Saturday, June 5, 2010

विश्व पर्यावरण दिवस : क्या आप एक जिम्मेदार पर्यटक हैं?

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। जून में पर्यावरण दिवस को मनाना कम से कम भारतीय उप महाद्वीप के लोगों के दिल में ज्यादा संवेदना व कर्त्तव्य बोध जगाता है। ये वो वक्त होता है जब हम हर साल पहले से और बढ़ती गर्मी की मार झेल चुके होते हैं। पानी की बढ़ती किल्लत भयावह रूप से सामने आ जाती है। पहले लोग इन सब से निज़ात पाने के लिए पहाड़ों की ओर भागते थे। पर अब वहाँ का भी वातावरण बदल रहा है।

पहले घूमने घामने के लिए सबसे लोकप्रिय माने जाने वाले पर्यटन स्थल अब कंक्रीट के जंगल बन गए हैं। मसूरी और दार्जिलिंग इसके ज्वलंत उदाहरण है। लिहाज़ा प्रकृति प्रेमी घुमक्कड़ हर वर्ष नई नई जगहों की तलाश में रहते हैं जहाँ की प्राकृतिक सुंदरता अभी तक अक्षुण्ण बनी हुई है। अगर यही हाल रहा तो शायद प्रकृति को करीब से देखने का सुख हमारी भावी पीढ़ियों को रहेगा ही नहीं।

इसमें कोई शक नहीं कि पर्यटन से किसी स्थान विशेष के लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। पर ये सुधार जीवन पर्यन्त और आने वाली पीढ़ियों तक होना चाहिए। अगर हम अपने वातावरण से खिलवाड़ का उसका सीमा से ज्यादा दोहन करेंगे तो उस जगह की खूबसूरती कुछ दशकों में ही खत्म हो जाएगी। पर्यटक तो कोई दूसरी जगह चुन लेंगे पर वहाँ पर रहने वाले लोगों का क्या होगा, ये प्रश्न भी पर्यटन स्थलों के विकास से जुड़े हमारे नीति निर्माताओं को सोचना होगा।

पर एक पर्यटक की दृष्टि से हमारा भी कुछ दायित्व है जिसका निर्वहन हममें से अधिकांश जन नहीं ही करते हैं। 'इकोफ्रेंडली टूरिज्म' का जुमला बहुत सालों से उछाला गया है पर उस पर कितना अमल हुआ है ये हम और आप जानते ही हैं। मेरी समझ से अगर हम पर्यटन स्थलों पर जाते वक्त अपनी आवश्यक्ताओं को सीमित रखेंगे तो अपने आप प्रकृति का संरक्षण होगा। पर्यटन स्थल पर हमारे हमारे रहने और खान पान के तौर तरीके सीधे सीधे वहाँ के पर्यावरण को प्रभावित करते हैं। एसी कमरे, गर्म पानी की सुविधा, हर जगह अधिक से अधिक पैदल चलने के बजाए पेट्रोल डीजल वाहनों का प्रयोग ये सब प्रत्यक्ष या अप्रयत्क्ष रूप से हमारे पर्यावरण को प्रभावित करता है। घूमते घामते वक्त कुछ पानी और खाने का सामान तो ले जाना तो लाज़िमी है पर उसके इस्तेमाल के बाद प्लास्टिक की बोतलों और रैपरों को वहीं फेक देना कहाँ तक उचित है? आलम ये है कि पंद्रह हजार फीट की ऊँचाई पर जब आपको वनस्पति का एक क़तरा भी नहीं दिखाई देगा प्लास्टिक की बोतलें जरूर दिखाई दे जाएँगी।

वैसे तो ये बात वहाँ के लिए भी लागू है जहाँ हम और आप रहते हैं। अक्सर हम अपनी समस्याओं का सारा दोष सरकार पर मढ़ते हैं। पर प्रकृति संरक्षण पर जितनी जवाबदेही उनकी है उनसे कहीं ज्यादा हमारी है। चलते चलते आपको सुनाना चाहूँगा गुलज़ार का लिखा नग्मा जो पिछले साल उन्होंने के पर्यावरण बचाओ अभियान के लिए लिखा था। इस गित को आवाज़ दी थी शंकर महादेवन ने और इसे संगीतबद्ध किया था शंकर अहसान लॉय की तिकड़ी ने। गुलज़ार साहब ने बड़े साफ साफ लफ्ज़ों में कहना चाहा है कि जितना जरूरी इस संसार में हमारी आपकी उपस्थिति है उतनी ही आवश्यक्ता हमें अपने आस पास की प्रकृति की भी है..


हवाएँ पत्ते पानी पेड़ जंगल सब्ज सोना है
अगर तुम हो इतना ही जरूरी इनका होना है

हवाएँ मैली मत करना कि जब तुम साँस लोगे,
ये दम वापस नही आएगा जब तुम खाँस लोगे
उगाओ जिंदगी और याद रखो दिल को बोना है...
हवाएँ पत्ते पानी पेड़ जंगल सब्ज सोना है

पेड़ उगाओ छानो हवाएँ साफ़ करो
अपनी जमीं से इतना तो इन्साफ करो
उगाओ जिंदगी और याद रखो दिल को बोना है
हवाएँ पत्ते पानी पेड़ जंगल सब्ज सोना है

पेड़ पौधे हमारी जिंदगी के अभिन्न अंग है। इसलिए गुलज़ार कहते हैं कि उगाओ जिंदगी और याद रखो दिल को बोना है...

6 comments:

  1. बढिया पोस्ट
    हम तो ध्यान रखते हैं जी, अब और ज्यादा रखेंगें

    प्रणाम

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  2. विचारणीय एवं सार्थक आलेख. सभी को मिल कर कदम उठाने होंगे.

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  3. Very nice post. Not only as tourists, we should always take care of our surroundings as good citizens also.

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  4. very true frnds we have to take care our nature as we are careing our love ones.

    basicaly tourists have to develop a respect for nature then we can protect .

    one thing i noticed during my various treks that the locals like drivers ,guides are polluting more . means as a treker we always try to bring our wrapers and other non degradable thing back but the porters guide and taxi drivers throw it any where . so i think its our duty also to aware them about these things.

    happy and environment frndly treking

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  5. शुक्रिया राजीव आपने एक अच्छे मुद्दे को उठाया हे। पर्यटकों के साथ इस उद्योग से जुड़े लोगों में भी ये सजगता होनी चाहिए।

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  6. बहुत अच्छा लिखा है और गुलजार का जो गीत आप लेकर आये वो तो मैंने सुना ही नहीं था. वैसे उसे पढ़ना ज्यादा अच्छा लगा. गया बहुत ही साधारण तरीके से गया है
    मैं फसबूक पर गाने की पंक्तियों को शेयर कर रहा हूँ

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