Wednesday, November 21, 2018

लेह से खारदोंग ला होते हुए दिस्कित तक का सफ़र In Pictures : Route of Leh to Diskit via Khardung La

लेह से पांगोंग त्सो की यात्रा की तुलना मे लेह से श्योक या नुब्रा घाटी का मार्ग ना केवल छोटा है बल्कि शरीर को भी कम ही परेशान करता है। लेह से हुंडर तक की दूरी सवा सौ किमी की है जबकि पांगोंग जाने में लगभग सवा दो सौ किमी का सफ़र तय करना पड़ता है। इस सफ़र में आप लद्दाख के खारदोंग ला से रूबरू होते हैं जिसका परिचय गलत ही सही पर विश्व के सबसे ऊँचे दर्रे के रूप में कराया जाता था। हालांकि अब ये स्पष्ट है कि इसकी ऊँचाई बोर्ड पर लिखे 18380 फीट ना हो कर मात्र 17582 फीट है जो कि चांग ला के समकक्ष है। स्थानीय भाषा में खारदोंग ला पुकारे जाने वाले इस दर्रे को कई जगह रोमन में खारदुंग ला भी लिखा दिखाई देता है। यहाँ तक कि दर्रे पर ही आप दोनों तरह के बोर्ड देख सकते हैं।


बहरहाल आज की इस पोस्ट में  मेरा इरादा आपको लेह से दिस्कित तक के इस खूबसूरत रास्ते की कुछ झलकियाँ दिखाने का है। चित्रों का सही आनंद लेने के लिए उस पर क्लिक कर उनको अपने बड़े रूप में देखें।
लेह के दो छोरों पर बाँयी ओर दिखता लेह पैलेस और दाहिनी तरफ शांति स्तूप
दरअसल अगर लेह शहर को संपूर्णता से देखना है तो इसकी उत्तर दिशा में खारदोंग ला या खारदुंग ला की सड़क की ओर बढ़ना चाहिए। लेह से खारदुंग ला जाने वाली सड़क तेजी से ऊँचाई की ओर उठती है। इसके हर घुमाव पर आप हरे भरे पेड़ों के बीच बसे लेह शहर को अलग अलग कोणों से देख सकते हैं। सबसे बेहतर कोण वो होता है जब आप एक ही फ्रेम में इसके दो पहचान चिन्हों शांति स्तूप और लेह पैलेस को एक साथ देख पाते हैं।
पर्वत की रंगत को बदलते बादल
खारदोंग ला लेह से मात्र 39 किमी की दूरी पर है और इतनी ही दूरी में आप लेह से लगभग 1850 मीटर ऊपर बर्फ से लदी घाटियों में पहुँच जाते हैं। इतनी जल्दी शरीर इस ऊँचाई का अभ्यस्त नहीं हो पाता इसीलिए गाड़ी वाले ताकीद करते हैं कि यहाँ पन्द्रह बीस मिनट से ज्यादा ना रुकें। लद्दाख आने वाले किसी भी यात्री के लिए खारदोंग ला इस लिए भी यादगार साबित होता है क्यूँकि यहाँ से गुजरते या लौटते वक़्त बर्फबारी होने के आसार बहुत ज्यादा होते हैं। आप तो जानते ही हैं  की बर्फ के इन  गिरते छोटे छोटे टुकड़ों और फाहों का शरीर से स्पर्श पाने के लिए मैदानवासी कितना तरसते हैं। मुझे भी ये आनंद नुब्रा से लेह वापस लौटते समय मिला।
खारदोंग ला पर बर्फ हर मौसम में मिलती है। 

स्थानीय भाषा में खारदोंग ला जिसे कई जगह रोमन में खारदुँग ला भी लिखा देखा मैंने
बर्फबारी के बाद पहाड़ों पर बना खूबसूरत नमूना
खारदोंग ला से आगे का रास्ता नुब्रा और श्योक घाटियों का दरवाजा है। नुब्रा नदी के किनारे चलते हुए आप पनामिक होते हुए सियाचिन घाटी तक पहुँच सकते हैं वहीं श्योक नदी आपको दिस्कित मठ, हुंडर के ठंडे मरुस्थल और तुरतुक जैसे सीमा के पास के गाँव से मिलवाती है। इस रास्ते में मिलने वाली चट्टानों की आकृतियाँ देखते ही बनती हैं। यहाँ की चट्टानों का स्वरूप बहुत कुछ काज़ा से लोसर जाते वक़्त दिखती चट्टानों से मिलता है।
चट्टानें कैसी कैसी ?

पर्वतों के बीच बनी कंदरा


इस रास्ते की खूबसूरती का अहसास तब होता है जब आपको श्योक नदी के पहले दर्शन होते हैं। श्योक मटमैली सी नदी है जिसका पानी अपने आस पास की स्याह रेत को काटते काटते उसी के रंग का हो जाता है। इसके किनारे बसे गाँवों की हरियाली देखते ही बनती है। यहाँ का मंज़र तब और हसीन हो जाता है जब इन गाँवों के बीच से हँसता खिलखिलाता कोई नाला निकलता हुआ इस नदी में विलीन होता दिखता  है।

श्योक नदी में पहाड़ से बहकर आती एक धारा

श्योक नदी घाटी
श्योक नदी के किनारे उलटी दिशा में चलते हुए पांगोंग त्सो तक पहुँचा जा सकता है। आजकल ज्यादातर यात्री समय बचाने के लिए नुब्रा से लेह लौटने के बजाय इसी सड़क से सीधे पांगोंग त्सो चले जाते हैं।
दिस्कित में नीचे दिखता एक नेचर कैंप
दिस्कित मठ से दिखता श्योक घाटी का एक खूबसूरत नज़ारा


कश्मीर लद्दाख यात्रा में अब तक 

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Wednesday, October 31, 2018

पैंगांग झील ( पांगोंग त्सो) और वो मजेदार वाकया ! Beauty of Pangong Tso

इस श्रंखला की पिछली कड़ी में मैंने आपको  लेह के ड्रक वाइट लोटस स्कूल से होते हुए पैंगांग त्सो तक के रास्ते की सैर कराई थी। वैसे बोलचाल में पैंगांग के आलावा इस झील को पेंगांग और पांगोंग के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। तिब्बती भाषा में पांगोंग त्सो शब्द का मतलब ऊँचे चारागाह पर स्थित झील होता है। पैंगांग झील करीब 134 किमी लंबी है और इस लंबाई का लगभग पचास पचपन किमी हिस्सा भारत में पड़ता है। पर कोई भी सड़क फिलहाल झील के किनारे किनारे सीमा तक नहीं जाती। घुसपैठ रोकने के लिए सिर्फ सेना के जवान ही इलाक़े में गश्त लगाते हैं।
पैंगांग ( पांगोंग त्सो) में मस्ती का आलम
मैंने सबसे पहली अत्याधिक ऊँचाई पर स्थित झील उत्तरी सिक्कम में देखी थी। 17800 फीट की ऊँचाई पर स्थित इस एक चौथाई जमी हुई झील को देखना मेरे लिए बेहद रोमांचक क्षण था। ऍसा इसलिए भी था कि तब तक यानि 2006 में इतनी ऊँचाई पर मैं कभी गया नहीं था। दूसरी बात ये थी कि गुरुडोंगमर झील के बारे में पहले से मुझे कुछ खास पता नहीं था, इसीलिए बिल्कुल किसी अपेक्षा के जा पहुँचा था गुरुडोंगमर तक। पर पैगांग त्सो ! क्या उसके लिए यही बात कही जा सकती थी? यहाँ तो सब उल्टा था। हिंदी फिल्मों और नेट पर लोगों ने शायद ही कोई कोण छोड़ा हो इस खूबसूरत झील का। 

झील ने पूछा आसमान से बोलो सबसे नीला कौन ?

फिर भी लद्दाख जाते समय इस झील का आकर्षण मेरे लिए कम नहीं हुआ था। होता भी कैसे? झील के बदलते रंगों को अपनी आँखों से देखने की उत्कंठा जो थी। वैसे भी पैंगांग (पांगोंग) की विशालता इसे बाकी झीलों से अलग कर देती है। गुरुडोंगमर हो या चंद्रताल या फिर इतनी ऊँचाई पर स्थित कोई अन्य झील, पैंगांग के विस्तृत फैलाव के सामने सब की सब बौनी हैं। अब बताइए जहाँ पैंगांग का क्षेत्रफल सात सौ वर्गकिमी है वही गुरुडोंगमर और चंद्रताल दो वर्ग किमी से भी कम के क्षेत्रफल  में सिमटे हुए हैं।

कितना विस्तृत कितना नीला ...है प्रभु तेरी अनूठी लीला
छः घंटे की थका देने वाली यात्रा का असर मेरे परिवार के अन्य सदस्यों पर पड़ चुका था। मुझे मालूम था कि एक बार टेंट के अंदर लिहाफ में घुसने के बाद इनके लिए बाहर आना मुश्किल होगा इसलिए मैं सबको ले कर सीधे झील की ओर चल पड़ा। झील की  नीली रंगत और हल्की ठंडी हवा ने गाड़ी से उतरते ही सबकी आधी थकान तो मिटा दी।

गहरे नीले जल के एक ओर थोड़े दलदली थोड़े सूखे मैदान थे और झील के दूसरी तरफ नंगे पहाड़ों का जमावड़ा था  जिनकी ढाल अलग अलग रंगों में सजी दिख रही थी। सूर्य की रोशनी के घटने बढ़ने से ना केवल यहाँ का पानी रंग बदलता है बल्कि सामने के पर्वत भी अलग अलग परिधानों को पहन लेते हैं। झील को एकटक ताकते हुए मन में जो सुकून का भाव जाग्रत होता है उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

बादल, पर्वत, झील मैदान.. इनके आगे क्या है इंसान ?
मन ही मन सोचा आख़िर पैगांग में इतना पानी आता कहाँ से है? बाद में पता चला की भारत के इलाके से दो धाराएँ पैगांग में मिलती हैं। जहाँ ये झील से मिलती हैं वहाँ की भूमि दलदली हो जाती है। गर्मी के दिनों में इसी दलदली ज़मीन के आसपास ब्राह्मणी बत्तख, सिर पर धारी वाली बत्तख और भूरी गंगा चिल्ली दिखाई पड़ती हैं। झील के भारतीय सिरे के पास का पानी इतना खारा है कि उसमें मछलियाँ नहीं है लेकिन दलदली भूमि के पास उगने वाली झाड़ियों और जड़ी बूटियों से ही ये पक्षी अपना भोजन प्राप्त करते होंगे ऐसा अनुमान है।
Three Idiots Point पर पक्षियों का जमावड़ा
पानी के बीचो बीच जो ज़मीन दिख रही है वहीं 3 Idiots के आख़िरी दृश्य का फिल्मांकन हुआ था। झील के पास कुछ वक्त बिताकर हम लोग अपने टेंट में लौट आए।
इक मीठी यादगार .....पैंगांग के द्वार
एक रात का हमारा आशियाना
थोड़ा विश्राम कर साढ़े चार बजे मैं अकेले ही झील के पश्चिमी किनारे की ओर जाने की सोचने लगा। तभी एक सज्जन जो कुछ ही देर पहले मेरी बगल वाले टेंट में आए थे मेरे पास आ कर बोले..क्या देख रहे हैं?

झील की ओर नज़रें गड़ाए मैंने उनसे कहा और क्या देखूँगा यहाँ आकर?

मेरा इतना कहना था कि वो अपनी निराशा की दुख भरी गाथा ले कर  बैठ गए। बताइए तो पाँच घंटा में हड्डी का बाजा बजा के बस यही झील दिखाने लाया है। ऊपर से यहाँ की ठंड देख रहे हैं। मिसेज और बच्चे को इतनी  ठंड लग रही  है और यहाँ है क्या? ना बोटिंग ना कुछ।

उनकी बात सुन के मुझे तो मन ही मन चिढ़ हुई कि कैसे आदमी से पाला पड़ गया?  फिर भी अपनी आवाज़ को संयत करके कहा कि आप बोटिंग की क्या बात कर रहे हैं? क्या आपको ढलती धूप के साथ झील के बदलते रंग की सुंदरता नहीं दिखी? यही देखने के लिए तो लोग यहाँ आते हैं।

मेरे जवाब से वे ज़रा भी संतुष्ट नहीं लगे। कहने लगे देखिए वो तो ठीक है पर हम मुंबई से इस झील के बारे में इतना सुनने के बाद यहाँ आए है। ज़ंस्कर नदी में हम लोग रिवर राफ्टिंग किए कितना मजा आया। यहाँ तो adventure के नाम  पर  कुछ है ही नहीं। 

मुझे अब उनकी बातों से गुस्से के बजाए मन ही मन  हँसी आ रही थी। मैंने कहा कि तब तो आपको यहाँ आना ही नहीं चाहिए था। अब आ गए हैं तो चलिए मैं आपको झील की खूबसूरती पास से दिखा लाऊँ।

उन्होंने मेरे प्रस्ताव पर तुरंत प्रश्न दाग दिया। आप वाइफ से पूछे हैं?

मैंने भी पलटते जवाब दिया। क्या पूछना है वो आराम कर रही हैं।

ठीक है पर हम पूछ के आते हैं।

पाँच मिनट बाद वही सज्जन अपनी पत्नी और बच्चे के साथ बड़बड़ाते हुए बाहर निकले। कितना ठंडा है टेंट में। हम यहाँ नहीं रह सकते। हम यहाँ से जा रहे हैं सीमेंट वाले एकोमोडेशन में आपको जाना है झील की तरफ तो जाइए।

मुझे समझ आ गया कि टेंट के अंदर घुसते ही Home Ministry से जो dose मिला है ये उसी का असर है।

सूखी ज़मी सूखा जहां... बोलो तुम्हीं खाऊँ कहाँ ? 😂
ख़ैर मैं अकेले ही धीमे कदमों से झील की ओर बढ़ गया। उस शख़्स की बात से ध्यान आया कि इस झील के पूर्वी सिरे में तिब्बत की सीमा पड़ती है। उस सीमा से चीन का एक राजमार्ग गुजरता है जो झील को छूते हुए निकलता है। ये राजमार्ग अक्साई चीन को ल्हासा से जोड़ता है। वहाँ आप अपनी नाव ले कर झील में नौकायन कर सकते हैं। मुझे लगा कि मजाक में ही उन सज्जन को चीन की नागरिकता ग्रहण करने की सलाह दे देनी थी।

झील के पश्चिमी किनारे में चाय कॉफी के साथ दो तीन फास्ट फूड की दुकाने हैं। वहाँ देशी विदेशी पर्यटकों का जमघट लगा हुआ था। युवा सेल्फी के लिए तरह तरह के प्रयोग से झील के साथ अपनी यादगार को अंतिम रूप देने में जुटे हुए थे। दूर कोई स्थानीय आसपास के गाँव से दो याकों को सजा कर लाया था। कुछ भीड़ वहाँ लगी थी।

वो शामें, वो मौसम, झील किनारा.. वो चंचल हवा
झील का जल किनारे छिछला था। तलहटी पर सिर्फ छोटे छोटे पत्थरों का जखीरा था। वहीं एक चट्टान पर मैंने आसन जमाया और शाम की उस वेला को आँखों मैं क़ैद करने लगा। शाम के वक्त यहाँ हवा बेहद तेज हो जाती है। इसलिए झील के पास पूरी तैयारी से (यानि सिर और कान अच्छी तरह ढककर) जाना चाहिए।
ढल गया दिन हो गई शाम... भागो टेंट में वर्ना ठंड में हो जाएगा काम तमाम
जैसे जैसे शाम ढलने लगी टेंट के अंदर ठंडक भी बढ़ी। हालात ये हो गए कि हम सबने एक के ऊपर एक तीन रजाइयाँ चढ़ा लीं। अब उनका भार इतना हो गया कि नीचे शरीर टस से मस नहीं हो पा रहा था। ख़ैर रात में खाने के लिए बाहर निकलने  की मज़बूरी थी तो पूरी ताकत लगा कर उस बोझ से बाहर निकले।  

टेंट में सोलर पैनल से दी जाने वाली बिजली खाने के बाद बंद कर दी जाती है। अँधेरी रात में बाहर निकले तो ये चमकदार चाँद मुस्कुराता हुआ नज़र आया पर बाहर गिरते तापमान में ज्यादा देर उनकी मुस्कान का आनंद लेना खतरे से खाली नहीं था। फिर जल्दी उठने की सोच रजाई के भीतर दुबक लिए।

रात का समा, झूमे चंद्रमा....
सुबह पाँच बजे हिम्मत बटोरकर सूर्योदय देखने निकले। जून के उस भीड़ भाड़ वाले मौसम  में भी बाहर उस वक़्त इक्का दुक्का प्राणी ही  दिखाई दिए।

सूरज निकला भी तो बादलों ने उसे अपने आगोश में भर लिया। मुझे सुबह भी झील के किनारे किनारे टहलने का मन था। जब उधर कोई जाता नहीं दिखा तो फिर मैंने एकला चलो रे का मार्ग अपनाया और तब तक चलता रहा जब तक सामने से पहाड़ी  कुत्तों का एक झुंड आता नहीं दिख गया। अब इन हट्टे कट्टे झबरेदार कुत्तो् का कोई  भरोसा तो था नहीं तो चुपचाप सड़क से उतर कर झील के किनारे शरण ली।

बीती विभावरी जाग री..अम्बर पनघट में डुबो रही- तारा-घट ऊषा नागरी

भोर का सन्नाटा
झील से जी भर आँखों ही आँखों में बात कर मैंने उससे आख़िरी विदा ली। एक घंटे बाद हम हेमिस बौद्ध मठ होते हुए लेह की वापसी की राह पर थे। अगले दिन नुब्रा घाटी हमारा इंतज़ार कर रही थी। चलेंगे उस सफ़र पर भी इस श्रंखला की अगली कड़ी में..
आ गई विदा की बेला


कश्मीर लद्दाख यात्रा में अब तक 

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Tuesday, October 23, 2018

पंडाल परिक्रमा दुर्गा पूजा 2018 बकरी बाजार राँची : तीन स्थापत्य शैलियों के मिश्रण से बना मंदिर Best Pandals of Durga Puja Ranchi 2018 Part - V

राँची के तीन सबसे सुंदर पंडालों को दिखाने के बाद पंडाल परिक्रमा की इस आख़िरी कड़ी में आज बारी है बकरी बाजार और शेष उल्लेखनीय पंडालों की। राँची के सबसे बड़े पंडाल होने का गौरव बकरी बाजार के पंडाल को प्राप्त है। हालांकि मैंने अक्सर देखा है कि यहाँ पंडाल बाहर से  जितना भव्य होता है अंदर से उतना कलात्मक नहीं होता।


इस बार यहाँ का पंडाल तीन मंदिरों को मिलाकर बनाया गया था। पहला मंदिर द्रविड़ शैली में गोपुरम के साथ था। जबकि दूसरा और तीसरा मंदिर गोथिक और नागर शैली में बनाया गया था। 


सफेद रंग के पूरे मंदिर को अगर दिन में देखा जाए तो कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ता पर रात में जिस तरह से प्रकाश की सहायता से इसके रंगों को बदला जा रहा था वो वृंदावान के प्रेम मंदिर वाले माहौल तक पहुँचाने के लिए काफी था।

Saturday, October 20, 2018

पंडाल परिक्रमा दुर्गा पूजा 2018 राँची : कैसे उतर आया बांग्ला स्कूल में स्वप्न लोक? Best Pandals of Durga Puja Ranchi 2018 Part - III

ज़रा सोचिए कि अचानक रातों रात आपको स्वप्न लोक में पहुँचा दिया जाए तो वो दुनिया कैसी होगी? आपका जायज़ सा सवाल होगा कि मैं तो यहाँ आपके साथ दुर्गा पूजा के इस पंडाल की झलक लेने आया था। आप मुझे स्वप्न लोक में क्यूँ ले जा रहे हैं। अब क्या बताएँ जब माँ का मंडप ही स्वप्न लोक के रास्ते में हो तो वहाँ जाना ही पड़ेगा ना।   

स्वप्न लोक का द्वार
इस बार इस स्वप्न लोक की रचना हुई थी ओसीसी क्लब द्वारा बांग्ला स्कूल में निर्मित पंडाल में। अब तक राँची के जितने पंडालों की आपको मैंने सैर कराई वो सब इंद्रषुनषी रंगों से सराबोर थे पर इस बार बिना चटख रंगों के खूबसूरती लाने की चुनौती ली थी ओसीसी क्लब के महारथियों ने। हालांकि जितनी उम्मीद थी उतना तो प्रभाव ये पंडाल नहीं छोड़ पाया पर बँधे बँधाए ढर्रे से कुछ अलग करने का उनका ये प्रयास निश्चय ही सराहनीय था।
राजहंसों का जोड़ा

भीड़ से घिरे पंडाल तक सिर्फ नीली दूधिया रौशनी फैली हुई थी। मुख्य द्वार के ऊपर फैली पतली चादर का डिजाइन ऐसा था मानो काली रात में आसमान में तारे टिमटिमा रहे हों। पंडाल के पास राजहंस का एक जोड़ा हमारा स्वागत कर रहा था। हंस को प्रेम से भरे पूरे पवित्र और विवेकी पक्षी के रूप में जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि ये एक बार जब अपने साथी को चुन लेता है तो उसी के साथ सारा जीवन बिताता है। हंस के इन्हीं गुणों के कारण उन्हें इस पंडाल का प्रतीक बनाया गया था।
बहती नदी में तैरते फूलों का निरूपण



Friday, October 19, 2018

पंडाल परिक्रमा दुर्गा पूजा 2018 राँची : जहाँ दुर्गा माँ स्थापित हैं दशानन के दरबार में.. Best Pandals of Durga Puja Ranchi 2018 Part - III

इक ज़माना था जब राँची की दुर्गा पूजा का मतलब था बकरी बाजार, रातू रोड, राजस्थान मित्र मंडल, कोकर और सत्य अमर लोक के पंडालों का विचरण करना। पिछले पाँच सालों में ये स्थिति बदली है। राँची रेलवे स्टेशन, बांग्ला स्कूल और बाँधगाड़ी के पंडाल हर साल कुछ अलग करने के लिए जाने जा रहे हैं और रेलवे स्टेशन पर लगने वाला पंडाल इसमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय हो चुका है। आज सब लोग यही पूछते हैं कि रेलवे स्टेशन का पंडाल देखा क्या ? यानि यहाँ  होकर नहीं आए तो आपकी पंडाल यात्रा अधूरी ही रही।

मुखौटों के साथ होने वाले छऊ नृत्य पर आधारित है रेलवे स्टेशन का पंडाल

पंडाल में घुसते ही दिखता है सूर्य का ये मुखौटा
राँची रेलवे स्टेशन के पंडाल की इस लोकप्रियता की वजह उसका हर साल किसी खास प्रसंग या विषयवस्तु को लेकर बनाया जाना है। इस बार पंडाल को झारखंड, बंगाल और उड़ीसा में किए जाने वाले छऊ नृत्य को केंद्र में रखकर बनाया गया था । इस नृत्य के पारम्परिक केंद्र बंगाल का पुरुलिया, झारखंड का सरायकेला और उड़ीसा का  मयूरभंज जिला रहा है  तीनों इलाकों की शैली थोड़ी अलग है पर इस लोकनृत्य के आवश्यक अंगों में वास्तविक या सांकेतिक मुखौटे, कलाबाजियाँ और रामायण महाभारत की कथाओं को कहने का चलन आम है।

छऊ नृत्य में इस्तेमाल होने वाले पारम्परिक मुखौटे

पंडाल का मुख्य द्वार

रावण के दरबार में स्वागत करते कुंभकरण

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