Thursday, March 15, 2012

रंगीलो राजस्थान : आख़िर क्या ख़ास है रणकपुर (राणकपुर) के जैन मंदिरों में ?

आज आपको ले चल रहा हूँ रणकपुर के जैन मंदिरों के दर्शन के लिए। वैसे अंग्रेजी का Ranakpur, हिंदी में कैसे लिखा जाए इस पर मेरा संशय इस यात्रा के इतने दिनों बाद भी ज्यों का त्यों हैं। मील के पत्थरों पर, मंदिर में घुसने के पूर्व लगने वाले टिकट पर और बाद में अंतरजाल के विभिन्न जाल पृष्ठों पर मैंने रनकपुर, रणकपुर और राणकपुर तीनों नाम देखे हैं। इनमें सबसे प्रचलित नाम कौन सा है ये तो मेरे राजस्थानी मित्र बता पाएँगे। बहरहाल मैंने कहीं पढ़ा था कि है कि चूंकि ये मंदिर राणा कुंभ के शासनकाल में उनकी दी गई ज़मीन पर बनाया गया इसलिए इसका नाम राणकपुर पड़ा ।

बाल दिवस यानि चौदह नवंबर  को कुंभलगढ़ पर की गई चढ़ाई ने हमें वैसे ही थका दिया था। फिर खाली पेट पहाड़ी रास्तों के गढ़्ढ़ों को बचते बचाते हुए 50 किमी का सफ़र हमने कैसे काटा होगा वो आप भली भांति समझ सकते हैं। पर दो बातें हमारी इस दुर्गम यात्रा के लिए अनुकूल साबित हुईं। एक तो बरसात के बाद मंद मंद बहती ठंडी हवा और दूसरे हर दो तीन किमी पर हाथ से गाड़ी रुकवाता बच्चों का झुंड। जैसे ही हमारी गाड़ी धीमी होती ढेर सारे बच्चे छोटी छोटी टोकरियों में शरीफा लिए दौड़े चले आते। दाम भी कितना..पाँच रुपये में बारह शरीफे ! ना ना करते हुए भी बच्चों के अनुरोध को हम टाल ना सके। शरीफों की बिक्री के इस तरीके से हमें अगले दिन माउंट आबू जाते हुए भी दो चार होना पड़ा।
कुंभलगढ़ से करीब डेढ़ घंटे के सफ़र को तय करने के बाद हम पाली जिले में स्थित इस भव्य मंदिर समूह के प्रांगण में पहुँचे। राणकपुर का मुख्य मंदिर जैन धर्म के पहले तीर्थांकर आदिनाथ को समर्पित है। इसके आलावा मुख्य मंदिर के आस पास चार और छोटे छोटे मंदिर भी बने हैं। लगभग 48000 वर्ग फुट में फैले इस मंदिर में 24 बड़े कक्ष और 1444 स्तंभ हैं। आश्चर्य की बात ये है कि इन 1444 स्तंभों पर की गई महीन नक़्काशी एक दूसरे से अलग है। आदिनाथ के इस मंदिर के चार प्रवेश होने के कारण इसे चौमुखा मंदिर भी कहा जाता है।


पर शिल्पियों ने अपनि कलाकारी स्तंभों तक ही दिखाई हो ऐसा भी नहीं है। मंदिर के गुम्बदों की अंदरुनी छत और दीवारों पर एक से बढ़कर एक जटिल रूप गढ़े गए हैं। मिसाल के तौर पर इस कल्पवृक्ष को देखिए


मंदिर के पीछे के निर्माण की कथा भी रोचक है। कहते हैं जैन सेठ धन्ना शाह को किसी सपने में मंदिर के स्वरूप सी इक रचना दिखाई दी। शाह ने दूर दूर से शिल्पियों को बुलाया और अपने सपने में देखे मंदिर के स्वरूप का वर्णन किया। वर्णन के आधार पर दीपा शिल्पी द्बारा बनाया गया प्रारूप धन्ना को अपने सपने के सबसे करीब लगा।सो धन्ना शाह ने प्रधान शिल्पी के रूप में दीपा को मंदिर निर्माण के लिए नियुक्त किया।

दीपा शिल्पी ने इस मंदिर को बनाने में 65 वर्षों का समय लिया। सन 1430-1440 ई. के बीच में ये मंदिर बन कर तैयार हुआ। आप सोच सकते हैं कि मंदिर के हर हिस्से में पत्थरों को छैनी हथौड़े से काट काट कर इतना सुंदर रूप देने में कितनी मेहनत लगी होगी।


मंदिर में घुसने के पहले आपके सामान की अच्छी तरह से जाँच होती है। मैंने कैमरे का टिकट तो लिया था पर साथ में पुराना कैमरा भी बैग में पड़ा था। मुख्य द्वार पर वो कैमरा उन्होंने रख लिया। गड़बड़ ये हुई कि अंदर जाकर नए कैमरे की बैटरी जवाब दे गई। मुख्य द्वार पर खड़ी गार्ड से वापस पुराना कैमरा माँगा तो वो तैयार नहीं हुई। पर उसके वरीय अधिकारी से बात की तब जाकर बात बनी। यानि सीख ये कि इस मंदिर में अगर दोपहर के बाद जाएँ तो बैटरी को पूरी तरह चार्ज कर लें क्यूँकि मंदिर में अलग से प्रकाश की व्यवस्था नहीं है और सूर्य देव की आंशिक उपस्थिति में सारे चित्र फ्लैश की सहायता से ही लेने होते हैं।

मंदिर के अंदर पर्यटकों की भारी भीड़ थी। जितने देशी सैलानी थे उससे कहीं ज्यादा विदेशी। हर सेकेंड पर कैमरे का फ्लैश कहीं ना कहीं से चमक उठता था। चारों प्रवेश द्वार मंदिर के बीचों बीच स्थित प्रार्थना कक्ष तक ले जाते हैं जहाँ  108 किलो की दो घंटियाँ अपनी गूँज से वातावरण भक्तिमय कर रही थीं।

पत्थरों पर जगह जगह जैन मुनियों की छवियों के साथ साथ थिरकती नृत्यांगनाओं, हाथी,शेर, घोड़े, बंदर आदि जानवरों और मंदिर के शिखरों को भी उकेरा गया है।


कहीं आपको पत्थर के हाथी दिखते हैं तो कहीं ये बड़े बड़े नगाड़े...


मंदिर की संरचना की एक और ख़ासियत है वो हैं इसकी नींव से उठा हुआ भूतल, जिस पर की तीन मंजिला इमारत, स्तंभ और शिखर टिके हैं। इसीलिए मुख्य मंदिर के तल तक पहुंचने के लिए आपको काफी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।




हम मंदिर के स्तंभों और दीवारों पर बनी इन कलाकृतियों को देखने में तल्लीन थे कि अचानक ही मेरी नज़र ऊपर छत की ओर उठी। पत्थर को काटकर मध्य में जो जालियाँ बनाई गयीं हैं वो राणकपुर ही नहीं पूरे राजस्थान के जैन मंदिरों की पहचान हैं। व्यास में बढ़ती इन गोलाकार जालियों के चारों ओर एक घेरे में नृत्य करती युवतियों की छवियाँ पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर रही थीं।


मंदिर के अंदर आप जिधर भी जाएँ वहाँ की खूबसूरती को देखकर आपको लगेगा कि यहाँ का चित्र लेना आवश्यक है। एक बात गौर करने की है कि संगमरमर के इन स्तंभों का रंग सूरज के घटते बढ़ते प्रकाश में बदलता है और दिन के समय ये सबसे रमणीक लगता है कि क्यूँकि इस वक़्त कला की सारी बारीकियाँ पूरी तरह उभर कर आती हैं। इसलिए शाम को आने से कम प्रकाश में आपका कैमरा वो नतीजे नहीं दे पाता खासकर अगर कैमरे का फ्लैश ज्यादा दमदार ना हो। इसलिए मेरी राय ये है कि अगर आपके पास समय हो तो कुंभलगढ़ को देख कर वहाँ रात्रि का विश्राम करें और अगली सुबह राणकपुर के मंदिरों की सुंदरता को अपने हृदय में आत्मसात करते हुए जोधपुर या उदयपुर की ओर बढ़ जाएँ।

सादड़ी कस्बे के निकट स्थित राणकपुर के ये मंदिर अरावली की पहाड़ियों से घिरे हुए हैं। मंदिर के अंदर जहाँ आप मानव हाथों की जादूगरी से प्रभावित होते हैं वहीं बाहर से मंदिर के आहाते का चक्कर लगाते समय आपको प्रकृति उल्लासित करती है।

शाम के पाँच बजे से थोड़ा पहले ही हम वापस उदयपुर की ओर रवाना हो चुके थे। उदयपुर में बिताई हमारी ये आख़िरी रात थी। अगली सुबह हमें प्रस्थान करना था हमारे अगले पड़ाव माउंट आबू के लिए। कैसा रहा उदयपुर से माउंट आबू का सफ़र पढ़ियेगा इस श्रृंखला की अगली कड़ी में..

19 comments:

  1. The scale and the details, for both it looks like worth a visit! Never been there till date.

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    1. My Panasonic failed me when I needed it most. Also Ranakpur in broad daylight looks more beautiful than what we could see on that rain soaked afternoon. Definitely a worthy visit for photo enthusiast like you.

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  2. ये मंदिर वाकई अद्भुत है...मैंने भारत में इस तरह की बारीक नक्काशी कहीं नहीं देखी. छतें तो खास तौर से मोहक हैं. इन्हें गढना वाकई बहुत मेहनत का काम रहा होगा.

    ब्लॉग पर पढ़ कर पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं.

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  3. राणकपुर ही सही है, और निश्चित ही इस मन्दिर प्रांगण का नामकरण विख्यात 'राणा सांगा' के यशार्थ दिया गया है।
    बहुत ही रोचक प्रस्तुति!!
    मुख्य मण्डप की छत पर उकेरी गई अद्भुत कलाकृति "कल्पवृक्ष" का चित्र आप न ले पाए शायद!

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    1. सुज्ञ जी राणकपुर नाम के बारे में मेरी दुविधा को दूर करने के लिए धन्यवाद ! मुख्य मंडप की छत की तसवीर उस डिटेल में नहीं आई इसलिए यहाँ नहीं लगायी है। वैसे मैंने ये ध्यान तब नहीं दिया था कि वहाँ 'कल्पवृक्ष' को उकेरा गया है।

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    2. आपके दिए चित्र क्रमांक तीन में भी रोचक पहेलीनुमा कलाकृति है, यह तेईसवे तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है यह सहस्त्रफणा पार्श्वनाथ कहलाते है। इनके सिर पर जो छत्रनुमा आकृति दिखाई दे रही है वह वस्तुतः नाग के १००० फन है और जो रस्सीनुमा गांठे दृष्टिगोचर हो रही है वह इस एक नाग का ही कुण्डली युक्त शरीर है, नाग का शरीर पार्श्वनाथ के पिछे से होकर उनके पैरो के पास से निकलता प्रारम्भ होकर कंट्यूनिस पूंच तक जाता है, पूंच को खोज पाना ही पहेली है। कलाकार की यह अद्भुत विस्मयकारक कारीगरी है।

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    3. मनिष जी, उस 'कल्पवृक्ष' का बहुत ही स्पष्ट चित्र यहां उपलब्ध है……
      http://www.flickr.com/photos/nevilzaveri/3970801740/lightbox/

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    4. आप की तीसरे चित्र से संबंधित जानकारी के लिए बहुत धन्यवाद। अब उस चित्र की विशेषता से पूर्ण परिचय हो सका।
      जहाँ तक कल्पवृक्ष की बात है जैसा कि मैंने कहा वो चित्र मैंने खींच रखा है पर शाम को सफेद संगमरमर बहुत कुछ स्वर्णिम आभा के साथ एक दूसरे रूप में दिखता है। समय मिलते ही उस चित्र को पोस्ट के साथ संलग्न करूँगा।

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  4. यूँ तो देश के अनगिन मंदिर मैंने भी देखे हैं...पर रणकपुर के मंदिर सबमें अनूठे थे...इनकी कारीगरी इतनी बारीक थी जैसे कहीं और नहीं थी...संगमरमर पर की जालीदार नक्काशी हो कि मूर्तियों के तराशे हुए नाखून...विस्मय से पूरा प्रांगन घूमी थी...अद्भुत ही जगह है.

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    1. पूजा आप सही कह रही हैं। हालांकि मुझे इस बात का मुगालता रहेगा कि मैं यहाँ दोपहर के पहले क्यूँ नहीं पहुँचा क्यूँकि जैसा सुना है कि उस वक़्त मंदिर की छतों और स्तंभों पर की गई कलाकारी अपने सबसे अनुपम रूप में सामने आती है।

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  5. Really a fantastic place to visit..

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  6. घर की मुर्गी दाल बराबर. मैं इनके काफी पास रहा पर कभी यहां नहीं गया

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    1. काजल जी ऐसा प्रायः हम सब के साथ होता है। झारखंड में रहते हुए भी हम इस प्रदेश को उतनी अच्छी तरह नहीं देख पाए हैं। हालांकि यहाँ की सुरक्षा व पर्यटन व्यवस्था इसके लिए मुख्य तौर पर जिम्मेवार है।

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  7. बहुत सुन्‍दर। आपने एक जगह सदरी कस्‍बा लिखा है, असल में यह सादड़ी है। राणकपुर शब्‍द के बारे में तो सुज्ञ जी ने बता ही दिया है। पहाड़ों से चारों तरफ से घिरा यह मन्दिर अद्वितीय है। शाम के समय जब मन्दिर में घण्‍टे बजते हैं तब पूरा पहाड़ी क्षेत्र गुंजायमान हो जाता है। पहाड़ों के मध्‍य होने के कारण यह सुरक्षित भी है। कहते हैं कि मुगल आक्रमण के समय इसे रेत से ढक दिया गया था और एक विशाल टीले का रूप बन गया था। यह भी कहा जाता है कि इसके 1444 खम्‍बे एक दूसरे से कलाकृति में भिन्‍न भी हैं और इसे आज तक किसी के द्वारा भी गिना नहीं जा सका है। मन्दिर में आप जहाँ भी खड़े होंगे वहीं से चारों दिशाओं में एक सी मूर्ति के ही दर्शन होंगे। यात्रियों की सुविधा के लिए यहाँ कई धर्मशालाएं हैं जहाँ पर्याप्‍त सुविधाएं उपलब्‍ध हैं। एक भोजनशाला है जो बहुत ही कम शुल्‍क में आपको शुद्ध और गर्मागर्म भोजन कराती हैं। जैन मतावलम्बियों के लिए भोजन का शुल्‍क नहीं है। उदयपुर आने वाले पर्यटकों को राणकपुर अवश्‍य देखना चाहिए।

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  8. यहाँ के खंभे एक दूसरे से अलग दिखते हैं ये तो यहाँ अपने सहयात्रियों से पहले से सुन रखा था। पर जैसा कि आपने बताया सुरक्षा की दृष्टि से पहाड़ियों से घिरा होने की वज़ह से ये बाहरी शासकों के आक्रमण से बच पाया। ये भी बात गौर करने की है ख़ुद शिव का उपासक होने के बावज़ूद मेवाड़ या यूँ कहें पूरे राजपूताने में राजा ना केवल जैन मंदिरों के सुरक्षा कवच बनते रहे बल्कि उन्होंने इन मंदिरों के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।

    आपने यहाँ रहने की सुविधाओं के बारे में जो जानकारी दी है उससे तो यही लगता है कि यहाँ रहना, कुंभलगढ़ में रहने के अपेक्षा ज्यादा सस्ता है।

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  9. whaat beautiful description and pics... wowwww.

    Regards
    Anupam Mazumdar

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  10. Wonderful pictures .........

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  11. अनुपम हैं राणकपुर के मंदिर...पहले इनके सामने एक बड़ी सी झील हुआ करती थी अब है या नहीं कह नहीं सकता और मंदिर प्रांगन में मिलने वाला खाना...आहा...शुद्ध और बेहद लज़ीज़...
    नीरज

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