Saturday, September 8, 2018

मानसूनी झारखंड : सफ़र हजारीबाग वन्य जीव अभ्यारण्य और तिलैया बाँध का Road Trip to Hazaribagh Wildlife Sanctuary and Tilaiya Dam

झारखंड की इस मानसूनी यात्रा का आख़िरी पड़ाव पारसनाथ तो नियत था पर जैसे जैसे हमारी यात्रा का दिन पास आता गया हमारे बीच के गंतव्य बदलते गए। पहले हमारा इरादा नवादा के ककोलत जलप्रपात तक जाने का था, पर जब हमने वहाँ तक जाने के रास्ते को गौर से देखा तो उसे आबादी बहुल पाया। हमें तो एक ऐसा रास्ता चाहिए था जो हमारी आँखों को मानसूनी हरियाली से तृप्त कर दे। इसलिए ककोलत की बजाए हमने पतरातू से हजारीबाग वन्य प्राणी आश्रयणी की राह पकड़ना उचित समझा।

हजारीबाग वन्य प्राणीआश्रयणी का मुख्य द्वार
हमारा ये निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ क्यूँकि हमें जितनी उम्मीद थी उससे कही शांत और ज्यादा हरी भरी राह हमें देखने को मिली। पतरातू से हम लोग बरकाकाना होते हुए रामगढ़ पहुँचे और वहाँ से आगे वापस राँची पटना राजमार्ग को पकड़ लिया। वैसे रेलवे के स्टेशन की वजह से बड़काकाना से तो कई बार गुजरना हुआ है पर इस बार मुझे पहली बार पता चला कि बड़काकाना की तरह एक छोटकाकाना नाम की भी जगह है। रामगध के बाद मांडू होते हुए ग्यारह बजते बजते हम हजारीबाग पहुँच चुके थे। जिस तरह अच्छे मौसम के लिए राँची का नाम लिया जाता है। वैसा ही मौसम हजारीबाग का भी है। झारखंड का नामी विनोबा भावे विश्वविद्यालय भी यहीं स्थित है।


हजारीबाग वन्य प्राणी आश्रयणी हजारीबाग शहर से करीब 18 किमी दूर स्थित है। राँची पटना राजमार्ग पर हजारीबाग से बरही के रास्ते में इसका एक द्वार सड़क के बाँयी ओर दिखता है। वैसे इस आश्रयणी का एक हिस्सा सड़क के दाहिने भी पड़ता है पर वो अपेक्षाकृत विरल और छोटा है।
साल के घने जंगल
हजारीबाग के इस अभ्यारण्य के दो द्वार हैं। जिस रास्ते से हम इसके अंदर घुसे उसे सालफरनी गेट कहा जाता है। इस द्वार से करीब तीस किमी की दूरी बहिमर गेट आता है। पूरा अभ्यारण्य दो सौ वर्ग किमी से थोड़े कम में फैला हुआ है। छोटानागपुर के पठार पर फैले इस वन में मुख्यतः साल और सखुआ के वृक्ष हैं। एक ज़माने में शायद यहाँ बाघ भी पाए जाते थे। पर अब इसके अंदर जीव जंतुओं की संख्या काफी कम हो गयी है।
रामगढ़ के राजा द्वारा बनाया गया टाइगर ट्रैप
कम नहीं हुई है तो यहाँ की हरियाली। करीब एक किमी अंदर बढ़ने पर रामगढ़ के राजा द्वारा बनवाया गया टाइगर ट्रैप दिखा। बारिश की वजह से ट्रैप की ओर जाने वाले रास्ते में जगह जगह काई जम गयी थी। ट्रैप के रूप में वहाँ एक गहरा कुँआ दिखा जिसमें बाघ के उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। पानी पीने के लिए जब वहाँ बाघ आता होगा तो शायद जाल बिछा के उसे पकड़ लिया जाता हो। पर अब तो यहाँ बाघ बिल्कुल भी नहीं रहे। यदा कदा तेंदुए के होने की संभावना भले ही व्यक्त की जाती हो।
 टाइगर ट्रैप की चौकीदारी करते मिले ये
उन सीढ़ियों पर साँप की केंचुल देखकर हमारे हाथ पाँव फूल गए। वैसे भी हमारे आने से मच्छरों ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी। सो अपने मित्रों के साथ मैं ट्रैप के इलाके से बाहर निकल आया। जंगल में हल्की हल्की बरिश शुरु हो गयी थी। दूर कहीं से बहते पानी की गर्जना सुनाई पड़ रही थी़। गाड़ी में बैठकर हम उसी आवाज़ के पीछे हो लिए।
पानी की दूर से सुनाई देनी वाली कलकलाहट की ओर जब हम बढ़े तो पहले बराकर नदी मिली
ये आवाज़ बराकर नदी की थी जो इस अभ्यारण्य के बीचो बीच बहती है। इस नदी का उद्गम स्थल हजारीबाग ज़िले  में ही है। मुझे नदी के किनारे कुछ पक्षियों के दिखने की उम्मीद थी, पर निराशा ही हाथ लगी।
भतरमुंग नाला
पक्षियों की चहचहाहट तो बीच बीच में सुनाई देती रही पर प्रकट में सतभाई या बैबलर के झुंड और एक शिकरे जैसे पक्षी के आलावा हमें ज्यादा कुछ  नहीं दिखाई पड़ा। राजडेरवा झील में भी एक गहरे नीले रंग के पक्षी ने उड़ान भरी पर जब तक दूरबीन से उस पर अपनी आँखें के्द्रित करता वो जंगलों में गुम हो चुका था। वैसे अगर आश्रयणी के मुख्य द्वार पर लगे बोर्ड की माने  तो यहाँ मोर, ब्राह्मणी मैना, जंगली मैना, भारतीय पीलक यानि Golden Oriole  , Crescent Serpent Eagle, Asian Paradise Flycatcher, Bee Eater, Hoopoe के साथ साथ किग फिशर की भी कई प्रजातियाँ मौजूद हैं।
जंगल के बीचो बीच जाता रास्ता जो राजडेरवा फारेस्ट रेस्ट हाउस तक जाता है।

धमधमा माँद के पास
राजडेरवा झील
वैसे भी पक्षियों को देखने के लिए सुबह और शाम का समय उपयुक्त रहता है जबकि हम भरी दुपहरी में यहाँ विचर रहे थे। राजडेरवा झील के किनारे लगे घने हरे जंगल भील के मटमैले पानी के साथ एक ऐसी विषमता बना रहे थे जो आँखों को लुभा रही थी। झील के पास ही एक छोटा सा भोजनालय भी है जहाँ हल्के फुल्के जलपान की व्यवस्था थी। यहीं एक वन विश्राम गृह और पक्षियों को देखने के लिए Watch Tower भी है। 
वन विश्राम गृह के आसपास का नज़ारा

झील के पास पहुँचते ही हल्की बूँदा बाँदी शुरु हो गयी
सप्ताहंत व्यतीत करने के लिए ये एक आदर्श जगह है। आप यहाँ से सुबह सुबह पास ही बने नेचर ट्रेल पर जा सकते हैं। जंगल की चौहद्दी नापनी हो तो इसके दूसरे सिरे बहिमर गेट तक निकल सकते हैं। उस रास्ते में भी एक और Watch Tower है। दो ढाई घंटे जंगल के बीच बिताने के बाद हमने बरही की राह पकड़ी।
हजारीबाग से बरही की ओर
बरही पहुँचने के पहले ही मूसलाधार बारिश शुरु हो गयी। एक समय लगने लगा कि क्या तिलैया में इस बारिश में हम बाहर भी निकल पाएँगे? पर मानसून में निकलने पर राह में बारिश ना मिले तो सफ़र का मजा ही क्या? गाड़ी की गति धीमी रखते हुए कुछ देर में हम बरही पहुँचे। बरही से तिलैया बाँध मात्र बीस किमी की दूरी पर है। बारिश अब भी तड़तड़ाकर बरस रही थी। ऐसा में बाहर निकलकर भोजन करना भी दुष्कर प्रतीत हो रहा था। यही वजह थी कि हम चलते ही रहे। बरही से सात आठ किमी बाद से ही बराकर नदी पर बने बाँध का जलाशय दिखना शुरु हो जाता है। एक ओर पर्वत और दूसरी ओर बराकर की अथाह जलराशि। दिल होता है कि सड़क मार्ग का ये हिस्सा पैदल ही चलकर पार किया जाए।
लीजिए आ गयी वो जिसका हमें इंतजार था।

तिलैया के पास बना रेलवे ब्रिज
तिलैया बाँध से पहले एक सड़क पुल से इस जलाशय को पार करना पड़ता है। साथ ही में एक रेलवे पुल भी है। यहाँ आते आते बरखा रानी छू मंतर हो गयी थीं। वैसे आकाश में काले बादल जरूर उमड़ घुमड़ रहे थे। मन हुआ कि थोड़ा बाहर निकल कर इन घटाओं को निहारा जाए। पुल के दूसरी तरफ जलाशय का दूसरा छोर आ जाता है। इसकी विपरीत दिशा में जो हरे भरे पहाड़ दिखते हैं उन्हीं के किनारे किनारे चलते हुए ही हम यहाँ तक पहूँचे थे।
तिलैया जलाशय का एक हिस्सा
पर्वत जहाँ खत्म होते दिख रहे हैं वहीं वन विभाग का एक विश्राम गृह है। इस विश्राम गृह की बालकोनी से आप जलाशय और उससे सटी हरी भरी पहाड़ियों के नयनाभिराम दृश्य का आनंद ले सकते हैं। विश्राम गृह के सामने सड़क पर एक स्टाल है जिसकी चाय इस रास्ते से सफ़र करने वालों में बेहद मशहूर है। तिलैया से पारसनाथ की ओर निकलते वक़्त हम वहाँ रुके।
तिलैया के पहले वन विभाग का विश्राम गृह

तिलैया बाँध की ओर जाती सड़क भी बेहद खूबसूरत है। इधर बारिश हुई ही नहीं थी। ये सड़क अविभाजित बिहार के मशहूर विद्यालत सैनिक स्कूल तिलैया से हो कर जाती है। अविभाजित इसलिए क्यूँकि बिहार के विभाजन के बाद अब झारखंड में स्थित नेतरहाट और सैनिक स्कूल तिलैया की चमक में कमी आई है। इसकी एक वज़ह CBSE के बजाए इन स्कूलों का राज्य के बोर्ड से जुड़ा होना भी है। रास्ते में तिलैया और अन्य स्कूलों में नामांकन के लिए ढेर सारे कोचिंग इंस्टिट्यूट दिखे जो कि इस बात को दर्शा रहे थे कि इस इलाके के लोगों में अभी भी यहाँ बच्चों को पढ़ाने की ललक है।
सैनिक स्कूल तिलैया होते हुए बाँध की ओर जाता रास्ता

बाँध के पास तिलैया जलाशय में दिखता एक टापू
तिलैया बाँध के ऊपर दामोदर वैली कार्पोरेशन का अतिथि गृह है। ऊँचाई पर होने के बावजूद भी वन विभाग के विश्राम स्थल की तरह  बीच के जंगल की वज़ह से सीधे सीधे जलाशय नहीं दिख पाता। वैसे यहाँ आकर आप नौका विहार का आनंद उठा सकते हैं।
तिलैया में नौकायन


नौका विहार की बजाए हमने जलाशय के किनारे पेड़ के घने झुरमुटों के बीच विश्राम करना उचित समझा। थोड़ी देर बाद हम अपने मुख्य गन्तव्य पारसनाथ की ओर बढ़ चले थे। झारखंड की मानसूनी यात्रा की अगली कड़ी में आपके साथ बाटूँगा पारसनाथ से मधुवन तक की गयी अपनी ट्रेकिंग का किस्सा।

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Tuesday, September 4, 2018

मानसूनी झारखंड : देखिए खूबसूरती पतरातू घाटी की In pictures : Patratu Valley

राँची को बाहर से आने वाले अक्सर झरनों के शहर के रूप में ही जानते रहे हैं। हुँडरू, दसम, जोन्हा, सीता और हिरणी के जलप्रपात राँची से अलग अलग दिशा में बिखरे हैं जहाँ महज एक से दो घंटे के बीच पहुँचा जा सकता है। एक ज़माना था जब राँची में दोपहर के बाद लगभग हर दिन बारिश हो जाया करती थी और तब इन झरनों में सालों भर यथेष्ट बहाव रहा करता था। आज की तारीख़ में बारिश के मौसम और उसके तीन चार महीनों बाद तक ही इन झरनों की रौनक बनी रहती है।

पतरातू घाटी
यही वजह है कि आजकल झरनों से ज्यादा लोग पतरातू घाटी की हरी भरी वादियों में विचरना  पसंद करते हैं। राँची से पतरातू घाटी की दूरी मात्र पैंतीस किमी है और यहाँ जाने का रास्ता भी बेहद शानदार है। आप तो जानते ही हैं कि हर साल मैं अपने मित्रों के साथ मानसून के मौसम में झारखंड के अंदरुनी इलाकों में सफ़र के लिए एक बार जरूर निकलता हूँ। पिछली बार हमारा गुमला, नेतरहाट और लोध जलप्रपात का सफ़र बेहद खुशगवार बीता था। 

इस बार मानसून का आनंद लेने के लिए हम लोगों ने पारसनाथ की पहाड़ियों को चुना। अगस्त के आख़िरी सप्ताहांत में शनिवार की सुबह जब हम घर से निकले तो हमारा इरादा राँची हजारीबाग रोड से पहले हजारीबाग पहुँचने का था पर घर से दो तीन किमी आगे निकलने के साथ योजना ये बनी कि क्यूँ ना इस खूबसूरत सुबह को पतरातू की हरी भरी वादियों में गुजारा जाए।

राँची से पतरातू जाने वाला रास्ता यहाँ के मानसिक रोगियों के अस्पताल, रिनपास, काँके की बगल से गुजरता है।
पर इससे पहले की आप पतरातू की इस रमणीक घाटी के दृश्यों को देखें ये बता दूँ कि इस घाटी पर जब ये सड़क नहीं बनी थी तो लोग रामगढ़ हो कर पतरातू आते जाते थे। अस्सी के दशक में रूस की मदद से यहाँ एक ताप विद्युत संयंत्र लगाया गया था। इस संयंत्र और रामगढ़ शहर को पानी पहुँचाने के लिए यहाँ एक डैम का भी निर्माण हुआ था जहाँ पहले मैं आपको ले जा चुका हूँ। आज यहाँ जिंदल की भी एक स्टील मिल है।

रास्ते में उपलों के ढेर

यहीं से शुरु होती हैं पतरातू की पिठौरिया घाटी

मानसून के मौसम में यहाँ की हरी भरी वादियों के बीच खाली खाली सड़क के बीच से गुजरने का लुत्फ़ ही और है।

 पतरातू घाटी को चीरती आड़ी तिरछी सर्पीली सड़कें 

ये है पतरातू घाटी का सबसे चर्चित दृश्य। सड़कों के इन जाल के बीच ये हरे भरे पेड़ एक गुलदस्ते की तरह दिखते हैं।

घाटी के हर मोड़ पर छोटे छोटे बगीचे बनाए गए हैं जो घाटी की सुंदरता को और निखारते हैं।

पतरातू घाटी से उतरते ही सामने आ जाता है यहाँ का डैम जहाँ अब एक रिसार्ट भी बन रहा है।

ये हैं झारखंड के मानसूनी रंग...

पतरातू से आगे का रास्ता बड़काकाना और रामगढ़ होते हुए जाता है।

रामगढ़ के आगे का एक रेलवे ब्रिज देखिए मानसून में कितना हरिया गया है।

सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं
पतरातू घाटी में नव वर्ष और गर्मियों को छोड़ साल के किसी भी महीने में जाया जा सकता है पर मानसून में इसकी फ़िज़ा निराली होती है। इस इलाके को बतौर फिल्म सिटी और डैम को पर्यटक केंद्र के रूप में विकसित करने की योजनाएँ हैं पर अभी ये इलाका भीड़ भाड़ से परे नैसर्गिक सुंदरता से भरा हुआ है। झारखंड की इस यात्रा में हमारा अगला पड़ाव था हजारीबाग वन्य जीव अभ्यारण्य। एक और फोटो फीचर के साथ शीघ्र ही लौटूँगा झारखंड की इस मानसूनी यात्रा में..

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Thursday, August 23, 2018

भारत के आधुनिकतम संग्रहालयों में से एक : पटना का बिहार संग्रहालय Bihar Museum, Patna

बिहार के साथ आधुनिक शब्द का इस्तेमाल थोड़ा अजीब लगा होगा आपको। भारत के पूर्वी राज्यों बिहार, झारखंड और ओड़ीसा का नाम अक्सर यहाँ के आर्थिक पिछड़ेपन के लिए लिया जाता रहा है पर बिहार के पटना  स्थित इस नव निर्मित संग्रहालय को आप देखेंगे तो निष्पक्ष भाव से ये कहना नहीं भूलेंगे कि ना केवल ये बिहार की ऐतिहासिक एवम सांस्कृतिक धरोहर को सँजोने वाला अनुपम संग्रह केंद्र है बल्कि इसकी रूपरेखा इसे वैश्विक स्तर के संग्रहालय कहलाने का हक़ दिलाती है।

बिहार के गौरवशाली ऍतिहासिक अतीत से तो मेरा नाता स्कूल के दिनों से ही जुड़ गया था जो बाद में नालंदा, राजगीर, वैशाली और पावापुरी जैसी जगहों पर जाने के बाद प्रगाढ़ हुआ पर पिछले महीने की अपनी पटना यात्रा मैं मैं जब इस संग्रहालय में गया तो बिहार की कुछ अनजानी सांस्कृतिक विरासत से भी रूबरू होने का मौका मिला।  

संग्रहालय परिसर में लगा सुबोध गुप्ता का शिल्प "यंत्र"
पाँच सौ करोड़ की लागत से पटना के बेली रोड पर बने इस संग्रहालय की नींव अक्टूबर 2013 में रखी गयी और चार साल में एक जापानी कंपनी की देख रेख में इसका निर्माण हुआ। दरअसल इस विश्व स्तरीय संग्रहालय का निर्माण बिहार के वर्तमान मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह का सपना था। अंजनी जी ख़ुद एक संग्रहकर्ता हैं और आप जब संग्रहालय के विभिन्न कक्षों से गुजरते हैं तो लगता है कि किसी ने दिल लगाकर ही इस जगह को बनवाया होगा।

संग्रहालय का मानचित्र

संग्रहालय में प्रवेश के साथ ओरियेंटेशन गैलरी मिलती है जो संक्षेप में ये परिभाषित करती है कि संग्रहालय के विभिन्न हिस्सों में क्या है? साथ ही ये भी समझाने की कोशिश की गयी है कि एक इतिहासकार के पास इतिहास को जानने के लिए क्या क्या मानक प्रक्रियाएँ उपलब्ध हैं? अगर आपके पास समय हो तो यहाँ पर आप एक फिल्म के ज़रिए बिहार में हो रहे ऐतिहासिक अनुसंधान के बारे में भी जान सकते हैं। 

बिहार बौद्ध और जैन धर्म का उद्गम और इनके धर्मगुरुओं की कर्मभूमि रही है। इसलिए आप यहाँ अलग अलग जगहों पर खुदाई में निकली भगवान बुद्ध ,महावीर और तारा की मूर्तियों को देख पाएँगे। इनमें कुछ की कलात्मकता देखते ही बनती है। आडियो गाइड की सुविधा के साथ साथ यहाँ काफी जानकारी आलेखों में भी प्रदर्शित की गयी है।

संग्रहालय इतिहास की तारीखों के आधार पर तीन अलग अलग दीर्घाओं में बाँटा गया है।
ऐतिहासिक वस्तुओं को प्रदर्शित करते यूँ तो देश में कई नामी संग्रहालय हैं, फिर बिहार संग्रहालय में अलग क्या है? अलग है शिल्पों को दिखाने का तरीका। प्रकाश की अद्भुत व्यवस्था जो कलाकृतियों के रूप लावण्य को उभार देती हैं और इस बात की समझ की एक शिल्प भी अपने चारों ओर एक खाली स्थान चाहता है ताकि जो उसपे नज़रे गड़ाए उसकी कलात्मकता  में बिना ध्यान भटके डूब सके ।
बिहार तो बुद्ध की भूमि रही है। ये संग्रहालय उनकी कई ऐतिहासिक मूर्तियों को सँजोए हुए है।

जिस तरह लूवर म्यूजियम की प्रसिद्धि का एक बड़ा कारण वहाँ मोनालिसा का होना है वहीं बिहार संग्रहालय विश्वविख्यात शिल्प दीदारगंज यक्षी को अपने यहाँ ले आया है। अमेरिका तक में प्रदर्शित हुआ ये यक्षी पहले पुराने पटना संग्रहालय की अमानत था। 

दीदारगंज यक्षी को सम्राट अशोक के शासनकाल में बनाया गया था। बादामी रंग के बलुआ पत्थर पर चमकदार पालिश मौर्यकालीन कला का अद्भुत नमूना है। इस प्रतिमा के मिलने का प्रसंग भी काफी रोचक है। 1917 में ये प्रतिमा पटना के निकट दीदारगंज के गंगा तट पर पाई गयी। पलटी हुई प्रतिमा को एक उभरी शिला समझ कर वहाँ के धोबी इसे कपड़े धोने के लिए काम में लाते थे। पत्थर के नीचे एक साँप के घुसने के क्रम में जब शिला खिसकाई गयी तो  गुलाम रसूल नामक व्यक्ति को ये प्रतिमा अपने पूर्ण रूप में दिखाई दी। यक्षी की ये प्रतिमा कई विदेशी महोत्सवों में भारतीय कला का प्रतिधिनित्व कर चुकी है।

बाएँ से दाएँ : तारा, दीदारगंज यक्षी और तोते के साथ खेलती युवती

संग्रहालय में झारखंड से मिली मूर्तियों को भी प्रदर्शित किया गया है।
मौर्यों ने कला और वास्तुकला में पत्थर का व्यापक इस्तेमाल किया। मौर्य काल में अशोक के शासनकाल में विशाल स्तंभ खड़े किए गए और चट्टानों को काटकर गुफा का निर्माण किया गया। नए नए बुद्ध स्तूप निर्मित किए गए। इस समय  टेराकोटा से बनाई गयी मूर्तियों (जिन्हें मृणमूर्तियाँ भी कहा जाता है) में उकेरी भाव भंगिमाएँ देख मन आश्चर्यचकित रह जाता है।
मौर्यकालीन मृणमूर्तियाँ


काले पत्थर से बना दानव मुँगेर बारहवीं शताब्दी
ऐतिहासिक दीर्घाओं के आलावा इस संग्रहालय में एक विशेष दीर्घा आंचलिक कलाओं के प्रदर्शन के लिए लगाई गयी है। साथ ही आज कला क्षेत्र में चित्रकला और स्थापत्य में क्या नए प्रयोग हो रहे हैं उसको भी पर्याप्त जगह दी गयी है।
सिक्की घास से बने हस्तनिर्मित खिलौने मधुबनी
घर के बर्तनों और रोजमर्रा के सामानों को अपने शिल्प में जगह देने वाले पटना के प्रख्यात शिल्पी सुबोध गुप्ता ने इस संग्रहालय को भेंट स्वरूप कलाकृति दी है जिसे संग्रहालय के बीच के खुले अहाते में लगाया गया है। इससे पहले पटना के राजधानी पार्क में सुबोध का शिल्प कैक्टस वहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण बन गया था । बिहार ही के एक अन्य कलाकार संजय कुमार का शिल्म प्रथम तल पर जाने वाली सीढ़ियों के पास प्रदर्शित है।
पहले तल की दीर्घाओं में जाने के रास्ते में प्रदर्शित ताम्र शिल्प

ब्रिटिश काल के पन्नों को खोलते पुराने चित्र
चित्रकला दीर्घा में जतिन दास, हिम्मत शाह, अर्पिता कौर, सतीश गुजराल, नलिनी मलानी की कृतियाँ प्रदर्शित हैं।
संग्रहालय में आज के चित्रकारों की कला को प्रदर्शित करती एक चित्र दीर्घा भी है।

रात और दिन : चित्रकार अर्पिता कौर की एक रचना
राज्य के एक और कलाकार रजत कुमार घोष ने टेराकोटा कला के माध्यम से यहाँ मिथिला में भाई बहनों द्वारा मनाए जाने वाले पर्व सामा चकेबा की कहानी को कहना चाहा है। पुराण में कही गयी कथा के अनुसार कृष्ण ने अपनी बेटी सामा को झूठी शिकायत के आधार पर शापित कर उसे चिड़िया बना दिया था । सामा के भाई चकेबा ने बहन की ये दशा देख कर शिव की तपस्या की। शिव इस तपस्या से प्रसन्न हुए। चकेबा और सामा की सहेलियों को साथ लेकर उसके चरित्र को लेकर की गयी गलत शिकायत से उन्होंने कृष्ण को आगाह किया। आख़िरकार कृष्णा को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने अपना शाप वापस लिया। इस प्रकार चकेबा के प्रयत्नों से सामा अपने वास्तविक रूप में लौट आई। 

रजत ने काले रंग की काया से कृष्ण का निरूपण किया है। साथ में चिड़िया का रूप लिए सामा भी है। दूसरे शिल्प में भगवान कृष्ण को समझाती बुझाती स्त्रियों के साथ शिव को दर्शाया गया है। रजत का ये शिल्प विस्मृत होते जा रहे हमारे लोक पर्वों पर हमारा ध्यान आकृष्ट करता  है।

मिथिलांचल के पर्व सामा चकेबा को निरूपित करता टेराकोटा शिल्प
भाई बहन के प्रेम को दर्शाते इस पर्व को इस शिल्प से जोड़ा है शिल्पकार रजत कुमार घोष ने
क्षेत्रीय कला दीर्घा में काष्ठ कला का एक नमूना
आंचलिक कलाओं को प्रदर्शित करती दीर्घा इस संग्रहालय की सबसे अनूठी दीर्घा है। समाज के हाशिये पर बैठे वर्ग ने किस तरह अपनी कला के दम पर अपने हुनर का परचम देश विदेश में लहराया है, ये दीर्घा इसकी जीती जागती मिसाल है। मल्लाह वर्ग से आने वाली दुलारी देवी ने आज मधुबनी पेटिंग में अपनी कला के माध्यम से खासा नाम कमाया है। संग्रहालय में उन्होंने अपने इलाके में होने वाली कमला पूजा को मधुबनी शैली की चित्रकला से उभारा है। शिवन पासवान हरिजनों मे पूजे जाने वाले राजा सल्हेश की कथा को कपड़ों और सनमाइका पर चित्रकारी के ज़रिए उभार रहे हैं ।

ये वो आवाज़ें हैं जिनके पास कला की पहुँच सीधे सीधे नहीं थी। अपने एक साक्षात्कार में शिवन बताते हैं कि उन्होंने चोरी छुपे ब्राह्मण परिवारों द्वारा की जाने वाली चित्रकला के गुर सीखे। कुछ नया करने की सोच रखते हुए उन्होंने अपने समाज के नायक राजा सल्हेश को अपनी कला का विषय बनाया। उन्होंने अपनी चित्रकला में  गोदना शैली का प्रयोग किया है।

राजा सल्हेश की कथा को दर्शाती शिवन पासवान की कृति
उलुपी कुमारी  की कलाकृति भी सामा चनेबा की तरह मिथिला की एक दूसरी लोककथा को अपनी चित्रकला में प्रदर्शित करती है। ये कथा है बिहुला विषहरी की। सती बिहुला ने सर्पदंश से मृत अपने पति लखन्दर को कैसे पुनर्जीवित कराया यह कथा इसी घटना पर आधरित है। 

कपड़े पर बिहुला विषहरी की कथा का चित्रांकन किया है कलाकार उलुपी कुमारी
 ने
संग्रहालय की एक दीर्घा उन प्रवासी बिहारियों को समर्पित है जो मजदूरी के लिए सुरीनाम, दक्षिण अफ्रीका से लेकर मारिशस तक ले जाए गए। इन्हें गिरमिटिया के नाम से जाना जाता रहा क्यूँकि ये जाते वक़्त अंग्रेजों से एक करार करते थे़ जिसे गिरमिट कहा जाता था। पाँच साल की सामाजिक गुलामी का ये करार उन्हें उसके बाद भारत आने की सुविधा प्रदान करता था। देश की सीमाओं से दूर बसे इन धरतीपुत्रों के प्रति अपना  सम्मान प्रकट करने का काम ये दीर्घा बखूबी करती है। इसके आलावा यहाँ एक दीर्घा अस्थायी तौर पर चलती है जिसका विषय बदलता रहता है। मैं जब वहाँ गया  था तो उस दीर्घा में देश भर में जारी किए गए ऐतिहासिक सिक्कों की प्रदर्शनी चल रही थी। 

संग्रहालय में एक बड़े खुले आडिटोरियम, रेस्त्रां और बिहार के साथ हस्तशिल्प का विक्रय करने वाले केंद्र भी हैं। कुल मिलाकर लोगों में बिहार के इतिहास के प्रति रूचि बढ़ाने में ये संग्रहालय सफल साबित हो रहा है। युवाओं और बच्चों की उमड़ती भीड़ इसके लोकप्रिय होने का सबूत है।

बिहार के हस्तशिल्प को बाजार तक पहुँचाने का सेतु बन रहा है ये संग्रहालय

संग्रहालय का एक हिस्सा बच्चों की रुचियों को ध्यान में रख कर बनाया है। तो मैं भी बन लिया थोड़ी देर के लिए बालक। आख़िर दिल तो बच्चा है जी।

संग्रहालय से जुड़ी कुछ और आवश्यक जानकारी

  • साप्ताहिक अवकाश - सोमवार
  • खुलने का समय - प्रातः 10.30 बजे से अपराह्न 4.30 तक
  • टिकट दर - व्यस्क  सौ रुपये प्रति व्यक्ति  और बच्चे पचास रुपये प्रति व्यक्ति 
  • विकलांगों के लिए व्यवस्था -  उपलब्ध
  • आडियो गाइड की सुविधा - उपलब्ध

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