Sunday, August 21, 2016

टोरंटो की वैश्विक संस्कृति : सपनों की रानी से .... डोला रे डोला तक Multicultural City of Toronto, Canada

टोरंटो के होटल रामदा प्लाजा की वो सुबह बड़ी प्यारी थी। धूप में हल्की सी ठसक थी जिससे बाहर का तापमान बीस से ऊपर चला गया था। हवा भी धीमी रफ्तार से मंद मंद बह रही थी। वापसी की उड़ान भरने के पहले जो चार पाँच घंटे का समय शेष था उसमें इस शहर को कदमों से नापने का अनुकूल वातावरण था।

टोरंटो का मुख्य केंद्र इटन सेंटर

सुबह नौ बजे जब हम होटल के रेस्ट्रां में पहुँचे तो वो खाली पड़ा था। हमें देख कर स्थूल काया और मध्यम ऊँचाई वाला एक वेटर हमारी ओर लपका और बड़ी गर्मजोशी से उसने हमारा अभिवादन किया। उसकी छोटी छोटी आँखों से ये तो स्पष्ट था कि वो एशियाई मूल का है पर चीन, वियतनाम, कोरिया, थाईलैंड, फिलीपींस जैसे दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में वो किस देश से ताल्लुक रखता होगा ये क़यास लगाने लायक महारत हमारे समूह में किसी को नहीं थी।

इससे पहले कि हम उसे बताते कि नाश्ते में क्या लेना है वो पहले ही  उत्साह से पूछ बैठा कि क्या आप भारत से आये हैं ? हमारे हाँ कहते ही वो कहने लगा कि मैं समझ गया कि आप को क्या चाहिए। हम एक क्षण तो चौंके पर जिस तत्परता से उसने हमारी टेबुल पर फल, दूध, जूस, बटर टोस्ट,आलू फ्राई परोसनी शुरु की उससे हम समझ गए कि आज हम सही शख़्स की मेजबानी में हैं।

नाश्ता करते समय तक उसने हमें नहीं टोंका। पर जब हम चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे वो फिर हमारे पास आया और पूछने लगा कि क्या आप सबने राजेश खन्ना की फिल्में देखी हैं? मुझसे नहीं रहा गया और मैं पूछ बैठा कि आप कहाँ से हो? वो बताने लगा कि वो बर्मा से है और अपने कॉलेज के दिनों से राजेश खन्ना का बहुत बड़ा फैन रहा है। उसने आराधना का जिक्र करते हुए मेरे सपनों की रानी.... गुनगुना कर  राजेश खन्ना के प्रति अपने प्रेम का इज़हार किया। मैंने उसे बड़े भारी मन से बताया कि वो तो कुछ साल पहले गुजर गए पर जब मैं उससे ये कह रहा था मेरे दिल में उनकी कालजयी फिल्म आनंद का वो संवाद गूँज रहा था . आनंद मरा नहीं.. आनंद मरते नहीं।

मुझे वो व्यक्ति बहुत दिलचस्प लगा इसलिए मैंनें उसकी बीती हुई ज़िदगी के बारे में पूछना शुरु किया। पता चला कि वो लगभग तीन दशक पहले रोज़गार की खोज में कनाडा पहुँचा था। कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई थी तो यहाँ होटल में बर्तन साफ करने की नौकरी मिली। धीरे धीरे उसने तरह तरह के पकवान बनाना सीखा, अंग्रेजी में प्रवीणता हासिल की और छोटे मोटे होटल बदलते हुए रामदा आ पहुँचा। पिछले कुछ सालों से वो यहीं है। एक बेटा है तो वो इंजीनियरिंग कर नार्वे में नौकरी कर रहा है। पत्नी भी नौकरी कर रही है ।
 

अपनी कथा कहते कहते वो भावुक हो गया और कहने लगा मैंने जहाँ से शुरुआत की थी उस हिसाब से मैंने वो सब कुछ हासिल कर लिया जिस आशा में मैं कनाडा आया था  टोरंटो में मेरा अपना घर है, बच्चे नौकरी कर रहे हैं, बुढ़ापे के लिए अच्छी खासी बचत कर ली है पर मेरा मन करता है अपने साथियों के लिए कुछ करूँ जो म्यानमार में अभी भी गरीबी और आभाव की ज़िदगी जी रहे हैं। पत्नी कहती है तुम वापस क्यूँ जाना चाहते हो? मैं जानता हूँ वो नहीं समझेगी पर मैं एक दिन निकल जाऊँगा उसे बिना बताए अपने देश में, अपने लोगों के पास..

उसकी आँखें उस स्वप्न पे अटकी थीं और उनकी स्वीकारोक्ति के लिए ही शायद उसने हमसे अपने दिल का दर्द  बाँटा था। हमने उसे बताया कि भारत के बड़े शहरों में तो आजकल विश्व के कई देशों के व्यंजनों का स्वाद चखने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। आप म्यानमार में भी कुछ वैसा ही करो। वो मुस्कुराते हुए बोला, मैंने भी वही सोचा है। आप सब तो भारतीय हैं, समझ सकते हैं। भारत की ही तरह मेरे देश में कोई नया व्यापार शुरु करने से पहले जेबें भरने पड़ती हैं। अब मुस्कुराने की बारी हमारी थी।

चलते चलते मैंने उससे यही कहा कि मित्रों के साथ मिलकर  अनुभव के सहारे अपने वतन में काम करने की सोच बहुत अच्छी है। आपको अपने देश जरूर जाना चाहिए ये देखने कि वहाँ  आप का काम सँवर सकता है या नहीं। पर एक बार काम की नींव मजबूत हो जाए तो अपनी पत्नी को भी आप आश्वस्त कर सकते हैं स्वदेश लौटने के लिए। मुझे पता नहीं कि वो अपने देश जा पाया या नहीं पर ऐसे जीवट इंसान मन में अमिट छाप छोड़ जाते हैं।


टोरंटो की डबलडेकर बस
नाश्ता कर मैं शहर के मुख्य केंद्र इटन सेन्टर की तरफ चल पड़ा। यूरोपीय शहरों की तरह टोरंटो में भी Hop On Hop Off बसों की सुविधा है। यहाँ आप 35 US डॉलर में पूरे शहर का चक्कर लगा सकते हैं। अगर रास्ते में कोई जगह आपको पसंद आ गई तो वहीं उतर जाइए और फिर जब मर्जी इस डबल डेकर बस में वापस चढ़ जाइए। अपने टिकट का प्रयोग आपको एक दिन नहीं बल्कि तीन दिन इन बसों में चढ़ने की इजाज़त देता है। अगर आप के पास समय कम है तो यहाँ के सिटी पास का इस्तेमाल कर यहाँ के मुख्य आकर्षणों का बिना लंबी लााइन में लगे आप आनंद उठा सकते हैं।

योंगे स्ट्रीट Yonge Street, Toronto

Tuesday, August 9, 2016

टोरंटो में गुजरा वो पहला दिन ... CN Tower, Toronto, Canada

टोरंटो कनाडा का सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है । अब अगर मैं बता दूँ कि यहाँ की आबादी करीब छब्बीस लाख है तो आप कहेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है? भारतीयों को आबादी के मामले में चीन के आलावा टक्कर ही कौन दे सकता है? वैसे इस बड़े शहर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की सर्वदेशीय  संस्कृति है। कनाडा के इस पहलू के बारे में विस्तार से आगे बताऊँगा  ही पर इस शहर में गुजारे दो दिनों में पहले दिन के अनुभवों को आज आपसे साझा कर लेते हैं ..


टोरंटो से नियाग्रा लगभग एक सौ तैंतीस (133) किमी की दूरी पर है।सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय यात्रियों के यहाँ आने और बसने से पहले ये इलाका आदिम जनजातियों की मिल्कियत हुआ करता था। ऐसा माना जाता है कि यहाँ की एक जनजाति ने इस क्षेत्र का नान टकारोन्टो रखा था जिसका शाब्दिक अभिप्राय एक ऐसी जगह से होता है जहाँ पानी में पेड़ उगते हों। इस इलाके को शहरी रूप अठारहवीं शताब्दी के आख़िर में मिला। ब्रिटिश लोगों ने इस शहर को यार्क का नाम दिया। पर उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिकी लड़ाकों ने युद्ध में ब्रिटिश सेना को धूल चटा दी। अमेरिकी तो शहर को तहस नहस कर वापस चले गए पर इसके बाद जब शहर बसा तो  टोरन्टो के नाम से।

नियाग्रा से लौटते हुए हम टोरंटो पहुँचे थे। क्वीन एलिजाबेथ राजमार्ग से गुजरता हुआ ये रास्ता कार्यालय जाने और आने के वक़्त बेहद  व्यस्त रहता है। कई किमी लंबी गाड़ियों की रेंगती कतारें इस राजमार्ग की पहचान हैं। ख़ैर क्वीन एलिजाबेथ मार्ग से तो हम अपेक्षाकृत जल्दी निकल आए पर डाउनटाउन टोरंटो में अपने होटल तक पहुँचने के लिए हमें घंटे भर का वक़्त लग गया।


टोरंटो शहर की गगनचुंबी अट्टालिकाएँ
हमारी कार हर मोड़ और चौराहे  पर रुक रही थी। लिहाजा इस शहर की झांकियों को क़ैद करने का हमें यथेष्ट अवसर मिल रहा था। महानगरों की आकाश छूती इमारतों को वृहत स्तर पर देखने का मौका इससे पहले टोक्यो में मिल चुका था। फिर भी नए शहर में आँखे कुछ नया तो तलाशती ही रहती हैं। एक ओर बड़ी बड़ी इमारतें तो दूसरी ओर ओंटोरियो झील का किनारा दिख रहा था। शाम पूरी ढली भी नहीं थी पर लोग वर्जिश करते नज़र आ रहे थे। कुछ दौड़ रहे थे । कई साइकिल पर सवार थे। बाकी झील के किनारे पार्क में धूप का आनंद ले रहे थे।

ब्रुकफील्ड प्लेस जहाँ है टोरंटो के बड़े बड़े कार्यालयों का जमावड़ा

Monday, August 1, 2016

आइए ले चलें आपको मुखौटों के इस संसार में.. Mask Garden, Eco Park, Kolkata

मुखौटों की दुनिया बड़ी विचित्र है। आदि काल से मनुष्य मुखौटों का प्रयोग कर रहा है अपने को बाकी मनुष्यों से अलग दिखाने के लिए। वैसे तो खुदाई में नौ हजार वर्ष पूर्व के भी मुखौटे मिले हैं पर विशेषज्ञों का मानना है कि इनसे कहीं पहले इनका प्रयोग शुरु हो चुका था। पर आज मैं आपसे मुखौटों की बातें क्यूँ कर रहा हूँ। उसकी वज़ह ये है जनाब कि मैं आपको आज एक ऐसे उद्यान में ले चल रहा हूँ जिसका नाम ही Mask Garden है और ये स्थित है कोलकाता के राजरहाट इलाके में नए बने इको पार्क में। यूँ तो लगभग पाँच सौ एकड़ में फैले इस उद्यान में देखने को बहुत कुछ है पर मुखौटों का ये संसार इस पार्क को अन्य उद्यानों की तुलना में खास बना देता है।


तो सबसे पहले आपको लिए चलते हैं अफ्रीका। अफ्रीकी जनजातियों के धार्मिक अनुष्ठानों और पारिवारिक समारोहों में मुखौटों का प्रचलन पुरातन काल से आम रहा है।ऐसे माना जाता रहा कि एक बार मुखौटों को पहन लेने के बाद मनुष्य अपनी पहचान खो कर उस आत्मा का रूप धारण कर लेता है जिसके प्रतीक के तौर पर मुखौटे का निर्माण किया गया है। समाज में मुखौटे बनाने वालों और विशेष अवसर पर उन्हें पहनने वालों को सम्मान  की नज़रों से देखा जाता था । मुखौटे बनाने का काम भी पीढ़ी दर पीढ़ी एक परिवार के लोगों को ही दिया जाता था। यानि मुखौटे इन परलौकिक शक्तियों से संपर्क के सूत्र का काम निभाते थे।

Monday, July 18, 2016

वो शामें, वो मौसम, नदी का किनारा..वो चंचल हवा ...A drive along Niagara River !

बारिश का मौसम पूरे शबाब पर है। रुक रुक थम थम कर पानी की फुहारें तन मन में शीतलता का संचार कर रही हैं।। बरखा रुकती भी है तो ठंडी हवाओं के झोंके आ कर दिल को सहला जाते हैं। मन भी है कि उड़ चला है पुरानी यादों की तरफ़ और आँखों के सामने उभरने लगी है वो शाम जब आकाश में काले बादल धूप के साथ आँख मिचौनी का खेल खेल कर रहे थे नीचे इक नदी का नीला आँचल था जिसे हरे भरे पेड़ों ने अपनी बाहों में थाम रखा था। तो आइए उस मंज़र को सजीव करें आज के इस फोटो फीचर में.. 

गर्मी में ओंटोरियो की हरियाली देखते ही बनती है।

वो शाम कनाडा की थी. नियाग्रा से हमें दो दिन बाद ही टोरंटो के लिए निकलना था। मई महीने का आखिरी हफ्ता था।  शाम को जब अपना काम निबटाकर घूमने की फुर्सत मिली तो पौने सात बज रहे थे। पर बाहर दिन शाम को पास फटकने भी नहीं दे रहा था। हमारे होस्ट ने सुझाया कि चलिए आपको नियाग्रा नदी के साथ साथ एक लम्बी  ड्राइव पर ले चलें। आफिस से थक हार कर निकल रहे लोगों के लिए इससे अच्छा प्रस्ताव क्या होगा भला तो हम सहर्ष ही उनके साथ निकल पड़े।

ये है नियाग्रा नदी का रास्ता..

नियाग्रा नदी ज्यादा लंबी नदी नहीं है। इसकी कुल लंबाई साठ किमी से भी कम है। ये लेक एरी से निकलती है और दक्षिण से उत्तर की ओर बहती हुई लेक ओंटेरियो में जा मिलती है। इसके पश्चिमी तट पर कनाडा का ओंटेरियो  है और पूर्वी तट से सटा अमेरिका का न्यूयार्क राज्य।

वो शामें, वो मौसम, नदी का किनारा..वो चंचल हवा

Friday, July 8, 2016

शिमला और उसका ब्रिटिश अतीत... Shimla and its British legacy

वैसे तो ब्रिटिश लोगों ने हिमालय से सटे राज्यों में कई पर्वतीय स्थलों को सजाया सँवारा पर इतिहास की किताबों में इनमें जिस हिल स्टेशन का सबसे ज़्यादा उल्लेख हुआ वो था शिमला। तिब्बत का मामला हो या भारत पाकिस्तान के बीच बातचीत, शिमला में समझौते दर्ज होते रहे और इतिहास की पुस्तकों के माध्यम से हम उन्हें याद करते रहे।  हिमाचल के ज्यादातर हिस्से कभी नेपाली तो कभी पंजाबी शासकों के प्रभाव में रहे पर शिमला जिस रूप में आज है उसकी नींव रखने का श्रेय अंग्रेजों को ही जाता है। 
Christ Church, Shimla
 चित्र सौजन्य
जब हिंदुस्तान के मैदानों की गर्मी से निज़ात पाने अंग्रेज यहाँ पहुँचे तो शिमला एक छोटा सा गाँव भर था जहाँ  जाखू पर्वत पर एक मंदिर हुआ करता था। शिमला का नाम भी यहाँ पूजी जाने वाली श्यामला देवी के नाम से पड़ा था। लगभग 1820 ई के बाद से अंग्रेज हुक्मरानों का यहाँ गर्मियों में तफ़रीह के लिये आने जाने का सिलसिला शुरु हुआ। आज़ादी के पहले की दो तारीखें  शिमला के आज के अस्तित्व में काफी मायने रखती हैं। पहली तो 1863 की जब लार्ड विलियम बेंटिक ने शिमला को ब्रिटिश राज की ग्रीष्म कालीन राजधानी बना दिया और दूसरी 1906 की जब कालका शिमला रेलवे अपने अस्तित्व में आई। राजधानी बनने से यहाँ की आबादी बढ़ी, सिखों व पारसी समुदाय की अगुआई में नए नए व्यापारिक प्रतिष्ठान बने और रेल कड़ी बनने से लोगों का दिल्ली और चंडीगढ़ के रास्ते शिमला आना सुलभ हो गया।

शिमला शहर शहर का एक दृश्य चित्र सौजन्य
यातायात की सुविधा का कमाल है कि आज शिमला देश के लोकप्रिय पर्वतीय स्थलों में एक है और अब तो हिमाचल के अंदर आने जाने के लिए वायु सेवा शुरु हो गई है जिससे कुल्लू, शिमला, कांगड़ा और चंडीगढ जैसे शहर आपस में जुड़ गए हैं। पर अप्रैल के महीने में मनाली, कुल्लू और मंडी जैसे शहरों से होते हुए जब मैं शिमला पहुँचा था तो वायु सेवा का विकल्प नहीं था। होता भी तो मैं नहीं लेता क्यूँकि जो आनंद गाँव, कस्बों की घुमावदार सड़कों से गुजरते हुए और वहाँ के लोगों से मिलते जुलते अपने गन्तव्य तक पहुँचने में है वो हवाई उड़ान में कहाँ? शिमला पहुँच तो गए थे पर बिना होटल की बुकिंग कराए। बस ने तो हमें बस अड्डे तक छोड़ दिया था क्यूँकि शहर के केंद्र तक गाड़ियों के जाने की मनाही है पर मैं माल रोड के पास ही रहना चाहता था तो सामान के साथ वहाँ पहुँचने की अलग दिक्कत थी। ख़ैर कुलियों की कमी नहीं थी जो सामान के साथ होटल तक दिलवाने के लिए राजी थे। मैंने भी मन ही मन सोच लिया था कि होटल तो देखेंगे इसकी मर्जी से पर पसंद करेंगे अपनी सहूलियत से। माल रोड से करीब पचास मीटर चढ़ाई पर हमने होटल पसंद कर लिया था।

शिमला रिज़ चित्र सौजन्य

होटल की खिड़की से गर्मा गर्म चाय के साथ घाटी के नज़ारों को थोड़ी देर लुत्फ़ उठाने के बाद हम चहलकदमी करते मॉल रोड तक आ गए। दार्जिलिंग, मसूरी और नैनीताल में भी मॉल रोड हैं पर जो भव्यता मॉल रोड व उससे सटे रिज़ में शिमला में दिखी वो अतुलनीय थी। माल रोड के पूर्वी और पश्चिमी सिरों को जोड़ता रिज़ यानी चोटी का बड़ा चौरस समतल इलाका चारों ओर फैली घाटियों का एक साथ दर्शन कराता है। रिज़ पर ही अठारहवीं शताब्दी का बना क्राइस्ट चर्च स्थित है जिसका नाम उत्तर भारत के दूसरे सबसे पुराने चर्च में शुमार होता है। वैसे क्या आपको पता है कि इस रिज़ के नीचे पानी के विशाल टैंक है जिनसे पानी की आपूर्ति सारे शहर में की जाती है।

रिज़ के पूर्वी भाग से मॉल रोड पर चलते चलते आप लक्कड़ बाजार में पहुँचते हैं तो वहीं पश्चिमी सिरे का मिलन बिंदु स्कैंडल प्वाइंट के नाम से मशहूर है। आब आप सोच रहे होंगे कि आख़िर इस जगह का नाम स्कैंडल प्वाइंट क्यूँ पड़ा? कहते हैं पटियाला महाराज यहीं से वॉयसराय की पुत्री को भगा कर ले गए थे। ब्रिटिश सरकार ने उनकी इस हिमाकत के बाद उनके शिमला में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी। महाराज ने इस आदेश के प्रतिकार स्वरूप अपना ठिकाना शिमला की जगह चैल को बना दिया था।
मॉल रोड, शिमला चित्र सौजन्य

Thursday, June 30, 2016

कोबे शहर की वो शाम.. Kobe Harbour Area, Japan

जापान जाने के पहले मुझे पता नहीं था कि मुझे कोबे जाने का भी  मौका मिलेगा। वैसे भी घूमने वालों की फेरहिस्त में सामान्यतः जापान की जो तीन जगहें आती हैं वो हैं टोक्यो, क्योटो व हिरोशिमा। सही मौसम रहा तो लोग टोक्यो और क्योटो के बीच माउंट फूजी  के दर्शन भी कर लेते हैं। हाँ, ये जरूर है कि कुछ लोग समय रहने पर ओसाका को भी अपनी यात्रा योजना में शामिल करते हैं और यदि आप ओसाका आ गए तो कोबे जाना तो बनता ही है क्यूँकि ये वहाँ से मात्र चौंतीस किमी की दूरी पर है।

A room with a view जब आपकी खिड़की ऐसे दृश्य ले कर खुले !

क्योटो से ओसाका होते हुए हमें बस से कोबे आना था। ओसाका शहर  से तो तो हम किनारे किनारे निकल लिए। पर एक बात जो मुझे दिखी वो ये कि जापान के सारे शहर एक जैसे ही लगते हैं। सारे ऊँची ऊँची गगनचुंबी इमारतों के दूर तक फैले हुए जंगल सरीखे। कहीं कोई पुरानी धरोहर  नहीं। अब इसमें जापान का दोष नहीं कि उनके पास इतिहास के नाम पर क्योटो और नारा जैसी जगहें ही  बची हैं। युद्ध व भूकंप की दोहरी मार झेले हुए इस देश में इतिहास के नाम पर BC नहीं बस AD ही चलता है।

कोबे का बंदरगाह  Kobe Harbour
मध्य जापान के होन्शू द्वीप में स्थित कोबे, जापान का छठा सबसे बड़ा नगर है। एक ओर पहाड़ी और दूसरी और समुद्र से घिरा कोबे शहर अपनी तीन खूबियों के लिए जाना जाता रहा है। पहला तो यहाँ का बंदरगाह, जो कभी जापान का सबसे बड़ा व व्यस्ततम बंदरगाह हुआ करता था । अठारहवीं शताब्दी में पश्चिमी देशों से इसी बंदरगाह के माध्यम से यहाँ व्यापार शुरु हुआ। नतीजन  यहाँ कोरिया, चीन, वियतनाम और अमेरिका से भी  लोग आकर बस गए। वक़्त के साथ कोबे शहर ने इन देशों की संस्कृति को अपने में समाहित करता गया ।

कोबे की दूसरी पहचान एक औद्योगिक शहर की है। मशीनरी व स्टील की बड़ी बड़ी कंपनियाँ यहाँ काम करती हैं और तीसरी ये कि कोबे बीफ़ अपने स्वाद के लिए विश्व भर में जाना  जाता है। अब मेरे जैसे शाकाहारियों के लिए तो ये खासियत किसी काम की नहीं थी तो उस ज़ायके से दूर ही रहे।
कोबे में हमारा ठिकाना JICA Kanshai Centre

Sunday, June 19, 2016

अलविदा मेघालय : यूमियम झील और वो अनहोनी ! Umiam Lake, Shillong

मेघालय में बिताए हमारे आख़िरी दिन की शुरुआत तो लैटलम कैनय की भुलभुलैया से हुई थी। पर वहाँ से लौटने के बाद हमारा इरादा वहाँ के बेहद प्रसिद्ध संग्रहालय डॉन वास्को म्यूजियम को देखने का था। ऐसा सुना था कि ये संग्रहालय उत्तर पूर्वी राज्यों की संस्कृति को जानने समझने की मुफ़ीद जगह है। मावलाई स्थित इस संग्रहालय में जाना तो हमें अपने शिलांग प्रवास के पहले ही दिन था पर बंदी की वज़ह से हमारे ड्राइवर ने इस इलाके में आने से इसलिए इनकार कर दिया कि ये इलाका बंदी के समय ख़तरे से खाली नहीं है।

बाहरी द्वार, डॉन बास्को म्यूजियम Front gate of Don Bosco Museum

रविवार के दिन जब हम यहाँ पहुँचे तो खिली धूप और छोटे छोटे घरों से अटा ये इलाका कहीं से ख़ौफ़ पैदा करने वाला नहीं लग रहा था। पर यहाँ आकर सबसे बड़ी निराशा हमें तब हुई जब पता चला कि ये संग्रहालय रविवार को बंद रहता है। सुना था संग्रहालय की सात मंजिली इमारत में उत्तर पूर्व के सारे राज्यों की संस्कृति की झांकी दिखलाई गई है। 

दूर से एक आम भारतीय के लिए उत्तर पूर्व एक लगता है। पर फिर ये भी सुनने में आता है कि नागा व मणिपुरी, बोदो व असमी आपस में ही तलवारें तान लेते हैं। ख़ैर यहाँ आकर एक मौका था इन राज्यों के रहन सहन, पहनावे व खान पान के तौर तरीकों में छोटी बड़ी भिन्नताओं को परखने का पर अफ़सोस वो अवसर हमें मिल ना सका।और तो और संग्रहालय की छत की मशहूर स्काई वॉक पर चहलकदमी करने का मौका भी जाता रहा।


डॉन बास्को म्यूजियम की सात मंजिली इमारत

Friday, June 3, 2016

उत्तर कोरिया में कोई भगवान नहीं है ... There are no Gods in North Korea!

घूमने के लिहाज़ से उत्तर कोरिया कैसी जगह है ? आप ये प्रश्न सुनकर यही कहेंगे कि मज़ाक कर रहे हैं क्या! पर आपसे यात्रा से जुड़ी जिस किताब का आज जिक्र छेड़ना चाह रहा हूँ उसका शीर्षक ही है There are no gods in North Korea. पुस्तक का मुखड़ा देख कर तो यही लगता है कि ये किताब उत्तर कोरिया के बारे में होगी। पर ऐसा है नहीं। पेशे से एक समय वकील व फिर पत्रकार रह चुकी अंजली थॉमस  ने इस किताब में उत्तर कोरिया के साथ मंगोलिया, चीन, यूगांडा, केनिया और तुर्की जैसे देशों के अपने संस्मरणों को भी जगह दी है। 



कम्युनिस्ट उत्तर कोरिया अपने आप में हम सबके लिए अबूझ पहेली रहा है। इसलिए जब लेखिका ने इस पुस्तक को समीक्षा के लिए मेरे पास भेजा तो लगा कि मुझे अब इस देश को एक नए सिरे से जानने का मौका मिलेगा। पर उत्तर कोरिया की सरकार ने ये पहले से ही सुनिश्चित कर रखा है कि वहाँ आने वाला क्या देखे, क्या सुने और क्या खाए। अंजली को ये दुखद सच वहाँ जाकर मालूम हुआ। पर इतनी रोक टोक के बीच वो ये जानने में सफल रहीं कि उत्तर कोरिया में भगवान आसमान की तहों में नहीं पर ज़मीन पर अपनी निरंकुश  सत्ता से राज करते हैं।

हर एक यात्रा लेखक का यात्रा का अपना नज़रिया होता है। अंजली का भी है। वो लोगों से घुलती मिलती हैं। स्थानीय स्वाद का ज़ायका लेना नहीं भूलती  और इन सब के बीच वो अपने मन में चल रही उधेड़बुन के बारे में इतना जरूर बता देती हैं कि आप उनके व्यक्तित्व का खाका खींच सकें।

पर वो अपने गन्तव्य के बारे में हल्की सी भूमिका देकर उसे अपनी आँखों से रूबरू नहीं करातीं।  मसलन आप ये नहीं जान पाते कि पहली बार जब उत्तर कोरिया में सरकारी निगाहों से दूर एक छुक छुक चलती गाड़ी में  वो बैठीं तो उन्हें वो देश अपने वास्तविक रूप में कैसा नज़र आया? केनिया  के घने जंगलों की सरसराहट और उनमें रहने वाले बाशिंदों का खौफ़ आप तक पहुँच नहीं पाता। यूगांडा में नील नदी का मुहाने या फिर उसमें स्थित Murchison Falls या तुर्की के बालों के संग्रहालय तक तक पहुँचने का रोमांच तो होता है पर मंजिल पर पहुँचने के बाद बिना किसी विवरण के वो रोमांच कुछ क्षणों में काफूर हो जाता है।

पर वहीं जब वो हर एक देश के अलग अलग लोगों से मिलती हैं। उन्हें अपना दोस्त बनाती हैं तो उस मेलजोल से बहुत सारी ऐसी बातें निकल कर आती हैं जो वहाँ के लोगों की सोच,रहन सहन और मान्यताओं को दर्शाती हैं और यही इस किताब का सबसे मजबूत पक्ष भी है। जैसे उत्तर कोरिया में हर कोई अमेरिका नहीं बल्कि चीन में जाने के सपने देखता है। चीन में लड़कियाँ ऊपर से कितनी चिकनी सुंदर दिखें पर अपनी आर्मपिट पर रेज़र नहीं चलातीं। यूगांडा में  वहाँ के शाही स्मारक में शुक्रवार को जाना आपको काबका के शाही हरम में दाखिला करा सकता है। तुर्की में एक नए आंगुतक का स्वागत लोग थालियाँ तोड़ कर करते हैं। मंगोलिया विश्व के नज़रिए की परवाह किए बगैर आज भी अपनी पहचान लड़ाके चंगेज़ खाँ में खोजता है।

शाकाहारियों को इस किताब को पढ़कर ये आसानी से समझ आ सकता है कि मंगोलिया, उत्तर कोरिया और चीन जैसी जगहें उनका वज़न घटाने के लिए कितनी माकूल साबित हो सकती हैं। अंजली के अनुभव ये बताते हैं कि अकेले घूमते हुए  हॉस्टल और डारमेट्रियाँ में रहना न केवल आपकी जेब को हल्का नहीं होने देता बल्कि आपकी ज़िन्दगी में नयी पहचानों का भी सबब बनता है। 

बहरहाल अगर आप कॉफी और बियर के शौकीन हों, किसी जगह के इतिहास, भूगोल व प्रकृति से ज्यादा वहाँ के लोगों और खान पान में डूबना आपको  पसंद हो, किसी यात्रा वृत का  लेखक की निजता से जुड़ना आपको असहज नहीं करता और सहज कथ्य शैली आपको रुचती हो तो ये किताब आपको जरूर पसंद आएगी अन्यथा उत्तर कोरिया की तरह ही इसे आप अपनी पुस्तकों की आलमारी से दूर रख सकते हैं।

पुस्तक के बारे में
प्रकाशक : नियोगी बुक्स, पृष्ठ संख्या : 235, मू्ल्य : 350 रुपये

अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

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