हीयान शिंटो पूजा स्थल देखने के बाद भरी दोपहर में हम क्योटो के सबसे विख्यात मंदिरों में से एक Sanjusangen-do सान जू सान गेनदो पहुँचे। Sanjusangen-do नाम तो आपको बड़ा अटपटा लग रहा होगा। वैसे बोलने में क्लिष्ट ये नाम जापानी की गिनती गिनने के तरीके से आया है जो उतना कठिन भी नहीं हैं। जापानी में 1,2 और 3 के लिए इचि, नी और सान का प्रयोग करते हैं। इसी हिसाब से अगर 'जू' मतलब 'दस' तो 'नी जू' मतलब 'बीस' और 'सान जू' मतलब 'तीस'। यानि सान जू इचि, सान जू नी और सान जू सान का मतलब 31, 32 और 33 होगा। चूंकि ये मंदिर इसमें लगे 34 खंभो द्वारा 33 भागों में बाँटा गया है इसीलिए इसका नाम Sanjusangen-do यानि तैंतीस हिस्सों में बँटा परिसर रखा गया।
पहली बार ये मंदिर 1164 ई में सम्राट शिराकावा के निर्देश पर बनाया गया।
तब इस परिसर में एक पाँच मंजिला पैगोडा और शिंतो पूजा स्थल भी हुआ करता था।
पर दुर्भाग्यवश लकड़ी से बने इस मंदिर में 1249 ई में भीषण आग लगी जिसकी
वज़ह से पूरा परिसर जलकर नष्ट हो गया। 1266 में मंदिर का 120 मीटर लंबा
मुख्य कक्ष फिर से बनाया गया। इसमें प्राचीन मंदिर से बचा कर लाई गई 124 मूर्तियाँ भी थीं पर बाकी 876 मूर्तियाँ बाद में लगाई गयीं। जापान में इस मंदिर को हजार कैनोन वाले मंदिर के
नाम से भी जाना जाता है। पर ये कैनोन अवलोकितेश्वर आख़िर हैं कौन ? दरअसल महायान
बौद्ध ग्रंथों का संदर्भ लें तो उनके अनुसार अवलोकितेश्वर, भगवान बुद्ध के
वो तैंतीस रूप हैं जिसमें वे मानव या जानवर का रूप धारण कर सजीव प्राणियों
को धर्म का मतलब समझा सकें। इसमें सात स्त्री रूप भी शामिल हैं। इन रूपों
के हिसाब से ही इस मंदिर को तैंतीस हिस्सों में बाँटा गया है।
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मंदिर का पिछला हिस्सा जहाँ धनुर्धारी आज़माते हैं अपना निशाना |
जापान में मैं चालीस दिनों के लिए रहा पर वो पल मैं आज भी नहीं भूल सकता जब मैंने इस मंदिर में प्रवेश किया। आख़िर क्या था ऐसा मंदिर में ? लकड़ी के ऊपर सोने के पानी से चमकते इन अवलोकितेश्वरों (Kannon) को देखकर तो कोई भी हैरत में पड़ जाएगा। पर जिस बात ने मुझे अचंभे में डाल दिया वो ये कैनोन नहीं बल्कि उनकी रक्षा करते आगे की पंक्ति में खड़े ये प्रहरी थे। मानव या जानवर का मुँह लिए बोधिसत्व की रक्षा का भार सँभालते ये देव प्रहरी यूँ तो जापानी नैन नक़्श के थे पर जब मैंने इनके नाम पढ़ने शुरु किए तो खुशी से मेरी आँखें नम हो गयीं।
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हज़ार कैननों से घिरे भगवान बुद्ध Buddha surrounded by 1000 Kannon (Scanned image) |
भारत से पाँच हजार किमी से भी ज्यादा दूरी पर स्थित एक मंदिर जहाँ बौद्ध
धर्म भारत से ना आकर चीन के रास्ते आया हो वहाँ भी भारतीय देवी देवताओं की
पहुँच हो जाएगी ऐसा मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था। हर देवी देवता के
जापानी नाम के साथ वहाँ वो संस्कृत नाम भी लिखे हुए थे जिनसे उनका उद्भव
हुआ। वायु, वरुण, इंद्र, गरुड़, लक्ष्मी, विष्णु, ब्रह्मा, शिव सबका वास था
वहाँ पर एक अलग ही रूप में। मैं सोच रहा था कि कितनी मजबूत होगी हमारी प्राचीन संस्कृति जिसकी
मान्यताएँ धर्म के बदलाव के बाद भी साथ साथ जुड़ती हजारों किमी दूर चली
आयीं।