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शनिवार, 16 जुलाई 2022

झारखंड ओड़िशा सीमा की वो मानसूनी शाम Monsoon magic at Jharkhand Odisha Border

ट्रेन से की गई यात्राएं हमेशा आंखों को सुकून पहुंचाती रही है। यह सुकून तब और बढ़ जाता है जब मौसम मानसून का होता है। सच कहूं तो ऐसे मौसम में ट्रेन के दरवाजे से हटने का दिल नहीं करता। ऐसी ही एक यात्रा पर मैं पिछले हफ्ते झारखंड से ओड़िशा की ओर निकला।


पटरियों पर ट्रेन दौड़ रही थी। आंखों के सामने तेजी से मंजर बदल रहे थे। बादल और धूप के बीच आइस पाइस का खेल जारी था। नीचे उतरती धूप पर कभी बादलों की फौज पीछे से आकर धप्पा मार जाती तो कभी बादलों को चकमा देकर उनके बीच से निकल कर आती  धूप पेड़ पौधों और खेत खलिहान के चेहरे पर चमक ले आती।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

रानी सती मंदिर, बिरमित्रपुर, राउरकेला Rani Sati Temple, Birmitrapur, Odisha

राजस्थान के उत्तर पश्चिम में एक जिला है झुँझुनू और जिसका  मुख्यालय भी इसी नाम से है। झुँझुनू दो वज़हों से जाना जाता रहा है। एक तो अपनी मंदिर और हवेलियों की वज़ह से और दूसरे पानी की किल्लत की वज़ह से भी। मारवाड़ियों में झुँझुनू का सबसे श्रद्धेय मंदिर है रानी सती जी का मंदिर। हालांकि सती प्रथा को तो कबका ये देश अलविदा कह गया पर लगभग तीन दशक पहले एक दाग तो लग ही गया था भारतीय समाज के दामन पर। ख़ैर छोड़िए उस बात पर कुछ देर बाद आते हैं। अभी तो बस ये जान लीजिए कि जिस रानी सती मंदिर के दर्शन आज आपको कराने जा रहा हूँ वो राजस्थान में ना होकर ओड़िशा में है।

मंदिर का मुख्य द्वार

कार्यालय के काम के सिलसिले में मेरा अक्सर राउरकेला जाना होता रहता है। ऍसी ही एक यात्रा में वापस लौटते हुए पता चला कि जिस ट्रेन से हमें जाना है वो चार घंटे विलंब से आने वाली है। थोड़ी देर सोचने के बाद आनन फानन में योजना बनी कि समय का सदुपयोग करने के लिए क्यूँ ना राउरकेला से पैंतीस किमी दूर स्थित वीरमित्रपुर कस्बे के प्रसिद्ध रानी सती मंदिर में चला जाए। झटपट ओला मँगवाई गयी और कुछ ही क्षणों में अपने सामान सहित हम वीरमित्रपुर के रास्ते में थे।
NH 143 राजमार्ग से दिखती मंदिर की भव्य इमारत
वीरमित्ररपुर का कस्बा, उत्तरी ओड़िशा को झारखंड से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 143 पर है। इससे आगे बढ़ने पर कुछ ही देर में झारखंड की सीमा शुरु हो जाती है। इसी रास्ते से राउरकेला का वेद व्यास मंदिर भी पड़ता है। झारखंड, ओड़िशा व छत्तीसगढ़ से पास होने के कारण यहाँ हिंदी व ओड़िया दोनों धड़ल्ले से बोली जाती है। मारवाड़ियों की भी यहाँ अच्छी खासी संख्या है। राजस्थान से ठीक उलट देश के पूर्वी किनारे पर होने की वजह से अपनी इष्ट देवी की याद में यहाँ रहने वाले मारवाड़ियों ने साठ के दशक में ये मंदिर बनवाया। नब्बे के दशक में दो एकड़ में फैले इस मंदिर का सौंदर्यीकरण भी हुआ।

प्रार्थना कक्ष

झुँझुनू  के मुख्य मंदिर की याद में इस मंदिर को झुँझुनू धाम (Jhunjhunu  Dham ) के नाम से भी जाना जाता है। स्थापत्य भी बाहर से एक जैसा है और राजस्थान के मुख्य मंदिर की तरह ही भगवान की मूर्तियाँ अंदर के कक्ष में नहीं लगी हैं। रानी सती जी को  प्यार  से श्रद्धालु दादी मैया के नाम से भी पूजते हैं। मंदिर का सबसे खूबसूरत हिस्सा इसका मुख्य हॉल है जहाँ लोग पूजा के लिए बैठते हैं। यहाँ छत पर लगे रंगीन टाइल के डिजाइन देखते  ही बनते हैं।

रंग बिरंगी ज्यामितीय आकृतियों से सुसज्जित छत

शनिवार, 21 मार्च 2015

तारा तारिणी मंदिर : बरहमपुर का अनजाना आदि शक्ति पीठ Tara Tarini Temple, Brahmapur

भारत में छोटे बड़े 51 शक्तिपीठ हैं पर इनमें से चार की गणना आदि शक्तिपीठों में होती है। गौर करने की बात है कि ये सारे पीठ भारत के पूर्वी इलाके में स्थित हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर, गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर और कोलकाता के काली मंदिर के तीन पीठों के बारे में तो आप भली भांति परिचित होंगे। पर क्या आप जानते हैं कि चौथा आदि शक्तिपीठ कहाँ है? आदि शक्तिपीठों की चौथी पीठ दक्षिणी ओडीसा के ब्रह्मपुर ( Brahmapur) या बरहमपुर ( Berhampur) शहर से तीस किमी दूर तारा तारिणी मंदिर में स्थित है। तो चलिए आज आपको लिये चलते हैं  इस शक्तिपीठ के दर्शन पर.. 

तारा तारिणी का भव्य मंदिर

पिछले लेखों में आपको बता चुका हूँ कि गोपालपुर में समुद्र के सानिध्य में बिताई शाम और सुबह कितनी रमणीक थी । गोपालपुर में एक रात ठहरने के बाद अगले दिन भोजन के उपरांत हमारा समूह तारा तारिणी मंदिर की ओर चल पड़ा। गोपालपुर से तारा तारिणी मंदिर की दूरी पैंतीस किमी के लगभग है जो तकरीबन एक घंटे में पूरी होती है। पंथ निवास से हमने एक कार की बुकिंग की थी पर ऐन वक़्त पर जब ये चमचमाती हुई महिंद्रा की मिनी वैन आकर खड़ी हुई तो लगा कि इस पर सैर करने का आनंद ही अलग होगा। जनवरी का महीना था सो दिन की धूप तेज होते हुए भी कड़ी नहीं थी। कुछ दूर तक सफ़र राष्ट्रीय राजमार्ग (NH 59) से होकर गुजरा और फिर राज्य राजमार्ग (SH 32) की दुबली पतली सड़क का दामन हमने थाम लिया।

गोपालपुर से तारा तारिणी तक जाने का मार्ग

सड़क पर ट्राफिक नगण्य था सो हम पचास मिनट में ही कुमारी पहाड़ियों के नीचे थे। पहाड़ी के नीचे से एक सड़क मंदिर तक जाती है, साथ ही अगर आपमें दम खम हो तो यहाँ की 999 सीढ़ियाँ चढ़ सकते हैं। पर जब आपके सामने इतना सुंदर उड़न खटोला हो तो बाकी के विकल्प तो बेमानी हो ही जाएँगे। रोपवे से मंदिर के प्रांगण तक की दूरी पाँच मिनट में तय होती है और इस दौरान आप आस पास बसे गाँव , खेत खलिहान और उनके ठीक बगल से बहती  ऋषिकुल्‍या नदी का मनोरम नज़ारा देख सकते हैं।

उड़न खटोला (Rope Way) , तारा तारिणी मंदिर

ऋषिकुल्‍या दक्षिणी ओडीसा की एक प्रमुख नदी है जो विंध्याचल के पूर्वी हिस्से से निकल कर काँधमाल और गंजाम जिलों से होती हुई बंगाल की खाड़ी में जा मिलती है। गंजाम के पास इस नदी का मुहाना है। इसी मुहाने पर कछुओं की प्रजाति Olive Ridley Turtle द्वारा हर साल काफी मात्रा में अंडे दिए जाते हैं। तारा तारिणी मंदिर के आहाते से सर्पीले आकार में अपना रास्ता बदलती इस नदी के पाट को आप बखूबी देख सकते हैं।

ऋषिकुल्‍या नदी का मनमोहक रूप

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

गोपालपुर समुद्र तट का वो अद्भुत सूर्योदय और सुबह की सैर Beautiful Sunrise at Gopalpur Beach, Odisha

समुद्री तटों पर जाने का हमारा पहला उद्देश्य तो सागर की लहरों से अठखेलियाँ करना ही होता है। पर अपनी विशाल जलराशि में गोते लगाने के लिए आमंत्रण देता समुद्र साथ ही प्रकृति की दो मनोरम झाँकियों को करीब से देखने और अंदर तक महसूस करने का अवसर भी देता है। ये बेलाएँ होती हैं सूर्योदय और सूर्यास्त की। भारत के पूर्वी तटों पर सूर्योदय का मंज़र देखने लायक होता है पर शर्त ये कि बादल उस समय आँख मिचौली का खेल ना खेलें।

गोपालपुर में समुद्र की कोख से निकलते सूर्य को तो हम बादलों की वज़ह से नहीं देख सके पर उसके बाद दिवाकर की जिस छटा का मैंने अनुभव किया वो गोपालपुर की यात्रा को यादगार बना गई। तो चलिए आज की इस प्रविष्टि में दक्षिणी ओडीसा के समुद्र तट गोपालपुर के सूर्योदय के साथ समुद्र तट पर हो रही हलचलों से उस वक़्त खींची गई तसवीरों के माध्यम से आपको मैं वाकिफ़ कराता हूँ। 


जैसा की पिछले आलेख में आपको बताया था कि पंथ निवास से गोपालपुर के समुद्र तट की दूरी सौ मीटर से भी कम है। सुबह छः बजे जब मैं उठा तो बाहर अँधेरा ही था। पन्द्रह बीस मिनट में तैयार होकर अपने मित्र के साथ समुद्र तट की ओर निकला। तट पर काफी चहल पहल थी। मछुआरों का समूह अपनी अपनी नावों के किनारे जाल को व्यवस्थित करने में जुटा हुआ था। कुछ नावें पहले ही बीच समुद्र में जा चुकी थीं और किनारे से काले कागज की नाव सरीखी दिख रही  थीं।


पौने सात से दो मिनट पहले सूर्य की लाली बादलों की ओट से बाहर आना लगी। फिर तो दो मिनट के अंदर सूरज अपनी पूरी लालिमा के साथ बाहर निकल कर आ गया। सूर्य के बदलते रुपों को क़ैद करने के लिए कैमरे का सटर क्षण क्षण दबता रहा। जब सूरज की लाली पीलेपन में बदल गई तो फिर उसे अपनी मुट्ठी में क़ैद करने का ख्याल आया।


सूर्य किरणों की बढ़ती तीव्रता के साथ सागर तट का नज़ारा देखने लायक था...


शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

उड़ीसा का कम चर्चित पर खूबसूरत समुद्र तट गोपालपुर.. Gopalpur Sea Beach, Odisha

उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के समुद्र तट हमेशा से मेरे प्रिय रहे हैं। पिछले कुछ सालों में इस ब्लॉग पर मैं आपको दीघा, चाँदीपुर व पुरी के समुद्र तटों के चक्कर लगा चुका हूँ। चाँदीपुर और दीघा के समुद्र तट छिछले हैं। लहरें ज्यादा उठती नहीं है और आप बिना किसी डर भय के समुद्र तट में गोते लगा सकते हैं। चांदीपुर में तो आप समुद्र के अंदर सैकड़ों मीटर तक चहलकदमी करते हुए अंदर जा सकते हैं। समुद्र की तेज उठती लहरों का आनंद लेना हो तो फिर पुरी का लोकप्रिय समुद्र तट तो है ही़ पर इन सब के आलावा भी उड़ीसा के दक्षिणी सिरे पर एक और खूबसूरत समुद्र तट है जहाँ लहरों का तेज तो है पर पुरी के उलट पर्यटकों का रेलमपेल नहीं । ये समुद्रतट है गोपालपुर का जो उड़ीसा के बरहमपुर (Berhampur) शहर से मात्र सोलह किमी की दूरी पर है।

Fisherman getting ready for foray into sea at Gopalpur, Odisha
जनवरी के महीने की आख़िर में मैंने गोपालपुर जाने का कार्यक्रम बनाया। राँची से गोपालपुर जाने के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं है। पहले शाम की ट्रेन से चलकर भुवनेश्वर पहुँचिए और फिर वहाँ से दक्षिण जाने वाली किसी भी गाड़ी गाड़ी में टिकट कटा लीजिए। हावड़ा से चेन्नई जाने वाली रेलवे लाइन पर ही बरहमपुर स्टेशन पड़ता है। आज इसका नाम बदलकर ब्रह्मपुर  ( Brahmapur ) यानि ब्रह्मा के घर में तब्दील कर दिया गया है।
Map of Gopalpur  locatedon east coast of Odisha, India

उड़ीसा के गंजाम जिले में पड़ने वाला ये शहर यहाँ बनने वाली सिल्क की साड़ियों के लिए विख्यात है। जनसंख्या की दृष्टि से ये उड़ीसा का चौथा सबसे बड़ा शहर है। राँची से चलकर भुवनेश्वर तो हम अगली सुबह पाँच बजे ही पहुँच गए थे। भुवनेश्वर से ब्रह्मपुर की 170 किमी की दूरी को तय करने में करीब तीन घंटे का वक्त लग गया। भुवनेश्वर से ब्रह्मपुर का रास्ता भारत के पूर्वी घाट के किनारे किनारे चलता है। घाट की छोटी छोटी पहाड़ियों के साथ लगे खेतों के किनारे किनारे इन ताड़ के वृक्षों की बहुतायत है। 

A typical landscape along the railway tracks on way to Brahmapur
ट्रेन कुछ देर तक चिलिका झील के भी ठीक बगल से गुजरती है। झील की अथाह जल राशि को पाँच मिनट तक बगल से गुजरते देखना इस यात्रा की यादगार झांकियों में से है। दिन के साढ़े बारह बजे हम ब्रह्मपुर पहुँचे। स्टेशन के बाहर से टैक्सी ली और चल पड़े गोपालपुर की ओर। गोपालपुर में रहने के लिए बजट होटलों में सबसे लोकप्रिय उड़ीसा पर्यटन का पंथ निवास है। यहाँ आप ढाई सौ की डॉरमेट्री से लेकर ढाई हजार के कॉटेज में रह सकते हैं। पर अगर आपने पहले से आरक्षण नहीं करवाया हो तो यहाँ कमरों का मिलना टेढ़ी खीर है। महीने भर पहले भी हमें सामान्य एसी और नॉन एसी कमरा नहीं मिल पाया। अतः कॉटेज में ही रहना पड़ा।  

Front view of Panth Niwas at Gopalpur
कॉटेज की सबसे बड़ी सुविधा ये थी कि आप बिना किसी की नज़रो में आए हुए समुद्र तक आ जा सकते थे जो वहाँ से पचास  मीटर के फासले पर था। गोपालपुर को हमेशा से चक्रवातीय तूफानों का दंश झेलना पड़ा है। यहाँ का पंथनिवास भी इसकी चपेट में आ चुका है। नतीजन निवास से समुद्र के बीच का हिस्सा जो कभी पेड़ों से गुलज़ार हुआ करता था आज बिल्कुल नग्न सा दिखता है।

Cottages at Panth Niwas, OTDC

दिन का भोजन कर के हम करीब चार बजे समुद्र की ओर निकले। पंथ निवास समुद्र के किनारे थोड़ी ऊँचाई पर बना है। थोड़ी दूर समतल ज़मीन पर चलने के बाद एकदम से बालू की ढलान आ जाती है और समुद्र की विशाल नीली जलराशि के प्रथम दर्शन होते हैं। अंग्रेजों के ज़माने में गोपालपुर बंदरगाह हुआ करता था। यहाँ से बर्मा के रंगून तक व्यापार होता था। अब वो जेट्टी टूट फूट चुकी हैं हालांकि यहाँ एक नए बंदरगाह के निर्माण की योजना है।


मंगलवार, 16 अगस्त 2011

चाँदीपुर समुद्र तट भाग 2 : क्या आप समुद्र में मेरे साथ मार्निंग वॉक पर चलेंगे?

चाँदीपुर के समुद्र तट पर शाम बिताने के बाद कुछ देर विश्राम कर हम फिर पेट पूजा के लिए नीचे आए। शाम को समुद्र की तरफ बने लॉन में ही गोल टेबुल व कुर्सियाँ लगा दी जाती हैं। बादल भरी रात होने की वज़ह से समुद्र एक बारगी फिर दूर चला गया था। दूर अँधेरे में कुछ दिख भी नहीं रहा था। फिर भी समुद्र के हर रूप में देखने की इच्छा हमें भोजन के पश्चात एक बार फिर हम समुद्र की ओर बने वॉच टावर की ओर ले गई। 

शांत समुद्र को हम यूँ ही बहुत देर निहारते रहे कि अचानक हमें समुद्र के स्याह जल के बीच थोरी थोड़ी दूर पर सफेद आकृतियाँ दिखाई पड़ीं। आकृति दूर से इतनी छोटी दिखाई दे रही थी कि वो क्या है ये किसी की समझ में नहीं आ रहा था। सफेद रंग की वो आकृति पल भर में अपनी जगहें यूँ बदल रही थी मानों उसकी सतह पर बड़ी तेजी से तैर रही हो। इतने कम पानी में इतनी तेजी से तैरती मछली का अनुमान हमारे गले नहीं उतर रहा था। इसलिए रात के अँधेरे में समूह के सबसे युवा सदस्य को तहकीकात करने के लिए नीचे भेजा गया। थोड़ी देर बाद उसने ऊपर आकर कर उसने रहस्य खोला कि वो सफेद आकृति कोई मछली नहीं पर पानी की सतह के समानांतर उड़ती छोटी सफेद चिड़िया है जो कीड़े मकोड़ों और नन्ही मछलियों को अपना शिकार बना रही है।

थोड़ी दूर और समय बिताने के बाद हम वापस चले गए इस कार्यक्रम के साथ की भोर होते ही फिर समुद्र में वॉक पर निकल पड़ना है। सुबग पाँच बजे जब नींद खुली तो तेज हवा चलने की आवाज़ आई। बालकोनी का दरवाजा खोला तो पाया कि तेज हवा के साथ मूसलाधार बारिश भी हो रही है। घंटे भर की बरिश के बाद  बादल  तितर बितर हो गए।
सात बजते बजते हल्की सी धूप भी निकल आई।  बारिश से धुली ये वाटिका कुछ और हरी भरी महसूस हो रही थी।

पाँच दस मिनट के भीतर ही हम सुबह की सैर पर निकल आए। सबुह हमने समुद्र में पिछली शाम की तरह अंदर ना जा कर उसके समानांतर टहलने का निश्चय किया। अगर गूगल मैप से देखें तो हमारी सुबह की सैर का इलाका कुछ यूँ दिखाई पड़ेगा।

पहले हम अपने अतिथि गृह सागर दर्शन के दाँयी ओर मुड़े। इस इलाके में DRDO के ही कुछ और पुराने बने गेस्ट हाउस हैं। समुद्र के कटाव को रोकने के लिए पूरे तट पर पत्थरों से बाँध बनाया गया है जिसके पीछे नारियल के वृक्षों की कतार दूर तक दिखाई देती है। 

करीब तीन चार सौ मीटर बढ़ने के बाद एक बार फिर से बादल घिर आए तो हमने दूसरी दिशा में चलना शुरु किया। दरअसल चाँदीपुर का मुख्य समुद्र तट इसी दिशा में है। बादलों के आ जाने से समुद्र में टहलना और अच्छा लग रहा था। तट के किनारे पानी लगभग स्थिर था इसलिए हम हल्की लहरों वाले हिस्से में बहते जल में चलने लगे। देखिए दोनों जल राशियाँ कितनी पृथक लग रही हैं...



सागर दर्शन गेस्ट हाउस से चलते चलते हम अब PWD के गेस्ट हाउस तक आ चुके थे। चाँदीपुर तट का बालू वाला किनारा भी पार्श्व में नज़र आने लगा था। इसी तट के आस पास ही यहाँ के होटल अवस्थित हैं। ऊपर चित्र में मेरे पीछे जो बिन्दुनुमा काली आकृतियाँ दिख रही हैं वो मुख्य तट पर आए सैलानियों की हैं।

हल्के नीले सफेद बादलों ने अपना रंग बदलना शुरु कर दिया था। दूर से आते बादलों की कालिमा बारिश के आने का संकेत दे रही थी। हाथों में कैमरे होने की वजह से हम बारिश में भींफने का खतरा नहीं उठा सकते थे सो हम वापस लौटने लगे।

आधे रास्ते पहुँचते पहुँचते बारिश की रिमझिम शुरु हो गई थी। कारे कारे बदरा किस तरह बारिश की फुहारों को छोड़ रहे थे वो नज़ारा भी देखने लायक था।

तट के बिल्कुल किनारे जहाँ से समुद्र गायब हो चुका था वहाँ ठोस रेत में पानी के कटाव से बड़ी मोहक आकृतियों का निर्माण हो गया था

सुबह की इस सैर तो हो गई पर अब तक हम समुद्र में छपाका नहीं लगा पाए थे। अब समुद्र में आएँ और उसके पानी से अठखेलियाँ ना की जाएँ तो फिर बात अधूरी रह जाएगी। बारह बजे तेज धूप में अंतिम बार हम फिर तट की ओर निकले। क्या किया इस बार हमने ये देखिए इस श्रृंखला की आखिरी कड़ी में..

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

सोमवार, 8 अगस्त 2011

चाँदीपुर समुद्र तट भाग 1 : डूबता सूरज..समुद्र में बदते कदम और वो यादगार शाम...

चाँदीपुर ओडीसा का एक बेहद खूबसूरत समुद्र तट है। दशकों पहले एक बार यहाँ जाना हुआ था और उस यात्रा में समुद्र के रातों रात गायब होने और फिर सुबह में वापस अवतरित होने की कहानी भी आप सब से साझा की थी। पर उस बार चाँदीपुर से समुद्रतट से हुई मुलाकात सुबह के उन चंद घंटों की ही थी और साथ में कैमरा भी नहीं था कि आपको समुद्र के बदलते रूप को प्रत्यक्ष दिखा पाता। पिछले साल जब उड़ीसा गया तो पारादीप के बंदरगाह से लौटते वक़्त बालासोर भी जाना हुआ। 

ओडीसा के उत्तर पूर्वी हिस्से में स्थित इस जिले से चाँदीपुर मात्र पन्द्रह किमी दूर है। इसके तटीय जिले के पूर्व में बंगाल की खाड़ी और पश्चिम में मयूरभंज का इलाका आता है जबकि इसे उत्तरी सिरे पर बंगाल का मेदनीपुर जिला आ जाता है। बंगाल के सबसे लोकप्रिय समुद्र तट दीघा से बालासोर की दूरी लगभग सौ किमी की है। दीघा से बालासोर का समुद्रतट बेहद छिछला है। यानि आप समुद्र के अंदर मीलों चलते रहें पानी घुटनों से ऊपर नहीं जाएगा। चाँदीपुर के समुद्रतट की यही विशिष्टता इसे बाकी सभी समुद्र तटों से अलग कर देती है। वैसे चाँदीपुर मिसाइल प्रक्षेपण केंद्र के लिए भी मशहूर है। यह केंद्र यहाँ १९८९ में स्थापित किया गया था। भारत में बनी अधिकतर मिसाइल जैसे त्रिशूल, आकाश, नाग व हाल फिलहाल में जमीन से जमीन तक मार करने वाली मिसाइल पृथ्वी और अग्नि का प्रक्षेपण भी यहीं से किया गया था।



बालेश्वर से चाँदीपुर पहुँचते पहुँचते पौने पाँच बज चुके थे। इस बार चाँदीपुर में किसी होटल में ना ठहरकर हम डीआरडीओ के विश्रामगृह में ठहरे। ये गेस्ट हाउस समुद्र के ठीक किनारे बसा हुआ था। उद्यान को पार करिए और सामने समुद्र हाज़िर। वैसे प्रथम तल्ले की बालकोनी से भी समुद्र की गतिविधियाँ साफ दिखाई देती थीं। रूम में सामान रखकर हम लगभग पाँच बजे समुद्र की ओर चल पड़े। सूर्यास्त अभी नहीं हुआ था। पर सूरज बादलों की ओट में छुपा हुआ था। हमारे आने के पहले ही वहाँ बारिश भी हुई थी। चाँदीपूर में सूर्यास्त के पहले का समुद्र बेहद शांत होता है। जब तक सागर को चाँद ना दिखे उसका दिल हिलोरें लेने को मानता ही नहीं है। गेस्ट हाउस के वाच टॉवर से नीचे उतरकर हम नंगे पाँव समुद्र में चहलकदमी करने चल पड़े। पीछे दिख रहा है डी आर डी ओ का गेस्ट हाउस।



समुद्र के अंदर मैंने करीब दो सौ मीटर का फासला तय कर लिया था पर पानी का स्तर मेरे तलवों से भी ऊपर नहीं आया था।



सूर्यास्त के पहले एक हल्की सी रोशनी बादलों के बीच से आई तो मैंने कैमरे का रुख ऊपर की ओर मोड़ा।



अब तक समुद्र में चलते चलते हमें बीस मिनट हो चले थे। इस इलाके के समुद्र तट कि एक खास बात ये भी है कि यहाँ की सतह ठोस होती है और बालू बेहद  महीन जिससे आपको समुद्र में चलने में जरा भी तकलीफ़ नहीं होती। गेस्ट हाउस से तकरीबन हम लोग एक डेढ़ किमी दूर थे पर हमने चलना जारी रखा।



डूबता सूरज आकाश को लाल नारंगी आभा से दीप्त किए दे रहा था। हमें समुद्र में चलते चलते पैंतीस मिनट हो चुके थे। दाएँ, बाएँ और सामने जहाँ तक नज़र जाती थी दूर दूर तक समुद्र का मटमैला पानी दिख रहा था। पीछे देखने पर गेस्ट हाउस पहले से और बौना प्रतीत हो रहा था। पानी का स्तर तलवों से बढ़ गया था पर दो किमी चलने के बाद भी घुटनों से नीचे था।



पर कुछ ही मिनटों में एकदम से अँधेरा हो गया। जो लहरें शांत दिख रही थीं उनमें एक हलचल सी दिखाई देने लगी। शायद उन्हें चाँद की झलक मिल चुकी थी। हम सब भी वापस गेस्ट हाउस की ओर लौटने लगे। इस इच्छा को मन में दबाए हुए कि अगली सुबह फिर तेरा रूप देखने लौंटेंगे।


कैसा था चाँदीपुर समुद्र तट में शाम का नज़ारा। अगले भाग में आपके साथ की जाएगी समुद्र में मार्निंग वॉक। तैयार रहिएगा !

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

सोमवार, 2 नवंबर 2009

चित्र पहेली 9 : आइए जानते हैं कछुओं की दौड़ का रहस्य और कथा 'Doomed Eggs' की.!.




पिछली चित्र पहेली में प्रश्न था कि ये दौड़ क्यूँ और कहाँ हो रही है?




आपमें से अधिकतर लोगों के जवाब सही थे। पर आप में से एक ने ही बताया सही स्थान का नाम। दरअसल भितरकनिका से जुड़े इस हिस्से की बात मैंने इस पहेली की वज़ह से आप सबको अपने यात्रा वृत्तांत में नहीं बताई थी।

तो पहेली का सही हल देखने के साथ समुद्र तट पर कछुओं द्वारा अंडे देने से लेकर नन्हे बच्चों के वापस समुद्र में जाने की झाँकी देखिए यहाँ पर...

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

भितरकनिका का हमारा आखिरी पड़ाव: इकाकुला का खूबसूरत समुद्र तट

भितरकनिका में हमारा आखिरी पड़ाव था इकाकुला (Ekakula Sea Beach) का समुद्र तट। सुबह करीब साढ़े दस बजे हम डांगमाल से मोटरबोट के ज़रिए इकाकुला की ओर बढ़ गए। धूप तेज थी इसलिए नौका के ऊपरी सिरे पर बैठना उतना प्रीतिकर नहीं रह गया था। आकाश में हल्के हल्के बादल थे । उनमें से कोई बड़ा बादल जब हमारी नौका के पास आता तो हम ऊपर चले जाते और बादल की छाँव के नीचे मंद मंद बहती बयार का आनंद लेते। पर ऍसे सुखद अंतराल प्रायः कुछ मिनटों में खत्म हो जाते और हमें वापस नौका के अंदर लौट आना पड़ता।

करीब डेढ़ घंटे सफ़र तय करने के बाद हम समुद्र के बिल्कुल सामने आ चुके थे। पर इकाकुला के तट तक पहुँचने के लिए छोटी नौका की जरूरत होती है क्यूँकि कम गहरे पानी में मोटरबोट तो चलने से रही। इकाकुला तट से डेढ किमी दूर आकर हमारी मोटरबोट रुक गई। पर छोटी नौका के आने में एक घंटे का विलंब हो गया । वैसे छोटी नौका से की गई यात्रा कम रोमांचकारी नहीं रही। वैसे भी पानी के बहाव को हाथ से छूते हुए महसूस करना हो तो इससे बढ़िया विकल्प दूसरा नहीं। फिर हम सब तो पूरे पानी में ही गोता लगा लेते। बड़ी नौका से छोटी नौका में उतरते समय ध्यान नहीं रहा और भारी लोग एक किनारे जा बैठे। नौका को ये बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने बाँयी ओर बीस डिग्री का टिल्ट क्या लिया हम लोगों को लगा कि गए पानी में। पर नाव खेने वालों ने तत्परता से अपना स्थान बदलकर नाव को संतुलित किया और हमारी जान में जान आई। इकाकुला के समुद्र तट के दूसरी तरफ मैनग्रोव के जंगल हैं। पर डांगमाल के विपरीत यहाँ इनकी सघनता कम है और ये अपेक्षाकृत और हरे भरे दिखते हैं। किनारे तक तो पहुँच गए पर अगली मुश्किल लकड़ी के बने पुल तक पहुँचने की थी। लो टाईड (low tide) होने की वज़ह से पुल और पानी के स्तर में काफी अंतर आ गया था। ख़ैर वो बाधा भी नाविकों की मदद से पार की गई. पुल पार करते ही इकाकुला का फॉरेस्ट गेस्ट हाउस दिखता है। पर्यटक या तो इसकी डारमेट्री में रुक सकते हैं या बाहर बनाए गए टेंट में। हम एक टेंट में अंदर घुसे तो देखा कि अंदर दो सिंगल बेड और शौच की व्यवस्था है। सामने इकाकुला का साफ सु्थरा और बेहद खूबसूरत समुद्र तट हमारा स्वागत कर रहा था। रेत की विशाल चादर को पहले भिगोने की होड़ में लहरें लगी हुई थी। हम पहले तो समुद्र तट के समानांतर झोपड़ीनुमा शेड में जा बैठे और कुछ देर तक शांत मन से समुद्र की लीलाओं को निहारते रहे।

नहाने का मन तो बहुत हो रहा था पर दिन के दो बजे की धूप और वापस तुरंत लौटने की बंदिश की वजह से हम समुद्री लहरों में ज्यादा दूर आगे नहीं बढ़े। कहते हैं शाम के समय नदी के मुहाने से सूर्यास्त देखने का आनंद ही कुछ और है। इकाकुला के समुद्र तट का फैलाव दूर दूर तक दिखता है। पहले यहाँ समुद्र के किनारे काफी जंगल थे जो समुद्री कटाव के कारण अब कम हो गए हैं। वैसे अगर आप यहाँ एक दिन रुका जाए तो सुबह उठकर घंटे भर पैदल चलने के बाद एक और समुद्र तट मिलता है। पर उसकी बातें फिर कभी...

दिन का भोजन करने के बाद हम लोग वापस चल पड़े। दिन की कड़ी धूप गायब हो चुकी थी और रिमझिम रिमझिम बारिश होने लगी थी। हल्की फुहारें और ठंडी हवा के बीच भीगने का आनंद भी हमने उठाया। आधे घंटे बाद आकाश से बादल छँट चुके थे और गगन इंद्रधनुषी आभा से उद्दीप्त हो उठा था। ऐसा लग रहा था कि ये नज़ारा भगवन ने मानो भितरकनिका के विदाई उपहारस्वरूप दिखाया हो। आप भी देखिए ना...

भारत सरकार ने भितरकनिका को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शुमार करने का आग्रह किया है जिसकी स्वीकृत होने की पूरी उम्मीद है। अगर आप भीड़ भाड़ से दूर मैनग्रोव के जंगलों के बीच अपना समय बिताना चाहते हैं तो ये जगह आपके लिए उपयुक्त है.. पुनःश्च राज भाटिया साहब ने कुछ प्रश्न पूछे हैं । इनमें कुछ का उत्तर तो पिछली किश्तों में दिया है फिर भी चूंकि ये जानकारी यात्रा विवरण के विभिन्न भागों में बिखरी हुई है इसलिए इसे यहाँ संकलित कर रहा हूँ
  • भितरकनिका में विदेश से पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी विमान अड्डा भुवनेश्वर है जो भारत के पूर्वी राज्य उड़ीसा की राजधानी है और भितरकनिका के गुप्ती चेक पोस्ट से मात्र १२० किमी दूरी पर है। दिल्ली और कलकत्ता से नियमित उड़ानें भुवनेश्वर के लिए हैं। सड़क मार्ग से भुवनेश्वर से भितरकनिका पहुँचने का रास्ता विस्तार से मैं यहाँ बता चुका हूँ। वैसे देशी पर्यटक भुवनेश्वर के आलावा इस जगह भद्रक के रास्ते भी आते हैं।
  • इस पूरे इलाके को देखने के लिए दो रातें, तीन दिन का समय पर्याप्त है। इसमें से पहली रात डाँगमाल और दूसरी रात आप इकाकुला में बने वन विभाग के गेस्ट हाउस में बिता सकते हैं। अगर आप उड़ीसा पहली बार आ रहे हैं तो आप अपनी इस यात्रा में भुवनेश्वर, कोणार्क, पुरी और चिलका को शामिल कर सकते हैं। निजी टूर आपरेटरों द्वारा संचालित कार्यक्रम का विवरण आप यहाँ देख सकते हैं । इनके पैकेज में एयरपोर्ट से आपको रिसीव कर आपके घूमने, खाने और रहने और राष्ट्रीय उद्यान में घुसने का परमिट की सारी सुविधाएँ रहती हैं। इनकी दरों के लिए आप इनके जाल पृष्ठ पर इनसे संपर्क कर सकते हैं।
  • सरकारी वन विभाग के गेस्ट हाउस के रेट यहाँ उपलब्ध हैं और इसके लिए राजनगर के वन विभाग के डिविजनल फॉरेस्ट आफिसर से संपर्क किया जा सकता है।
  • यहाँ के स्थानीय लोग आम भारतीयों की तरह ही हैं। हिंदी व अंग्रेजी बोल भले ना पाएँ पर आसानी से समझ लेते हैं।
इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ
  1. भुवनेश्वर से भितरकनिका की सड़क यात्रा
  2. मैनग्रोव के जंगल, पक्षियों की बस्ती और वो अद्भुत दृश्य
  3. भितरकनिका की चित्रात्मक झाँकी : हरियाली और वो रास्ता ...
  4. डाँगमाल के मैनग्रोव जंगलों के विचरण में बीती वो सुबह.....
  5. डाँगमाल मगरमच्छ प्रजनन केंद्र और कथा गौरी की...
  6. इकाकुला का खूबसूरत समुद्र तट

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

मेरी ओड़िशा यात्रा : कुछ झलकियाँ नंदन कानन से.... Snapshots from Nandan Kanan

नंदन कानन (Nandan Kanan) यानि उल्लास से भरा एक वन। नंदन कानन का जैविक उद्यान भुवनेश्वर से करीब बीस किमी दूरी पर है। 1960 में स्थापित ये उद्यान सफेद बाघों (White Tigers) के लिए तो मशहूर है ही साथ ही यहाँ घड़ियाल प्रजनन केंद्र (Gharial Breeding Centre) भी है।


नंदन कानन में आप टाइगर सफॉरी (Tiger Safari) और नेचर ट्रेल (Nature Trail) का भी आनंद ले सकते हैं। इतना ही नहीं चंडक के जंगलों के विस्तार में बसे इस वन को आप देखना तो चाहते हों पर ज्यादा चलना फिरना आपके लिए कष्टकारी हो तो यहाँ के रोप वे (Rope Way) का इस्तेमाल करें।

हमारे पास नंदन कानन में व्यतीत करने के लिए तीन घंटे का ही समय था जो कि इसे पूरी तरह देखने के लिए अपर्याप्त है। इसलिए बिना ज्यादा समय नष्ट किए हम पहले सफेद बाघ के बाड़े की ओर ही चल पड़े। नंदन कानन में आज ३० से ऊपर सफेद बाघ हैं जिनका रूप आप को सहज ही आकर्षित करता है


जहाँ बाघ अपनी गुर्राहट से जंगल की शांति में खलल डाल रहे थे वहीं ये जनाब घास के बीचों बीच सुस्ताते दिखाई दिए

फिर रोपवे की ओर बढ़े तो ये हाथी मिल कर अभिवादन करने लगे।

और जिन विदेशी घुमंतु पक्षियों (Migratory Birds) की तालाश हम चिलका में कर रहे थे वो आखिरकार यहाँ देखने को मिलीं

रोपवे से जंगल की विशालता तो दिखती है पर इतनी ऊपर से आप उसे महसूस नहीं कर पाते जैसा कि नेचर ट्रेल में हमने पेरियार में किया था। रोप वे (Rope Way) से दिखती ये सहमी शांत सी झील