सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

हवाई अड्डा है या कोई वाटिका चलिए मेरे साथ बैंगलोर के T2 टर्मिनल की सैर पर

पहली हवाई यात्रा का उत्साह अपने आप में अनूठा होता है। दो दशक पहले जब कोलकाता से अंडमान जाना हुआ था तबका रोमांच अब तक मन को पुलकित करता रहता है। 


पर जैसे जैसे घर और कार्यालय की जरूरतों की वज़ह से हवाई सफ़र निरंतर होने लगे उनका नयापन जाता रहा। हवाई अड्डों पर जाने का उत्साह रहता भी तो कैसे? वक़्त के साथ साथ Peak Hour में यात्रियों की भारी भीड़ ने कई अच्छे खासे एयरपोर्ट में अनुभव रेलवे स्टेशन से भी बदतर बना दिया।

टर्मिनल में घुसते ही आप पहुंच जाते हैं इस हरे भरे गलियारे में


दूसरी तरफ पिछले कुछ सालों में नए और विशाल एयरपोर्ट तो बने पर सारे के सारे लगभग एक ही तर्ज पर। एक सी छत की संरचना, एक से गलियारे , एक सी बैठने की जगह और रंगों का वही उदासीन करता संयोजन। 



ऐसे में जब पिछले साल मैं बैंगलोर के नए T2 टर्मिनल पहुंचा तो उसका रूप रंग देख के मन जुड़ गया। 


चार साल की मेहनत के बाद ये टर्मिनल 2022 के अंत में अपने इस रूप में आया। यहां प्रवेश करते हुए ही आपको लगेगा मानो एयरपोर्ट नहीं बल्कि आप एक उद्यान में प्रवेश कर गए हों। बैंगलोर वाटिकाओं की नगरी के रूप में जाना जाता है और इसीलिए इस टर्मिनल का स्वरूप ऐसा रखा गया।



प्रकृति को इस इमारत में करीब रखने के लिए जो लैंडस्केप यहां बनाया गया उसमें मुख्य भूमिका थी छत, खंभों और दीवारों में प्रयोग किए गए बांस की। यहां तक की छत से लटकते झाड़फानूस (जिसमें रोशनी के साथ पौधों को डाला गया है) और ACVS duct को भी यहां बांस से बनाया गया।

T2  पर बना हरा भरा भोजन कक्ष 

छत से लटकते बांस के झाड़फानूस 

AC Duct 


करीब दस हजार वर्ग मीटर में हरियाली को फैलाने के लिए दीवारों की बाहरी सतह पर फैले पौधों का इस्तेमाल किया गया। बैठने की जगहों के बीचों बीच पेड़ लगाए गए। इन पेड़ों की हरीतिमा बनी रहे उसके लिए बांस से बनी छत के बीच से पर्याप्त मात्रा में प्रकाश आने की व्यवस्था की गई।




एयरपोर्ट में प्रवेश करते ही एक लंबा सा गलियारा आता है जिसके दोनों ओर हरी भरी लताएं आपकी गलबहियां करने के लिए आतुर दिखती हैं। अचानक छत की ओर आपकी नज़र जाती है तो शंकु की शक्ल में बांस को लपेटी हुई लताओं में खिलते फूल आपको देख कर मुस्कुराते हैं। ये समझ लीजिए कि एक प्रकृति प्रेमी को आनंदित करने के लिए यहां बहुत कुछ है।





आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यहां तीन हजार से अधिक प्रजातियों के पौधों में दो सौ के करीब संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं। ताड़ के भी सौ से ज्यादा रूप आप यहां देख सकते हैं। और तो और यहां एक छोटा सा झरना भी है जो सुरक्षा जांच के बाद आपके सामने आ जाता है। 


प्रकृति तो इस एयरपोर्ट की मुख्य थीम है ही पर इसका एक हिस्सा कर्नाटक के इतिहास , सांस्कृतिक कलाओं और स्थापत्य से भी परिचय कराता है 


कठपुतली के नाम से सबसे पहला ध्यान राजस्थान पर जाता है पर कर्नाटक में भी कठपुतलियों का प्रयोग लोगों के मनोरंजन के लिए किया जाता रहा है। यही वज़ह है कि टर्मिनल पर जगह जगह पारम्परिक वेशभूषा में कठपुतलियां प्रदर्शित की गयी हैं। इन्हें बनाया है अनुपमा होस्केरे ने  इन कठपुतलियों में महिलाओं की भाव भंगिमाओं  द्वारा भारतीय नाट्यशास्त्रों के नवरसों  को दिखने की कोशिश की गयी है। 


कर्नाटक के उत्तरी सिरे पर एक ऐतिहासिक शहर है बीदर जो कभी बहमनी सल्तनत का मुख्य केंद्र हुआ करता था इसी जगह बिदरी कला विकसित हुई इसमें  मिश्र धातु की प्लेट को मिट्टी के साथ पका कर काले  रंग में लाया जाता हैं।  फिर  उस पर आकृतियों को उकेरा जाता है।  इस कला की मुख्य विशेषता ये है कि इन आकृतियों को चांदी के धागों से बनाया जाता है।  नीचे बिदरी कला से बने इस एक सर्किट बोर्ड  सरीखे इस शिल्प में बंगलौर के नक़्शे को दिखाया गया है जो शहर की हरीतिमा के साथ साथ उसके तकनीकी केंद्र होने का भी आभास देता है।  


हवाई अड्डे पर रखी गयी कलाकृतियाँ भी आगुन्तक का ध्यान अपनी और खींचती हैं। सरवनन परसुरमन का ये गोलाकार  शिल्प  वास्तव में एक बीज की परिकल्पना बनाया गया है।  बीज जब प्रस्फुटित होता है तो ये संरचना नीचे के चित्र की शक़्ल में आ जाती है। शिल्पकार प्रकृति के विभिन्न घटकों के आपसी संबंधों को तंतुओं के अंतरजाल के रूप में प्रदर्शित करते हैं। 



कर्नाटक का प्राचीन इतिहास हम्पी के विशाल शहर विजयनगर से जुड़ा है  इस शहर की सम्पन्नता और कला कौशल को आप आज भी हम्पी के खंडहरों में महसूस कर सकते हैं  ओडिशा के कलाकार मयाधर साहू ने अपने इस काष्ठ शिल्प के माध्यम से विजयनगर की सांस्कृतिक समृद्धि को उकेरने का प्रयास किया है  



तो आप जब कभी इस टर्मिनल पर पधारें तो कुछ समय इसकी प्राकृतिक खूबसूरती और इन सराहनीय शिल्पों  को निहारने के लिए जरूर रखें।