Wednesday, May 20, 2015

चलिए 17800 फीट ऊँचाई पर स्थित गुरुडांगमार झील तक.. Gurudangmar Lake, North Sikkim

गंगटोक से चुन्गथांग तक के सफ़र से आज आगे बढ़ते हुए आपको लिए चलते हैं हिमालय पर्वतमाला में स्थित सबसे ऊँची झीलों मे से एक गुरुडांगमार तक की रोमांचकारी यात्रा पर।
Gurudongmar Lake
चुन्गथांग की हसीन वादियों और चाय की चुस्कियों के साथ सफर की थकान जाती रही। शाम ढ़लने लगी थी और मौसम का मिज़ाज भी कुछ बदलता सा दिख रहा था। यहाँ से हम शीघ्र ही लाचेन के लिये निकल पड़े जो कि हमारा अगला रात्रि पड़ाव था। लाचेन तक के रास्ते में रिहाइशी इलाके कम ही दिखे । रास्ता सुनसान था, बीच-बीच में एक आध गाड़ियों की आवाजाही हमें ये विश्वास दिला जाती थी कि सही मार्ग पर ही जा रहे हैं । लाचेन के करीब 10 किमी पहले मौसम बदल चुका था । लाचेन घाटी (Lachen Valley) पूरी तरह गाढ़ी सफेद धुंध की गिरफ्त में थी और वाहन की खिड़की से आती हल्की फुहारें मन को शीतल कर रहीं थीं।

6 बजने से कुछ समय पहले हम लगभग 9000 फीट ऊँचाई पर स्थित इस गांव में प्रवेश कर चुके थे !पर हम तो मन ही मन रोमांचित हो रहे थे उस अगली सुबह के इंतजार में जो शायद हमें उस नीले आकाश के और पास ले जा सके !

Early Morning in Lachen


लाचेन (Lachen) की वो रात हमने एक छोटे से लॉज में गुजारी । रात्रि भोज के समय हमारे ट्रैवल एजेन्ट ने सूचना दी (या यूँ कहें कि बम फोड़ा )कि सुबह 5.30 बजे तक हमें निकल जाना है । अब उसे किस मुँह से बताते कि यहाँ तो 9 बजे कार्यालय पहुँचने में भी हमें कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। सो 10 बजते ही सब रजाई में घुस लिये। अब इस नयी जगह और कंपकंपाने वाली ठंड में जैसे तैसे थोड़ी नींद पूरी की और सुबह 6 बजे तक हम सब इस सफर की कठिनतम यात्रा पर निकल पड़े।



मौसम से मुकाबले के लिये हम कपड़ों की कई परतें यानि इनर, टी शर्ट, स्वेटर, मफलर और जैकेट चढ़ाकर पूरी तरह तैयार थे। वैसे भी 4-5 घंटों में हम 17000 फीट की ऊँचाई छूने वाले थे।लाचेन से आगे का रास्ता फिर थोड़ा पथरीला था। सड़क कटी-कटी सी थी। कहीं-कहीं पहाड़ के ऊपरी हिस्से में भू-स्खलन होने की वजह से उसके ठीक नीचे के जंगल बिलकुल साफ हो गये थे। आगे की आबादी ना के बराबर थी। बीच-बीच में याकों का समूह जरूर दृष्टिगोचर हो जाता था। चढ़ाई के साथ साथ पहाड़ों पर आक्सीजन कम होती जाती है । इसलिये हमें १७००० फीट पहुँचने के पहले रुकना था, १४००० फीट की ऊँचाई पर बसे थान्गू में ताकि हम कम आक्सीजन वाले वातावरण में अभ्यस्त हो सकें ।

Thangu

करीब 9 बजे हम थान्गू (Thangu) में थे । बचपन में भूगोल का पढ़ा हुआ पाठ याद आ रहा था कि जैसे जैसे ऊपर की ओर बढ़ेंगे वैसे वैसे वनस्पति का स्वरूप बदलेगा। इसी तथ्य की गवाही हमारे अगल बगल का परिदृश्य भी दे रहा था । चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की जगह अब नुकीली पत्ती वाले पेड़ो ने ले ली थी । पर ये क्या थान्गू पहुँचते पहुँचते तो ये भी गायब होने लगे थे। रह गये थे, तो बस छोटे-छोटे झाड़ीनुमा पौधे।

थान्गू तक धूप नदारद थी । बादल के पुलिंदे अपनी मन मर्जी इधर उधर तैर रहे थे । पर पहाड़ों के सफर में धूप के साथ नीला आकाश भी साथ हो तो क्या कहने ! पहले तो कुछ देर धूप छाँव का खेल चलता रहा । पर आखिरकार हमारी ये ख्वाहिश नीली छतरी वाले ने जल्द ही पूरी की और उसके बाद जो दृश्य हमारे सामने था वो आप इन तसवीरों में खुद देख सकते हैं। 


नीला आसमान, नंगे पहाड़ और बर्फ आच्छादित चोटियाँ मिलकर ऐसा मंजर प्रस्तुत कर रहे थे जैसे हम किसी दूसरी ही दुनिया में हों । 


15000 फीट की ऊँचाई पर हमें विक्टोरिया पठारी बटालियन (Victoria Plateau Battalion) का चेक पोस्ट मिला । दूर-दूर तक ना कोई परिंदा दिखाई पड़ता था और ना कोई वनस्पति ! सच पूछिये तो इस बर्फीले पठारी रेगिस्तान में कुछ हो हवा जाये तो सेना ही एकमात्र सहारा थी ।थोड़ी दूर और बढ़े तो अचानक ये बर्फीला पहाड़ हमारे सामने आ गया !

 
गुनगुनी धूप, गहरा नीला गगन और ऊपर से इतनी पास इस पहाड़ को देख के गाड़ी से बाहर निकलने की इच्छा सबके मन में कुलबुलाने लगी । पर उस इच्छा को फलीभूत करने पर हमारी जो हालत हुई उसकी एक अलग कहानी है । वैसे भी हम गुरूडांगमार के बेहद करीब थे ! अरे चौंकिये मत यही तो था इस यात्रा का पहला लक्ष्य ! दरअसल गुरूडांगमार (Gurudongmar) एक झील का नाम है जो समुद्र तल से करीब 17300 फीट पर है ।


जिंदगी में कितनी ही बार ऐसा होता है कि जो सामने स्पष्ट दिखता है उसका असली रंग पास जा के पता चलता है। अब इतनी बढ़िया धूप, स्वच्छ नीले आकाश को देख किसका मन बाहर विचरण करने को नहीं करता ! सो निकल पड़े हम सब गाड़ी के बाहर.....पर ये क्या बाहर प्रकृति का एक सेनापति तांडव मचा रहा था, सबके कदम बाहर पड़ते ही लड़खड़ा गये, बच्चे रोने लगे, कैमरे को गले में लटकाकर मैं दस्ताने और मफलर लाने दौड़ा ।
जी हाँ, ये कहर वो मदमस्त हवा बरसा रही थी जिसकी तीव्रता को 16000 फीट की ठंड, पैनी धार प्रदान कर रही थी । हवा का ये घमंड जायज भी था। दूर दूर तक उस पठारी समतल मैदान पर उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं था, फिर वो अपने इस खुले साम्राज्य में भला क्यूँ ना इतराये । 



जल्दी-जल्दी हम सब ने कुछ तसवीरें खिंचवायीं । अब इन तसवीरों की कृत्रिम मुस्कुराहट पर कतई ना जाइयेगा, वो सिर्फ हम ही जान सकते हैं कि उस वक्त क्या बीत रही थी। इसके बाद नीचे उतरने की जुर्रत किसी ने नहीं की और हम गुरूडांगमार पहुँच कर ही अपनी सीट से खिसके । धार्मिक रूप से ये झील बौद्ध और सिख अनुयायियों के लिए बेहद मायने रखती है । कहते हैं कि गुरूनानक के चरण कमल इस झील पर पड़े थे जब वो तिब्बत की यात्रा पर थे । ये भी कहा जाता है कि उनके जल स्पर्श की वजह से झील का वो हिस्सा जाड़े में भी नहीं जमता । 
 




गनीमत थी कि 17800 फीट की ऊँचाई पर हवा तेज नहीं थी । झील तक पहुँच तो गये थे पर इतनी चढ़ाई बहुतों के सर में दर्द पैदा करने के लिये काफी थी। मन ही मन इस बात का उत्साह भी था कि आखिर सकुशल इस ऊँचाई पर पहुँच ही गये। झील का दृश्य बेहद मनमोहक था। दूर-दूर तक फैला नीला जल और पार्श्व में बर्फ से लदी हुई श्वेत चोटियाँ गाहे-बगाहे आते जाते बादलों के झुंड से गुफ्तगू करती दिखाई पड़ रहीं थीं। दूर कोने में झील का एक हिस्सा जमा दिख रहा था। हम लोगों को वो नजदीक से देखने की इच्छा हुई, तो चल पड़े नीचे की ओर। 


बर्फ की परत वहाँ ज्यादा मोटी नहीं थी। हमने देखा कि एक ओर की बर्फ तो पिघल कर टूटती जा रही है! पर हमारे मित्र को उस पर खड़े हो कर तसवीर खिंचवानी थी । हमने कहा भइया आप ही जाइये तसवीर हम खींच देते हैं। झील के दूसरी ओर सुनहरे पत्थरों के पीछे गहरे नीले आकाश एक और खूबसूरत परिदृश्य उपस्थित कर रहा था ।

 



वापसी की यात्रा लंबी थी इसलिये झील के किनारे दो घंटे बिताने के बाद हम वापस चल पड़े । अब नीचे उतरे थे तो ऊपर भी चढ़ना था पर इस बार ऊपर की ओर रखा हर कदम ज्यादा ही भारी महसूस हो रहा था । सीढ़ी चढ़ तो गये पर तुरंत फिर गाड़ी तक जाने की हिम्मत नहीं हुई । कुछ देर विश्राम के बाद सुस्त कदमों से गाड़ी तक पहुँचे तो अचानक याद आया कि एक दवा खानी तो भूल ही गये हैं । पानी के घूँट के साथ हाथ और पैर और फिर शरीर की ताकत जाती सी लगी । कुछ ही पलों में मैं सीट पर औंधे मुँह लेटा था । शरीर में आक्सीजन की कमी कब हो जाए इसका जरा भी पूर्वाभास नहीं होता । खैर मेरी ये अवस्था सिर्फ २ मिनटों तक रही और फिर सब सामान्य हो गया । वापसी में हमें चोपटा घाटी (Chopta Valley) होते हुये लाचुंग तक जाना था । इस यात्रा की सबसे बेहतरीन तसवीरें मेरी समझ से मैंने लाचुंग की उस निराली सुबह की थीं ।
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15 comments:

  1. सजीव व सुन्दर वृतान्त।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन कवि सुमित्रानंदन पन्त और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    1. हार्दिक आभार !

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  3. उस अद्भुत और खूबसूरत यात्रा की यादें ताजी होगईं ,जो हमने पिछले नवम्बर में की थीं .नाथुला ,युमथंग वैली और जीरो पॅाइंट के अलावा इस झील पर भी गए थे . हमें बताया गया कि सिक्किम के प्राकृतिक वैभव को और भव्य बनाने वाली तीस्ता नदी का उद्गम इसी झील से होता है .झील से ग्यारह बजे तक लौटना ही होता है . ड्राइवर ने ही बताया कि इसके बाद यहाँ बर्फीला तूफान चलता है .इसलिये लाचेन से सुबह चार बजे ही झील की ओर निकल पड़े थे .और ग्यारह बजे लौट भी पड़े थे . बेशक यह यात्रा अद्भुत और अपूर्व थी .शुक्रिया मनीष जी इस सुन्दर वृत्तान्त के लिये .इसका विवरण मैंने भी यहाँ लिखा है . --- http://yehmerajahaan.blogspot.in/2014/11/2.html

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    1. अभी यूरोप की यात्रा पर था। समय मिलते ही पढ़ता हूँ। यहाँ जाकर सच में नैसर्गिक सुख का अनुभव होता है।

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  4. बहुत रोचक ,सुन्दर सटीक और सार्थक रचना के लिए बधाई स्वीकारें।
    कभी इधर भी पधारें

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  5. अति सुन्दर जगह.लगता है अगला टारगेट सिक्किम ही रखना पड़ेगा

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    1. जरूर रखिए सुंदर व साफ सुथरी जगह है।

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  6. Great Article ,Thanks For Sharing About Gurudangmar Lake.

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    1. Its my pleasure to share. Thx for liking it.

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  7. भुत सुंदर photo और रस्ते का हाल

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