Friday, April 15, 2022

चला मन फिर पलाश के पीछे Flame of Forest : Palash

हर साल बसंत ॠतु के आगमन के साथ इंतज़ार रहता है कि कब पलाश की कलियाँ फूल बन कर पूरी छटा को अपनी लालिमा से ढक लेंगी। होली आते आते पलाश अपने रूप रंग में आने लगता है और ये आज की बात नहीं है। पहले जब रासयनिक रंग नहीं होते थे होली का त्योहार टेसू से बनाए गए गुलाल से लहकता महकता था। आदिवासी समाज तो प्राकृतिक रंगों का प्रयोग शुरु से करता आया है। वक्त के साथ इनके इस्तेमाल की प्रवृति आम जन मानस में भी बढ़ी है।

लग गयी आग; बन में पलाश, नभ में पलाश, भू पर पलाश
लो, चली फाग; हो गयी हवा भी रंगभरी छू कर पलाश

गर्मियों में पलाश का सुर्ख नारंगी रंग जंगल की आग की तरह सखुआ के जंगलों में यहाँ वहाँ फैलता है। बसंत में जहाँ सखुआ अपनी हरीतिमा और अपने हल्के पीले फूलों से हमारी आँखों को तरोताज़ा रखता है वही पलाश की लाली 
अपनी लहक से उस हरियाली को और मनोहर बना देती है।
सखुआ के हरे भरे जंगल और उनके बीच से झांकता पलाश


जनजातीय समाज में सखुआ के वृक्षों का विशेष महत्त्व रहा है। प्रकृति पर्व सरहुल जो कि आदिवासी नववर्ष के रूप में मनाया जाता है में सखुआ की पूजा की जाती है और स्त्रियाँ उसके पुष्प सिर में लगा कर नृत्य करती हैं। जंगल से जुड़े आदिवासी समुदाय में हर व्यक्ति को सखुआ के पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है। शायद यही वज़ह है झारखंड, छत्तीसगढ़, बंगाल और उड़ीसा के जंगलों में प्राकृतिक साधनों के दोहन के बाद भी सखुआ के जंगल बहुतायत में हैं। वसंत में सेमल और गर्मियों में पलाश सखुआ के इस एकछत्र साम्राज्य को तोड़ता है।


सखुआ के वृक्षों से अलग पलाश के वृक्ष यत्र तत्र बिखरे नज़र आते हैं। दूर से इन्हें देख के ऐसा लगेगा कि धूप से पीली पड़ चुकी धरती पर किसी ने आधर उधर नारंगी स्याही छिड़क दी हो। 

सखुआ के जंगलों के सामने बिखरे पलाश वृक्ष

लो, डाल डाल से उठी लपट! लो डाल डाल फूले पलाश
यह है बसंत की आग, लगा दे आग, जिसे छू ले पलाश

एक पंक्ति में जमे पलाश के वृक्षों की मोहक कतार

बहुत से बहुत तो एक सीध में इनके पेड़ों का झुरमुट तो मिल जाएगा पर उसका विस्तार कभी सखुआ जैसा नहीं होता। पलाश ज्यादा ऊँचे भी नहीं होते। एक सीध ऊँचाई में बढ़ना इनकी फितरत में नहीं है। बस टेढ़े मढ़े होकर इधर से उधर झूलते रहेंगे। कभी सखुआ तो कभी महुआ तो कभी खजूर जैसे वृक्षों के साथ। भगवन ने इन्हें इतने सुंदर फूलों का उपहार दिया पर साथ में ये नियति भी कि जब वृक्ष फूलों से भरा रहेगा तो उसके नीचे बैठने वालों को पत्तों की छाँव भी नसीब नहीं होगी।


पलाश का भी धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग होता है पर उतना नहीं जितना सखुआ का। पलाश के व्यवसायिक उपयोग ज्यादा हैं। रंगों के लिए इसके फूल का और बतौर दवा के लिए इस पेड़ की छाल, बीज का प्रयोग करने की प्राचीन परंपरा है। इसके पत्तों का उपयोग आदिवासी क्षेत्रों में खाने के पत्तल या सब्जी रखने के लिए दोना बनाने में किया जाता रहा है। हालांकि आजकल इसके पत्तों को दरकिनार कर प्लास्टिक प्लेटेों का चलन बढ़ता जा रहा है।

सुवर्णरेखा नदी के तट पर

इनके बारे में एक नई बात ये पता चली कि जब जंगल के बाकी पेड़ों को उगने के क्षमता जाती रहती है तो वहां पलाश अपनी कमान संभालते हैं। यही वज़ह है की पलाश जंगल की बाहरी परिधि के आस पास अकेले में अपना आशियाना बनाते हैं।
खजूर के पेड़ों के साथ

फूलों से लदे पलाश के वृक्ष


पलाश को ढाक के नाम से भी जाना जाता है। वही ढाक के तीन पात वाला मुहावरा भी इसी वृक्ष से आया है क्यूँकि इसकी किसी भी टहनी से निकली शाखाओं में बस तीन ही पत्ते रहते हैं। बहुत लोगों को ये शिकायत रहती है कि अन्य फूलों की तुलना में पलाश मुश्किल से दो हफ्ते से ज्यादा नहीं ठहरता। कबीर इसलिए पलाश के बारे में कह गए हैं..

दस दिन फूला फूल के खंखड़ भया पलास 

पर अपनी इन दो तीन हफ्तों की झलक में ही पलाश गर्मी के रूखे सूखे मौसम में आंखों को तृप्त कर देते हैं।



उत्तर प्रदेश के साथ साथ पलाश झारखंड का भी राजकीय पुष्प है। झारखंड में आपको पलाश के पेड़ों से रूबरू होने के लिए जंगलों की ओर किसी भी दिशा में निकलना काफी है। भारतीय रेलवे की दया से डिब्बे की खिड़कियाँ कभी इतनी साफ रहती नहीं कि बढ़िया तस्वीरें ली जा पाएँ। इसलिए जब भी मार्च अप्रैल में ट्रेन से बाहर निकलने का मौका लगता है तो मेरा आधा वक्त डिब्बे के दरवाजे के पास ही बीतता है। दामोदर, सुवर्णरेखा, जमुनिया जैसी नदियों के पाट पर दूर दूर तक फैले इन पेड़ों को देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है। ट्रेन से इन पेड़ों का फैलाव सड़क की तुलना में एक ऊँचाई से दिख पाता है।
जहां जंगल खत्म हो जाते हैं वहां भी पलाश खड़ा हो जाता है।

खुजूर और पलाश की दोस्ती

नदी के किनारों को भी पलाश पसंद है।


खेत खलिहानों के बीच




देश के पूर्वी हिस्से में गर मार्च अप्रैल के महीने में रुख करें तो इस नारंगी फूल के दर्शन से ना चूकें। भविष्य में इस ब्लॉग पर नई पोस्ट की सूचना पाने के लिए सब्सक्राइब करें। 

Tuesday, February 22, 2022

सड़क मार्ग से चलिए राँची से राउरकेला तक Road Trip from Ranchi to Rourkela

राँची से राउरकेला तक अक्सर ट्रेन से जाना होता रहा है। ट्रेन बड़े मजे में तीन घंटे में वहाँ पहुँचा देती है। कर्रा, लोधमा, गोविंदपुर रोड, बकसपुर जैसे स्टेशनों से होते हुए बानो पहुँचिए और फिर वहाँ से झारखंड और ओड़िशा के सीमावर्ती घने जंगलों का आनंद लेते हुए नुआगाँव में प्रवेश कर जाइए। बरसात में इन पठारी इलाकों के बीच की धान की खेती और गर्मियों में सेमल और पलाश के फूलों को खिलता देखना पूरे सफ़र में आँखों को तरोताज़ा रखता है।

सकल बन फूल रही सरसों

पर इस बार मुझे मौका मिला इसी दूरी को सड़क से नापने का। अभी मौसम का हाल तो ये है कि फरवरी में भी पूरी तरह ठंड जाने का नाम नहीं ले रही इसलिए सेमल के फूलों की लाली देखने को नहीं मिली। हाँ सरसों के हरे पीले खेतों ने नज़ारा रंगीन जरूर कर दिया।

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