रविवार, 19 जून 2022

तारादेवी व शिमला की वो बारिश भरी शाम A misty evening in Shimla and Taradevi

यह शिमला के मेरी पहली यात्रा नहीं थी। अंतर सिर्फ इतना था की पहली बार मनाली से लौटते हुए शिमला में रुके थे और इस बार शिमला होते हुए किन्नौर और फिर स्पीति की यात्रा पर जा रहे थे। इस बार एक फर्क ये भी था कि शिमला के आस पास होते हुए भी हम शहर से कोसों दूर थे। शहर से दूर रहकर उसकी खूबसूरती को देखना बेहद सुकूनदेह होता है, खासकर तब जब आप पहाड़ों में हैं। ये बात मैंने मुन्नार और मसूरी जैसी जगहों में अनुभव करके देखी थी।  

मुन्नार से थेक्कड़ी के रास्ते में जाती घुमावदार सड़कों के दोनों ओर मखमली कालीन की तरह बिछे चाय बागानों में अपने आप को गुम कर लेना और कानाताल में सुबह सुबह बड़े से चांद को पर्वतों के पीछे ढकेल कर बंदरपूंछ की चोटियों पर सूर्य की पहली किरणों के स्पर्श का इंतजार करना अभी तक भूला नहीं है। इसीलिए इस बार जब शिमला गए तो मुख्य शहर में न रहकर वहां से दस किमी दूर तारा देवी में रहना मुनासिब समझा।


तारा देवी में मां दुर्गा का एक प्राचीन मंदिर है। सत्रहवीं शताब्दी में सेन वंश के शासकों ने इसे बनाया था। आज भी हिमाचल के जुनगा में उनका प्राचीन महल जीर्ण शीर्ण हालत में उपस्थित है। ऐसी किंवदंतियाँ है कि दुर्गा की बेहद छोटी एक प्रतिमा को लॉकेट के रूप में बंगाल से शिमला तक लाया गया था । बाद में राजा भूपेंद्र सेन को स्वप्न में जब माँ तारा ने दर्शन दिए तो राजा ने यहाँ मंदिर बनाने के आदेश दिए। तारा देवी की पहली प्रतिमा लकड़ी की बनी जिसे बाद में अष्ट धातु से बदल दिया गया।  

हिंदी फिल्मों में असित सेन, अपर्णा सेन व सुचित्रा सेन जैसे नामी कलाकारों को तो आप सभी जानते हैं पर शिमला में ऐसे नाम के शासकों का होना उनके बंगाल से जुड़ाव की ओर इशारा करता था। इतिहास के पन्ने टटोले तो पता चला कि शिमला के आस पास के इन इलाकों में क्योंथल रियासत के राजा राज करते थे जिनके पहले नरेश बंगाल से यहाँ पधारे थे इसीलिए ये वंश सेन वंश कहलाया। 

बारिश में नहाते तारा देवी के घने जंगल

दिल्ली से चंडीगढ़ होते हुए जब हम दिन में 3:00 से 4:00 के बीच तारा देवी पहुंचे तो हल्की हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। होटल के सामने ही हरी-भरी शानदार घाटी थी बादलों के पतले पतले फाहे बड़ी तेज़ी से उमड़ते घुमड़ते नीचे घाटी की तलहटी को छूने आ रहे थे। पर्वतों के शिखर के आस पास पेड़ों को उन्होंने अपने आँचल में छुपा रखा था। नीचे घना जंगल था और उसके ठीक बीचों बीच तीन चार घर दिखाई दे रहे थे प्यारे से। मन किया कि उड़ के पहुँच जाऊँ उन घरों के बाहर पसरी हुई हरी दूब की चादर पे, इससे पहले कि बादल उन्हें इस बाहरी दुनिया से ओझल कर दें।

दिमाग ने कल्पना को हल्की सी चपत लगाई और दुष्यंत कुमार का ये शेर फुसफुसाते हुए कानों में डाल दिया

दिल को बहला ले इजाज़त है मगर इतना न उड़
रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख।

तो बस मन मसोस कर अपने सपने को कैमरे में क़ैद भर कर लिया। तस्वीर खिंचने के चंद मिनटों में बाहर मेघों की स्याह सफेदी के आलावा कुछ भी नहीं था। ना वो घर , ना घाटी में फैले हुए हरे भरे जंगल। मेरा सपना उस सफेद धुंध में गुम सा हो गया था।

बारिश की वजह से करीब साढे 6 किलोमीटर दूर तारा देवी के मंदिर में जाना संभव तो नहीं हो पाया इसलिए सामने के जंगल का आनंद लेते हुए हम यूं ही चहल कदमी करने लगे। 

होटल के बाहर गौरैया का एक बड़ा सा झुंड

बारिश की फुहारों के बीच ही पक्षियों का कलरव सुनाई दिया। थोड़ी ही दूर पर एक झाड़ी के आस पास गौरैया का विशाल झुंड सम्मेलन कर रहा था। कहाँ भारत के कई हिस्सों में ये कभी कभार नज़र आती हैं पर यहाँ प्रकृति की हरी चादर के बीच मज़े में हँसी ठिठोली कर रही थीं। बगल की डाल पर हिमालय में रहने वाली काली और पीले पार्श्व वाली बुलबुल भी उड़ती नज़र आयीं। सामने अपने दोनों हाथों खोल बुलाता जंगल, पक्षियों की चहचहाहट और मंद मंद चलती ठंडी बयार मन को प्रफुल्लित किये दे रही थी। मन में यही विचार आया कि दुनिया की हर जगह ऊपरवाले ने अपने आप में निराली और विशिष्ट बनाई थी पर कई जगह हमने उसके मूल स्वरूप से इतनी छेड़छाड़ की वो जगहें उजाड़ और रसहीन हो गयीं।

कमरे की खिड़की से बाहर की छटा

आधे घंटे बाद होटल के कमरे में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए शीशे का पर्दा हटाया तो बारिश गायब थी। पर पहाड़ों की बारिश का क्या ठिकाना कब जाए और कब वापस आ जाए? सो हम निकल लिए ढलती शाम और उतरते अँधेरे के बीच शिमला का रूप रंग देखने के लिए। बाहर आसमान खुल चुका था। घाटी में उतरे हुए बादल अपने को जलविहीन कर मानो अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए थे। हल्के फुल्के मन से अब वो पास पड़ोस की घाटियों पर डोरे डालने में लगे थे।

घाटी में तफ़रीह करते बादल


सूरज की किरणें शिमला के रंग बिरंगे घरों को कल फिर आने का वादा दे के पर्वतों के पार धीरे धीरे कदमों से आगे बढ़ते हुए विदा ले रही थीं। बड़ा ही सुहाना दृश्य था। आख़िर मुझसे ना रहा गया तो किनारे गाड़ी खड़ी करवा के चुपचाप ढलते सूरज और मचलते बादलों को निहारता रहा। ढेर सारी तस्वीरें लीं और फिर शिमला की ओर बढ़ चला।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

चला मन फिर पलाश के पीछे Flame of Forest : Palash

हर साल बसंत ॠतु के आगमन के साथ इंतज़ार रहता है कि कब पलाश की कलियाँ फूल बन कर पूरी छटा को अपनी लालिमा से ढक लेंगी। होली आते आते पलाश अपने रूप रंग में आने लगता है और ये आज की बात नहीं है। पहले जब रासयनिक रंग नहीं होते थे होली का त्योहार टेसू से बनाए गए गुलाल से लहकता महकता था। आदिवासी समाज तो प्राकृतिक रंगों का प्रयोग शुरु से करता आया है। वक्त के साथ इनके इस्तेमाल की प्रवृति आम जन मानस में भी बढ़ी है।

लग गयी आग; बन में पलाश, नभ में पलाश, भू पर पलाश
लो, चली फाग; हो गयी हवा भी रंगभरी छू कर पलाश

गर्मियों में पलाश का सुर्ख नारंगी रंग जंगल की आग की तरह सखुआ के जंगलों में यहाँ वहाँ फैलता है। बसंत में जहाँ सखुआ अपनी हरीतिमा और अपने हल्के पीले फूलों से हमारी आँखों को तरोताज़ा रखता है वही पलाश की लाली 
अपनी लहक से उस हरियाली को और मनोहर बना देती है।
सखुआ के हरे भरे जंगल और उनके बीच से झांकता पलाश


जनजातीय समाज में सखुआ के वृक्षों का विशेष महत्त्व रहा है। प्रकृति पर्व सरहुल जो कि आदिवासी नववर्ष के रूप में मनाया जाता है में सखुआ की पूजा की जाती है और स्त्रियाँ उसके पुष्प सिर में लगा कर नृत्य करती हैं। जंगल से जुड़े आदिवासी समुदाय में हर व्यक्ति को सखुआ के पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है। शायद यही वज़ह है झारखंड, छत्तीसगढ़, बंगाल और उड़ीसा के जंगलों में प्राकृतिक साधनों के दोहन के बाद भी सखुआ के जंगल बहुतायत में हैं। वसंत में सेमल और गर्मियों में पलाश सखुआ के इस एकछत्र साम्राज्य को तोड़ता है।


सखुआ के वृक्षों से अलग पलाश के वृक्ष यत्र तत्र बिखरे नज़र आते हैं। दूर से इन्हें देख के ऐसा लगेगा कि धूप से पीली पड़ चुकी धरती पर किसी ने आधर उधर नारंगी स्याही छिड़क दी हो। 

सखुआ के जंगलों के सामने बिखरे पलाश वृक्ष

लो, डाल डाल से उठी लपट! लो डाल डाल फूले पलाश
यह है बसंत की आग, लगा दे आग, जिसे छू ले पलाश

एक पंक्ति में जमे पलाश के वृक्षों की मोहक कतार

बहुत से बहुत तो एक सीध में इनके पेड़ों का झुरमुट तो मिल जाएगा पर उसका विस्तार कभी सखुआ जैसा नहीं होता। पलाश ज्यादा ऊँचे भी नहीं होते। एक सीध ऊँचाई में बढ़ना इनकी फितरत में नहीं है। बस टेढ़े मढ़े होकर इधर से उधर झूलते रहेंगे। कभी सखुआ तो कभी महुआ तो कभी खजूर जैसे वृक्षों के साथ। भगवन ने इन्हें इतने सुंदर फूलों का उपहार दिया पर साथ में ये नियति भी कि जब वृक्ष फूलों से भरा रहेगा तो उसके नीचे बैठने वालों को पत्तों की छाँव भी नसीब नहीं होगी।


पलाश का भी धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग होता है पर उतना नहीं जितना सखुआ का। पलाश के व्यवसायिक उपयोग ज्यादा हैं। रंगों के लिए इसके फूल का और बतौर दवा के लिए इस पेड़ की छाल, बीज का प्रयोग करने की प्राचीन परंपरा है। इसके पत्तों का उपयोग आदिवासी क्षेत्रों में खाने के पत्तल या सब्जी रखने के लिए दोना बनाने में किया जाता रहा है। हालांकि आजकल इसके पत्तों को दरकिनार कर प्लास्टिक प्लेटेों का चलन बढ़ता जा रहा है।

सुवर्णरेखा नदी के तट पर

इनके बारे में एक नई बात ये पता चली कि जब जंगल के बाकी पेड़ों को उगने के क्षमता जाती रहती है तो वहां पलाश अपनी कमान संभालते हैं। यही वज़ह है की पलाश जंगल की बाहरी परिधि के आस पास अकेले में अपना आशियाना बनाते हैं।
खजूर के पेड़ों के साथ

फूलों से लदे पलाश के वृक्ष


पलाश को ढाक के नाम से भी जाना जाता है। वही ढाक के तीन पात वाला मुहावरा भी इसी वृक्ष से आया है क्यूँकि इसकी किसी भी टहनी से निकली शाखाओं में बस तीन ही पत्ते रहते हैं। बहुत लोगों को ये शिकायत रहती है कि अन्य फूलों की तुलना में पलाश मुश्किल से दो हफ्ते से ज्यादा नहीं ठहरता। कबीर इसलिए पलाश के बारे में कह गए हैं..

दस दिन फूला फूल के खंखड़ भया पलास 

पर अपनी इन दो तीन हफ्तों की झलक में ही पलाश गर्मी के रूखे सूखे मौसम में आंखों को तृप्त कर देते हैं।



उत्तर प्रदेश के साथ साथ पलाश झारखंड का भी राजकीय पुष्प है। झारखंड में आपको पलाश के पेड़ों से रूबरू होने के लिए जंगलों की ओर किसी भी दिशा में निकलना काफी है। भारतीय रेलवे की दया से डिब्बे की खिड़कियाँ कभी इतनी साफ रहती नहीं कि बढ़िया तस्वीरें ली जा पाएँ। इसलिए जब भी मार्च अप्रैल में ट्रेन से बाहर निकलने का मौका लगता है तो मेरा आधा वक्त डिब्बे के दरवाजे के पास ही बीतता है। दामोदर, सुवर्णरेखा, जमुनिया जैसी नदियों के पाट पर दूर दूर तक फैले इन पेड़ों को देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है। ट्रेन से इन पेड़ों का फैलाव सड़क की तुलना में एक ऊँचाई से दिख पाता है।
जहां जंगल खत्म हो जाते हैं वहां भी पलाश खड़ा हो जाता है।

खुजूर और पलाश की दोस्ती

नदी के किनारों को भी पलाश पसंद है।


खेत खलिहानों के बीच




देश के पूर्वी हिस्से में गर मार्च अप्रैल के महीने में रुख करें तो इस नारंगी फूल के दर्शन से ना चूकें। भविष्य में इस ब्लॉग पर नई पोस्ट की सूचना पाने के लिए सब्सक्राइब करें। 

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

सड़क मार्ग से चलिए राँची से राउरकेला तक Road Trip from Ranchi to Rourkela

राँची से राउरकेला तक अक्सर ट्रेन से जाना होता रहा है। ट्रेन बड़े मजे में तीन घंटे में वहाँ पहुँचा देती है। कर्रा, लोधमा, गोविंदपुर रोड, बकसपुर जैसे स्टेशनों से होते हुए बानो पहुँचिए और फिर वहाँ से झारखंड और ओड़िशा के सीमावर्ती घने जंगलों का आनंद लेते हुए नुआगाँव में प्रवेश कर जाइए। बरसात में इन पठारी इलाकों के बीच की धान की खेती और गर्मियों में सेमल और पलाश के फूलों को खिलता देखना पूरे सफ़र में आँखों को तरोताज़ा रखता है।

सकल बन फूल रही सरसों

पर इस बार मुझे मौका मिला इसी दूरी को सड़क से नापने का। अभी मौसम का हाल तो ये है कि फरवरी में भी पूरी तरह ठंड जाने का नाम नहीं ले रही इसलिए सेमल के फूलों की लाली देखने को नहीं मिली। हाँ सरसों के हरे पीले खेतों ने नज़ारा रंगीन जरूर कर दिया।

सोमवार, 1 नवंबर 2021

पहाड़ के कोने पर टिका धनकर का बौद्ध मठ और रोमांच धनकर झील ट्रेक का ! Dhankar Gompa and Dhankar Lake Trek

स्पीति की यात्रा करने के बहुत पहले से वहाँ की दो तस्वीरें मेरे मन में घर कर चुकी थीं। एक तो हरे भरे खेतों के बीचों उठती लांग्ज़ा में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा तो दूसरी पहाड़ की संकरी चोटी पर लटकता हुआ सा प्रतीत होता धनकर का बौद्ध मठ जिसे यहाँ धनखर के नाम से भी जाना जाता है। बाद में स्पीति की यात्रा की योजना बनाते समय ये भी पता चला कि मठ से थोड़ी चढ़ाई पर एक छोटा सा ताल भी है जिस तक पहुँचने के लिए करीब एक घंटे लगते हैं। फिर धनकर के इस ऐतिहासिक मठ के साथ साथ वो अनजानी सी झील भी मेरे सफ़र का हिस्सा बन गयी।

धनकर का बौद्ध मठ व किला जिसके अवशेष मात्र ही रह गए हैं

काज़ा की वो सुबह मन में स्फूर्ति भर कर लाई थी। स्पीति के सबसे पुराने मठ को देखने की ललक तो थी ही साथ ही इतनी ऊँचाई पर एक छोटा सा ही सही ट्रेक कर धनखर की पवित्र झील तक जाने का रोमांच भी था। हालांकि मेरे साथी थोड़ा सशंकित जरूर थे क्यूँकि इस तरह की यात्रा का उनका ये पहला अनुभव था पर उत्साह की कमी उनमें भी नहीं थी। 

स्थानीय विद्यालय की शिक्षिका के साथ हम सब

काज़ा से धनकर की दूरी मात्र 33 किमी की है। सीधा सा रास्ता है जो स्पीति नदी के किनारे किनारे होता हुआ करीब एक घंटे में धनकर पहुँचा देता है। काज़ा से पाँच छः किमी आगे बढ़े थे कि रास्ते में हमारी गाड़ी को रोकने का इशारा करती एक युवती मिल गयी। उसे भी धनकर जाना था। हमने उसे बिठा लिया। पता चला कि वहीं के स्कूल की शिक्षिका है। वो रोज़ काज़ा के आगे के एक गाँव से धनकर में बच्चों को पढ़ाने जाती थी। अपने गाँव कस्बों के विद्यालयों से तुलना करूँ तो उसके स्कूल की इमारत शानदार थी पर जिस गाँव की आबादी ही कुल जमा तीन सौ हो वहाँ बच्चे कितने होने थे? 

धनकर का साफ सुथरा प्यारा सा  गाँव 

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

सखुआ और पलाश के देश में : रेल यात्रा झारखंड की A train journey through Jharkhand

कोरोना की मार ऐसी है कि चाह के भी लंबी यात्राओं पर निकलना नहीं हो पा रहा है। फिर भी अपने शहर और उसके आस पास के इलाकों को पिछले कई महीनों से खँगाल रहा हूँ। बीते दिनों  में अपने दूसरे ब्लॉग एक शाम मेरे नाम पर व्यस्तता ऐसी रही कि यहाँ लिखने का समय नहीं मिल पाया। अब उधर से फुर्सत मिली है तो पिछले कुछ महीनों की हल्की फुल्की घुमक्कड़ी में जो बटोरा है उसे आपसे साझा करने की कोशिश करूँगा।

सखुआ के घने जंगल 

शुरुआत पिछले हफ्ते की गयी एक रेल यात्रा से। बचपन से ही मुझे ट्रेन में सफ़र करना बेहद पसंद रहा है। जब भी नानी के घर गर्मी छुट्टियों में जाना होता मैं खिड़की वाली सीट सबसे पहले हथिया लेता। घर में भले ही सबसे छोटा था पर किसी की मजाल थी जो मुझे खिड़की से उठा पाता। दिन हो या रात खिड़की के बाहर बदलते दृश्य मेरे मन में विस्मय और आनंद दोनों का ही भाव भर देते थे। खेत-खलिहान, नदी-नाले, पहाड़, जंगल, गांव, पुल सभी की खूबसूरती आंखों में बटोरता मैं यात्रा के दौरान अपने आप में मशगूल रहता था।

आज भी जब मुझे कोई खिड़की की सीट छोड़ने को कहता है तो मैं उस आग्रह को कई बार ठुकरा देता हूँ। इस बार होली में घर आने जाने में दो बार रेल से सफ़र करने का मौका मिला।

जाने की बात तो बाद में पर मेरी वापसी सुबह की थी। आसमान साफ था और धूप साल के हरे भरे पत्तों पर पड़कर उनका सौंदर्य दोगुना कर दे रही थी। साल (सखुआ) के पेड़ जहां अपने हरे भरे परिवार और क्रीम फूलों के साथ मुस्कुरा रहे थे तो वहीं कुछ पेड़ों में पतझड़ का आलम था। इन सब के बीच पलाश भी बीच बीच में अपनी नारंगी चुनर फैला रहा था।
कुल मिलाकर दृश्य ऐसा कि आंखें तृप्त हुई जा रही थीं। इसी यात्रा के कुछ नज़ारे आप भी देखिए।

नीली नदी जो इस वसंत में हरी हो गयी 😍

हरी भरी वसुन्धरा पर नारंगी चुनर पलाश की

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