Monday, July 31, 2017

एफिल से लूवर तक की पैदल यात्रा और मिलना मोनालिसा से ! Eiffel Tower to Louvre Museum on foot !

एफिल टॉवर की ऊँचाइयों को छूने के बाद मेरे पास दो विकल्प थे। या तो पेरिस के मशहूर डिज्नीलैंड में धमाचौकड़ी मचाई जाए या फिर वहाँ की सड़कों पर चहलकदमी करते हुए कुछ वक़्त बिताया जाए। जापान के अत्याधुनिक स्पेसवर्ल्ड और भारत के निक्को और रामोजी फिल्म सिटी जैसे मनोरंजन पार्क की सैर के बाद मेरे मन में डिज्नीलैंड के लिए कोई खास उत्साह नहीं था। हाँ दा विंची  कोड पढ़ते वक़्त लूवर के संग्रहालय में जाने का सपना मैंने अपने मन में बहुत पहले से पाल लिया था। समूह के बाकी सदस्य भी डिज्नीलैंड जाने को उत्सुक नहीं थे। 

लूवर के मशहूर पिरामिड के साथ मैं

पर पहले से हमने ये तय नहीं किया था कि वहाँ जाने के लिए मेट्रो या बस का सहारा लेंगे। कुछ लोगों से पूछा तो पता चला कि मेट्रो से लूवर का नजदीकी स्टेशन पास ही है। मेट्रो का रास्ता पूछते हुए हम एक अश्वेत सज्जन से टकरा गए जिसने रास्ता तो बताया पर साथ ही ये कहना ना भूला Man I always walk for such small distance. It will take not more than 15-20 minutes for you to reach there. अब ये पन्द्रह बीस मिनट का उसका जुमला हमें जोश दिला गया और हम मेट्रो छोड़ लूवर की ओर पैदल ही बढ़ लिए। आसमान में छाई बदलियों के बीच सीन नदी के किनारे किनारे दो तीन भारतीय परिवारों  का दल चल पड़ा।

Vertical  Gardens of  Quai Branly Museum दीवारों पर चढ़ते उद्यान का अद्भुत उदहारण

पैदल चलने का  सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि आप रास्ते के सारे आकर्षणों को आराम से वक़्त देते हुए चल सकते हैं। एफिल टॉवर से निकले ही थे कि हमें सड़क के किनारे यहाँ का Quai Branly Museum दिख गया जो कि अपने Vertical Garden के लिए मशहूर है। हरी दीवार यानि Green Wall को प्रचलित करने का श्रेय फ्रांस के वनस्पति  वैज्ञानिक पैट्रिक ब्लांक को दिया जाता है। यूँ तो दीवारों के समानांतर ऊँचाई तक पौधे उगाने का पेटेंट सबसे पहले अमेरिकी वैज्ञानिक स्टेनले वाइट के नाम है पर आज जिस रूप में इस विधा का विकास विश्व के अनेक देशों में हुआ है उसमें पैट्रिक ब्लांक का बड़ा हाथ है।

वैसे भारत में पुरानी इमारतों में उगती पीपल की गाछ तो भला किसने नहीं देखी होगी। रखरखाव के आभाव में अक्सर इन पौधों की जड़े दीवारों को कमजोर और सीलन की दावेदार बना देती हैं। पर वर्टिकल गार्डन की तकनीक कुछ ऐसी है कि इस पर उगी वनस्पतियाँ ना केवल भवनों को खूबसूरत बनाती हैं बल्कि उनसे उन्हें कोई नुकसान भी नहीं पहुँचता।

नदी के किनारे पिकनिक मनाने आए छोटे बच्चों के साथ उनकी शिक्षिका

सीन नदी के किनारे चलने का अपना ही आनंद है। सड़क और नदी के बीच फैली जगह को Riverfront की तरह विकसित किया गया है। यहाँ की विख्यात इमारतों के आस पास लगी भीड़ के विपरीत इन रास्तों पर पर्यटकों के बजाए यहाँ के स्थानीय निवासी ही दिखते हैं।

यूरोप के शहरों में एक जाना पहचाना दृश्य आपको गाहे बगाहे देखने को मिल जाएगा। ये नज़ारा है आदम मूर्तियों का। ऐसी ही एक मूर्ति से हम सीन नदी के पास टकरा गए।

इन जीवित मूर्तियों के साथ तस्वीर खिंचवाने का मौका भला कौन छोड़ना चाहेगा?
अक्सर मूर्ति का रूप धारण करने वाले ये कलाकार अपने शरीर में पेंट लगाकर स्थिर होकर कहीं खड़े हो जाएँगे। इनका हाव भाव इतना जबरदस्त होता है कि दूर से आप बिल्कुल नहीं बता सकते कि ये मूर्ति ना हो के एक जीवित प्राणी हैं। हाँ, जब आप इन्हें घूरेंगे तो ये अपना हाथ  हिला कर या कनखी मार कर आपके भ्रम को दूर करेंगे। इन आदम मूर्तियों के बगल में आपको दान पात्र भी मिल जाएगा जिसमें आप स्वेच्छा से कुछ  देना चाहें तो दे सकते हैं।

Monday, July 17, 2017

पेरिस की मशहूर इमारतें Famous Monuments of Paris near Eiffel Tower

पेरिस शहर से जुड़ी पिछली कड़ियों में आपने इस शहर को मोनपारनास टॉवर और एफिल टॉवर की ऊँचाइयों से देखा। इस शहर में तमाम ऐतिहासिक इमारते हैं जो फ्रांस के गौरवशाली अतीत से हमें रूबरू कराती हैं। साथ ही वे इस बात की भी गवाही देती हैं कि ये शहर ग्रीक और रोमन स्थापत्य से कितना प्रभावित था। पेरिस शहर की खूबी ये है कि अगर आप एफिल टॉवर के आस पास ठहरते हैं तो  इसके तमाम आकर्षण पैदल ही घूम सकते हैं बशर्ते 5 -6 किमी चलने का आपको अभ्यास हो। वैसे यहाँ मेट्रो, बस व यहाँ तक कि रिक्शे की भी अच्छी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

मैं पेरिस में दो दिन रुका था और इस दौरान मैंने बस और पैदल दोनों तरह से सफ़र करने का अनुभव लिया। सबसे पहले आपको लिए चलता हूँ लेज़नवालीद के सामने जिसका सुनहरा गुंबद और पूरे परिसर को आपने मोनपारनास टॉवर से देखा था। लेज़नवालीद एक काफी लंबा चौड़ा अहाता है जिसमें तमाम संग्रहालय हैं। एफिल टॉवर से सीन नदी के किनारे चलते हुए अगर आप Alexandre III के खूबसूरत पुल के पास पहुँचेगे तो पुल की दूसरी तरफ थोड़ी दूर पर ये विशाल इमारत दिखाई देगी। इसकि दाहिने सिरे पर जो संग्रहालय है उसके बाहरी चौहद्दी पर उद्यान के सामने थोड़े थोड़े अंतराल पर छोटी छोटी तोपें भी रखी गयी हैं। 

लेज़नवालीद Les Invalides Paris
पेरिस की संस्कृति में ओपेरा (Opera ) यानि वहाँ की विशिष्ट नृत्य नाटिका का कितना महत्त्व है ये तो सर्वविदित है। आपको जान कर ताज्जुब होगा कि नृत्य की ये विशिष्ट शैली करीब साढ़े चार सौ वर्ष पुरानी है। ओपेरा के जनक के रूप में Pierre Perrin का नाम लिया जाता है। सत्रहवीं शताब्दी में आम लोगों की ये मान्यता थी कि फ्रेंच भाषा कुछ ऐसी है कि उसका संगीत से जुड़ाव बड़ा मुश्किल है। पेरिन इस धारणा में बदलाव लाना चाहते थे और इसी कारण वे तत्कालीन सम्राट लुईस XIV से इस तरह की संस्था बनाने की अनुमति लेने गए। राजा की सहमति के अनुसार उन्हें बारह साल तक एक थियेटर चलाने की अनुमति दी गयी जिसमें ओपेरा के तौर तरीकों की शिक्षा के आलावा आम जनता के समक्ष उसके प्रदर्शन का भी प्रावधान रखा गया।  

पहले ओपेरा के प्रदर्शन का अधिकार सिर्फ पेरिन को मिला पर वक़्त के साथ फ्रांस के अन्य शहरों में भी इस तरह के संस्थानों की नींव रखी गयी। राजकीय संरक्षण की वजह से शुरुवात में इसका नाम रॉयल एकाडमी था जो फ्रांसिसी क्रांति के बाद नेशनल एकाडमी रखा गया। आज की तारीख में ओपेरा का प्रदर्शन तो नए बने थिएटर में होने लगा है पर फ्रांस के नृत्य बैले को यहाँ देखा जा सकता है।

नेशनल एकाडमी दि म्यूजिक Academic Musique Paris
समयाभाव के कारण हम इस संस्थान के अंदर तो नहीं जा सके पर हमें बताया गया कि यहाँ दो हजार के करीब लोगों के बैठने की व्यवस्था है और मुख्य हॉल तक पहुँचाने वाला गलियारा अंदर से काफी भव्यता लिए हुए है। बाहर लगी प्रतिमाएँ जो ताम्बे और अन्य धातुओं के मिश्रण से बनी हैं यहाँ के कवियों और संगीतज्ञों को समर्पित हैं।

Monday, July 10, 2017

The Sacred Sorrow of Sparrows : विश्व के अलग अलग कोने में उदास मानव हृदयों को जोड़ती दस कहानियाँ !

The Sacred Sorrow of Sparrows कोई यात्रा वृत्तांत नहीं है इसलिए इस किताब के प्रकाशक नियोगी बुक्स ने इसे मेरे जैसे यात्रा लेखकों के पास समीक्षा हेतु भेजने की इच्छा ज़ाहिर की तो मुझे कौतूहल जरूर हुआ। जब इस संग्रह की कहानियों से पर्दा उठने लगा तो समझ आया कि ये हम जैसे यात्रा प्रेमियों को क्यूँ भेजी गयी है? 

बस समझ लीजिए गर कोई घुमक्कड़ लेखक अपनी यात्राओं के दौरान मिले चरित्रों के इर्द गिर्द घटी घटनाओं को उन शहरों के अक़्स और संस्कृति के साथ आत्मसात करते हुए कहानियों की शक़्ल में परोस दे तो ऍसी किताब सामने आती है।


इस किताब के लेखक सिद्धार्थ दासगुप्ता यूँ तो पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा से विज्ञापन जगत से जुड़े हैं पर यात्रा करना उन्हें शुरु से भाता रहा है। उनका पहला उपन्यास Letters from an Indian Summer पेरिस से लेकर बनारस के गली कूचों तक गुजरा था। The Sacred Sorrow of Sparrows की दस कहानियाँ तो सुदुर पूर्व के टोक्यो से लेकर लखनऊ, दिल्ली, पुणे, मुंबई, दुबई, इस्फहान, इस्तांबुल होते हुए लेबनान जा पहुँचती हैं। लेखक का कहना है कि इन कहानी के चरित्रों के अंदर बहती उदासी ही उन्हें एक सूत्र में जोड़ती है। क्या ऐसा सचमुच है ये जानने के लिए आपको ले चलते हैं इन कहानियों की ओर।

Sunday, July 2, 2017

एफिल टॉवर : बुद्धिजीवियों के अनुसार जो थी बेकार सी दैत्याकार संरचना ! Do you know Eiffel was once described as giant ridiculous tower !

मोनपारनास टॉवर की ऊँचाइयों को छू लेने के अगले दिन जब हम एफिल टॉवर की ओर बढ़े तो मन में ऐसा कोई उत्साह नहीं था। वैसे भी हम शहर में घुसते ही ट्रोकाडीरो और फिर मोनपारनास टॉवर से इस की झलक पा ही चुके थे। उत्साह की कमी की एक वज़ह यहाँ लगने वाली लोगों की लंबी कतारें थीं। इतनी दूर आकर अपना कीमती समय पंक्ति में लग कर बर्बाद करना मुझे ऐसी जगहो से दूर खींचता है। पर एफिल टॉवर ना जाना तो ऐसा ही है जैसे कोई आगरे जा कर भी ताज महल करीब से निहारे बिना चला जाए। वैसे तो हमारी टिकटें पहले ही ली जा चुकी थीं फिर भी संसार के विभिन्न देशों से आए पर्यटकों के मेले के बीच पौन घंटे से ऊपर  मुझे प्रतीक्षा में गुजारने पड़े।

एफिल टॉवर
पेरिस भारत के कोलकाता की तरह एक सांस्कृतिक नगरी तो है ही साथ ही यहाँ अन्य यूरोपीय देशों के आलावा, अफ्रीकी मूल के लोग भी बसते हैं। हमारे टूर मैनेजर ने ऐसी भीड़ भाड़ वाली जगहों पर सचेत रहने की सलाह दे रखी थी।  पेरिस में पासपोर्ट और पैसों की चोरी से जुड़ी कई घटनाओं के बारे में मैं पहले भी सुन चुका था।

हमारा समूह जहाँ कतार में लगा था वहीं एक युवा यूरोपीय युवती अपनी माँ की उम्र की महिला के साथ खड़ी थी। वे लोग ना पंक्ति में थे और ना ही वहाँ से जा रहे थे। मैंने अपने समूह को उसके बारे में बता दिया पर उन पर निगाह बनाए रखी। सैकड़ों मीटर लंबी लाइन के बढ़ते ही मैंने देखा कि वे दोनों चुपके से पंक्ति के बीचो बीच घुस गयीं। भारतीय प्रवृति की यूरोप के इस आलीशान शहर में पुनरावृति होते देख मन ही मन हँसी आई। 



अब कतार में अपनी जगह तो समूह के अन्य सदस्य सँभाल ही रहे थे तो मैंने सोचा क्यूँ ना तब तक लोहे के इस बेमिसाल ढाँचे को करीब से देख लिया जाए। एफिल टॉवर का इलाका चैम्प डे मार्स के हरे भरे इलाके के बीच बना है। एफिल टॉवर बनने के पहले ये क्षेत्र मैदान की शक़्ल में था जिसे बाद में फ़्रांसिसी फौज़ की परेड और अन्य सैन्य गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। मोनपारनास  से लिए गए इस चित्र में चैम्प डे मार्स का हरा भरा इलाका देख सकते हैं।


जब मैंने आपको मोनपारनास टॉवर से एफिल की छवि दिखाई थी तो एक सवाल उठा था कि सारी पोस्ट तो मोनपारनास टॉवर  से जुड़ी थी पर आपने तो उसे दिखाया ही नहीं?  दरअसल टॉवर की दूर से ली हुई फोटो मैंने इस आलेख के लिए सँभाल कर रखी हुई थी। जब हम एफिल पर चढ़े तो हमें सामने ही मोनपारनास टॉवर अपना सीना ताने दिखाई पड़ा। अब आप भी बताइए एक सा स्थापत्य और रंग रोगन लिए पेरिस के केंद्रीय जिले की इमारतों के बीच इस टॉवर को यहाँ के लोग व्यंग्य से ही सही काले दानव के रूप में पुकारें तो क्या गलत है?

एफिल से दिखता चैम्प डे मार्स , Ecole Militaire,और  मोनपारनास टॉवर

Sunday, June 18, 2017

कैसा दिखता है पेरिस मोनपारनास टॉवर से ? : An evening in Paris from top of Tour Montparnasse

बेल्जियम से फ्रांस की सीमाओं में दाखित होते ही बारिश की झड़ी लग गयी। बारिश की रिमझिम में एफिल टॉवर की पहली झलक भी मिली। पर एफिल टॉवर पर चढ़ाई करने से पहले हम पेरिस के केन्द्रीय जिले की सबसे ऊँची इमारत मोनपारनास टॉवर पर पहुँचे। ये 59 मंजिला इमारत यहाँ की दूसरी सबसे ऊँची बहुमंजिली इमारत है।

यूरोप की सांस्कृतिक राजधानी पेरिस
केंद्रीय जिले में ये इकलौती इमारत है जो दो सौ मीटर से भी ऊँची है। आज से लगभग पैंतालीस साल पहले जब ये इमारत बनी तो लंदन की तरह ही इस कदम की व्यापक आलोचना हुई। लोगों ने इसे पेरिस शहर के चरित्र को नष्ट करने वाला भवन माना। विरोध इतना बढ़ा कि एफिल टॉवर के आस पास के केंद्रीय इलाके में सात मंजिल से ज्यादा ऊँचे भवनों पर रोक लगा दी गयी। विगत कुछ वर्षों में पेरिस शहर पर जनसंख्या के दबाव की वज़ह से ये रोक कुछ हल्की की गयी है। पर मोनपारनास टॉवर बनाने वालों पर लोगों का नज़रिया फ्रेंच ह्यूमर में झलक जाता है जब यहाँ के लोग कहते हैं कि टॉवर के ऊपर से पेरिस सबसे खूबसूरत दिखाई देता है क्यूँकि वहाँ से आप इस बदसूरत टॉवर को नहीं देख सकते 😀।

सटे सटे भवन और खूबसूरत टेरेस गार्डन
अब हँसी हँसी में कही हुई इस बात में कितनी सच्चाई है वो आप मेरे साथ इमारत के छप्पनवें तल्ले तक चल कर ख़ुद देख सकते हैं आज के इस फोटो फीचर में। जब हमारा समूह इस टॉवर के पास पहुँचा तो शाम के साढ़े छः बज रहे थे। बारिश थम चुकी थी और धूप बादलों के बीच से आँख मिचौनी खेल रही थी। मन में संदेह था कि कहीं बादलों के बीच ऊपर का नज़ारा धुँधला ना जाए। इस उहापोह के बीच लिफ्ट पर चढ़े। क्या फर्राटा लिफ्ट थी वो। मात्र 38  सेकेंड में 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से 56 वें तल्ले तक पहुँच गई।


पेरिस की पहली झलक में आड़ी तिरछी गलियों और एक जैसे लगते भवनों के बीच जो भव्य इमारत दूर से ही मेरा ध्यान खींचने में सफल हुई वो थी लेज़नवालीद जिसका नामकरण संभवतः अंग्रेजी के Invalid शब्द से हुआ हो। दरअसल सुनहरे गुंबद की वज़ह से दूर से ही नज़र आने वाला ये भवन सेवानिवृत और विकलांग जवानों के रहने के लिए बनाया गया था।

Les Invalides लेज़नवालीद

तब इस परिसर में एक अस्पताल भी था। बाद में सैनिकों के पूजा पाठ के लिए यहाँ चर्च और उसके ऊपर का सुनहरा गुंबद बना। फ्रांस के प्रसिद्ध योद्धा नेपोलियन की समाधि इसी गुंबद वाले हॉल में है। आज इस इलाके में चार संग्रहालय हैं। अब तक पेरिस की प्राचीन इमारतों के डिजाइन में एक साम्यता आपने महसूस कर ली होगी। वो ये कि पीले रंग की इन इमारतों की घुमावदार छतें स्याह रंग से रँगी हैं।
पेरिस का विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय लूवर
संग्रहालय के सामने संत जरमेन एक चर्च है जिसके आसपास का इलाका फ्रेंच फैशन डिजाइनर्स का गढ़ माना जाता है। लूवर के काफी पीछे एक पहाड़ी के ऊपर "Sacred Heart of Jesus" को समर्पित एक सुंदर सी बज़िलका है। चित्र लेते समय वहाँ बदली छाई थी सो वो स्पष्ट आ नहीं पायी।

एफिल टॉवर

Wednesday, June 7, 2017

बिष्णुपुर की शान : संगीत, शिल्प और परिधान ! Art and Crafts of Bishnupur

बिष्णुपुर को सिर्फ मंदिरों का शहर ना समझ लीजिएगा। मंदिरों के आलावा बिष्णुपुर कला और संस्कृति के तीन अन्य पहलुओं के लिए भी चर्चित रहा है। पहले बात यहाँ की धरती पर पोषित पल्लवित हुए संगीत की। बिष्णुपुर की धरती पर कदम रख कर अगर आपने यहाँ के मशहूर बिष्णुपुर घराने के गायकों को नहीं सुना तो यहाँ के सांस्कृतिक जीवन की अनमोल विरासत से आप अछूते रह जाएँगे। बिष्णुपुर घराना पश्चिम बंगाल में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ध्रुपद गायन शैली का गढ़ रहा है। ये मेरा सौभाग्य था कि जिस दिन मैं बिष्णुपुर पहुँचा उस वक्त वहाँ के वार्षिक मेले में स्थानीय प्रशासन की ओर से इलाके के कुछ होनहार संगीतज्ञों को अपनी प्रस्तुति के लिए बुलाया गया था। दिन के भोजन के पश्चात यहाँ के संग्रहालय को देखते हुए मैं  इस मेले तक जा पहुँचा।

छोटे से भोले भाले गणेश जी
मेले में चहल पहल तो पाँच बजे के बाद ही शुरु हुई। मैदान की एक ओर एक स्टेज बना हुआ था जिसके सामने ज़मीन पर जनता जनार्दन के बैठने के लिए दरी बिछाई गयी थी। दिसंबर के आखिरी हफ्ते की हल्की ठंड के बीच पहले पकौड़ों के साथ चाय की तलब शांत की गयी और फिर पालथी मार मैं वहीं दरी पर आसीन हो गया। शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में वैसे भी भीड़ ज्यादा नहीं होती। यहाँ भी नहीं थी पर युवा कलाकारों को अपने साज़ के साथ शास्त्रीय संगीत के सुरों को साधने का प्रयास ये साबित कर गया कि यहाँ की प्राचीन परंपरा आज के प्रतिकूल माहौल में भी फल फूल रही है। 

पर संगीत की ये परंपरा यहाँ पनपी कैसे? मल्ल नरेशों ने टेराकोटा से जुड़ी शैली को विकसित करने के साथ साथ कला के दूसरे आयामों  को भी काफी प्रश्रय दिया। इनमें संगीत भी एक था। ऍसा कहा जाता है कि बिष्णुपुर घराने की नींव तेरहवीं शताब्दी में पड़ी पर इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हैं।  इतिहासकारों ने इस बात का उल्लेख जरूर किया है कि औरंगजेब के ज़माने में जब कलाकारों पर सम्राट की तिरछी निगाहें पड़ीं तो उन्होंने आस पास के सूबों में जाकर शरण ली। तानसेन के खानदान से जुड़े ध्रुपद गायक और वादक बहादुर खान भी ऐसे संगीतज्ञों में एक थे। उन्होंने तब बिष्णुपुर के राजा रघुनाथ सिंह द्वितीय के दरबार में शरण ली। उनकी ही शागिर्दी में बिष्णुपुर घराना अपने अस्तित्व में आया।
बाँकुरा के मशहूर घोड़े

संगीत का आनंद लेने के बाद यहाँ के हस्तशिल्प कलाकारों की टोह लेने का मन हो आया। बिष्णुपुर के मंदिरों के बाद अगर किसी बात के लिए ये शहर जाना जाता है तो वो है बांकुरा का घोड़ा। ये घोड़ा बांकुरा जिले का ही नहीं पर समूचे पश्चिम बंगाल के प्रतीक के रूप में विख्यात है। बंगाल या झारखंड में शायद ही किसी बंगाली का घर हो जिसे आप घोड़ों के इन जोड़ों से अलग पाएँगे। हालांकि विगत कुछ दशकों में ये पहचान अपनी चमक खोती जा रही है। एक समय टेराकोटा से बने इन घोड़ों का पूजा में भी प्रयोग होता था पर अब ये ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाने का सामान भर रह गए हैं।

नारंगी और भूरे रंग में रँगे ये घोड़े यहाँ कुछ इंचों से होते हुए तीन चार फुट तक की ऊँचाई में मिलते हैं। अपने मुलायम भावों और सुराहीदार गर्दन लिए ये बाजार में हर जगह आपको टकटकी लगाए हुए दिख जाएँगे। इनकी बटननुमा आँखों को देखते देखते इनके सम्मोहन से बचे रहना आसान नहीं होता।
थोड़ी सी मिट्टी गढ़ती कितने सजीले रूप !
टेराकोटा यानी पक्की हुई मिट्टी से खिलौने बनाने की ये कला बिष्णुपुर  और बांकुरा के आस पास के गाँवों में फैली पड़ी है। अगर समय रहे तो आप इन खिलौंनों को पास के गाँवों में जाकर स्वयम् देख सकते हैं। घोड़ों के आलावा टेराकोटा से गढ़े गणेश, पढ़ाई करती स्त्री, ढाक बजाते प्रौढ़, घर का काम करती महिलाएँ आपको इन हस्तशिल्प की दुकानों से जगह जगह झाँकती मिल जाएँगी। मेले में ग्रामीण इलाकों से आए इन शिल्पियों से इन कलाकृतियों को खरीद कर बड़ा संतोष हुआ। इनकी कीमत भी आकार के हिसाब पचास से डेढ़ सौ के बीच ही दिखी जो की बेहद वाज़िब लगी। 

टेराकोटा की इन कलाकृतियों में एक बात गौर करने लायक थी। वो ये कि यहाँ के शिल्पी मानव शरीर को आकृति देते समय हाथ व पैर पतले तो बनाते  हैं पर साथ ही इनकी लंबाई भी कुछ ज्यादा रखते हैं ।
टेराकोटा के बने शंख

यूँ तो शंख का उद्घोष तो हिंदू धर्म में आम है पर बंगाली संस्कृति का ये एक अभिन्न अंग है। धार्मिक अनुष्ठान हो या सामाजिक क्रियाकलाप बंगालियों में कोई शुभ अवसर बिना शंख बजाए पूरा नहीं होता। शादी के फेरों से लेकर माँ दुर्गा की अराधना में इसकी स्वरलहरी गूँजती रहती है। पर टेराकोटा के बने शंख पहली बार मुझे बिष्णुपुर में ही दिखाई पड़े।

इनकी चमक के क्या कहने !
टेराकोटा से तो बिष्णुपुर की पहचान है पर अन्य यहाँ जूट, बाँस व मोतियों से बने हस्तशिल्प भी खूब दिखे।

जूट के रेशे से बनी गुड़िया

Saturday, May 27, 2017

बिष्णुपुर की मंदिर परिक्रमा : आइए आज चलें खूबसूरत जोर बांग्ला व मदनमोहन मंदिर में Jor Bangla and Madanmohan Temple, Bishnupur

बिष्णुपुर की मंदिर परिक्रमा के पहले चरण में आपने दर्शन किए थे श्याम राय, राधा माधव, लालजी आदि मंदिरों के। आज इन ऐतिहासिक मंदिरों की परिक्रमा जारी रखते हुए जानेंगे बंगाल की वास्तुकला का अद्भुत परिचय देते जोर बांग्ला और मदन मोहन मंदिरों के बारे में। पर मंदिरों भ्रमण पर चलने से पहले बिष्णुपुर के भूगोल पर एक नज़र मार ली जाए तो कैसा रहेगा? 

जोर बांग्ला मंदिर

बिष्णुपुर में करीब छोटे बड़े तीस मंदिर हैं जो मल्ल राजाओं के शासन काल में सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में बनाए गए। पर मजे की बात ये है कि इन तीस मंदिरों का फैलाव चंद वर्ग किमी तक ही सीमित है इसलिए इन मंदिरों को आप बड़े आराम से एक दिन में ही देख सकते हैं। मल्ल शासकों ने मंदिरों के आलावा यहाँ पानी सिंचित करने के लिए कई बाँध भी बनवाए। अगर आप नीचे दिए हुए बिष्णुपुर के नक्शे पर गौर करें तो इन बाँधों  से इस कस्बे को घिरा पाएँगे। आज की तारीख़ में ये बाँध विशाल तालाब का प्रतिरूप दिखते हैं जिनमें बारिश के दिनों में तो खूब पानी रहता है पर बाकी समय जलकुंभियाँ ही अपना साम्राज्य पसारे दिखती हैं।

बिष्णुपुर का मानचित्र


Saturday, May 13, 2017

बिष्णुपुर मंदिर परिक्रमा : रास मंच और श्याम राय का अद्भुत शिल्प ! Terracotta temples of Bishnupur, West Bengal

अक़्सर ऐसा होता है कि जिस इलाके में हम पलते बढ़ते है उसकी ऐतिहासिक विरासत से सहज ही लगाव हो जाता है। स्कूल में जब भी इतिहास की किताबें पढ़ता तो पूर्वी भारत के किसी भी राजवंश का जिक्र आते ही पढ़ने की उत्सुकता बढ़ जाती। प्राचीन मौर्य/मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र यानि आधुनिक पटना तब मेरा घर हुआ करता था। पर पाटलीपुत्र में कुम्हरार के अवशेषों के आलावा ऐसा कुछ भी नहीं था जो इस विशाल साम्राज्य की कहानी कहता। राजगृह, नालंदा, पावापुरी और बोधगया में भी बौद्ध विहारों व स्तूपों, जैन मंदिरों और विश्वविद्यालय के आलावा अशोक या उनके पूर्ववर्ती सम्राटों की कोई इमारत बच नहीं पायी। वैसे भी जिनके शासन काल की अवधि ही ईसा पूर्व में शुरु होती हो उस काल के भवनों के बचे होने की उम्मीद रखी भी कैसे जा सकती है? 

मौर्य शासको के बाद इस इलाके पर राज तो कई वंशों ने किया पर इतिहास के पन्नों पर नाम आया पाल वंश के राजाओं गोपाल, धर्मपाल और महिपाल का जिन्होंने बंगाल बिहार के आलावा उत्तर भारत के केंद्र कन्नौज पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए राष्ट्रकूट व प्रतिहार शासकों के साथ लोहा लिया। बारहवीं शताब्दी आते आते  पाल वंश का पराभव हो गया। भागलपुर के पास विक्रमशिला औेर बांग्लादेश में सोमपुरा के बौद्ध विहारों के अवशेष पाल शासन के दौरान बने विहारों की गवाही देते हैं।
बिष्णुपुर
पर इन सब के आलावा भी बंगाल के बांकुरा जिले से सटे छोटे से भू भाग पर एक अलग राजवंश ने शासन किया जिसके बारे में ज्यादा पुष्ट जानकारी नहीं है। ये राजवंश थाा मल्ल राजाओं का जो सातवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक इस छोटे से इलाके में काबिज़ रहे। मल्ल शासकों द्वारा 17 वीं और 18 वीं शताब्दी में बनाए गए टेराकोटा के मंदिरों ने इस कस्बे  को हमेशा हमेशा के लिए इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में जगह दिला दी। बिष्णुपुर के बारे मैं मैंने जबसे जाना तबसे वहाँ जाने की इच्छा मन में घर कर  गयी थी।

राँची से कोलकाता के रेल मार्ग पर बांकुरा स्टेशन तो पड़ता है पर शताब्दी जैसी ट्रेन वहाँ रुकती नहीं। धनबाद से बिष्णुपुर की दूरी करीब 160 किमी है जिसे सड़क मार्ग से चार पाँच घंटे में तय किया जा सकता है। पर बाहर से आने वालों के लिए विष्णुपुर पहुँचने का सबसे आसान तरीका है कोलकाता आकर वहाँ से सीधे बिष्णुपुर के लिए ट्रेन पकड़ने का। कोलकाता से विष्णुपुर की 142 किमी की दूरी एक्सप्रेस ट्रेन चार घंटे में पूरी कर लेती है। दिसंबर के महीने में जब मैं कोलकाता गया तो वहीं से बिष्णुपुर जाने का कार्यक्रम बन गया। सुबह सुबह कोलकाता से निकला और साढ़े दस बजे तक मैं बिष्णुपुर स्टेशन पर था।
राधा माधव मंदिर में सहयात्री के साथ
बिष्णुपुर स्टेशन से निकल कर आपको बिल्कुल नहीं लगेगा कि आप किसी ऐतिहासिक शहर में आ गए हैं। ये आम सा एक कस्बा है जहाँ ज़िदगी घोंघे की रफ्तार से खिसकती है । कस्बे की दुबली पतली धूल धूसरित सड़कों पर आटोरिक्शे से ले कर रिक्शे व ठेला गाड़ी दौड़ती दिखेंगी।पर चंद किमी के फासले को तय करने के बाद आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप एक दूसरी ही दुनिया में आ गए हैं।   ये दुनिया है बिष्णुपुर के वैष्णव राजाओं द्वारा बनाए दर्जनों छोटे बड़े टेराकोटा के मंदिरों की जिन्हें ASI ने बेहद करीने से रखा और सहेजा है। काश इन तक पहुँचने वाली सड़कें भी इस इलाके के गौरवशाली अतीत का प्रतिबिम्ब बन पातीं । स्टेशन से निकल कर शहर के मंदिरों को घूमने का सबसे अच्छा ज़रिया आटोरिक्शा है जो सीजन के हिसाब से तीन चार सौ रुपये में शहर का कोना कोना घुमा देता है। बिष्णुपुर का हमारा सबसे पहला पड़ाव था रासमंच

Monday, May 1, 2017

हरी भरी इस धरती पर चलने को मचलते पाँव हैं , ओ साथ चलते पथिक बता क्या इसी डगर तेरा गाँव है? In pictures : The countryside of Belgium

बेल्जियम से हमारी डगर जाती थी फ्रांस की ओर। यूरोप के खेत खलिहानों को पास से निहारने का पहला मौका तो क्यूकेनहॉफ से एमस्टर्डम आते वक़्त मिला था पर ब्रसल्स से पेरिस जाते वक्त यूरोप के भीतरी इलाकों से गुजरना आँखों के साथ मन को भी सुकून दे गया। जैसे जैसे फ्रांस की धरती पास आने लगी वैसे वैसे मौसम भी करवट लेने लगा। नीले आसमान को स्याह बादलों ने ढक लिया। हवा का शोर एकदम से बढ़ गया और तापमान तेजी से कम होने लगा। हमारी सरपट भागती बस ने इस बदलती फ़िज़ा में जो अनूठे रंग दिखाए वही सँजों के लाया हूँ मैं आपके लिए आज की इस पोस्ट में.. 

मिट्टी है ये या सोना है, इक दिन इसमें ख़ुद खोना है...
सकल वन फूल रही सरसों, आवन कह गए आशिक रंग..और बीत गए बरसों।
हरी भरी इस धरती पर चलने को मचलते पाँव हैं , ओ साथ चलते पथिक बता क्या इसी डगर तेरा गाँव है?
वृक्ष की कतार में, मौसमी बयार में..दिल मेरा खो गया किसके इंतज़ार में

Monday, April 17, 2017

ब्रसल्स के सबसे लोकप्रिय आकर्षण : Atomium & Town Hall, Brussels

हर देश की अपनी एक पहचान होती है जो विश्व के अन्य हिस्सों में रहने वाले लोगों के लिए उस देश का प्रतीक बन जाती है। ज्यादातर ये पहचान चिन्ह इमारतों की शक़्ल में होते हैं। भारत का ताजमहल, चीन की दीवार, मिश्र का पिरामिड, फ्राँस का एफिल टॉवर, इंग्लैंड का बिग बेन ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। अक्सर  ऐसे प्रतीक इतिहास के पन्नों पर अपना महत्त्वपूर्ण दखल रखते हैं। पर मगर मैं अगर कहूँ कि एक देश ऐसा भी है जिसका प्रतीक विज्ञान से प्रेरित है तो थोड़ी  हैरत तो होगी आपको।


अगर आप बेल्जियम की राजधानी ब्रसल्स में जाएँ तो प्रतीक के तौर पर आपको  दुकानों, बसों, इमारतों  पर आणविक संरचना बनी दिखाई देगी। बेल्जियम वासियों ने इसका नाम दिया है एटोमियम । स्कूल में आपने धातु क्रिस्टल की संरचना पढ़ते हुए BCC (Body Centered Cubic) व  FCC (Face Centered Cubic) के बारे में पढ़ा होगा। अब याद ना भी हो तो मैं याद दिला देता हूँ। दरअसल ये एक घन यानि क्यूब के विभिन्न बिंदुओं पर अणु की पारस्परिक स्थितियों का चित्रण था।  ये भी तब बताया गया था कि लोहे के अणु  BCC सरीखी संरचना लिए होते हैं। एक घन यानि क्यूब के सारे कोनों पर और एक ठीक घन के मध्य में।



पचास के दशक में यूरोप के वैज्ञानिक नित नई खोजों में लीन थे। बेल्जियम भी इससे अछूता नहीं था और जीवन में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के ख़्याल से यहाँ EXPO 58 के तहत 1958 में एटोमियम का निर्माण हुआ। लोहे के क्रिस्टल की संरचना को 16500 करोड़ गुणा बना कर ये इमारत बनाई गयी। एक BCC के रूप में इसमें अठारह मीटर व्यास के नौ अलग अलग गोले बनाए गए। इन गोलों को तीन मीटर व्यास के पाइप से आपस में जोड़ा गया। इस तरह जो ढाँचा बना उसकी की ऊँचाई 102 मीटर थी। आज इस संरचना का प्रयोग एक म्यूजियम के तौर पर होता है। इसके सबसे ऊपरी गोले में एक भोजनालय बना है जहाँ से आप ब्रसल्स शहर का नज़ारा देख सकते हैं।

Saturday, April 8, 2017

ब्रसल्स, बेल्जियम : चलिए चलें कार्टून व चॉकलेट प्रेमियों के देश में In pictures : Brussels, Belgium

लंदन और एम्सटर्डम के बाद मेरे यूरोपीय सफ़र का अगला पड़ाव था बेल्जियम का शहर ब्रसल्स । यूरोप का ये एकमात्र ऐसा शहर था जहाँ कुछ घंटों के लिए ही सही, कनाडा जाते समय मेरा रुकना हो पाया था। अगर आपको याद हो तो इस इस शहर के खूबसूरत आकाशीय नज़ारों का झरोखा मैंने यहाँ और यहाँ आपको दिखाया था। ब्रसल्स में हम करीब दो दिन रहे। यहाँ की कुछ मशहूर इमारतें भी देखीं। बाजारों में यूँ ही चहलकदमी की और इधर उधर  घूमते फिरते कुछ अलग से नज़ारे कैमरे में क़ैद किये। इमारतों की बारी तो बाद में आएगी। आज तो थोड़ा यूँ ही "बेफिक्रे" घूम लें इन तसवीरों के साथ.. 

टिनटिन के देश में !
बेल्जियम अपने कार्टून चरित्रों के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। कोई भी कार्टून प्रेमी टिनटिन के नाम से भला कैसे अनजान होगा? ये मशहूर चरित्र बेल्जियम से ही ताल्लुक रखता है और इसके रचयिता  Hergé नामक कार्टूनिस्ट थे। ब्रसल्स के बाजारों में  बेल्जियम का पूरा समाज ही कार्टून चरित्रों का रूप धर खिलौने के रूप में बिक रहा था।

बेल्जियम का कार्टून संसार
इन कार्टूनों को ज़रा ध्यान से देखिए डॉक्टर, जज, वकील, इंजीनियर, खानसामे, शिक्षक, खिलाड़ी, नृत्यांगना, वादक, फोटोग्राफर सब नज़र आएँगे आपको। साथ ही नज़र आएँगी पुरुषों के साथ हर क्षेत्र में क़दम मिलाती महिलाएँ जो कि यहाँ की संस्कृति की हक़ीकत भी है। वैसे सबसे  मजेदार चरित्र मुझे खिसकती पैंट और तोंद के साथ वो गोल्फर लगा। आपकी इस बारे में क्या राय है? 😃

ब्रसल्स के पुराने होटलों में से एक,  होटल एमिगो Hotel Amigo
यूरोप की इमारतों में खिड़की के आगे यूँ लटकते गमलों में फूल लगाना आम बात है। सबसे पहले ये नज़ारा मुझे ब्रसल्स के होटल एमिगो में देखने को मिला। अब बाहर से देखने से आपको शायद ही लगे कि ये एक पाँच सितारा होटल है पर इस होटल की ऐतिहासिक विरासत इसे आज भी ब्रसल्स के विशिष्ट होटलों की श्रेणी में ला खड़ा करती है।

कहा जाता है कि इस इमारत की मिल्कियत पाँच सौ साल पहले एक धनी व्यापारी के हाथ थी। 1522 ई में इसे वहाँ की सिटी काउंसिल ने खरीदा । वैसे क्या आप अंदाज लगा सकते हैं कि सबसे पहले इस होटल का प्रयोग स्थानीय प्रशासन ने किस तौर पर किया होगा? जनाब बड़ा मुश्किल है ये अनुमान लगाना। चलिए मैं ही बता देता हूँ ये भवन सबसे पहले एक जेल के रूप में इस्तेमाल किया गया।😀 सन 1957 में ये होटल इस रूप में आया और आज तक अपनी पुरानी विरासत को यूँ ही समेटे हुए है।

Le  Faucon : फ्रांसिसी प्रभाव ब्रसल्स में स्पष्ट दिखता है
ब्रसल्स में सड़कों और रेस्त्रां में लोग बेहद शांत और सहज दिखे। कुछ गलियाँ परंपरागत यूरोपीय शैली की इमारतों से सजी थीं तो कहीं डिजाइन का नयापन ध्यान खींच लेता था।

अब इस बोतलनुमा इमारत को देख के ही नशा आ जाए तो किसी की क्या ख़ता ?

Thursday, March 30, 2017

बड़ा इमामबाड़ा परिसर : जहाँ अकाल ने रखवायी लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों की नींव ! Bara Imambara, Lucknow

बचपन में जब भी दोस्तों के साथ लखनऊ शहर का जिक्र होता तो एक ही बात चर्चा में आती और वो थी यहाँ की भूलभुलैया की। जो भी यहाँ से हो कर आता इसकी तंग सीढ़ियों और रहस्यमयी गलियारों की बात जरूर करता। आज से करीब 28 साल पहले एक प्रतियोगिता परीक्षा देने मैं सन 89 में जब लखनऊ पहुँचा तो इरादा ये था कि परीक्षा जैसी भी जाए इस भूलभुलैया के तिलिस्म से गुजर कर ही लौटूँगा । 

बड़ा इमामबाड़ा का बाहरी द्वार और उद्यान
एक आटो से परीक्षा केंद्र से सीधे भूलभुलैया तक तो पहुँच गया पर पर होनी को कुछ और मंजूर था। उसी दिन शियाओं के सर्वोच्च नेता आयोतुल्लाह खोमैनी का इंतकाल हो गया था। पूरा परिसर ही आम जनता के लिए बंद था। तभी मुझे ये सत्य उद्घाटित हुआ कि भूलभुलैया कोई अलग सी जगह नहीं पर बड़ा इमामबाड़ा का ही एक हिस्सा है। लगभग तीन दशकों बाद जब मैं इस इलाके में पहुँचा तो इमामबाड़े की आसपास की छटा बिल्कुल बदली बदली नज़र आयी। पर इससे पहले कि मैं आपको इस इमामबाड़े में ले चलूँ, कुछ बातें उस शख़्स के बारे में जिसकी बदौलत ये इमारत अपने वज़ूद में आई।
बड़ा इमामबाड़ा सहित लखनऊ की तमाम ऐतिहासिक इमारतों की नींव अवध के चौथे नवाब आसफ़ उद दौला ने रखी थी । आसफ़ उद दौला के पहले नवाबों की राजधानी फैज़ाबाद हुआ करती थी। वे 26 साल की उम्र में नवाब बने पर माँ की राजकाज में दखलंदाज़ी से तंग आकर उन्होंने फैज़ाबाद से राजधानी को लखनऊ में बसाने का निर्णय लिया।
पहले द्वार से घुसते ही दूसरे द्वार की झलक कुछ यूँ दिखाई देती है
बड़े इमामबाड़े का निर्माण एक अच्छे उद्देश्य को पूरा करने के लिए हुआ। 1785 में अवध में भीषण अकाल  पड़ा। क्या अमीर क्या गरीब सभी दाने दाने को मुहताज हो गए। लोगों को रोजगार देने के लिए नवाब ने ये बड़ी परियोजना शुरु की। वे आम जनता से दिन के वक़्त काम लेते। वहीं रियासत के अमीर उमरा रात के वक़्त काम करते ताकि उनकी तथाकथित रईस की छवि पर कोई दाग न लगने पाए । जब तक अकाल रहा इमामबाड़े पर काम चलता रहा। इमामबाड़े, मस्जिद और बाउली के साथ लगे मेहमानख़ाने को पूरा होने में छः साल लग गए।

दूसरा द्वार और इसके पीछे दिखता बड़ा इमामबाड़ा
बड़े इमामबाड़े तक पहुँचने के लिए आप को दो विशाल द्वार पार करने पड़ते हैं। इन द्वारों के बीच की जगह फिलहाल एक खूबसूरत बागीचे ने ले रखी है। इमारत के गुंबद हों, मेहराबें हों या मीनार इन सब पर मुगल स्थापत्य का स्पष्ट  प्रभाव दिखता है।  इमामबाड़े की दीवारों के बारे में यहाँ का हर गाइड बड़े शान से ये बताना नहीं भूलता कि "दीवारों के भी कान होते हैं " ये मुहावरा यहाँ हक़ीकत बन जाता है।

Sunday, March 19, 2017

छोटा इमामबाड़ा : जिसकी सफेद आभा कर देती है मंत्रमुग्ध ! Chota Imambara, Lucknow

लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों का जिक्र वहाँ के इमामबाड़ों के बिना अधूरा है। अवध के नवाब लगभग 130 सालों तक इस इलाके में काबिज़ रहे। पहले मुगल सम्राट के सूबेदार की हैसियत से और बाद में मुगलों की ताकत कम होते ही स्वघोषित स्वतंत्र नवाबों के रूप में। पर उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में ही सत्ता की असली चाभी परोक्ष रूप से अंग्रेजों ने हथिया ली थी। लगभग पचास सालों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के रहमोकरम पर अवध के ये नवाब शासन करते रहे पर सिपाही विद्रोह के दमन के साथ नवाबी हुकूमत का पूर्णतः अंत हो गया।

अवध सूबे की राजधानी पहले फैजाबाद हुआ करती थी बाद में लखनऊ को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया । अवध के नवाब मूलतः ईरानी मूल के शिया थे और आज भी लखनऊ की आबादी एक हिस्सा इस संप्रदाय से ताल्लुक रखता है। शिया संप्रदाय में वैसे तो बारह इमाम यानि धर्मगुरु माने गए हैं पर इनमें उनके तीसरे इमाम हुसैन का विशेष स्थान है। हज़रत हुसैन कर्बला की लड़ाई में अपने परिवार के साथ शहीद हुए थे। शिया मुसलमान उसी तकलीफ़देह घटना के मातम में हर साल मुहर्रम का पर्व मनाते हैं। 

छोटे इमामबाड़े के मुख्य द्वार का अंदरुनी दृश्य
मुहर्रम में जो दस दिन का शोक मनाया जाता है उससे जुड़ी धार्मिक गतिविधियों के लिए बनाया गया स्थल इमामबाड़े के नाम से जाना जाता है। अपनी लखनऊ यात्रा में मैंने छोटे और बड़े दोनों इमामबाड़ों को करीब से देखा और आज मैं आपको ले चल रहा हूँ छोटे इमामबाड़े यानि हुसैनाबाद इमामबाड़े की पवित्रता और खूबसूरती से आपको रूबरू कराने के लिए।

बाहर से ऐसा दिखता है इमामबाड़े का प्रवेश द्वार !
बड़े इमामबाड़े से रूमी दरवाजे होते हुए छोटे इमामबाड़े तक पहुँचने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता। जब आप सड़क से सटे इमामबाड़े का रुख करते हो तो मुख्य द्वार के नीचे बने कमरों में लखनवी चिकन दस्तकारी के साथ कई और दुकानें दिखाई देती हैं।  धार्मिक महत्त्व की इस ऍतिहासिक इमारत के सामने इन दुकानों का होना अजीब लगता है। पता नहीं इन्हें वहाँ रहने की इजाजत किसने दी?

जैसे ही इमामबाड़े के अंदर कदम पड़ते हैं परिदृश्य एकदम से बदल जाता है। नीले आकाश तले फैली सर्वत्र सफेदी देख मन को शांत कर देती हैं। द्वार का अंदर का हिस्सा बेहद आकर्षक है। इस पट और बगल की मीनारों के शीर्ष से तारों का एक जाल एक स्त्री की प्रतिमा के हाथों में आकर ख़त्म होता है। थोड़ी देर में ही सही हमें समझ आ गया कि ये मूर्ति तड़ित चालक का काम कर रही है।
मुख्य द्वार के पास की सुनहरी मछली जो बताती है हवा का रुख

इमामबाड़े में घुसते ही बाँए तरफ़ शाही हमाम की ओर रास्ता जाता है वहीं दाहिनी ओर हुसैनाबाद मस्जिद  नज़र आती  है। द्वार के ठीक सामने हवा में लटकी एक सुनहरी मछली आपका स्वागत करती दिखती है। वास्तव में ये मछली की शक्ल में हवा का  रुख जानने का एक यंत्र है। मछली के नीचे बनी दीवारों में इस्लामी कलमकारी का खूबसूरत नमूना दिखता है। वैसे अगर आपको ख़्याल हो तो अवध नवाबों के झंडों में भी मुकुट एक साथ सुनहरी मछली दिखाई देती है।

हुसैनाबाद इमामबाड़ा जिसे प्रचलन में छोटा इमामबाड़ा भी  कहा जाता है।
इसके ठीक पीछे इमामबाड़े की इमारत अपने भव्य गुंबद के साथ नज़र आती है। ताजमहल में जिस तरह मुख्य इमारत की तरफ़ जाने वाले रास्ते के मध्य में फव्वारे लगे हैं वैसे ही यहाँ भी मध्य में फव्वारों के साथ नहरनुमा हौज और उसके ऊपर एक छोटा सा पुल है। कहते हैं एक ज़माने में वहाँ एक कश्ती भी लगी रहती थी जो बाद में रखरखाव के आभाव में नष्ट हो गयी।
हुसैनाबाद इमामबाड़े के सामने बनी नहर और बाग
इमामबाड़े की मुख्य इमारत में घुसने के पहले हमारे गाइड ने मुझे शाही हमाम को पहले देखने का आग्रह किया। तुर्की, जापान और रोम में सामूहिक स्नानागारों का जिक्र तो आपने सुना होगा पर भारत में विशिष्ट स्नानागार कभी आम लोगों के लिए नहीं बनाए गए। हाँ, नवाबों की बात कुछ और थी।

Sunday, March 5, 2017

एमस्टर्डम : क्या दौड़ता है इस शहर की रगों में ! Spirit of Amsterdam !

हर शहर की अपनी एक खासियत होती है, अपना एक चेहरा होता है। उस चेहरे के भीतर के चेहरे को समझने के लिए आपको उस जगह कई दिन गुजारने पड़ते हैं पर  कम समय में भी अगर आप ध्यान दें तो शहर की कुछ विशिष्टताएँ नज़र तो आ ही जाती हैं। एमस्टर्डम की सवारी साइकिल की चर्चा तो मैंने पिछली पोस्ट में ही कर ली थी। आज आपको दिखाते हैं शहर की ऐसी झलकियाँ जिनमें थोड़ा ही सही, इस शहर का अक़्स नज़र आएगा आपको। 

यूरोपीय शहरों में लोकप्रियता के हिसाब से एमस्टर्डम आठवें स्थान पर आता है। नीदरलैंड में बाहर से जो यात्री आते हैं वो इसके दो राज्यों उत्तरी और दक्षिणी हालैंड में ही सिमट जाते हैं। हेग, राटरडम, क्यूकेनहॉफ और एमस्टर्डम इसी इलाके में स्थित हैं।  एमस्टर्डम में पर्यटकों का सबसे बड़ा जमावड़ा राइक्स म्यूजियम और दाम स्कव्यार के आस पास ही लगता है। राइक्स म्यूजियम के सामने बने प्रतीक चिन्ह पर पर्यटकों की मस्ती देखते ही बनती है।
प्रेमियों के लिए दुनिया की कोई जगह वर्जित नहीं 😆
दाम स्कवायर या एमस्टर्डम सेंट्रल स्टेशन के आस पास ये घोड़ा गाड़ी आपको सहज ही नज़र आ जाएगी। आप इस गाड़ी पर चढ़कर आधे एक घंटे के लिए ही सही अपने आपको विशिष्ट व्यक्ति समझ ही लेंगे क्यूँकि जिधर भी आप जाएँगे बाहरी आंगुतक आपकी तसवीर लेने के लिए लालायित रहेंगे। ये अलग बात है कि उनके आकर्षण का केंद्र आप नहीं बल्कि ये घोड़ागाड़ी होगी। पर फ्रेम में तो आप भी रहेंगे ना 😉। वैसे इस राजा वाली feeling के लिए आपको घंटे भर में सौ यूरो यानि सात हजार रुपये से हाथ धोना पड़ सकता है। सो हुजूर मैंने तो दूर से ही इसके दर्शन कर लिए।

जेब में पैसे हों और मन में राजसी ठाठ बाठ से चलने का इरादा तो ये घोड़ागाड़ी बुरी नहीं है आपके लिए
चित्र में जो दुकान दिख रही है De Bierkoning वो यहाँ की मशहूर बीयर की दुकान है।

Saturday, February 25, 2017

साइकिल सवारों का शहर एमस्टर्डम Amsterdam : Bicycle capital of the world !

एमस्टर्डम को लोग दुनिया की साइकिल राजधानी के नाम से भी जानते हैं और जैसे ही आप इस शहर में प्रवेश करते हैं आपको शहर की ये पहचान उसके हर गली कूचे से निकलती दिखाई देती है। मुझे अपनी यूरोप यात्रा में यहाँ एक दिन बिताने का मौका मिला और आज मेरी कोशिश होगी कि उन चंद घंटों में ये शहर जिस रूप में मिला उसकी एक झांकी आपके भी दिखाऊँ। 

हर बड़े शहर का एक प्रतीक चिन्ह होता है और एमस्टर्डम का प्रतीक है Iamsterdam ! शायद ही एमस्टर्डम में जाने वालों को आपने इस चिन्ह के साथ बिना तसवीर लिए लौटे देखा होगा। पर इस प्रतीक की पूर्व जानकारी बहुत काम आई और अचानक ही हमारी मुलाकात इससे हो गयी। हुआ यूँ कि दोपहर के आस पास जब हम क्यूकेनहॉफ से एमस्टर्डम पहुँचे तो बस ने हमें यहाँ के मशहूर राइक्स म्यूजियम के पिछले हिस्से की ओर उतारा। हमारे पास समय म्यूजियम देखने का तो था नहीं तो हम थोड़ा समय गुजारने के लिए इसके अगल बोल डोल ही रहे थे कि सफेद लाल रंग से रँगे दो मीटर ऊँचे इन अक्षरों की झलक दूर से दिखी। फिर तो हमारे कदमों में पंख लग गए और कुछ ही क्षणों में हम इन अक्षरों की छाँव में तस्वीरें खिंचा रहे थे।

एमस्टर्डम का प्रतीक है Iamsterdam
आप सोच रहे होंगे कि आख़िर ये निशान शहर का प्रतीक कैसे बन गया? साल 2005 में एमस्टर्डम को एक अपनी पहचान देने की मुहिम के तौर पर राइक्स म्यूजियम के पास इसे लगाया गया। इस जुमले की शुरुआत वहाँ के कारोबारियों ने की जिसे वहाँ के नागरिकों ने हाथों हाथ लिया और ये इतना लोकप्रिय हुआ कि इसे शहर का प्रतीक बना दिया गया। आज एमस्टर्डम में तीन जगहों पर आप इस 23.5 मीटर चौड़े प्रतीक चिन्ह को देख सकते हैं। पहला राइक्स म्यूजियम के सामने, दूसरा एयरपोर्ट के पास और तीसरा कहीं भी आपको दिख सकता है। मतलब शहर में हो रही व्यावसायिक व सांस्केतिक गतिविधियों के हिसाब से इसकी जगह बदलती रहती है। दुनिया के विभिन्न भागों से आए यात्रियों का आदि काल से स्वागत करने वाला इस शहर का ये प्रतीक यही कहना चाहता है कि एमस्टर्डम हम सबका है।



वैसे इन अक्षरों के साथ exclusive तसवीर खिंचवाना एक टेढ़ी खीर है। किसी भी अक्षर के किनारे, अंदर या यहाँ तक कि कूद फाँद करते हुए इसके ऊपर भी भिन्न भिन्न मुद्राओं में आपको लोग अपनी तसवीर खिंचवाते मिलेंगे। यहाँ पर खड़े होकर लोगों की गतिविधियों को देखते हुए मुझे यही महसूस हुआ कि आप विश्व के चाहे किसी कोने से ताल्लुक रखते हों, कितने भी उम्रदराज़ हों, हम सबके अंदर एक बच्चा मौजूद है।

राइक्स म्यूजियम एमस्टर्डम Rijksmuseum

फ्रांस को यूँ ही यूरोपीय सोच और कला में अग्रणी नहीं माना जाता। अब देखिए ना, जब वहाँ एफिल टॉवर  बना तो लंदन में Giant Wheel के नाम से फेरीज़ व्हील बनी। पेरिस ने अपने सांस्कृतिक दमखम को सहेजने के लिए लूव्रे म्यूजियम बनाया तो अन्य यूरोपीय देशों में भी ये जरूरत महसूस की जाने लगी और हॉलैंड भी इससे अछूता नहीं रहा । सत्रहवीं शताब्दी के आख़िर में हेग में राइक्स म्यूजियम की शुरुआत हुई। वहाँ से इसका स्थानंतरण एमस्टर्डम हुआ और फिर 1885 में ये संग्रहालय इस रूप में आया। इस इमारत की संरचना में गोथिक और यूरोप के पुनर्जागरण कालीन शैलियों का मिश्रण है। ये संग्रहालय डच इतिहास के आठ सौ सालों का विभिन्न रूपों में समेटे है जिसमें यहाँ की चित्रकला व स्थापत्य का विशेष स्थान है।

राइक्सम्यूजियम सामने से

चार साल पहले राइक्स म्यूजियम के सामने के उद्यान को एक नए रूप में सँवारा गया। सुबह से शाम छः बजे तक आप यहाँ लोगों की गहमागहमी देख सकते हैं। यहाँ खुले में ही शिल्पकला का प्रदर्शन किया जाता है जिसे देखने के लिए टिकट भी नहीं लगता।

राइक्सम्यूजियम उद्यान Rijksmuseum's garden


LinkWithin

Related Posts with Thumbnails