Saturday, August 11, 2018

लेह लद्दाख यात्रा : मैग्नेटिक हिल का तिलिस्म और कथा पत्थर साहिब की Road trip from Alchi to Leh

अलची से लेह की दूरी करीब 66 किमी की है पर इस छोटी सी दूरी के बीच लिकिर मठ, सिन्धु ज़ांस्कर संगम, मैग्नेटिक हिल, और गुरुद्वारा पत्थर साहिब जैसे आकर्षण हैं। पर इन सब आकर्षणों पर भारी पड़ता है इस हिस्से के समतल पठारी हिस्सों के बीच से जाने वाला रास्ता। ये रास्ते देखने में भले भले खाली लगें पर गाड़ी से उतरते ही आपको समझ आ जाएगा कि इन इलाकों में यहाँ बहने वाली सनसनाती हवाएँ राज करती हैं। मजाल है कि इनके सामने आप बाहर बिना टोपी लगाए निकल सकें। अगर गलती से ऍसी जुर्रत कर भी ली तो कुछ ही क्षणों में आपके बाल इन्हें सलाम बजाते हुए कुतुब मीनार की तरह खड़े हो जाएँगे।


इतने बड़े निर्जन ठंडे मरुस्थल को जब आपकी गाड़ी हवा को चीरते हुए निकलती है तो ऐसा लगता है कायनात की सारी खूबसूरती आपके कदमों में बिछ गयी है। मन यूँ खुशी से भर उठता है मानो ज़िदगी के सारे ग़म उस पल में गायब हो गए हों। इसी सीधी जाती सड़क के बीचो बीच मैंने ऐसे ही उल्लासित तीन पीढ़ियों के एक भरे पूरे परिवार को इकठ्ठा सेल्फी लेते देखा।

इन रेशमी राहों में, इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुँचती हो... 
सरपट भागती गाड़ी अचानक ही लिकिर मठ की ओर जाने वाले रास्ते को छोड़ती हुई आगे बढ़ गयी। अलची में समय बिता लेने के बाद लेह पहुँचने में ज्यादा देर ना हो इसलिए मैंने भी लिकिर में अब और समय बिताना उचित नहीं समझा। वैसे भी रास्ता इतना रमणीक हो चला था कि आँखें इनोवा की खिड़कियों पर टँग सी गयी थीं। सफ़र मैं ऍसे दृश्य मिलते हैं तो बस होठों पर नए नए तराने आते ही रहते हैं। पथरीले मैदान अब सड़क के दोनों ओर थे। बादल यूँ तो अपनी हल्की चादर हर ओर बिछाए थे पर कहीं कहीं चमकते बादलों द्वारा बनाए झरोखों से गहरा नीला आकाश दिखता तो तीन रंगों का ये  समावेश आँखों को सुकून से भर देता था।

कि संग तेरे बादलों सा, बादलों सा, बादलों सा उड़ता रहूँ
तेरे एक इशारे पे तेरी ओर मुड़ता रहूँ

सेना की छावनी के बीच से निकलता एक खूबसूरत मोड़

पीछे के रास्तों की तरह अलची से लेह के बीच के हिस्से में यहाँ नदी साथ साथ नहीं चलती। अलची के पास जो सिंधु नदी मिली थी वो वापस निम्मू के पास फिर से दिखाई देती है। यहीं इसकी मुलाकात जांस्कर नदी से होती है। जैसा कि मैंने आपको बताया था कि जांस्कर घाटी की ओर जाने के लिए एक रास्ता कारगिल से कटता है जो इसके मुख्यालय पदुम तक जाता है। वैसे एक सड़क निम्मू से भी जांस्कर नदी के समानांतर दिखती है पर वो अभी तक पदुम तक नहीं पहुँची है। संगम पर गर्मी के दिनों में आप यहाँ रिवर राफ्टिंग का आनंद उठा सकते हैं जबकी सर्दी के दिनों में जब जांस्कर जम जाती है तो जमी हुई नदी ही जांस्कर और लेह के बीच आवागमन का माध्यम बनती है। जमी हुई जांस्कर नदी पर सौ किमी से ऊपर की हफ्ते भार की ट्रेकिंग चादर ट्रेक के नाम से मशहूर है।

मटमैली रंग की जांस्कर नदी जिसके किनारे किनारे जांस्कर घाटी के अंदर तक जाने वाली सड़क बन रही है।

अलची के पहले तक साथ आ रही सिंधु वहीं से मुड़ जाती है और फिर निम्मू के पास अपने इस हरे नीले रूप में अवतरित होती है।

संगम से छः सात किमी बढ़ने से ही मैग्नेटिक हिल का इलाका आ जाता है। यहाँ एक स्थान विशेष पर गाड़ी न्यूट्रल में खड़ी कर रोकने के बाद खुद ब खुद ऊँचाई की ओर जाते रास्ते की ओर बढ़ने लगती है। गुरुत्वाकर्षण को धता बताता ये मंज़र चुंबकीय शक्ति की वजह से होता है, ऐसी सोच इसके नामकरण की वज़ह बनी है। हालाँकि  विशेषज्ञों का कहना है कि यहाँ पाई जाने वाली चुंबकीय शक्ति मैदानों से तो बहुत ज्यादा है पर इतनी भी नहीं कि किसी खड़ी गाड़ी को बीस किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हाँक सके। उनका कहना है कि जो हल्की चढ़ाई आँखों को दिखती है वो एक Optical Illusion से ज्यादा कुछ नहीं।


मैंने ऐसी ही एक घटना कच्छ के काला डूंगर से लौटते हुए महसूस की थी जब हमारी बस पहाड़ से उतरकर समतल रास्ते पर आने के बाद न्यूट्रल में बीस से तीस किमी की रफ्तार से लगभग चा पाँच मिनट भागती रही थी। वहाँ भी लोग इसे पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति का प्रमाण बताते थे। ख़ैर सच जो भी हो ये सब होते देखना मन को कौतुक से भर देता  है।

मैग्नेटिक हिल : सामने लगता है कि चढ़ाई है पर इसी चढ़ाई पर गाड़ियाँ न्यूट्रल में भी दौड़ लगा देती हैं

खैर, मैग्नेटिक हिल से आगे बढ़े तो पाँच दस मिनटों में ही गुरुद्वारा पत्थर साहिब पहुँच गए। बुद्ध की भूमि में इतनी ऊँचाई पर किसी गुरुद्वारे का होना मुझे असमंजस में डाल रहा था। इससे पहले मैंने इतनी ऊँचाई पर सिखों का श्रद्धेय स्थल उत्तरी सिक्कम के गुरुडांगमार में देखा था। मुझे क्या पता था कि इन दोनों जगहों के तार संत गुरु नानक से जुड़े हुए हैं।  गुरु नानक ने अपने जीवन काल में कई पदयात्राएँ की। ऐसी ही पदयात्रा के दौरान उनके चरण सिक्किम से तिब्बत की ओर जाते हुए गुरुडांगमार में पड़े थे। गुरु नानक वहाँ से तिब्बत होते हुए लद्दाख के इसी इलाके में आए थे।

गुरुद्वारा पत्थर साहिब
जब हम गुरुद्वारे में घुसे तो पता चला कि इस गुरुद्वारे का रखरखाव सेना के हाथ है। सेना ने यहाँ गुरुद्वारा क्यूँ बनाया उसकी एक अलग ही कहानी है। सत्तर के दशक में निम्मू से जब लेह के लिए सेना सड़क बन रही थी तो इस इलाके में स्थित एक बड़े से पत्थर को हटाने की आवश्यकता पड़ी। पर पत्थर इतना मजबूत था कि  बुलडोजर से भी उसे हटाया नहीं जा पाया। उल्टे हटाने वाले को स्वप्न आया कि ये पत्थर पवित्र है इसे ना हटाया जाए। वो पत्थर बरसों से बौद्ध लामाओं द्वारा भी पवित्र माना जाता रहा था और लोग उसे नानक लामा के पत्थर के रूप में जानते थे।


ऍसी दंतकथा है कि जब गुरु नानक यहाँ पर आए तो ये इलाका एक दुष्ट दानवी व्यक्ति के अत्याचारों से पीड़ित था। गुरु नानक ने अपने आचार व्यवहार से इस इलाके के लोगों का दिल जीत लिया और यहीं ध्यान करने लगे। स्थानीय लोगों का नानक के प्रति रुझान उस दानव को पसंद नहीं आया। एक दिन मौका पाकर उसने वो पत्थर पहाड़ से उस दिशा में ढकेल दिया जहाँ नानक तपस्या में लीन थे। पत्थर नानक की पीठ से टकराया  और उनके प्रभाव से मोम जैसा हो गया। दानव को भी समझ आया ये कोई मामूली इंसान नहीं बल्कि एक सिद्ध पुरुष हैं और उसने गुरु से अपने कृत्यों के लिए माफी माँग ली। आज भी गुरुद्वारे में एक पत्थर रखा है जिसके एक तरफ हाथ का निशान है और दूसरी तरफ नानक की पीठ का। गुरु नानक की याद में इस पत्थर को यहाँ आज भी पूजा जाता है और इसी की वजह से ये गुरुद्वारा पत्थर साहिब कहलाता है।

लेह के बेहद करीब तक ये समतल परिदृश्य बना रहता है।

इन्हीं पहाड़ों को पार करने के बाद आता है लेह 

जितनी मुझे इस गुरुद्वारे के नाम के पीछे के रहस्य को जानने की उत्सुकता थी उतनी ही लालसा यहाँ मिलने वाले स्वादिष्ट हलुए की भी थी। प्रसाद ग्रहण कर हम अपने गन्तव्य लेह की ओर बढ़ गए।

ऐसे निर्जन इलाकों को सेना ही आबाद रख सकती है।

लेह शहर के मुख्य द्वार को देख कर मन प्रसन्न हुआ कि हमारी इस यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा पूरा हुआ। आशा के विपरीत लेह के मुख्य शहर को मैंने तंग गलियों में सिमटा पाया। मंथर गति से बढ़ते ट्राफिक की चिल्ल पों के बीच खिसकते हुए हमारा समूह शाम सात बजे अपने होटल नालंदा तक पहुँचा। वैसे लेह के प्रथम अनुभव में ये बात स्पष्ट हो गयी कि यहाँ की गलियाँ भले तंग हों लोगों के दिल तंग नहीं हैं। एक पतली सड़क में दो गाड़ियाँ आमने सामने आ जाए तो दोनों में से एक चालक अपनी गाड़ी को पीछे करने में क्षण भर भी नहीं लगाएगा चाहे इसके लिए उसे पचास सौ मीटर भी पीछे क्यूँ ना जाना पड़े। काश ऐसा भाई चारा मैदानी लोगों मे भी होता।

लेह शहर का प्रवेश द्वार
अक्सर जब लोग लद्दाख जाते हैं तो उनके मन में ये प्रश्न रहता है कि लेह जाने पर High Altitude Sickness से कैसे बचा जा सकता है? क्या यहाँ छोटे बच्चों को साथ ले जाना ठीक रहेगा ? मैंने अपने परिवार को इस समस्या से बचाने के लिए श्रीनगर से लेह तक सड़क मार्ग से जाने का विकल्प चुना था। ये रास्ता तो कितना खूबसूरत है वो मैं आपको दिखा ही चुका हूँ पर कारगिल में एक रात रुकने से फ़ायदा ये हुआ कि लेह तक पहुँचने के बाद किसी को भी कोई तकलीफ नहीं हुई। आते के साथ इस बात को परखने के लिए मैंने सीढ़ियाँ भी चढ़ीं और होटल के बाहर पैदल भी चल कर देखा पर मुझे कम आक्सीजन का कोई असर नहीं देखने को मिला। 


पर जो लोग लेह सीधे उड़ान से आते हैं उन्हें एक दिन तो पूरी तरह बिना किसी क्रियाकलाप के होटल में रहना जरूरी है अन्यथा वो इस बीमारी का शिकार हो जाएँगे। ये तो हुई High Altitude Sickness की बात पर मसला सिर्फ इतना नहीं हैं। जिन लोगों को घुमावदार रास्तों पर तकलीफ होती है वो यहाँ भी रहेगी। वैसे लामायुरु और ज़ोजीला के हिस्सों को छोड़ दें तो श्रीनगर से लेह तक का रास्ता भारत के अन्य पर्वतीय स्थलों की तुलना में बेहद आरामदेह है। पर यही बात नुब्रा और पांगोंग तक के रास्ते के लि॓ए नहीं कही जा सकती।

छोटे बच्चों के लिए लेह आदर्श जगह नहीं है क्यूँकि यहाँ कठिन रास्तों के साथ ठंड की मार भी सहनी पड़ती है। व्यस्क और बड़े बच्चों को भी लेह तभी पसंद आएगा अगर उनमें प्रकृति की सुंदरता को नजदीक से  महसूस करने की ललक हो। ऐसा मैं क्यूँ कह रहा हूँ ये मैं अपने आगे के विवरण में साथी पर्यटकों से हुई बातचीत के मजेदार उदाहरणों के साथ समझाऊँगा। फिलहाल लेह यात्रा से थोड़े समय का विराम। वैसे अभी सफ़र बाकी है नुब्रा, पनामिक और पांगोंग तक का।

कश्मीर लद्दाख यात्रा में अब तक 

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Tuesday, July 31, 2018

मूनलैंड लामायुरु का जादू और अलची का ऐतिहासिक बौद्ध मठ Moonland Lamayuru & Historic Alchi !

फोतुला से लामायुरु की दूरी महज पन्द्रह किमी है पर जिन घुमावों को पार कर आप फोतुला पर चढ़ते हैं उससे भी ज्यादा ढलान का सामना उतरते वक़्त करना पड़ता है। नीचे की ओर उतरते हुए एक बार में ही लामायुरु कस्बा, ऊँचाई पर स्थित मठ और उसके पीछे फैला हुआ मूनलैंड का इलाका जब एक साथ दिखा तो मन रोमाचित हुए बिना नहीं रह सका। थोड़ी ही देर में हम लामायुरु मठ के अंदर थे। रास्ते के घुमावों का असर मुझ पर तो नहीं पर मेरे सहयात्रियों यानि मेरे परिवार पर जरूर पड़ा गया था। उनके लिए थोड़ा आराम जरूरी था। उन्हें पवित्र चक्र के पास बैठा कर मैं ऊँचाई पर बने मठ की ओर चल पड़ा। 

ऊपर हवा तेज थी और वहाँ से चारों तरफ़ का नज़ारा भी बड़ा खूबसूरत था। ऐसी स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यहाँ कभी एक झील हुआ करती थी जिसे महासिद्ध नरोपा ने सुखा दिया था। पानी हटने से बाहर निकली पहाड़ी पर नरोपा ने बौद्ध मठ की स्थापना की थी। 

लामायुरू बौद्ध मठ और पीछे देखता मूनलैंड 
लद्दाख में जितने मठों को मैंने देखा उसमें लामायुरु की अवस्थिति सबसे अनूठी है। इसके नीचे की तरफ लगभग सात सौ की आबादी वाला लामायुरु कस्बा है। उत्तर की दिशा में दो विशाल चोटियाँ इसे छत्र बनाकर खड़ी हैं और उन्ही की निचली ढलानों पर चाँद की सतह जैसी ऊँची नीची अजीबोगरीब बनावट वाली भूमि है जिससे आंगुतकों का परिचय मूनलैंड कह के कराया जाता है। मठ से सटी दूसरी पहाड़ी पर यहाँ रहने वाले डेढ़ सौ लामाओं के घर हैं। साथ ही तहलटी पर नंगी पहाड़ियों के बीच फैला है दुबला पतला हरा भरा नखलिस्तान। इतनी भौगौलिक विविधताओं से घिरे इस मठ में इस रास्ते से गुजरने वाला कोई पथिक जाने की इच्छा ना रखे ऐसा संभव नहीं है।


लामायुरू का छोटा सा क़स्बा 

लामायुरु और अलची की गणना लद्दाख के प्राचीनतम बौद्ध मठों में की जाती है। यहाँ लगा सूचना पट्ट इसे दर्शनशास्त्र के विद्वान नरोपा द्वारा ग्यारहवीं शताब्दी में बनाए जाने की बात कहता है। नरोपा का जन्म बंगाल में हुआ था और बारह साल के गहन ध्यान के बाद उन्होंने हिमालय की इन वादियों की और कूच किया था। 


लामायुरु की महत्ता इस बात में है कि आज भी यहाँ बौद्ध इतिहास के कई प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं। अलची को छोड़ दें तो लद्दाख के इन मठों की आंतरिक सज्जा चटक रंगों से भरी पड़ी है और यहाँ तिब्बत से फैला हुआ तांत्रिक बौद्ध धर्म पूरी तरह पाँव पसारे दिखता है जो कि बिहार और ओड़ीसा के सादे मठों से सर्वथा भिन्न है।
लामायुरू के भगवन बुद्ध 
बौद्ध मठों  में प्रार्थना के दौरान इस्तेमाल होने वाला चिर परिचित दीपक 

जब मैं वहाँ पहुँचा दिन चढ़ चुका था पर बादलों की वजह से धूप का नामो निशान नहीं था। मंदिर के मुख्य कक्ष में वीरानी छाई थी। सुबह की पूजा हो चुकी थी और शाम की होने में अभी वक़्त था। कक्ष में एक लामा बैठा था पर वहाँ उसके रहने का प्रयोजन पूजा पाठ से ज्यादा बाहर से आए पर्यटकों पर नज़र रखना था ताकि वो मठ की गरिमा को बनाए रखें। ऐसे उदासीन माहौल में ज्यादा देर मठ के अंदर रहने का मन नहीं किया और हम बाहर निकल आए। मठ से बाहर निकलते ही मूनलैंड का सारा इलाका और समीप से दिखा और आँखें आश्चर्य से फटी रह गयीं।  

मूनलैण्ड  के दूसरी ओर  की अजीबो गरीब पर्वतीय संरचना
मूनलैण्ड से सटी पर्वतीय संरचनाएँ ऐसी थीं मानो दीमकों ने पहाड़नुमा बांबी खड़ी कर दी हो। मिट्टी के रंग की ये चट्टानें हल्की बारिश की वजह से  बीच-बीच में स्याह हो गई थीं।
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दूसरी ओर मूनलैंड का तो स्वरुप ही अनोखा था। ऐसा प्रतीत होता था कि दो  विशाल पर्वतों की तलहटी में किसी ने तपता हुआ लावा बहने के लिए छोड़ दिया हो और लावे की गर्मी से ऊपरी सतह का रंग बिल्कुल  बदल गया हो।

मूनलैंड को अपलक निहारते हुए मन में भाँँति भाँँति के विचार उठ रहे थे। कैसे बना होगा यह? क्या शुरू से ये ऐसा ही था या फिर लावा की बहती नदी को नरोपा ने अचानक ही मूर्तिवत बन जाने का आदेश दे दिया था ? जो भी हो यह अद्भुत संरचना लामायुरु की ओर पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करने में सहायक रही है।
मूनलैंड की ज़मी की सबसे नजदीकी तस्वीर

लामायुरु और मूनलैण्ड  के बाद हमारा अगला पड़ाव था इस इलाके का सबसे प्राचीन बौद्ध मठ अलची। लामायुरु से अलची तक का रास्ता यहाँँ की प्रसिद्ध सिंधु नदी के किनारे किनारे जाता है।  नदी के नीले जल और अचानक से ठीक सामने खड़े हो जाने वाले पहाड़ इस रास्ते की पहचान हैं। पूरे रास्ते में वनस्पति का एक कतरा भी नज़र नहीं आता। पर रंगों की ये कमी पर्वत अपनी बदलती शक्लों से पूरा कर देते हैं। इनकी रंगत भी चट्टानों की प्रकृति के हिसाब से पीली, भूरी, मटमैली से बदलती हुई कभी हल्की बैंगनी सी हो जाती है।

सिंधु नदी 

लामायुरु से अलची करीब साठ किमी की दूरी पर है। अंतिम चार किमी का सफ़र लेह जाते राजमार्ग के दाहिनी ओर सिंधु नदी को पार करते पुल से होकर जाता है और इसके लिए हमें गाड़ी बदलनी पड़ी। लद्दाख का नियम है कि राजमार्ग पर तो श्रीनगर से आने वाली गाड़ियों को अनुमति है पर अगर मुख्य मार्ग से कटने वाले किसी रास्ते पर जाना हो तो उस इलाके की गाड़ी का इस्तेमाल करना पड़ता है। खैर हमारे ट्रेवल एजेंट ने यह तालमेल बिठाया हुआ था कि वहाँ पहुँचने पर हमें अलची  के स्थानीय होटल मालिक द्वारा लिफ्ट मिल जाएगी। वहाँ पहुँचने  में उन सज्जन को थोड़ा वक़्त लगा पर इस वजह से मुझे  सिंधु नदी की कलकल बहती धरा के साथ कुछ वक़्त बिताने का मौक़ा मिल गया।

अल्ची बौद्ध मठ  का मुख्य मंदिर 
ऐसा कहा जाता है कि अलची का निर्माण तिब्बती मूल के प्रसिद्ध विद्वान रिनचेन जांगपो ने किया था। अलची का बौद्ध विहार तीन मुख्य मंदिरों और छोटे बड़े स्तूपों में बँटा हुआ है। हर मंदिर के बाहर जो काष्ठ शिल्प दिखता है वह बहुत सुंदर है। मंदिर के अंदर यहाँ फोटोग्राफी की मनाही थी। अंदर की दीवारों पर  बेहद रमणीक भित्तिचित्र बनाए गए है। खासकर यहाँ के सुमस्तेक मंदिर(Sumstek Temple) के अंदर दीवार पर उकेरी चित्रकला बेहद मोहक है ।


मंदिर के अंदर घुसने वाला दरवाजा इतना नीचा है कि आप झुके बिना अंदर प्रवेश ही नहीं कर सकते। शायद इसे ऐसा इसलिए बनाया गया होगा कि भगवान के समक्ष शीश झुका रहे। अंदर घुसते ही कमरे का अँधेरा आपको विचलित करता है। जब आंख इस अँधेरे की अभ्यस्थ हो जाती है तब दीवारों पर बने रंग बिरंगे चित्र अचानक से आपको विस्मित कर देते हैं। दरवाजे के ऊपर महाकाल की नीले रंग की आकृति बनी है। मंदिर के अंदर बोधिसत्व के तीन अलग अलग शिल्प हैं। महासिद्धों, बुद्ध के विभिन्न रूपों के आलावा यहाँ तारा और आम जनों के विभिन्न क्रियाकलाप भी चित्रों का विषय बने हैं। चित्रों में दिखते तमाम वस्त्रों के आधार पर ये आप सहजता से कह सकते हैं कि उस ज़माने में मध्य एशिया से जाने वाला व्यापार मार्ग जिसे सिल्क रूट भी कहा जाता था, खूब फल फूल रहा था। 
अल्ची बौद्ध मठ 
मठ के अंदर एक और गौर करने वाली बात यहाँ की सपाट छत है जिसके लकड़ी के बने साँचों में ऐसे डिजाइन बनाए गए हैं जिन्हें देख कर आपको लगेगा कि उनके बीच अलग अलग तरह के कपड़े लगे हैं। इतिहासकार इससे ये अनुमान लगाते हैं कि भिन्न भिन्न कोटि के वस्त्र उस ज़माने में लोगों द्वारा पहने जाते होंगे और चित्रकारों ने उन्ही से प्रेरणा लेकर छतों का रंग रोगन किया होगा। आज बौद्ध धर्म की ये ऐतिहासिक धरोहर लिकिर मठ की देखरेख में है। अगर आप बौद्ध धर्म के वज्रयान संप्रदाय के इतिहास में रुचि रखते हों तो अलची अवश्य आएँ।
छत के ऊपर चढ़ने  की सीढ़ी 
अलची के बौद्ध मठ में आप लद्दाख के गांव में प्रयुक्त होने वाले लकड़ी की इस विशिष्ट सीढी को भी देख सकते हैं जो छतों पर जाने के लिए प्रयोग की जाती है
उत्सवों में पहनी जाने वाली लद्दाखी टोपी 
अलची मठ से बाहर निकलने का रास्ता एक पतली गली से होकर गुजरता है जिसमें सुबह और शाम बाजार लगता है। हजार जनों वाले यहाँ के गाँव में देशी विदेशी पर्यटकों के लिए होटल और रिसार्ट तक बने हुए हैं।
बुद्ध बाज़ारों में 

कश्मीर लद्दाख यात्रा में अब तक 

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Saturday, July 14, 2018

TVS Jupiter : एक अग्रणी उत्पाद के अंतिम रूप में आने की कहानी मेरी जुबानी ! Brand development story of a flagship product !

अपने जीवन में हम कई तरह के उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि रोज़ाना इस्तेमाल होने वाली चीजें आखिर बनती कैसे हैं और उन्हें अपने अंतिम रूप में लाने के पहले कितनी मेहनत मशक्कत की जाती है? ऐसे ही रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली एक वस्तु है हमारा दुपहिया वाहन जिसके बिना एक मध्यमवर्गीय परिवार का काम सुचारु रूप से चल ही नहीं सकता। इसीलिए ब्लॉगरों की सबसे बड़ी संस्था इंडीब्लॉगर के सौजन्य से जब TVS Motor Company ने अपने अग्रणी उत्पाद TVS Jupiter के बारे में बताने के लिए तमिलनाडु में अपने होसूर स्थित संयंत्र में आने का आमंत्रण भेजा तो मैंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। 
कर्नाटक के मानसूनी रंग
होसूर में TVS का ये संयंत्र बिल्कुल तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर स्थित है। बेंगलुरु से होसूर की दूरी महज चालीस किमी है पर जब आपका सामना वहाँ के मंथर गति से चलते अतिव्यस्त ट्राफिक के साथ होगा तो ये दूरी सौ किमी से कम की नहीं लगेगी। सुबह सुबह हम इस ट्राफिक का शिकार हुए और नतीजन अपने गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते हमें एक घंटे से भी ज्यादा की देरी हो गयी। इससे पहले भी मैंने इस तरह के आयोजनों में हिस्सा लिया है पर इस आयोजन की खास बात ये थी कि इसमें सिर्फ भारतीय भाषाओं के ब्लॉगरों को आमंत्रित किया गया था, यानि हिंदी के आलावा तमिल और कन्नड़ भाषी ब्लॉगर इस सफ़र में हमारे सहयात्री थे। ये इस बात का द्योतक है कि आज कंपनियाँ ये समझ रही हैं कि अपने ग्राहकों तक पहुँचने के लिए उनसे उनकी भाषा में बात करनी होगी।


होसूर के पास हम पहुँच ही रहे थे कि हमारी बस ने गलती से एक ग्रामीण इलाके से होकर जाने वाली सड़क का मोड़ ले लिया। ये एक तरह से अच्छा ही हुआ क्यूँकि बाहर का नज़ारा एकदम से बदल गया। कर्नाटक की लाल मिट्टी और हरे भरे खेत और काले बादल मिलकर प्रकृति की मोहक छवि दिखला ही रहे थे कि अचानक इनके साथ नारियल पेड़ों की लंबी कतार का खूबसूरत परिदृश्य  मन को आनंदित कर गया।

ये चला ब्लॉगरों का जत्था बेंगलुरु से होसूर की ओर

जैसी ही हम कर्नाटक की सीमा पार कर होसूर पहुँचे TVS का संयंत्र सामने आ गया। मैं अपने काम के सिलसिले में कई संयंत्रों में गया हूँ पर इतना हरा भरा प्लांट मैंने पहली बार देखा। साथ ही अंदर की स्वच्छता देख कर मन प्रसन्न हो गया। कार्यक्रम की शुरुआत में हमें बताया कि TVS Jupiter ब्रांड को बनाने के पहले मार्केटिंग टीम ने किस तरह से बाजार का अध्ययन किया। उनके समक्ष मुख्य मसला था कि समाज का कौन सा वर्ग इस स्कूटर का इस्तेमाल करेगा, वो किन बातों के लिए इसका प्रयोग करेगा और बाकी प्रतिद्वंदियों के रहते हुए उसे ऐसी क्या ज्यादा सहूलियतें दी जाएँ कि वो स्कूटर खरीदने जाए तो TVS Jupiter का चुनाव करे।

TVS Jupiter  ब्रांड के इस रूप में आने की कहानी बताते अधिकारी

बाजार के सर्वेक्षण से जो नतीजे निकले उसके बाद ये निर्णय लिया गया कि इसे ज्यादातर तीस से पैंतालीस साल के पुरुष अपने परिवार की सारी छोटी बड़ी जरूरतों के लिए इस्तेमाल करेंगे। उनकी आवश्यकताओं के हिसाब से  110 cc और  7.88 BHP का शक्तिशाली इंजन चुना गया ताकि अगर स्कूटर fully loaded  भी रहे तो उसकी गति और Pickup से कोई समझौता ना हो।  ग्राहकों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए पैर रखने और सीट के नीचे सामान रखने की जगह में इज़ाफा किया गया। पेट्रोल भरवाते वक़्त सीट उठानी ना पड़े इसलिए कार की तरह बाहर ही फिलिंग प्वाइंट बनाया गया। फिर बात आई उसके रूप रंग की क्यूँकि अधिकतर उपभोक्ता चाहते थे कि वो ऐसे आकर्षक स्कूटर के स्वामी बने जिस पर उन्हें गर्व हो। उनकी पसंद के हिसाब से स्कूटर का बाहरी आकार, सीट और रंगों की विविधता तय की गयी।

TVS की पाठशाला

साल 2013 में ये स्कूटर बाजार में लाया गया और आज अन्य स्कूटरों की तुलना में सबसे तेजी से पाँच सालों में ये पच्चीस लाख उपभोक्ताओं की पसंद बन गया है। TVS ने ज्यादा का फायदा की अपनी टैगलाइन को घर घर तक पहुँचाने के लिए अमिताभ बच्चन को अपना ब्रांड एम्बैस्डर बनाया। 2017 में इसके बाहरी रूप को क्लासिक वर्जन में औेर सँवारा गया और डिकी में USB Charging port की सुविधा भी दे दी गयी। इस ब्रांड को इस रूप में लाने वाले अभियंताओं की खुशी तब दोगुनी हो गयी जब साल 2018 में J. P. Power ने  Most appealing executive scooter के लिए TVS Jupiter को  चुना


हिंदी, कन्नड़ और तमिल भाषाओं के ब्लॉगर
स्कूटर के बारे में ये सारी जानकारियाँ लेने के बाद ब्लॉगरों के समूह को उस संयत्र के अंदर ले जाया गया जहाँ स्कूटर के साथ मोपेड का निर्माण चल रहा था। सारे कर्मचारी अपने अपने काम में व्यस्त थे। मशीनिंग और पेंट विभाग में बारीक काम के लिए रोबोट्स और सी एन सी मशीनों का व्यापक इस्तेमाल हो रहा था। मशीनों और रोबटों को बिना किसी मानवीय नियंत्रण के इस तरह काम करते देखना एक रोचक अनुभव था। महिलाएँ, कामगारों के समूह का एक अहम हिस्सा बने इसलिए कंपनी ने पूरे कार्मिकों में करीब एक तिहाई नियुक्ति महिलाओं की ही की है। इंजन एसेंबली में तो पूरे आत्मविश्वास से काम करती हुई वो बहुतायत में दिखीं। आख़िर में हम फाइनल एसेंबली विभाग में पहुँचे जहाँ हर मिनट में करीब दो स्कूटर बन के निकल रहे थे और उसके बाद उनका परीक्षण हो रहा था।

कैसी लगी आपको मेरी ये वेशभूषा 😂 ?
पर असली आनंद तो तो तब आया जब हमें स्कूटर की टेस्ट ड्राइव करने के लिए टेस्ट ट्रैक ले जाया गया। आख़िर हमें स्कूटर की इतनी खूबियों के बारे में बताया गया था पर उनमें से कुछ का तो ख़ुद अनुभव तभी हो सकता था जब उसकी सवारी की जाए।

टेस्ट ड्राइव को तैयार
पहले हमें ट्रैक में प्रयोग होने वाले रास्ते से अवगत कराया गया। फिर किसी अनहोनी को टालने के लिए सिर से पैर तक सुरक्षा कवचों से लैस कर दिया गया। यूँ कह लीजिए कि हमारी वेशभूषा ऐसी थी कि दूर से पहचानना भी मुश्किल हो गया। घुमावदार रास्तों से गुजरते ट्रैक के हम सभी ने दो चक्कर लगाए। टेस्ट ड्राइव करने के बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ कि यह स्कूटर काफी संतुलित है और इसका पिक अप भी बेहतरीन है। इस  श्रेणी के स्कूटरों के बारें में एक शिकायत इनकी कमजोर फाइबर बॉडी का होना है। वहीं अगर पूरी फ्रेम ही धातु की बना दी जाए तो गाड़ी का वजन काफी बढ़ जाता है। इस परेशानी को दूर करने के लिए TVS ने स्कूटर के उन हिस्सों को धातु का बनाया है जो गिरते वक़्त सड़क के संपर्क में सबसे पहले आते हैं। इस स्कूटर से जुड़ी अन्य तकनीकी जानकारी आप यहाँ से ले सकते हैं

TVS Motor Company के अधिकारियों के साथ
विदा लेने के पहले हमारी मुलाकात संयंत्र के वरिष्ठ अधिकारियों से हुई। हमने स्कूटर का इस्तेमाल करने वालों की अपेक्षाओं से उन्हें अवगत कराया। बाहर मौसम तेजी से करवट ले रहा था। काले बादलों की खेप आने वाली वर्षा का संकेत कर रही थी। वापस उसी ट्राफिक से गुजरना था तो हम सबने TVS Jupiter की टीम से विदा ली।

आशा है कि एक स्कूटर के ब्रांड के रूप में स्थापित होने की ये प्रक्रिया आपको रोचक लगी होगी। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

Monday, July 2, 2018

आइए चलें कारगिल से होते हुए लामायुरु के सफ़र पर Kargil to Lamayuru via Fotu La

सोनमर्ग, जोजिला, द्रास घाटी होते हुए कारगिल में रात बिताने के बाद  हमारा समूह अगली सुबह लामायुरु के बौद्ध मठ की ओर निकल पड़ा। कारगिल से लामायुरु की दूरी करीब सौ किमी की है पर घुमावदार रास्तों पर रुकते चलते इस सफ़र में करीब तीन घंटे लग ही जाते हैं। कारगिल शहर से निकलते कुछ दूर तो रास्ता सही था पर पशकुम के आस पास सड़क पर पानी जमा हो जाने से रास्ता जर्जर हालत में मिला।  

फ़ोतु ला से लामायुरु की ओर उतरता श्रीनगर लेह राजमार्ग

ये परेशानी पर दस पन्द्रह मिनटों की ही थी। कारगिल से निकलने के आधे घंटे बाद हम सफ़र के आपने पहले पड़ाव मुलबेक की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। इस इलाके से वाखा नदी बहती है जो ज़ांस्कर श्रंखला से निकलकर कारगिल के पास सुरु नदी में मिल जाती है। यही वजह है कि कारगिल से मुलबेक के बीच का इलाका बेहद हरा भरा है। पोपलर, विलो के पेड़ों के बीच यहाँ सब्जियों के खेत भी दिखाई दिये।

हरे भरे खेत जो नीले आकाश के साथ और खिल उठते हैं
बालटिस्तान से कारगिल के संस्कृतिक जुड़ाव का जिक्र तो मैंने पिछली पोस्ट में आपसे किया ही था। कारगिल जिले की तीन चौथाई से ज्यादा आबादी शिया मुस्लिमों की है। ज़ाहिर सी बात है कि इस रास्ते में बहुतेरी मस्जिदें भी देखने को मिलीं। खारंगल के पास की एक छोटी सी मस्जिद तो अनोखी बनावट लिये हुई थी। यहाँ मस्जिद का गुम्बद सीमेंट और पत्थर से ना बना हो कर स्टील की चादरों को जोड़ कर बनाया गया था।

कारगिल जिले की बाकी आबादी बौद्ध और हिंदू धर्मावलंबियों की है। यहाँ बोली जाने वाली भाषाएँ यूँ तो उर्दू लिपि  में लिखी जाती हैं पर उनके बोलने का लहजा कश्मीरी उर्दू से बिल्कुल भिन्न है। जब भी बातचीत का सिलसिला स्थानीय लोगों से चला तो यही आभास हुआ कि यहाँ के लोग भारतीय सेना को गर्व से देखते हैं और उनके कार्यों में सहयोग देने में कभी पीछे नहीं हटते।

चंबा, मुलबेक की प्राचीन प्रतिमा
मुलबेक और बुद्धखरबू इस जिले के दो ऐसे कस्बे हैं जहाँ बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। वैसे लेह की ओर जाते जाते तिब्बती बौद्ध संस्कृति का असर उत्तरोत्तर बढ़ता चला जाता है। पर्यटकों को मुलबेक इसलिए भी लुभाता है क्यूँकि यहाँ सड़क के किनारे सीधी खड़ी चट्टान पर भगवान बुद्ध की 26 फीट ऊँची आकृति को तराशा गया है। सत्तर के दशक में इस प्रतिमा के  ठीक सामने एक बौद्ध मंदिर का भी  निर्माण किया गया है। 



चम्बा की ये मैत्रेयी बुद्ध की प्रतिमा कुषाण काल में ईसा पूर्व पहली शताब्दी में बनी है, इसकी घोषणा यहाँ का सरकारी सूचना पट्ट करता है पर इतिहासकार इसे आठवीं शताब्दी का बताते हैं। ये प्रतिमा आने वाले समय के संभावित बुद्ध की है जो मैत्री का प्रतीक हैं और इसीलिए इन्हें मैत्रेयी बुद्ध के रूप में कल्पित किया गया है। चट्टान पर उकेरे बुद्ध के इस मोहक रूप के पास खारोष्ठी लिपि में एक संदेश लिखा गया है। ये संदेश यहाँ के तत्कालीन  राजा  का है और स्थानीयों को जीवित जानवरों की बलि चढ़ाने की मनाही करता है। हालांकि कहा जाता है कि यहाँ के लोगों को राजा का ये आदेश नागवार गुजरा क्यूँकि उन्हें लगता था कि अगर हम बलि चढ़ाना बंद कर दें तो हमारे इष्ट देव हमसे प्रसन्न कैसे होंगे?

मंदिर के पुजारी बताते हैं कि कुछ साल पहले यहाँ दलाई लामा भी आए थे। बुद्ध की प्रतिमा से सुसज्जित ये मंदिर तो छोटा सा है पर यहाँ आकर सबसे मजेदार बात लगी भगवान बुद्ध के चरणों में चढ़ावे की प्रकृति को देखकर। देशी शीतल पेय Thumbs Up से लेकर यहाँ Four Season, Treat और Fresca जैसे विदेशी ब्रांड बुद्ध के चरणों में समर्पित थे। अब सारा सुख वैभव छोड़कर दुख का कारण जानने के लिए निकले सिद्धार्थ को क्या पता था कि इतनी तपस्या के बाद व मोक्ष तो पा जाएँगे पर एक दिन भिक्षा के नाम पर उनके अनुयायी शीतल पेय का प्रसाद चढ़ाएँगे।

मुलबेक का बौद्ध मंदिर
मुलबेक से फ़ोतु ला की ओर बढ़ने से पहले मुझे नहीं पता था कि बीच में एक दर्रा और पड़ता है जिसे नामिक ला के नाम से जाना जाता है। नामिक ला की विशेषता है कि यहाँ से गुजरते वक़्त एक ऐसी चोटी दिखती है जो एक पहाड़ के बीचो बीच खंभे की तरह आसमान छूती प्रतीत होती है। मैंने वो अद्भुत चोटी तो देखी पर उसकी तस्वीर लेते लेते नामिक ला का साइनबोर्ड कब गुजर गया पता ही नहीं चला।

खंगराल जहाँ से बटालिक से आता एक रास्ता मिलता है
खंगराल के पास एक रास्ता कारगिल से बटालिक और दाह होते हुए श्रीनगर लेह राजमार्ग से मिल जाता है। यहाँ फिर हरे भरे खेतों के दर्शन हुए। इसके बाद ऍसी हरियाली लेह तक नहीं दिखी।

नामिक ला और फ़ोतु ला के बीच
खंगराल से जैसे जैसे हम फ़ोतु ला की ओर बढ़ रहे थे वैसे वैसे आसमान की  रंगत और नीली होती जा रही थी।खिली धूप, गहरा नीला आकाश और उन पर थिरकते सफेद बादलों का छोटा सा पुलिंदा मन को पुलकित  किए जा रहा था। ये सम्मोहन इतना बढ़ गया कि फ़ोतु ला के पहले ही मैंने गाड़ी रुकवाई और दूर दूर तक फैली चोटियों और उनमें पसरी शांति को महसूस करना चाहा। दरअसल लद्दाख आने का सुख असल मायने में यही है कि आप चित्त स्थिर कर देने वाली यहाँ की प्रकृतिक छटा को अपलक निहारते हुए यूँ  डूब जाएँ कि आपको ख़ुद का भी ध्यान ना रहे।

इस बादल को देख कर जी चाहा कि आसमान की तरह मैं भी इसे अपने आगोश में भर लूँ
खंगराल के बाद अगला गाँव बुद्धखरबू का मिला। यहाँ सड़क के किनारे ही एक बौद्ध मठ है। पर यहाँ रुके बिना हम फोटु ला की ओर बढ़ गए।
गगनभेदी पर्वतों के बीच नीले आसमान की छतरी
लगभग ग्यारह बजे हमारा समूह फ़ोतु ला पहुँच चुका था। वैसे इस दर्रे को फोटुला के नाम से भी जाना जाता है जो इसका सही उच्चारण नहीं है। साढ़े तेरह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित ये दर्रा इस राजमार्ग का सबसे ऊँचा दर्रा है। जहाँ जोजिला अपने खतरनाक रास्तों के चलते एक यात्री के मन में भय पैदा करता है वहीं फ़ोतु ला से दिखती अलग अलग रंग की पहाड़ियाँ और उनमें छाई गहरी निस्तब्धता एक आंगुतक को अपने मोहपाश में जकड़ लेती है। फ़ोतु ला से जब आप नीचे के सर्पीलाकार रास्तों की लड़ियाँ देखते हैं तो मन एक रोमांच से भर उठता  है।

फ़ोतु ला की ऊँचाइयों तक पहुँचने पर दिखता है इन सर्पीली सड़कों का जाल

फ़ोतु ला के पास पहुँचने पर धूप तो ठीक ठाक थी पर साथ थे बर्फीली हवाओं के थपेड़े 

फ़ोतु ला के पास ही दूरदर्शन का ये टीवी टॉवर है
फोतु ला पर ही प्रसार भारती का एक दूरदर्शन रिले स्टेशन हैं। यहाँ से लामायुरु तक का रास्ता अपने तीखे घुमावों और ढलान से अच्छे अच्छों का सिर घुमा देता है। सिर्फ पन्द्रह किमी की यात्रा में आप 500 मीटर नीचे पहुँच जाते हैं।
फ़ोतु ला से लामायुरु की राह पर
मटमैले पहाड़ कई परतों में हमारे सामने खड़े थे।  उनकी विशालता के सामने श्रीनगर लेह राजमार्ग चींटी की तरह उनके चरणों में रेंगता सा दिख रहा था। बादलों की आवाजाही में ये पहाड़ गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लेते। 
इन विशाल पहाड़ों के चेहरे का रंग अगर कोई बदल सकता है तो  वो हैं ये मनचले बादल
बहुत दूर तक ये परिदृश्य मन को लुभाता रहा कि तभी अचानक नीचे उतरते उतरते लामायुरु के बौद्ध मठ अपनी पहली झलक दिखला गया। क्या दृश्य था वो ! लद्दाख के पहाड़ों की गोद में खेत खलिहानों की हरी चादर लपेटे एक इमारत मुस्कुराती हुई सी खड़ी हो।
और ये पहुँच गए हम लोग लामायुरु के बौद्ध मठ के पास
लामायुरु के बौद्ध मठ के साथ अगली कड़ी आपको दिखाऍगे यहाँ का मूनलैंड और फिर आपकी मुलाकात कराएँगे सिंधु यानि Indus से। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो Facebook Page Twitter handle Instagram  पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें।

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