Saturday, February 28, 2015

उड़ीसा का कम चर्चित पर खूबसूरत समुद्र तट गोपालपुर.. Gopalpur Sea Beach, Odisha

उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के समुद्र तट हमेशा से मेरे प्रिय रहे हैं। पिछले कुछ सालों में इस ब्लॉग पर मैं आपको दीघा, चाँदीपुर व पुरी के समुद्र तटों के चक्कर लगा चुका हूँ। चाँदीपुर और दीघा के समुद्र तट छिछले हैं। लहरें ज्यादा उठती नहीं है और आप बिना किसी डर भय के समुद्र तट में गोते लगा सकते हैं। चांदीपुर में तो आप समुद्र के अंदर सैकड़ों मीटर तक चहलकदमी करते हुए अंदर जा सकते हैं। समुद्र की तेज उठती लहरों का आनंद लेना हो तो फिर पुरी का लोकप्रिय समुद्र तट तो है ही़ पर इन सब के आलावा भी उड़ीसा के दक्षिणी सिरे पर एक और खूबसूरत समुद्र तट है जहाँ लहरों का तेज तो है पर पुरी के उलट पर्यटकों का रेलमपेल नहीं । ये समुद्रतट है गोपालपुर का जो उड़ीसा के बरहमपुर (Berhampur) शहर से मात्र सोलह किमी की दूरी पर है।

Fisherman getting ready for foray into sea at Gopalpur, Odisha
जनवरी के महीने की आख़िर में मैंने गोपालपुर जाने का कार्यक्रम बनाया। राँची से गोपालपुर जाने के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं है। पहले शाम की ट्रेन से चलकर भुवनेश्वर पहुँचिए और फिर वहाँ से दक्षिण जाने वाली किसी भी गाड़ी गाड़ी में टिकट कटा लीजिए। हावड़ा से चेन्नई जाने वाली रेलवे लाइन पर ही बरहमपुर स्टेशन पड़ता है। आज इसका नाम बदलकर ब्रह्मपुर  ( Brahmapur ) यानि ब्रह्मा के घर में तब्दील कर दिया गया है।
Map of Gopalpur  locatedon east coast of Odisha, India

उड़ीसा के गंजाम जिले में पड़ने वाला ये शहर यहाँ बनने वाली सिल्क की साड़ियों के लिए विख्यात है। जनसंख्या की दृष्टि से ये उड़ीसा का चौथा सबसे बड़ा शहर है। राँची से चलकर भुवनेश्वर तो हम अगली सुबह पाँच बजे ही पहुँच गए थे। भुवनेश्वर से ब्रह्मपुर की 170 किमी की दूरी को तय करने में करीब तीन घंटे का वक्त लग गया। भुवनेश्वर से ब्रह्मपुर का रास्ता भारत के पूर्वी घाट के किनारे किनारे चलता है। घाट की छोटी छोटी पहाड़ियों के साथ लगे खेतों के किनारे किनारे इन ताड़ के वृक्षों की बहुतायत है। 

A typical landscape along the railway tracks on way to Brahmapur
ट्रेन कुछ देर तक चिलिका झील के भी ठीक बगल से गुजरती है। झील की अथाह जल राशि को पाँच मिनट तक बगल से गुजरते देखना इस यात्रा की यादगार झांकियों में से है। दिन के साढ़े बारह बजे हम ब्रह्मपुर पहुँचे। स्टेशन के बाहर से टैक्सी ली और चल पड़े गोपालपुर की ओर। गोपालपुर में रहने के लिए बजट होटलों में सबसे लोकप्रिय उड़ीसा पर्यटन का पंथ निवास है। यहाँ आप ढाई सौ की डॉरमेट्री से लेकर ढाई हजार के कॉटेज में रह सकते हैं। पर अगर आपने पहले से आरक्षण नहीं करवाया हो तो यहाँ कमरों का मिलना टेढ़ी खीर है। महीने भर पहले भी हमें सामान्य एसी और नॉन एसी कमरा नहीं मिल पाया। अतः कॉटेज में ही रहना पड़ा।  

Front view of Panth Niwas at Gopalpur
कॉटेज की सबसे बड़ी सुविधा ये थी कि आप बिना किसी की नज़रो में आए हुए समुद्र तक आ जा सकते थे जो वहाँ से पचास  मीटर के फासले पर था। गोपालपुर को हमेशा से चक्रवातीय तूफानों का दंश झेलना पड़ा है। यहाँ का पंथनिवास भी इसकी चपेट में आ चुका है। नतीजन निवास से समुद्र के बीच का हिस्सा जो कभी पेड़ों से गुलज़ार हुआ करता था आज बिल्कुल नग्न सा दिखता है।

Cottages at Panth Niwas, OTDC

दिन का भोजन कर के हम करीब चार बजे समुद्र की ओर निकले। पंथ निवास समुद्र के किनारे थोड़ी ऊँचाई पर बना है। थोड़ी दूर समतल ज़मीन पर चलने के बाद एकदम से बालू की ढलान आ जाती है और समुद्र की विशाल नीली जलराशि के प्रथम दर्शन होते हैं। अंग्रेजों के ज़माने में गोपालपुर बंदरगाह हुआ करता था। यहाँ से बर्मा के रंगून तक व्यापार होता था। अब वो जेट्टी टूट फूट चुकी हैं हालांकि यहाँ एक नए बंदरगाह के निर्माण की योजना है।


गोपालपुर का समुद्र तट पुरी की सी सुंदरता लिए है पर यहाँ की शांति और एकांत का अपना ही आनंद है। समुद्र तट के मुख्य भाग से पंथ निवास के आधे किमी की दूरी में बाहर से आने वाले आगुंतकों से ज्यादा स्थानीय मछुआरे ही दिखाई पड़ते हैं।


गोपालपुर में एक लाइटहाउस भी है। पर हम जब वहाँ गए तो वो मरम्मत के लिए बंद पड़ा था। इसके ऊपर से गोपालपुर शहर और यहाँ के समुद्र तट का पूरा विस्तार देखा जा सकता है। लाइटहाउस के आगे यहाँ उड़ीसा की नामी होटल श्रंखला मेयफेयर का रिसार्ट है जो ज़ाहिरन काफी मँहगा है।

Lighthouse of Gopalpur
लाइटहाउस से सटे इलाके में पार्क बनाने की योजना थी। पर इसके निर्माण के दौरान आए इस तूफान ने इसे तहस नहस कर दिया।


पार्क के ऊपरी हिस्से से गोपालपुर के समुद्र तट का ये नज़ारा दिखा।

Deep blue water at Gopalpur Beach, Odisha
मछुआरों की नौकाएँ बीच समुद्र में जाल ले कर जा चुकी थीं। धूप कम हो रही थी और हमें लगा कि इससे पहले तट की ओर से चलती हवा चलनी शुरु हो समुद्र स्नान कर लिया जाए।


फिर तो लहरों के साथ घंटे भर जम कर गोते लगाए गए। यात्रा की थकान समुद्र में लगाई गई इन डुबकियों से जाती रही।


शाम को गोपालपुर शहर की टोह लेने जब हम बाहर निकले तो हमें निराशा हाथ लगी। समुद्र तट के बगल की सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। इस सन्नाटे में आधे घंटे चहलकदमी करने के बाद हम वापस अपने दबड़े में लौट आए। पर गोपालपुर के समुद्री तट का असली सौंदर्य अगली सुबह सूर्योदय के सामने प्रकट हुआ। गोपाल के समुद्र तट की सुबह की झांकी के साथ लौटूँगा ५स यात्रा की अगली कड़ी में..


अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

14 comments:

  1. धरती का कितना वैभव थाह चुके हैं - आपसे तो बस ईर्ष्या की जा सकती है !

    ReplyDelete
    Replies
    1. धरती की इस असीमित चौहद्दी को एक जनम में नाप पाना तो शायद किसी के लिए संभव नहीं पर कोशिश रहती है कि जब भी छुट्टियाँ आस पास हों तो कहीं ना कहीं निकला जाए।

      Delete
  2. मनोरंजक...बस लिखते रहें

    ReplyDelete
    Replies
    1. शु्क्रिया त्यागी जी आप यूँ ही साथ साथ रहें.. :)

      Delete
  3. I like to read musafir hun yaaro....bas aap likte rhiye or me padta rhunga....

    ReplyDelete
    Replies
    1. जानकर खुशी हई ..निश्चिंत रहें जब तक मन में घुमक्कड़ी का जज़्बा है तब तक ये कलम भी चलती रहेगी।

      Delete
  4. बिल्कुल नई जानकारी हमारे लिए...... इस समुंद्र तट के बारे में जानकार अच्छा लगा...

    धन्यवाद !
    www.safarhainsuhana.blogspot.in

    ReplyDelete
  5. Apka yatra britant accha laga

    ReplyDelete
    Replies
    1. जानकर प्रसन्नता हुई :)

      Delete
  6. Mast aapke sath hame bhi ghoomne ka mouka mil jata hai thanks...

    ReplyDelete
    Replies
    1. जानकर खुशी हई .:)

      Delete

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails