सोमवार, 9 अप्रैल 2012

उदयपुर से माउंट आबू का सफ़र : कैसे बना आबू पर्वत ?

जब हमने अपनी राजस्थान यात्रा का कार्यक्रम बनाया था तो यही सोचा था कि यात्रा की शुरुआत माउंट आबू से करें और उसके बाद उदयपुर होते हुए जोधपुर की ओर बढ़ चलें। पर होटल की अनुपलब्धता की वज़ह से हमें शुरुआत उदयपुर से करनी पड़ी। उदयपुर में रहते हुए हमने चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़ और राणकपुर के मंदिरों को देख लिया। पर तीन रातें उदयपुर में बिताने के बाद भी ये मुगालता रह ही गया कि आज के उदयपुर को बाजारों, मोहल्लों, लोगोंके माध्यम से देखने व महसूस करने का मौका कम ही मिल पाया।

सज्जनगढ़ की ओर जाते वक़्त हम जरूर शहर के अंदर से निकले और सिटी पैलेस से नीचे उतरती सड़क पर बनी छोटी बड़ी दुकानों और बेतरतीब ट्राफिक से भी कई बार सामना हुआ। यहाँ के बाजार देखने का मौका ही नहीं मिला और रही खाने की जगहों की बात तो रात का खाना हमने हर दिन एक ही भोजनालय (जोधपुर रेस्ट्राँ) में किया क्यूँकि दिन भर मिर्च के चक्कर में आँसू बहाने वाले पुत्र को वहीं का भोजन रास आया था।

इस पूरी यात्रा में मेरे मन में उदयपुर और जैसलमेर को देखने का बड़ा रोमांच था और उदयपुर मुझे अपनी आशा के अनुरूप ही बेहद सुंदर लगा था। खासकर रात के समय जगमगाते उदयपुर की अद्भुत आभा को मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा। अपने राजस्थान भ्रमण की चौथी सुबह जब हम उदयपुर को छोड़ रहे थे तो मन में यही भाव उठ रहे थे कि यहाँ दोबारा भी आना अच्छा लगेगा।


माउंट आबू से आने वाले यात्रियों से हमने वहाँ की नक्की झील और दिलवाड़ा मंदिर का जिक्र बारहा सुना था। इसके आलावा पिताजी को वहाँ के ब्रह्मा कुमारी के आध्यात्मिक संगठन के मुख्यालय में जाने की बड़ी उत्सुकता थी। सुबह के करीब दस बजे हमारा समूह उदयपुर छोड़ चला था। शीघ्र ही हम राष्ट्रीय राजमार्ग 27 ( NH 27) पर आ गए थे। चार लेनों वाले इस राजमार्ग पर आप आसानी से 80-90 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से गाड़ी दौड़ा सकते हैं। पर राजस्थान में ये बात आम है कि जितनी अच्छी सड़क होगी उतने ही ज्यादा नाके आएँगे। उदयपुर और माउंट आबू के बीच कम से कम पाँच छः बार टौल लेने देने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। मन ही मन सोचता रहा कि दस, बीस पचास के पत्तों को लाइन में लग कर बार बार सरकाने की बजाए अगर एक या दो बार में ही एकमुश्त पैसे ले लिए जाएँ तो कितना अच्छा रहे। सफ़र में रुकावट भी कम और इतने टौल प्लाजा (Toll Plaza)  की जरूरत भी नहीं रहेगी तब तो।

ख़ैर मौसम साफ था और रास्ते में आबादी बहुत ही कम थी। अरावली की पहाड़ियाँ रह रह कर सड़क के कभी एक तो कभी दोनों तरफ़ आ रही थीं। पहाड़ को तोड़ कर बनाए गए रास्ते का यह दृश्य सफ़र के कई महिने बाद भी मन में अंकित रहा।



रास्ते में दो सुरंगें भी आयीं। पहली सुरंग लंबी थी...


सुरंग पर उखलियात ( Ukhliyat ) लिखा था जो संभवतः इसके आसपास के गाँव का नाम हो । दूसरी सुरंग इसके तुरंत बाद थी पर इससे छोटी थी नाम था खोखरियानाल ( Khokhariyanal )


लगभग दो घंटों के सफ़र के बाद हम आबू रोड के करीब आ चुके थे। रेल के माध्यम से आने वाले यात्रीगण इसी स्टेशन पर उतर कर ऊपर की चढ़ाई करते हैं। वैसे भी आबू रोड से आबू पर्वत के गोल घुमावदार रास्ते के सफ़र को जारी रखने के लिए यहाँ उतर कर थोड़ा विश्राम कर तरोताज़ा होना बेहतर है।


पर इससे पहले कि आबू रोड से माउंट आबू की बाइस किमी की अंतिम दूरी तय की जाए क्या आप ये नहीं जानना चाहेंगे कि आखिर इसका ये नाम पड़ा कैसे? दरअसल हिन्दुओं के पौराणिक ग्रंथों में इस जगह का बार बार उल्लेख मिलता है। मनोहर बंदोपाध्याय अपनी किताब 'टूरिस्ट डेस्टिनेशन्स आफ इंडिया' में पद्म पुराण से ली गई एक कथा का जिक्र करते हैं।


इसके अनुसार समुद्र मंथन से जो कामधेनु गाय उत्पन्न हुई थी वो इसी इलाके की एक गहरी खाई में जा गिरी। यहीं महर्षि वशिष्ठ की कुटिया थी। जब उन्हें ये पता चला तो उन्होंने सहायता के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की। शिव ने अपनी शक्तियों से दिव्य नदी सरस्वती (जो भूमि के नीचे बहती हैं) को धरती से बाहर निकाला। सरस्वती ने अपने जल से पूरी खाई को ऊपर तक भर दिया और कामधेनु गाय उस पर तैरती बाहर निकल आई। कामधेनु तो निकल गई पर महर्षि चिंतामुक्त नहीं हुए। उनके मन में ये बात चलती रही कि इस खाई में कभी कोई भी गिर सकता है। इस समस्या का पूर्णकालिक निदान के लिए उन्होंने हिमालय की अराधना प्रारंभ की। कहते है कि हिमालय और सर्प देव अर्बुदा की मदद से इस खाई को पाटने के लिए यहाँ एक पर्वत लाया गया और तब से इस स्थान का नाम अर्बुदांचल (Arbudanchal) और इस इलाके का नाम अर्बुदारण्य पड़ा। कालांतर में ये नाम आबू पर्वत (Mount Abu) में तब्दील हो गया।


वैसे आबू नामकरण के लिए ऐसी कई और किवदंतियाँ भी प्रचलित हैं जिसमें कुछ महर्षि विश्वामित्र से भी जुड़ी हैं। बहरहाल हम बीस मिनट के अंतराल के बाद आबू पर्वत की ओर बढ़ चले थे। हरे भरे जंगलों  को काटते हुए हमारी गाड़ी ने एक घुमाव लिया ही था कि अचानक ही ये विशालकाय पहाड़ सामने खड़ा हो गया। काफी देर तक मेरी नज़रें इस पर्वत पर टिकी रहीं। जगह जगह फैली नंगी चट्टानों के बीच हरियाली के टुकड़े ऊंचाई तक बिखरे थे।


माउंट आबू के अखिरी नाके को पार कर कर करीब सवा एक बजे हम इस पर्वतीय स्थल में दाखिल हो चुके थे। हमें यहाँ बैंक के गेस्ट हाउस में ठहरना था। चूंकि किसी ने वो घर गेस्ट हाउस के तौर पर किराए में दिया था इसलिए उसे खोजने में थोड़ी देर लगी। सामान रखने के बाद खाने का आर्डर दे कर मैं इस हिल स्टेशन का ज़ायजा लेने बाहर निकला। मुख्य मार्ग पर थोड़ी ही दूर बढ़ने पर पर्यटक सूचना केंद्र दिखा। कर्मचारी तो वहाँ नहीं दिखे पर वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मी ने मुझे वहाँ का पर्यटन मानचित्र दिया। उससे ये समझ आया कि नक्की झील (Nakki Lake) पास ही है। चूंकि हमारे पास एक दिन का समय और था इसलिए हमने सोचा कि अब भोजन और हल्का आराम कर चार बजे झील की ओर निकला जाए।

मौसम का रंग बदल रहा था। रास्ते में भी बूँदाबादी एक दो बार हो चुकी थी । आसमान में बादलों कीआवाजाही जारी थी। सवा चार बजे जब हम झील के पास पहुँचे तो वहाँ पर्यटकों की भारी भीड़ मौजूद थी। टिकट काउंटर पर यात्रियों की लंबी कतारें थीं। कुल मिलाकर झील की पहली झलक हमें इतना आकर्षित नहीं कर रही थी कि उस भीड़ में बोटिंग के लिए टिकट लिया जाए और फिर अपना नंबर आने की प्रतीक्षा की जाए।


अगली दो शामों में कुछ घंटे हमने इस झील के करीब चहलकदमी करते हुए बिताए। क्या दिखा हमें इस झील के आस पास..उन दृश्यों की झलक ले के शीघ्र उपस्थित होता हूँ इस यात्रा विवरण की अगली कड़ी में..
मुसाफिर हूँ यारों हिंदी का एक यात्रा ब्लॉग

 माउंट आबू से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

12 टिप्‍पणियां:

  1. I have never been to Mt. Abu but it looks beautiful thourgh your lens.

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    1. As u will see in coming posts going to the topmost peak at GuruShikhar was most cherishing moment at Mt Abu. Apart from Guru Shikhar & Dilwara temple the place is so so in comparision with other hill stations.

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  2. बडी़ ही खूबसूरत जगह है.... अगली पोस्ट का इंतजार है........

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    1. अभी तो प्रशांत हमने माउंट आबू तक का रास्ता तय किया है। शहर आबू आपको कैसा लगेगा ये तो आप आगे की पोस्टस में ही जान पाओगे।

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  3. जब लेखनी में डूब गए तब क्रमश: आ गया। आगामी पोस्‍ट का इंतजार रहेगा।

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    1. ज्यादा लंबा लिखने से लगता है कि पढ़नेवाले को बोर ना कर दूँ। इसलिए क्रमशः का सहारा लेना पड़ता है ।

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  4. आपकी पोस्ट पहली बार देख रहा हूँ, अच्छी लगी, आगे ओउर कंहा कंहा घुमाओगे भाई.

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    1. इस महिने तो माउंट आबू..आगे जोधपुर , जैसलमेर , बीकानेर..

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  5. क्या मांउन्ट आबू भ्रंमण को एक दिन मे पूरा किया जा सकता है ?

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    1. अगर आप रात तक माउंट आबू पहुँच गए हैं तो अगली रात तक आबू की मुख्य जगहों को निबटा सकते हैं। सुबह सुबह गुरु शिखर तथा कुछ मंदिरों को देखिए। भोजन के बाद दिलवाड़ा मंदिर देखिए और शाम को नक्की झील में नौकायन का लुत्फ़ उठाइए। वैसे समय कम हो तो नक्की झील छोड़ दीजिए।

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