नैनीताल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नैनीताल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 7 जुलाई 2014

एक सुबह और एक रात शहर-ए-नैनीताल की Nainital : Morning and night scenery

कौसानी और फिर बिनसर जाने के पहले मैं नैनीताल में दो दिन रुका था। नैनीताल में भी ज्यादा समय हमने शहर से दूर स्थित तालों को देखने में बिताया। फिर भी जो वक़्त हमें सुबह और शाम को वापस लौटने पर मिलता था उसका सदुपयोग हमने शहर ए नैनीताल देखने के लिए जरूर किया। हमारा गेस्ट हाउस नैनीताल के नामी होटल मन्नू महारानी के पास मल्लीताल इलाके में था। वैसे जो लोग नैनीताल ना गए हों उन्हें बता दूँ कि मल्लीताल और तल्लीताल नैनी झील के उत्तरी और दक्षिणी सिरे पर स्थित नैनीताल के दो प्रमुख इलाके हैं। नैनीताल की पहली सुबह तो हम सैर को नहीं निकल पाए क्यूंकि दिल्ली से नैनीताल के सफ़र की थकान ने हमें सात बजे के पहले उठने ही नहीं दिया।


पर दूसरे दिन सुबह की सैर के लिए हम हाइकोर्ट जाने वाली सड़क पर निकल पड़े। वैसे अंग्रेजों ने ये शानदार इमारत 1900 में बनाई थी। दूर से देखने से आप इसके यूरोपीय स्थापत्य को आसानी से पहचान सकते हैं। हाइकोर्ट के सामने स्थित बाग इसकी खूबसूरती को और बढ़ा देता है। हाइकोर्ट के पीछे नैना का पर्वत शिखर है जो कि नैनीताल का सबसे ऊँचा शिखर है।


सोमवार, 30 जून 2014

झीलें नैनीताल की : भीमताल और सतताल Lakes of Nainital : Bhimtal and Sattal

पिछली दफ़े आपको नैनीताल कै नौकुचियाताल और उसके आस पास की प्राकृतिक सुंदरता की एक झलक दिखलाई थी। इसी कड़ी में आज बारी है भीमताल और सतताल की। वैसे तो लोग गर्मियों में भी तालों के इस शहर में जाते हैं क्यूँकि तभी बच्चों की छुट्टियाँ भी होती हैं। पर अगर नैनीताल की खूबसूरत वादियों का अकूत सौंदर्य आपको अपने कैमरे में क़ैद करना हो तो अक्टूबर के उत्तरार्ध या फिर नवंबर में यहाँ जरूर जाएँ। देवदार के जंगलों के बीच गहरा नीला आसमान आपके स्वागत के लिए हमेशा तैयार मिलेगा। 

अक्टूबर के पहले हफ्ते की सुबह भी कुछ ऐसी ही सुबह थी। अपने गेस्टहाउस से बाहर चहलकदमी करने निकला तो इन चार पेड़ों को बुलंदी से सीना ताने खड़ा पाया। पेड़ों के पत्ते सूख चुके थे पर फिर भी वो ऐसे खड़े थे मानो इससे उन्हें कोई फर्क ना पड़ता हो। 


सुबह जब हम नैनीताल के तालों का दर्शन करने निकले तो घड़ी की सुइयाँ साढ़े दस बजा रही थीं। मौसम का मिजाज़ सुबह की अपेक्षा बदल सा गया था। आकाश में बादल की हल्की परत नीले आकाश को मटमैला बना चुकी थी। जब तक हम नैनीताल की भीड़ भाड़ से निकल 22 किमी की दूरी पर स्थित भीमताल पहुँचे साढ़े ग्यारह बज चुके थे।


अब नाम भीमताल है तो महाबली भीम से जुड़ी कहानियाँ भी होंगी। कहते हैं पांडवों के निर्वासन के समय भीम यहाँ पधारे थे। वैसे ये झील भीमकाय तो नहीं फिर पौने दो किमी लंबी और लगभग आधा किमी चौड़ी जरूर है। झील के पास ही भीमेश्वरमहादेव का मंदिर भी है जो सत्रहवीं शताब्दी में यहाँ के कुमाऊँ राजाओं ने बनाया था। यानि भीमताल का अस्तित्व नैनीताल से भी पुराना है।



रविवार, 22 जून 2014

नौकुचियाताल : शांति और सुंदरता का अद्भुत समन्वय Naukuchiatal : Beauty in tranquility !

कौसानी, बिनसर और अपनी नैनीताल यात्रा को आगे बढ़ाते हुए आज चलते हैं नैनीताल के सबसे खूबसूरत ताल नौकुचियाताल की ओर। वैसे प्राकृतिक सुंदरता की बात करें तो सात ताल और खुरपा ताल भी ज्यादा पीछे नहीं रहेंगे पर अपने नौ किनारों के विस्तार और उनके पार्श्व में ओक के जंगलों को समेटे इस ताल के किनारे किनारे चलना या फिर इसमें नौका विहार करना कम से कम मेरे लिए एक अविस्मरणीय अनुभव रहा। 

पेड़ों की इस धानी छाँव का सुख कोई इस झील से पूछे !
अक्टूबर के महीने में जब हम नैनीताल से चौबीस किमी की दूरी पर स्थित इस झील के पास पहुँचे तो आसमान में बदली छाई थी। इस झील की सबसे बड़ा आकर्षण इसके किनारे लगे वृक्षों की कतारें और उन पर पास की पहाड़ियों से नज़र रखते घने जंगल थे। बादलों ने सूरज की रोशनी पर ऐसा पहरा लगाया था कि गहरे हरे रंग के पत्तों और धानी पत्तों के पेड़ एक दूसरे से बिल्कुल पृथक नज़र आ रहे थे। रंगों का ये विभेद हमारे सामने जो दृश्य उपस्थित कर रहा था वो मेरी स्मृतियों से ना निकला है ना निकल सकेगा। 

बोलो कैसे अपनी प्रीत दिखाऊँ.. धानी चुनरिया ओढ़ मैं साजन पे झुक जाऊँ !

ऐसा लगता था मानो पानी में खड़े ये खिले खिले से पेड़ झील के जल से अपना ममत्व दर्शा रहे हों। पेड़ों की झुरमुट में खड़ी बत्तखनुमा नौकाएँ और उनके बीच से निकलकर किनारे आते इस बत्तख के समूह को कैमरे में क़ैद करने का आनंद को बस महसूस ही किया जा सकता है।

देखो मैंने देखा है ये इक सपना झीलों के शहर में हो घर अपना..