Sunday, March 8, 2020

उत्तरी कारो नदी पर स्थित रमणीक पर्यटन स्थल पेरवाघाघ Perwaghagh Falls, Khunti

राँची से सटा झारखंड का एक जिला है खूँटी। लोकसभा में उप सभापति रह चुके कड़िया मुंडा इस लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे। कड़िया मुंडा की विरासत तो आज केंद्र में आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा सँभाल रहे हैं पर इन बड़े कद के नेताओं से ज्यादा खूँटी का जिक्र नक्सलवाद, अफीम की खेती और पत्थलगड़ी जैसे मसलों की वज़ह होता रहा है। ऐसी परिस्थितियों में पर्यटन के लिहाज से शायद ही राँची आने वाला कोई शख्स अब तक इस ओर रुख करता था।

पेरवाघाघ से सटी पहाड़ी के शीर्ष पर पहुँचने के बाद
फिर भी इस इलाके में सड़कों का जाल बिछने से कई जगहें जो पहुँच से दूर थीं वो अब आम जनता के दायरे में आ गयी हैं। खूँटी जिले की ऐसी ही एक खूबसूरत जगह है पेरवाघाघ।  राँची से करीब 75 किमी दूर इस रमणीक स्थल तक पहुँचने के लिए पहले राँची से खूँटी और फिर आगे तोरपा का रास्ता पकड़ना पड़ता है। तोरपा थाना के ठीक पहले एक सड़क बाँयी ओर मुड़ती है जो गाँव देहात के कई मोड़ों को पार करते हुए पेरवाघाघ पहुँचती है।

खूँटी से तोरपा के रास्ते एक बेहद लोकप्रिय शिव धाम है। पेरवाघाघ जाते समय कुछ देर वहाँ रुकना हुआ। कहते हैं कि यहाँ आम के वृक्ष के नीचे से शिवलिंग के निकलने के कारण इसका नाम आम्रेश्वर धाम पड़ा। शिव के आलावा यहाँ दुर्गा, पार्वती, सीता, भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमान गणेश और राधा कृष्ण को समर्पित मंदिर भी हैं पर लोग मुख्यतः यहाँ भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं। आम्रेश्वर धाम की पहचान दूर से दिखने वाले लगभग दो सौ फीट ऊँचे बने मीनार से होती है जिसके नीचे माँ दुर्गा का मंदिर है। इसी  वज़ह से ये धाम अंगराबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है।

आम्रेश्वर धाम परिसर में स्थित विभिन्न मंदिर
झारखंड का वास्तविक ग्रामीण जीवन देखना हो तो किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग से निकलती दुबली पतली सड़कों पर उतर लीजिए। हालांकि झारखंड की ज्यादा भूमि पठारी है फिर भी गाँव के लोगों की जीविका का ज़रिया खेती और पशुपालन ही है। पहाड़ियों और जंगलों के बीच बसे इन गाँवों को जंगल से लकड़ी और मवेशी चराने के लिए जगह भी मिल जाती है। ऐसे ही तीन चार गाँव पार कर जब हम पेरवाघाघ पहुँचे तो वहाँ सैलानियों की भीड़ पहले से ही मौज़ूद थी। वैसे भी जनवरी के महीने में ऐसी जगहों में लोग भारी तादाद में दिन भर पहुँचते  रहते हैं। 


अगर आपको पेरवाघाघ नाम कुछ अजीब लग रहा हो तो बता दूँ कि स्थानीय भाषा में पेरवा कबूतर को कहते हैं। रही बात घाघ की तो हिंदी में ये शब्द एक धूर्त या कुटिल व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होता है पर झारखंड में घाघ से मतलब ऊँचाई से गिरते पानी यानी झरने के लिए प्रयुक्त होता है। पहली बार मेरा इस शब्द से परिचय झारखंड के सबसे ऊँचे जलप्रपात लोध के झरने में जाते वक़्त हुआ था। वहाँ लोग उसे बूढ़ा  घाघ के नाम से पुकारते हैं।

 बेहद साफ सुथरी है यहाँ कारो नदी
किसी ज़माने में यहाँ की पहाड़ी गुफाओं में कबूतरों का वास था। मैंने भी कोशिश की ये देखने कि क्या आज भी उनका वहाँ बसेरा है पर मुझे निराशा ही हाथ लगी। आजकल पिकनिक मनाने में सामिष भोजन और तेज संगीत बजाने की अनिवार्यता हो गई है। स्थानीय झारखंडी संस्कृति तो इसमें और भी रमी हुई है इसलिए परिंदे भी वैसी जगहों से दूर होते जा रहे हैं जहाँ मनुष्य अपने स्वछंद आचरण से उनके लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है। 

पेरवाघाघ की झलक पाने के लिए पहाड़ों के बीच बहती उत्तरी कारो नदी के तट पर नीचे तक उतर कर नदी पार करनी पड़ती है। उत्तरी कारो नदी का उद्गम राँची के पश्चिमी छोर पर खूँटी के पठारी इलाके से होता है। वहाँ से बहते हुए  ये सारंडा सिंहभूमि के जंगलों में प्रवेश करती है और कई सारे घुमाव लेते हुए दक्षिणी कोयल नदी में मिल जाती है। मैंने आपको एक बार राउरकेला के वेद व्यास की सैर कराई थी। वहाँ इसी दक्षिणी कोयल और शंख नदी के संगम से ब्राह्मणी नदी की शुरुआत होती है।

उत्तरी कारो नदी इस दिशा में बढ़ती हुई प्रवेश करती है सारंडा सिंहभूमि के वन्य क्षेत्र में
आंगुतकों की सुविधा के लिए यहाँ के स्थानीय लोगों ने लकड़ी का एक पुल बनाया है जिसे पार करने के लिए आपको पाँच रुपये का एक छोटा सा शुल्क देना होता है। यहाँ से होने वाली आय से स्थानीय, पूरे परिसर की साफ सफाई करते हैं और लोगों पर नज़र भी बनाए रखते हैं। 

पेरवाघाघ पर पहुँचते के साथ ही बिना वक़्त गँवाए पुल पार कर पास की मैंने पास की पहाड़ी पर चढ़ाई शुरु की। कारो नदी घाटी का घुमाव कुछ ऐसा है कि बिना पहाड़ी पर चढ़े आप झरने को नहीं देख सकते। 

पेरवाघाघ का सुंदर जलप्रपात
पेरवाघाघ का झरना भले ही छोटा सा हो पर पचास फीट की ऊँचाई से गिरते पानी के बाद बनने वाला गहरे हरे रंग का जलाशय और उसके बाद की संकरी घाटी इसकी खूबसूरती को बढ़ा देते हैं। झरने तक पहुँचने के लिए एक जुगाड़ वाली नाव भी है जो दोनों छोर में बँधी रस्सी की मदद से आपको झरने के बेहद करीब ले आती है।वहां पहुंचने पर आप  पानी के गिरने से हवा में उठती फुहारों को  शरीर पर महसूस कर सकते हैं।  वैसे भी अब अगर झरने के नीचे नहाना संभव नहीं हो तो फुहारों से ही संतोष करना पड़ेगा ना।

लकड़ी की नैया.. चलाए खिवैया
मैंने सोचा कि क्यूँ ना पहले ऊपर ऊपर चलते हुए झरने के शीर्ष पर पहुँचा जाए पर थोड़ा आगे बढ़ने पर एक खाई सामने आ गयी। मन मसोस कर मुझे वहाँ से वापस लौटना पड़ा। नौका पर आते जाते लोगों के उत्साह को देख कर झरने को छू कर आने की इच्छा जागी और मैं भी पंक्ति में लग गया। ये निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ। सच मजा आ गया रस्सी के सहारे खिंचती इस नौका विहार का।

पास आता झरना :)

झरने के पास गिरती फुहारों का आनंद !

पहाड़ की चढ़ाई भी हो गयी और झरने तक की नौका यात्रा भी। समय अभी भी काफी था तो सोचा चलो आगे बहती नदी के साथ भी कुछ दूर चल लिया जाए। पत्थर यूँ तो सूखे थे पर उनके बीच से कूदते फाँदते चलना इतना आसान भी नहीं था। कई लोगों को उन पत्थरों पर फिसलते देखा और देखते देखते कुछ देर बाद मेरे भी कदम डगमगा गए और मैं गिरते गिरते बचा। धूप भी बढ़ती जा रही थी और लोगों की भीड़ भी। अगर माहौल शांत रहता तो नदी के तट पर इन चट्टानों के साथ साथ चलते चलते बड़े आराम से कुछ समय बिताया जा सकता था।

कारो इन्हीं विशाल शिलाओं के बीच से आपना आगे का रास्ता बनाती है।

 उत्तरी कारो का चट्टानी पाट  



धूप से बचने के लिए अब जंगल ही एक सहारा थे। पक्षी तो दिखे नहीं पर कुछ शानदार पेड़ जरूर दिखे। अब इस लाल पीले फूलों से लदे इस वृक्ष को देखिए। दरअसल ये एक परजीवी झाड़ी है जो अपने भोजन के लिए किसी पेड़ से एक विशेष संरचना से जुड़ जाती है और उसी के इर्द गिर्द फलती फूलती है। अंग्रेजी में इस तरह के वृक्ष Mistletoe के अंदर  वर्गीकृत किए जाते हैं। जंगल में कुछ वक़्त ऐसे ही कुछ और आकर्षक पेड़ों की छवियाँ खींचते हुए बीता और फिर मैंने वापसी की राह पकड़ी।

लाल पीले फूलों से सजा एक परजीवी पेड़

सूखी पत्तियँ के बावज़ूद इस पेड़ पर नज़र ठहर ठहर जाती थी

 पत्तियाँ तो मनोहारी हैं पर उन तक पहुँचने का रास्ता काँटो भरा है।

पेरवाघाघ में क्या करें और क्या ना करें

  • वैसे तो पेरवाघाघ सालों भर जाया जा सकता है पर अप्रैल से जून के बीच नदी के खुले पाट में चलना गर्मी की वजह से आनंद के बजाए पसीने ही छुड़वाएगा। वहीं दिसंबर और जनवरी के महीनों में यहाँ भीड़ काफी होती है इसलिए उसके पहले या बाद में यहाँ जाने की योजना बनाएँ। 
  • तोरपा तक तो बसें चलती हैं पर आखिर के सोलह किमी की दूरी किसी निजी वाहन से ही पूरी की जा सकती हैं। 
  • नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने की वजह से चार बजे के बाद यहाँ ठहरना श्रेयस्कर नहीं है। 
  • झरने के पास पानी गहरा है। वहाँ नहाना जोखिम को आमंत्रण देना है। 
  • मुझे संगीत खुद बेहद प्रिय है पर ऐसी जगहों में म्यूजिक सिस्टम और उसे चलाने के लिए डी जी सेट ले जाना कहाँ की समझदारी है? यहाँ आएँ तो प्रकृति का संगीत सुने जो झूमते पेड़ों, नदी व झरने की बहती धारा व पक्षियों के कलरव से निकलता है।
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Sunday, February 23, 2020

आइए चलें पक्षियों की दुनिया में अंबाझरी जैवविविधता उद्यान, नागपुर Ambazari Biodiversity Park, Nagpur

नागपुर यूँ तो अपने चारों ओर तरह तरह के अभ्यारण्यों को समेटे है बस शहर के बीचो बीच भी एक इलाका है जो जानवरों के लिए तो नहीं पर प्रकृति प्रेमियों और स्वास्थ के प्रति सजग रहने वालों में खासा लोकप्रिय है। इस इलाके का नाम है अंबाझरी जैवविविधता उद्यान जो करीब साढ़े सात सौ एकड़ में फैला हुआ है और अपने अंदर दो सौ से भी अधिक प्रजातियों के पक्षियों को समेटे है।  


पिछले नवंबर में जब मैं पेंच राष्ट्रीय उद्यान में गया था तो उससे पहले अपनी दो सुबहें मैंने यहीं व्यतीत की थीं और सच पूछिए बड़ा आनंद आया था मुझे अंबाझरी झील के किनारे बसे इस इलाके में अकेले विचरण करते हुए। ये पूरा क्षेत्र घास के मैदानों और झाड़ियों से भरा है। यही वज़ह है कि यहाँ आपको वो पक्षी दिखते हैं जिन्हें पानी के पास या झाड़ियों में रहना पसंद है। 


घास के मैदान जो आश्रयस्थल है ढेर सारे पक्षियों के
 घर से चलने के पहले ही अंबाझरी में काले और नारंगी रंग के थिरथिरे से मेरी मुलाकात हो गयी। बताइए क्या रंगों का मिश्रण दिया इन्हें भगवान ने! शरीर का ऊपरी हिस्सा काला रखा तो निचले सिरे को खूबसूरत नारंगी बना दिया। अब इन दोनों रंगों का मेल ऐसा कि एक बार देखते ही नज़रें ठिठक जाएँ। इन जनाब से मेरी पहली मुलाकात दो साल पहले सितंबर के महीने में तब हुई थी जब में स्पीति के गांव लंग्ज़ा की ओर बढ़ रहा था और ये उस पथरीले रेगिस्तान में ज़मीन पर अपने भोजन को ढूँढ रहे थे। जाड़ों में ये हिमालय की ऊँचाई त्याग कर मैदानी इलाकों की राह तय करते हैं।
अंबाझरी जैवविविधता उद्यान, नागपुर

साढ़े सात बजे तक मैं पार्क में दाखिल हो चुका था। यूँ तो वहाँ साइकिल की व्यवस्था है पर पक्षियों को ढूँढने और साथ ही साथ कैमरा सँभालने के लिए पैदल चलने से बेहतर कुछ भी नहीं। शुरुआत में तो मुझे पक्षियों की आवाज़ों के आलावा वहाँ कोई शख़्स नज़र नहीं आया। पर इतने एकांत में प्रकृति को यूँ निहारना अपने आप में एक अलग तरह का अनुभव था। जानते हैं सबसे पहले मुझे वहाँ कौन सा पक्षी दिखाई दिया? एक ऐसा पक्षी जिसकी साहित्य में तो महिमा अपरमपार है पर जिसके दर्शन मुझे इससे पहले कभी सुलभ नहीं हो पाए थे।

वो पक्षी था चातक ! वही चातक जिसके बारे में कहा जाता है कि चाहे वो कितना भी प्यासा हो मगर नदी या झील के पानी के बजाय वर्षा की गिरती बूँदों से ही अपना गला तर करता है। कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य में भी इसका जिक्र है। बहरहाल ये तो बस कहानियों की बाते हैं जो बेचारे चातक पर यूँ ही लाद दी गयी हैं। काले और सफेद रंग के पंखों वाले इस पक्षी का सबसे आकर्षित करने वाला हिस्सा इसकी बड़ी बड़ी आँखें और कलगी है। बहरहाल मैं इसे देख ही रहा था कि एक विचित्र गूँज से मेरा ध्यान दूसरी ओर पलटा।

चातक (Pied Cuckoo, Jacobin Cuckoo)
रौशनी अभी धीरे धीरे अपने पैर पसार रही थी। इसलिए एक सूखे पेड़ के ऊपर उस आवाज़ करती काली सी आकृति को पहचानना मुश्किल था। कैमरे से ज़ूम कर इतना समझ जरूर आया कि हो न हो ये तीतर के दो आगे तीतर , तीतर के दो पीछे तीतर ,बोलो कितने तीतर वाले प्रश्न का ही तीतर है। जनाब की हुंकार मीठी तो कहीं से नहीं थी पर ये जरूर था कि उनकी हर हूक का जवाब करीब आधे किमी दूर बैठे पक्षी से लगातार मिल रहा था। नतीजा ये था कि उनकी वाणी पूरे उत्साह से वातावरण को गुंजायमान किए थी। बाद में मुझे पता चला कि प्रजनन काल में सुबह सुबह ही अपनी प्रेयसी की तलाश में ही भोर होते ही ये अपने रियाज़ पर लग जाते हैं और उसके लिए कोई ऊँचा स्थान ढूँढ लेते हैं।  कम रौशनी और दूरी की वज़ह से उनकी तस्वीर बहुत साफ नहीं आई। इसकी आवाज़ का वीडियो बनाना उस वक़्त सूझा नहीं पर आप सुनना चाहें तो यहाँ सुन सकते हैं

तीतरों की कई प्रजातियाँ होती है और इस तीतर को चित्रित तीतर के नाम से जाना जाता है। चित्रित तीतर पश्चिमी और मध्य भारत के इलाकों में ज्यादा देखा जाता है।

चित्रित तीतर (Painted Francolin)
उजाला हो रहा था और अब कई युवा भाड़े की साइकिलों के साथ नज़र आने लगते थे। कहीं रास्ते में मैं किसी पक्षी की तस्वीर खींच रहा होता तो सब बिना आवाज़ किए पहले ही रुक जाते और मेरे से इशारा पाकर ही आगे बढ़ते। बच्चों को ऐसा करते देख अच्छा लगा। कई माता पिता अपने बच्चों को पक्षियों के बारे में बताने भी लाए थे पर बिना किसी दूरबीन के। इसीलिए उनहें वहाँ लगे पक्षियों के साइनबोर्ड पर दी गयी जानकारी से ही संतोष करना पड़ रहा था।

राबिन, महोख, फुटकी, अबाबील की झलक पाते हुए नज़रें इस लंबी पूँछ वाले लहटोरे पर जा अटकीं। इससे तो कई बार पहले भी मुलाकात हुई थी। आँखों के आगे काली पट्टी बाँधे ये पक्षी दिखने में भले छोटा सा दिखे पर इसकी गिनती बेरहम शिकारियों में होती है।

लंबी दुम वाला लहटोरा या लटोरा, Long Tailed Shrike
फाख़्ता तो आपने कई देखे होंगे पर चितरोखा और छोटे फाख्ता की तुलना में गेरुई फाख्ता अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। अपने गले के पास के घेरे और नर के स्याह रंग के सिर की वजह से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। 

फाख्ता के बाद जो पक्षी मुझे दिखाई पड़ा वो थी लाल मुनिया। कहना ना होगा कि इसकी खूबसूरती के चर्चे और झाड़ियों वाले इलाकों में इसके नज़र आने की अधिक प्रायिकता ते मेरे मन में विश्वास जगा दिया था कि सुबह की मेरी इस सैर में इसके दर्शन जरूर होंगे।

गेरुई फाख्ता  (Red Collared Dove)
लाल रंग तो कुदरत ने कई पक्षियों पर उड़ेला है पर लाल शरीर और भूरे काले पंखों के साथ इन छोटे छोटे से सफेद बूटों को देख कर इस रूप पर कौन ना वारी जाए? सच पूछिए इसकी लाल सफेद काया का दर्शन ऐसा है मानों पक्षियों के सांता क्लाज के दर्शन हो गए :)।

अंग्रेज बड़े अच्छे इतिहासकार थे। किसी भी चीज़ को देखना और उसके बारे में लिखकर दस्तावेज़ की शक़्ल देना उन्हें बखूबी आता था। सालिम अली का युग तो बाद में आया पर उसके पहले बहुतेरे भारतीय पक्षियों का नामकरण अंग्रेजों द्वारा कर दिया गया। इस क्रम में कुछ नाम उन्होंने ऐसे बिगाड़े कि आप समझ ही नहीं पाएँगे कि इस पक्षी का नाम ऐसा क्यूँ दिया गया? अब लाल मुनिया को ही लीजिए। ये पक्षी अंग्रेजी में रेड अवदावत (Red Avadavat ) के नाम से मशहूर है। अब अवदावत तो अंग्रेजी मूल का शब्द है ही नहीं तो क्या आपने कभी सोचा कि आख़िर बेचारी इस छोटी और प्यारी सी मुनिया का इतना क्लिष्ट नाम क्यूँ रख दिया गया?



इतिहास के पन्नों को टटोलें तो पाएँगे कि ये नाम दरअसल भारत के गुजरात राज्य के शहर अहमदाबाद का अपभ्रंश है। सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेजों ने अपने दस्तावेज़ों में अहमदाबाद में पिंजरों में बंद इन सुंदर पक्षियों का जिक्र किया है। वहीं से इन्हें यूरोप भी ले जाया गया। कहीं अमिदावाद, कहीं अमदावत होते होते इस पक्षी का नाम अंग्रेजों ने रेड अवदावत कर दिया।
खैर छोड़िए अवदावत को हमारे लिए तो ये लाल मुनिया ही रहेगी। जब मेरी इससे मुलाकात हुई तो ये झाड़ी के एक नुकीले सिरे पर झूला झूल रहा था। हमारी नज़रे मिलीं और अपनी आजादी में खलल देख कर कुछ देर तो इसने नाक भौं सिकोड़ी पर फिर मुझ पर ध्यान ना देते हुए ये अपने गायन में तल्लीन हो गया। तस्वीर का ये लम्हा तभी का है।
लाल मुनिया नर  (Red Munia)

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