Thursday, September 29, 2016

मानसूनी हरियाली में नहाया हुआ झारखंड : ये वादियाँ, ये फ़िज़ायें बुला रही हैं तुम्हें ! Lush Green Jharkhand !

मुझे बचपन से ही रेल में सफ़र करना पसंद रहा है। मज़ाल है कि रेल के सफ़र में मुझसे कोई खिड़की की जगह छीन ले। आजकल तो रेलवे की समय सारणी में मुख्यतः बड़े स्टेशन का जिक्र रहता है पर उस वक़्त महीन छपाई में बीच वाले छोटे छोटे उन सभी स्थानों का उल्लेख रहता था। हर यात्रा के पहले मैं उस टाइम टेबल का उसी तरह परायण करता जैसे कि परीक्षा के पहले लोग किताबों को बाँचते हुए करते हैं। 

रेल के निकलते धुएँ के साथ पटरी पर दौड़ती ट्रेन, सामने से निकलते हरे भरे खेत, छोटे बड़े घर, काम करते लोग इन सबको अपलक निहारते हुए अगले स्टेशन या आने वाली नदी की प्रतीक्षा करना मेरी आदत में शुमार हो गया था। डिब्बे में कहीं भी कोई पूछता कि अगला स्टेशन कौन सा होगा तो छूटते ही मेरा जवाब तैयार होता और मुझे ये करते बेहद संतोष का अनुभव होता।

ये नज़ारा है राँची से बस बीस किमी की दूरी पर स्थित कस्बे टाटीसिलवे के बाहर का (Near Tatisilwai)

ट्रेन के वातानुकूल डिब्बों में सफ़र करते हुए  ना तो स्लीपर की वो खिड़की रही जिसकी छड़ों के बीच चेहरे को घुसाकर पटरियों के साथ कदम ताल मिला सकूँ और ना ही यात्रियों के  अनिर्दिष्ट सवालों को जवाब देने की बाल सुलभ तत्परता। पर रेल की खिड़कियों का मोह उसी तरह आज भी बरक़रार है। कार्यालय के कामों से जाऊँ या परिवार के साथ खिड़की पर कब्जा आज भी मेरा ही होता है।

मेरा मानना है किसी स्थान के लिए किए गए सफ़र जितनी ही महत्त्वपूर्ण वो डगर होती है जिससे आप अपनी मंजिल तक पहुँचते हैं। ऐसी ही एक डगर को आँखों से नापने का मौका मुझे विश्व पर्यटन दिवस पर मिला। ये सफ़र था राँची से आसनसोल तक का। झारखंड एक ऐसा प्रदेश है जहाँ मानसून और उसके बाद की हरियाली देखते ही बनती है। एक बार आप शहर की चौहद्दी से निकले तो फिर दूर दूर तक जिधर भी आपकी नज़रें जाएँगी हरी भरी पहाड़ियाँ और उनकी तलहटी में फैले धान के खेत आपका मन मोह लेंगे।  इन दिनों यही रंग रूप है झारखंड से सटे बंगाल और ओड़ीसा का भी। ईंट पत्थरों की दुनिया से बाहर निकलते ही जब ऐसे दृश्य दिखते हैं तो आँखें तृप्त हो जाती हैं। तो चलें ऐसी ही एक यात्रा पर जो ट्रेन की खिड़कियों से गुजरती हुई आप तक पहुँची है..

हरी हरी वसुंधरा पे नीला नीला ये गगन, के जिस पे बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन
सारे रास्ते धान के खेतों के साथ धूप की आँख मिंचौनी चलती रही। ज्यूँ ही बदरा छाते हैं धान की बालियाँ गहरी हरी हो जाती हैं और धूप के आते ही धानी रंग में रँग जाती हैं।
नीलगगन में उड़ते बादल आ आ आ, धूप में जलता खेत हमारा कर दे तू छाया
 

बताइए कितना अच्छा लगेगा ना कि इस धान के खेत के मध्य में खड़े उस पेर के नीचे एक पूरा दिन बिता दिया जाए..



 झारखंड बंगाल की सीमा पर झालिदा की पहाड़ियाँ


बलखाती बेलें, मस्ती में खेले, पेड़ों से मिलके गले नीले गगन के तले.. ..धरती का प्यार पले
दामोदर नदी, चंद्रपुरा के नजदीक  Near Chandrapura, Bokaro
कभी बंगाल का शोक कहीं जाने वाली दामोदर अब जगह जगह थाम ली गई है। सारा साल अपनी चट्टानी पाटों के बीच सिकुड़ती हुई बहती है। हाँ जब बारिश आती है तो इसका मन भी मचल मचल उठता है उमड़ने को।

जमुनिया नदी, चंद्रपुरा और जमुनिया टाँड़ के बीच

कहीं धूप कहीं छाँव आज पिया मोरे गाँव

किता घाटी : सोचिए गर ये तार ना होते.. Kita Valley near Silli

गंगाघाट से सटे जंगल  Forest near Gangaghat, Ranchi

इन  रेशमी राहों में इक राह तो वो होगी तुम तक जो पहुँचती है इस मोड़ से जाती है 
अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

Sunday, September 18, 2016

वाट फो : क्या अनूठा है थाई मंदिर स्थापत्य शैली में ? Wat Pho, Temple of reclining Buddha, Bangkok

बैंकाक मंदिरों का शहर है। यहाँ तकरीबन चार सौ छोटे बड़े मंदिर हैं जिन्हें यहाँ वाट भी कहा जाता है। अब सारे मंदिरों को तो आप देख भी नहीं सकते और देखना भी नहीं चाहेंगे। पर देखें तो किसे देखें?  खासकर ऐसी जगह में जहाँ एक ओर तो मशहूर फुटबाल खिलाड़ी डेविड बेकहम  के नाम पर भी मंदिर है तो दूसरी ओर ऐसे मंदिर भी जो विशाल पीपल के पेड़ में समाए हैं । वैसे अगर लोकप्रियता के हिसाब से देखें तो बैंकाक के शाही महल में स्थित वाट फ्रा काएव, शाही महल के बाहर पर उसके बिल्कुल निकट का प्राचीन मंदिर वाट फो और नदी के पार स्थित बैंकाक की पहचान के रूप में जाना जाने वाला वाट अरुण अग्रणी स्थान रखते हैं। 


वाट फ्रा काएव में चूँकि प्रवेश शुल्क करीब 1000 रुपये है इसलिए बहुत सारे यात्रा संचालक इसे अपने कार्यक्रम के बाहर रखते हैं। पर फुकेट और बाद में बैंकाक के मंदिरों को देखने के बाद ये तो समझ आ गया कि स्थापत्य की दृष्टि से इन मंदिरों के मूल तत्त्व क्या होते हैं? आज जब मैं आपको वाट फो यानि सहारे के साथ लेटे हुए बुद्ध के मंदिर (Temple of reclining Buddha) में ले चलूँगा तो थाई मंदिरों की ये विशिष्ट स्थापत्य शैली आपके सामने होगी।

Decorated roof and Chedi of Wat Pho  वाट फो की सजी धजी छतें व स्तूप
भारतीय बौद्ध मंदिरों में स्तूप की बनावट तो आपने देखी ही होगी। धौली, लेह व साँची के स्तूप आदि एक गुंबद की शक्ल में उभरते हैं  जबकि इनका आधार वृताकार है। थाईलैंड में स्तूपों का आकार शंकुनुमा  होता है। यहाँ के स्तूप आधार में चौड़े और ऊपर जाते हुए पतले होकर एक लकीर की शक़्ल इख़्तियार कर लेते हैं। दूर से ऐसा लगता है मानो आसमान से लटकती बड़ी बड़ी घंटियाँ सतह पर रख दी गई हों। स्थानीय भाषा में इन्हें 'चेदी' कहा जाता है। वाट फो की विशालता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की यहाँ 91 छोटे और 4 बड़े स्तूप हैं।

Chedis of Wat Pho वाट फो की मशहूर चेदी

Thursday, September 8, 2016

चलिए बैंकाक की स्काईट्रेन से चाटुचाक बाजार तक A skytrain journey to Chatuchak Weekend Market, Bangkok

अगर मैं आपसे पूछूँ  कि बैंकाक पर्यटकों में इतना लोकप्रिय क्यूँ है तो आप क्या कहेंगे? इतना तो पक्का है कि आपके  जवाब एक जैसे नहीं होंगे। मौज मस्ती के लिए यहाँ आने वाले पटाया के समुद्र तट और यहाँ के मसाज पार्लर का नाम जरूर लेंगे। वहीं इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले यहाँ की बौद्ध विरासत को प्राचीन और नवीन बौद्ध मंदिरों में ढूँढेंगे। पर कुछ लोग तो ये भी कहेंगे कि बैंकाक गए और शापिंग वापिंग नहीं की तो क्या किया? घुमक्कड़ के रूप में आपकी कैसी भी प्रकृति हो पर इस बात से शायद ही आपको इंकार हो कि खरीददारी के लिए बैंकाक में आपके पास विकल्प ही विकल्प हैं। 

अपनी यात्राओं में मैं सबसे कम समय मैं वहाँ के बाजारों में बिताना चाहता हूँ। वो भी  तब, जब करने को और कुछ नहीं हो।  बैंकाक में वैसे तो कितने सारे सुपर स्टोर हैं। सबकी अपनी अपनी खासियत है।अब हमारे मन में बाजार से कुछ लेने के लिए बनी बनाई सूची तो थी नहीं तो सोचा कि क्यूँ ना ऐसे बाजार में समय व्यतीत करें  जो स्थानीय संस्कृति के करीब हो। इसलिए बैंकाक प्रवास के आख़िरी दिन का एक बड़ा हिस्सा हमने यहाँ सप्ताहांत में लगने वाले बाजार चाटुचाक में बिताया।

BTS Skystation पर रंग बिरंगी ट्रेन

सुखमवित इलाके में होने की वज़ह से फायदा ये था कि हम बैंकाक के Mass Transit System यानि BTS के स्काईट्रेन स्टेशन के बिल्कुल करीब थे। बैंकाक की इस BTS सेवा में दो मुख्य रेल मार्ग हैं। एक मार्ग  बैंकाक के पूर्वी स्टेशन बीरिंग से चलती हुई उत्तर में मोचित तक जाता  है तो दूसरा  नेशनल स्टेडियम से चलकर बांग वा की तरफ। नेशनल स्टेडियम के पास का इलाका स्याम के नाम से जाना जाता है औेर इसके पास कॉफी शापिंग मॉल्स हैं।

बैंकाक में दिल्ली मेट्रो की तरह रोड के ऊपर ऊपर ट्रेन चलाने की क़वायद नब्बे के दशक में शुरु की गई थी। थाई अधिकारियों को अपनी इस परियोजना के लिए कनाडा के वैनकूवर शहर की मेट्रो ने बहुत प्रभावित किया था। वैनकूवर में ये ज़मीन के ऊपर चलने वाली मेट्रो स्काई ट्रेन के नाम से जानी जाती थी। जब आख़िरकार 1999 दिसंबर में ये ट्रेन चली तो BTS के साथ थाई निवासियों ने वैनकूवर की अपनी प्रेरणास्रोत स्काईट्रेन का नाम अपना लिया। बैंकाक में वैसे ज़मीन के अंदर चलने वाली मेट्रो (MRT) अलग से है जो कुछ जगहों पर स्काइट्रेन के रास्ते से मिल जाती है।
रेल मानचित्र BTS Map, Bangkok
अपने होटल से पास के स्टेशन तक पहुँचने में हमें कुछ खास परेशानी नहीं हुई। पर टिकट के लिए मशीन में जितने छुट्टे की जरूरत थी वो हमारे पास नहीं थे। थाई भाषा में टिकट का दाम लिखने से अलग ही परेशानी आ रही थी। किसी तरह वहाँ के कार्यालय से छुट्टे लिए गए। स्टेशन बिल्कुल साफ था और ट्रेनें खूब रंग बिरंगी। मतलब जापान, फ्रांस, जर्मनी व आस्ट्रिया की ट्रेनों से (जिन पर मैं सफर कर चुका हूँ) थाइलैंड की ये स्काई ट्रेन किसी मामले में कम नहीं थी।

BTS की ये ट्रेनें इन मार्गों पर हर दो तीन मिनट के अंतराल पर आती हैं. सुबह साढ़े छः बजे से लेकर रात बारह बजे तक ये आवाजाही चलती रहती है। इन ट्रेनों का कम से कम किराया पन्द्रह बहत यानि तीस रुपये के लगभग है। हमें तो इस लाइन के अंतिम स्टेशन तक जाना था। इसलिए जो तनाव था वो गाड़ी में बैठ भर जाने का था। बीच में उतरने का कोई चक्कर ही नहीं।

ठाठ हों तो ऐसे !
ट्रेन में बैठते ही ठीक सामने की सीट पर मुझे ये सज्जन मिल गए। अपनी वेशभूषा और आकार प्रकार से वे  हिंदी फिल्मों में कॉमेडियन के किरदार के लिए पूरी तरह जँच रहे थे। पाँच बालाओं के बीच चिर निद्रा में लीन चैन की बंसी बजाते से वे आधुनिक कृष्ण प्रतीत हो रहे थे।

गुलाबी रंग की टैक्सी तो पहली बार बैंकाक में ही देखी
मोचित पहुँचने में यहाँ का प्रसिद्ध विजय स्मारक यानि Victory Monument नज़र आया। और हाँ यहाँ की टैक्सियाँ एक रंग की नहीं बल्कि कई रंगों की हैं। नीली, हरी, गुलाबी , नारंगी और दोरंगी।  एक रंग वाली टैक्सियाँ किसी निजी कंपनी की होती हैं। दोरंगी टैक्सियों में सबसे प्रचलित हरी पीली टैक्सी है जिसमें चालक ही गाड़ी का मालिक भी होता है।

मोचित स्टेशन से उतरते ही करीब सौ मीटर के फासले पर चाटुचक बाजार शुरु हो जाता है। 27 एकड़ में फैले बैंकाक के इस बाजार को विश्व के सबसे बड़े सप्ताहांत बाजारों में एक माना गया है। पूरा बाजार 27 हिस्सों में बँटा है। क्या नहीं है इस बाजार में कपड़े, हश्तशिल्प, फर्नीचर, किताबें, घर की सजावट से जुड़ी वस्तुएँ, इलेक्ट्रानिक्स, रसोई और यहाँ तक की पालतू जानवर ! बाजार के बाहरी हिस्सों को आगर आप पार कर पाए तो इसके मध्य में आपको एक घंटाघर दिखेगा। हम चार घंटों में मुश्किल से सताइस में से दस हिस्से ही देख पाए।

थाई रुमाल पर गजराज

हाथी मेरे साथी फिल्म तो ये भारत की है पर थाइलैंड के लिए बिलकुल फिट बैठती है। आदि काल से ये देश हाथियों को पूजता रहा है। थाइलैंड के इतिहास के पन्ने उलटें तो पाएँगे कि घने जंगलों के बीच युद्ध करने वाले राजाओं की सवारी हाथी ही होता है। लकड़ियों और भारी सामान की ढुलाई भी इन्हीं से की जाती थी। लिहाजा मंदिरों से लेकर रुमाल तक में इनकी छवी आपको सहजता से दिख जाएगी। चाटुचाक मार्केट में रुमालों के बीच गजराज को मैंने जब घूमता पाया तो उनकी तस्वीर निकाल ली... 

चित्र में तोम यम सेट बाँयी ओर व लेमन ग्रास दाहिने दिख रही है
मसालों के बाजार में बाकी चीजें तो वहीं थी सिवाए इस तोम यम सेट के। पैकेट के अंदर तरह तरह की पत्तियाँ दिख रही थीं। पता चला कि इस सेट में तरह तरह की जड़ी बूटियाँ हैं जिन्हें इस्तेमाल करने के लिए पीसकर एक घोल तैयार कर लिया जाता है जो इसी नाम के थाई सूप  में इस्तेमाल होता है। इस पेस्ट के साथ इस नान वेजसूप में लेमन ग्रास भी डाली जाती है।

इसे क्या कहते होंगे थाइ कुल्हड़ :)
इस बाजार की विशालता को छोड़ दें तो इनमें अक़्स आपको अपने देश के बाजारों का ही दिखेगा। कई  दुकानें एक दाम रखती हैं। बाकी में मोल भाव जम कर होता है। मतलब इस गिल्ट के लिए तैयार रहें कि दुकानदार आपके कहे मूल्य पर तैयार हो जाए तो दिल से आवाज़ निकले कि हाय मैंने और कम बोला होता। :)

यात्रा से पहले हम ऐसी ही चप्पलें भारत से खरीद कर ले गए थे। हमें क्या पता था कि वो यहाँ बनती हैं।

यहाँ अगर आपने कोई सामान पसंद कर लिया और ये सोचकर आगे बढ़ गए कि थोड़ा और देख लें तो यकीन मानिए आप शायद ही उस दुकान को वापस लौट कर खोज सकें। मेर इरादा तो पूरे बाजार का ज्यादा से ज्यादा चक्कर लगा लूँ पर बढ़ती गर्मी और रुक रुक कर होती खरीददारी की वज़ह से ऐसा हो नहीं पाया।

सितारे ज़मी पर
सुबह नौ से एक बजे तक चलते चलते भूख प्यास ने जब एक साथ धावा बोला तो हम वापस अपने होटल की ओर रुखसत हो गए।



अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

Saturday, August 27, 2016

रानी सती मंदिर, बिरमित्रपुर, राउरकेला Rani Sati Temple, Birmitrapur, Odisha

राजस्थान के उत्तर पश्चिम में एक जिला है झुँझुनू और जिसका  मुख्यालय भी इसी नाम से है। झुँझुनू दो वज़हों से जाना जाता रहा है। एक तो अपनी मंदिर और हवेलियों की वज़ह से और दूसरे पानी की किल्लत की वज़ह से भी। मारवाड़ियों में झुँझुनू का सबसे श्रद्धेय मंदिर है रानी सती जी का मंदिर। हालांकि सती प्रथा को तो कबका ये देश अलविदा कह गया पर लगभग तीन दशक पहले एक दाग तो लग ही गया था भारतीय समाज के दामन पर। ख़ैर छोड़िए उस बात पर कुछ देर बाद आते हैं। अभी तो बस ये जान लीजिए कि जिस रानी सती मंदिर के दर्शन आज आपको कराने जा रहा हूँ वो राजस्थान में ना होकर ओड़िशा में है।

मंदिर का मुख्य द्वार

कार्यालय के काम के सिलसिले में मेरा अक्सर राउरकेला जाना होता रहता है। ऍसी ही एक यात्रा में वापस लौटते हुए पता चला कि जिस ट्रेन से हमें जाना है वो चार घंटे विलंब से आने वाली है। थोड़ी देर सोचने के बाद आनन फानन में योजना बनी कि समय का सदुपयोग करने के लिए क्यूँ ना राउरकेला से पैंतीस किमी दूर स्थित वीरमित्रपुर कस्बे के प्रसिद्ध रानी सती मंदिर में चला जाए। झटपट ओला मँगवाई गयी और कुछ ही क्षणों में अपने सामान सहित हम वीरमित्रपुर के रास्ते में थे।
NH 143 राजमार्ग से दिखती मंदिर की भव्य इमारत
वीरमित्ररपुर का कस्बा, उत्तरी ओड़िशा को झारखंड से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 143 पर है। इससे आगे बढ़ने पर कुछ ही देर में झारखंड की सीमा शुरु हो जाती है। इसी रास्ते से राउरकेला का वेद व्यास मंदिर भी पड़ता है। झारखंड, ओड़िशा व छत्तीसगढ़ से पास होने के कारण यहाँ हिंदी व ओड़िया दोनों धड़ल्ले से बोली जाती है। मारवाड़ियों की भी यहाँ अच्छी खासी संख्या है। राजस्थान से ठीक उलट देश के पूर्वी किनारे पर होने की वजह से अपनी इष्ट देवी की याद में यहाँ रहने वाले मारवाड़ियों ने साठ के दशक में ये मंदिर बनवाया। नब्बे के दशक में दो एकड़ में फैले इस मंदिर का सौंदर्यीकरण भी हुआ।

प्रार्थना कक्ष

झुँझुनू  के मुख्य मंदिर की याद में इस मंदिर को झुँझुनू धाम (Jhunjhunu  Dham ) के नाम से भी जाना जाता है। स्थापत्य भी बाहर से एक जैसा है और राजस्थान के मुख्य मंदिर की तरह ही भगवान की मूर्तियाँ अंदर के कक्ष में नहीं लगी हैं। रानी सती जी को  प्यार  से श्रद्धालु दादी मैया के नाम से भी पूजते हैं। मंदिर का सबसे खूबसूरत हिस्सा इसका मुख्य हॉल है जहाँ लोग पूजा के लिए बैठते हैं। यहाँ छत पर लगे रंगीन टाइल के डिजाइन देखते  ही बनते हैं।

रंग बिरंगी ज्यामितीय आकृतियों से सुसज्जित छत

Sunday, August 21, 2016

टोरंटो की वैश्विक संस्कृति : सपनों की रानी से .... डोला रे डोला तक Multicultural City of Toronto, Canada

टोरंटो के होटल रामदा प्लाजा की वो सुबह बड़ी प्यारी थी। धूप में हल्की सी ठसक थी जिससे बाहर का तापमान बीस से ऊपर चला गया था। हवा भी धीमी रफ्तार से मंद मंद बह रही थी। वापसी की उड़ान भरने के पहले जो चार पाँच घंटे का समय शेष था उसमें इस शहर को कदमों से नापने का अनुकूल वातावरण था।

टोरंटो का मुख्य केंद्र इटन सेंटर

सुबह नौ बजे जब हम होटल के रेस्ट्रां में पहुँचे तो वो खाली पड़ा था। हमें देख कर स्थूल काया और मध्यम ऊँचाई वाला एक वेटर हमारी ओर लपका और बड़ी गर्मजोशी से उसने हमारा अभिवादन किया। उसकी छोटी छोटी आँखों से ये तो स्पष्ट था कि वो एशियाई मूल का है पर चीन, वियतनाम, कोरिया, थाईलैंड, फिलीपींस जैसे दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में वो किस देश से ताल्लुक रखता होगा ये क़यास लगाने लायक महारत हमारे समूह में किसी को नहीं थी।

इससे पहले कि हम उसे बताते कि नाश्ते में क्या लेना है वो पहले ही  उत्साह से पूछ बैठा कि क्या आप भारत से आये हैं ? हमारे हाँ कहते ही वो कहने लगा कि मैं समझ गया कि आप को क्या चाहिए। हम एक क्षण तो चौंके पर जिस तत्परता से उसने हमारी टेबुल पर फल, दूध, जूस, बटर टोस्ट,आलू फ्राई परोसनी शुरु की उससे हम समझ गए कि आज हम सही शख़्स की मेजबानी में हैं।

नाश्ता करते समय तक उसने हमें नहीं टोंका। पर जब हम चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे वो फिर हमारे पास आया और पूछने लगा कि क्या आप सबने राजेश खन्ना की फिल्में देखी हैं? मुझसे नहीं रहा गया और मैं पूछ बैठा कि आप कहाँ से हो? वो बताने लगा कि वो बर्मा से है और अपने कॉलेज के दिनों से राजेश खन्ना का बहुत बड़ा फैन रहा है। उसने आराधना का जिक्र करते हुए मेरे सपनों की रानी.... गुनगुना कर  राजेश खन्ना के प्रति अपने प्रेम का इज़हार किया। मैंने उसे बड़े भारी मन से बताया कि वो तो कुछ साल पहले गुजर गए पर जब मैं उससे ये कह रहा था मेरे दिल में उनकी कालजयी फिल्म आनंद का वो संवाद गूँज रहा था . आनंद मरा नहीं.. आनंद मरते नहीं।

मुझे वो व्यक्ति बहुत दिलचस्प लगा इसलिए मैंनें उसकी बीती हुई ज़िदगी के बारे में पूछना शुरु किया। पता चला कि वो लगभग तीन दशक पहले रोज़गार की खोज में कनाडा पहुँचा था। कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई थी तो यहाँ होटल में बर्तन साफ करने की नौकरी मिली। धीरे धीरे उसने तरह तरह के पकवान बनाना सीखा, अंग्रेजी में प्रवीणता हासिल की और छोटे मोटे होटल बदलते हुए रामदा आ पहुँचा। पिछले कुछ सालों से वो यहीं है। एक बेटा है तो वो इंजीनियरिंग कर नार्वे में नौकरी कर रहा है। पत्नी भी नौकरी कर रही है ।
 

अपनी कथा कहते कहते वो भावुक हो गया और कहने लगा मैंने जहाँ से शुरुआत की थी उस हिसाब से मैंने वो सब कुछ हासिल कर लिया जिस आशा में मैं कनाडा आया था  टोरंटो में मेरा अपना घर है, बच्चे नौकरी कर रहे हैं, बुढ़ापे के लिए अच्छी खासी बचत कर ली है पर मेरा मन करता है अपने साथियों के लिए कुछ करूँ जो म्यानमार में अभी भी गरीबी और आभाव की ज़िदगी जी रहे हैं। पत्नी कहती है तुम वापस क्यूँ जाना चाहते हो? मैं जानता हूँ वो नहीं समझेगी पर मैं एक दिन निकल जाऊँगा उसे बिना बताए अपने देश में, अपने लोगों के पास..

उसकी आँखें उस स्वप्न पे अटकी थीं और उनकी स्वीकारोक्ति के लिए ही शायद उसने हमसे अपने दिल का दर्द  बाँटा था। हमने उसे बताया कि भारत के बड़े शहरों में तो आजकल विश्व के कई देशों के व्यंजनों का स्वाद चखने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। आप म्यानमार में भी कुछ वैसा ही करो। वो मुस्कुराते हुए बोला, मैंने भी वही सोचा है। आप सब तो भारतीय हैं, समझ सकते हैं। भारत की ही तरह मेरे देश में कोई नया व्यापार शुरु करने से पहले जेबें भरने पड़ती हैं। अब मुस्कुराने की बारी हमारी थी।

चलते चलते मैंने उससे यही कहा कि मित्रों के साथ मिलकर  अनुभव के सहारे अपने वतन में काम करने की सोच बहुत अच्छी है। आपको अपने देश जरूर जाना चाहिए ये देखने कि वहाँ  आप का काम सँवर सकता है या नहीं। पर एक बार काम की नींव मजबूत हो जाए तो अपनी पत्नी को भी आप आश्वस्त कर सकते हैं स्वदेश लौटने के लिए। मुझे पता नहीं कि वो अपने देश जा पाया या नहीं पर ऐसे जीवट इंसान मन में अमिट छाप छोड़ जाते हैं।


टोरंटो की डबलडेकर बस
नाश्ता कर मैं शहर के मुख्य केंद्र इटन सेन्टर की तरफ चल पड़ा। यूरोपीय शहरों की तरह टोरंटो में भी Hop On Hop Off बसों की सुविधा है। यहाँ आप 35 US डॉलर में पूरे शहर का चक्कर लगा सकते हैं। अगर रास्ते में कोई जगह आपको पसंद आ गई तो वहीं उतर जाइए और फिर जब मर्जी इस डबल डेकर बस में वापस चढ़ जाइए। अपने टिकट का प्रयोग आपको एक दिन नहीं बल्कि तीन दिन इन बसों में चढ़ने की इजाज़त देता है। अगर आप के पास समय कम है तो यहाँ के सिटी पास का इस्तेमाल कर यहाँ के मुख्य आकर्षणों का बिना लंबी लााइन में लगे आप आनंद उठा सकते हैं।

योंगे स्ट्रीट Yonge Street, Toronto

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