Monday, August 4, 2014

Sanjusangen-do, Kyoto : सान जू सान गेन दो एक ऐसा बौद्ध मंदिर जहाँ भगवान बुद्ध की रक्षा करते हैं हिंदू देवी देवता !

हीयान शिंटो पूजा स्थल देखने के बाद भरी दोपहर में हम क्योटो के सबसे विख्यात मंदिरों में से एक Sanjusangen-do सान जू सान गेनदो पहुँचे। Sanjusangen-do नाम तो आपको बड़ा अटपटा लग रहा होगा। वैसे बोलने में क्लिष्ट ये नाम जापानी की गिनती गिनने के तरीके से आया है जो उतना कठिन भी नहीं हैं। जापानी में 1,2 और 3 के लिए इचि, नी और सान का प्रयोग करते हैं। इसी हिसाब से अगर 'जू' मतलब 'दस' तो 'नी जू' मतलब 'बीस' और 'सान जू' मतलब 'तीस'। यानि सान जू इचि, सान जू नी और सान जू सान का मतलब 31, 32 और 33 होगा। चूंकि ये मंदिर इसमें लगे 34 खंभो द्वारा 33 भागों में बाँटा गया है इसीलिए इसका नाम Sanjusangen-do यानि तैंतीस हिस्सों में बँटा परिसर रखा गया। 


पहली बार ये मंदिर 1164 ई में सम्राट शिराकावा के निर्देश पर बनाया गया।  तब इस परिसर में एक पाँच मंजिला पैगोडा और शिंतो पूजा स्थल भी हुआ करता था। पर दुर्भाग्यवश लकड़ी से बने इस मंदिर में 1249 ई में भीषण आग लगी जिसकी वज़ह से पूरा परिसर जलकर नष्ट हो गया। 1266 में मंदिर का 120 मीटर लंबा मुख्य कक्ष फिर से बनाया गया। इसमें प्राचीन मंदिर से बचा कर लाई गई 124 मूर्तियाँ भी थीं पर बाकी 876 मूर्तियाँ बाद में लगाई गयीं। जापान में इस मंदिर को हजार कैनोन वाले मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। पर ये कैनोन अवलोकितेश्वर आख़िर हैं कौन ? दरअसल महायान बौद्ध ग्रंथों का संदर्भ लें तो उनके अनुसार अवलोकितेश्वर,  भगवान बुद्ध के वो तैंतीस रूप हैं जिसमें वे मानव या जानवर का रूप धारण कर सजीव प्राणियों को धर्म का मतलब समझा सकें। इसमें सात स्त्री रूप भी शामिल हैं। इन रूपों के हिसाब से ही इस मंदिर को तैंतीस हिस्सों में बाँटा गया है।

मंदिर का पिछला हिस्सा जहाँ धनुर्धारी आज़माते हैं अपना निशाना
जापान में मैं चालीस दिनों के लिए रहा पर वो पल मैं आज भी नहीं भूल सकता जब मैंने इस मंदिर में प्रवेश किया। आख़िर क्या था ऐसा मंदिर में ? लकड़ी के ऊपर सोने के पानी से चमकते इन अवलोकितेश्वरों (Kannon) को देखकर तो कोई भी हैरत में पड़ जाएगा। पर जिस बात  ने मुझे अचंभे में डाल दिया वो ये कैनोन नहीं बल्कि उनकी रक्षा करते आगे की पंक्ति में खड़े ये प्रहरी थे। मानव या जानवर का मुँह लिए बोधिसत्व की रक्षा का भार सँभालते ये देव प्रहरी यूँ तो जापानी नैन नक़्श के थे पर जब मैंने इनके नाम पढ़ने शुरु किए तो खुशी से मेरी आँखें नम हो गयीं।

हज़ार कैननों से घिरे भगवान बुद्ध Buddha surrounded by 1000 Kannon (Scanned image)
भारत से पाँच हजार किमी से भी ज्यादा दूरी पर स्थित एक मंदिर जहाँ बौद्ध धर्म भारत से ना आकर चीन के रास्ते आया हो वहाँ भी भारतीय  देवी देवताओं की पहुँच हो जाएगी ऐसा मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था। हर देवी देवता के जापानी नाम के साथ वहाँ वो संस्कृत नाम भी लिखे हुए थे जिनसे उनका उद्भव हुआ। वायु, वरुण, इंद्र, गरुड़, लक्ष्मी, विष्णु, ब्रह्मा, शिव सबका वास था वहाँ पर एक अलग ही रूप में। मैं सोच रहा था कि कितनी मजबूत होगी हमारी प्राचीन संस्कृति जिसकी मान्यताएँ धर्म के बदलाव के बाद भी साथ साथ जुड़ती हजारों किमी दूर चली आयीं।

वरूण देवता का जापानी रूप Varun the God of Thunder (इस चित्र के छायाकार हैं Miguel Michan)
मंदिर में गहन शांति थी। मंदिर के बीचो बीच बौद्ध भिक्षुओं का एक समूह कतार लगा के बैठा था। चित्र खींचने की सख़्त मनाही थी। हमारे गाइड ने हमें बताया कि इन 30 (28+2) रक्षकों में सबसे ज्यादा सम्मान वायु और वरूण देव पाते हैं। इनकी प्रतिमाएँ उस लंबे हॉल के दो सिरे पर रखी गई थीं। तूफान के देवता वरूण की प्रतिमा में उन्हें तेजी से चारों ओर लगे ड्रमों को पीटता दिखाया गया है। संभवतः ऐसा गर्जन वो तूफान उत्पन्न करने के लिए कर रहे हों।
ये हैं अपने रौद्र रूप में वायु देवता (इस चित्र के छायाकार हैं Miguel Michan)
वायु देव की प्रतिमा को भी वरुण देव की तरह डरावना बनाने का प्रयास किया गया है। प्रतिमा में वायु देव अपने कंधे पर हवा भरी एक बोरी सँभाले हुए नज़र आते हैं। आँधी,तूफान के साथ भूकंप से बार बार तबाह होने वाले जापान के लोगों में वायु और तूफ़ान जैसी प्राकृतिक शक्तियों का खौफ़ सबसे ज्यादा था। इसलिए इनकी पूजा भी सबसे ज्यादा की जाती थी और इन्हें चढ़ावा भी खूब दिया जाता था। 

अरे भाई नहीं पहचाना ये हैं अपनी 'लक्ष्मी' ! Goddess of Prosperity Laxmi (Scanned image)
वैसे क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि जापानी चढ़ावे में क्या चढ़ाते होंगे? अब इतना तो तय है कि घी के लड्डू तो नहीं चढ़ते हैं जापान में। चौंकिएगा मत... बाकी छोटे मोटे सामानों के साथ बड़े करीने से चढ़ावे में शराब की बोतलें रखी गयी थीं। जितना बड़ा भगवान उतनी ही ज्यादा बोतलें। सबसे ज्यादा चढ़ावा वायु देव के हिस्से आया था। हमारे गाइड ने चढ़ावे की ओर इंगित कर हमसे मजाकिया लहजे में कहा Do you think all these wine bottles are for God of Wind..no no ultimately it will find the way into stomach of those monks.

अब तक आपने सिर्फ नीरो को बंसी बजाते सुना था अब इन्हें देखिए Protecting Kannon (Scanned image)
Sanjusangen-do (सान जू सान गेनदो) में हर साल जनवरी में एक उत्सव मनाया जाता है और साथ ही पुरानी परंपरा के अनुरूप मंदिर के पिछवाड़े में तीरंदाजी की बेहद लोकप्रिय  प्रतियोगिता होती है जिसमें दूर दूर से आए महिला एवम् पुरुष तीरंदाज़ हिस्सा लेते हैं। इस मंदिर को देखने के बाद हम क्योटो के एक और अनोखे मंदिर को देखने गए। क्या अनोखा था उस मंदिर में जानिएगा इस श्रंखला की अगली कड़ी में।  

यादें क्योटो की

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13 comments:

  1. Very nice

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  2. At Shravn Velgola,Hindu deities are sculpted around the giant figure of mahaveer Swami.In many other Jain temples,uptill before ten years,there used to be beautiful idols of Hindu deities around the parikrama path which now have been destroyed.Issue,perhapes,was showing the inter-relationship between deities and the Buddha.Or may be the Hindu prominence of Gupta ages,when Chinese pilgrims used to visit India ,influenced temple construction models.

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    1. शुक्रिया इस बाबत इतिहास का परिदृश्य पेश करने के लिए।

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  3. क ग्रन्थों से किया जा सकता है। इन ग्रन्थों में " अंगुत्तर निकाय " अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इन ग्रन्थों में सोलह महाजनपदोंं के अतिरिक्त कुछ गणराज्यों का भी वर्णन मिलता है जिनमें से एक है कपिलवस्तु का शाक्य गणराज्य दूसरा रामगाम का कोलीय गणराज्य। शाक्य गणराज्य नेपाल की सीमा पर हिमालय की तराई में था। कपिलवस्तु नगर इसकी राजधानी थी। यहां के शाक्य लोग सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। बुद्ध का जन्म इसी गणराज्य में हुआ था। कोलीय गणराज्य शाक्य गणराज्य के पूर्व में था। इन दोनों राज्यों के बीच रोहिणी नामक नदी बहती थी। ( प्राचीन भारत का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास - लेखक - बी.एन. लुणिया - पृष्ठ 131 ) शाक्य गणराज्य का वर्णन करते हुए रतिभानु सिंह नाहर जी ने भारतीय इतिहास की रूपरेखा में लिखा ( पृ.80 ) है कि कपिलवस्तु को शिक्षा एवं संस्कृति का केन्द्र माना जाता था। कुमार सिद्धार्थ की माता माया देवी कोलीय गणराज्य की राजकुमारी थी। सिद्धार्थ का पालन-पोषण क्षत्रिय धर्म के अनुसार हुआ। यज्ञोपवीत संस्कार के बाद शिक्षा ली, विभिन्न कलाओं और शस्त्र ज्ञान में भी निपुणता रही। पांच सौ शाक्यों को प्रतियोगिता में पराजित करने के बाद ही यशोधरा से परिणय सूत्र में बँध पाए थे। बाद में उनका हृदय परिवर्तन हुआ और ज्ञान प्राप्ति और बौद्ध धर्म और इसका विदेशों तक प्रचार … मुद्दा यह कि बौद्ध मंदिर किसी भी देश में हो, वहां किसी भी देश से यह धर्म आया हो, बुद्ध के मूल जन्म स्थान ( हिमालय की तराई ) और आरंभिक जीवन पद्धति - क्षत्रिय ( हिन्दू ) धर्म के प्रभाव से उनके मन्दिरों में हिन्दु देवी-देवताओं की मूर्तियां भी हो सकती है

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    1. इसीलिए पोस्ट में मैंने लिखा भी है कि नई बात ये नहीं कि बौद्ध मंदिर में हिंदू देवी देवता हो नहीं सकते। आश्चर्य इस बात में है कि गुप्त वंश में चीन से आए भ्रमणकारी इस बात को अपने साथ चीन ले गए और उसके आठ नौ सौ साल बाद वही जानकारी चीन के बौद्ध गुरुओं से उसी रूप में जापान जा पहुँची। कितनी मजबूत होगी हमारी प्राचीन संस्कृति जिसकी मान्यताएँ धर्म के बदलाव के बाद भी साथ साथ जुड़ती हजारों किमी दूर चली आयीं।

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  4. सुन्दर यात्रा वर्णन मनीष जी !

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  5. Yery very best

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    1. Kindly give your name and location along with ur comments.

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  6. arvind mishraSeptember 10, 2014

    Very nice explanation.

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    1. धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिए !

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