सियाचीन बेस कैंप मार्ग पर कुछ दूर ही सही पर जाने का मौका मिलना और तीसरी खारदोंग ला और लेह के बीच की जबरदस्त बर्फबारी। आज के इस आलेख मैं मैंने अपने इन्हीं संस्मरणों को सँजोया है।


किताबें आपको किसी जगह जाने के लिए प्रेरित करती हैं। सालों पहले अजय जैन की पुस्तक Postcards from Ladakh की अपने ब्लॉग पर समीक्षा की थी। किताब का कथ्य तो कुछ खास नहीं लगा था पर बतौर फोटोग्राफर अजय की तस्वीरें शानदार थीं। उन्हीं में से एक तस्वीर थी नुब्रा घाटी की पतली सी सड़क पर चलते दो लामाओं की। ये तस्वीर मेरे मन में इस क़दर बस गई कि सालों बाद नुब्रा जाते वक़्त मैं उसी सड़क की तलाश करता रहा जो दूर दूर तक फैले सफेद मटमैले पत्थरों को चीरती हुई सी गुजरती है और जब ये सड़क मिली तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

दिस्कित जाते समय जब तक समझ आया कि जिस सड़क की खोज मैं कर रहा था वो यही है तब तक हमारी गाड़ी उस सड़क पर काफी आगे बढ़ चुकी थी। मैंने सोचा कि लौटते हुए जरूर कुछ पल वहाँ बिताऊँगा। दिस्कित से नीचे उतरते ही नुब्रा का एक पठारी मैदान सामने आ जाता है। इस मैदान के दोनों किनारों पर जो पहाड़ हैं वो सड़क के समानांतर चलते हैं। बाँयी तरफ कुछ दूर पर श्योक नदी भी पहाड़ के किनारे किनारे बहती है पर वो सड़क से दिखाई नहीं देती।

इससे सीधी सड़क क्या होगी ?
इस सड़क पर उतर कर लगता है कि दोनों तरफ फैले पहाड़ की गोद में लेटे इस मैदान में बस आप ही आप हैं। मन एक अजीब सी सिहरन और रोमांच से भर उठा। सोचने लगा कि वे लामा यहाँ से मठ तक के दस किमी की राह यूँ ही बारहा पैदल पार करते होंगे। कैसा लगता होगा इस निर्जन राह पर चलना? दरअसल ऐसा माहौल ही उन्हें अध्यात्म से जोड़े रखता होगा।

हरियाली और रास्ता
उन अनूठे पलों को क़ैद कर मैं पनामिक की ओर चल पड़ा। दिस्कित से लेह की ओर जाती सड़क में पन्द्रह किमी बाद बाँयी ओर एक रास्ता जाता है जिस पर मुड़ते ही एक छोटे से पुल को पार कर आप श्योक नदी के दूसरी ओर पहुँचते हैं। श्योक नदी के समानांतर बढ़ते हुए करीब 15 km बाद सुमूर ( Sumur ) गाँव के दर्शन होते हैं जो इस रास्ते की सबसे प्रचलित जगह है।

सुमूर की लोकप्रियता के कारण कई हैं। सुमूर एक प्यारा और छोटा सा हरा भरा गाँव हैं। हुंडर की तरह यहाँ रहने की भी व्यवस्था है। अगर सुमूर से थोड़ी दूर पथरीले मैदानी हिस्से में ट्रेक करें तो नुब्रा नदी से आपकी मुलाकात हो सकती है । सुमूर आने के चंद किमी पहले ही नुब्रा नदी श्योक नदी से मिलती है यानी असली नुब्रा नदी घाटी सुमूर के पास से शुरु होती है।

Tuesday, February 5, 2019

फूलों के रंग "फन कैसल" के संग Fun Castle, Ranchi

राँची को जलप्रपातों का शहर कहा जाता है। शहर से चालीस से अस्सी किमी के दायरे में दशम, जोन्हा, हुंडरू, सीता, हिरणी, पंचघाघ जैसे छोटे बड़े कई झरने हैं। अक्सर साल की शुरुआत में इन झरनों के पास मौज मस्ती करने पूरा शहर उमड़ जाता है पर वास्तविकता ये है कि ये समय इन झरनों की खूबसूरती देखने का सही समय नहीं होता। सबसे अच्छा समय बरसात के तुरंत बाद यानी सितंबर अक्टूबर का है जब इन प्रपातों से आने वाली पानी की गर्जना आप कोसों दूर से सुन सकते हैं।

फूलों की तरह लब खोल कभी, "डेज़ी" की जुबां में बोल कभी 
ये तो हुई शहर के बाहरी इलाके की बातें। शहर के अंदर की मशहूर स्थलों में एक पहाड़ी है जहाँ कभी रवींद्रनाथ टैगोर के अग्रज ज्योतिंद्रनाथ निवास किया करते थे।  तब वो पहाड़ी हरे भरे जंगलों के बीच में हुआ करती थी और आज उसके अगल बगल कंक्रीट के जंगलों का विस्तार है।  ऐसी ही एक दूसरी पहाड़ी पर भगवान जगन्नाथ का  मंदिर है जहाँ हर साल रथ यात्रा बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इसके आलावा जिन लोगों के पास थोड़ा समय हो वो यहाँ के देवड़ी और सूर्य मंदिर में भी जाना पसंद करते हैं।

शहर में दो बड़े जलाशय भी हैं धुर्वा और काँके के पर आज की तारीख़ में जो सबसे लोकप्रिय जगह राँचीवासियों के लिए हो गयी है वो है पतरातू घाटी और उससे सटा बाँध।


राँची में जैव विविधता उद्यान से लेकर नक्षत्र वन जैसे उद्यान तो हैं पर हर बड़े शहर जैसे थीम पार्क या वाटर पार्क जैसा कुछ खास है नहीं। रातू महाराज के इलाके में एक ऐसा एम्यूजमेंट पार्क बना तो था आज से करीब पन्द्रह वर्ष पहले पर वो उस कोटि का नहीं रह गया है जैसा अपने शुरुआती दिनों में था।  पन्द्रह सालों में मैंने सोचा कि क्यूँ ना एक परिवर्तन के लिए ही सही वहाँ का चक्कर मार लें। घूमने का घूमना हो जाएगा और फरवरी के इस महीने में प्रकृति के वासंती रंगों से भी मुलाकात हो जाएगी।

फन कैसल के सबसे ऊँचे बिंदु से पार्क का दृश्य
पार्क में छोटी बड़ी दर्जन भर राइड हैं जिसमें  तीन चार मजेदार हैं। 160 के टिकट में बहुतेरी राइड्स का एक साथ आनंद  लिया जा सकता है। 

सबसे ज्यादा रोमांच तो इसी ट्रेन में आता है।

Friday, January 25, 2019

भारत, नेपाल और बांग्लादेश के नज़ारे चित्रों के सहारे Tarang Painting Exhibition, Ranchi

एक मुसाफ़िर जब नई जगह जाता है तो आख़िर क्या देखता है? उस जगह की इमारतें, लोग, उनका रहन सहन, संस्कृति और आस पास की प्रकृति ! यही ना? यानी वो चीजें जो उस जगह को इतना आकर्षक बनाती हैं कि लोग उसे देखने दूर दूर से आते हैं। पर इंसान की भी एक सीमा है। वो आख़िर कितनी जगहें जा सकता है? इस छोटी सी ज़िंदगी में क्या क्या देख सकता है? 

यही वज़ह है कि इंसान की फितरत है कि वो दूसरों द्वारा कहे और लिखे अनुभवों को भी आत्मसात करता है, दूसरे की आँखों से देखता है और ये आँखें अगर वही दृश्य कूची के रंगों में भरकर दिखाती हैं तो वो अनुभव और सजीव होता है।

पिछले हफ्ते मेरे शहर में भारत , नेपाल और बांग्लादेश के कई चित्रकारों ने अपनी चित्रकला का प्रदर्शन किया। थोड़ा सा समय निकालकर मैं भी वहाँ जा पहुँचा। घंटे भर  अपने और पड़ोसी देशों के उन पहलुओं को रंगों में तब्दील होता देखता रहा जिसकी चर्चा इस आलेख की शुरुआत में की है। आइए इन नज़ारों में कुछ से आपकी भी मुलाकात कराएँ ।
एक वृद्ध पहाड़ी स्त्री 

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