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गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

कानाताल की वो खूबसूरत सुबह !


कानाताल में हमारा कमरा पश्चिम दिशा की ओर खुलता था। इसलिए हमारी हर सुबह की शुरुआत होती थी चंद्र देव के दर्शन से। पर्वतों पर फैलती सूर्य किरणों की लालिमा हमारे चंदा को संकेत कर देती थीं कि अब तुम्हारी रुखसती का वक़्त आ गया है और चंदा जी भी इशारा समझ धीरे धीरे नीचे खिसकना शुरु कर देते।


अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में पूर्णिमा पास ही पड़ी थी इसलिए चाँद अपनी पूर्णता के साथ हमें रिझा रहा था। हम भी सुबह की ठंड की परवाह किए बिना बॉलकोनी में खड़े होकर चंद्रमा के इस अद्भुत रूप को निहारा करते थे।  



सोमवार, 3 दिसंबर 2012

आइए चलें गढ़वाल हिमालय की गंगोत्री समूह की चोटियों की सैर पर!

कानाताल में बिताया गया तीसरा दिन सुबह से ही काफी व्यस्त रहा। सवा तीन किमी की मार्निंग वॉक और नाश्ते को निबटाने के बाद हम टिहरी बाँध (Tehri Dam) गए और फिर वहाँ से लौटकर दोपहर में धनौल्टी (Dhanaulti) होते हुए मसूरी के लिए निकल गए।  कानाताल, टिहरी और फिर धनौल्टी जाते समय हमें गढ़वाल हिमालय की अलग अलग चोटियों के दर्शन हुए। इसमें वो चोटी भी शामिल थी जिसे पहचानने के लिए एक प्रश्न आपसे मैंने पिछली पोस्ट में पूछा था। जैसा कि आपको पिछली पोस्ट में बताया था कि मैंने इन चोटियों का नाम पता करने के लिए नेट पर उपलब्ध नक़्शों और चित्रों की मदद ली। दो तीन रातों की मेहनत से मैं अपने कैमरे द्वारा खींचे अधिकांश चित्रों में दिख रही चोटियों को पहचान सका। सच पूछिए तो जैसे जैसे ये अबूझ पहेली परत दर परत खुल रही थी, मन आनंदित हुए बिना नहीं रह पा रहा था।  तो चलिए आज की पोस्ट में आपको ले चलता हूँ गढ़वाल हिमालय  की गंगोत्री समूह की चोटियों के अवलोकन पर ।

कानाताल (Kanatal) के क्लब महिंद्रा रिसार्ट के ठीक सामने जंगल के बीच से जाता ट्रेकिंग मार्ग है। जैसे ही आप जंगलों के बीच चलना शुरु करते हैं लंबे वृक्षों के बीच से गढ़वाल हिमालय की चोटियाँ दिखने लगती हैं। पर घने जंगलों की वजह से आपको क़ैमरे में क़ैद करने के लिए करीब सवा किमी तक चलना पड़ता है। इस जगह पर सामने कोई वृक्ष नहीं हैं। कानाताल से सबसे पहले जिस पर्वत चोटी का दीदार होता है उसका नाम है बंदरपूँछ ! वैसे लोग कहते हैं कि बंदर की पूँछ के आकार का होने के कारण इसका ये नाम पड़ा।  मुझे तो इस चोटी के ऊपरी स्वरूप को देखकर ऐसा नहीं लगा पर वो कहते हैं ना कि सही पहचान करने के लिए वो नज़र होनी चाहिए जो शायद विधाता ने मुझे नहीं बख्शी।:)
 तीन चोटियों के ऊपर गर्व से आसन जमाए बैठी बंदरपूँछ की जुड़वाँ चोटियाँ

बुधवार, 21 नवंबर 2012

Unconference @ Kanatal : कानाताल में बिताया वो अविस्मरणीय दूसरा दिन !

पहले दिन की यात्रा के बाद थकान काफी हो गई थी। अगली सुबह जल्दी उठने का मन नहीं होते हुए भी हिमालय पर्वत श्रृंखला की चोटियों पर पड़ती धूप की पहली किरणों को देखने की उत्सुकता ने हमें छः बजे ही जगा दिया था। मेरे रूम पार्टनर दीपक  भी तैयार थे इस सुबह की सैर के लिए। सो करीब साढ़े छः बजे हम अपने रिसार्ट से बाहर आ गए। सड़क की दूसरी तरफ़ ही एक ट्रैकिंग मार्ग था। हम तेज कदमों से उस पर चल पड़े। थोड़ी दूर चलने के बाद ही पेड़ की झुरमुटों से हिमालय पर्वत श्रृंखला दिखने लगी। 



पर ये क्या ! कैमरे को चालू करते ही उसमें मेमोरी कार्ड एरर (Memory Card Error) दिखने लगा।। रात तक अच्छा भला कैमरा सुबह जल्दी उठाने पर एक बच्चे की तरह नाराज़ हो गया था। मेरे चेहरे पर चिंता की लकीरें देख कर दीपक ने कार्ड को निकाल कर फिर से कैमरा चालू करने की सलाह दी। पर कार्ड किसी भी तरह मानने को तैयार ही नहीं था। नतीजन जॉली ग्रांट से लेकर शाम और फिर रात के कानाताल की तसवीरें कार्ड में ही दफ़न हो गयीं। बेवकूफी ये की थी कि अतिरिक्त कार्ड ले कर भी नहीं चला था। मायूस मन से मैं चुपचाप दीपक के साथ हो लिया। पगडंडी के एक ओर चीड़ और देवदार के वृक्षों से भरा पूरा घना जंगल था।

कभी कभी इनके बीच से बर्फ से ढकी चोटियों की झलक मिल जाती थी। पर एक किमी तक चलने के बाद भी पर्वतश्रृंखला का अबाधित दृश्य हम नहीं देख पा रहे थे। Unconference के लिए तैयार भी होना था इसलिए अगली सुबह फिर इसी मार्ग पर दूर तक जाने का निश्चय कर हम वापस लौट चले।


शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

Conclay @ Kanatal : साथी यात्रा ब्लागरों के साथ बिताया वो खुशनुमा पहला दिन !

पिछली बार सिक्किम में ट्रैवेल ब्लॉगर कांफ्रेस में ना जाने का अफ़सोस था पर जापान की यात्रा ऐसे अवसर पर आ गई थी कि मेरे पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं बचा था। पर अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में जब CLAY की ओर से दूसरी बार ऐसी ही एक कांफ्रेस में शामिल होने की गुजारिश की गई तो मेरे मुँह से पहले ना ही निकला क्यूँकि जिन तिथियों पर CONCLAY का आयोजन हो रहा था उस अंतराल में मैं पहले ही दक्षिण महाराष्ट्र के लिए अपना सपरिवार घूमने का कार्यक्रम बना चुका था। 29 को मुंबई से राँची वापसी की टिकट भी हो चुकी थी। पर अचानक ही ये ख्याल आया कि दक्षिण महाराष्ट्र की यात्रा तो 26 रात तक  खत्म हो रही है। बाकी दिन तो रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने के लिए रखे थे। अगर श्रीमतीजी को वापस अकेले लौटने को तैयार कर लिया जाए और क्लब महिंद्रा वाले मुंबई से मुझे पिक अप कर लें तो कानाताल जाना संभव हो सकता है।


जब मैंने घुमक्कड़ ब्लॉगरों की इस कांफ्रेंस के बारे में पत्नी को बताया तो वो अनिच्छा से ही सही राजी हो गयीं। क्लब महिंद्रा वाले मेरे मुंबई से यात्रा करने के लिए पहले ही हामी भर चुके थे। गणपतिपूले, सिंधुदुर्ग, कोल्हापुर, पुणे होते हुए हम 26 अक्टूबर की आधी रात को मुंबई से करीब अपने अड्डे अंबरनाथ पहुँचे। मेल चेक करने पर पता लगा कि मुझे अपने साथियों से 28 की सुबह पाँच बजे मुंबई हवाई अड्डे पर मिलना है। पाँच बजे का मतलब था कि अंबरनाथ से रात तीन बजे ही निकल चलूँ। अब जहाँ छुट्टियों के लिए भाई बहनों के सारे परिवार एक जगह वर्षों बाद इकठ्ठा हों वहाँ रात के बारह एक बजे से पहले कहाँ सोना हो पाता है। रात डेढ़ बजे से एक घंटे के लिए बस आँखें भर बंद कीं। नींद ना आनी थी, ना आई। करीब सवा तीन बजे मैं सबसे विदा ले कर घर से निकल पड़ा। यूँ तो अंबरनाथ (जो कि कल्याण से लगभग दस किमी दूर है) से मुंबई हवाईअड्डे का सफ़र आम तौर पर ट्रैफिक की वज़ह से दो ढाई घंटे में पूरा होता है पर सुबह का वक़्त होने की वज़ह से मैं सवा घंटे में ही पहुँच गया। बीच में अँधेरी में सड़क किनारे गाड़ी रुकवा चाय की चुस्कियाँ भी लीं। सुबह के साढ़े चार बजे जब हवाई अड्डे पर पहुँचा तो वहाँ कोई जाना पहचाना चेहरा दिख नहीं रहा था। वैसे भी मुंबई से जिन चार लोगों को जाना था उनमें से किसी से पहले मैं मिला भी नहीं था। पर ये जरूर था कि अपनी मुखपुस्तिका यानि फेसबुक की बदौलत इनमें से कुछ की शक़्लों का खाका दिमाग में था।