रविवार, 2 नवंबर 2008

कोणार्क का सूर्य मंदिर : जिसका गुम्बद कभी समुद्री पोतों का 'काल' होता था

दशहरे के पहले आपको मैं पुरी और चिलका की यात्रा करा चुका था। फिर त्योहार और कार्यालय के कामों में ऍसा फँसा कि आगे के पड़ावों के बारे में लिख ना सका। तो आज अपनी उड़ीसा यात्रा को आगे बढ़ाते हुए बारी कोणार्क के विश्व प्रसिद्ध मंदिर (Sun Temple at Konark) की..


पुरी से कोणार्क का रास्ता बड़ा मोहक है। एक तो सीधी सपाट सड़क और दोनों ओर हरे भरे वृक्षों की खूबसूरत कतार। कोणार्क के ठीक पहले चंद्रभागा का समुद्री तट दिखाई देता है। हम लोग कुछ देर वहाँ रुककर कर तेजी से उठती गिरती लहरों का अवलोकन करते रहे। यहाँ समुद्र तट की ढाल थोड़ी ज्यादा है इसलिए नहाने के लिए ये तट आदर्श नहीं है।




कुछ देर बाद हम कोणार्क के मंदिर के सामने थे। क्या आपको पता है कि कोणार्क शब्द, 'कोण' और 'अर्क' शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा। कोणार्क का सूर्य मंदिर पुरी के उत्तर पूर्वी किनारे पर समुद्र तट के करीब निर्मित है। इसे गंगा वंश (Ganga Dynasty) के राजा नरसिम्हा देव (Narsimha Deva) ने १२७८ ई. में बनाया था।


कहा जाता है कि ये मंदिर अपनी पूर्व निर्धारित अभिकल्पना के आधार पर नहीं बनाया जा सका। मंदिर के भारी गुंबद के हिसाब से इसकी नींव नहीं बनी थी। पर यहाँ के स्थानीय लोगों की मानें तो ये गुम्बद मंदिर का हिस्सा था पर इसकी चुम्बकीय शक्ति की वजह से जब समुद्री पोत दुर्घटनाग्रस्त होने लगे, तब ये गुम्बद हटाया गया। शायद इसी वज़ह से इस मंदिर को ब्लैक पैगोडा (Black Pagoda) भी कहा जाता है।

19 वीं शताब्दी में जब इस मंदिर का उत्खनन किया गया तब ये काफी क्षत-विक्षत हो चुका था। जैसे ही इस मंदिर के पूर्वी प्रवेश द्वार से घुसेंगे सामने एक नाट्य शाला दिखाई देती है जिसकी ऊपरी छत अब नहीं है। कोणार्क नृत्योत्सव (Konark Festival) के समय हर साल यहाँ देश के नामी कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते है।

और आगे बढ़ने पर मंदिर की संरचना, जो सूर्य के सात घोड़ों द्वारा दिव्य रथ को खींचने पर आधारित है, परिलक्षित होती है। अब इनमें से एक ही घोड़ा बचा है। वैसे इस रथ के चक्कों, जो कोणार्क की पहचान है को आपने चित्रों में बहुधा देखा होगा। मंदिर के आधार को सुंदरता प्रदान करते ये बारह चक्र साल के बारह महिनों को प्रतिबिंबित करते हैं जबकि प्रत्येक चक्र आठ अरों (Spokes) से मिल कर बना है जो कि दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं।



पूरे मंदिर की दीवारें पर तरह तरह की नक्काशी है। कहीं शिकार के दृश्य हैं, तो जीवन की सामान्य दैनिक कार्यों के। कुछ हिस्से में रति क्रियाओं और दैहिक सुंदरता को भिन्न कोणों से दिखाने की कोशिश की गई है। मज़े की बात ये रही कि जब भी ऍसा कोई शिल्प पास आने वाला होता हमारा गाइड समूह के पुरुषों को तेजी से आगे बढ़वाकर धीरे से फुसफुसाता कि ये देखिए ! :)

मंदिर के चारों ओर आर्कियालॉजिकल सर्वे आफ इंडिया (Archeological Survey of India) ने एक बेहद सुंदर हरा भरा बाग बना रखा है जो इन खंडहरों में एक जीवंतता लाता है...आप भी देखिए, खूबसूरत है ना ? 

इस वृत्तांत के अगले हिस्से में देखेंगे वो जगह, जहाँ कभी सम्राट अशोक ने भयंकर युद्ध के बाद हमेशा के लिए शांति को अंगीकार किया था।

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13 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामीनवंबर 02, 2008

    बहुत अच्छी जानकारी | आभार

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  2. बहुत ही सुंदर विवरण. बड़ी बेसब्री से इसका इंतज़ार था. आभार.
    http://mallar.wordpress.com

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  3. पुरी जगह ही ऐसी है ..की जितनी बार पढो नया सा लगता है .बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने ..मनीष जी

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति... आगे नंदन-कानन भी गए होंगे ?

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  5. बहुत ही सुन्दर, आप ने बहुत मेहनत की है इस लेख पर , ओर सब कुछ विवरण से बताया , इस जानकारी के लिये धन्यवाद

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  6. बहुत अच्छी जानकारी

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  7. सुँदर चित्र व लिन्क्स के साथ अच्छा आलेख रहा मनीष भाई

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  8. बहुत सुन्दरता से बखाना है यात्रा वृतांत हमेशा की तरह. सोचता हूँ क्या आप घूमते समय इस बात को ध्यान में रखे रहते हैं कि अभी इस पर लिखना है? बताईयेगा..नोटस तो जरुर बना लेते होंगे तुरंत.

    बहुत बेहतरीन रहता है.

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  9. लेख पसंद करने के लिए आप सबका आभार !

    समीर भाई लिखता तो मैं हमेशा से आया हूँ अपनी सभी यात्राओं के बारे में । मेरे साइट नोट्स मेरा कैमरा लेता है जिससे यात्रा की ढ़ेर सारी तसवीरें लेता रहता हूँ ताकि जब उसके बारे में लिखूँ, सारा दृश्य ज़ेहन में उभरकर आ सके।

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  10. कोणार्क पूरी से नजदीक होगा या चिलका से..?? ये कितनी दूरी पे है..?? और जानें के क्या साधन हैं..??
    कृपया मार्गदर्शन करें..

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    1. कोर्णार्क पुरी और भुवनेश्वर के साथ एक त्रिकोण बनाता है। पुरी से लौटते हुए भी कोणार्क होते हुए भुवनेश्वर जाया जा सकता है और इसके ठीक उलट भुवनेश्वर से कोर्णार्क होते हुए एक ही दिन में पुरी जाया जा सकता है। चिलका लोग पुरी से जाते हैं। मात्र एक डेढ़ घंटे का सफ़र है। वहाँ रहने की व्यवस्था है पर अगर होटल भरे हों तो चिलका से शाम को वापस पुरी लौटा जा सकता है। वहाँ जाने के लिए बस या जीप या आटो सभी मिलते हैं।

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  11. aapka blog bahut achha laga .. history ki student hun lekin aaj pata chala ki is mandir ko black pagoda kyon kahte hain.

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    1. जानकर खुशी हुई कि आपको ब्लॉग पसंद आया। आपके शहर जोधपुर पर भी हाल ही में एक श्रंखला की थी। आशा है आप भविष्य में भी ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेखों पर अपने विचार व्यक्त करती रहेंगी।

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