Monday, July 17, 2017

पेरिस की मशहूर इमारतें Famous Monuments of Paris near Eiffel Tower

पेरिस शहर से जुड़ी पिछली कड़ियों में आपने इस शहर को मोनपारनास टॉवर और एफिल टॉवर की ऊँचाइयों से देखा। इस शहर में तमाम ऐतिहासिक इमारते हैं जो फ्रांस के गौरवशाली अतीत से हमें रूबरू कराती हैं। साथ ही वे इस बात की भी गवाही देती हैं कि ये शहर ग्रीक और रोमन स्थापत्य से कितना प्रभावित था। पेरिस शहर की खूबी ये है कि अगर आप एफिल टॉवर के आस पास ठहरते हैं तो  इसके तमाम आकर्षण पैदल ही घूम सकते हैं बशर्ते 5 -6 किमी चलने का आपको अभ्यास हो। वैसे यहाँ मेट्रो, बस व यहाँ तक कि रिक्शे की भी अच्छी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

मैं पेरिस में दो दिन रुका था और इस दौरान मैंने बस और पैदल दोनों तरह से सफ़र करने का अनुभव लिया। सबसे पहले आपको लिए चलता हूँ लेज़नवालीद के सामने जिसका सुनहरा गुंबद और पूरे परिसर को आपने मोनपारनास टॉवर से देखा था। लेज़नवालीद एक काफी लंबा चौड़ा अहाता है जिसमें तमाम संग्रहालय हैं। एफिल टॉवर से सीन नदी के किनारे चलते हुए अगर आप Alexandre III के खूबसूरत पुल के पास पहुँचेगे तो पुल की दूसरी तरफ थोड़ी दूर पर ये विशाल इमारत दिखाई देगी। इसकि दाहिने सिरे पर जो संग्रहालय है उसके बाहरी चौहद्दी पर उद्यान के सामने थोड़े थोड़े अंतराल पर छोटी छोटी तोपें भी रखी गयी हैं। 

लेज़नवालीद Les Invalides Paris
पेरिस की संस्कृति में ओपेरा (Opera ) यानि वहाँ की विशिष्ट नृत्य नाटिका का कितना महत्त्व है ये तो सर्वविदित है। आपको जान कर ताज्जुब होगा कि नृत्य की ये विशिष्ट शैली करीब साढ़े चार सौ वर्ष पुरानी है। ओपेरा के जनक के रूप में Pierre Perrin का नाम लिया जाता है। सत्रहवीं शताब्दी में आम लोगों की ये मान्यता थी कि फ्रेंच भाषा कुछ ऐसी है कि उसका संगीत से जुड़ाव बड़ा मुश्किल है। पेरिन इस धारणा में बदलाव लाना चाहते थे और इसी कारण वे तत्कालीन सम्राट लुईस XIV से इस तरह की संस्था बनाने की अनुमति लेने गए। राजा की सहमति के अनुसार उन्हें बारह साल तक एक थियेटर चलाने की अनुमति दी गयी जिसमें ओपेरा के तौर तरीकों की शिक्षा के आलावा आम जनता के समक्ष उसके प्रदर्शन का भी प्रावधान रखा गया।  

पहले ओपेरा के प्रदर्शन का अधिकार सिर्फ पेरिन को मिला पर वक़्त के साथ फ्रांस के अन्य शहरों में भी इस तरह के संस्थानों की नींव रखी गयी। राजकीय संरक्षण की वजह से शुरुवात में इसका नाम रॉयल एकाडमी था जो फ्रांसिसी क्रांति के बाद नेशनल एकाडमी रखा गया। आज की तारीख में ओपेरा का प्रदर्शन तो नए बने थिएटर में होने लगा है पर फ्रांस के नृत्य बैले को यहाँ देखा जा सकता है।

नेशनल एकाडमी दि म्यूजिक Academic Musique Paris
समयाभाव के कारण हम इस संस्थान के अंदर तो नहीं जा सके पर हमें बताया गया कि यहाँ दो हजार के करीब लोगों के बैठने की व्यवस्था है और मुख्य हॉल तक पहुँचाने वाला गलियारा अंदर से काफी भव्यता लिए हुए है। बाहर लगी प्रतिमाएँ जो ताम्बे और अन्य धातुओं के मिश्रण से बनी हैं यहाँ के कवियों और संगीतज्ञों को समर्पित हैं।

द्वितीय विस्व युद्ध की याद में बना एक शिल्प  Memorial on walls of Passy Cemetry
वैसे पेरिस के मशहूर भवनों का दर्शन सीन नदी के क्रूज पर भी किया जा सकता है। ये क्रूज यहाँ आने वालों में काफी लोकप्रिय हैं।

सीन नदी पर क्रूज
अब सीन नदी की बात हो रही है तो उसके ऊपर बने सबसे खूबसूरत सेतु  Alexandre III का जिक्र कैसे छूट सकता है। इसका ये नामाकरण रूस के तत्कालीन शासक के नाम पर रखा गया जिसने फ्रांस के साथ मैत्री संधि की थी।   इस पुल को सन 1900 ई में विश्व मेले के दौरान पेरिस में बनवाया गया था। इन मेलों की परंपरा यूरोप में काफी पुरानी थी। ये मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ ऐसे ही एक मेले के आयोजन को आकर्षक बनाने के ख्याल से एफिल टॉवर का निर्माण किया गया था।

 सीन नदी के ऊपर बना सबसे खूबसूरत सेतु  Alexandre III
मुझे अपनी पेरिस यात्रा के दौरान दो बार इस पुल के पास से गुजरने का मौका मिला। पुल के एक ओर तो Les Invalides है तो दूसरी ओर Champs Elysees का मशहूर राजमार्ग। इस पुल के निर्माण का समय फ्रांस के सांस्कृतिक और औद्यिगिक उत्थान का समय था। पुल पर आपको शेर, समुद्री जीव, मछलियों , प्रेम दूतों व योद्धाओं के कदम कदम पर शिल्प मिलेंगे। इन शिल्पों की सबसे खास बात मानवीय आकृतियों और भावों का हूबहू निरूपण है। इस मेहराबनुमा पुल के दोनों ओर दो दो स्तंभ हैं जो पुल के भार को वहन करते हैं।

Alexandre III पर बना एक स्तंभ
फ्रांस के लिए Champs Elysees वही हैसियत रखता है जो भारत के लिए दिल्ली का राजपथ। इस सड़क का एक सिरा यहाँ के विजय स्मारक आर्क दी ट्रंप की ओर जाता है तो दूसरा मिश्र से लाए गए पुराने स्मारक की ओर। फ्रांस के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर लगभग दो किमी लंबी इस सड़क पर मिलिट्री परेड भी होती है। फ्रांस की मशहूर साइकिल रैली Tour de France का  समाप्ति स्थल भी यही है।

पेरिस का राजपथ  Champs Elysees
आर्क दी ट्रंप  की नींव फ्रांस के लोकप्रिय योद्धा और सम्राट नेपोलियन ने अपने विजय अभियान की सफलता के उपलक्ष्य में रखी थी। हालांकि इसका निर्माण उनकी मृत्यु के बाद ही हो सका। इस स्मारक की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये स्मारक पचास मीटर ऊँचा और पैंतालीस मीटर चौड़ा है। इसके चारों स्तंभों पर फ्रांसिसी इतिहास की मुख्य घटनाओं को चित्रित किया गया है। आर्क दी ट्रंप देखने के बाद लगा कि इ्डिया गेट जैसी इमारत बनाने में इसी से प्रेरणा ली गई होगी। बाद में जब नेट पर छानबीन की तो वास्तव में ये बात सही साबित हुई।

आर्क दी ट्रंप पर 1814  के फ्रांससी प्रतिरोध को चित्रित करता शिल्प La Résistance
आर्क दी ट्रंप से चलकर पेरिस के सबसे बड़े चौराहे Place de la Concorde तक पहुँचा जा सकता है। बीस एकड़ से भी ज्यादा क्षेत्र में फैले इस चौराहे का ऐतिहासिक महत्त्व है। एक ज़माने में यहाँ घोड़े पर सवार सम्राट लुइस XV की मूर्ति हुआ करती थी 1789 की फ्रांसिसी क्रांति के बाद लोगों ने इस मूर्ति को चौराहे पर लगी अन्य शाही मूर्तियों के साथ तोड़ डाला। तभी से इस लुइस चौक का पहली बार Place de la Concorde के रूप में नामाकरण किया गया। ये नाम क्रांति के बाद आपसी बातचीत के बाद एक समझौते के होने का प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल हुआ। आज इस चौराहे पर पुरानी इमारतों के आलावा फ़व्वारे और  पत्थर से बना शंकुनुमा स्मारक है।
पेरिस का सबसे बड़े चौराहा : Place de la Concorde (चित्र को बड़ा कर के देखें )
अष्टभुज आकार के इस चौराहे के आठों सिरों पर एक एक मूर्ति लगी है जो फ्रांस के आठ शहरों का प्रतिनिधित्व करती है।
 

चौराहे के उत्तरी सिरे पर सड़क पर सीधे चलते ही यहाँ का पुराना संत मेरी को समर्पित रोमन कैथालिक चर्च मिल जाता है  इस इमारत का निर्माण दक्षिणी फ्रांस में स्थिन प्राचीन रोमन मंदिर की तर्ज पर हुआ। इस चर्च के चारों ओर 52 स्तंभ हैं  जो बीस मीटर ऊँचे  हैं।

रोमन कैथालिक चर्च : La Madeleine
इस चौराहे से पेरिस घुमाने वाली खुली बस भी आपको मिल जाएगी। इसके रंग रूप को देखकर मेरा मन तो इसमें बैठने का तुरंत करने लगा पर हमारी बस तो अलग थी। सो मन मसोस कर रह गए। पेरिस में अगले दिन हमने एफिल टॉवर देखने के बाद वहीं से पैदल भ्रमण शुरु कर लूवर संग्रहालय की ओर रुख किया। कैसी रही वो यात्रा जानिएगा इस श्रंखला की अगली कड़ी में।


यूरोप यात्रा में अब तक
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Monday, July 10, 2017

The Sacred Sorrow of Sparrows : विश्व के अलग अलग कोने में उदास मानव हृदयों को जोड़ती दस कहानियाँ !

The Sacred Sorrow of Sparrows कोई यात्रा वृत्तांत नहीं है इसलिए इस किताब के प्रकाशक नियोगी बुक्स ने इसे मेरे जैसे यात्रा लेखकों के पास समीक्षा हेतु भेजने की इच्छा ज़ाहिर की तो मुझे कौतूहल जरूर हुआ। जब इस संग्रह की कहानियों से पर्दा उठने लगा तो समझ आया कि ये हम जैसे यात्रा प्रेमियों को क्यूँ भेजी गयी है? 

बस समझ लीजिए गर कोई घुमक्कड़ लेखक अपनी यात्राओं के दौरान मिले चरित्रों के इर्द गिर्द घटी घटनाओं को उन शहरों के अक़्स और संस्कृति के साथ आत्मसात करते हुए कहानियों की शक़्ल में परोस दे तो ऍसी किताब सामने आती है।


इस किताब के लेखक सिद्धार्थ दासगुप्ता यूँ तो पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा से विज्ञापन जगत से जुड़े हैं पर यात्रा करना उन्हें शुरु से भाता रहा है। उनका पहला उपन्यास Letters from an Indian Summer पेरिस से लेकर बनारस के गली कूचों तक गुजरा था। The Sacred Sorrow of Sparrows की दस कहानियाँ तो सुदुर पूर्व के टोक्यो से लेकर लखनऊ, दिल्ली, पुणे, मुंबई, दुबई, इस्फहान, इस्तांबुल होते हुए लेबनान जा पहुँचती हैं। लेखक का कहना है कि इन कहानी के चरित्रों के अंदर बहती उदासी ही उन्हें एक सूत्र में जोड़ती है। क्या ऐसा सचमुच है ये जानने के लिए आपको ले चलते हैं इन कहानियों की ओर।

दुबई विस्थापितों का शहर है। अपनी जड़ों से कटे होने के बाद लोग यहाँ एक सुनहरे भविष्य की तलाश में आते हैं। ये शहर उन्हें रोज़ी रोटी तो देता है पर साथ ही अपने घर परिवार से दूर कर देता है। कहानी संग्रह की पहली कथा ऐसे ही एक अफ़गानी बेकर की है जो अपने कनाडा में रह रहे बेटे की वापसी के सपने जोह रहा है। पर क्या वो अपने बेटे के लिए बुने सपनों को वो मूर्त रूप दे पाता है? ये कहानी बताती है कि अपने परिवार की खुशहाली के लिए एकाकी जीवन जीते तमाम प्रवासियों को क्या कुछ खोना पड़ता है।

मेरा बचपन भी रेलवे लाइन की पटरियों के पास के घर में गुजरा है और यही संग्रह की दूसरी कहानी का परिवेश भी है। सिद्धार्थ जब पटरियों से सटे ऍसे ही एक घर के सदस्यों का जीवन एक गुजरती ट्रेन के साथ गूँजती दर्दनाक चीख से जोड़ते हैं तो मन सहम कर कहानी से बँध जाता है। सिद्धार्थ की अगली कहानी गुलमोहर ड्राइव पुणे के पारसी परिवार से जुड़ी एक  कामकाजी युवती की पुराने रिश्तों और अतीत के कृत्यों से हुई आत्मगलानि से उबरने की प्यारी दास्तान है।

आरंभिक कहानियों का ये बंधन संग्रह की अगली कहानियों Reversal and its residues, Dawn's Fatal Betrayal, Once Upon A Mystic Sky और In Symphonies we flow में कमज़ोर कथानक की वज़ह से ढीला पड़ता नज़र आता है। पर In deep sleep  के शहर टोक्यो में नींद से जुदा एक कन्या के जीवन में जब वो डा.ड्रीम का रहस्यमयी चरित्र गढ़ते हैं तो पाठक एक बार फिर विस्मित हो जाता है। The Thousandth Bridge  पुलों को अपनी चित्रकला का विषय बनाने वाली एक लड़की की कहानी है जिसमें लेखक ना केवल ईरान के दूसरे सबसे बड़े शहर इस्फहान के गौरवशाली इतिहास की झलक दिखाते हैं  पर साथ में आज के ईरान के बदलते स्वरूप का अंदाजा भी दे देते हैं।

सिद्धार्थ दासगुप्ता

इतना तो तय है कि जहाँ भी लेखक के कदम पड़े हैं उन्होंने उस जगह को बड़ी नज़दीकी से देखा परखा है। दुबई के मीना बाजार की चहल पहल हो या पुणे का कोरेगाँव पार्क का हरा भरा शांत वातावरण, टोक्यो की रात की रंगीनियाँ हो या इस्तांबुल की उदास गलियाँ सब उनकी लेखनी में सहज उतर जाता है। एक यात्री के नाते अगर आप उन जगहों से गुजरे हैं तो यकीनन सिद्धार्थ का वर्णन पढ़कर आपको खासा आनंद आएगा जैसा कि मेरे साथ टोक्यो से जुड़ी कहानी In deep sleep पढ़ते हुए हुआ। पर लेखक नयी जगहों और उनकी संस्कृति व इतिहास में भी रुचि पैदा करने में सफल रहे हैं। ईरान के इस्फहान के उनके विवरण ने तो मेरे मन में वहाँ जाने की उत्सुकता पैदा कर दी।

अच्छे यात्री के आलावा सिद्धार्थ की लेखनी में एक प्रवाह है,एक कविता है। Once Upon A Mystic Sky में जब वो सूफी संगीत का वर्णन करते हैं तो लगता है मन में रागिनी पैदा हो रही हो। लेखक अपने सूक्ष्म चिंतन से आम सी लगने वाली बातों को भी खास बना देते है। । गुलमोहर के पेड़ को ही ले लीजिए चढ़ती गर्मी में कैसा सुर्ख लाल रंग लिए दहकता है और बारिश की रुत आते आते अपनी रंगीनियत अचानक से खो देता है। सिद्धार्थ अपनी कहानी Gulmohar Drive में इस प्राकृतिक घटना को इंसानी रिश्तों से खूबसूरती से जोड़ते हुए कहते हैं..

"वे बारिश की पहली झड़ी को बर्दाश्त कर लेंगे। यहाँ तक और ज्यादा संख्या में फूल कर वो इस बात की गवाही देंगे कि उनमें उमंग की कोई कमी नहीं हुई है। ऐसा लगने लगेगा कि वो मेरी गली में हमेशा यूँ ही खिलते रहेंगे। जब बारिश तेज होगी, जो कि अभी हो रही है तो उनकी पत्तियाँ सिकुड़ने लगेंगी, रंग फीका पड़ जाएगा, अक़्स मिट जाएगा और अचानक एक दिन वो गायब हो जाएँगे। जैसे वे मेरी ज़िंदगी का, गर्मी की उस पहली तपिश का, बरसात में आने वाली उस सोंधी महक का कभी हिस्सा  थे ही नहीं।"

अपनी प्रस्तावना  में लेखक कहते हैं ये कहानियाँ दुखी करने वाली कहानियाँ नहीं है। आपको दुखी करना मेरा उद्देश्य नहीं है। शायद पुस्तक के शीर्षक को सार्थक करने के लिए उनका ये कहना जरूरी रहा होगा। पर अगर वो ये नहीं कहते तो बेहतर होता क्यूँकि पाठक हर कहानी में एक अनहोनी की प्रतीक्षा में रहता है और कई बार उसका पूर्वानुमान भी लगा लेता है। The Baker from Kabul और Dawn's Fatal Betrayal मैं मैं इसी "predictability" का शिकार हुआ। वहीं कुछ प्रेम कथाओं Reversal and its Residues और In Symphonies We Flow में लेखक विरह की आसन्न अवस्था से उपजे दर्द को कथानक में प्रभावी ढंग से उतार नहीं पाते ।

किताब के समापन का लेखक का अंदाज़ निराला है। सूफ़ियत के रंग में रँगी संग्रह की आख़िरी कहानी में लेखक का नायक एक ऐसी शक्ति का स्वामी बनता है जो लोगों के दुखों को उड़न छू करने की ताकत रखता है। लेखक इस शक्ति का सारी कहानियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए कैसे  इस्तेमाल करते हैं वो तो मैं अभी आपको नहीं बताऊँगा। हाँ, इतना जरूर कहना चाहूँगा कि  अगर आपके मन में पीछे पढ़ी हुई कहानियों को लेकर प्रश्न उमड़ घुमड़ रहे हों तो आखिरी कहानी को ज़रा ध्यान से पढ़ियगा क्यूँकि वहाँ आपको अपने सारे अनुत्तरित प्रश्नों का जवाब मिल जाएगा।

किताब की अंतिम कथा में मानव जीवन से जुड़ा लेखक का अद्भुत चिंतन

चलते चलते वापस लौटते हैं इस किताब के शीर्षक The Sacred Sorrow of Sparrows की ओर। आख़िर ये शीर्षक रखने की लेखक की क्या मंशा थी? लेखक का मानना है कि मनुष्य द्वारा महसूस की जाने वाली भावनाओं में दुख ही है जो सबसे ज्यादा खिंचता है और अनायास ही चला आता है। हर शख़्स उनके बीच एक छोटी सी गौरैया की तरह अपने पंख फड़फड़ाता है, उनको सहता है और उनके बीच आशा की किरण जगा कर जीता है।

किताब की  जो बातें मुझे पसंद आयीं और जो नापसंद रहीं उसकी चर्चा तो मेंने कर दी। अगर दुनिया के अलग अलग कोने में अपनी सामान्य सी ज़िदगी  जीते इन किरदारों की उदासी में आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आमेजन से ये किताब यहाँ खरीद सकते हैं। मेरे द्वारा की गयी पुस्तक चर्चाओं की सूची आप यहाँ भी देख सकते हैं।

Sunday, July 2, 2017

एफिल टॉवर : बुद्धिजीवियों के अनुसार जो थी बेकार सी दैत्याकार संरचना ! Do you know Eiffel was once described as giant ridiculous tower !

मोनपारनास टॉवर की ऊँचाइयों को छू लेने के अगले दिन जब हम एफिल टॉवर की ओर बढ़े तो मन में ऐसा कोई उत्साह नहीं था। वैसे भी हम शहर में घुसते ही ट्रोकाडीरो और फिर मोनपारनास टॉवर से इस की झलक पा ही चुके थे। उत्साह की कमी की एक वज़ह यहाँ लगने वाली लोगों की लंबी कतारें थीं। इतनी दूर आकर अपना कीमती समय पंक्ति में लग कर बर्बाद करना मुझे ऐसी जगहो से दूर खींचता है। पर एफिल टॉवर ना जाना तो ऐसा ही है जैसे कोई आगरे जा कर भी ताज महल करीब से निहारे बिना चला जाए। वैसे तो हमारी टिकटें पहले ही ली जा चुकी थीं फिर भी संसार के विभिन्न देशों से आए पर्यटकों के मेले के बीच पौन घंटे से ऊपर  मुझे प्रतीक्षा में गुजारने पड़े।

एफिल टॉवर
पेरिस भारत के कोलकाता की तरह एक सांस्कृतिक नगरी तो है ही साथ ही यहाँ अन्य यूरोपीय देशों के आलावा, अफ्रीकी मूल के लोग भी बसते हैं। हमारे टूर मैनेजर ने ऐसी भीड़ भाड़ वाली जगहों पर सचेत रहने की सलाह दे रखी थी।  पेरिस में पासपोर्ट और पैसों की चोरी से जुड़ी कई घटनाओं के बारे में मैं पहले भी सुन चुका था।

हमारा समूह जहाँ कतार में लगा था वहीं एक युवा यूरोपीय युवती अपनी माँ की उम्र की महिला के साथ खड़ी थी। वे लोग ना पंक्ति में थे और ना ही वहाँ से जा रहे थे। मैंने अपने समूह को उसके बारे में बता दिया पर उन पर निगाह बनाए रखी। सैकड़ों मीटर लंबी लाइन के बढ़ते ही मैंने देखा कि वे दोनों चुपके से पंक्ति के बीचो बीच घुस गयीं। भारतीय प्रवृति की यूरोप के इस आलीशान शहर में पुनरावृति होते देख मन ही मन हँसी आई। 



अब कतार में अपनी जगह तो समूह के अन्य सदस्य सँभाल ही रहे थे तो मैंने सोचा क्यूँ ना तब तक लोहे के इस बेमिसाल ढाँचे को करीब से देख लिया जाए। एफिल टॉवर का इलाका चैम्प डे मार्स के हरे भरे इलाके के बीच बना है। एफिल टॉवर बनने के पहले ये क्षेत्र मैदान की शक़्ल में था जिसे बाद में फ़्रांसिसी फौज़ की परेड और अन्य सैन्य गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। मोनपारनास  से लिए गए इस चित्र में चैम्प डे मार्स का हरा भरा इलाका देख सकते हैं।


जब मैंने आपको मोनपारनास टॉवर से एफिल की छवि दिखाई थी तो एक सवाल उठा था कि सारी पोस्ट तो मोनपारनास टॉवर  से जुड़ी थी पर आपने तो उसे दिखाया ही नहीं?  दरअसल टॉवर की दूर से ली हुई फोटो मैंने इस आलेख के लिए सँभाल कर रखी हुई थी। जब हम एफिल पर चढ़े तो हमें सामने ही मोनपारनास टॉवर अपना सीना ताने दिखाई पड़ा। अब आप भी बताइए एक सा स्थापत्य और रंग रोगन लिए पेरिस के केंद्रीय जिले की इमारतों के बीच इस टॉवर को यहाँ के लोग व्यंग्य से ही सही काले दानव के रूप में पुकारें तो क्या गलत है?

एफिल से दिखता चैम्प डे मार्स , Ecole Militaire,और  मोनपारनास टॉवर
टॉवर के पीछे इस उद्यान का फैलाव यहाँ की एक और मशहूर इमारत Ecole Militaire से लेकर सीन नदी तक है। Ecole Militaire एक सैन्य प्रशिक्षण संस्थान है जिसके आहाते के अंदर कई इमारते हैं। इसका इतिहास कितना पुराना है वो आप इसी बात से समझ सकते हैं कि नेपोलियन बोनापार्ट जैसे शूरवीर योद्धा ने इसी संस्थान में अपनी सैन्य शिक्षा ली थी।

नदी के दूसरी ओर एफिल टॉवर की सीध में ट्रोकाडीरो और उससे सटा एक दूसरा उद्यान है। पेरिस में अगर रात को जगमगाती रोशनी के बीच एफिल टॉवर को देखना हो तो ट्रोकाडीरो से अच्छी जगह कोई नहीं है। एक ज़माने में यहाँ पहाड़ी के ऊपर ट्रोकाडीरो का महल था जिसे आज से आठ दशक पहले तोड़ दिया गया। इसके बदले जो महल बना उसे फ़्रांसिसी जुबान में पली डे शायो कहते हैं। यह अर्धचंद्राकार भवन दो अलग अलग हिस्सों में बँटा है और इसके बीच का खुला हिस्सा सैलानियों के लिए एफिल टॉवर को निहारने का मौका देता है। आज इस महल के अंदर कई संग्रहालय हैं। वैसे अगर कोई पेरिस के सारे संग्रहालयों को तबियत से देखने की ठान ले तो एक साल का समय भी कम होगा।

सीन नदी और उससे सटा ट्रोकाडीरो उद्यान व महल
चहलकदमी करता मैं टॉवर के बिल्कुल करीब पहुँच चुका था। 324  मीटर ऊँचे इस टॉवर को इसके एकदम पास पहुँच कर कैमरे में क़ैद करना एक टेढ़ी खीर है।


टॉवर में तीन तल है । नीचे से पहले और पहले से दूसरे तक पहुँचने के लिए तीन सौ सीढ़ियाँ तय करने पड़ती हैं। इसके ऊपर एक तीसरा तल भी हैं जहाँ केवल लिफ्ट से पहुँचा जा सकता है। फोटोग्राफी के लिए दूसरा तल सबसे बेहतरीन माना जाता है जबकि तीसरे तल तक पहुँच कर आप पेरिस की चौहद्दियों को भली भांति देखने का रोमांच पा सकते हैं बशर्ते इसके लिए आपकी जेब में मोटी रकम हो। आज एफिल टावर पेरिस की शान है पर क्या आप जानते हैं कि इसके जनक गुस्ताव एफिल ने जब पहली बार इस ऊँचे टावर के निर्माण का प्रारूप बनाया था तो समाज के बुद्धिजीवी वर्ग ने किन शब्दों में इसकी आलोचना की थी
"हम लेखक, चित्रकार, शिल्पकार, वास्तुकार और पेरिस की अनछुई सुंदरता के पुजारी अपनी पूरी ताकत से फ्रांसवासियों की रुचियों के साथ अनादर करते इस बेकार से दैत्याकार एफिल टॉवर का  विरोध करते हैं। हमारी बात समझने के लिए ज़रा कल्पना कर देखिए। क्या आप चाहेंगे कि एक असंतुलित सा वाहियात टॉवर पेरिस के आकाश को काली चिमनी की तरह अपने विशालकाय स्वरूप से इस तरह ढक ले जिससे नाटर्डम, लेज़नवालीद का गुंबद, आर्क डे ट्रंप और लूवर जैसे भवन अपने को अपमानित सा महसूस करते हुए एक भयावह सपने की तरह खो से जाएँ और फिर बीस सालों तक स्याही के धब्बे की तरह लोहे के टुकड़ों से बोल्ट किए गए इस घृणास्पद ढाँचे को हम बढ़ता देखें ?"
कभी कभी बुद्धिजीवियों की सोच भी एक सीमित बँधे बँधाये दायरे में सिमट कर रह जाती है। एफिल टॉवर का इतने कड़े शब्दों में किया विरोध ऐसी ही सोच का उदहारण है। इतने विरोध के बाद भी 1889 के पेरिस में आयोजित विश्व मेले के मुख्य गेट के रूप में ये टॉवर बना और आज ये पेरिस का प्रतीक है।

एफिल टॉवर के ठीक नीचे At the base of the Eiffel Tower
एफिल का आधार 125 मीटर के वर्ग में फैला हुआ है। एफिल टॉवर बनाते वक़्त एक बड़ी चुनौती इसके संकरे हिस्से से ऊपर के तल तक लिफ्ट ले जाने की थी जिसे मशहूर लिफ्ट कंपनी ओटिस की मदद से पार किया गया।

एफिल टॉवर पर तीन पीढ़ियाँ
एफिल टॉवर पर जब हम लिफ्ट से ऊपर आए तो आसमान में बादल छा चुके थे। तेज़ ठंडी हवा ने हालात ऐसे कर दिए कि कनटोप के बिना वहाँ खड़े रहना भी मुश्किल हो गया। मेरी यूरोप यात्रा का ये सबसे ठंडा दिन था।

नदी की ओर जाता टॉवर के नीचे का चौराहा
सीन नदी  River Seine
एफिल टॉवर से दिखते दृश्य इसके बगल में बहती सीन नदी की वजह से और खूबसूरत हो जाते हैं। पेरिस में इस नदी के ऊपर करीब तीन दर्जन पुल बने हैं। पेरिस के ज्यादातर आकर्षण इस नदी पर चलते क्रूज से देखे जा सकते हैं और अगर क्रूज रात का हो तब तो रोशनी से नहाए एफिल टॉवर को देखने का अलग ही आनंद है। 


वैसे सीन इस ऐतिहासिक नगर को एक रूमानी रंग जरूर देती है पर जब जब बारिश की वज़ह से इस नदी में बाढ़ के हालात बनते हैं तो ये शहर सहम सा जाता है। ऐसा इसलिए है कि पेरिस के संग्रहालयों के तहखानों में तमाम कलाकृतियाँ इस बाढ़ का पहला निशाना बन जाती हैं। कई बार ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने से पहले इन्हें शहर से बाहर पहुँचाया गया है।


तो ये था मेरी एफिल टॉवर यात्रा का लेखा जोखा। पेरिस दर्शन की अगली कड़ी में आपको ले चलेंगे एफिल से लूवर तक की पैदल यात्रा पर और बताएँगे कि इतनी मेहनत के बाद भी क्या हम मोनालिसा से मिल पाए?

यूरोप यात्रा में अब तक
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Sunday, June 18, 2017

कैसा दिखता है पेरिस मोनपारनास टॉवर से ? : An evening in Paris from top of Tour Montparnasse

बेल्जियम से फ्रांस की सीमाओं में दाखित होते ही बारिश की झड़ी लग गयी। बारिश की रिमझिम में एफिल टॉवर की पहली झलक भी मिली। पर एफिल टॉवर पर चढ़ाई करने से पहले हम पेरिस के केन्द्रीय जिले की सबसे ऊँची इमारत मोनपारनास टॉवर पर पहुँचे। ये 59 मंजिला इमारत यहाँ की दूसरी सबसे ऊँची बहुमंजिली इमारत है।

यूरोप की सांस्कृतिक राजधानी पेरिस
केंद्रीय जिले में ये इकलौती इमारत है जो दो सौ मीटर से भी ऊँची है। आज से लगभग पैंतालीस साल पहले जब ये इमारत बनी तो लंदन की तरह ही इस कदम की व्यापक आलोचना हुई। लोगों ने इसे पेरिस शहर के चरित्र को नष्ट करने वाला भवन माना। विरोध इतना बढ़ा कि एफिल टॉवर के आस पास के केंद्रीय इलाके में सात मंजिल से ज्यादा ऊँचे भवनों पर रोक लगा दी गयी। विगत कुछ वर्षों में पेरिस शहर पर जनसंख्या के दबाव की वज़ह से ये रोक कुछ हल्की की गयी है। पर मोनपारनास टॉवर बनाने वालों पर लोगों का नज़रिया फ्रेंच ह्यूमर में झलक जाता है जब यहाँ के लोग कहते हैं कि टॉवर के ऊपर से पेरिस सबसे खूबसूरत दिखाई देता है क्यूँकि वहाँ से आप इस बदसूरत टॉवर को नहीं देख सकते 😀।

सटे सटे भवन और खूबसूरत टेरेस गार्डन
अब हँसी हँसी में कही हुई इस बात में कितनी सच्चाई है वो आप मेरे साथ इमारत के छप्पनवें तल्ले तक चल कर ख़ुद देख सकते हैं आज के इस फोटो फीचर में। जब हमारा समूह इस टॉवर के पास पहुँचा तो शाम के साढ़े छः बज रहे थे। बारिश थम चुकी थी और धूप बादलों के बीच से आँख मिचौनी खेल रही थी। मन में संदेह था कि कहीं बादलों के बीच ऊपर का नज़ारा धुँधला ना जाए। इस उहापोह के बीच लिफ्ट पर चढ़े। क्या फर्राटा लिफ्ट थी वो। मात्र 38  सेकेंड में 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से 56 वें तल्ले तक पहुँच गई।


पेरिस की पहली झलक में आड़ी तिरछी गलियों और एक जैसे लगते भवनों के बीच जो भव्य इमारत दूर से ही मेरा ध्यान खींचने में सफल हुई वो थी लेज़नवालीद जिसका नामकरण संभवतः अंग्रेजी के Invalid शब्द से हुआ हो। दरअसल सुनहरे गुंबद की वज़ह से दूर से ही नज़र आने वाला ये भवन सेवानिवृत और विकलांग जवानों के रहने के लिए बनाया गया था।

Les Invalides लेज़नवालीद

तब इस परिसर में एक अस्पताल भी था। बाद में सैनिकों के पूजा पाठ के लिए यहाँ चर्च और उसके ऊपर का सुनहरा गुंबद बना। फ्रांस के प्रसिद्ध योद्धा नेपोलियन की समाधि इसी गुंबद वाले हॉल में है। आज इस इलाके में चार संग्रहालय हैं। अब तक पेरिस की प्राचीन इमारतों के डिजाइन में एक साम्यता आपने महसूस कर ली होगी। वो ये कि पीले रंग की इन इमारतों की घुमावदार छतें स्याह रंग से रँगी हैं।
पेरिस का विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय लूवर
संग्रहालय के सामने संत जरमेन एक चर्च है जिसके आसपास का इलाका फ्रेंच फैशन डिजाइनर्स का गढ़ माना जाता है। लूवर के काफी पीछे एक पहाड़ी के ऊपर "Sacred Heart of Jesus" को समर्पित एक सुंदर सी बज़िलका है। चित्र लेते समय वहाँ बदली छाई थी सो वो स्पष्ट आ नहीं पायी।

एफिल टॉवर

Wednesday, June 7, 2017

बिष्णुपुर की शान : संगीत, शिल्प और परिधान ! Art and Crafts of Bishnupur

बिष्णुपुर को सिर्फ मंदिरों का शहर ना समझ लीजिएगा। मंदिरों के आलावा बिष्णुपुर कला और संस्कृति के तीन अन्य पहलुओं के लिए भी चर्चित रहा है। पहले बात यहाँ की धरती पर पोषित पल्लवित हुए संगीत की। बिष्णुपुर की धरती पर कदम रख कर अगर आपने यहाँ के मशहूर बिष्णुपुर घराने के गायकों को नहीं सुना तो यहाँ के सांस्कृतिक जीवन की अनमोल विरासत से आप अछूते रह जाएँगे। बिष्णुपुर घराना पश्चिम बंगाल में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ध्रुपद गायन शैली का गढ़ रहा है। ये मेरा सौभाग्य था कि जिस दिन मैं बिष्णुपुर पहुँचा उस वक्त वहाँ के वार्षिक मेले में स्थानीय प्रशासन की ओर से इलाके के कुछ होनहार संगीतज्ञों को अपनी प्रस्तुति के लिए बुलाया गया था। दिन के भोजन के पश्चात यहाँ के संग्रहालय को देखते हुए मैं  इस मेले तक जा पहुँचा।

छोटे से भोले भाले गणेश जी
मेले में चहल पहल तो पाँच बजे के बाद ही शुरु हुई। मैदान की एक ओर एक स्टेज बना हुआ था जिसके सामने ज़मीन पर जनता जनार्दन के बैठने के लिए दरी बिछाई गयी थी। दिसंबर के आखिरी हफ्ते की हल्की ठंड के बीच पहले पकौड़ों के साथ चाय की तलब शांत की गयी और फिर पालथी मार मैं वहीं दरी पर आसीन हो गया। शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में वैसे भी भीड़ ज्यादा नहीं होती। यहाँ भी नहीं थी पर युवा कलाकारों को अपने साज़ के साथ शास्त्रीय संगीत के सुरों को साधने का प्रयास ये साबित कर गया कि यहाँ की प्राचीन परंपरा आज के प्रतिकूल माहौल में भी फल फूल रही है। 

पर संगीत की ये परंपरा यहाँ पनपी कैसे? मल्ल नरेशों ने टेराकोटा से जुड़ी शैली को विकसित करने के साथ साथ कला के दूसरे आयामों  को भी काफी प्रश्रय दिया। इनमें संगीत भी एक था। ऍसा कहा जाता है कि बिष्णुपुर घराने की नींव तेरहवीं शताब्दी में पड़ी पर इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हैं।  इतिहासकारों ने इस बात का उल्लेख जरूर किया है कि औरंगजेब के ज़माने में जब कलाकारों पर सम्राट की तिरछी निगाहें पड़ीं तो उन्होंने आस पास के सूबों में जाकर शरण ली। तानसेन के खानदान से जुड़े ध्रुपद गायक और वादक बहादुर खान भी ऐसे संगीतज्ञों में एक थे। उन्होंने तब बिष्णुपुर के राजा रघुनाथ सिंह द्वितीय के दरबार में शरण ली। उनकी ही शागिर्दी में बिष्णुपुर घराना अपने अस्तित्व में आया।
बाँकुरा के मशहूर घोड़े

संगीत का आनंद लेने के बाद यहाँ के हस्तशिल्प कलाकारों की टोह लेने का मन हो आया। बिष्णुपुर के मंदिरों के बाद अगर किसी बात के लिए ये शहर जाना जाता है तो वो है बांकुरा का घोड़ा। ये घोड़ा बांकुरा जिले का ही नहीं पर समूचे पश्चिम बंगाल के प्रतीक के रूप में विख्यात है। बंगाल या झारखंड में शायद ही किसी बंगाली का घर हो जिसे आप घोड़ों के इन जोड़ों से अलग पाएँगे। हालांकि विगत कुछ दशकों में ये पहचान अपनी चमक खोती जा रही है। एक समय टेराकोटा से बने इन घोड़ों का पूजा में भी प्रयोग होता था पर अब ये ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाने का सामान भर रह गए हैं।

नारंगी और भूरे रंग में रँगे ये घोड़े यहाँ कुछ इंचों से होते हुए तीन चार फुट तक की ऊँचाई में मिलते हैं। अपने मुलायम भावों और सुराहीदार गर्दन लिए ये बाजार में हर जगह आपको टकटकी लगाए हुए दिख जाएँगे। इनकी बटननुमा आँखों को देखते देखते इनके सम्मोहन से बचे रहना आसान नहीं होता।
थोड़ी सी मिट्टी गढ़ती कितने सजीले रूप !
टेराकोटा यानी पक्की हुई मिट्टी से खिलौने बनाने की ये कला बिष्णुपुर  और बांकुरा के आस पास के गाँवों में फैली पड़ी है। अगर समय रहे तो आप इन खिलौंनों को पास के गाँवों में जाकर स्वयम् देख सकते हैं। घोड़ों के आलावा टेराकोटा से गढ़े गणेश, पढ़ाई करती स्त्री, ढाक बजाते प्रौढ़, घर का काम करती महिलाएँ आपको इन हस्तशिल्प की दुकानों से जगह जगह झाँकती मिल जाएँगी। मेले में ग्रामीण इलाकों से आए इन शिल्पियों से इन कलाकृतियों को खरीद कर बड़ा संतोष हुआ। इनकी कीमत भी आकार के हिसाब पचास से डेढ़ सौ के बीच ही दिखी जो की बेहद वाज़िब लगी। 

टेराकोटा की इन कलाकृतियों में एक बात गौर करने लायक थी। वो ये कि यहाँ के शिल्पी मानव शरीर को आकृति देते समय हाथ व पैर पतले तो बनाते  हैं पर साथ ही इनकी लंबाई भी कुछ ज्यादा रखते हैं ।
टेराकोटा के बने शंख

यूँ तो शंख का उद्घोष तो हिंदू धर्म में आम है पर बंगाली संस्कृति का ये एक अभिन्न अंग है। धार्मिक अनुष्ठान हो या सामाजिक क्रियाकलाप बंगालियों में कोई शुभ अवसर बिना शंख बजाए पूरा नहीं होता। शादी के फेरों से लेकर माँ दुर्गा की अराधना में इसकी स्वरलहरी गूँजती रहती है। पर टेराकोटा के बने शंख पहली बार मुझे बिष्णुपुर में ही दिखाई पड़े।

इनकी चमक के क्या कहने !
टेराकोटा से तो बिष्णुपुर की पहचान है पर अन्य यहाँ जूट, बाँस व मोतियों से बने हस्तशिल्प भी खूब दिखे।

जूट के रेशे से बनी गुड़िया

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