Saturday, July 14, 2018

TVS Jupiter : एक अग्रणी उत्पाद के अंतिम रूप में आने की कहानी मेरी जुबानी ! Brand development story of a flagship product !

अपने जीवन में हम कई तरह के उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि रोज़ाना इस्तेमाल होने वाली चीजें आखिर बनती कैसे हैं और उन्हें अपने अंतिम रूप में लाने के पहले कितनी मेहनत मशक्कत की जाती है? ऐसे ही रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली एक वस्तु है हमारा दुपहिया वाहन जिसके बिना एक मध्यमवर्गीय परिवार का काम सुचारु रूप से चल ही नहीं सकता। इसीलिए ब्लॉगरों की सबसे बड़ी संस्था इंडीब्लॉगर के सौजन्य से जब TVS Motor Company ने अपने अग्रणी उत्पाद TVS Jupiter के बारे में बताने के लिए तमिलनाडु में अपने होसूर स्थित संयंत्र में आने का आमंत्रण भेजा तो मैंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। 
कर्नाटक के मानसूनी रंग
होसूर में TVS का ये संयंत्र बिल्कुल तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर स्थित है। बेंगलुरु से होसूर की दूरी महज चालीस किमी है पर जब आपका सामना वहाँ के मंथर गति से चलते अतिव्यस्त ट्राफिक के साथ होगा तो ये दूरी सौ किमी से कम की नहीं लगेगी। सुबह सुबह हम इस ट्राफिक का शिकार हुए और नतीजन अपने गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते हमें एक घंटे से भी ज्यादा की देरी हो गयी। इससे पहले भी मैंने इस तरह के आयोजनों में हिस्सा लिया है पर इस आयोजन की खास बात ये थी कि इसमें सिर्फ भारतीय भाषाओं के ब्लॉगरों को आमंत्रित किया गया था, यानि हिंदी के आलावा तमिल और कन्नड़ भाषी ब्लॉगर इस सफ़र में हमारे सहयात्री थे। ये इस बात का द्योतक है कि आज कंपनियाँ ये समझ रही हैं कि अपने ग्राहकों तक पहुँचने के लिए उनसे उनकी भाषा में बात करनी होगी।


होसूर के पास हम पहुँच ही रहे थे कि हमारी बस ने गलती से एक ग्रामीण इलाके से होकर जाने वाली सड़क का मोड़ ले लिया। ये एक तरह से अच्छा ही हुआ क्यूँकि बाहर का नज़ारा एकदम से बदल गया। कर्नाटक की लाल मिट्टी और हरे भरे खेत और काले बादल मिलकर प्रकृति की मोहक छवि दिखला ही रहे थे कि अचानक इनके साथ नारियल पेड़ों की लंबी कतार का खूबसूरत परिदृश्य  मन को आनंदित कर गया।

ये चला ब्लॉगरों का जत्था बेंगलुरु से होसूर की ओर

जैसी ही हम कर्नाटक की सीमा पार कर होसूर पहुँचे TVS का संयंत्र सामने आ गया। मैं अपने काम के सिलसिले में कई संयंत्रों में गया हूँ पर इतना हरा भरा प्लांट मैंने पहली बार देखा। साथ ही अंदर की स्वच्छता देख कर मन प्रसन्न हो गया। कार्यक्रम की शुरुआत में हमें बताया कि TVS Jupiter ब्रांड को बनाने के पहले मार्केटिंग टीम ने किस तरह से बाजार का अध्ययन किया। उनके समक्ष मुख्य मसला था कि समाज का कौन सा वर्ग इस स्कूटर का इस्तेमाल करेगा, वो किन बातों के लिए इसका प्रयोग करेगा और बाकी प्रतिद्वंदियों के रहते हुए उसे ऐसी क्या ज्यादा सहूलियतें दी जाएँ कि वो स्कूटर खरीदने जाए तो TVS Jupiter का चुनाव करे।

TVS Jupiter  ब्रांड के इस रूप में आने की कहानी बताते अधिकारी

बाजार के सर्वेक्षण से जो नतीजे निकले उसके बाद ये निर्णय लिया गया कि इसे ज्यादातर तीस से पैंतालीस साल के पुरुष अपने परिवार की सारी छोटी बड़ी जरूरतों के लिए इस्तेमाल करेंगे। उनकी आवश्यकताओं के हिसाब से  110 cc और  7.88 BHP का शक्तिशाली इंजन चुना गया ताकि अगर स्कूटर fully loaded  भी रहे तो उसकी गति और Pickup से कोई समझौता ना हो।  ग्राहकों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए पैर रखने और सीट के नीचे सामान रखने की जगह में इज़ाफा किया गया। पेट्रोल भरवाते वक़्त सीट उठानी ना पड़े इसलिए कार की तरह बाहर ही फिलिंग प्वाइंट बनाया गया। फिर बात आई उसके रूप रंग की क्यूँकि अधिकतर उपभोक्ता चाहते थे कि वो ऐसे आकर्षक स्कूटर के स्वामी बने जिस पर उन्हें गर्व हो। उनकी पसंद के हिसाब से स्कूटर का बाहरी आकार, सीट और रंगों की विविधता तय की गयी।

TVS की पाठशाला

साल 2013 में ये स्कूटर बाजार में लाया गया और आज अन्य स्कूटरों की तुलना में सबसे तेजी से पाँच सालों में ये पच्चीस लाख उपभोक्ताओं की पसंद बन गया है। TVS ने ज्यादा का फायदा की अपनी टैगलाइन को घर घर तक पहुँचाने के लिए अमिताभ बच्चन को अपना ब्रांड एम्बैस्डर बनाया। 2017 में इसके बाहरी रूप को क्लासिक वर्जन में औेर सँवारा गया और डिकी में USB Charging port की सुविधा भी दे दी गयी। इस ब्रांड को इस रूप में लाने वाले अभियंताओं की खुशी तब दोगुनी हो गयी जब साल 2018 में J. P. Power ने  Most appealing executive scooter के लिए TVS Jupiter को  चुना


हिंदी, कन्नड़ और तमिल भाषाओं के ब्लॉगर
स्कूटर के बारे में ये सारी जानकारियाँ लेने के बाद ब्लॉगरों के समूह को उस संयत्र के अंदर ले जाया गया जहाँ स्कूटर के साथ मोपेड का निर्माण चल रहा था। सारे कर्मचारी अपने अपने काम में व्यस्त थे। मशीनिंग और पेंट विभाग में बारीक काम के लिए रोबोट्स और सी एन सी मशीनों का व्यापक इस्तेमाल हो रहा था। मशीनों और रोबटों को बिना किसी मानवीय नियंत्रण के इस तरह काम करते देखना एक रोचक अनुभव था। महिलाएँ, कामगारों के समूह का एक अहम हिस्सा बने इसलिए कंपनी ने पूरे कार्मिकों में करीब एक तिहाई नियुक्ति महिलाओं की ही की है। इंजन एसेंबली में तो पूरे आत्मविश्वास से काम करती हुई वो बहुतायत में दिखीं। आख़िर में हम फाइनल एसेंबली विभाग में पहुँचे जहाँ हर मिनट में करीब दो स्कूटर बन के निकल रहे थे और उसके बाद उनका परीक्षण हो रहा था।

कैसी लगी आपको मेरी ये वेशभूषा 😂 ?
पर असली आनंद तो तो तब आया जब हमें स्कूटर की टेस्ट ड्राइव करने के लिए टेस्ट ट्रैक ले जाया गया। आख़िर हमें स्कूटर की इतनी खूबियों के बारे में बताया गया था पर उनमें से कुछ का तो ख़ुद अनुभव तभी हो सकता था जब उसकी सवारी की जाए।

टेस्ट ड्राइव को तैयार
पहले हमें ट्रैक में प्रयोग होने वाले रास्ते से अवगत कराया गया। फिर किसी अनहोनी को टालने के लिए सिर से पैर तक सुरक्षा कवचों से लैस कर दिया गया। यूँ कह लीजिए कि हमारी वेशभूषा ऐसी थी कि दूर से पहचानना भी मुश्किल हो गया। घुमावदार रास्तों से गुजरते ट्रैक के हम सभी ने दो चक्कर लगाए। टेस्ट ड्राइव करने के बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ कि यह स्कूटर काफी संतुलित है और इसका पिक अप भी बेहतरीन है। इस  श्रेणी के स्कूटरों के बारें में एक शिकायत इनकी कमजोर फाइबर बॉडी का होना है। वहीं अगर पूरी फ्रेम ही धातु की बना दी जाए तो गाड़ी का वजन काफी बढ़ जाता है। इस परेशानी को दूर करने के लिए TVS ने स्कूटर के उन हिस्सों को धातु का बनाया है जो गिरते वक़्त सड़क के संपर्क में सबसे पहले आते हैं। इस स्कूटर से जुड़ी अन्य तकनीकी जानकारी आप यहाँ से ले सकते हैं

TVS Motor Company के अधिकारियों के साथ
विदा लेने के पहले हमारी मुलाकात संयंत्र के वरिष्ठ अधिकारियों से हुई। हमने स्कूटर का इस्तेमाल करने वालों की अपेक्षाओं से उन्हें अवगत कराया। बाहर मौसम तेजी से करवट ले रहा था। काले बादलों की खेप आने वाली वर्षा का संकेत कर रही थी। वापस उसी ट्राफिक से गुजरना था तो हम सबने TVS Jupiter की टीम से विदा ली।

आशा है कि एक स्कूटर के ब्रांड के रूप में स्थापित होने की ये प्रक्रिया आपको रोचक लगी होगी। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

Monday, July 2, 2018

आइए चलें कारगिल से होते हुए लामायुरु के सफ़र पर Kargil to Lamayuru via Fotu La

सोनमर्ग, जोजिला, द्रास घाटी होते हुए कारगिल में रात बिताने के बाद  हमारा समूह अगली सुबह लामायुरु के बौद्ध मठ की ओर निकल पड़ा। कारगिल से लामायुरु की दूरी करीब सौ किमी की है पर घुमावदार रास्तों पर रुकते चलते इस सफ़र में करीब तीन घंटे लग ही जाते हैं। कारगिल शहर से निकलते कुछ दूर तो रास्ता सही था पर पशकुम के आस पास सड़क पर पानी जमा हो जाने से रास्ता जर्जर हालत में मिला।  

फ़ोतु ला से लामायुरु की ओर उतरता श्रीनगर लेह राजमार्ग

ये परेशानी पर दस पन्द्रह मिनटों की ही थी। कारगिल से निकलने के आधे घंटे बाद हम सफ़र के आपने पहले पड़ाव मुलबेक की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। इस इलाके से वाखा नदी बहती है जो ज़ांस्कर श्रंखला से निकलकर कारगिल के पास सुरु नदी में मिल जाती है। यही वजह है कि कारगिल से मुलबेक के बीच का इलाका बेहद हरा भरा है। पोपलर, विलो के पेड़ों के बीच यहाँ सब्जियों के खेत भी दिखाई दिये।

हरे भरे खेत जो नीले आकाश के साथ और खिल उठते हैं
बालटिस्तान से कारगिल के संस्कृतिक जुड़ाव का जिक्र तो मैंने पिछली पोस्ट में आपसे किया ही था। कारगिल जिले की तीन चौथाई से ज्यादा आबादी शिया मुस्लिमों की है। ज़ाहिर सी बात है कि इस रास्ते में बहुतेरी मस्जिदें भी देखने को मिलीं। खारंगल के पास की एक छोटी सी मस्जिद तो अनोखी बनावट लिये हुई थी। यहाँ मस्जिद का गुम्बद सीमेंट और पत्थर से ना बना हो कर स्टील की चादरों को जोड़ कर बनाया गया था।

कारगिल जिले की बाकी आबादी बौद्ध और हिंदू धर्मावलंबियों की है। यहाँ बोली जाने वाली भाषाएँ यूँ तो उर्दू लिपि  में लिखी जाती हैं पर उनके बोलने का लहजा कश्मीरी उर्दू से बिल्कुल भिन्न है। जब भी बातचीत का सिलसिला स्थानीय लोगों से चला तो यही आभास हुआ कि यहाँ के लोग भारतीय सेना को गर्व से देखते हैं और उनके कार्यों में सहयोग देने में कभी पीछे नहीं हटते।

चंबा, मुलबेक की प्राचीन प्रतिमा
मुलबेक और बुद्धखरबू इस जिले के दो ऐसे कस्बे हैं जहाँ बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। वैसे लेह की ओर जाते जाते तिब्बती बौद्ध संस्कृति का असर उत्तरोत्तर बढ़ता चला जाता है। पर्यटकों को मुलबेक इसलिए भी लुभाता है क्यूँकि यहाँ सड़क के किनारे सीधी खड़ी चट्टान पर भगवान बुद्ध की 26 फीट ऊँची आकृति को तराशा गया है। सत्तर के दशक में इस प्रतिमा के  ठीक सामने एक बौद्ध मंदिर का भी  निर्माण किया गया है। 



चम्बा की ये मैत्रेयी बुद्ध की प्रतिमा कुषाण काल में ईसा पूर्व पहली शताब्दी में बनी है, इसकी घोषणा यहाँ का सरकारी सूचना पट्ट करता है पर इतिहासकार इसे आठवीं शताब्दी का बताते हैं। ये प्रतिमा आने वाले समय के संभावित बुद्ध की है जो मैत्री का प्रतीक हैं और इसीलिए इन्हें मैत्रेयी बुद्ध के रूप में कल्पित किया गया है। चट्टान पर उकेरे बुद्ध के इस मोहक रूप के पास खारोष्ठी लिपि में एक संदेश लिखा गया है। ये संदेश यहाँ के तत्कालीन  राजा  का है और स्थानीयों को जीवित जानवरों की बलि चढ़ाने की मनाही करता है। हालांकि कहा जाता है कि यहाँ के लोगों को राजा का ये आदेश नागवार गुजरा क्यूँकि उन्हें लगता था कि अगर हम बलि चढ़ाना बंद कर दें तो हमारे इष्ट देव हमसे प्रसन्न कैसे होंगे?

मंदिर के पुजारी बताते हैं कि कुछ साल पहले यहाँ दलाई लामा भी आए थे। बुद्ध की प्रतिमा से सुसज्जित ये मंदिर तो छोटा सा है पर यहाँ आकर सबसे मजेदार बात लगी भगवान बुद्ध के चरणों में चढ़ावे की प्रकृति को देखकर। देशी शीतल पेय Thumbs Up से लेकर यहाँ Four Season, Treat और Fresca जैसे विदेशी ब्रांड बुद्ध के चरणों में समर्पित थे। अब सारा सुख वैभव छोड़कर दुख का कारण जानने के लिए निकले सिद्धार्थ को क्या पता था कि इतनी तपस्या के बाद व मोक्ष तो पा जाएँगे पर एक दिन भिक्षा के नाम पर उनके अनुयायी शीतल पेय का प्रसाद चढ़ाएँगे।

मुलबेक का बौद्ध मंदिर
मुलबेक से फ़ोतु ला की ओर बढ़ने से पहले मुझे नहीं पता था कि बीच में एक दर्रा और पड़ता है जिसे नामिक ला के नाम से जाना जाता है। नामिक ला की विशेषता है कि यहाँ से गुजरते वक़्त एक ऐसी चोटी दिखती है जो एक पहाड़ के बीचो बीच खंभे की तरह आसमान छूती प्रतीत होती है। मैंने वो अद्भुत चोटी तो देखी पर उसकी तस्वीर लेते लेते नामिक ला का साइनबोर्ड कब गुजर गया पता ही नहीं चला।

खंगराल जहाँ से बटालिक से आता एक रास्ता मिलता है
खंगराल के पास एक रास्ता कारगिल से बटालिक और दाह होते हुए श्रीनगर लेह राजमार्ग से मिल जाता है। यहाँ फिर हरे भरे खेतों के दर्शन हुए। इसके बाद ऍसी हरियाली लेह तक नहीं दिखी।

नामिक ला और फ़ोतु ला के बीच
खंगराल से जैसे जैसे हम फ़ोतु ला की ओर बढ़ रहे थे वैसे वैसे आसमान की  रंगत और नीली होती जा रही थी।खिली धूप, गहरा नीला आकाश और उन पर थिरकते सफेद बादलों का छोटा सा पुलिंदा मन को पुलकित  किए जा रहा था। ये सम्मोहन इतना बढ़ गया कि फ़ोतु ला के पहले ही मैंने गाड़ी रुकवाई और दूर दूर तक फैली चोटियों और उनमें पसरी शांति को महसूस करना चाहा। दरअसल लद्दाख आने का सुख असल मायने में यही है कि आप चित्त स्थिर कर देने वाली यहाँ की प्रकृतिक छटा को अपलक निहारते हुए यूँ  डूब जाएँ कि आपको ख़ुद का भी ध्यान ना रहे।

इस बादल को देख कर जी चाहा कि आसमान की तरह मैं भी इसे अपने आगोश में भर लूँ
खंगराल के बाद अगला गाँव बुद्धखरबू का मिला। यहाँ सड़क के किनारे ही एक बौद्ध मठ है। पर यहाँ रुके बिना हम फोटु ला की ओर बढ़ गए।
गगनभेदी पर्वतों के बीच नीले आसमान की छतरी
लगभग ग्यारह बजे हमारा समूह फ़ोतु ला पहुँच चुका था। वैसे इस दर्रे को फोटुला के नाम से भी जाना जाता है जो इसका सही उच्चारण नहीं है। साढ़े तेरह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित ये दर्रा इस राजमार्ग का सबसे ऊँचा दर्रा है। जहाँ जोजिला अपने खतरनाक रास्तों के चलते एक यात्री के मन में भय पैदा करता है वहीं फ़ोतु ला से दिखती अलग अलग रंग की पहाड़ियाँ और उनमें छाई गहरी निस्तब्धता एक आंगुतक को अपने मोहपाश में जकड़ लेती है। फ़ोतु ला से जब आप नीचे के सर्पीलाकार रास्तों की लड़ियाँ देखते हैं तो मन एक रोमांच से भर उठता  है।

फ़ोतु ला की ऊँचाइयों तक पहुँचने पर दिखता है इन सर्पीली सड़कों का जाल

फ़ोतु ला के पास पहुँचने पर धूप तो ठीक ठाक थी पर साथ थे बर्फीली हवाओं के थपेड़े 

फ़ोतु ला के पास ही दूरदर्शन का ये टीवी टॉवर है
फोतु ला पर ही प्रसार भारती का एक दूरदर्शन रिले स्टेशन हैं। यहाँ से लामायुरु तक का रास्ता अपने तीखे घुमावों और ढलान से अच्छे अच्छों का सिर घुमा देता है। सिर्फ पन्द्रह किमी की यात्रा में आप 500 मीटर नीचे पहुँच जाते हैं।
फ़ोतु ला से लामायुरु की राह पर
मटमैले पहाड़ कई परतों में हमारे सामने खड़े थे।  उनकी विशालता के सामने श्रीनगर लेह राजमार्ग चींटी की तरह उनके चरणों में रेंगता सा दिख रहा था। बादलों की आवाजाही में ये पहाड़ गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लेते। 
इन विशाल पहाड़ों के चेहरे का रंग अगर कोई बदल सकता है तो  वो हैं ये मनचले बादल
बहुत दूर तक ये परिदृश्य मन को लुभाता रहा कि तभी अचानक नीचे उतरते उतरते लामायुरु के बौद्ध मठ अपनी पहली झलक दिखला गया। क्या दृश्य था वो ! लद्दाख के पहाड़ों की गोद में खेत खलिहानों की हरी चादर लपेटे एक इमारत मुस्कुराती हुई सी खड़ी हो।
और ये पहुँच गए हम लोग लामायुरु के बौद्ध मठ के पास
लामायुरु के बौद्ध मठ के साथ अगली कड़ी आपको दिखाऍगे यहाँ का मूनलैंड और फिर आपकी मुलाकात कराएँगे सिंधु यानि Indus से। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें।

Tuesday, June 19, 2018

द्रास से रहगुज़र कारगिल की और मिलना हिंदी फिल्मों के एक संगीतकार से.. Road to Kargil !

श्रीनगर लेह राजमार्ग पर चलते हुए अब तक मैंने आपको सोनमर्गजोजिलाद्रास घाटी  और द्रास युद्ध स्मारक तक की सैर कराई। द्रास के युद्ध स्मारक और संग्रहालय को देखने के बाद हमारा अगला पड़ाव था कारगिल। पर इससे पहले कि मैं अपनी इस यात्रा के बारे में बताऊँ, लद्दाख जाने वालों के लिए बस यही कहना चाहूँगा कि ये एक ऐसा इलाका है जहाँ किसी भी पड़ाव से ज्यादा महत्त्वपूर्ण वहाँ तक पहुँचाने वाली रहगुज़र है। 
द्रास से चले अब हम कारगिल की ओर
अगर आपने लद्दाख के रास्तों को अपनी आँखों में क़ैद नहीं किया तो समझिए आपने लद्दाख को आत्मसात नहीं किया। बहुत से लोगों को ये रास्ते एकाकी और एकरूपता लिए नज़र आते हैं। इनके एकाकीपन पर मैं तो यही  कहूँगा कि इन इलाकों की शून्यता ही मन में गहन शांति का भाव लाती है। आपको अपने और करीब पहुँचाती है। मिट्टी के रंग के ये नंगे पहाड़ हर मोड़ पर अपना रूप बदलते हैं। इनके असाधारण रूपों से किसी का मन तो प्रफुल्लित होता है तो कोई इन रास्तों को बोरिंग कहकर एकदम से खारिज़ कर देता है। 


कलकल छलछल बहती द्रास
जहाँ तक मेरे व्यक्तिगत अनुभवों का सवाल है मुझे तो अपनी लगभग दस दिनों की कश्मीर लद्दाख यात्रा में मुझे तो इन रास्तों से प्यार  हो गया और इनकी खूबसूरती ही मेरी इस यात्रा का हासिल रहा। इसीलिए मैं आपको ये रास्ता चित्रों के माध्यम से लगातार दिखा रहा हूँ और आगे भी दिखाता रहूँगा और इसी कड़ी में आज देखिए द्रास से कारगिल तक की मेरी यात्रा की एक  झाँकी।

ऊपर नंगे पहाड़ और नीचे हरा भरा नदी का तट
द्रास से कारगिल की दूरी करीब 64 किमी है। द्रास घाटी के खुले चारागाहों से विपरीत कारगिल की ओर बढ़ती सड़क संकरी है और इसके दोनों ओर पहाड़ बेहद करीब लगभग साथ साथ चलते हैं। कारगिल और द्रास  से लगा ये इलाका  एक समय प्राचीन बलतिस्तान की एक तहसील  थी। जम्मू कश्मीर के डोगरा राजाओं ने उन्नीस वी शताब्दी के मध्य में बलतिस्तान और गिलगित के इलाकों पर अपना कब्जा जमाया था। उस समय इसका फैलाव उत्तर पश्चिम में स्कार्दू से लेकर नुब्रा घाटी के तुर्तुक तक था। 

कारगिल से 29 किमी पहले

Tuesday, June 5, 2018

द्रास युद्ध स्मारक : कैसे फतह की हमने टाइगर हिल की चोटी? Drass War Memorial

श्रीनगर लेह राजमार्ग से हम सोनमर्ग, जोजिला, द्रास घाटी होते हुए हमारा समूह अब द्रास कस्बे से कुछ ही किमी दूर था। द्रास घाटी से साथ चलने वाली द्रास नदी रास्ते में मिलने वाले ग्लेशियर की बदौलत फूल कर और चौड़ी हो गयी थी। जोजिला के बाद बर्फ की तहों के बीच आँख मिचौनी करती ये नदी अब पिघल कर पूरे प्रवाह के साथ बह रही थी।

द्रास युद्ध स्मारक का मुख्य द्वार

द्रास नदी का अस्तित्व कारगिल से करीब सात किमी पहले तब खत्म हो जाता है जब ये कारगिल की ओर से आने वाली सुरु नदी में मिल जाती है। हरे भरे चारागाहों से पटे इन  इलाकों में सर्दियों में जम कर बर्फबारी होती है जिसकी वजह से यहाँ जीवन यापन करना बेहद कठिन है। 




बारह सौ की आबादी वाले इस इलाके में सेना के जवानों के आलावा दार्द जनजाति के लोग निवास करते हैं जो किसी ज़माने में उत्तर पश्चिम दिशा से तिब्बत के रास्ते यहाँ आए थे। इनकी भाषा को दार्दी का नाम दिया जाता है जो लद्दाख की बोलियों से मिलती जुलती है। उन्नीसवीं शताब्दी में यहाँ आने वाले अंग्रेज इतिहासकारों ने द्रास के लोगों द्वारा कश्मीरी और लद्दाखी राजाओं को कर देने की बात का उल्लेख किया है। कश्मीरी राजाओं के प्रभाव का एक प्रमाण यहाँ मिट्टी के एक किले के रूप में भी झलकता है जिसके छोटे मोटे अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।

द्रास नदी की कलकल धारा

द्रास का ये दुर्भाग्य ही था कि इतनी खूबसूरत घाटी में बसे इस कस्बे को असली शोहरत कारगिल युद्ध की वजह से आज से लगभग बीस साल पहले 1999 में मिली। कारगिल युद्ध में दो प्रमुख चोटियों टाइगर हिल और तोलोलिंग, द्रास के इलाके में स्थित थीं इसलिए ये कस्बा युद्ध का प्रमुख केंद्र रहा। फरवरी 1999 का  महीना था जब पाकिस्तान ने द्रास, कारगिल और बतालिक इलाके में अपनी टुकड़ियाँ भेजनी शुरु कर दी थीं। अप्रैल में ये घुसपैठ अपने चरम पर थी पर भारतीय सेना इस सौ वर्ग किमी से भी ज्यादा के क्षेत्रफल में हो रही इतनी बड़ी घुसपैठ से अनभिज्ञ थी। मई के दूसरे हफ्ते में बतालिक सेक्टर के स्थानीय गड़ेरियों द्वारा दी गई ख़बर सेना के हाथ लगी। कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व में एक खोजी दस्ता बतालिक सेक्टर में स्थित चोटियों के साथ रवाना हुआ और ऊँचाई पर जमे दुश्मन की गोलियों का शिकार बना।


जब भारत को इस व्यापक घुसपैठ का अंदाजा हुआ तो आपरेशन विजय के नाम से एक अभियान शुरू हुआ जिसके  तहत  सेना की कई टुकड़ियों को  कारगिल और उसके आसपास के इलाकों के लिए रवाना किया गया। इस इलाके तक सेना को रसद और साजो सामान पहुँचाने के लिए सिर्फ श्रीनगर लेह राजमार्ग ही था। दिक्कत ये थी कि द्रास से सटी चोटियों पर दुश्मन पहले से ही घात लगाकर हमला करने के लिए तैयार बैठा था। उसकी मारक क्षमता के अंदर समूचा राजमार्ग था और इस रास्ते पर दुश्मन ने ताबड़तोड़ हमले कर जान माल को काफी क्षति भौ पहुँचाई। हालात ये थे कि सेना ने इस सड़क के किनारे अपने बचाव के लिए दीवाल का निर्माण किया जिसके कुछ हिस्से आज भी द्रास जाते वक़्त देखे जा सकते हैं।

दुश्मन के गोले बारूद की मार से बचने के लिए बनाई गयी दीवार

भारतीय सेना की प्रथम प्राथमिकता श्रीनगर लेह मार्ग से सटी चोटियों पर कब्जा जमाने की थी ताकि लेह तक सेना को रसद पहुँचाने वाले रास्ते पर गाड़ियों का आवगमन सही तरीके से हो। द्रास के पास सबसे ऊँची चोटी टाइगर हिल की थी जिसके ऊपर दुश्मन ने करीब दर्जन भर बंकर बना रखे थे। दिन में जवानों को इस खड़ी चढ़ाई वाले पहाड़ों पर भेजना सीधे सीधे मौत को आमंत्रण देना था। रात के वक़्त अँधेरे में बिना आवाज़ किए बढ़ना ही एकमात्र विकल्प था। चोटियों के पास तापमान शून्य से दस से बारह डिग्री कम था पर भारतीय सेना के जवानों ने ये कठिन चुनौती भी स्वीकारी। यही वजह रही कि आरंभिक लड़ाई में सेना के सैकड़ों जवान ऊपर से हो रही अंधाधुंध  गोली बारी  का शिकार हुए। 

भारत चाहता तो LOC पार कर दुश्मन को पीछे से घेरकर उसकी रसद के रास्ते बंद कर उसे नीचे उतरने पर मजबूर कर सकता था। पर पाकिस्तान को हमलावर साबित करने के अंतरराष्ट्रीय दबाव को बढ़ाने के लिए ऐसा नहीं किया गया और इस वजह से एक एक चोटी फतेह करने के लिए यहाँ ऐसा खूनी संघर्ष हुआ जिसमें दोनों ओर के सैनिकों को भारी संख्या में अपने प्राणों  की आहुति देनी पड़ी।

16600 फीट ऊँची टाइगर हिल की चोटी
गाड़ीवाला हमें गाड़ी रोक कर टाइगिर हिल की ओर इशारा कर रहा था। हम द्रास के कस्बे में प्रवेश कर चुके थे। हरे भरे पेड़ों और खेतों से अटे कस्बे में ऐसे भीषण युद्ध के होने की बात सपने में भी सोची नहीं जा सकती थी। अगर यहाँ गोलों से दगी दीवारें और वार मेमोरियल नहीं बना होता तो शायद हम सब इसे एक रमणीक पर बेहद ठंडे कस्बे से ज्यादा अपनी यादों में कहाँ समा पाते? पर अब तो ये देश के विभिन्न भागों से युद्ध में भाग लेने आए सैनिकों की वीर गाथा की जीती जागती तस्वीर बन गया है। क्या बिहार, क्या जाट, क्या सिख, क्या गोरखा, क्या नागा, क्या अठारह ग्रेनेडियर कितनी सारी रेजिमेंट्स ने इस युद्ध में एक दूसरे का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।

 हरा भरा द्रास

टाइगर हिल के फतह की कहानी तो आज की तारीख में कई फिल्मों का हिस्सा बन गयी है। यहाँ आने वाले हर आंगुतक को सेना के जवान समूह में इकठ्ठा कर टाइगर हिल, तोलोलिंग हिल और उसके आस पास की दुर्गम चोटियों पर भारतीय सेना द्वारा अत्यंत विकट परिस्थितियों में अद्भुत पराक्रम की इस अमर दास्तान को सबसे बाँटते हैं। ये घटनाएँ ऐसी हैं जो आँखों में युद्ध की विभीषका से एक ओर तो नमी भर देती हैं तो दूसरी ओर हमारे वीर सपूतों की शौर्य गाथा को सुन मन नतमस्तक हो जाता है। टाइगर हिल की ही बात करूँ तो इसे कब्जे में लेने के लिए नागा, सिख और अठारह ग्रेनेडियर की टुकड़ियों ने हिस्सा लिया। बाँयी और दाहिनी ओर से नागा और सिख रेजीमेंट की टुकड़ियाँ आगे बढ़ीं जबकि पीछे से अठारह ग्रेनेडियर ने खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए हमले की योजना बनाई। 

हरे भरे खेतों के पीछे से झांकती टाइगर हिल की चोटी

रात के अँधेरे में योगेद्र सिंह यादव की अगुआई में घातक कंपनी के जवानों ने चढ़ाई आरंभ की। यादव ने ऊपर तक पहुँचने के लिए रस्सियों को बाँधने का काम अपने जिम्मे लिया। जब वे शिखर से साठ फीट नीचे थे तो दुश्मनों ने उन्हें देख लिया और मशीनगन से उनकी टुकड़ी पर हमला बोल दिया। प्लाटून कमांडर सहित दो जवान वहीं वीरगति को प्राप्त हुए पर कई गोलियाँ खाकर भी योगेंद्र ने ऊपर बढ़ना जारी रखा। उसी हालत में वो ऊपर पहुँचे और अपने सामने के बंकर पर ग्रेनेड से हमला कर उसे तबाह कर दिया। योगेंद्र का ये दुस्साहस पीछे से आने वाली टुकड़ियों के लिए टाइगर हिल तक रास्ता बनाने का ज़रिया बना।

इसी तरह 8 सिख रेजीमेंट के जवान जब शिखर के पास पहुँचने लगे तो सामने से हो रही गोलाबारी में आड़ लेने का कोई विकल्प उनके पास मौजूद नहीं था। मौत का संदेश लिए कोई गोली कभी भी उनके सीने के पार हो सकती थी। ऐसे में शत्रुओं के हताहत जवानों को ढाल की तरह  इस्तेमाल करते हुए शिखर पर पहुंचने में सफलता प्राप्त की और दुश्मनों से हाथों हाथ की लड़ाई में हरा कर टाइगर हिल के दूसरे हिस्से पर कब्जा जमाया।

युद्ध स्मारक में प्रदर्शित मिग 21 विमान
द्रास का युद्ध स्मारक तीन हिस्सों में बँटा है। मुख्य द्वार से विजय पथ के रास्ते अमर जवान ज्योति तक जाया जा सकता है। अमर जवान ज्योति पर कवि माखन लाल चतुर्वेदी की लिखी लोकप्रिय कविता "पुष्प की अभिलाषा अंकित हैं।

चाह नहीं, मैं सुरबाला के 
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,

जिस पथ पर जावें वीर अनेक!

गुलाबी पत्थरों से बने इस स्मारक के ठीक पीछे एक दीवार बनी है जिसमें पीतल की चादर पर शहीदों के नाम लिखे हुए  हैं। इसके ठीक पीछे सौ फीट की ऊँचाई पर भारत का विशाल ध्वज  है जिसे आप स्मारक में प्रवेश करते हुए दूर से ही  देख पाते हैं। 

अमर जवान ज्योति 

कारगिल युद्ध की शौर्य गाथा बयाँ करता सैनिक

स्मारक के एक हिस्से में एक छोटा सा संग्रहालय  बनाया गया है जिसे गोरखा रेजीमेंट के जवान मनोज पांडे के नाम पर रखा गया है। इस संग्रहालय के अंदर युद्ध में प्रयोग और दुश्मनों से बरामद हथियारों के आलावा, अलग अलग चोटियों पर सेना के विभिन्न दस्तों के आगे बढ़ने के मार्गों को विभिन्न मॉडल से दर्शाया गया है। साथ ही उस वक्त की तस्वीरों और बधाई संदेशों को भी यहाँ प्रदर्शित किया गया है। इसी से सटा यहाँ एक वीडियो कक्ष भी है। 
 वीर भूमि

स्मारक के तीसरे हिस्से का नाम वीर भूमि रखा गया है। यहाँ शहीद जवानों के नाम पर एक एक पट्टिका बनाई गयी है। इनके बीच से गुजरना मन को अनमना कर देता है। सेना की ओर से यहाँ एक भोजनालय भी चलाया जाता है।

टाइगर हिल की फतह का निरूपण

कारगिल युद्ध में पुरस्कृत होने वाले जवान। पहली पंक्ति में सबसे बाँए योगेद्र सिंह यादव  की तस्वीर है।


भले ही दो महीने के भीतर भारत ने  कारगिल युद्ध जीत लिया पर इस दौरान देश ने पाँच सौ से अधिक सैनिक खोए। द्रास से गुजरना हमेशा इन शहीदों की शहादत को याद दिलाता रहेगा। मैंने ये देखा कि यहाँ जब दूर दराज के लोग आते हैं तो उन्हें देख कर यहाँ पदस्थापित जवानों का मनोबल बढ़ता है। इसलिए जब भी आप श्रीनगर से कारगिल जाएँ यहाँ घंटे दो घंटे का वक़्त अवश्य बिताएँ।

लद्दाख की इस यात्रा का अगला पड़ाव होगा कारगिल जहाँ अचानक ही मुलाकात हुई एक संगीतकार से जो सारेगामापा में कई बार जज की भूमिका निभा चुके हैं। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें।

Saturday, May 26, 2018

मुसाफ़िर हूँ यारों ने पूरे किए अपने दस साल ! Musafir Hoon Yaaron 10th Blog Anniversary !

मुसाफ़िर हूँ यारों ने अपने जीवन के दस साल पिछले महीने पूरे कर लिए। यूँ तो ब्लागिंग करने का मेरा ये सिलसिला तेरह साल पुराना है। शुरुआत रोमन हिंदी ब्लॉग से मैंने 2005 में की क्यूँकि तब यूनिकोड की सुविधा सारे आपरेटिंग सिस्टम में आयी नहीं थी। रोमन से देवनागरी में टंकण सीखने के बाद 2006 अप्रैल में एक शाम मेरे नाम की नींव रखी गयी। ब्लागिंग के उस शुरुआती दौर में सारा कुछ एक ही थाली में परोसने की परंपरा थी। मैंने भी ब्लागिंग के अपने पहले दो सालों में गीत, ग़ज़लों, किताबों के साथ यात्रा वृत्तांत भी एक शाम मेरे नाम पर ही लिखे। 



पर वक़्त के साथ मुझे लगने लगा कि ब्लॉग विषय आधारित होने चाहिए और इसीलिए मुझे संगीत और यात्रा जैसे अपने प्रिय विषयों को दो अलग अलग वेब साइट्स पर डालने की जरूरत महसूस हुई। संगीत और साहित्य जहाँ एक शाम मेरे नाम की पहचान बना वहीं अपने यात्रा लेखन को एक जगह व्यवस्थित करने के लिए 2008 अप्रैल में मुसाफ़िर हूँ यारों अस्तित्व में आया। हिंदी में यात्रा ब्लागिंग की ये शुरुआती पहल थी जो अगले कुछ सालों में तेजी से फैलती गयी। आज हिंदी में सैकड़ों यात्रा ब्लॉग हैं जिसमें लोग अपने संस्मरणों को सजों रहे हैं। 

इस ब्लॉग की पहली पोस्ट

व्यक्तिगत रूप से सफ़र का सिलसिला जारी रहा। आपको भारत के कोने कोने से लेकर विदेशों की भी सैर कराई। इस ब्लॉग पर लगभग चार सौ आलेख व फोटो फीचर्स लिख चुका हूँ।  हिंदी में यात्रा लेखन करते हुए मेरा ये उद्देश्य रहा है कि इसे उस स्तर पर ले जा सकूँ जहाँ इसे अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं में हो रहे काम के समकक्ष आँका जाए।  इस सतत प्रयास से विगत कुछ वर्षों में इस ब्लॉग की जो उपलब्धियाँ रहीं है उनमें कुछ का जिक्र आप यहाँ देख सकते हैं। 

राहें जो तय हो चुकीं ,  Places covered in this blog

पिछले दस सालों के इस सफ़र में मैंने बहुत कुछ सीखा। हिंदी और अंग्रेजी में हो रहे यात्रा लेखन को नजदीक से देखने का अवसर मिला।  कई बार देश के अग्रणी यात्रा लेखकों के साथ अलग अलग मंचों पर मुलाकात और चर्चाएँ भी हुईं। आज जिस हालत में यात्रा उद्योग और उनसे जुड़ा ब्लागिंग का परिदृश्य है उसके कुछ सुखद और कुछ अफसोसनाक पहलू दोनों ही हैं।

अगर पहले धनात्मक बिंदुओं की चर्चा करूँ तो यात्रा उद्योग में अब ब्लॉग और सोशल मीडिया में लेखन के महत्त्व को समझा जाने लगा है। घूमने फिरने का शौक रखने वाले एक निष्पक्ष राय जानने के लिए ब्लॉगस और सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं। यही वजह है कि देश और विदेशों में किसी स्थान को बढ़ावा देने के लिए ब्लॉगरों को आमंत्रित किया जा रहा है। निजी कंपनियाँ आपको अपने इवेंट को कवर करने के लिए आमंत्रित करने के साथ आपकी सेवाओं का मूल्य भी दे रही हैं। आम लेखन का स्तर भी पहले से बेहतर हुआ है। कैमरों की बढ़ती गुणवत्ता का असर आजकल सोशल मीडिया और ब्लॉग पर लगाए गए चित्रों में नज़र आने लगा है। यात्रा के अपने अनुभवों को लोग पुस्तकों के माध्यम से छपवा रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर ट्रैवेल ब्लागिंग एक रुचि के स्तर पर शुरु हुई थी। पर अब इसे  फुल या पार्ट टाइम प्रोफेशन के तौर पर भी लोग अपनाने लगे हैं। पर जहाँ व्यवसायीकरण शुरु होता है अपने आप को बाजार में बेचने की प्रतिस्पर्धा शुरु हो जाती है। बाजार ने ब्लागरों की गुणवत्ता के लिए जो मापदंड निर्धारित किए हैं वो सोशल मीडिया पर आपकी सक्रियता और फॉलोवर्स की संख्या पर आधारित हैं। इसके आलावा आपके ब्लॉग की डोमेन अथारिटी भी माएने रखती है। कायदे से देखा जाए तो ये परिपाटी तार्किक लगती  है।

यात्रा के कुछ यादगार लमहों का एक झरोखा।

ये मापदंड पश्चिम से आए हैं पर दिक्कत ये है कि उन्होंने ही इसमें घालमेल करने की सारी व्यवस्थाएँ भी उपलब्ध कराई हैं। सोशल मीडिया पर फालोवर्स और लाइक्स खरीदे जा सकते हैं।  Link Building के लिए नामी इंटरनेशनल ब्लागर एक दूसरे की लिंक को अपने ब्लॉग पर लगाकर अपनी डोमेन आथारिटी को बढ़ाने की कोशिशों में तत्पर रहते हैं और ऐसा करना एक जायज तरीके के तौर पर देखा जाता है। विदेशों में ये सालों से हो रहा है और अब वही प्रवृति भारत में देखने को मिल रही है। हाँ अपवाद हर जगह हैं लेकिन अगर ऐसे ही चलता रहा तो ईमानदारी से अपना काम करने  पेशेवर यात्रा लेखकों की संख्या गिनती में रह जाएगी।

सफलता का स्वाद चखने के लिए यात्रा लेखकों द्वारा सोशल मीडिया पर झूठे दावों और हथकंडों का प्रयोग भी देखने को मिलता रहता है। पी आर एजेंसीज के पास इतना समय और योग्यता नहीं कि वो लेखकों और सोशल मीडिया पर अपना प्रभाव रखने वालों का उचित मूल्यांकन करें। इस वजह से घूमने और लिखने का जो स्वाभाविक आनंद है वो सोशल मीडिया पर हमेशा दिखते रहने के दबाव और दिखावे के इस खेल में खोता सा जा रहा है।

ये तो हुई समूचे यात्रा लेखन परिदृश्य की बात। जहाँ तक हिंदी की बात है तो अभी भी हिंदी में लिखने वालों के समक्ष बड़ी चुनौती है कि इस तरह देश के साथ विदेशों के प्रायोजकों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें। ये जतला सकें कि हम उनकी बात को देश के तमाम हिंदी भाषी पाठकों तक पहुँचा सकते हैं जो तेजी से इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं। ये तभी हो सकता है जब हम किसी जगह की प्रकृति, संस्कृति और इतिहास से घुलते मिलते हुए अपने  विषयवस्तु की रचना करें।

खैर इन सब बातों का मैंने जिक्र इसलिए किया कि पाठक जिन्हें यात्रा लेखन का एक खूबसूरत चेहरा दिखाई देता है वे उसके इस पक्ष से भी थोड़ा परिचित हो लें। बाकी मैं तो आपको यूँ ही अपनी यात्राओं के किस्से सुनाता ही रहूँगा। जैसा पिछले इन दस सालों से सुना रहा हूँ।  अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें।ब्लागिंग का एक उद्देश्य आपकी बातों, आपकी पसंद को सुनना समझना भी है और यह तभी संभव है जब आप यहाँ अपनी राय ज़ाहिर करें। अगर आपके मन में यात्रा लेखन से जुड़ा कोई सवाल हो तो बेहिचक प्रश्न करें। आपके सुझावों का सहर्ष स्वागत है। आशा है पिछले दशक की तरह आने वाले दशकों में भी आप इस चिट्ठे को ऐसे ही प्यार देते रहेंगे।

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