Monday, October 8, 2018

ड्रक वाइट लोटस स्कूल से होते हुए पैंगांग त्सो तक का सफ़र Three Idiot's School and Pangong Lake Road

इस श्रंखला की पिछली कड़ियों में आपको श्रीनगर से लेह तक ले के आया था। फिर मानसून यात्राओं में कुछ बेहद रोमांचक अनुभव हुए तो सोचा उन्हें ताज़ा ताज़ा ही साझा कर लूँ और फिर लेह से आगे के सफ़र की दास्तान लिखी जाए। 

जैसा मैंने पहले भी बताया था अक्सर लेह पहुँचने के बाद High Altitude Sickness की समस्या के चलते लोग पहले दिन वहाँ जाकर आराम करते हैं। पर चूँकि हम सब श्रीनगर से आए थे इसलिए हमारा शरीर इस ऊँचाई का अभ्यस्त हो चुका था। इसके बावज़ूद मैंने लेह में अगले दिन स्थानीय आकर्षणों को देखने का कार्यक्रम बनाया था। पर मेरे यात्रा संयोजक से चूक ये हो गई कि फोन पर उसने पैंगांग झील के लिए जो दिन नियत किया वो वहाँ के टेंट वाले ने उल्टा सुन लिया। लिहाजा पैंगांग झील जहाँ मैंने सबसे अंत में जाने का सोचा था वहाँ सबसे पहले जाना पड़ा। 

मी  इडियट  :)
हमारी यात्रा की शुरुआत ड्रक वाइट लोटस स्कूल जिसे लेह में ड्रक पद्मा कारपो स्कूल कह के भी बुलाया जाता है से हुई। 1998 में बना ये स्कूल उसी रास्ते पर है जिससे लेह से पैंगांग त्सो की ओर जाया जाता है। इतिहास गवाह है कि हिंदी या अंग्रेजी फिल्मों ने विश्व के मानचित्र में कई नयी जगहों को एकदम से लोकप्रिय बना दिया। एक समय था जब कश्मीर से शायद ही कोई बॉबी हाउस देखे बिना लौट कर आता था। कोयला की शूटिंग में माधुरी दीक्षित अरुणाचल प्रदेश गयीं तो फिर वहाँ की एक पूरी झील ही माधुरी झील के नाम से जानी जाने लगी। कहो ना प्यार है में ऋतिक रोशन और अमीशा पटेल ने थाइलैंड की माया बे को हर भारतीय की जुबाँ पर ला दिया।

ओमी वैद्य ने थ्री इडियट्स में चतुर रामलिंगम का किरदार ऐसा निभाया कि उनका फिल्म की आख़िर में इस स्कूल और पैंगांग त्सो में अभिनीत दृश्य दर्शको के मन मस्तिष्क में अजर अमर हो गया।

Saturday, September 29, 2018

मानसून में पारसनाथ शिखर से मधुबन तक की रोमांचक पदयात्रा Parasnath Temple Trek

झारखंड की मानसूनी यात्रा में मैं आपको पतरातू घाटी, हजारीबाग वन्य प्राणी अभ्यारण्य और तिलैया बाँध तक ले गया था। तिलैया से पारसनाथ के सफ़र की कहानी पिछले दो हफ्तों की लाहौल स्पीति यात्रा की वज़ह से आगे नहीं बढ़ पाई थी। तो चलिए आज सुनाते हैं इस मानसूनी सफ़र के सबसे रोमांचक हिस्से का लेखा जोखा।

चूँकि मेरा बचपन  बिहार में बीता इसलिए बौद्ध और जैनियों के श्रद्धेय स्थलों नालंदा, राजगीर और पावापुरी में कई बार आना जाना होता रहा। जैसा कि सिखाया गया था जब भी इनकी मूर्तियों के सामने से गुजरता तुरंत दोनों हाथ प्रणाम में जुट जाते थे पर पावापुरी में भगवान महावीर को प्रणाम करने की बात आई तो मन में नमन के साथ संकोच सा उभर आया। बालमन में प्रश्न जागा आख़िर भगवान होकर भी इन्होंने कपड़े क्यूँ नहीं पहन रखे? हम घर में यही करें तो सब  शेम शेम कह कर चिढ़ाते हैं। यहाँ ये हैं की अपने इतने विशाल रूप में भी बड़े मज़े में नंगू फंगू  बने खड़े हैं। मुझे याद है कि  मन में चल रहे इसी उहापोह से मुक्ति पाने के लिए मैंने सबके सामने माँ से ये प्रश्न पूछ लिया था और काफी देर तक सब लोगों की हँसी का पात्र बना था।

पारसनाथ की पहाड़ियों पर बिखरे जैन मंदिर और समाधि स्थल
जैन मंदिरों को नजदीक से देखने का पहला अवसर मुझे फिर राजस्थान में मिला। रणकपुर और दिलवाड़ा मंदिरों के अद्भुत स्थापत्य पर अचंभित हुए बिना मैं नहीं रह पाया था। इसीलिए वहाँ के शिल्पों के बारे में विस्तार से लिखने की कोशिश की थी। जैसलमेर के निकट लोद्रवा  के मंदिर की खूबसूरती भी आज तक भुलाए नहीं भूली है पर पारसनाथ घर के बगल में होकर भी मेरा ध्यान आकर्षित नहीं कर पाया था। वैसे तो पटना और राँची के बीच ट्रेन से आते जाते पारसनाथ स्टेशन हर बार आता था। पर वहाँ से दूर पहाड़ियों के आलावा मंदिर सदृश कुछ नज़र के सामने नहीं होता था। राँची से पारसनाथ की यात्रा की बात सिर्फ जैनियों के मुँह से सुनता आया था। सोशल मीडिया के इस ज़माने में एक मित्र का फेसबुक पर एक यात्रा  संस्मरण पढ़ा कि पारसनाथ की यात्रा प्रकृति को पास से महसूस करने का बेहतरीन ज़रिया है।  तभी से मानसून या जाड़े में इस पहाड़ी की चढ़ाई करने की इच्छा मन में घर कर गयी।

दरअसल पारसनाथ की प्राकृतिक ख़ूबसूरती आज भी गैर जैनियों के लिए अनगढ़ पहेली रही हैऔर इसकी वज़ह है शिखर तक पहुँचने की दुर्गमता।। चोटी तक पहुंचने और उतरने की मेहनत हम तीनों मित्रों के लिए भी एक चुनौती पेश कर रही थी। मैं जानता था कि मानसून के मौसम में ये चुनौती और खूबसूरत होने वाली है। इस मानसून के लिए जब मित्रों ने जगह का चुनाव करने का ज़िम्मा मुझे सौंपा तो मैंने झट से पारसनाथ का नाम आगे कर दिया जिसे सबने आसानी से लपक लिया।

तिलैया से जब हम पारसनाथ के मधुवन में पहुँचे तो रात के नौ बज रहे थे। हम बिना किसी आरक्षण के मधुवन पहुंचे थे। आफ सीजन होने की वजह से विश्वास था कि किसी ना किसी धर्मशाला में रहने का ठिकाना मिल ही जाएगा। मधुबन के जिस बिंदु से ऊपर की चढ़ाई शुरु होती है उसके सबसे नजदीक बीस पंथी धर्मशाला नज़र आई। अंदर गाड़ी लगाने की जगह भी थी। वहाँ कमरा भी आसानी से मिल गया। वैसे मधुवन में दो सौ से लेकर प्रतिदिन पन्द्रह सौ रु के हिसाब से कमरे उपलब्ध हैं। आप जब भी यहाँ आएँ बस ये जरूर देख लें कि उस वक़्त जैन मतावलंबियों का कोई वार्षिक अनुष्ठान तो नहीं है। ऐसा जनवरी में मकर संक्रांति और सावन के महीने में एक बार जरूर होता है। रही भोजन की बात तो सारी धर्मशालाओं में बड़े सस्ते दरों पर शाकाहारी जलपान की व्यवस्था है। एक नमूना नीचे हाज़िर है ।

घबराइए नहीं ये मेरे अकेला का नहीं बल्कि दो लोगों का नाश्ता है। 😆
वैसे पारसनाथ सिर्फ धार्मिक कारणों से ही प्रसिद्ध नहीं है। पारसनाथ अविभाजित बिहार की सबसे ऊँची पहाड़ी थी। विभाजन के बाद ये झारखंड की सर्वोच्च पहाड़ी बन गयी है। इसकी ऊँचाई 4480 फीट है। जैनों के चौबीस धर्मगुरुओं जिन्हें जैन शब्दावली में तीर्थंकर कहा जाता है में से बीस को पारसनाथ में ही निर्वाण प्राप्त हुआ था। ये समाधियां आस पास की हर छोटी बड़ी पहाड़ियों पर फैली  हुयी हैं। हर पूज्य स्थल तक पहुंचने के लिए सीमेंट से  रास्ता भी बना है।  यहाँ  की पहाड़ियों पर दो मुख्य मंदिर और चौबीस समाधि स्थल हैं। 

जैन तीर्थंकर समाधि स्थल
पर पारसनाथ की ये यात्रा आसान नहीं है। मधुवन से पारसनाथ के सम्मेद शिखर तीर्थ यानि मुख्य मंदिर करीब नौ किमी की तीखी चढ़ाई पर है। ऊपर आम जन के रुकने की कोई सुविधा नहीं है यानि आपको उसी दिन वापस भी उतरना होगा। इसका मतलब ये है कि एक दिन में कम से कम अठारह किमी की यात्रा करनी पड़ेगी। कम से कम इसलिए कि अलग अलग पहाड़ों पर बसे सारे समाधि स्थलों और मंदिरों का भ्रमण करने पर आप इसमें आसानी से नौ किमी और जोड़ सकते हैं। हमें तो रात तक वापस आ कर राँची लौटना था तो हमने रात में ही निर्णय ले लिया कि चढ़ाई हम यहाँ मौजूद मोटरसाइकल चालकों की सहायता से करेंगे पर वापसी में जल मंदिर जाते हुए करीब दस से बारह किमी उतरने का काम पैदल करेंगे।

ऊपर जाता हुआ जंगल का रास्ता
सुबह साढ़े आठ बजे तक हमारा चार सदस्यों वाला समूह ऊपर जाने के लिए तैयार हो गया। दिन रक्षा बंधन का था तो हमारे हाथों में राखियाँ चमक रही थीं। मोटरसाइकिल से ऊपर जाने के लिए जंगल के रास्ते में नौ की बजाए करीब अठारह किमी लगते हैं।


घने जंगलों के बीच वन विभाग दवारा बनाया गया ये रास्ता बेहद रमणीक हैं। एक तो ये धीरे धीरे ऊपर उठता है और दूसरे कि आप जंगल के बाहरी किनारे से होते हुए पहाड़ का चक्कर लगाते हैं। इसकी वज़ह से आप जंगल के साथ पहाड़ों और बादलों की चहलकदमी को स्पष्ट रूप से देख पाते हैं। वहीँ पैदल मार्ग घने जंगल और कलकल बहते नालों के बीच से गुज़रता है और तीखी चढ़ाई वाला है ।
सुबह धुंध में डूबा पार्श्वनाथ  मंदिर
जैसे जैसे हम ऊपर चलते गए हवा में नमी और ठंडक बढ़ती गयी। कुछ देर बाद हमारी मोटरसाइकिल बादलों के बीच अपना रास्ता बना कर आगे बढ़ रही थी। पारसनाथ का मंदिर बेहद पास आ गया था पर बादलों ने उसके चारों ओर ऐसा शिकंजा कस रखा था कि पचास सौ मीटर की दूरी से भी मंदिर के आकार के बारे में अनुमान लगा पाना कठिन था। मोटरसाइकिल चालकों ने हमें मुख्य मंदिर से थोड़ा नीचे लाकर छोड़ दिया और फ़िर हमारी पैदल यात्रा शुरु हुई।

पारसनाथ मंदिर से जल मंदिर की ओर जाता रास्ता
पारसनाथ मंदिर में सम्मेद शिखर जी के दर्शन के बाद कुछ देर वहीं धुंध छटने का इंतजार करने लगे। जब धुंध नहीं छटी तो आस पास के समाधि स्थलों की राह ली गई। लगभग सारे समाधि स्थल छोटी बड़ी पहाड़ियों के शीर्ष पर हैं। यानि उन तक पहुँचने के लिए आपको चढ़ाई और ढलान दोनों का सामना करना पड़ता है। इसी रास्ते  में आगे जाकर यहाँ के मशहूर जल मंदिर की भी राह निकलती थी ।


Saturday, September 8, 2018

मानसूनी झारखंड : सफ़र हजारीबाग वन्य जीव अभ्यारण्य और तिलैया बाँध का Road Trip to Hazaribagh Wildlife Sanctuary and Tilaiya Dam

झारखंड की इस मानसूनी यात्रा का आख़िरी पड़ाव पारसनाथ तो नियत था पर जैसे जैसे हमारी यात्रा का दिन पास आता गया हमारे बीच के गंतव्य बदलते गए। पहले हमारा इरादा नवादा के ककोलत जलप्रपात तक जाने का था, पर जब हमने वहाँ तक जाने के रास्ते को गौर से देखा तो उसे आबादी बहुल पाया। हमें तो एक ऐसा रास्ता चाहिए था जो हमारी आँखों को मानसूनी हरियाली से तृप्त कर दे। इसलिए ककोलत की बजाए हमने पतरातू से हजारीबाग वन्य प्राणी आश्रयणी की राह पकड़ना उचित समझा।

हजारीबाग वन्य प्राणीआश्रयणी का मुख्य द्वार
हमारा ये निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ क्यूँकि हमें जितनी उम्मीद थी उससे कही शांत और ज्यादा हरी भरी राह हमें देखने को मिली। पतरातू से हम लोग बरकाकाना होते हुए रामगढ़ पहुँचे और वहाँ से आगे वापस राँची पटना राजमार्ग को पकड़ लिया। वैसे रेलवे के स्टेशन की वजह से बड़काकाना से तो कई बार गुजरना हुआ है पर इस बार मुझे पहली बार पता चला कि बड़काकाना की तरह एक छोटकाकाना नाम की भी जगह है। रामगध के बाद मांडू होते हुए ग्यारह बजते बजते हम हजारीबाग पहुँच चुके थे। जिस तरह अच्छे मौसम के लिए राँची का नाम लिया जाता है। वैसा ही मौसम हजारीबाग का भी है। झारखंड का नामी विनोबा भावे विश्वविद्यालय भी यहीं स्थित है।


हजारीबाग वन्य प्राणी आश्रयणी हजारीबाग शहर से करीब 18 किमी दूर स्थित है। राँची पटना राजमार्ग पर हजारीबाग से बरही के रास्ते में इसका एक द्वार सड़क के बाँयी ओर दिखता है। वैसे इस आश्रयणी का एक हिस्सा सड़क के दाहिने भी पड़ता है पर वो अपेक्षाकृत विरल और छोटा है।
साल के घने जंगल
हजारीबाग के इस अभ्यारण्य के दो द्वार हैं। जिस रास्ते से हम इसके अंदर घुसे उसे सालफरनी गेट कहा जाता है। इस द्वार से करीब तीस किमी की दूरी बहिमर गेट आता है। पूरा अभ्यारण्य दो सौ वर्ग किमी से थोड़े कम में फैला हुआ है। छोटानागपुर के पठार पर फैले इस वन में मुख्यतः साल और सखुआ के वृक्ष हैं। एक ज़माने में शायद यहाँ बाघ भी पाए जाते थे। पर अब इसके अंदर जीव जंतुओं की संख्या काफी कम हो गयी है।
रामगढ़ के राजा द्वारा बनाया गया टाइगर ट्रैप
कम नहीं हुई है तो यहाँ की हरियाली। करीब एक किमी अंदर बढ़ने पर रामगढ़ के राजा द्वारा बनवाया गया टाइगर ट्रैप दिखा। बारिश की वजह से ट्रैप की ओर जाने वाले रास्ते में जगह जगह काई जम गयी थी। ट्रैप के रूप में वहाँ एक गहरा कुँआ दिखा जिसमें बाघ के उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। पानी पीने के लिए जब वहाँ बाघ आता होगा तो शायद जाल बिछा के उसे पकड़ लिया जाता हो। पर अब तो यहाँ बाघ बिल्कुल भी नहीं रहे। यदा कदा तेंदुए के होने की संभावना भले ही व्यक्त की जाती हो।

Tuesday, September 4, 2018

मानसूनी झारखंड : देखिए खूबसूरती पतरातू घाटी की In pictures : Patratu Valley

राँची को बाहर से आने वाले अक्सर झरनों के शहर के रूप में ही जानते रहे हैं। हुँडरू, दसम, जोन्हा, सीता और हिरणी के जलप्रपात राँची से अलग अलग दिशा में बिखरे हैं जहाँ महज एक से दो घंटे के बीच पहुँचा जा सकता है। एक ज़माना था जब राँची में दोपहर के बाद लगभग हर दिन बारिश हो जाया करती थी और तब इन झरनों में सालों भर यथेष्ट बहाव रहा करता था। आज की तारीख़ में बारिश के मौसम और उसके तीन चार महीनों बाद तक ही इन झरनों की रौनक बनी रहती है।

पतरातू घाटी
यही वजह है कि आजकल झरनों से ज्यादा लोग पतरातू घाटी की हरी भरी वादियों में विचरना  पसंद करते हैं। राँची से पतरातू घाटी की दूरी मात्र पैंतीस किमी है और यहाँ जाने का रास्ता भी बेहद शानदार है। आप तो जानते ही हैं कि हर साल मैं अपने मित्रों के साथ मानसून के मौसम में झारखंड के अंदरुनी इलाकों में सफ़र के लिए एक बार जरूर निकलता हूँ। पिछली बार हमारा गुमला, नेतरहाट और लोध जलप्रपात का सफ़र बेहद खुशगवार बीता था। 

इस बार मानसून का आनंद लेने के लिए हम लोगों ने पारसनाथ की पहाड़ियों को चुना। अगस्त के आख़िरी सप्ताहांत में शनिवार की सुबह जब हम घर से निकले तो हमारा इरादा राँची हजारीबाग रोड से पहले हजारीबाग पहुँचने का था पर घर से दो तीन किमी आगे निकलने के साथ योजना ये बनी कि क्यूँ ना इस खूबसूरत सुबह को पतरातू की हरी भरी वादियों में गुजारा जाए।

राँची से पतरातू जाने वाला रास्ता यहाँ के मानसिक रोगियों के अस्पताल, रिनपास, काँके की बगल से गुजरता है।
पर इससे पहले की आप पतरातू की इस रमणीक घाटी के दृश्यों को देखें ये बता दूँ कि इस घाटी पर जब ये सड़क नहीं बनी थी तो लोग रामगढ़ हो कर पतरातू आते जाते थे। अस्सी के दशक में रूस की मदद से यहाँ एक ताप विद्युत संयंत्र लगाया गया था। इस संयंत्र और रामगढ़ शहर को पानी पहुँचाने के लिए यहाँ एक डैम का भी निर्माण हुआ था जहाँ पहले मैं आपको ले जा चुका हूँ। आज यहाँ जिंदल की भी एक स्टील मिल है।

रास्ते में उपलों के ढेर

यहीं से शुरु होती हैं पतरातू की पिठौरिया घाटी

मानसून के मौसम में यहाँ की हरी भरी वादियों के बीच खाली खाली सड़क के बीच से गुजरने का लुत्फ़ ही और है।

 पतरातू घाटी को चीरती आड़ी तिरछी सर्पीली सड़कें 

Thursday, August 23, 2018

भारत के आधुनिकतम संग्रहालयों में से एक : पटना का बिहार संग्रहालय Bihar Museum, Patna

बिहार के साथ आधुनिक शब्द का इस्तेमाल थोड़ा अजीब लगा होगा आपको। भारत के पूर्वी राज्यों बिहार, झारखंड और ओड़ीसा का नाम अक्सर यहाँ के आर्थिक पिछड़ेपन के लिए लिया जाता रहा है पर बिहार के पटना  स्थित इस नव निर्मित संग्रहालय को आप देखेंगे तो निष्पक्ष भाव से ये कहना नहीं भूलेंगे कि ना केवल ये बिहार की ऐतिहासिक एवम सांस्कृतिक धरोहर को सँजोने वाला अनुपम संग्रह केंद्र है बल्कि इसकी रूपरेखा इसे वैश्विक स्तर के संग्रहालय कहलाने का हक़ दिलाती है।

बिहार के गौरवशाली ऍतिहासिक अतीत से तो मेरा नाता स्कूल के दिनों से ही जुड़ गया था जो बाद में नालंदा, राजगीर, वैशाली और पावापुरी जैसी जगहों पर जाने के बाद प्रगाढ़ हुआ पर पिछले महीने की अपनी पटना यात्रा मैं मैं जब इस संग्रहालय में गया तो बिहार की कुछ अनजानी सांस्कृतिक विरासत से भी रूबरू होने का मौका मिला।  

संग्रहालय परिसर में लगा सुबोध गुप्ता का शिल्प "यंत्र"
पाँच सौ करोड़ की लागत से पटना के बेली रोड पर बने इस संग्रहालय की नींव अक्टूबर 2013 में रखी गयी और चार साल में एक जापानी कंपनी की देख रेख में इसका निर्माण हुआ। दरअसल इस विश्व स्तरीय संग्रहालय का निर्माण बिहार के वर्तमान मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह का सपना था। अंजनी जी ख़ुद एक संग्रहकर्ता हैं और आप जब संग्रहालय के विभिन्न कक्षों से गुजरते हैं तो लगता है कि किसी ने दिल लगाकर ही इस जगह को बनवाया होगा।

संग्रहालय का मानचित्र

संग्रहालय में प्रवेश के साथ ओरियेंटेशन गैलरी मिलती है जो संक्षेप में ये परिभाषित करती है कि संग्रहालय के विभिन्न हिस्सों में क्या है? साथ ही ये भी समझाने की कोशिश की गयी है कि एक इतिहासकार के पास इतिहास को जानने के लिए क्या क्या मानक प्रक्रियाएँ उपलब्ध हैं? अगर आपके पास समय हो तो यहाँ पर आप एक फिल्म के ज़रिए बिहार में हो रहे ऐतिहासिक अनुसंधान के बारे में भी जान सकते हैं। 

बिहार बौद्ध और जैन धर्म का उद्गम और इनके धर्मगुरुओं की कर्मभूमि रही है। इसलिए आप यहाँ अलग अलग जगहों पर खुदाई में निकली भगवान बुद्ध ,महावीर और तारा की मूर्तियों को देख पाएँगे। इनमें कुछ की कलात्मकता देखते ही बनती है। आडियो गाइड की सुविधा के साथ साथ यहाँ काफी जानकारी आलेखों में भी प्रदर्शित की गयी है।

संग्रहालय इतिहास की तारीखों के आधार पर तीन अलग अलग दीर्घाओं में बाँटा गया है।
ऐतिहासिक वस्तुओं को प्रदर्शित करते यूँ तो देश में कई नामी संग्रहालय हैं, फिर बिहार संग्रहालय में अलग क्या है? अलग है शिल्पों को दिखाने का तरीका। प्रकाश की अद्भुत व्यवस्था जो कलाकृतियों के रूप लावण्य को उभार देती हैं और इस बात की समझ की एक शिल्प भी अपने चारों ओर एक खाली स्थान चाहता है ताकि जो उसपे नज़रे गड़ाए उसकी कलात्मकता  में बिना ध्यान भटके डूब सके ।
बिहार तो बुद्ध की भूमि रही है। ये संग्रहालय उनकी कई ऐतिहासिक मूर्तियों को सँजोए हुए है।

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