शुक्रवार, 27 मार्च 2026

गढ़ पंचकोट बंगाल में सप्ताहांत बिताने की एक सुरम्य जगह

गढ़ पंचकोट, ये नाम शायद ही आपने कभी सुना हो। सुनने से तो ऐसा लगता है कि यहां कोई विशाल सा किला रहा होगा। पर किले के नाम पर यहां सिर्फ 16 वीं शताब्दी में सिंहदेव वंश के शासनकाल में बनाए पक्की मिट्टी के कुछ मंदिर ही बचे हैं। 


वैसे अगर आपने बंगाल के प्रसिद्ध विष्णुपुर के मंदिरों को देखा हो तो वहां की स्थापत्य शैली बिल्कुल यहां के मंदिरों सरीखी दिखेगी। हालांकि ऐसा माना जाता है कि मल्ल शासकों द्वारा बनाए वो मंदिर 17 वीं शताब्दी में बने। इस हिसाब से गढ़ पंचकोट के मंदिर संभवतः उससे पचास सौ वर्ष पुराने रहे होंगे।


पंचेत बांध से निकलता पानी 

गढ़ पंचकोट का इलाका यहां स्थित पंचेत पहाड़ियों के उत्तर पूर्वी किनारे की तलहटी पर है। पास ही दामोदर नदी के पानी को रोककर बनाया गया पंचेत बांध है जो झारखंड और बंगाल की सीमा का काम करता है। यही वज़ह है कि पुरुलिया जिले में स्थित ये कस्बा यूं तो बंगाल में है पर इसका निकटवर्ती रेलवे स्टेशन कुमारधुबी झारखंड में है।

पंचेत की हरी भरी पहाड़ियां

गढ़ पंचकोट की खूबसूरती का मुख्य आकर्षण पंचेत की लगभग 450 मीटर ऊंची हरी भरी पहाड़ी और उससे सटे घने जंगल हैं। इन जंगलों के बीच से एक दुबला पतला रास्ता जाता है जिस पर सुबह सुबह चहलकदमी करना मन को बेहद सुकून देता है। इस रास्ते पर बेहद सुंदर रिसॉर्ट भी हैं। दुर्गापुर और धनबाद जैसे बड़े शहरों के पास होने के कारण मानसून और जाड़ों में यहां काफी लोग आते हैं।

रिजॉर्ट का मुख्य द्वार

बारिश में यहां के सुंदर तरणताल का आनंद नहीं ले पाए

गढ़ पंचकोट इको टूरिज्म का अहाता

रिजॉर्ट के अंदर एक छोटा मगर प्यारा सा मंदिर

पिछले साल अगस्त के महीने में मैं दुर्गापुर में था। सप्ताहांत की छुट्टियां थीं तो अचानक यहां जाने का कार्यक्रम बन गया। भरी दोपहरी में मैं जब यहां पहुंचा तो गाड़ी से उतरते ही ऐसी झमाझम बरसात शुरू हुई कि कमरे से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया। खुशकिस्मती बस इतनी थी कि बालकनी से ही पंचेत की पहाड़ियां अपना दिल खोलकर हमें दर्शन दे रही थीं। गर्मागर्म चाय और पकौड़ों के बीच तड़तड़ाती बारिश का आनंद लिया गया।

बारिश में बाल्कनी से दिखता दृश्य
बारिश के  बंद होने के इंतज़ार में थोड़ी पेट पूजा ही कर ली जाए

बादल छंटे तो पूर्णिमा का चांद अपनी झलक कुछ यूं दिखा गया

रात तक इंद्र देव ने अपनी सेना वापस बुला ली पर अंधेरे में जंगलों की ओर कौन निकलता? सुबह सुबह जब हम सब निकले तो मौसम साफ था। पक्षियों का कलरव शुरू हो चुका था। 

Clockwise from left लाजवंती, पीहू, कुमुदनी, स्याह वक्ष वाली फुदकी

कहीं पीहू तो कहीं काले सिर वाले पीलक की उपस्थिति नज़र आ रही थी। सतभाई स्याह पिद्दी के साथ सुर में सुर मिला रहे थे। कहीं तो जंगल एकदम से घना हो उठता तो कभी अचानक सड़क के दोनों ओर समतल भूमि आ जाती। एक ओर धान के खेतों का विस्तार था तो दूसरी और छोटे बड़े सरोवर ,कमल और कुमुदिनी की उपस्थिति से फूले नहीं समा रहे थे । 

जंगल का रास्ता और खेत खलिहान

तीन चार किमी चलने के बाद ये ख्याल आया कि अभी वापस भी लौटना है। धूप अब चढ़ चुकी थी और बारिश के बाद की उमस ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। पसीने पसीने होकर किसी तरह रुकते चलते हुए होटल पहुंचे और फिर दिन में पंचेत बांध से गुजरते हुए वापसी की राह ली।

दीवारों पर महाराष्ट्र की वरली चित्रकला, सड़क पर बिखरे quarzite पत्थर

पंचेत बांध और पीछे दिखती पहाड़ियां

अगर आपके पास एक दिन और समय हो तो जाड़ों के दिनों में आप पंचेत की पहाड़ियों के ऊपर तक की ट्रैकिंग भी कर सकते हैं।