Tuesday, June 5, 2018

द्रास युद्ध स्मारक : कैसे फतह की हमने टाइगर हिल की चोटी? Drass War Memorial

श्रीनगर लेह राजमार्ग से हम सोनमर्ग, जोजिला, द्रास घाटी होते हुए हमारा समूह अब द्रास कस्बे से कुछ ही किमी दूर था। द्रास घाटी से साथ चलने वाली द्रास नदी रास्ते में मिलने वाले ग्लेशियर की बदौलत फूल कर और चौड़ी हो गयी थी। जोजिला के बाद बर्फ की तहों के बीच आँख मिचौनी करती ये नदी अब पिघल कर पूरे प्रवाह के साथ बह रही थी।

द्रास युद्ध स्मारक का मुख्य द्वार

द्रास नदी का अस्तित्व कारगिल से करीब सात किमी पहले तब खत्म हो जाता है जब ये कारगिल की ओर से आने वाली सुरु नदी में मिल जाती है। हरे भरे चारागाहों से पटे इन  इलाकों में सर्दियों में जम कर बर्फबारी होती है जिसकी वजह से यहाँ जीवन यापन करना बेहद कठिन है। 




बारह सौ की आबादी वाले इस इलाके में सेना के जवानों के आलावा दार्द जनजाति के लोग निवास करते हैं जो किसी ज़माने में उत्तर पश्चिम दिशा से तिब्बत के रास्ते यहाँ आए थे। इनकी भाषा को दार्दी का नाम दिया जाता है जो लद्दाख की बोलियों से मिलती जुलती है। उन्नीसवीं शताब्दी में यहाँ आने वाले अंग्रेज इतिहासकारों ने द्रास के लोगों द्वारा कश्मीरी और लद्दाखी राजाओं को कर देने की बात का उल्लेख किया है। कश्मीरी राजाओं के प्रभाव का एक प्रमाण यहाँ मिट्टी के एक किले के रूप में भी झलकता है जिसके छोटे मोटे अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।

द्रास नदी की कलकल धारा

द्रास का ये दुर्भाग्य ही था कि इतनी खूबसूरत घाटी में बसे इस कस्बे को असली शोहरत कारगिल युद्ध की वजह से आज से लगभग बीस साल पहले 1999 में मिली। कारगिल युद्ध में दो प्रमुख चोटियों टाइगर हिल और तोलोलिंग, द्रास के इलाके में स्थित थीं इसलिए ये कस्बा युद्ध का प्रमुख केंद्र रहा। फरवरी 1999 का  महीना था जब पाकिस्तान ने द्रास, कारगिल और बतालिक इलाके में अपनी टुकड़ियाँ भेजनी शुरु कर दी थीं। अप्रैल में ये घुसपैठ अपने चरम पर थी पर भारतीय सेना इस सौ वर्ग किमी से भी ज्यादा के क्षेत्रफल में हो रही इतनी बड़ी घुसपैठ से अनभिज्ञ थी। मई के दूसरे हफ्ते में बतालिक सेक्टर के स्थानीय गड़ेरियों द्वारा दी गई ख़बर सेना के हाथ लगी। कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व में एक खोजी दस्ता बतालिक सेक्टर में स्थित चोटियों के साथ रवाना हुआ और ऊँचाई पर जमे दुश्मन की गोलियों का शिकार बना।


जब भारत को इस व्यापक घुसपैठ का अंदाजा हुआ तो आपरेशन विजय के नाम से एक अभियान शुरू हुआ जिसके  तहत  सेना की कई टुकड़ियों को  कारगिल और उसके आसपास के इलाकों के लिए रवाना किया गया। इस इलाके तक सेना को रसद और साजो सामान पहुँचाने के लिए सिर्फ श्रीनगर लेह राजमार्ग ही था। दिक्कत ये थी कि द्रास से सटी चोटियों पर दुश्मन पहले से ही घात लगाकर हमला करने के लिए तैयार बैठा था। उसकी मारक क्षमता के अंदर समूचा राजमार्ग था और इस रास्ते पर दुश्मन ने ताबड़तोड़ हमले कर जान माल को काफी क्षति भौ पहुँचाई। हालात ये थे कि सेना ने इस सड़क के किनारे अपने बचाव के लिए दीवाल का निर्माण किया जिसके कुछ हिस्से आज भी द्रास जाते वक़्त देखे जा सकते हैं।

दुश्मन के गोले बारूद की मार से बचने के लिए बनाई गयी दीवार

भारतीय सेना की प्रथम प्राथमिकता श्रीनगर लेह मार्ग से सटी चोटियों पर कब्जा जमाने की थी ताकि लेह तक सेना को रसद पहुँचाने वाले रास्ते पर गाड़ियों का आवगमन सही तरीके से हो। द्रास के पास सबसे ऊँची चोटी टाइगर हिल की थी जिसके ऊपर दुश्मन ने करीब दर्जन भर बंकर बना रखे थे। दिन में जवानों को इस खड़ी चढ़ाई वाले पहाड़ों पर भेजना सीधे सीधे मौत को आमंत्रण देना था। रात के वक़्त अँधेरे में बिना आवाज़ किए बढ़ना ही एकमात्र विकल्प था। चोटियों के पास तापमान शून्य से दस से बारह डिग्री कम था पर भारतीय सेना के जवानों ने ये कठिन चुनौती भी स्वीकारी। यही वजह रही कि आरंभिक लड़ाई में सेना के सैकड़ों जवान ऊपर से हो रही अंधाधुंध  गोली बारी  का शिकार हुए। 

भारत चाहता तो LOC पार कर दुश्मन को पीछे से घेरकर उसकी रसद के रास्ते बंद कर उसे नीचे उतरने पर मजबूर कर सकता था। पर पाकिस्तान को हमलावर साबित करने के अंतरराष्ट्रीय दबाव को बढ़ाने के लिए ऐसा नहीं किया गया और इस वजह से एक एक चोटी फतेह करने के लिए यहाँ ऐसा खूनी संघर्ष हुआ जिसमें दोनों ओर के सैनिकों को भारी संख्या में अपने प्राणों  की आहुति देनी पड़ी।

16600 फीट ऊँची टाइगर हिल की चोटी
गाड़ीवाला हमें गाड़ी रोक कर टाइगिर हिल की ओर इशारा कर रहा था। हम द्रास के कस्बे में प्रवेश कर चुके थे। हरे भरे पेड़ों और खेतों से अटे कस्बे में ऐसे भीषण युद्ध के होने की बात सपने में भी सोची नहीं जा सकती थी। अगर यहाँ गोलों से दगी दीवारें और वार मेमोरियल नहीं बना होता तो शायद हम सब इसे एक रमणीक पर बेहद ठंडे कस्बे से ज्यादा अपनी यादों में कहाँ समा पाते? पर अब तो ये देश के विभिन्न भागों से युद्ध में भाग लेने आए सैनिकों की वीर गाथा की जीती जागती तस्वीर बन गया है। क्या बिहार, क्या जाट, क्या सिख, क्या गोरखा, क्या नागा, क्या अठारह ग्रेनेडियर कितनी सारी रेजिमेंट्स ने इस युद्ध में एक दूसरे का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।

 हरा भरा द्रास

टाइगर हिल के फतह की कहानी तो आज की तारीख में कई फिल्मों का हिस्सा बन गयी है। यहाँ आने वाले हर आंगुतक को सेना के जवान समूह में इकठ्ठा कर टाइगर हिल, तोलोलिंग हिल और उसके आस पास की दुर्गम चोटियों पर भारतीय सेना द्वारा अत्यंत विकट परिस्थितियों में अद्भुत पराक्रम की इस अमर दास्तान को सबसे बाँटते हैं। ये घटनाएँ ऐसी हैं जो आँखों में युद्ध की विभीषका से एक ओर तो नमी भर देती हैं तो दूसरी ओर हमारे वीर सपूतों की शौर्य गाथा को सुन मन नतमस्तक हो जाता है। टाइगर हिल की ही बात करूँ तो इसे कब्जे में लेने के लिए नागा, सिख और अठारह ग्रेनेडियर की टुकड़ियों ने हिस्सा लिया। बाँयी और दाहिनी ओर से नागा और सिख रेजीमेंट की टुकड़ियाँ आगे बढ़ीं जबकि पीछे से अठारह ग्रेनेडियर ने खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए हमले की योजना बनाई। 

हरे भरे खेतों के पीछे से झांकती टाइगर हिल की चोटी

रात के अँधेरे में योगेद्र सिंह यादव की अगुआई में घातक कंपनी के जवानों ने चढ़ाई आरंभ की। यादव ने ऊपर तक पहुँचने के लिए रस्सियों को बाँधने का काम अपने जिम्मे लिया। जब वे शिखर से साठ फीट नीचे थे तो दुश्मनों ने उन्हें देख लिया और मशीनगन से उनकी टुकड़ी पर हमला बोल दिया। प्लाटून कमांडर सहित दो जवान वहीं वीरगति को प्राप्त हुए पर कई गोलियाँ खाकर भी योगेंद्र ने ऊपर बढ़ना जारी रखा। उसी हालत में वो ऊपर पहुँचे और अपने सामने के बंकर पर ग्रेनेड से हमला कर उसे तबाह कर दिया। योगेंद्र का ये दुस्साहस पीछे से आने वाली टुकड़ियों के लिए टाइगर हिल तक रास्ता बनाने का ज़रिया बना।

इसी तरह 8 सिख रेजीमेंट के जवान जब शिखर के पास पहुँचने लगे तो सामने से हो रही गोलाबारी में आड़ लेने का कोई विकल्प उनके पास मौजूद नहीं था। मौत का संदेश लिए कोई गोली कभी भी उनके सीने के पार हो सकती थी। ऐसे में शत्रुओं के हताहत जवानों को ढाल की तरह  इस्तेमाल करते हुए शिखर पर पहुंचने में सफलता प्राप्त की और दुश्मनों से हाथों हाथ की लड़ाई में हरा कर टाइगर हिल के दूसरे हिस्से पर कब्जा जमाया।

युद्ध स्मारक में प्रदर्शित मिग 21 विमान
द्रास का युद्ध स्मारक तीन हिस्सों में बँटा है। मुख्य द्वार से विजय पथ के रास्ते अमर जवान ज्योति तक जाया जा सकता है। अमर जवान ज्योति पर कवि माखन लाल चतुर्वेदी की लिखी लोकप्रिय कविता "पुष्प की अभिलाषा अंकित हैं।

चाह नहीं, मैं सुरबाला के 
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,

जिस पथ पर जावें वीर अनेक!

गुलाबी पत्थरों से बने इस स्मारक के ठीक पीछे एक दीवार बनी है जिसमें पीतल की चादर पर शहीदों के नाम लिखे हुए  हैं। इसके ठीक पीछे सौ फीट की ऊँचाई पर भारत का विशाल ध्वज  है जिसे आप स्मारक में प्रवेश करते हुए दूर से ही  देख पाते हैं। 

अमर जवान ज्योति 

कारगिल युद्ध की शौर्य गाथा बयाँ करता सैनिक

स्मारक के एक हिस्से में एक छोटा सा संग्रहालय  बनाया गया है जिसे गोरखा रेजीमेंट के जवान मनोज पांडे के नाम पर रखा गया है। इस संग्रहालय के अंदर युद्ध में प्रयोग और दुश्मनों से बरामद हथियारों के आलावा, अलग अलग चोटियों पर सेना के विभिन्न दस्तों के आगे बढ़ने के मार्गों को विभिन्न मॉडल से दर्शाया गया है। साथ ही उस वक्त की तस्वीरों और बधाई संदेशों को भी यहाँ प्रदर्शित किया गया है। इसी से सटा यहाँ एक वीडियो कक्ष भी है। 
 वीर भूमि

स्मारक के तीसरे हिस्से का नाम वीर भूमि रखा गया है। यहाँ शहीद जवानों के नाम पर एक एक पट्टिका बनाई गयी है। इनके बीच से गुजरना मन को अनमना कर देता है। सेना की ओर से यहाँ एक भोजनालय भी चलाया जाता है।

टाइगर हिल की फतह का निरूपण

कारगिल युद्ध में पुरस्कृत होने वाले जवान। पहली पंक्ति में सबसे बाँए योगेद्र सिंह यादव  की तस्वीर है।


भले ही दो महीने के भीतर भारत ने  कारगिल युद्ध जीत लिया पर इस दौरान देश ने पाँच सौ से अधिक सैनिक खोए। द्रास से गुजरना हमेशा इन शहीदों की शहादत को याद दिलाता रहेगा। मैंने ये देखा कि यहाँ जब दूर दराज के लोग आते हैं तो उन्हें देख कर यहाँ पदस्थापित जवानों का मनोबल बढ़ता है। इसलिए जब भी आप श्रीनगर से कारगिल जाएँ यहाँ घंटे दो घंटे का वक़्त अवश्य बिताएँ।

लद्दाख की इस यात्रा का अगला पड़ाव होगा कारगिल जहाँ अचानक ही मुलाकात हुई एक संगीतकार से जो सारेगामापा में कई बार जज की भूमिका निभा चुके हैं। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें।

Saturday, May 26, 2018

मुसाफ़िर हूँ यारों ने पूरे किए अपने दस साल ! Musafir Hoon Yaaron 10th Blog Anniversary !

मुसाफ़िर हूँ यारों ने अपने जीवन के दस साल पिछले महीने पूरे कर लिए। यूँ तो ब्लागिंग करने का मेरा ये सिलसिला तेरह साल पुराना है। शुरुआत रोमन हिंदी ब्लॉग से मैंने 2005 में की क्यूँकि तब यूनिकोड की सुविधा सारे आपरेटिंग सिस्टम में आयी नहीं थी। रोमन से देवनागरी में टंकण सीखने के बाद 2006 अप्रैल में एक शाम मेरे नाम की नींव रखी गयी। ब्लागिंग के उस शुरुआती दौर में सारा कुछ एक ही थाली में परोसने की परंपरा थी। मैंने भी ब्लागिंग के अपने पहले दो सालों में गीत, ग़ज़लों, किताबों के साथ यात्रा वृत्तांत भी एक शाम मेरे नाम पर ही लिखे। 



पर वक़्त के साथ मुझे लगने लगा कि ब्लॉग विषय आधारित होने चाहिए और इसीलिए मुझे संगीत और यात्रा जैसे अपने प्रिय विषयों को दो अलग अलग वेब साइट्स पर डालने की जरूरत महसूस हुई। संगीत और साहित्य जहाँ एक शाम मेरे नाम की पहचान बना वहीं अपने यात्रा लेखन को एक जगह व्यवस्थित करने के लिए 2008 अप्रैल में मुसाफ़िर हूँ यारों अस्तित्व में आया। हिंदी में यात्रा ब्लागिंग की ये शुरुआती पहल थी जो अगले कुछ सालों में तेजी से फैलती गयी। आज हिंदी में सैकड़ों यात्रा ब्लॉग हैं जिसमें लोग अपने संस्मरणों को सजों रहे हैं। 

इस ब्लॉग की पहली पोस्ट

व्यक्तिगत रूप से सफ़र का सिलसिला जारी रहा। आपको भारत के कोने कोने से लेकर विदेशों की भी सैर कराई। इस ब्लॉग पर लगभग चार सौ आलेख व फोटो फीचर्स लिख चुका हूँ।  हिंदी में यात्रा लेखन करते हुए मेरा ये उद्देश्य रहा है कि इसे उस स्तर पर ले जा सकूँ जहाँ इसे अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं में हो रहे काम के समकक्ष आँका जाए।  इस सतत प्रयास से विगत कुछ वर्षों में इस ब्लॉग की जो उपलब्धियाँ रहीं है उनमें कुछ का जिक्र आप यहाँ देख सकते हैं। 

राहें जो तय हो चुकीं ,  Places covered in this blog

पिछले दस सालों के इस सफ़र में मैंने बहुत कुछ सीखा। हिंदी और अंग्रेजी में हो रहे यात्रा लेखन को नजदीक से देखने का अवसर मिला।  कई बार देश के अग्रणी यात्रा लेखकों के साथ अलग अलग मंचों पर मुलाकात और चर्चाएँ भी हुईं। आज जिस हालत में यात्रा उद्योग और उनसे जुड़ा ब्लागिंग का परिदृश्य है उसके कुछ सुखद और कुछ अफसोसनाक पहलू दोनों ही हैं।

अगर पहले धनात्मक बिंदुओं की चर्चा करूँ तो यात्रा उद्योग में अब ब्लॉग और सोशल मीडिया में लेखन के महत्त्व को समझा जाने लगा है। घूमने फिरने का शौक रखने वाले एक निष्पक्ष राय जानने के लिए ब्लॉगस और सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं। यही वजह है कि देश और विदेशों में किसी स्थान को बढ़ावा देने के लिए ब्लॉगरों को आमंत्रित किया जा रहा है। निजी कंपनियाँ आपको अपने इवेंट को कवर करने के लिए आमंत्रित करने के साथ आपकी सेवाओं का मूल्य भी दे रही हैं। आम लेखन का स्तर भी पहले से बेहतर हुआ है। कैमरों की बढ़ती गुणवत्ता का असर आजकल सोशल मीडिया और ब्लॉग पर लगाए गए चित्रों में नज़र आने लगा है। यात्रा के अपने अनुभवों को लोग पुस्तकों के माध्यम से छपवा रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर ट्रैवेल ब्लागिंग एक रुचि के स्तर पर शुरु हुई थी। पर अब इसे  फुल या पार्ट टाइम प्रोफेशन के तौर पर भी लोग अपनाने लगे हैं। पर जहाँ व्यवसायीकरण शुरु होता है अपने आप को बाजार में बेचने की प्रतिस्पर्धा शुरु हो जाती है। बाजार ने ब्लागरों की गुणवत्ता के लिए जो मापदंड निर्धारित किए हैं वो सोशल मीडिया पर आपकी सक्रियता और फॉलोवर्स की संख्या पर आधारित हैं। इसके आलावा आपके ब्लॉग की डोमेन अथारिटी भी माएने रखती है। कायदे से देखा जाए तो ये परिपाटी तार्किक लगती  है।

यात्रा के कुछ यादगार लमहों का एक झरोखा।

ये मापदंड पश्चिम से आए हैं पर दिक्कत ये है कि उन्होंने ही इसमें घालमेल करने की सारी व्यवस्थाएँ भी उपलब्ध कराई हैं। सोशल मीडिया पर फालोवर्स और लाइक्स खरीदे जा सकते हैं।  Link Building के लिए नामी इंटरनेशनल ब्लागर एक दूसरे की लिंक को अपने ब्लॉग पर लगाकर अपनी डोमेन आथारिटी को बढ़ाने की कोशिशों में तत्पर रहते हैं और ऐसा करना एक जायज तरीके के तौर पर देखा जाता है। विदेशों में ये सालों से हो रहा है और अब वही प्रवृति भारत में देखने को मिल रही है। हाँ अपवाद हर जगह हैं लेकिन अगर ऐसे ही चलता रहा तो ईमानदारी से अपना काम करने  पेशेवर यात्रा लेखकों की संख्या गिनती में रह जाएगी।

सफलता का स्वाद चखने के लिए यात्रा लेखकों द्वारा सोशल मीडिया पर झूठे दावों और हथकंडों का प्रयोग भी देखने को मिलता रहता है। पी आर एजेंसीज के पास इतना समय और योग्यता नहीं कि वो लेखकों और सोशल मीडिया पर अपना प्रभाव रखने वालों का उचित मूल्यांकन करें। इस वजह से घूमने और लिखने का जो स्वाभाविक आनंद है वो सोशल मीडिया पर हमेशा दिखते रहने के दबाव और दिखावे के इस खेल में खोता सा जा रहा है।

ये तो हुई समूचे यात्रा लेखन परिदृश्य की बात। जहाँ तक हिंदी की बात है तो अभी भी हिंदी में लिखने वालों के समक्ष बड़ी चुनौती है कि इस तरह देश के साथ विदेशों के प्रायोजकों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें। ये जतला सकें कि हम उनकी बात को देश के तमाम हिंदी भाषी पाठकों तक पहुँचा सकते हैं जो तेजी से इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं। ये तभी हो सकता है जब हम किसी जगह की प्रकृति, संस्कृति और इतिहास से घुलते मिलते हुए अपने  विषयवस्तु की रचना करें।

खैर इन सब बातों का मैंने जिक्र इसलिए किया कि पाठक जिन्हें यात्रा लेखन का एक खूबसूरत चेहरा दिखाई देता है वे उसके इस पक्ष से भी थोड़ा परिचित हो लें। बाकी मैं तो आपको यूँ ही अपनी यात्राओं के किस्से सुनाता ही रहूँगा। जैसा पिछले इन दस सालों से सुना रहा हूँ।  अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें।ब्लागिंग का एक उद्देश्य आपकी बातों, आपकी पसंद को सुनना समझना भी है और यह तभी संभव है जब आप यहाँ अपनी राय ज़ाहिर करें। अगर आपके मन में यात्रा लेखन से जुड़ा कोई सवाल हो तो बेहिचक प्रश्न करें। आपके सुझावों का सहर्ष स्वागत है। आशा है पिछले दशक की तरह आने वाले दशकों में भी आप इस चिट्ठे को ऐसे ही प्यार देते रहेंगे।

Friday, May 18, 2018

लद्दाख का प्रवेश द्वार : द्रास घाटी Gateway to Ladakh : Dras Valley

जोजिला से आगे बढ़ने का मतलब है कश्मीर घाटी को विदा कहते हुए लद्दाख के पर्वतीय इलाके में प्रवेश कर जाना। जोजिला के बाद द्रास की घाटी शुरु हो जाती है। कहते हैं कि द्रास का इलाका भारत ही क्या साइबेरिया के बाद विश्व के सबसे ठंडे इलाकों में शुमार होता है। करीब ग्यारह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित इस इलाके में जनवरी फरवरी के वक़्त पारा शून्य से चालीस डिग्री और कभी तो उससे भी अधिक नीचे चला जाता है। जून के महीने में जब हम वहाँ पिछले साल पहुँचे थे तो वहाँ के हरे भरे चारागाहों और खेतों को देख कर यकीन ही नहीं हुआ था कि ये इलाका कभी इतना सर्द हो जाता होगा।


द्रास नदी के साथ द्रास घाटी में सफ़र करना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था जिसे शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है। लद्दाख की ये प्रथम झलक कितनी खूबसूरत थी आप भी इसका अनुभव कीजिए इस फोटो फीचर में।
संकरी सड़क के दोनों ओर बर्फ का जमाव गर गर्मियों तक बना रहे तो समझिए कि पानी की मार से सड़क के हालात बदतर ही रहेंगे। 

कश्मीर घाटी से द्रास के कुछ दूर पहले तक खड़ी ढाल वाले नंगे पहाड़ नज़र आते हैं जिनकी चट्टानें सख्त दिखती हैं पर कारगिल तक पहुँचते पहुँचते इनकी कठोरता घटती चली जाती है। ऐसा लगता है कि ये भुरभुरी मिट्टी से बने हों।

ये है जून के मौसम में भी जमी हुई द्रास नदी। सिन्ध नदी की तरह ही द्रास नदी भी सोनमर्ग के पास मचोई ग्लेशियर से निकलती है। पर सिन्ध से पलट ये उत्तर पूर्व की ओर बहती हुई कारगिल तक पहुँच जाती है जबकि सिन्ध उलटी दिशा में बहती हुई कश्मीर घाटी का रुख करती है।

दूर से तो कुछ हिस्से में नदी का रास्ता एक बर्फीले मैदान सा दिखता है लेकिन बीच बीच में बर्फ के अंदर के सुराख इस बात की गवाही देते हैं कि इनके अंदर कलकल बहती धारा एक नदी की है जो सिर्फ गर्मियों में ही बर्फ के हिजाब के बीच से अपना खूबसूरत चेहरा दिखाती है।

पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया था कि कैसे गुर्जर बकरवाल अपनी भेड़ों को बर्फ के मैदानों से  पार करा कर गर्मियों में ऊँचाई पर स्थित हरे भरे चारागाहों तक लाते हैं।

जीरो प्वाइंट से द्रास तक पहुँचते हुए इन बंजारों की ये यात्रा मैंने खुद अपनी आँखों से देख ली।

द्रास की इन हरी भरी बैरन घाटियों में ऐसे समतल इलाके भी हैं जहाँ गर्मियों में थोड़ी बहुत खेती हो जाती है।
वैसे अगर आपकी चिंता इस बात की है कि इतने दुर्गम इलाके में खेती कौन करता होगा तो आप ठीक ही सोच रहे हैं। पूरे रास्ते में बेहद छोटे गाँव है जिनकी जनसंख्या दो अंकों से ज्यादा की नहीं है। वैसे जानते हैं पूरे द्रास कस्बे की आबादी कितनी है? मात्र बारह सौ।



जोजिला से द्रास के बीच एक चेक प्वाइंट आता है। दुख सिर्फ इस बात का लगा कि इतनी सुरम्य वादियों के बीच चेकपोस्ट तक में ढंग के शौचालय नहीं थे। जो थे भी वो इतने गंदे कि वहाँ तक जाने का मन ही ना करे।

द्रास घाटी का वो सिरा जो द्रास शहर के करीब ले आता है। इस इलाके के बाद से ही द्रास का वो मशहूर इलाका शुरु होता है जहाँ कारगिल युद्ध के समय सबसे कठिन लड़ाइयाँ लड़ी गयी थीं।


इस श्रंखला की अगली कड़ी में ले चलेंगे आप उस टाइगर हिल के पास जहाँ भारतीय सेना ने अत्यंत विकट परिस्थितियों में दुश्मन के दाँत खट्टे किए थे।

अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

Sunday, May 6, 2018

जोजिला : लद्दाख का सबसे दुर्गम दर्रा जहाँ लड़ा गया था एक ऐतिहासिक युद्ध ! Zoji La, Jammu and Kashmir

सोनमर्ग से अक्सर लोग बालटाल जाते हैं। जून के आखिरी हफ्ते के आसपास यहीं से अमरनाथ यात्रा शुरु होती है। वैसे एक रास्ता पहलगाम होकर भी है। सोनमर्ग से जोजिला या जोजी ला जाते समय बालटाल के पास सिन्ध नदी घाटी का अद्भुत दृश्य दिखाई देना शुरु होता है। यहीं से सर्पीली सड़कों के माध्यम से जोजिला की चढ़ाई आरंभ होती है। सोनमर्ग से जोजिला पहुँचने तक 2800 मीटर से 3500 मीटर की चढ़ाई के दौरान जो नज़ारे दिखते हैं वो कश्मीर की अतुलनीय सुंदरता की गवाही देते हैं।

सिंध नदी घाटी : दाहिने बहती सिंध नदी और घास के मैदानों से जुड़ा बालटाल का  कस्बा

खड़ी ढाल वाले पहाड़ बर्फ की सफेद टोपी पहन शांत भाव से सिंध की बलखाती चाल का मुआयना करते नज़र आते हैं। ढलान के साथ हरे भरे पेड़ अब भी दिखते हैं पर उनकी सघनता कम होती जाती है।  बालटाल के पास गर्मियों में हरी दूब के चारागाहों के साथ ठुमकती सिंध को देखना एक ऐसा मंज़र है जिसे कोई सैलानी शायद ही भुला सके।

जून के शुरुआती हफ्ते में जब हम वहाँ गए थे तो वहाँ अमरनाथ यात्रियों के लिए टेंट का निर्माण शुरु हो गया था पर कस्बे में रौनक नहीं आई थी। जैसा मैंने आपको पहले बताया था कि सिंध नदी का उद्गम मचोई ग्लेशियर से होता है जो बालटाल से अमरनाथ जाने के रास्ते से दिखाई देता है।

चित्र बड़ा करने से आपको बालटाल में यात्रियों क लिए बन रहे तंबू दिखाई देंगे। दाहिनी ओर के इन्हीं घुमावदार रास्तों से यात्री जोजी ला में प्रवेश करते हैं।

पर पहाड़ों पर आपको लगता है कि हर जगह खूबसूरती ही मिलेगी तो आप मुगालते में हैं। मैं अपने समूह के साथ सिंध घाटी की खूबसूरती में खोया ही हुआ था कि अचानक ही रास्ता धूल धूसरित हो गया। घाटी नज़रों से ओझल हो गई। दुबले पतले रास्तों से उठती धूल और बीच बीच में मात्र एक दो फुट पर दिखती खाई मन को भयभीत करने के लिए पर्याप्त थी। जी हाँ हम जोजिला जिसे कहीं कहीं मैंने जोजी ला भी लिखा देखा में प्रवेश कर रहे थे। पहाड़ों में ला का मतलब ही दर्रा होता है। अक्सर लोग इसे जोजिला दर्रा कह देते हैं जो कि गलत है। या तो जोजी ला कहें या जोजी दर्रा।

इन दुर्गम रास्तों को कठोर सर्दी के बीच बना पाना भगवान की कृपा के बिना कैसे संभव है?

क्या आप यकीन कर सकते हैं कि इतने दुर्गम रास्तों से कभी यु्द्ध के लिए भारत के टैंक गुजरे होंगे। आजादी के बाद पाकिस्तानी सेना की मदद से घुसे कबाइलियों के साथ युद्ध का गवाह रहा है जोजी का ये दर्रा। इस बात का जिक्र भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास से जुड़ी कई पुस्तकों में है। बात 1947 1948 की है जब कबाइलियों ने गिलगिट बालतिस्तान के रास्ते पहले लेह और फिर इसी रास्ते से आगे बढ़ते हुए श्रीनगर पर कब्जा करने की योजना बनाई थी। लेह में सेना की एक छोटी टुकड़ी  पहले से ही मौज़ूद थी। दुश्मन की पहुँच मई 1948 में लेह  के बाहरी इलाके में खलात्से पुल तक हो गई थी। पर इसके पहले कि वे और आगे बढ़ते सेना की अतिरिक्त टुकड़ियाँ जून तक वहाँ पहुँच गयीं और कबाइलियों के हमलों को निरस्त कर दिया गया।


अब असली समस्या लेह की टुकड़ी तक रसद पहुँचाने की थी क्यूँकि जाड़े में नवंबर से मई तक बर्फबारी से ये रास्ता बंद हो जाता था। इसके लिए जरूरी था कि जोजिला से लेकर कारगिल तक के इलाके पर जल्द से जल्द कब्जा जमाया जाए। पर दिक्कत ये थी की कबाइली  घुसपैठिए जोजिला के दोनों ओर मशीनगन के साथ ऊँचाई पर स्थित गुफाओं में काबिज थे। लेह में भी सैनिक बल इतना नहीं था कि अपने बाहरी इलाके से दुश्मन को खदेड़ सके। इन परिस्थितियों में मेजर जनरल थिमैय्या के नेतृत्व में निर्णय लिया गया कि जोजिला पर किसी भी सूरत में टैंक ले कर आया जाए। जोजीला तक टैंक लाने के लिए रात का समय चुना गया। दुश्मनों को टैंक की गतिविधियाँ नज़र ना आएँ उसके लिए उनके बुर्ज खोलकर त्रिपाल लगाए गए।

 जोजी ला : बड़ी कठिन है डगर पनघट की

एक नवंबर 1948 को  ये टैंक जब जोजीला के पर्वतों के बीच से गुजरे तो उनकी गर्जना सुनकर ही दुश्मन हक्के बक्के रह गए। टैंक से उनके ठिकानों को नष्ट कर दिया गया। दुश्मनों को जोजिला से आनन फानन में पीछे की ओर भागना पड़ा। अगले कुछ हफ्तों में भारतीय सेना द्रास और नवंबर के अंत तक कारगिल में दाखिल हो गयी। जोजिला का ये युद्ध भारतीय सेना के विकट परिस्थितियों में अभूतपूर्व साहस की एक मिसाल है।

नुकीले पहाड़ों के बीच से होकर निकलती हमारी डगर

जोजिला या जोजी ला की एक और खासियत इसके आस पास अजीब प्रकृति के पहाड़ों का होना है। रास्ता बनाने के क्रम में यहाँ एक ऐसा हिस्सा मिलता है जहाँ चट्टानें ऐसी पतली और नुकीली दिखती हैं मानों मोटी लकड़ी को काटकर नोकदार फट्टे बनाए गए हों। यहाँ के पहाड़ कच्चे हैं। आए दिन भू स्खलन, बर्फ के गलने से आती पानी की धार और ट्राफिक की संयुक्त मार से यहाँ की सड़के धाराशायी ही रहती हैं। सड़क मार्ग से श्रीनगर से लेह जाना हो तो डर यही रहता है कि इस हिस्से में ना फँस जाएँ। एक दो घंटों के जाम की बात यहाँ आम है। गनीमत थी कि हमारे समूह के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ।


ऐसी परतदार चट्टान तो मैंने पहली बार जोजी ला में ही देखी

जोजीला पार करने के कुछ ही देर बाद इस इलाकें का मशहूर जीरो प्वाइंट आ जाता है। दरअसल जीरो प्वाइंट पहाड़ की तलहटी पर स्थित एक समतल इलाका है जहाँ गर्मियों के महीने में भी यथेष्ट बर्फ जमी रहती है। यही वजह है कि बर्फ का आनंद उठाने के लिए सोनमर्ग से लोग यहाँ जरूर आते हैं। दूर से देखने पर बर्फ के ये मैदान किसी वृत की परिधि जैसे घुमावदार नज़र आते हैं।

जीरो प्वाइंट के बर्फीले मैदान

सोनमर्ग से हमारे अगले पड़ाव द्रास तक खाने पीने के लिए कुछ मिलने वाला नहीं था। इसी कारण सड़क के किनारे पहाड़ों के लोकप्रिय आहार मैगी का जलपान लिया गया। आगे के सफ़र को देखते हुए समय ज्यादा नहीं था पर बिना बर्फ में उतरे रहा भी कैसे जाता। बर्फ पर उतर कर उस पर चहलकदमी करने की इच्छा तो हुई पर थोड़ी दूर चलकर ही समझ आ गया कि यहाँ घुटने तक के विशिष्ट जूतों की जरूरत है ऐसे जूते यहाँ किराए पर मिल जाते हैं 

ऍसी ही माहौल में प्रकृति को आगोश में लेने को दिल चाहता है।
इधर लोग गाड़ी पर चढ़कर बर्फ की ढलान पर ससरने का उपक्रम कर ही रहे थे कि अचानक कुछ गड़ेरिए भेड़ों के विशाल समूह के साथ मैदान के एक बड़े हिस्से पर काबिज हो गए। सांकेतिक रूप से भेड़चाल की प्रवृति तो हमारे समाज का अभिन्न अंग है पर एक दूसरे को देख पंक्तिबद्ध अनुशासन में चलती भेड़ों की वास्तविक परेड को देखने का अपना अलग ही सुख है।

घास के मैदानों की ओर जाता भेड़ों का समूह जो रास्ते भर हमें आगे पीछे मिलता रहा

आस पास के लोगों से बातें की तो पता चला कि ये बंजारे गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिन्हें यहाँ बकरवाल कहा जाता है। बकरवाल भेड़, बकरी और घोड़ों के लालन पालन से अपनी जीविका चलाते हैं। जाड़े के दिनों में ये अपने पशुओं को लेकर जम्मू की कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों में ले जाते हैं। हाल ही में जम्मू के कठुआ में जो शर्मनाक घटना हुई उसमें पीड़ित परिवार बकरवाल समुदाय का ही था। जैसे ही कश्मीर घाटी में बर्फ पिघलनी शुरु होती है ये वहाँ के घास के मेदानों का रुख कर लेते हैं। इस समुदाय के भारतीय सेना से बड़े अच्छे संबंध रहे हैं और कई बार अगली पोस्ट तक रसद पहुँचाने में इनकी मदद ली जाती रही है। 

जम्मू से घाटी के ऊँचे मैदानों तक की ये यात्रा दो से तीन हफ्तों की होती है। जीरो प्वाइंट जैसे बर्फ के मैदानों से गुजरते हुए इन्हें इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि बिना भोजन के इनकी भेड़ें कितनी दूर तक चल सकती हैं। घास के मैदानों तक पहुँचने के पहले अगर उनकी शक्ति क्षीण हो गयी तो वो भूख से मर भी जाती हैं। दूरस्थ इलाकों में भोजन मिलता रहे इसके लिए वो मुर्गियों को हाथों में लेकर अपने गन्तव्य तक पहुँचते हैं ताकि वहाँ अंडों का सहारा रहे।


जोजिला के साथ ही अब हम कश्मीर घाटी को पार कर जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में दाखिला ले चुके थे। ऊँचाई पर स्थित इस पर्वतीय मरुस्थल की पहली झलक आप देखेंगे इस श्रंखला की अगली कड़ी में..



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Monday, April 23, 2018

सोनमर्ग : देवदारों के आँचल में समाया धरती का एक खूबसूरत टुकड़ा Sonamarg, Jammu and Kashmir

श्रीनगर से लद्दाख जाते वक़्त कश्मीर घाटी का प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल सोनमर्ग से होकर गुजरना पड़ता है। समुद्रतल से 2800 मीटर की उँचाई पर स्थित सोनमर्ग श्रीनगर से करीब 87 किमी उत्तर पूर्व की दूरी पर है । श्रीनगर तो झीलों, शिकारों और बागों का शहर है जहाँ से आप जबरवान की पहाड़ियों की खूबसूरती को निहार पाते हैं पर कश्मीर घाटी की असली सुंदरता देखने के लिए आपको शहरी इलाकों से बाहर आना पड़ेगा।

सोनमर्ग के खूबसूरत चारागाह
श्रीनगर से बाहर निकलते ही गांदरबल जिले का इलाका प्रारंभ हो गया। यहाँ कस्बों में भी बने मकान शानदार दिखे। ज्यादातर घरों को  ईंट की जगह स्याह रंग के पत्थरों और लकड़ी की अलग अलग डिज़ाइन वाली  खिड़कियों से सजाया गया था। छतें रंग बिरंगी इस्पात की घुमावदार चादरों की बनी थीं ताकि बर्फ गिरने पर ढलान के साथ  नीचे फिसल जाए।


गांदरबल वही इलाका है जहाँ से जम्मू एवम कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अबदुल्लाह और उनके बाद उनके सुपुत्र उमर अबदुल्लाह चुनाव लड़ा करते थे। गांदरबल से गुजरते हुए इस इलाके की प्रमुख नदी सिंध से हमारी पहली मुलाकात हुई। पानी की उपलब्धता इस इलाके में अच्छी है ये इस बात से ज़ाहिर हुआ कि मुझे धान की खेती दूर दूर तक फैली दिखाई दी। अब कश्मीर से आए लंबे दाने वाले चावल के जायक़े को भला कौन भूल सकता है?

वैसे ये सिंध नदी वो वाली सिंधु नदी नहीं है जिसे हम सभी अंग्रेजी में इंडस (Indus) के नाम से जानते हैं। इस सिंध की उत्पत्ति सोनमर्ग के समीप के मचोई हिमनद से होती है। सोनमर्ग के रास्ते में ये नदी कभी सड़क के बाँयीं तो कभी दायीं ओर बहती मिलेगी। गर्मी के दिनों में इसका पानी सफेद फेन के साथ जोरदार आवाज़ करता हुआ बहता है।


सिंध नदी जो आगे जाकर मिल जाती है झेलम में
इसके बहाव की ताकत का इस्तेमाल इस इलाके में बिजली और सिंचाई उपलब्ध कराने में होता है। सौ किमी से ज्यादा लंबी इस नदी का अंत श्रीनगर के ज़रा पहले हो जाता है जब ये झेलम में जा कर मिल जाती है। इसकी खिलखिलाहट को पास सुनने के लिए मैं इसके समीप बने एक उद्यान के पास उतरा और कुछ समय इसके करीब बैठ कर बिताया।
देवदार के ये जंगल सोनमर्ग से तीस किमी पहले से ही शुरु हो जाते हैं।


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