दुर्गा पूजा हर साल आती है धूमधाम के साथ मनाई जाती है और फिर माँ को विदा भी करना होता है। बचपन में पटना की पूजा देखी। स्टेशन से लेकर गाँधी मैदान, नाला रोड और फिर पैदल चलते चलते अशोक राजपथ तक का पाँच छः किमी सफ़र कैसे तय हो जाता पता ही नहीं चलता था। उस धूम धाम में माँ के दर्शन के बाद किसी संगीत की महफिल मैं बैठने का आनंद ही कुछ और हुआ करता था।
फिर नौकरी व पढ़ाई के लिए फरीदाबाद व रुड़की का रुख किया तो कुछ सालों तक पता ही नहीं चला की दुर्गा पूजा कब आई और कब गयी । पर देखिए तक़दीर ने फिर राँची भेज दिया और जब यहाँ की पूजा देखी तो समझ आया कि झारखंड, बंगाली संस्कृति से बिहार कीअपेक्षा ज़्यादा जुड़ा हुआ है। विगत कुछ सालों से राँची के आलावा कोलकाता की दुर्गा पूजा देखने का अवसर मिला है और इस इलाके में पंडाल और मूर्ति बनाने की जो अद्भुत कला है उसने हर साल कुछ नया दिखाकर चमत्कृत ही किया है। यही वज़ह है कि जैसे ही पूजा आती है हमारी रातें अपने शहर की सड़कों पर गुजरती हैं। एक बार पंडाल परिक्रमा पर निकल जाएँ तो इस इलाके के सभी शहर आधी रात से लेकर पौ फटने तक आपको जागते हुए मिलेंगे।
तो चलिए इस साल की पंडाल परिक्रमा शुरु करते हैं राँची के पंडालों से और इसका समापन करेंगे पश्चिम बंगाल के शहर दुर्गापुर में।
OCC Club में माँ दुर्गा की प्रतिमा
राँची में बड़ा तालाब के पास स्थित OCC Club यानि बांग्ला स्कूल का पंडाल इस साल के अनूठे पंडालों में से एक था। पंडाल बनाने में बड़े अजीबोगरीब किस्म के सामान का प्रयोग किया गया था। अब बताइए होज़ पाइप, चलनी, टोकरी और शहनाई सरीखे वाद्य यंत्र को मिलाकर एक दूसरे ग्रह से आए प्राणियों की काया तैयार कर दी जाए तो कैसा रहे? बस ऐसा ही कुछ माहौल था इस पंडाल में।
माँ दुर्गा का स्वागत बाजे गाजे के साथ
वाह !क्या ठुमका लगा रिया है...
मानव आकृतियाँ बनाने में होज़ पाइप का अद्भुत इस्तेमाल
पिछले महीने आपको अपने ब्लॉग पर मैंने पेरिस की यात्रा करवाई और वहाँ से निकलते वक़्त मैंने लिखा था कि अब आपकी मुलाकात कराऊँगा यूरोप के एक ऐसे देश से जो निहायत ही खूबसूरत है। ये देश है स्विट्ज़रलैंड का। 40000 वर्ग किमी से कुछ ही ज्यादा ही इस देश का क्षेत्रफल, पर इसके ज़र्रे ज़र्रे में खूबसूरती बिखरी पड़ी है। कहने का मतलब ये कि ये एक ऐसा देश है जहाँ आँखों को तृप्त करने के लिए बिना किसी मंजिल के निकल पड़ना ही काफ़ी है ।
पेरिस से स्विट्ज़रलैंड की सीमा करीब 600 किमी की दूरी पर है। पेरिस के खेत खलिहानों और मैदानों से उलट स्विट्ज़रलैंड में घुसते ही पहाड़ियों, झीलों, चारागाहों और उनमें बसे छोटे छोटे गाँव का जो सिलसिला शुरु होता है वो थमने का नाम नहीं लेता। आठ घंटों की इस सड़क यात्रा में चलते चलते जो नज़ारे बस की खिड़की से दिखे उनमें से कुछ को क़ैद कर आपके सामने लाने की कोशिश है मेरी ये पोस्ट..
फ्रांस स्विट्ज़रलैंड की सीमा पर एक प्राचीन महल
गोरी तेरा गाँव प्यारा मैं तो गया मारा आ के यहाँ रे..
जुते और बोए हुए खेतों के बीच से निकलती सड़क मन को हर गयी
बरसों पहले किसी स्थानीय मित्र ने एक ऐसे जलप्रपात के बारे में बताया था जिसकी आवाज़ घने जंगलों के बीच से कई किमी पहले से सुनी जा सकती है। पलामू जिला तब नक्सलियों का गढ़ माना जाता था। सड़कों का जाल भी झारखंड में तब इतना विस्तृत नहीं हुआ था। इसलिए वहाँ जाने का विचार मन में तब बैठ नहीं पाया था। बात आई गयी हो गयी और उस अनजान इलाके का रहस्य मेरे लिए रहस्य ही बना रहा।
बहुत दिनों बाद मैं उस झरने का नाम जान सका। साथ ये भी कि जंगलों के भीतर स्थित लोध जलप्रपात झारखंड का सबसे ऊँचा जलप्रपात है। झारखंड में यूँ तो कई जलप्रपात हैं पर इनमें से ज्यादातर राँची के आस पास ही हैं। हुँडरु, दशम, जोन्हा, सीता और हिरणी राँची से साठ किमी की त्रिज्या के अंदर ही आते हैं। पर उस वक़्त क्या आज भी राँची से दौ सौ किमी दूर स्थित ये निर्झर झारखंड और खासकर राँची के लोगों के लिए इक अबूझ पहेली ही है क्यूँकि उस इलाके के साथ नक्सली गतिविधियों का जो पुराना इतिहास रहा है वो अभी मिट नहीं सका है। हालत ये है कि आज भी नेतरहाट और उसके आस पास के इलाकों में जितने लोग पहुँचते हैं उनमें अधिकांश बंगाल से होते हैं।
मस्ती का है ये समा : लोध जलप्रपात
साल दर साल टलते टलते आख़िरकार नेतरहाट का कार्यक्रम बना तो मैंने निश्चय
कर लिया कि चाहे मौसम जैसा रहे नेतरहाट के साथ साथ इस झरने के अट्टाहस को इस बार सुन कर आना
है। राँची से नेतरहाट की अपनी यात्रा और वहाँ के प्रवास के बारे में
तों मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ। सुबह की बारिश का आनंद लेने के बाद करीब दस बजे जब हम नेतरहाट से निकले तो पहला झटका
हमारे होटल प्रबंधक ने दिया। उसने कहा कि बारिश के मौसम में आपकी गाड़ी
महुआडांड़ तक ही जा पाएगी। वहाँ से लोध तक का रास्ता सही नहीं है क्यूँकि
अभी तक सड़क ठीक से बनी नहीं है। इसलिए आप वहाँ से सूमो या महिंद्रा जैसी
गाड़ी ले लीजिएगा। इस सूचना के लिए हम मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। फिर भी
निर्णय लिया गया कि पहले महुआडांड़ तो पहुँचा जाए फिर वहाँ लोगों से पूछ कर
आगे का सफ़र तय किया जाएगा।
पर मन में जो चिंताएँ तैर रही थीं वो बाहर निखर आई धूप और खूबसूरत रास्ते की वज़ह से जाती रहीं। नेतरहाट से महुआडांड़ की दूरी चालीस किमी से थोड़ी ज्यादा होगी। सफ़र का पहला
हिस्सा नेतरहाट के जंगलों के बीच से गुजरता है और फिर अचानक से घने जंगल
साथ छोड़ देते हैं और दिखती हैं मानसूनी हरी भरी वादियाँ। कहीं चारागाह तो
कहीं धान और मक्के के खेत, रास्ते में छोटे छोटे गाँव और उनसे निकलती सड़कों
पर साइकिल या फिर पैदल चलते लोग।
समा..समा है सुहाना अकेले तुम हो अकेले हम हैं
ऐसी ही इक प्यारी सी जगह पर सड़क के किनारे हमने अपनी गाड़ी खड़ी की और प्रकृति के इस अद्भुत मंज़र को कुछ देर तक अपलक निहारते रहे । दूर दूर तक ना कोई गाड़ी आ जा रही थी और ना ही लोग। ऐसे लग रहा था मानो धरा के इस सुंदर से टुकड़े की मिल्कियत अपनी हो। ये एक विरोधाभास ही है कि इतने खूबसूरत अंचल को झारखंड के सबसे गरीब इलाकों में गिना जाता है।
सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं, हमें डर है हम खो ना जाए कहीं
अगर इस इलाके का इतिहास को खँगालें तो पाएँगे कि पलामू जिले पर खारवार जनजाति और गुमला जिले पर मुंडा राजा का वर्चस्व था। इसके आलावा उराँव, बिरहोर और असुर जनजाति के लोग भी यहाँ निवास करते थे। मुगल से ले के अंग्रेजों के ज़माने तक आम किसान यहाँ के जमींदारों और महाजनों की वसूली से त्रस्त रहे।
वैसे तो इस इलाके से शंख और उत्तरी कोयल नदी बहती हैं पर गर्मी के दिनों में ये लगभग सूख जाती हैं। आज भी यहाँ की मिट्टी बहुत उपजाऊ ना होने और सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर रहने की वज़ह से यहाँ के बाशिंदों का खेती से गुजारा चला पाना मुश्किल है। इसलिए यहाँ के लोग जंगल के उत्पादों और मुर्गी, बकरी और सूअर पालन कर अपनी ज़िंदगी बसर करते हैं।
महुआडांड़ लोध मार्ग
महुआडांड़ के कस्बे के आस पास पहली बार आबादी दिखनी शुरु हुई। हम चौराहे के किनारे रुके और लोगों से लोध के रास्ते का हाल पूछना शुरु किया। लोगों ने कहा कि वहाँ तक कच्ची पक्की सी सड़क तो है पर इस गाड़ी में वहाँ जाने में थोड़ा ख़तरा तो है। मन में शंका का बीज पड़ चुका था तो फिर आगे का सफ़र वहाँ खड़ी महिंद्रा से पूरा किया गया। अंतिम बीस किमी की इस यात्रा में आने जाने का खर्चा रास्ते के हिसाब से सात आठ सौ से ज्यादा नहीं होने चाहिए था पर हमारी बात हजार रुपये में बन पाई। लोध से लौटने पर लगा कि हमारा गाड़ी करने का निर्णय सही ही था।
महुआडांड़ लोध मार्ग
हमारी गाड़ी में मुस्लिम चालक ने हमसे पूछ कर अपने एक रिश्तेदार को भी बैठा
लिया। उनसे रास्ते भर बात होती रही। पता चला कि वो आलू के व्यापारी हैं और
महुआडांड़ से खरीद कर आलू वो पलामू जिले के मुख्यालय डाल्टेनगंज में बेचते हैं। जब
मैंने मकई के खेतों के बारे में उनसे सवाल किया तो उन्होंने बताया कि पहले
मकई की रोटी यहाँ के आहार का हिस्सा होती थी पर अब उसका इस्तेमाल मवेशियों
के चारे में ज्यादा होता है।
महुआडांड़ लोध मार्ग
बहरहाल अब आगे का रास्ता ऐसा था कि मेरी उन सज्जन से बातचीत एकदम से बंद हो गई। कहीं तो अचानक से ढलान आ जाती थी तो कहीं कीचड़ से सनी सड़क को काटते हुए गुजरना पड़ता था । अब मानसून का मौसम था तो छोटी मोटी नदी ने भी अपने जौहर दिखाने शुरु कर दिए थे।
जब नदी सड़क ही लील जाए
नदी के ऊपर बनी पुलिया पानी के थपेड़ों से लहुलुहान पड़ी थी। लिहाजा गाड़ी
पानी में भी उतारनी पड़ी। नदी पार करते हम गहरे जंगल में घुसने लगे और वहीं
से गिरते पानी की झंकार सुनाई देने लगी। अब सड़क के नाम पर छोटे बड़े पत्थर
ही बचे थे। कुछ ही पलों में हम उस जगह पर थे जहाँ से अगले सौ मीटर की दूरी
पैदल तय करनी थी।
लो अब तो झरने की आवाज़ भी आने लगी
इससे पहले हम अपनी चढ़ाई शुरु करते पहाड़ के ऊपर से गिरते झरने का पहला दृश्य हमें रोमांचित कर गया। लोध जलप्रपात छत्तीसगढ़ और झारखंड की सीमा पर स्थित है। छत्तीसगढ़ की ओर से घने जंगलों के बीच से आने वाली बूढ़ा नदी के नीचे गिरने से इस प्रपात का निर्माण होता है। पहाड़ के ऊपर से पानी नीचे आते वक्त तीन मुख्य धाराओं में विभक्त हो जाता है। दो धाराएँ तो बाद में मिल भी जाती हैं जबकी तीसरी कुछ दूर जाकर गिरती है।
झारखंड का सबसे ऊँचा जलप्रपात लोध
143 मीटर ऊँचा ये झरना कई चरणों में नीचे गिरता है। बूढ़ा नदी से उत्पन्न होने के कारण इसे बूढ़ा घाघ जलप्रपात के नाम से भी जाना जाता है।
तीन मुख्य धाराओं में बँटकर गिरता है ये जलप्रपात
दोपहर की धूप तीखी थी पर झरने के ठीक सामने बैठने से जो फुहारें चेहरे पर पड़ रही थीं वो तन मन शीतल कर दे रही थीं। कुछ देर हम यूं ही आनंदित होते रहे।
एक बार आप झरने के सामने आ गए तो ऊपर जाने का कोई अलग से रास्ता नहीं है।
मतलब ये कि अगर लोध के मुख की ओर जाना चाहें तो आपको चट्टानों पर चढ़ने लाएक
मजबूत घुटने और जूतों में अच्छी पकड़ होनी जरूरी है।
लोध की एक धारा
पहली बाधा पार करने में तो मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई पर झरने की दूसरी
मंजिल से तीसरी मंजिल चढ़ने में पसीने छूट गए। बरसात की फिसलन का ध्यान रखते
हुए मैंने और ऊपर जाने का जोख़िम नहीं लिया। मेरे मित्र थोड़ा और ऊपर जा
सके पर आगे का मार्ग और दुर्गम निकला सो वो भी कुछ देर में नीचे लौट आए।
ऍसी वादियों में बिछने का मन क्यूँ ना करे?
पानी की धारा को पकड़ने की हमारी कोशिश में हम पसीने से तरबतर हो चुके थे और
मुँह अलग से लाल हो चुका था। अब इस अवस्था से निज़ात पाने का आसान सा तरीका
था पानी में डुबकी लगाना। फिर क्या थासही जगह देख के झरने के निर्मल शीतल जल में हम
बारी बारी से कूद पड़े।
लोध में छप छपा छईं..
पानी के स्पर्श से पूरे शरीर को जो ठंडक और सुकून मिला उसे हमारे चेहरे की खुशी ही बयाँ कर सकती है। दो घंटे की मस्ती के बाद हम वापस महुआडांड़ पहुँचे। शाम के समय हम वापसी की राह नेतरहाट की घुमावदार घाटी से तय नहीं करना चाहते थे। वहाँ लोगों ने हमें डुमरी के रास्ते से लौटने को कहा। ये रास्ता और भी सुनसान पर बेहद खूबसूरत था और डुमरी, चैनपुर होते हुए मुख्य राजमार्ग से जा मिलता था।
राँची - घाघरा -नेतरहाट - लोध - डुमरी - गुमला - राँची : ये था हमारा रास्ता !
पन्द्रह
अगस्त की उस शाम को इलाके के हर छोटे बड़े गाँव में जश्न का माहौल था। हर
जगह इस दिन फुटबाल की प्रतिस्पर्धा का आयोजन था। लड़के और लड़कियाँ बढ़ चढ़ कर
इस आयोजन में हिस्सा ले रहे थे । मैदान के चारों ओर आम जनता मेले की भांति
भीड़ में खड़ी दिखी। हँसी तो तब आई जब मैंने प्रतियोगिता के दौरान होती
उद्घोषणा में इनाम की बात सुनी। तो बताइए क्या इनाम रखा था सरकार ने.. बोले तो आयोजकों ने 😄? जीतने वालों को दो खसी और हारने वाले को एक। हाँ जो इस
इलाके की भाषा से परिचित ना हों उन्हें बता दूँ कि खसी का अर्थ बकरा होता
है।
आजादी का जश्न
हमें बाद में पता चला कि ये इलाका भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शुमार होता है और इधर से शहरी आदिवासी तक गुजरने से कतराते हैं। मुझे ये जानने के बाद अग्रेजी की वो कहावत याद आ गयी कि Ignorance is a bliss. अगर हमे ये पता होता कि ये रास्ता इतना ख़तरनाक है तो हम इसकी ओर रुख ही नहीं करते और झारखंड की ग्रामीण संस्कृति को पास से देखने का सुनहरा मौका खो देते। बहरहाल जहाँ रास्तों में इक्का दुक्का बस और आटो के आलावा निजी वाहन ना चलते हों वहाँ हमारी नेक्सा थोड़े कौतूहल का विषय तो थी। लिहाजा तीन बार हमारी गाड़ी को रोका गया। पहली बार इन बच्चों के द्वारा जो ना जाने कहाँ से सामने आ गए और हमारी गाड़ी को घेर पूरी लय में गाजे बाजे के साथ गाने लगे। ना उन्होंने रास्ता दिया ना कुछ माँगा। ख़ैर दस रुपये का नोट उन्हें हटाने में सफल रहा। इस घटना की एक बार पुनरावृति और हुई पर पीछे का अनुभव काम आया।
ये डगर स्मृतियों में हमेशा रहेगी
रात साढ़े आठ बजे तक वापस राँची पहुंच चुके थे।कुल मिलाकर झारखंड के अंदरुनी इलाकों की हमारी ये यात्रा बेहद आनंददायक और
रोमांचकारी साबित हुई। तो चलते चलते आपको लोध का उस जगह से लिया अपना वीडियो दिखा दूँ जहाँ से मुझे इसकी पहली झलक मिली थी।
अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।
जब हमने अगस्त के महीने में झारखंड की रानी कहे जाने वाले झारखंड के पर्वतीय स्थल नेतरहाट जाने का कार्यक्रम बनाया तो लोगों का पहला सवाल था बारिश के मौसम में नेतरहाट? प्रश्न कुछ हद तक सही था। नेतरहाट को लोग वहाँ पहाड़ियों के बीच होने वाले सूर्योदय व सूर्यास्त के लिए जानते हैं। अब जिस मौसम में बादलों का राज हो वहाँ सूर्य देव तो लुकते छिपते ही फिरेंगे ना।
जंगल में मंगल
दूसरा पहलू सुरक्षा को ले कर था। भारी बारिश में कब रास्ते की पुल पुलिया बह जाए और हम बीच जंगल में जा फँसे, ये डर हमें भी मथ रहा था। संयोग ये रहा कि नेतरहाट के आस पास बारिश से जो सड़कें क्षतिग्रस्त हुई थीं वो हमारे जाते जाते दुरुस्त हो गयीं।
पर ना तो हमें सूर्य की परवाह थी और ना ही पानी में भींगने की अनिच्छा, हम तो बस बारिश में धुले हरे भरे झारखंड
की वादियों में भटकना चाहते थे। सच यो ये है कि इस यात्रा के बाद हमें विश्वास हो गया कि
प्रकृति का हर मौसम आपसे कुछ कहता है और Off Season की बातें कभी कभी कितनी बेमानी
होती हैं ये सफ़र तय कर के ही पता लगता है।
नेतरहाट घाटी का अविस्मरणीय दृश्य
चौदह अगस्त को अपनी कार ले कर हम तीन मित्र राँची से रवाना हो गए। राँची से नेतरहाट की दूरी करीब 160 किमी है। इस सफ़र को रुकते चलते आप चार से पाँच घंटे में पूरा कर सकते हैं। राँची से तीस किमी बाहर निकलने के बाद ज्यों ज्यों आबादी कम होती गयी वैसे वैसे धरती पर फैली हरीतिमा का विस्तार होता गया। हरियाली का वो हसीन मंज़र तो मैं आपको यहाँ दिखा ही चुका हूँ।
राँची, नगड़ी, बेड़ो होते हुए हम सिसई पहुँचे। सिसई से घाघरा जाने के लिए दो रास्ते हैं। प्रचलित रास्ता गुमला होकर जाता है तो दूसरा सिसई के ग्रामीण अंचल के बीच से गुजरता हुआ घाघरा पहुँचता है। छोटा होने के कारण हमने इस रास्ते का पहले रुख किया पर कुछ दूर उस पर चल कर समझ आ गया कि जितना समय हम इस पर चल कर बचाएँगे उससे ज्यादा इस के गढ्ढों से बचने बचाने में निकल जाएगा।
नेतरहाट का नाम सार्थक करता बाँसों का ये झुरमुट
दोपहर बारह बजे हम गुमला होते हुए घाघरा पहुँचे। सड़क से सटे छोटे से ढाबे में साथ लाया भोजन किया। स्पेशल चाय की माँग करने पर खालिस दूध वाली चाय मिली। पानी भी ऐसी मिठास लिए कि तन मन प्रफुल्लित हो जाए । थोड़ा आगे बढ़ने पर उत्तरी कोयल नदी मिली और फिर सफ़र शुरु हुआ नेतरहाट घाटी का।
नेतरहाट घाटी में प्रवेश करते ही तापमान दो तीन डिग्री कम हो गया। घने जंगल की शांति को या तो पहाड़ की ढलान पर बहती पानी की पतली दुबली धाराएँ तोड़ पा रही थी या बॉक्साइट की खानों से अयस्क लाते ट्रक। जंगल के बीच पहुँचते ही हमें नेतरहाट के नाम का रहस्य विदित होने लगा। दरअसल स्थानीय भाषा में बाँस के बाजार को नेतूर हाट के नाम से जाना जाता रहा है जो समय के साथ नेतरहाट में बदल गया। नेतरहाट पहुँचने के पहले पहाड़ की ढलानों पर बाँस के इतने घने जंगल हैं कि नीचे की घाटी की झलक पाने के लिए अच्छी खासी मशक्कत करनी पड़ती है।
नेतरहाट के ठीक पहले मिले हमें साल व सखुआ के जंगल
घाटी समाप्त होने के पहले एक रास्ता महुआडांड़ के लिए कटता है जबकि दूसरा नेतरहाट के जंगलों में फिर से ले जाता है। बाँस के जंगलों को पार करने के बाद हमारा सामना चीड़ के आलावा, सखुआ और साल के जंगलों से हुआ। आसमान में बदली छायी हुई थी पर हम सबका मन इन जंगलों में थोड़ा समय बिताने का हुआ और हम गाड़ी खड़ी कर बाहर निकल पड़े।
नेतरहाट स्कूल के ठीक सामने चीड़ वृक्षों की मनमोहक क़तार
नेतरहाट में रहने के लिए डाक बँगला, वन्य विश्रामागार के आलावा झारखंड
पर्यटन का अपना होटल भी है जिसका नाम प्रभात विहार है। यहाँ इंटरनेट से भी बुकिंग होती है। वन विश्रामागार में जगह ना मिलने की वजह से हमने इस
सुविधा का लाभ उठाया। वैसे इसके आलावा भी आजकल वहाँ छोटे छोटे लॉज बन गए हैं। होटल तक पहुँचते पहुँचते बारिश शुरु हो गयी थी। थोड़ी
देर हाथ पैर सीधे करने के बाद बारिश का चाय के साथ आनंद लिया गया और फिर
हमने राह पकड़ी कभी बिहार के सबसे नामी रहे नेतरहाट स्कूल की।
नेतरहाट स्कूल का खूबसूरत परिसर
मैदानों में स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियाँ होती हैं पर नेतरहाट में छुट्टी का मौसम मानसून में आता है। अविभाजित बिहार में 1954 में इस स्कूल की स्थापना की गयी। आज यहाँ छठी से बारहवीं तक की पढ़ाई होती है। जब मैं स्कूल में था तो नेतरहाट को पूरे बिहार का सर्वोत्तम स्कूल का दर्जा प्राप्त था। बिहार बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में प्रथम दस में इक्का दुक्का ही स्थान किसी और स्कूल के छात्रों को मिलते थे। हिंदी मीडियम की पताका आज तक फहराने वाले इस विद्यालय के नतीजे बिहार के विभाजन के बाद वैसे नहीं रहे।
पिछले बीस सालों में झारखंड में रहते हुए भी राँची, बोकारो, जमशेदपुर, धनबाद के आलावा अन्य इलाकों में जाना कम ही हुआ है। इसलिए इस बार अगस्त के दूसरे हफ्ते का लंबा सप्ताहांत नसीब हुआ तो मन में इच्छा जगी कि क्यूँ ना मानसूनी छटा से सराबोर झारखंड की सड़कों को नापा जाए। नेतरहाट और झारखंड के सबसे ऊँचे जलप्रपात लोध तक पहुँचने की अपेक्षा मन में झारखंड के उन दक्षिणी पश्चिमी इलाकों को नापने का उत्साह ज्यादा था जहाँ हमारे कदम आज तक नहीं पड़े थे। पड़ें भी तो कैसे पलामू, लातेहार और गुमला का नाम हमेशा से नक्सल प्रभावित जिलों में शुमार जो होता आया है।
मानसून में नेतरहाट के विख्यात सूर्योदय व सूर्यास्त देखने की उम्मीद कम थी
पर मेरा उद्देश्य तो इस बार धान के खेतों, हरे भरे जंगलों और बादलों के
साथ आइस पाइस खेलते सूरज का सड़कों पर पीछा करने का था। तो अपने दो मित्रों
के साथ चौदह तारीख की सुबह हम अपनी यात्रा पर निकल पड़े।
बरसाती मौसम में झारखंड के अंदरुनी इलाकों में सफ़र करना रुह को हरिया देने वाला अनुभव है। झारखंड की धरती का शायद ही कोई कोना हो जो इस मौसम में हरे रंग के किसी ना किसी शेड से ना रँगा होता है । तो आप ही इन तसवीरों से ये निर्णय लीजिए कि हमारी आशाओं के बीज किस हद तक प्रस्फुटित हुए?
राँची से नेतरहाट की ओर जाने का रास्ता दक्षिणी छोटानागपुर के नगरी, बेरो, भरनो और सिसई जैसे कस्बों से हो कर गुजरता है। कस्बों के आस पास के तीन चार किमी के फैलाव को छोड़ दें तो फिर सारी दुनिया ही हरी लगने लगती है।
पेड़ यूँ झुका हुआ, धान पर रुका हुआ धानी रंग रूप पर जैसे कोई फिदा हुआ
हरी भरी धान की काया, उस पर जो बादल गहराया प्रकृति का ये रूप देख मन आनंदित हो आया
दक्षिण कोयल नदी पर जर्जर हो चुके इस पुल को हमने अपना पहला विश्रामस्थल बनाया
सिसई पार करते ही हमारी मुलाकात दक्षिणी कोयल नदी से होती है। लोहड़दगा के पास के पठारों से दक्षिण पूर्व बहती हुई ये नदी गुमला और फिर सिंहभूम होती हुई उड़ीसा के राउरकेला में शंख नदी से मिलकर ब्राह्मणी का रूप धर लेती है। झारखंड की तमाम अन्य नदियों की तरह ये भी एक बरसाती नदी है जो इस मौसम में अपना रौद्र रूप दिखाती है।
सिसई गुमला रोड
गुमला से नेतरहाट जाने के पहले घाघरा प्रखंड पड़ता है। अपनी यात्रा के ठीक एक हफ्ते पहले भारी बारिश के बीच मैंने घाघरा नेतरहाट रोड की एक पुलिया बहने की बात पढ़ी थी। सो एक डर मन में बैठा था कि अगर रास्ता खराब निकला तो क्या वापस लौट जाना पड़ेगा। पर हमारा भाग्य था कि पिछले कुछ दिनों में तेज बारिश ना होने से पुलिया के डायवर्सन को पार करने में हमें कठिनाई नहीं हुई।
इस इलाके से दक्षिणी कोयल की बड़ी बहन उत्तरी कोयल बहती है। इसे पार करने के बाद घाघरा का रास्ता दो भागों में बँट जाता है। दाँयी और निकलने से आप बेतला के राष्ट्रीय अभ्यारण्य में पहुँचते हैं तो बाँयी ओर का रास्ता आपको नेतरहाट घाटी में ले जाता है।
घाघरा नेतरहाट मार्ग
नेतरहाट तक की चढ़ाई घने जंगल से होकर गुजरती है। वैसे तो इस रास्ते में सामान्य आवाजाही कम ही है पर कार चलाने वालों को बसों के आलावा बॉक्साइट अयस्क से लदे ट्रकों को ओवरटेक करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। इन जंगलों में बाँस के पेड़ों की बहुतायत है। सघनता ऐसी की नीचे घाटी का नजारा देखने के लिए इनके पतले तनों के बीच की दरारों से झांकने के लिए आप मजबूर हो जाएँ।
ऐ बारिश तू ही तो दिखाती है मुझे अपना चेहरा !
अगर मानसूनी झारखंड की हरियाली में कोई व्यवधान डाल पाता हे तो वो हैं यहाँ की लाल मिट्टी। ये मिट्टी ज्यादा उपजाऊ नहीं होती। इसलिए धान की फसल कटने के बाद सिंचाई की अनुपस्थिति में इसका ज्यादा उपयोग नहीं हो पाता।
झारखंड की लाल मिट्टी
पेड़ हों पहाड़ हों, धान की कतार हो ऐसी वादियों में बस प्यार की बयार हो
हर भरे खेतों से निकल अचानक ही जंगलों का आ जाना झारखंड के रास्तों की पहचान है।
नेतरहाट महुआडांड़ रोड
नेतरहाट से महुआडांड़ का रास्ता बेहद मनमोहक है। यहाँ रास्ते के दोनों तरफ या तो खेत खलिहान दिखते हैं या बड़े बड़े चारागाह। मजा तब और आता है जब इनसे गुजरते गुजरते अचानक से सामने कोई घाटी और उससे सटा जंगल आ जाए।
महुआडांड़ से डुमरी के रास्ते में हमें मिला ये बरगद का पेड़
आशा है झारखंड की हरियाली ने आपका मन मोहा होगा। झारखंड की इस मानसूनी यात्रा की अगली कड़ी में ले चलेंगे आपको यहाँ के मशहूर पर्वतीय स्थल नेतरहाट में।