Monday, December 10, 2018

पक्षियों के संग हजारीबाग के रंग A birding trip to Charwa Dam Hazaribagh

राँची से हजारीबाग महज़ दो घंटे का रास्ता है। पिछले तीन दशकों में दर्जनों बार इस शहर से होते हुए गुजरा हूँ पर कभी भी ये शहर मेरी मंजिल नहीं रहा। पिछले हफ्ते हजारीबाग के पक्षी प्रेमी और शिक्षक शिव शंकर जी ने नेचर वॉक के एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया और फिर राँची के कुछ अन्य प्रकृति और पक्षी प्रेमियों के साथ मिलकर वहाँ जाने का कार्यक्रम बन गया। 

नवंबर के आख़िरी हफ्ते के रविवार की सुबह सवा पाँच बजे घने अँधियारे में हम तीन पक्षी प्रेमी हजारीबाग की ओर कूच कर चुके थे। राँची में ठंड ने अपनी गुलाबी दस्तक दे दी थी। टोपी और जैकेट में सिकुड़े हम सब अपने शौक़ और कामकाज़ की बातों के बीच हँसी मजाक के तड़कों से वातावरण में गर्माहट घोल रहे थे। मेरे पर्वतारोही मित्र प्रवीण सिंह खेतवाल तो मेरी कई यात्राओं के सहभागी रहे हैं पर डॉ. शेखर शर्मा (जो एक शौकिया फोटोग्राफर भी हैं) से ये हम दोनों की पहली मुलाकात थी।


ओरमाँझी पहुँचते पहुँचते अपनी नींद को त्याग कर सूरज अपनी लाल पोशाक में साथ साथ सफ़र करने को तैयार हो गया था और खुशी की बात ये रही कि उसने पूरे दिन और शाम तक कभी भी बादलों को आस पास फटकने भी नहीं दिया ताकि हमारी छाया चित्रकारी निर्विघ्न चलती रहे।

सवा सात बजे हमारी गाड़ी हजारीबाग में प्रवेश कर चुकी थी। हजारीबाग को झारखंड के एक हरे भरे शहर के रूप में जाना जाता है। जैसा नाम से ही स्पष्ट है कि कालांतर में कभी ये जगह ढेर सारे बाग बागीचों से भरी पूरी रही होगी और तभी इसे हजार बागों के शहर के नाम से जाना गया होगा। हालांकि कि कुछ अंग्रेज लेखक इस नाम को इस इलाके के प्राचीन गाँव हजारी से भी जोड़ते हैं। ख़ैर सच जो भी हो आज इस शहर में बाग तो गिने चुने ही रह गए हैं पर शहर की चौहद्दी को घेरता एक घना जंगल आज भी है जिसे हजारीबाग राष्ट्रीय उद्यान के रूप में संरक्षित किया गया है। शहर से 18 किमी की दूरी पर वन्य जीव आश्रयणी भी है जहाँ का एक चक्कर मैं आप सबको पहले ही लगवा ही चुका हूँ

शिव शंकर जी वहाँ छात्रों के एक समूह के साथ हमारा पहले से इंतज़ार कर रहे थे। वहाँ पहुँचते ही लगभग आधा दर्जन छोटी बड़ी गाड़ियों में पूरा समूह छड़वा बाँध की ओर चल पड़ा। वैसे तो हज़ारीबाग में पक्षियों को देखने के लिए कई हॉटस्पाट हैं पर उनमें कैनरी हिल और छड़वा बाँध सबसे प्रमुख हैं। छड़वा बाँध अभी साइबेरिया, रूस और मंगोलिया से आने वाले प्रवासी पक्षियों का गढ़ बना हुआ है इसलिए पक्षियों के अवलोकन के लिए वही बिंदु ज्यादा उपयुक्त समझा गया। पन्द्रह बीस मिनटों में ही बाँध के पास पहुँच चुके थे।

अगीया ( Indian  Bush Lark )


बाँध की ओर हम कुछ ही कदम चले थे कि हमें भारतीय अगीया जिसे अंग्रेजी में इंडियन बुश लार्क कहा जाता है एक छोटे से पौधे के शीर्ष पर आसन जमाए बैठा मिला। सूर्य की दमकती पीली रोशनी के बीच इसके हल्के भूरे छोटे शरीर को देख पाना आसान नहीं था। अगीया एक ऐसा पक्षी है जो सूखे स्थानों में झाड़ियों के आस पास मँडराता है। गौरेया की तरह ये आपको शायद ही कभी तार या शाखाओं पर बैठा मिलेगा।

लार्क समुदाय के पक्षी अपने सर, परों और वक्ष पर के चित्तीदार नमूनों से पहचाने जाते हैं। अगीया की एक खासियत ये भी है कि प्रजनन के समय मादा का ध्यान आकर्षित करने के लिए नर ऊँची उड़ाने भरता है और नीचे पैराशूट की तरह उतरने के पहले पंखों से नर्तन करता दिखता है। इसका गीत भी मधुर होता है। बहरहाल मुझे तो ये चुप्पी साधे और हमारी ओर टकटकी लगाए देखता मिला।

अगीया की तस्वीर खींच ही रहा था कि आगे झुंड में लोगों को शिकारी पक्षी शिकरा दिखाई दिया। मैंने उस पर एक नज़र डाली ही थी कि वो मुँह घुमाकर दूसरी ओर देखने लगा। मैं भी धीरे धीरे उस पेड़ के समीप आ गया पर वो चित्र लेने के लिए एप्वाइंटमेंट देन के मूड में नहीं था, सो मन मार के मुझे आगे बढ़ना पड़ा। 

लंबी पूँछ वाला तिरंगा लहटोरा( Long Tailed Shrike Tricolour) जिसे कहीं कही लटोरा भी कहा जाता है।
हम लोग छड़वा बाँध के जलाशय की तरफ जिस राह से बढ़ रहे थे वो राह चार पाँच फुट के झाड़ीनुमा पौधों के बीच से गुजरती थी। ऐसे इलाके लहटोरे के लिए बिल्कुल मन माफिक होते हैं और कुछ ही देर में मुझे लंबी पूँछ वाले लहटोरे के दर्शन हो ही गए। ये लहटोरे से इस साल की मेरी तीसरी मुलाकात थी। फरवरी में दुधवा और सितंबर में किन्नौर की सांगला घाटी में दिखने के बाद ये हजारीबाग में भी दिख गया। लंबी पूँछ वाले लहटोरे की कई उप प्रजातियाँ हैं जिनमें काले सिर वाला लहटोरा तिरंगा लहटोरा या Tricolour के नाम से जाना जाता है। किन्नौर में में जो लहटोरा मुझे दिखा था उसका सिर स्याह रंग का था।  

 पतरिंगा (Green Bee Eater)
मेरी अगली मुलाकात आसानी से दिख जाने वाले इस पतरिंगे से हुई। राँची में मेरे घर के आस पास झुंड में ये लगभग मुझे रोज़ ही नज़र आता है। उड़ते उड़ते ही कीट पतंगों का शिकार करने वाला ये हरे रंग का पक्षी जब उड़ता है तो इसकी एंटीने के समान पूँछ देख कर इसे आप दूर से ही  पहचान सकते हैं। अगर संयोग से आप इसकी तस्वीर एक बार में नहीं भी खींच पाए तो निराश मत होइएगा। इसकी आदत है कि ये जिस डाल से उड़ान भरता है अक़्सर उसी पर ग्लाइड करता हुआ वापस आकर बैठता है। सुबह सुबह आप अक्सर इन्हें झुंड में तार या फिर किसी डाल पर बैठे देख सकते हैं।

हजारीबाग सब्जियों की खेती के लिए जाना जाता है। चित्र में टमाटर के खेत
अब हमें टमाटर के खेतों को पार करते हुए जलाशय के किनारे तक पहुँचना था। मिटटी गीली थी और हम सभी सँभल सँभल कर आगे बढ़ रहे थे। एक गलत कदम हमारी पतलून का हुलिया खराब करने के लिए काफी था।  टमाटर के पौधों के बीचो बीच लगे डंडों पर लहटोरे, मुनिया और अगीया बार बार आ कर बैठ रहे थे़। एक बार उनकी तस्वीर ले चुकने के बाद हमारा ध्यान अब जलीय पक्षियों की ओर हो चला था। अब हम पानी के एक किनारे के काफी करीब पहुँच चुके थे पर जलीय पक्षी बाँध की दूसरी ओर तैर रहे थे। दूरबीन और कैमरे के बिना नंगी आँखों से उन्हें पहचान पाना बेहद मुश्किल था।

अपने अपने लक्ष्यों पर "कैमराभेदी" नज़र
सरपट्टी सवन (Bar Headed Goose) यही प्रवासी पक्षी था हमारी इस नेचर वॉक का मुख्य आकर्षण
हजारीबाग में हर साल नवंबर के महीने में प्रवासी पक्षी आने लगते हैं। दूरबीन पर नज़रें गड़ाने पर वहाँ Common Pochard, लाल सिरी (Red Crested Pochard), Tufted Duck, छोटी पनडुब्बी (Little Grebe), सुरखाब (Ruddy Shellduck) , झिरिआ (Little Ringe Plover) जैसे तमाम जलीय पक्षी दिखे। तभी सिर पट्टी सवन जिन्हें खास तौर पर देखने हम सब आए थे वहाँ कई जत्थों में आ पहुँचे। 

गर्मियों में ये पक्षी मध्य एशिया की ऊँचाई पर स्थित झीलों के आस पास अपना अड्डा जमाते हैं। झीलों के अगल बगल की घास ना केवल इनके आहार का काम करती है बल्कि वहीं इनका घोंसला भी बनता है। इस पक्षी की पहचान इसके सिर पर काली धारियों का होना है। मध्य एशिया के देशों में गर्मी बिताने के बाद ये पक्षी हिमालय पार कर भारत के विभिन्न हिस्सों में जाड़े में आ जाते हैं। ऍसा करते हुए ये हजारों किमी की यात्रा करता है और सबसे मजेदार बात तो ये कि पहाड़ पार करते समय इन्हें आठ हजार मीटर की ऊँचाई के भी ऊपर से उड़ते देखा गया है। 

सरपट्टी सवन (Bar Headed Goose) की उड़ान

लंबी पूँछ वाले लहटोरे से तो मेरी पुरानी मुलाकात थी पर भूरे लहटोरे से मैं यहाँ पहली बार मिल रहा था। दरअसल लहटोरे की प्रजाति अपनी आँख और माथे पर चलती काली पट्टी से पहचानी जाती है। कई लोग हँसी में इनकी तुलना आँखों में काली पट्टी बाँधे डकैतों से कर देते हैं। वैसे ये तुलना नाजायज़ भी नहीं। सामान्य सा दिखने वाले इस प्रजाति के पक्षी एक बेहद निर्मम शिकारी होते हैं। ये सामान्यतः कीड़ों, छिपकलियों और छोटे पक्षियों का शिकार करते हैं। अपने शिकार पर काबू करने के बाद कई बार ये उसे काँटेदार झाड़ियों और पौधों पर दे मारते हैं। काँटों में इस तरह भोजन को लटकाकर खाने की वजह से इन्हे कसाई पक्षी (Butcher Bird) भी कहा जाता है। 

भूरा लहटोरा (Brown Shrike) जिसे पक्षी प्रेमी एक बेरहम शिकारी के रूप में जानते हैं।

Wednesday, November 21, 2018

लेह से खारदोंग ला होते हुए दिस्कित तक का सफ़र In Pictures : Route of Leh to Diskit via Khardung La

लेह से पांगोंग त्सो की यात्रा की तुलना मे लेह से श्योक या नुब्रा घाटी का मार्ग ना केवल छोटा है बल्कि शरीर को भी कम ही परेशान करता है। लेह से हुंडर तक की दूरी सवा सौ किमी की है जबकि पांगोंग जाने में लगभग सवा दो सौ किमी का सफ़र तय करना पड़ता है। इस सफ़र में आप लद्दाख के खारदोंग ला से रूबरू होते हैं जिसका परिचय गलत ही सही पर विश्व के सबसे ऊँचे दर्रे के रूप में कराया जाता था। हालांकि अब ये स्पष्ट है कि इसकी ऊँचाई बोर्ड पर लिखे 18380 फीट ना हो कर मात्र 17582 फीट है जो कि चांग ला के समकक्ष है। स्थानीय भाषा में खारदोंग ला पुकारे जाने वाले इस दर्रे को कई जगह रोमन में खारदुंग ला भी लिखा दिखाई देता है। यहाँ तक कि दर्रे पर ही आप दोनों तरह के बोर्ड देख सकते हैं।


बहरहाल आज की इस पोस्ट में  मेरा इरादा आपको लेह से दिस्कित तक के इस खूबसूरत रास्ते की कुछ झलकियाँ दिखाने का है। चित्रों का सही आनंद लेने के लिए उस पर क्लिक कर उनको अपने बड़े रूप में देखें।
लेह के दो छोरों पर बाँयी ओर दिखता लेह पैलेस और दाहिनी तरफ शांति स्तूप
दरअसल अगर लेह शहर को संपूर्णता से देखना है तो इसकी उत्तर दिशा में खारदोंग ला या खारदुंग ला की सड़क की ओर बढ़ना चाहिए। लेह से खारदुंग ला जाने वाली सड़क तेजी से ऊँचाई की ओर उठती है। इसके हर घुमाव पर आप हरे भरे पेड़ों के बीच बसे लेह शहर को अलग अलग कोणों से देख सकते हैं। सबसे बेहतर कोण वो होता है जब आप एक ही फ्रेम में इसके दो पहचान चिन्हों शांति स्तूप और लेह पैलेस को एक साथ देख पाते हैं।
पर्वत की रंगत को बदलते बादल
खारदोंग ला लेह से मात्र 39 किमी की दूरी पर है और इतनी ही दूरी में आप लेह से लगभग 1850 मीटर ऊपर बर्फ से लदी घाटियों में पहुँच जाते हैं। इतनी जल्दी शरीर इस ऊँचाई का अभ्यस्त नहीं हो पाता इसीलिए गाड़ी वाले ताकीद करते हैं कि यहाँ पन्द्रह बीस मिनट से ज्यादा ना रुकें। लद्दाख आने वाले किसी भी यात्री के लिए खारदोंग ला इस लिए भी यादगार साबित होता है क्यूँकि यहाँ से गुजरते या लौटते वक़्त बर्फबारी होने के आसार बहुत ज्यादा होते हैं। आप तो जानते ही हैं  की बर्फ के इन  गिरते छोटे छोटे टुकड़ों और फाहों का शरीर से स्पर्श पाने के लिए मैदानवासी कितना तरसते हैं। मुझे भी ये आनंद नुब्रा से लेह वापस लौटते समय मिला।
खारदोंग ला पर बर्फ हर मौसम में मिलती है। 

स्थानीय भाषा में खारदोंग ला जिसे कई जगह रोमन में खारदुँग ला भी लिखा देखा मैंने
बर्फबारी के बाद पहाड़ों पर बना खूबसूरत नमूना
खारदोंग ला से आगे का रास्ता नुब्रा और श्योक घाटियों का दरवाजा है। नुब्रा नदी के किनारे चलते हुए आप पनामिक होते हुए सियाचिन घाटी तक पहुँच सकते हैं वहीं श्योक नदी आपको दिस्कित मठ, हुंडर के ठंडे मरुस्थल और तुरतुक जैसे सीमा के पास के गाँव से मिलवाती है। इस रास्ते में मिलने वाली चट्टानों की आकृतियाँ देखते ही बनती हैं। यहाँ की चट्टानों का स्वरूप बहुत कुछ काज़ा से लोसर जाते वक़्त दिखती चट्टानों से मिलता है।
चट्टानें कैसी कैसी ?

पर्वतों के बीच बनी कंदरा


इस रास्ते की खूबसूरती का अहसास तब होता है जब आपको श्योक नदी के पहले दर्शन होते हैं। श्योक मटमैली सी नदी है जिसका पानी अपने आस पास की स्याह रेत को काटते काटते उसी के रंग का हो जाता है। इसके किनारे बसे गाँवों की हरियाली देखते ही बनती है। यहाँ का मंज़र तब और हसीन हो जाता है जब इन गाँवों के बीच से हँसता खिलखिलाता कोई नाला निकलता हुआ इस नदी में विलीन होता दिखता  है।

श्योक नदी में पहाड़ से बहकर आती एक धारा

श्योक नदी घाटी
श्योक नदी के किनारे उलटी दिशा में चलते हुए पांगोंग त्सो तक पहुँचा जा सकता है। आजकल ज्यादातर यात्री समय बचाने के लिए नुब्रा से लेह लौटने के बजाय इसी सड़क से सीधे पांगोंग त्सो चले जाते हैं।
दिस्कित में नीचे दिखता एक नेचर कैंप
दिस्कित मठ से दिखता श्योक घाटी का एक खूबसूरत नज़ारा


कश्मीर लद्दाख यात्रा में अब तक 

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Wednesday, October 31, 2018

पैंगांग झील ( पांगोंग त्सो) और वो मजेदार वाकया ! Beauty of Pangong Tso

इस श्रंखला की पिछली कड़ी में मैंने आपको  लेह के ड्रक वाइट लोटस स्कूल से होते हुए पैंगांग त्सो तक के रास्ते की सैर कराई थी। वैसे बोलचाल में पैंगांग के आलावा इस झील को पेंगांग और पांगोंग के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। तिब्बती भाषा में पांगोंग त्सो शब्द का मतलब ऊँचे चारागाह पर स्थित झील होता है। पैंगांग झील करीब 134 किमी लंबी है और इस लंबाई का लगभग पचास पचपन किमी हिस्सा भारत में पड़ता है। पर कोई भी सड़क फिलहाल झील के किनारे किनारे सीमा तक नहीं जाती। घुसपैठ रोकने के लिए सिर्फ सेना के जवान ही इलाक़े में गश्त लगाते हैं।
पैंगांग ( पांगोंग त्सो) में मस्ती का आलम
मैंने सबसे पहली अत्याधिक ऊँचाई पर स्थित झील उत्तरी सिक्कम में देखी थी। 17800 फीट की ऊँचाई पर स्थित इस एक चौथाई जमी हुई झील को देखना मेरे लिए बेहद रोमांचक क्षण था। ऍसा इसलिए भी था कि तब तक यानि 2006 में इतनी ऊँचाई पर मैं कभी गया नहीं था। दूसरी बात ये थी कि गुरुडोंगमर झील के बारे में पहले से मुझे कुछ खास पता नहीं था, इसीलिए बिल्कुल किसी अपेक्षा के जा पहुँचा था गुरुडोंगमर तक। पर पैगांग त्सो ! क्या उसके लिए यही बात कही जा सकती थी? यहाँ तो सब उल्टा था। हिंदी फिल्मों और नेट पर लोगों ने शायद ही कोई कोण छोड़ा हो इस खूबसूरत झील का। 

झील ने पूछा आसमान से बोलो सबसे नीला कौन ?

फिर भी लद्दाख जाते समय इस झील का आकर्षण मेरे लिए कम नहीं हुआ था। होता भी कैसे? झील के बदलते रंगों को अपनी आँखों से देखने की उत्कंठा जो थी। वैसे भी पैंगांग (पांगोंग) की विशालता इसे बाकी झीलों से अलग कर देती है। गुरुडोंगमर हो या चंद्रताल या फिर इतनी ऊँचाई पर स्थित कोई अन्य झील, पैंगांग के विस्तृत फैलाव के सामने सब की सब बौनी हैं। अब बताइए जहाँ पैंगांग का क्षेत्रफल सात सौ वर्गकिमी है वही गुरुडोंगमर और चंद्रताल दो वर्ग किमी से भी कम के क्षेत्रफल  में सिमटे हुए हैं।

कितना विस्तृत कितना नीला ...है प्रभु तेरी अनूठी लीला
छः घंटे की थका देने वाली यात्रा का असर मेरे परिवार के अन्य सदस्यों पर पड़ चुका था। मुझे मालूम था कि एक बार टेंट के अंदर लिहाफ में घुसने के बाद इनके लिए बाहर आना मुश्किल होगा इसलिए मैं सबको ले कर सीधे झील की ओर चल पड़ा। झील की  नीली रंगत और हल्की ठंडी हवा ने गाड़ी से उतरते ही सबकी आधी थकान तो मिटा दी।

गहरे नीले जल के एक ओर थोड़े दलदली थोड़े सूखे मैदान थे और झील के दूसरी तरफ नंगे पहाड़ों का जमावड़ा था  जिनकी ढाल अलग अलग रंगों में सजी दिख रही थी। सूर्य की रोशनी के घटने बढ़ने से ना केवल यहाँ का पानी रंग बदलता है बल्कि सामने के पर्वत भी अलग अलग परिधानों को पहन लेते हैं। झील को एकटक ताकते हुए मन में जो सुकून का भाव जाग्रत होता है उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

बादल, पर्वत, झील मैदान.. इनके आगे क्या है इंसान ?
मन ही मन सोचा आख़िर पैगांग में इतना पानी आता कहाँ से है? बाद में पता चला की भारत के इलाके से दो धाराएँ पैगांग में मिलती हैं। जहाँ ये झील से मिलती हैं वहाँ की भूमि दलदली हो जाती है। गर्मी के दिनों में इसी दलदली ज़मीन के आसपास ब्राह्मणी बत्तख, सिर पर धारी वाली बत्तख और भूरी गंगा चिल्ली दिखाई पड़ती हैं। झील के भारतीय सिरे के पास का पानी इतना खारा है कि उसमें मछलियाँ नहीं है लेकिन दलदली भूमि के पास उगने वाली झाड़ियों और जड़ी बूटियों से ही ये पक्षी अपना भोजन प्राप्त करते होंगे ऐसा अनुमान है।
Three Idiots Point पर पक्षियों का जमावड़ा
पानी के बीचो बीच जो ज़मीन दिख रही है वहीं 3 Idiots के आख़िरी दृश्य का फिल्मांकन हुआ था। झील के पास कुछ वक्त बिताकर हम लोग अपने टेंट में लौट आए।
इक मीठी यादगार .....पैंगांग के द्वार
एक रात का हमारा आशियाना
थोड़ा विश्राम कर साढ़े चार बजे मैं अकेले ही झील के पश्चिमी किनारे की ओर जाने की सोचने लगा। तभी एक सज्जन जो कुछ ही देर पहले मेरी बगल वाले टेंट में आए थे मेरे पास आ कर बोले..क्या देख रहे हैं?

झील की ओर नज़रें गड़ाए मैंने उनसे कहा और क्या देखूँगा यहाँ आकर?

मेरा इतना कहना था कि वो अपनी निराशा की दुख भरी गाथा ले कर  बैठ गए। बताइए तो पाँच घंटा में हड्डी का बाजा बजा के बस यही झील दिखाने लाया है। ऊपर से यहाँ की ठंड देख रहे हैं। मिसेज और बच्चे को इतनी  ठंड लग रही  है और यहाँ है क्या? ना बोटिंग ना कुछ।

उनकी बात सुन के मुझे तो मन ही मन चिढ़ हुई कि कैसे आदमी से पाला पड़ गया?  फिर भी अपनी आवाज़ को संयत करके कहा कि आप बोटिंग की क्या बात कर रहे हैं? क्या आपको ढलती धूप के साथ झील के बदलते रंग की सुंदरता नहीं दिखी? यही देखने के लिए तो लोग यहाँ आते हैं।

मेरे जवाब से वे ज़रा भी संतुष्ट नहीं लगे। कहने लगे देखिए वो तो ठीक है पर हम मुंबई से इस झील के बारे में इतना सुनने के बाद यहाँ आए है। ज़ंस्कर नदी में हम लोग रिवर राफ्टिंग किए कितना मजा आया। यहाँ तो adventure के नाम  पर  कुछ है ही नहीं। 

मुझे अब उनकी बातों से गुस्से के बजाए मन ही मन  हँसी आ रही थी। मैंने कहा कि तब तो आपको यहाँ आना ही नहीं चाहिए था। अब आ गए हैं तो चलिए मैं आपको झील की खूबसूरती पास से दिखा लाऊँ।

उन्होंने मेरे प्रस्ताव पर तुरंत प्रश्न दाग दिया। आप वाइफ से पूछे हैं?

मैंने भी पलटते जवाब दिया। क्या पूछना है वो आराम कर रही हैं।

ठीक है पर हम पूछ के आते हैं।

पाँच मिनट बाद वही सज्जन अपनी पत्नी और बच्चे के साथ बड़बड़ाते हुए बाहर निकले। कितना ठंडा है टेंट में। हम यहाँ नहीं रह सकते। हम यहाँ से जा रहे हैं सीमेंट वाले एकोमोडेशन में आपको जाना है झील की तरफ तो जाइए।

मुझे समझ आ गया कि टेंट के अंदर घुसते ही Home Ministry से जो dose मिला है ये उसी का असर है।

सूखी ज़मी सूखा जहां... बोलो तुम्हीं खाऊँ कहाँ ? 😂
ख़ैर मैं अकेले ही धीमे कदमों से झील की ओर बढ़ गया। उस शख़्स की बात से ध्यान आया कि इस झील के पूर्वी सिरे में तिब्बत की सीमा पड़ती है। उस सीमा से चीन का एक राजमार्ग गुजरता है जो झील को छूते हुए निकलता है। ये राजमार्ग अक्साई चीन को ल्हासा से जोड़ता है। वहाँ आप अपनी नाव ले कर झील में नौकायन कर सकते हैं। मुझे लगा कि मजाक में ही उन सज्जन को चीन की नागरिकता ग्रहण करने की सलाह दे देनी थी।

झील के पश्चिमी किनारे में चाय कॉफी के साथ दो तीन फास्ट फूड की दुकाने हैं। वहाँ देशी विदेशी पर्यटकों का जमघट लगा हुआ था। युवा सेल्फी के लिए तरह तरह के प्रयोग से झील के साथ अपनी यादगार को अंतिम रूप देने में जुटे हुए थे। दूर कोई स्थानीय आसपास के गाँव से दो याकों को सजा कर लाया था। कुछ भीड़ वहाँ लगी थी।

वो शामें, वो मौसम, झील किनारा.. वो चंचल हवा
झील का जल किनारे छिछला था। तलहटी पर सिर्फ छोटे छोटे पत्थरों का जखीरा था। वहीं एक चट्टान पर मैंने आसन जमाया और शाम की उस वेला को आँखों मैं क़ैद करने लगा। शाम के वक्त यहाँ हवा बेहद तेज हो जाती है। इसलिए झील के पास पूरी तैयारी से (यानि सिर और कान अच्छी तरह ढककर) जाना चाहिए।
ढल गया दिन हो गई शाम... भागो टेंट में वर्ना ठंड में हो जाएगा काम तमाम
जैसे जैसे शाम ढलने लगी टेंट के अंदर ठंडक भी बढ़ी। हालात ये हो गए कि हम सबने एक के ऊपर एक तीन रजाइयाँ चढ़ा लीं। अब उनका भार इतना हो गया कि नीचे शरीर टस से मस नहीं हो पा रहा था। ख़ैर रात में खाने के लिए बाहर निकलने  की मज़बूरी थी तो पूरी ताकत लगा कर उस बोझ से बाहर निकले।  

टेंट में सोलर पैनल से दी जाने वाली बिजली खाने के बाद बंद कर दी जाती है। अँधेरी रात में बाहर निकले तो ये चमकदार चाँद मुस्कुराता हुआ नज़र आया पर बाहर गिरते तापमान में ज्यादा देर उनकी मुस्कान का आनंद लेना खतरे से खाली नहीं था। फिर जल्दी उठने की सोच रजाई के भीतर दुबक लिए।

रात का समा, झूमे चंद्रमा....
सुबह पाँच बजे हिम्मत बटोरकर सूर्योदय देखने निकले। जून के उस भीड़ भाड़ वाले मौसम  में भी बाहर उस वक़्त इक्का दुक्का प्राणी ही  दिखाई दिए।

सूरज निकला भी तो बादलों ने उसे अपने आगोश में भर लिया। मुझे सुबह भी झील के किनारे किनारे टहलने का मन था। जब उधर कोई जाता नहीं दिखा तो फिर मैंने एकला चलो रे का मार्ग अपनाया और तब तक चलता रहा जब तक सामने से पहाड़ी  कुत्तों का एक झुंड आता नहीं दिख गया। अब इन हट्टे कट्टे झबरेदार कुत्तो् का कोई  भरोसा तो था नहीं तो चुपचाप सड़क से उतर कर झील के किनारे शरण ली।

बीती विभावरी जाग री..अम्बर पनघट में डुबो रही- तारा-घट ऊषा नागरी

भोर का सन्नाटा
झील से जी भर आँखों ही आँखों में बात कर मैंने उससे आख़िरी विदा ली। एक घंटे बाद हम हेमिस बौद्ध मठ होते हुए लेह की वापसी की राह पर थे। अगले दिन नुब्रा घाटी हमारा इंतज़ार कर रही थी। चलेंगे उस सफ़र पर भी इस श्रंखला की अगली कड़ी में..
आ गई विदा की बेला


कश्मीर लद्दाख यात्रा में अब तक 

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Tuesday, October 23, 2018

पंडाल परिक्रमा दुर्गा पूजा 2018 बकरी बाजार राँची : तीन स्थापत्य शैलियों के मिश्रण से बना मंदिर Best Pandals of Durga Puja Ranchi 2018 Part - V

राँची के तीन सबसे सुंदर पंडालों को दिखाने के बाद पंडाल परिक्रमा की इस आख़िरी कड़ी में आज बारी है बकरी बाजार और शेष उल्लेखनीय पंडालों की। राँची के सबसे बड़े पंडाल होने का गौरव बकरी बाजार के पंडाल को प्राप्त है। हालांकि मैंने अक्सर देखा है कि यहाँ पंडाल बाहर से  जितना भव्य होता है अंदर से उतना कलात्मक नहीं होता।


इस बार यहाँ का पंडाल तीन मंदिरों को मिलाकर बनाया गया था। पहला मंदिर द्रविड़ शैली में गोपुरम के साथ था। जबकि दूसरा और तीसरा मंदिर गोथिक और नागर शैली में बनाया गया था। 


सफेद रंग के पूरे मंदिर को अगर दिन में देखा जाए तो कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ता पर रात में जिस तरह से प्रकाश की सहायता से इसके रंगों को बदला जा रहा था वो वृंदावान के प्रेम मंदिर वाले माहौल तक पहुँचाने के लिए काफी था।

Saturday, October 20, 2018

पंडाल परिक्रमा दुर्गा पूजा 2018 राँची : कैसे उतर आया बांग्ला स्कूल में स्वप्न लोक? Best Pandals of Durga Puja Ranchi 2018 Part - III

ज़रा सोचिए कि अचानक रातों रात आपको स्वप्न लोक में पहुँचा दिया जाए तो वो दुनिया कैसी होगी? आपका जायज़ सा सवाल होगा कि मैं तो यहाँ आपके साथ दुर्गा पूजा के इस पंडाल की झलक लेने आया था। आप मुझे स्वप्न लोक में क्यूँ ले जा रहे हैं। अब क्या बताएँ जब माँ का मंडप ही स्वप्न लोक के रास्ते में हो तो वहाँ जाना ही पड़ेगा ना।   

स्वप्न लोक का द्वार
इस बार इस स्वप्न लोक की रचना हुई थी ओसीसी क्लब द्वारा बांग्ला स्कूल में निर्मित पंडाल में। अब तक राँची के जितने पंडालों की आपको मैंने सैर कराई वो सब इंद्रषुनषी रंगों से सराबोर थे पर इस बार बिना चटख रंगों के खूबसूरती लाने की चुनौती ली थी ओसीसी क्लब के महारथियों ने। हालांकि जितनी उम्मीद थी उतना तो प्रभाव ये पंडाल नहीं छोड़ पाया पर बँधे बँधाए ढर्रे से कुछ अलग करने का उनका ये प्रयास निश्चय ही सराहनीय था।
राजहंसों का जोड़ा

भीड़ से घिरे पंडाल तक सिर्फ नीली दूधिया रौशनी फैली हुई थी। मुख्य द्वार के ऊपर फैली पतली चादर का डिजाइन ऐसा था मानो काली रात में आसमान में तारे टिमटिमा रहे हों। पंडाल के पास राजहंस का एक जोड़ा हमारा स्वागत कर रहा था। हंस को प्रेम से भरे पूरे पवित्र और विवेकी पक्षी के रूप में जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि ये एक बार जब अपने साथी को चुन लेता है तो उसी के साथ सारा जीवन बिताता है। हंस के इन्हीं गुणों के कारण उन्हें इस पंडाल का प्रतीक बनाया गया था।
बहती नदी में तैरते फूलों का निरूपण



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