Thursday, January 22, 2009

बिहार : तसवीरो से निकलती यादें जो उन शहरों को छोड़ने से दब सी गई थीं...

अंतरजाल पर यूँ ही भटक रहा था तो कुछ चित्र दिखाई दिए, उन जगहों के जो सामान्यतः भारत के पर्यटन मानचित्र में नहीं दिखते। ये चित्र बेहद जाने पहचाने थे। ऍसी जगहों के जहाँ मैं किसी यात्रा के दौरान नहीं गया। क्योंकि ये जगहें मैंने एक मुसाफ़िर की तरह नहीं देखीं। इन सब से कहीं न कहीं एक रिश्ता रहा है मेरा और उन्हीं रिश्तों से निकली यादों में से कुछ को बाँटने का प्रयास है मेरी ये पोस्ट...


वैसे किसी आम जन से बिहार की ऍतिहासिक विरासतों के बारे में पूछा जाए तो उसे बोधगया. राजगीर और नालंदा के सिवाए शायद ही किसी और शहर का नाम याद पड़े। पर एक शहर और ऍसा है जिसकी मिट्टी के एक सुपूत ने मुगलकालीन राजवंश की नींव को बनने से पहले ही उखाड़ फेंकने की हिमाकत की थी। मैं बात कर रहा हूँ गैंड ट्रंक रोड (Grand Trunk Road) के रास्ते में आने बाले शहर सासाराम की जिसे शायद लोग शेरशाह सूरी के मकबरे (Shershah' s Tomb) से ज्यादा बाबू जगजीवन राम की वजह से जानते होंगे।



पर इस मकबरे से भला मेरा क्या रिश्ता हो सकता है ? था ना हुजूर ! मेरा पहला स्कूल बाल विकास विद्यालय इसी मकबरे के आस पास हुआ करता था। अक्सर हमारी कक्षा के बच्चों को इस ऐतिहासिक इमारत की सैर पर ले जाया जाता था। रास्ते के दोनों ओर पानी होता और हम उस पतले से रास्ते पर कतार बाँधकर सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर के विशाल गुंबद को निहारा करते। बाल मन में बाकी तो कितना अंकित हुआ ये तो पता नहीं पर शेर शाह सूरी की छवि एक बहादुर शासक के रूप में जरूर मन में चढ़ गई। और जब सातवीं या आठवीं में हुमायूँ को शेरशाह सूरी के हाथों मिली शिकस्त का विवरण पढ़ने को मिला तो मन ऍसा प्रफुल्लित हुआ कि जैसे मेरी सेनाओं ने ही मुगल सम्राट को बाहर खदेड़ दिया हो।


...............१९७७ में पटना आ गया और अगले दस बारह साल यहीं गुजरे। यूँ तो हर शहर की एक खास इमारत होती है जो वक्त के साथ उसकी पहचान बन जाती है पर जब पटना के बारे में सोचता हूँ तो गोल घर (Golghar) के आलावा कोई दूसरी छवि दिमाग में नहीं उभरती। अँग्रेजों ने ये गोदाम बिहार में 1770 के भीषण आकाल के बाद ब्रिटिश फौजों के लिए खाद्यान्न जमा करने के लिए 1786 में बनाया था। २९ मीटर ऊँची इस इमारत में अवलंब के लिए कोई खंभा नहीं है। कहा जाता है कि तब मजदूर पीठ पर बोरी ले एक सीढ़ी से ऊपर चढ़ते और सबसे ऊपर से एक खुले हिस्से से बोरी नीचे गिरा कर दूसरी ओर की सीढ़ियों से उतर जाते।
उस ज़माने में ये ग्रेनरी गंगा नदी से कुछ यूँ दिखाई पड़ती थी।
(चित्र सौजन्य विकीपीडिया)
बचपन में जब भी गोलघर जाने का कार्यक्रम बनता हम सब बड़ी खुशी खुशी तैयार हो जाते। गोलघर की सर्पीलाकार सीढ़ियाँ चढ़ कर, पचास पैसे की लाल आइस्क्रीम चूसते, बाँकीपुर गर्ल्स हाईस्कूल के समानांतर बहती गंगा को हम अपलक निहारते थे। और सच तो ये है कि आज भी गोलघर के पास पहुँचते ही तीव्रता से उन १४५ सीढ़ियाँ चढ़ने की चाह मरी नहीं है। देखिए आज का गोलघर .................



.............हाईस्कूल में गए कि पापा का तबादला पटना से पूर्णिया हो गया। उत्तर
पूर्वी बिहार की सीमा से लगा ये जिला बिहार के जाने माने आंचलिक उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु की कर्मभूमि रहा है। पता नहीं पटना से पूर्णिया जाने में आज क्या हालात हैं। पर उन दिनों बस ७ बजे कि पकड़ी जाए या रात १० बजे की सारी बसें एक साथ ही पहुँचती थीं। सारी बसों को दरअसल एक साथ इकठ्ठा कर पुलिस एस्कार्ट के साथ रवाना किया जाता। और रास्ते की हालत ये कि जब सुबह नींद खुलती तो अपनी बस को तमाम गाड़ियों की कतार में खड़ा पाते। बस सुकून रहता तो इन हरे लहलहाते धान के खेतों के दिलकश मंज़र का। ......



...........इंजीनियरिंग कॉलेज से छुट्टियाँ होती तो अब बेतिया जाना होता। बेतिया बिहार के उत्तर पश्चिमी किनारे में स्थित पश्चिमी चंपारण का मुख्यालय है। ये वही चंपारण है जहाँ कभी गाँधीजी ने निलहे गोरों के खिलाफ अपना पहला सत्याग्रह शुरु किया था। पटना से बेतिया जाना मुझे उन दिनों देश निकाले की तरह लगता था। उमसती गर्मी में जैसे तैसे दिन निकलता और शाम होते होते मच्छरों की फौज ऍसा धावा बोलती कि फ्लिट के छिड़काव के बाद भी हम शाम से ही मच्छरदानी के दुर्भेद्य किले के अंदर चले जाते। ऍसे में एक सुबह ही होती थी जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार होता। ..........

हलकी धुंध , ताड़ के पेड़ों की कतार के बीच, टहलते-टहलते हम शहर से काफी दूर निकल जाते। सुबह का जो नज़ारा मेरी आँखों के सामने होता उसकी कहानी बहुत कुछ वहीं का लिया ये चित्र कह रहा है..



23 comments:

  1. बहुत धन्यवाद आपको इस पोस्ट के लिए| अपने ब्लॉग पर मैंने भारत के प्राचीनतम मन्दिर, जो बिहार में हैं, पर लिखा था|
    http://shashwatt.blogspot.com/
    बिहार में रहने से इनपर नजर कम गई| सरकार जो जनता के लिए कुछ नही कर पायी इनके लिए क्या करती|

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  2. गोलघर के अलावा पटना में गुरु गोविन्द सिंह का जन्मस्थल है, कुम्हरार है, अशोक ने १०० भाइयों को मार कर जिस कुँए में डाला था वो कुँआ है| सोनपुर में एशिया का सबसे बड़ा मेला है| गया को कौन नही जनता| रोहतास में गुप्ताधाम है|

    ऐसी बहुत सी जगहें हैं, उम्मीद है नई सरकार जिसने इस दिशा में कुछ पहल किए हैं, आगे भी जोर शोर से इनके लिए कुछ करेगी|

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  3. सुंदर विव्रण. शेरशाह का मकबरा देख लिया और नकल भी कर ली. नीचे ताड़ के पेड़ों की जो कतार है उसे देख पूछना चाह रहे हैं की क्या ये पेड़ सधरणतया बिहार में पाए जाते हैं? आभार अब देखूं वह प्राचीनतम मंदिर बिहार कैसे पहुँच गया.

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  4. "बिहार के इस सुंदर छुपे खजाने से रूबरू कराने का आभार.."

    Regards

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  5. Aapki yaado ke sath Bihar ghumna achha raha.

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  6. आज कम से कम ५-६ बार कमेन्ट करने की कोशिश की है तब सफल हुए है ।
    बिहार का इतना खूबसूरत और विस्तृत विवरण ।
    ७४ मे पटना गए थे तब ही घूमे थे उसके बाद तो बस t .v. पर ही बिहार देखा है ।
    सुंदर फोटो ।

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  7. बिहार के बारे में बहुत अच्‍छी जानकारी दी ....

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  8. बहुत शानदार पोस्ट. ज्ञान भी बढ़ा और तस्वीरों में घूम भी लिए और आपका सुनाने का अंदाज...वाह!! क्या कहने. हमेशा की तरह आनन्द विभोर होकर निकल रहे हैं.

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  9. शायद सर्वश्रेष्ट चिट्ठाकार का पुरूस्कार आपको मिलना चाहिए ......

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  10. शाश्वत आपने सही कहा पटना के महत्वपूर्ण स्मारकों और धरोहरों के बारे मे। कल ही मुख्यमंत्री बेतिया के पास के नंदनगढ़ के स्तूपों में घूम रहे थे और शोध की आवश्यकता पर जोर दे रहे थे। पर पर्यटन अभी बिहार झारखंड की सरकारों की प्राथमिकता में नहीं इसलिए इन क्षेत्रों को विकसित करने के लिए समुचित प्रयास नहीं हो पा रहे हैं. बिहार में इस दिशा में जो काम हुआ है वो विदेशी सहायता से बुद्ध सर्किट से जुड़े इलाकों में संभव हो पाया है।

    उस प्राचीन मंदिर के बारे में अवश्य पढ़ना चाहूँगा।


    PN Subramanian जी ताड़ के पेड़ समूचे उत्तर भारत में पाए जाते हैं। जिस तरह केरल में इस से मिलते जुलते पेड़ से toddy निकाली जाती है वैसे ही ताड़ से निकली ताड़ी भी नशेड़ियों की पसंदीदा है।

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  11. ये पोस्ट ख़ास अच्छी लगी. गोलघर का कभी इस्तेमाल नहीं हो पाया... क्यों ये भी बता देते. पता नहीं कितना सच है पर हमने तो बस सुना ही है.
    ये एक पोस्ट नहीं श्रृंखला होनी चाहिए. ऐसी और पोस्ट आनी चाहिए.

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  12. अभिषेक ये सही नहीं है कि गोलघर का खाद्यान्न जमा करने के लिए इस्तेमाल नहीं हुआ। हाँ ये बात जरूर कही जाती है कि कभी भी इसकी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो सका क्यूँकि इसके नीचे के दरवाजे बाहर की बजाए अंदर की ओर खुलते थे और इसलिए इसका कुछ हिस्सा खाली रखना पड़ता था।

    बिहार के बारे में अभी श्रृंखला तो नहीं कर पाऊँगा पर कोशिश करूँगा कि इस क्षेत्र से जुड़ी कुछ ान्य जगहों पर भी सबको ले चलूँ।

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  13. इस्स... क्या खींचा और क्या लिखा है भाई। मैं आपको बधाई दूंगा लेकिन बस कहकर नहीं। घर में बड़े भाई हों तो उनसे कहियेगा, जरा एकबार धौल जमाकर आपको शाबाशी दें। ...वाकई मजा बांध दिया।

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  14. शुक्रिया इस जगहों के बारे में बताने के लिये। सासाराम हम पहली और अभी तक आखिरी साइकिल यात्रा के दौरान ही गये थे। शेरशाह के मकबरे को उस समय पहली बार देखा।

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  15. आपके इस मुसफिराना सद्प्रयास के लिए आपको साधुवाद...........!!

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  16. बहुत अच्छा विवरण किया है आपने, मज़ा आ गया | बहुत इच्छा है बिहार भ्रमण करने की पर डर लगता है कि क्या वहाँ यात्री सुरक्षित होंगे, क्या रात में सफर करना उचित होगा और इसी तरह के कई विचार | मैंने तो बस राजगीर ही देखा है वह भी बचपन में |

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  17. nice travelling experiance

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  18. That was a nice tour of Bihar. I will have to contact you if I plan a trip there some day.

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  19. WAH! kaafi ghuma ja raha hai :) mein bahut dino baad aayee iss taraf!! kaam ki musrufiyat to tabiyat ki nasaazgipan :)
    kher accha laga aaj yahan aakar :)
    Cheers

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  20. कुछ नही कह पाऊंगा ........
    बस अभिवादन कहता हूँ इस एहसान के लिए .........
    ---मुफलिस---

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  21. अमरीशFebruary 28, 2009

    बहुत अच्छा विवरण दिया आपने गोलघर का...145 सीढ़ियों का...बांकीपुर गर्ल्स स्कूल के किनारे किनारे बहती गंगा नदी का...लेकिन एक खयाल आया मन मे...उन मज़दूरों की क्या हालत होती होगी...amrish2jan@gmail.com

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  22. गैर पटना वाले मैंने akaltara.blogspot.com पर पोस्‍ट लगाई है 'फिल्‍मी पटना', आशा है आपकी रुचि का होगा.

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