रविवार, 3 दिसंबर 2023

सीता जलप्रपात राँची का अनसुना पर खूबसूरत जलप्रपात Sita Falls, Ranchi

रांची को जलप्रपातों का शहर कहा जाता है। हुंडरू, दशम, जोन्हा, पंचघाघ, हिरणी और सीता जैसे ढेर सारे छोटे बड़े झरने बरसात के बाद अगले वसंत तक अपनी रवानी में बहते हैं यहां। पर बरसात के मौसम के तुरंत बाद यानी सितंबर और अक्टूबर के महीने में इन्हें देखने का आनंद ही कुछ और है। यही वो समय होता है जब झरनों में पानी का वेग और जंगल की हरियाली दोनों ही अपने चरम पर होती है।

रांची के सबसे लोकप्रिय जलप्रपातों में सबसे पहले हुंडरू, दशम और जोन्हा का ही नाम आता है। इसकी एक वज़ह ये भी है कि इन जगहों पर आप पानी के बिल्कुल करीब पहुंच सकते हैं।  मैं इन सभी झरनों तक कई बार जा चुका हूं पर जोन्हा के पास स्थित सीता जलप्रपात तक मैं आज तक नहीं गया था। सीता फॉल रांची से करीब 45 किमी की दूरी पर रांची पुरुलिया मार्ग पर स्थित है। 

सीता जलप्रपात का विहंगम दृश्य



जलप्रपात का ऊपरी हिस्सा

एक ज़माना था जब रांची से बाहर निकलते ही रास्ते के दोनों ओर की हरियाली मन मोह लेती थी पर बढ़ते शहरीकरण के कारण अब वो सुकून नामकुम और टाटीसिल्वे के ट्रैफिक को पार करने के बाद ही नसीब होता है।

सखुआ के जंगलों के बीच जलप्रपात की ओर जाती सीढियाँ 

मैं जब वहां पहुंचा तो टिकट संग्रहकर्ता और गार्ड के अलावा वहां कोई नहीं था। हमारे आने के बाद तीन चार परिवार वहां जरूर नज़र आए। फॉल के नजदीक तक पहुंचने के लिए 200 से थोड़ी ज्यादा सीढियां हैं। जंगल के बीचो बीच जाती इन सीढ़ियों के दोनों ओर साल के ऊंचे ऊंचे वृक्ष सूर्य किरणों का सबसे पहले स्वागत करने के लिए प्रतिस्पर्धा में रहते हैं।

जलप्रपात की पहली झलक

पहले वो जगह थोड़ी सुनसान थी। नीचे तक सीढियाँ ढंग से बनी नहीं थीं इसलिए वहां लोग जाना कम पसंद करते थे। लेकिन अब  वहां पार्किंग के साथ नीचे जाने का रास्ता भी बेहतरीन हो गया है। हां ये जरूर है कि यहां झरने के बिल्कुल पास पहुंचने के लिए आपको चट्टानों के ऊपर से चढ़ कर जाने की मशक्कत जरूर करनी पड़ेगी। वैसे अगर मौसम बारिश का हो तो ऐसा बिल्कुल मत कीजिएगा क्योंकि तब चट्टानों पर फिसलन ज्यादा ही हो जाती है।


रामायण और महाभारत की कहानियों से हमारे देश में सैकड़ों पर्यटन स्थलों को जोड़ा जाता है। सीता जलप्रपात भी इसी कोटि में आता है। कहा जाता है कि वनवास के समय भगवान राम सीता जी के साथ जब इस इलाके में आए तो उनकी रसोई के लिए इसी झतने का जल इस्तेमाल होता था। इस जलप्रपात को जाते रास्ते में लगभग एक किमी पहले सड़क के दाहिनी ओर एक बेहद छोटा सा मंदिर है। इस मंदिर में माँ सीता के पदचिन्हों को सुरक्षित रखा गया है।


कम सीढियाँ होने की वज़ह से आप यहाँ परिवार के वरीय सदस्यों के साथ भी आ सकते हैं। तीन चौथाई सीढियाँ पार कर ही पूरे जलप्रपात की झलक मिल जाती है। यहाँ बनाई सीढियाँ  भी चौड़ी और उतरने में आरामदायक हैं। हाँ जोन्हा या हुँडरू की तरह यहाँ जलपान की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसा इसलिए भी है कि यहाँ लोगों की आवाजाही राँची के अन्य जलप्रपातों की तुलना में काफी कम है।

जलप्रपात से बदती जलधारा जो आगे जाकर राढू नदी में मिल जाती है।

सीता जलप्रपात राढू नदी की सहायक जलधारा पर स्थित है इसलिए यहाँ पानी का पूरा प्रवाह बरसात और उसके बाद के दो तीन महीनों में ही पूर्ण रूप से बना रहता है। इसलिए यहाँ अगस्त से नवंबर के बीच आना सबसे श्रेयस्कर है। बरसात के दिनों में जल प्रवाह के साथ चारों ओर फैली हरियाली भी मंत्रमुग्ध कर देगी। सीता जलप्रपात के पाँच किमी पहले ही जोन्हा का भी जलप्रपात है। इसलिए जब भी यहाँ आएँ पहले इस झरने के दर्शन कर के ही जोन्हा की ओर रुख करें क्योंकि जोन्हा उतरना चढ़ना थोड़ा थकान भरा है। 

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