वैसे तो आज आपको दशनोक के चूहों के मंदिर में घुमाने के बाद आपको बीकानेर का शानदार किला दिखाना था। पर पिछले हफ्ते शताब्दी एक्सप्रेस से राँची से दुर्गापुर जाते हुए प्रकृति ने इतने हरे भरे लमहे दिए कि उनको आप तक पहुँचाए बगैर मन ही नहीं मान रहा था। राजधानी राँची, नामकुम और टाटीसिलवे से निकलने के बाद झारखंड का रमणीक रूप आँखों के सामने आ जाता है। ऊँचाई पर चलती ट्रेन से टाटीसिलवे और गंगाघाट के बीच की घाटी को देखना मैं अपनी किसी यात्रा में नहीं भूलता। हर बार यही सोचता हूँ कि काश वहाँ कोई हॉल्ट होता तो कुछ पल तो उन सुरम्य वादियों को अपलक निहार पाता।
गंगाघाट के आगे जंगल रेलवे की पटरियों के एक ओर सट के चलते हैं तो दूसरी ओर विरल होते जंगलों के बीच छोटे छोटे खेत खलिहान दिख जाते हैं। पर नयनों को असली तृप्ति तब मिलती है जब गाड़ी गौतमधारा से किता की ओर सरपट भागती है। मानसून के इस मौसम में धान के लहलहाते खेतों के पीछे की पहाड़ियाँ भी हरे रंग से सराबोर हो जाती हैं. विश्वास नहीं आता तो खुद ही देख लीजिए
पर हुज़ूर दुनिया आप पर ध्यान तभी देती है जब आप लीक से हट कर कुछ करें। अब किता स्टेशन पर खड़े इस अकेले पेड़ को ही देखिए। सारी धरती जब हरियाली की चादर ओढ़े है तो ये महाशय अपने को पत्तीविहीन कर किस दर्प के साथ सीना ताने खड़े हैं। और सच ध्यान इनकी खूबसूरती से हट ही कहाँ पा रहा है?