Saturday, May 13, 2017

बिष्णुपुर मंदिर परिक्रमा : रास मंच और श्याम राय का अद्भुत शिल्प ! Terracotta temples of Bishnupur, West Bengal

अक़्सर ऐसा होता है कि जिस इलाके में हम पलते बढ़ते है उसकी ऐतिहासिक विरासत से सहज ही लगाव हो जाता है। स्कूल में जब भी इतिहास की किताबें पढ़ता तो पूर्वी भारत के किसी भी राजवंश का जिक्र आते ही पढ़ने की उत्सुकता बढ़ जाती। प्राचीन मौर्य/मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र यानि आधुनिक पटना तब मेरा घर हुआ करता था। पर पाटलीपुत्र में कुम्हरार के अवशेषों के आलावा ऐसा कुछ भी नहीं था जो इस विशाल साम्राज्य की कहानी कहता। राजगृह, नालंदा, पावापुरी और बोधगया में भी बौद्ध विहारों व स्तूपों, जैन मंदिरों और विश्वविद्यालय के आलावा अशोक या उनके पूर्ववर्ती सम्राटों की कोई इमारत बच नहीं पायी। वैसे भी जिनके शासन काल की अवधि ही ईसा पूर्व में शुरु होती हो उस काल के भवनों के बचे होने की उम्मीद रखी भी कैसे जा सकती है? 

मौर्य शासको के बाद इस इलाके पर राज तो कई वंशों ने किया पर इतिहास के पन्नों पर नाम आया पाल वंश के राजाओं गोपाल, धर्मपाल और महिपाल का जिन्होंने बंगाल बिहार के आलावा उत्तर भारत के केंद्र कन्नौज पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए राष्ट्रकूट व प्रतिहार शासकों के साथ लोहा लिया। बारहवीं शताब्दी आते आते  पाल वंश का पराभव हो गया। भागलपुर के पास विक्रमशिला औेर बांग्लादेश में सोमपुरा के बौद्ध विहारों के अवशेष पाल शासन के दौरान बने विहारों की गवाही देते हैं।
बिष्णुपुर
पर इन सब के आलावा भी बंगाल के बांकुरा जिले से सटे छोटे से भू भाग पर एक अलग राजवंश ने शासन किया जिसके बारे में ज्यादा पुष्ट जानकारी नहीं है। ये राजवंश थाा मल्ल राजाओं का जो सातवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक इस छोटे से इलाके में काबिज़ रहे। मल्ल शासकों द्वारा 17 वीं और 18 वीं शताब्दी में बनाए गए टेराकोटा के मंदिरों ने इस कस्बे  को हमेशा हमेशा के लिए इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में जगह दिला दी। बिष्णुपुर के बारे मैं मैंने जबसे जाना तबसे वहाँ जाने की इच्छा मन में घर कर  गयी थी।

राँची से कोलकाता के रेल मार्ग पर बांकुरा स्टेशन तो पड़ता है पर शताब्दी जैसी ट्रेन वहाँ रुकती नहीं। धनबाद से बिष्णुपुर की दूरी करीब 160 किमी है जिसे सड़क मार्ग से चार पाँच घंटे में तय किया जा सकता है। पर बाहर से आने वालों के लिए विष्णुपुर पहुँचने का सबसे आसान तरीका है कोलकाता आकर वहाँ से सीधे बिष्णुपुर के लिए ट्रेन पकड़ने का। कोलकाता से विष्णुपुर की 142 किमी की दूरी एक्सप्रेस ट्रेन चार घंटे में पूरी कर लेती है। दिसंबर के महीने में जब मैं कोलकाता गया तो वहीं से बिष्णुपुर जाने का कार्यक्रम बन गया। सुबह सुबह कोलकाता से निकला और साढ़े दस बजे तक मैं बिष्णुपुर स्टेशन पर था।
राधा माधव मंदिर में सहयात्री के साथ
बिष्णुपुर स्टेशन से निकल कर आपको बिल्कुल नहीं लगेगा कि आप किसी ऐतिहासिक शहर में आ गए हैं। ये आम सा एक कस्बा है जहाँ ज़िदगी घोंघे की रफ्तार से खिसकती है । कस्बे की दुबली पतली धूल धूसरित सड़कों पर आटोरिक्शे से ले कर रिक्शे व ठेला गाड़ी दौड़ती दिखेंगी।पर चंद किमी के फासले को तय करने के बाद आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप एक दूसरी ही दुनिया में आ गए हैं।   ये दुनिया है बिष्णुपुर के वैष्णव राजाओं द्वारा बनाए दर्जनों छोटे बड़े टेराकोटा के मंदिरों की जिन्हें ASI ने बेहद करीने से रखा और सहेजा है। काश इन तक पहुँचने वाली सड़कें भी इस इलाके के गौरवशाली अतीत का प्रतिबिम्ब बन पातीं । स्टेशन से निकल कर शहर के मंदिरों को घूमने का सबसे अच्छा ज़रिया आटोरिक्शा है जो सीजन के हिसाब से तीन चार सौ रुपये में शहर का कोना कोना घुमा देता है। बिष्णुपुर का हमारा सबसे पहला पड़ाव था रासमंच

राधा श्याम मंदिर जहाँ आज भी होती है राधा कृष्ण की पूजा
मल्ल नरेश ज्यादातर वैष्णव थे इसीलिए यहाँ के सारे मंदिर कृष्ण को ही समर्पित हैं। अब कृष्ण हैं तो साथ में राधा भी रहेंगी। राधा और कृष्ण के अमर प्रेम की भावना को लोगों तक पहुँचाने के लिए यहाँ  रास उत्सव मानाने की परम्परा शुरू हुई ।

रास मंच
मल्ल राजा बीर हम्मीर ने इसी उत्सव को मनाने के लिए रास मंच का निर्माण 1600 ई. में  करवाया। एक चौकौर चबूतरे पर बने तीन गलियारों के ऊपर छत से उठती रासमंच की पिरामिड सरीखी आकृति अपने आप में अनूठी है। गलियारों के अंदर एक केद्रीय कक्ष है जिसका प्रयोग संभवतः पूजा या अनुष्ठान के लिए किया जाता रहा । रास उत्सव के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा लाई गयी इन मूर्तियों को इन गलियारों में सजा दिया जाता था।

रास मंच का बाहरी गलियारा
रास मंच से ही आप यहाँ के अन्य दो आकर्षण जोर बाँग्ला और श्याम राय के टिकट ले सकते हैं। वैसे इनके आलावा संग्रहालय को छोड़ ज्यादातर जगहों मे टिकट लगता भी नहीं है।
श्याम राय पंचरत्न मंदिर
यूँ तो बिष्णुपुर में दर्जनों मंदिर हैं पर इनमें श्याम राय, जोर बांग्ला और मदन मोहन मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से अपना विशेष महत्त्व रखते हैं। ईंट की इन दीवारों पर पक्की मिट्टी यानि टेराकोटा पर उभारी गयी कलाकृतियों की बात करें तो इसमें श्याम राय मंदिर का कोई सानी नहीं है। 

श्याम राय मंदिर पंचरत्न मंदिरों की श्रेणी में आता है। यानि पाँच शिखरों वाला मंदिर। इसी वज़ह से स्थानीय इसे पंचचूरा मंदिर के नाम से भी बुलाते हैं। इसके चारों कोनों पर दिखते चौकोर शिखरों के बीच जो पाँचवा शिखर है वो अष्टभुज की आकृति वाला है। मध्य शिखर से कोनों की ओर जाती घुमावदार छत का डिजाइन बंगाल के शिल्पकारों ने गाँवों में बाँस की बनी झोपड़ियों से लिया था। मंदिर की हर दीवार में तीन खुले द्वार हैं जिनको अंदर से एक गलियारा आपस में जोड़ता है।

दीवारों को सजाने के लिए टेराकोटा पर महीन नक्काशी
कृष्ण लीला का चित्रण

श्याम राय मंदिर का निर्माण मल्ल राजा रघुनाथ सिंह ने 1643 ई में करवाया। उस वक़्त इस इलाके में पत्थरों का कोई स्रोत नहीं था। इसलिए कारीगरों को लाल भूरे रंग में पकाई गयी मिट्टी को ही मंदिरों के निर्माण में इस्तेमाल करना पड़ा। पर इस कठिनाई ने  यहाँ के कारीगरों को एक अलग शैली विकसित करने को बाध्य किया जो कि टेराकोटा के इन मंदिरों पर  उभर कर सामने आई।


शिल्पकारों नें मंदिरों की दीवारों पर  मूलतः कृष्ण लीला को उभारने की कोशिश की है। इसके आलावा इनमें महाभारत और रामायण की कहानियों और यहाँ के सामाजिक जीवन को उतारने का भी प्रयास किया गया है। मंदिर का चक्कर लगाते हुए आस पास के गाँवों के उन कारीगरों की कला को नमन करने का दिल हो आया जिन्होंने इस मंदिर को मूर्त रूप दिया होगा।


यहाँ के सारे मंदिर कृष्ण के नामों का ही कोई ना कोई पर्याय हैं। श्याम राय मंदिर को देखने के बाद मैं राधा माधव मंदिर में गया। ये एकरत्न यानि एक शिखर वाला मंदिर अठारहवीं शताब्दी में गोपाल सिंह की पुत्रवधू द्वारा बनाया गया था। इस मंदिर की विशेषता है इसके ठीक बगल में बना मंडप।

राधा माधव मंदिर और पास का मंडप
गर आप राधा माधव मंदिर में जाएँ तो इससे सटे उद्यान में चहलकदमी करना ना भूलें। यहाँ एक प्राचीन वृक्ष है  जिसके आधार की चौड़ाई दो मीटर से भी ज्यादा है।

इतने मजबूत आधार वाले पेड़ं का कौन बाल बाँका कर सकता है?
हमारा अगला पड़ाव लालजी मंदिर था। मंदिर के चारों ओर ऊँची दीवारों से घेरा गया है। मंदिर के सामने एक बड़ा सा मैदान है । विष्णुपुर में मैंने जितने मंदिर देखे उनमें ये इकलौता मंदिर था जिसे हल्के पीले रंग का प्लास्टर चढ़ा था। 

लालजी मंदिर
ये मंदिर लेटेराइट चट्टान से बनाया गया है । इसके सामने वाले हिस्से में दीवार पर की गई नक्काशी देखने लायक है। बिष्णुपुर में किले या परकोटे के अवशेष तो दिखाई नहीं देते । हाँ, लालजी मंदिर क उत्तर में एक छोटा सा द्वारा जरूर है जिसे यहाँ पत्थर दरवाजा के नाम से पुकारा जाता है। इस द्वार के ऊपर सैनिकों के खड़े होने और छिप कर बाहर से आने वाले आंगुतकों पर बंदूक या तीर कमान सेवार करने के लिए सुराख बने हैं। 

बिष्णुपुर की इस मंदिर यात्रा की अगली कड़ी में आपको ले चलेंगे जोर बँग्ला और मदनमोहन मंदिर के साथ यहाँ के कुछ अन्य मंदिरों में..
 
लालजी मंदिर का प्रवेश द्वार 

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Monday, May 1, 2017

हरी भरी इस धरती पर चलने को मचलते पाँव हैं , ओ साथ चलते पथिक बता क्या इसी डगर तेरा गाँव है? In pictures : The countryside of Belgium

बेल्जियम से हमारी डगर जाती थी फ्रांस की ओर। यूरोप के खेत खलिहानों को पास से निहारने का पहला मौका तो क्यूकेनहॉफ से एमस्टर्डम आते वक़्त मिला था पर ब्रसल्स से पेरिस जाते वक्त यूरोप के भीतरी इलाकों से गुजरना आँखों के साथ मन को भी सुकून दे गया। जैसे जैसे फ्रांस की धरती पास आने लगी वैसे वैसे मौसम भी करवट लेने लगा। नीले आसमान को स्याह बादलों ने ढक लिया। हवा का शोर एकदम से बढ़ गया और तापमान तेजी से कम होने लगा। हमारी सरपट भागती बस ने इस बदलती फ़िज़ा में जो अनूठे रंग दिखाए वही सँजों के लाया हूँ मैं आपके लिए आज की इस पोस्ट में.. 

मिट्टी है ये या सोना है, इक दिन इसमें ख़ुद खोना है...
सकल वन फूल रही सरसों, आवन कह गए आशिक रंग..और बीत गए बरसों।
हरी भरी इस धरती पर चलने को मचलते पाँव हैं , ओ साथ चलते पथिक बता क्या इसी डगर तेरा गाँव है?
वृक्ष की कतार में, मौसमी बयार में..दिल मेरा खो गया किसके इंतज़ार में

पवन का आता शोर है, बादल भी घनघोर हैं.. अब ये तो बता बरखा रानी तू आख़िर किस ओर है?

बारिश की ये बूँदें तो बस तेरी याद दिलाती हैं.. तू नाच रही होगी  ऐसा कानों में कह जाती हैं

 बना पवन को छैला..  तूने किया गगन मटमैला


हरी हरी वसुंधरा पे नीला नीला ये गगन के जिस पे बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन 
यूरोप यात्रा में अब तक
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Monday, April 17, 2017

ब्रसल्स के सबसे लोकप्रिय आकर्षण : Atomium & Town Hall, Brussels

हर देश की अपनी एक पहचान होती है जो विश्व के अन्य हिस्सों में रहने वाले लोगों के लिए उस देश का प्रतीक बन जाती है। ज्यादातर ये पहचान चिन्ह इमारतों की शक़्ल में होते हैं। भारत का ताजमहल, चीन की दीवार, मिश्र का पिरामिड, फ्राँस का एफिल टॉवर, इंग्लैंड का बिग बेन ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। अक्सर  ऐसे प्रतीक इतिहास के पन्नों पर अपना महत्त्वपूर्ण दखल रखते हैं। पर मगर मैं अगर कहूँ कि एक देश ऐसा भी है जिसका प्रतीक विज्ञान से प्रेरित है तो थोड़ी  हैरत तो होगी आपको।


अगर आप बेल्जियम की राजधानी ब्रसल्स में जाएँ तो प्रतीक के तौर पर आपको  दुकानों, बसों, इमारतों  पर आणविक संरचना बनी दिखाई देगी। बेल्जियम वासियों ने इसका नाम दिया है एटोमियम । स्कूल में आपने धातु क्रिस्टल की संरचना पढ़ते हुए BCC (Body Centered Cubic) व  FCC (Face Centered Cubic) के बारे में पढ़ा होगा। अब याद ना भी हो तो मैं याद दिला देता हूँ। दरअसल ये एक घन यानि क्यूब के विभिन्न बिंदुओं पर अणु की पारस्परिक स्थितियों का चित्रण था।  ये भी तब बताया गया था कि लोहे के अणु  BCC सरीखी संरचना लिए होते हैं। एक घन यानि क्यूब के सारे कोनों पर और एक ठीक घन के मध्य में।



पचास के दशक में यूरोप के वैज्ञानिक नित नई खोजों में लीन थे। बेल्जियम भी इससे अछूता नहीं था और जीवन में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के ख़्याल से यहाँ EXPO 58 के तहत 1958 में एटोमियम का निर्माण हुआ। लोहे के क्रिस्टल की संरचना को 16500 करोड़ गुणा बना कर ये इमारत बनाई गयी। एक BCC के रूप में इसमें अठारह मीटर व्यास के नौ अलग अलग गोले बनाए गए। इन गोलों को तीन मीटर व्यास के पाइप से आपस में जोड़ा गया। इस तरह जो ढाँचा बना उसकी की ऊँचाई 102 मीटर थी। आज इस संरचना का प्रयोग एक म्यूजियम के तौर पर होता है। इसके सबसे ऊपरी गोले में एक भोजनालय बना है जहाँ से आप ब्रसल्स शहर का नज़ारा देख सकते हैं।

एटोमियम

एटोमियम के इन गोलों की बाहरी दीवार पर पहले एल्युमिनियम की परत चढ़ाई गयी थी। बाद में जब इनकी मरम्मत हुई तो इसे स्टेनलेस स्टील का बना दिया गया। दो गोलों को जोड़ने वाली पाइप के भीतर सीढ़ियाँ और एस्कलेटर्स लगे हैं जिससे आप एक गोले से दूसरे गोले तक पहुँच सकते हैं। पर ऊपर वाले चार गोलों में सुरक्षा की दृष्टि से सिर्फ सबसे ऊँचाई वाले गोले तक जाने की अनुमति है।


एटोमियम के ठीक सामने पर्यटकों के स्वागत के लिए वेलकम का बोर्ड लगा है जिसमें संसार की सारी प्रमुख भाषाओं में YOU ARE WELCOME का अनुवाद किया गया है। आपके मन में उत्सुकता होगी कि क्या हिंदी इनमें शामिल थी? हाँ जी बिल्कुल थी। यूरोप में हिंदी में लिखा पहला वाक्य मैंने यहीं देखा। अगर आप भी ये देखना चाहते हैं तो नीचे के चित्र पर क्लिक कर बड़ा कीजिए और लेटर 'E' को ध्यान से देखिए। आपको "आपका स्वागत है" लिखा दिख जाएगा। 😀

आपका स्वागत है 😍
एटोमियम को देखने के बाद अगले दिन सुबह सुबह हम चल पड़े ब्रसेल्स के केंद्रीय बिंदु यानि ग्रैंड प्लेस की तरफ़। ग्रैंड प्लेस ब्रसल्स का सबसे लोकप्रिय पर्यटक स्थल है। बाहर से आने वाले आंगुतक यहाँ के से्ट्रल स्कवॉयर पर आपको भारी संख्या में मिल जाएँगे। ये स्कवॉयर है भी आलीशान। करीब 110 x 70 वर्ग मीटर में फैले इस चौकौर हिस्से को यूनेस्को ने हेरिटेज साइट का दर्जा दे रखा है।

टाउन हॉल
ब्रसल्स के इस स्क्वॉयर पर सबसे खूबसूरत इमारत है टाउन हॉल की। टाउन हॉल का भी एक बड़े उतार चढ़ाव वाला इतिहास रहा। बारहवीं शताब्दी में ये इलाका एक छोटे मोटे व्यापार केंद्र के रूप में आरंभ हुआ। पहले खुले में बाजार लगते थे। तेरहवीं शताब्दी में इमारतों के अंदर बाजान का चलन शुरु हुआ और अगले दो सौ साल में ब्रसल्स का ये इलाका कपड़ों और खान पान की वस्तुओं के एक बड़े बाजार के रूप में जाना जाने लगा। व्यापार बढ़ा तो शहर में एक नगर निकाय की आवश्यकता महसूस हुई और इसी वज़ह से  पन्द्रहवीं शताब्दी में यहाँ के व्यापारियों ने मिलकर  टाउन हॉल का निर्माण किया।

टाउन हॉल का खूबसूरत शिखर

Saturday, April 8, 2017

ब्रसल्स, बेल्जियम : चलिए चलें कार्टून व चॉकलेट प्रेमियों के देश में In pictures : Brussels, Belgium

लंदन और एम्सटर्डम के बाद मेरे यूरोपीय सफ़र का अगला पड़ाव था बेल्जियम का शहर ब्रसल्स । यूरोप का ये एकमात्र ऐसा शहर था जहाँ कुछ घंटों के लिए ही सही, कनाडा जाते समय मेरा रुकना हो पाया था। अगर आपको याद हो तो इस इस शहर के खूबसूरत आकाशीय नज़ारों का झरोखा मैंने यहाँ और यहाँ आपको दिखाया था। ब्रसल्स में हम करीब दो दिन रहे। यहाँ की कुछ मशहूर इमारतें भी देखीं। बाजारों में यूँ ही चहलकदमी की और इधर उधर  घूमते फिरते कुछ अलग से नज़ारे कैमरे में क़ैद किये। इमारतों की बारी तो बाद में आएगी। आज तो थोड़ा यूँ ही "बेफिक्रे" घूम लें इन तसवीरों के साथ.. 

टिनटिन के देश में !
बेल्जियम अपने कार्टून चरित्रों के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। कोई भी कार्टून प्रेमी टिनटिन के नाम से भला कैसे अनजान होगा? ये मशहूर चरित्र बेल्जियम से ही ताल्लुक रखता है और इसके रचयिता  Hergé नामक कार्टूनिस्ट थे। ब्रसल्स के बाजारों में  बेल्जियम का पूरा समाज ही कार्टून चरित्रों का रूप धर खिलौने के रूप में बिक रहा था।

बेल्जियम का कार्टून संसार
इन कार्टूनों को ज़रा ध्यान से देखिए डॉक्टर, जज, वकील, इंजीनियर, खानसामे, शिक्षक, खिलाड़ी, नृत्यांगना, वादक, फोटोग्राफर सब नज़र आएँगे आपको। साथ ही नज़र आएँगी पुरुषों के साथ हर क्षेत्र में क़दम मिलाती महिलाएँ जो कि यहाँ की संस्कृति की हक़ीकत भी है। वैसे सबसे  मजेदार चरित्र मुझे खिसकती पैंट और तोंद के साथ वो गोल्फर लगा। आपकी इस बारे में क्या राय है? 😃

ब्रसल्स के पुराने होटलों में से एक,  होटल एमिगो Hotel Amigo
यूरोप की इमारतों में खिड़की के आगे यूँ लटकते गमलों में फूल लगाना आम बात है। सबसे पहले ये नज़ारा मुझे ब्रसल्स के होटल एमिगो में देखने को मिला। अब बाहर से देखने से आपको शायद ही लगे कि ये एक पाँच सितारा होटल है पर इस होटल की ऐतिहासिक विरासत इसे आज भी ब्रसल्स के विशिष्ट होटलों की श्रेणी में ला खड़ा करती है।

कहा जाता है कि इस इमारत की मिल्कियत पाँच सौ साल पहले एक धनी व्यापारी के हाथ थी। 1522 ई में इसे वहाँ की सिटी काउंसिल ने खरीदा । वैसे क्या आप अंदाज लगा सकते हैं कि सबसे पहले इस होटल का प्रयोग स्थानीय प्रशासन ने किस तौर पर किया होगा? जनाब बड़ा मुश्किल है ये अनुमान लगाना। चलिए मैं ही बता देता हूँ ये भवन सबसे पहले एक जेल के रूप में इस्तेमाल किया गया।😀 सन 1957 में ये होटल इस रूप में आया और आज तक अपनी पुरानी विरासत को यूँ ही समेटे हुए है।

Le  Faucon : फ्रांसिसी प्रभाव ब्रसल्स में स्पष्ट दिखता है
ब्रसल्स में सड़कों और रेस्त्रां में लोग बेहद शांत और सहज दिखे। कुछ गलियाँ परंपरागत यूरोपीय शैली की इमारतों से सजी थीं तो कहीं डिजाइन का नयापन ध्यान खींच लेता था।

अब इस बोतलनुमा इमारत को देख के ही नशा आ जाए तो किसी की क्या ख़ता ?

Thursday, March 30, 2017

बड़ा इमामबाड़ा परिसर : जहाँ अकाल ने रखवायी लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों की नींव ! Bara Imambara, Lucknow

बचपन में जब भी दोस्तों के साथ लखनऊ शहर का जिक्र होता तो एक ही बात चर्चा में आती और वो थी यहाँ की भूलभुलैया की। जो भी यहाँ से हो कर आता इसकी तंग सीढ़ियों और रहस्यमयी गलियारों की बात जरूर करता। आज से करीब 28 साल पहले एक प्रतियोगिता परीक्षा देने मैं सन 89 में जब लखनऊ पहुँचा तो इरादा ये था कि परीक्षा जैसी भी जाए इस भूलभुलैया के तिलिस्म से गुजर कर ही लौटूँगा । 

बड़ा इमामबाड़ा का बाहरी द्वार और उद्यान
एक आटो से परीक्षा केंद्र से सीधे भूलभुलैया तक तो पहुँच गया पर पर होनी को कुछ और मंजूर था। उसी दिन शियाओं के सर्वोच्च नेता आयोतुल्लाह खोमैनी का इंतकाल हो गया था। पूरा परिसर ही आम जनता के लिए बंद था। तभी मुझे ये सत्य उद्घाटित हुआ कि भूलभुलैया कोई अलग सी जगह नहीं पर बड़ा इमामबाड़ा का ही एक हिस्सा है। लगभग तीन दशकों बाद जब मैं इस इलाके में पहुँचा तो इमामबाड़े की आसपास की छटा बिल्कुल बदली बदली नज़र आयी। पर इससे पहले कि मैं आपको इस इमामबाड़े में ले चलूँ, कुछ बातें उस शख़्स के बारे में जिसकी बदौलत ये इमारत अपने वज़ूद में आई।
बड़ा इमामबाड़ा सहित लखनऊ की तमाम ऐतिहासिक इमारतों की नींव अवध के चौथे नवाब आसफ़ उद दौला ने रखी थी । आसफ़ उद दौला के पहले नवाबों की राजधानी फैज़ाबाद हुआ करती थी। वे 26 साल की उम्र में नवाब बने पर माँ की राजकाज में दखलंदाज़ी से तंग आकर उन्होंने फैज़ाबाद से राजधानी को लखनऊ में बसाने का निर्णय लिया।
पहले द्वार से घुसते ही दूसरे द्वार की झलक कुछ यूँ दिखाई देती है
बड़े इमामबाड़े का निर्माण एक अच्छे उद्देश्य को पूरा करने के लिए हुआ। 1785 में अवध में भीषण अकाल  पड़ा। क्या अमीर क्या गरीब सभी दाने दाने को मुहताज हो गए। लोगों को रोजगार देने के लिए नवाब ने ये बड़ी परियोजना शुरु की। वे आम जनता से दिन के वक़्त काम लेते। वहीं रियासत के अमीर उमरा रात के वक़्त काम करते ताकि उनकी तथाकथित रईस की छवि पर कोई दाग न लगने पाए । जब तक अकाल रहा इमामबाड़े पर काम चलता रहा। इमामबाड़े, मस्जिद और बाउली के साथ लगे मेहमानख़ाने को पूरा होने में छः साल लग गए।

दूसरा द्वार और इसके पीछे दिखता बड़ा इमामबाड़ा
बड़े इमामबाड़े तक पहुँचने के लिए आप को दो विशाल द्वार पार करने पड़ते हैं। इन द्वारों के बीच की जगह फिलहाल एक खूबसूरत बागीचे ने ले रखी है। इमारत के गुंबद हों, मेहराबें हों या मीनार इन सब पर मुगल स्थापत्य का स्पष्ट  प्रभाव दिखता है।  इमामबाड़े की दीवारों के बारे में यहाँ का हर गाइड बड़े शान से ये बताना नहीं भूलता कि "दीवारों के भी कान होते हैं " ये मुहावरा यहाँ हक़ीकत बन जाता है।

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