Monday, April 17, 2017

ब्रसल्स के सबसे लोकप्रिय आकर्षण : Atomium & Town Hall, Brussels

हर देश की अपनी एक पहचान होती है जो विश्व के अन्य हिस्सों में रहने वाले लोगों के लिए उस देश का प्रतीक बन जाती है। ज्यादातर ये पहचान चिन्ह इमारतों की शक़्ल में होते हैं। भारत का ताजमहल, चीन की दीवार, मिश्र का पिरामिड, फ्राँस का एफिल टॉवर, इंग्लैंड का बिग बेन ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। अक्सर  ऐसे प्रतीक इतिहास के पन्नों पर अपना महत्त्वपूर्ण दखल रखते हैं। पर मगर मैं अगर कहूँ कि एक देश ऐसा भी है जिसका प्रतीक विज्ञान से प्रेरित है तो थोड़ी  हैरत तो होगी आपको।


अगर आप बेल्जियम की राजधानी ब्रसल्स में जाएँ तो प्रतीक के तौर पर आपको  दुकानों, बसों, इमारतों  पर आणविक संरचना बनी दिखाई देगी। बेल्जियम वासियों ने इसका नाम दिया है एटोमियम । स्कूल में आपने धातु क्रिस्टल की संरचना पढ़ते हुए BCC (Body Centered Cubic) व  FCC (Face Centered Cubic) के बारे में पढ़ा होगा। अब याद ना भी हो तो मैं याद दिला देता हूँ। दरअसल ये एक घन यानि क्यूब के विभिन्न बिंदुओं पर अणु की पारस्परिक स्थितियों का चित्रण था।  ये भी तब बताया गया था कि लोहे के अणु  BCC सरीखी संरचना लिए होते हैं। एक घन यानि क्यूब के सारे कोनों पर और एक ठीक घन के मध्य में।



पचास के दशक में यूरोप के वैज्ञानिक नित नई खोजों में लीन थे। बेल्जियम भी इससे अछूता नहीं था और जीवन में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के ख़्याल से यहाँ EXPO 58 के तहत 1958 में एटोमियम का निर्माण हुआ। लोहे के क्रिस्टल की संरचना को 16500 करोड़ गुणा बना कर ये इमारत बनाई गयी। एक BCC के रूप में इसमें अठारह मीटर व्यास के नौ अलग अलग गोले बनाए गए। इन गोलों को तीन मीटर व्यास के पाइप से आपस में जोड़ा गया। इस तरह जो ढाँचा बना उसकी की ऊँचाई 102 मीटर थी। आज इस संरचना का प्रयोग एक म्यूजियम के तौर पर होता है। इसके सबसे ऊपरी गोले में एक भोजनालय बना है जहाँ से आप ब्रसल्स शहर का नज़ारा देख सकते हैं।

एटोमियम

एटोमियम के इन गोलों की बाहरी दीवार पर पहले एल्युमिनियम की परत चढ़ाई गयी थी। बाद में जब इनकी मरम्मत हुई तो इसे स्टेनलेस स्टील का बना दिया गया। दो गोलों को जोड़ने वाली पाइप के भीतर सीढ़ियाँ और एस्कलेटर्स लगे हैं जिससे आप एक गोले से दूसरे गोले तक पहुँच सकते हैं। पर ऊपर वाले चार गोलों में सुरक्षा की दृष्टि से सिर्फ सबसे ऊँचाई वाले गोले तक जाने की अनुमति है।


एटोमियम के ठीक सामने पर्यटकों के स्वागत के लिए वेलकम का बोर्ड लगा है जिसमें संसार की सारी प्रमुख भाषाओं में YOU ARE WELCOME का अनुवाद किया गया है। आपके मन में उत्सुकता होगी कि क्या हिंदी इनमें शामिल थी? हाँ जी बिल्कुल थी। यूरोप में हिंदी में लिखा पहला वाक्य मैंने यहीं देखा। अगर आप भी ये देखना चाहते हैं तो नीचे के चित्र पर क्लिक कर बड़ा कीजिए और लेटर 'E' को ध्यान से देखिए। आपको "आपका स्वागत है" लिखा दिख जाएगा। 😀

आपका स्वागत है 😍
एटोमियम को देखने के बाद अगले दिन सुबह सुबह हम चल पड़े ब्रसेल्स के केंद्रीय बिंदु यानि ग्रैंड प्लेस की तरफ़। ग्रैंड प्लेस ब्रसल्स का सबसे लोकप्रिय पर्यटक स्थल है। बाहर से आने वाले आंगुतक यहाँ के से्ट्रल स्कवॉयर पर आपको भारी संख्या में मिल जाएँगे। ये स्कवॉयर है भी आलीशान। करीब 110 x 70 वर्ग मीटर में फैले इस चौकौर हिस्से को यूनेस्को ने हेरिटेज साइट का दर्जा दे रखा है।

टाउन हॉल
ब्रसल्स के इस स्क्वॉयर पर सबसे खूबसूरत इमारत है टाउन हॉल की। टाउन हॉल का भी एक बड़े उतार चढ़ाव वाला इतिहास रहा। बारहवीं शताब्दी में ये इलाका एक छोटे मोटे व्यापार केंद्र के रूप में आरंभ हुआ। पहले खुले में बाजार लगते थे। तेरहवीं शताब्दी में इमारतों के अंदर बाजान का चलन शुरु हुआ और अगले दो सौ साल में ब्रसल्स का ये इलाका कपड़ों और खान पान की वस्तुओं के एक बड़े बाजार के रूप में जाना जाने लगा। व्यापार बढ़ा तो शहर में एक नगर निकाय की आवश्यकता महसूस हुई और इसी वज़ह से  पन्द्रहवीं शताब्दी में यहाँ के व्यापारियों ने मिलकर  टाउन हॉल का निर्माण किया।

टाउन हॉल का खूबसूरत शिखर
इस इमारत का सबसे आकर्षक हिस्सा 96 मीटर ऊँचा इसका टॉवर है। इस टॉवर के ऊपर एक मूर्ति लगी हुई है जो  संत माइकल की है । टाउन हाल के ठीक सामने यहाँ के ड्यूक ने अपने रहने के लिए एक इमारत बनाई। पर संयोगवश ड्यूक उसमें कभी रहे नहीं। आज ये इमारत यहाँ के संग्रहालय में तब्दील हो चुकी है।

खिड़कियों के बीच बनी मूर्तियाँ ही बाहरी साज सज्जा का मुख्य आकर्षण हैं।
टॉउन हाल के चारों तरफ व्यापारियों, कलाकारों के समूह ने अपने अपने गिल्डहाउस बनाए। पर युद्ध की विभीषिका कई बार झेलने की वज़ह से ये गिल्डहाउस कई बार नेस्तानाबूद कर दिए गए और फिर दुबारा बने। इस स्क्वॉयर पर आपको कई चित्रकार इन ऐतिहासिक गिल्डहाउस के चित्र बनाते दिख जाएँगे।

अपने उद्भव काल में कुल नौ गिल्ड हुआ करते थे जिसे उस वक़्त नेशन के नाम से पुकारा जाता था। ये नेशन ज्यादातर ईसाई संतों के नाम पर थे मसलन नेशन आफ सेंट जॉन या नेशन आफ सेंट पीटर वैगेरह वैगेरह। किसी विशेष गिल्ड के लिए तब ये जरूरी नहीं था कि वे एक ही तरह के सामान बेचें। एक गिल्ड तो ऐसा था जहाँ सब्जी मछली और मांस की दुकानों के सुनार और चाँदी काा काम करने वाले भी बैठते थे।


यूनेस्को की हेरिटेज सूची में शामिल है ये चौकोर इलाका

अठारहवीं वीं शताब्दी के आख़िर में फ्राँस की फौजों ने इन गिल्डस को तकरीबन बंद करवा कर इनकी मिल्कियत को सरे बाजार नीलाम कर दिया। स्कवॉयर के चारों तरफ आज भी कपड़ो और खाने  पीने की कई दुकाने हैं। जैसा कि मैंने आपको अपनी पिछली पोस्ट में बताया था कि ये इलाका मशहूर बेल्जियम चॉकलेट का प्रमुख विक्रय केंद्र है।

गिल्ड का सुनहरा आवरण प्रकाश का सामीप्य पाकर चमक उठता है।
व्यापार के इन प्राचीन केंद्रों की बगल से गुजरते हुए हम टॉउन हॉल से बाँयी ओर मुड़ गए। एमस्टर्डम की तरह यहाँ भी मुझे शाही घोड़ा गाड़ी देखने को मिली। बेल्जियम असल में कई सालों तक आस्ट्रिया और फिर डच वासियों के प्रभुत्व में रहा। आज भी इसके उत्तरी हिस्से में लगभग साठ फीसदी डच आबादी है वहीं दक्षिण के क्षेत्र में  ज्यादातर लोग फ्रेंच हैं।  इसके अलावा जर्मनी से सटे एक छोटे से हिस्से में जर्मन बहुमत में हैं। यही वज़ह है कि इतने छोटे से देश में भारत की तरह ही विभिन्न संस्कृतियाँ साथ साथ पलती हैं। शायद कभी बेल्जियम ज्यादा समय रहने को मिले तो इस विविधता का नजदीकी से आकलन कर पाऊँ।

जापान में भी ऐसे ही डिजाइन का बाजार देखा था मैंने, वैसे ये ज्यादा पुरानी इमारत है
बहरहाल उस सड़क पर चलते हुए एक मजेदार सी चीज देखने को मिली जिसके बारे में वहाँ खड़ी भीड़ से तो मुझे यही लगा कि सिर्फ मैं ही इसके बारे में अनजान हूँ। भीड़ में जब जगह बनाई तो देखा कि छोटे बच्चे की दो फीट ऊँची प्रतिमा को लोग टकटकी लगा कर देख रहें हैं और बच्चा भी बड़े  आराम से सूट बूट पहन कर सू सू कर रहा है। इस प्रतिमा का नाम है मानेके पिस्स जिसका डच भाषा में अर्थ है सू सू करता बच्चा।

अब ये प्रतिमा यहाँ क्यों बनाई गयी इसको लेकर कई कहानियाँ है। पर सबसे प्रचलित कथा ये बताई जाती है कि बारहवीं शताब्दी में एक ड्यूक अचानक चल बसे। उनका एक छोटा सा बालक था। उत्तराधिकारी की अनुपस्थिति में विरोधियों ने ड्यूक के इलाके में हमला बोल दिया। ड्यूक की सेना मोर्चे पर आई पर सैनिकों का कहना था कि वो तभी लड़ पाएँगे गर राजा उन्हें दिखाई दे। फिर क्या था एक ओक वृक्ष पर बच्चे का झूला बनाया गया। शुरुआत में ड्यूक की सेना को पीछे हटना पड़ा पर जब वे अपने राजा के पास लौटे तो देखा राजा मजे में अपनी टोकरी में लेटे हुए निर्मल धारा का प्रवाह कर रहे हैं। ये दृश्य सैनिकों में फिर उर्जा का संचार कर गया और फिर उन्होंने विरोधियों के दाँत खट्टे कर दिए।

मानेके पिस्स जिसका डच भाषा में अर्थ है सू सू करता बच्चा

अब सच्चाई जो भी हो ब्रसल्स जाने पर आप इनसे दूर से ही सही बिना मिले वापस नहीं आ सकते। वैसे अगर ये इस रूप में ना भी नज़र आएँ तो चौंकिएगा मत। ये जनाब हफ्ते में कई बार अपनी वेशभूषा बदलते रहते हैं। बेल्जियम में दो दिन बिताने के बाद हमें जाना था फ्रांस की दिशा में। पर रास्ते में जो खेत खलिहान व गाँव देखने को मिले उनकी झलक दिखलाएँगे इस श्रंखला की अगली कड़ी में।

यूरोप यात्रा में अब तक
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Saturday, April 8, 2017

ब्रसल्स, बेल्जियम : चलिए चलें कार्टून व चॉकलेट प्रेमियों के देश में In pictures : Brussels, Belgium

लंदन और एम्सटर्डम के बाद मेरे यूरोपीय सफ़र का अगला पड़ाव था बेल्जियम का शहर ब्रसल्स । यूरोप का ये एकमात्र ऐसा शहर था जहाँ कुछ घंटों के लिए ही सही, कनाडा जाते समय मेरा रुकना हो पाया था। अगर आपको याद हो तो इस इस शहर के खूबसूरत आकाशीय नज़ारों का झरोखा मैंने यहाँ और यहाँ आपको दिखाया था। ब्रसल्स में हम करीब दो दिन रहे। यहाँ की कुछ मशहूर इमारतें भी देखीं। बाजारों में यूँ ही चहलकदमी की और इधर उधर  घूमते फिरते कुछ अलग से नज़ारे कैमरे में क़ैद किये। इमारतों की बारी तो बाद में आएगी। आज तो थोड़ा यूँ ही "बेफिक्रे" घूम लें इन तसवीरों के साथ.. 

टिनटिन के देश में !
बेल्जियम अपने कार्टून चरित्रों के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। कोई भी कार्टून प्रेमी टिनटिन के नाम से भला कैसे अनजान होगा? ये मशहूर चरित्र बेल्जियम से ही ताल्लुक रखता है और इसके रचयिता  Hergé नामक कार्टूनिस्ट थे। ब्रसल्स के बाजारों में  बेल्जियम का पूरा समाज ही कार्टून चरित्रों का रूप धर खिलौने के रूप में बिक रहा था।

बेल्जियम का कार्टून संसार
इन कार्टूनों को ज़रा ध्यान से देखिए डॉक्टर, जज, वकील, इंजीनियर, खानसामे, शिक्षक, खिलाड़ी, नृत्यांगना, वादक, फोटोग्राफर सब नज़र आएँगे आपको। साथ ही नज़र आएँगी पुरुषों के साथ हर क्षेत्र में क़दम मिलाती महिलाएँ जो कि यहाँ की संस्कृति की हक़ीकत भी है। वैसे सबसे  मजेदार चरित्र मुझे खिसकती पैंट और तोंद के साथ वो गोल्फर लगा। आपकी इस बारे में क्या राय है? 😃

ब्रसल्स के पुराने होटलों में से एक,  होटल एमिगो Hotel Amigo
यूरोप की इमारतों में खिड़की के आगे यूँ लटकते गमलों में फूल लगाना आम बात है। सबसे पहले ये नज़ारा मुझे ब्रसल्स के होटल एमिगो में देखने को मिला। अब बाहर से देखने से आपको शायद ही लगे कि ये एक पाँच सितारा होटल है पर इस होटल की ऐतिहासिक विरासत इसे आज भी ब्रसल्स के विशिष्ट होटलों की श्रेणी में ला खड़ा करती है।

कहा जाता है कि इस इमारत की मिल्कियत पाँच सौ साल पहले एक धनी व्यापारी के हाथ थी। 1522 ई में इसे वहाँ की सिटी काउंसिल ने खरीदा । वैसे क्या आप अंदाज लगा सकते हैं कि सबसे पहले इस होटल का प्रयोग स्थानीय प्रशासन ने किस तौर पर किया होगा? जनाब बड़ा मुश्किल है ये अनुमान लगाना। चलिए मैं ही बता देता हूँ ये भवन सबसे पहले एक जेल के रूप में इस्तेमाल किया गया।😀 सन 1957 में ये होटल इस रूप में आया और आज तक अपनी पुरानी विरासत को यूँ ही समेटे हुए है।

Le  Faucon : फ्रांसिसी प्रभाव ब्रसल्स में स्पष्ट दिखता है
ब्रसल्स में सड़कों और रेस्त्रां में लोग बेहद शांत और सहज दिखे। कुछ गलियाँ परंपरागत यूरोपीय शैली की इमारतों से सजी थीं तो कहीं डिजाइन का नयापन ध्यान खींच लेता था।

अब इस बोतलनुमा इमारत को देख के ही नशा आ जाए तो किसी की क्या ख़ता ?

Thursday, March 30, 2017

बड़ा इमामबाड़ा परिसर : जहाँ अकाल ने रखवायी लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों की नींव ! Bara Imambara, Lucknow

बचपन में जब भी दोस्तों के साथ लखनऊ शहर का जिक्र होता तो एक ही बात चर्चा में आती और वो थी यहाँ की भूलभुलैया की। जो भी यहाँ से हो कर आता इसकी तंग सीढ़ियों और रहस्यमयी गलियारों की बात जरूर करता। आज से करीब 28 साल पहले एक प्रतियोगिता परीक्षा देने मैं सन 89 में जब लखनऊ पहुँचा तो इरादा ये था कि परीक्षा जैसी भी जाए इस भूलभुलैया के तिलिस्म से गुजर कर ही लौटूँगा । 

बड़ा इमामबाड़ा का बाहरी द्वार और उद्यान
एक आटो से परीक्षा केंद्र से सीधे भूलभुलैया तक तो पहुँच गया पर पर होनी को कुछ और मंजूर था। उसी दिन शियाओं के सर्वोच्च नेता आयोतुल्लाह खोमैनी का इंतकाल हो गया था। पूरा परिसर ही आम जनता के लिए बंद था। तभी मुझे ये सत्य उद्घाटित हुआ कि भूलभुलैया कोई अलग सी जगह नहीं पर बड़ा इमामबाड़ा का ही एक हिस्सा है। लगभग तीन दशकों बाद जब मैं इस इलाके में पहुँचा तो इमामबाड़े की आसपास की छटा बिल्कुल बदली बदली नज़र आयी। पर इससे पहले कि मैं आपको इस इमामबाड़े में ले चलूँ, कुछ बातें उस शख़्स के बारे में जिसकी बदौलत ये इमारत अपने वज़ूद में आई।
बड़ा इमामबाड़ा सहित लखनऊ की तमाम ऐतिहासिक इमारतों की नींव अवध के चौथे नवाब आसफ़ उद दौला ने रखी थी । आसफ़ उद दौला के पहले नवाबों की राजधानी फैज़ाबाद हुआ करती थी। वे 26 साल की उम्र में नवाब बने पर माँ की राजकाज में दखलंदाज़ी से तंग आकर उन्होंने फैज़ाबाद से राजधानी को लखनऊ में बसाने का निर्णय लिया।
पहले द्वार से घुसते ही दूसरे द्वार की झलक कुछ यूँ दिखाई देती है
बड़े इमामबाड़े का निर्माण एक अच्छे उद्देश्य को पूरा करने के लिए हुआ। 1785 में अवध में भीषण अकाल  पड़ा। क्या अमीर क्या गरीब सभी दाने दाने को मुहताज हो गए। लोगों को रोजगार देने के लिए नवाब ने ये बड़ी परियोजना शुरु की। वे आम जनता से दिन के वक़्त काम लेते। वहीं रियासत के अमीर उमरा रात के वक़्त काम करते ताकि उनकी तथाकथित रईस की छवि पर कोई दाग न लगने पाए । जब तक अकाल रहा इमामबाड़े पर काम चलता रहा। इमामबाड़े, मस्जिद और बाउली के साथ लगे मेहमानख़ाने को पूरा होने में छः साल लग गए।

दूसरा द्वार और इसके पीछे दिखता बड़ा इमामबाड़ा
बड़े इमामबाड़े तक पहुँचने के लिए आप को दो विशाल द्वार पार करने पड़ते हैं। इन द्वारों के बीच की जगह फिलहाल एक खूबसूरत बागीचे ने ले रखी है। इमारत के गुंबद हों, मेहराबें हों या मीनार इन सब पर मुगल स्थापत्य का स्पष्ट  प्रभाव दिखता है।  इमामबाड़े की दीवारों के बारे में यहाँ का हर गाइड बड़े शान से ये बताना नहीं भूलता कि "दीवारों के भी कान होते हैं " ये मुहावरा यहाँ हक़ीकत बन जाता है।

Sunday, March 19, 2017

छोटा इमामबाड़ा : जिसकी सफेद आभा कर देती है मंत्रमुग्ध ! Chota Imambara, Lucknow

लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों का जिक्र वहाँ के इमामबाड़ों के बिना अधूरा है। अवध के नवाब लगभग 130 सालों तक इस इलाके में काबिज़ रहे। पहले मुगल सम्राट के सूबेदार की हैसियत से और बाद में मुगलों की ताकत कम होते ही स्वघोषित स्वतंत्र नवाबों के रूप में। पर उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में ही सत्ता की असली चाभी परोक्ष रूप से अंग्रेजों ने हथिया ली थी। लगभग पचास सालों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के रहमोकरम पर अवध के ये नवाब शासन करते रहे पर सिपाही विद्रोह के दमन के साथ नवाबी हुकूमत का पूर्णतः अंत हो गया।

अवध सूबे की राजधानी पहले फैजाबाद हुआ करती थी बाद में लखनऊ को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया । अवध के नवाब मूलतः ईरानी मूल के शिया थे और आज भी लखनऊ की आबादी एक हिस्सा इस संप्रदाय से ताल्लुक रखता है। शिया संप्रदाय में वैसे तो बारह इमाम यानि धर्मगुरु माने गए हैं पर इनमें उनके तीसरे इमाम हुसैन का विशेष स्थान है। हज़रत हुसैन कर्बला की लड़ाई में अपने परिवार के साथ शहीद हुए थे। शिया मुसलमान उसी तकलीफ़देह घटना के मातम में हर साल मुहर्रम का पर्व मनाते हैं। 

छोटे इमामबाड़े के मुख्य द्वार का अंदरुनी दृश्य
मुहर्रम में जो दस दिन का शोक मनाया जाता है उससे जुड़ी धार्मिक गतिविधियों के लिए बनाया गया स्थल इमामबाड़े के नाम से जाना जाता है। अपनी लखनऊ यात्रा में मैंने छोटे और बड़े दोनों इमामबाड़ों को करीब से देखा और आज मैं आपको ले चल रहा हूँ छोटे इमामबाड़े यानि हुसैनाबाद इमामबाड़े की पवित्रता और खूबसूरती से आपको रूबरू कराने के लिए।

बाहर से ऐसा दिखता है इमामबाड़े का प्रवेश द्वार !
बड़े इमामबाड़े से रूमी दरवाजे होते हुए छोटे इमामबाड़े तक पहुँचने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता। जब आप सड़क से सटे इमामबाड़े का रुख करते हो तो मुख्य द्वार के नीचे बने कमरों में लखनवी चिकन दस्तकारी के साथ कई और दुकानें दिखाई देती हैं।  धार्मिक महत्त्व की इस ऍतिहासिक इमारत के सामने इन दुकानों का होना अजीब लगता है। पता नहीं इन्हें वहाँ रहने की इजाजत किसने दी?

जैसे ही इमामबाड़े के अंदर कदम पड़ते हैं परिदृश्य एकदम से बदल जाता है। नीले आकाश तले फैली सर्वत्र सफेदी देख मन को शांत कर देती हैं। द्वार का अंदर का हिस्सा बेहद आकर्षक है। इस पट और बगल की मीनारों के शीर्ष से तारों का एक जाल एक स्त्री की प्रतिमा के हाथों में आकर ख़त्म होता है। थोड़ी देर में ही सही हमें समझ आ गया कि ये मूर्ति तड़ित चालक का काम कर रही है।
मुख्य द्वार के पास की सुनहरी मछली जो बताती है हवा का रुख

इमामबाड़े में घुसते ही बाँए तरफ़ शाही हमाम की ओर रास्ता जाता है वहीं दाहिनी ओर हुसैनाबाद मस्जिद  नज़र आती  है। द्वार के ठीक सामने हवा में लटकी एक सुनहरी मछली आपका स्वागत करती दिखती है। वास्तव में ये मछली की शक्ल में हवा का  रुख जानने का एक यंत्र है। मछली के नीचे बनी दीवारों में इस्लामी कलमकारी का खूबसूरत नमूना दिखता है। वैसे अगर आपको ख़्याल हो तो अवध नवाबों के झंडों में भी मुकुट एक साथ सुनहरी मछली दिखाई देती है।

हुसैनाबाद इमामबाड़ा जिसे प्रचलन में छोटा इमामबाड़ा भी  कहा जाता है।
इसके ठीक पीछे इमामबाड़े की इमारत अपने भव्य गुंबद के साथ नज़र आती है। ताजमहल में जिस तरह मुख्य इमारत की तरफ़ जाने वाले रास्ते के मध्य में फव्वारे लगे हैं वैसे ही यहाँ भी मध्य में फव्वारों के साथ नहरनुमा हौज और उसके ऊपर एक छोटा सा पुल है। कहते हैं एक ज़माने में वहाँ एक कश्ती भी लगी रहती थी जो बाद में रखरखाव के आभाव में नष्ट हो गयी।
हुसैनाबाद इमामबाड़े के सामने बनी नहर और बाग
इमामबाड़े की मुख्य इमारत में घुसने के पहले हमारे गाइड ने मुझे शाही हमाम को पहले देखने का आग्रह किया। तुर्की, जापान और रोम में सामूहिक स्नानागारों का जिक्र तो आपने सुना होगा पर भारत में विशिष्ट स्नानागार कभी आम लोगों के लिए नहीं बनाए गए। हाँ, नवाबों की बात कुछ और थी।

Sunday, March 5, 2017

एमस्टर्डम : क्या दौड़ता है इस शहर की रगों में ! Spirit of Amsterdam !

हर शहर की अपनी एक खासियत होती है, अपना एक चेहरा होता है। उस चेहरे के भीतर के चेहरे को समझने के लिए आपको उस जगह कई दिन गुजारने पड़ते हैं पर  कम समय में भी अगर आप ध्यान दें तो शहर की कुछ विशिष्टताएँ नज़र तो आ ही जाती हैं। एमस्टर्डम की सवारी साइकिल की चर्चा तो मैंने पिछली पोस्ट में ही कर ली थी। आज आपको दिखाते हैं शहर की ऐसी झलकियाँ जिनमें थोड़ा ही सही, इस शहर का अक़्स नज़र आएगा आपको। 

यूरोपीय शहरों में लोकप्रियता के हिसाब से एमस्टर्डम आठवें स्थान पर आता है। नीदरलैंड में बाहर से जो यात्री आते हैं वो इसके दो राज्यों उत्तरी और दक्षिणी हालैंड में ही सिमट जाते हैं। हेग, राटरडम, क्यूकेनहॉफ और एमस्टर्डम इसी इलाके में स्थित हैं।  एमस्टर्डम में पर्यटकों का सबसे बड़ा जमावड़ा राइक्स म्यूजियम और दाम स्कव्यार के आस पास ही लगता है। राइक्स म्यूजियम के सामने बने प्रतीक चिन्ह पर पर्यटकों की मस्ती देखते ही बनती है।
प्रेमियों के लिए दुनिया की कोई जगह वर्जित नहीं 😆
दाम स्कवायर या एमस्टर्डम सेंट्रल स्टेशन के आस पास ये घोड़ा गाड़ी आपको सहज ही नज़र आ जाएगी। आप इस गाड़ी पर चढ़कर आधे एक घंटे के लिए ही सही अपने आपको विशिष्ट व्यक्ति समझ ही लेंगे क्यूँकि जिधर भी आप जाएँगे बाहरी आंगुतक आपकी तसवीर लेने के लिए लालायित रहेंगे। ये अलग बात है कि उनके आकर्षण का केंद्र आप नहीं बल्कि ये घोड़ागाड़ी होगी। पर फ्रेम में तो आप भी रहेंगे ना 😉। वैसे इस राजा वाली feeling के लिए आपको घंटे भर में सौ यूरो यानि सात हजार रुपये से हाथ धोना पड़ सकता है। सो हुजूर मैंने तो दूर से ही इसके दर्शन कर लिए।

जेब में पैसे हों और मन में राजसी ठाठ बाठ से चलने का इरादा तो ये घोड़ागाड़ी बुरी नहीं है आपके लिए
चित्र में जो दुकान दिख रही है De Bierkoning वो यहाँ की मशहूर बीयर की दुकान है।

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